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Vasundra singh

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Vasundra singh

@vasundra • Joined Jun 2016 • Active 4 years ago

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by Vasundra singh

अन्नदाता

February 20, 2021 in Poetry on Picture Contest

मैं किसान हूं
समझता हूं मैं अन्न की कीमत
क्योंकि वो मैं ही हूं
जो सींचता हूं फसल को
अपने खून और पसीने से
मरता हूं हर रोज
अपने खेत की फ़सल को जिंदा रखने के लिये
ताकि रहे न कोई भूखा
कोई इस दुनिया में
फिर भी तरसता हूं खुद ही
रोटी के इक निवाले को
ले जाता है कोई सेठ
मेरी पूरी फ़सल को
ब्याज के बहाने, कोढ़ियों के दाम
लड़ता हूं अकेला
आकर शहर की सड़्कों पर
फिर भी नहीं हो
तुम साथ मेरे
अपने अन्नदाता के!

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by Vasundra singh

जिंदगी

February 20, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जिंदगी थी बस
चंद लम्हों की दास्ता
रह गयी अधूरी फिर भी
अनकही, अनसुनी

5 Comments »

by Vasundra singh

अधूरे अरमानों की झांकी

October 3, 2020 in शेर-ओ-शायरी

अधूरे अरमानों की झांकी आज गुजरी मेरे दरम्यां से
इक जिंदगी जो जी नहीं, वो देखी आज मैनें

4 Comments »

by Vasundra singh

चंद पैसों की खातिर!

September 29, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

ले देकर कुछ यादें हैं मेरे पास
जो दिल की तिजोरी में
संभाल के रखीं हैं
गरीबी जब आयी करीब मेरे
तो लोगों ने हिदायत दी
कि कर लूं सौदा
कुछ यादों का
चंद पैसों की खातिर!

Tags: संपादक की पसंद 8 Comments »

by Vasundra singh

हर्फ़ ब हर्फ

September 28, 2020 in शेर-ओ-शायरी

आजकल हर्फ़ ब हर्फ तोल परख कर लिखतीं हूं
न जाने कौन सा मायना निकाल ले दुनिया!!

11 Comments »

by Vasundra singh

वो आये दबे पांव से यूं

September 6, 2020 in शेर-ओ-शायरी

वो आये दबे पांव से यूं
कानों ने तो कुछ सुना नहीं
मगर दिल ने सब सुन लिया

14 Comments »

by Vasundra singh

मां रोती है

September 3, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

नन्हे से बच्चे को जब
सड़क पर चाय बेचते देखती हूं
इक बहन सिसकती है
मां रोती है
मेरे अंदर

Tags: संपादक की पसंद 6 Comments »

by Vasundra singh

बेघर

August 29, 2020 in शेर-ओ-शायरी

तेरे दिल में अगर जगह मिल पाती
हम बेघर न समझती ये दुनिया

7 Comments »

by Vasundra singh

आजादी के जश्न में तो मनाता हर कोई है

August 15, 2020 in ग़ज़ल

आजादी के जश्न में तो मनाता हर कोई है
आजादी का मायना समझ सके तो कोई बात बने

समाज जब संवेदनहीन हो जाये
तब कोई संवेदना से बाते करे तो कोई बात बने

तिरंगे के कपड़े को तो सबने देखा है मगर
उसकी रूह में झांक सकें तो कोई बात बनें

हर कोई अपनी बात ही करता है यहां
कभी कोई दूसरे की बात हो तो बात बनें

मेरी बातों से लहू मत करना तुम दिल अपना
किसी के क्रन्दन से जब दिल दुखे तो कोई बात बनें

Tags: संपादक की पसंद 11 Comments »

by Vasundra singh

लफ़्ज

August 14, 2020 in शेर-ओ-शायरी

लफ़्ज अक्सर लवों पर ही ठहर जाते है
जमाने के खौफ़ है कि क्या कहेगा सुनकर

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by Vasundra singh

तन्हाई

August 13, 2020 in शेर-ओ-शायरी

इस मायूस दिल को कौन समझाये
मोहब्बत में बस तन्हाई ही मयस्सर है

17 Comments »

by Vasundra singh

तक़रीब ए इश्क

August 11, 2020 in शेर-ओ-शायरी

कोई तरकीब हो अगर तो जरूर बतायें
तक़रीब ए इश्क कैसे हो हम

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by Vasundra singh

पतंग

August 10, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

पतंग को देख कर आज उड़ने को मन हुआ
फिर पैरों में पड़ी जंजीर देखकर मन थम गया

Tags: संपादक की पसंद 18 Comments »

by Vasundra singh

दो सिक्के

August 9, 2020 in शेर-ओ-शायरी

ले दे के दो सिक्के ले कर चली थी बाजार में
इक उछालने में खो गया, एक को रख भूली कहीं पर

16 Comments »

by Vasundra singh

दिल और दिमाग

July 22, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

दिमाग बढाने की दवा तो हर जगह मिलती है
दिल को बढा करने का हुनर बस हमें आता है
दिमाग है इसलिये सोचते हो बस खुद की
दिल से जख्म को सहलाना बस हमें आता है

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by Vasundra singh

जहां ए इश्क

July 21, 2020 in शेर-ओ-शायरी

न बंदिशें रोक पायी तुझे
न मिन्नतों का असर हुआ तुझ पर
ए दिल बता आखिर
जहां ए इश्क में ऐसा किया दिखा

13 Comments »

by Vasundra singh

कहानी लापता है

July 18, 2020 in शेर-ओ-शायरी

कहानी लापता है, किरदार की खबर नहीं
फिर भी वहम है कि मेरा जाता ही नहीं

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by Vasundra singh

अब बस खामोशी है जो अजीज है

June 19, 2020 in मुक्तक

चंद सिक्के क्या खत्म हुये
रुखसत हो गये जो मेरे करीब थे
तनहाई है जो साथ रहती है
अब बस खामोशी है जो अजीज है

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