अन्नदाता
February 20, 2021 in Poetry on Picture Contest
मैं किसान हूं
समझता हूं मैं अन्न की कीमत
क्योंकि वो मैं ही हूं
जो सींचता हूं फसल को
अपने खून और पसीने से
मरता हूं हर रोज
अपने खेत की फ़सल को जिंदा रखने के लिये
ताकि रहे न कोई भूखा
कोई इस दुनिया में
फिर भी तरसता हूं खुद ही
रोटी के इक निवाले को
ले जाता है कोई सेठ
मेरी पूरी फ़सल को
ब्याज के बहाने, कोढ़ियों के दाम
लड़ता हूं अकेला
आकर शहर की सड़्कों पर
फिर भी नहीं हो
तुम साथ मेरे
अपने अन्नदाता के!