गजल- कोरोना कहर
माना की कोरोना कहर बड़ा मगर आया नहीं |
सारा जहाँ दहसत मे हिन्द मगर छाया नही |
फानूस बनके करता हिफाजत वजीरे आलम |
ठहर गया वो लोकडाउन से कुछ कर पाया नहीं |
मिल रहा वतन जंगे कोरोना हर खासो आम |
जीत लेंगे जंग क्या हुआ गर कुछ खाया नहीं |
है सजग सब कर्मबीर जान अब बचाने सबकी |
घर कैद जिंदगी और बेटा घर पहुँच पाया नही|
खींच दिया लक्ष्मण रेखा दहलीज वजीरे आलम|
माकां मे कैद आदमी कोरोना से मर पाया नहीं |
मुंह पे नकाब जेब सेनेटाइजर लेकर जाना बाहर |
रखना दूरिया तुम लोगो साथ कोरोना लाया नहीं |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286
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संपादक की पसंद
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गजल- कोरोना कहर
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भोजपुरी देबी गीत 4 – डरावेला कोरोनवा |
भोजपुरी देबी गीत 4 – डरावेला कोरोनवा |
डरावेला कोरोनवा डोले सारा जग संसार हो |
भगावा मारी त्रिशूलवा इहे माई विनती हमार हो |
चिनवा से आइल माई वाइरस कोरोनवा |
नमवा से काँपे सबकर थरथर परनवा |
करा किरीपा फिर से आवे देशवा मे बहार हो |
डरावेला कोरोनवा डोले सारा जग संसार हो |
मोदी जी देशवा लोकडाउन लगा दिहले |
निकलेना केहु घर से सबके सुना दिहले |
अँखिया तीसरी खोली कोरनवा करा संघार हो|
डरावेला कोरोनवा डोले सारा जग संसार हो |
आईल चैत्र नवरतनवा रखी कईसे कलशवा |
पड़ल संकट मे परान हमरो सगरो देशवा |
दूर होइहे दुखवा सबकर तोहरो महिमा अपरंपार हो |
डरावेला कोरोनवा डोले सारा जग संसार हो |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286 -
भोजपुरी धोबी गीत – भगा देता बैरी केरौना |
भोजपुरी धोबी गीत – भगा देता बैरी केरौना |
नाक करे सुकुर पुकुर बुखार ना उतरौना |
बलम हो भगा देता बैरी केरौना |
धीरज धरा धनिया बहरी पाँव ना उठौना |
मोर सुनरो हो भगा देईब बैरी केरौना |
जाइके बज़रिआ मसकिया ले आइहा |
हथवा धोवे वाला सबुनिया ले आइहा |
बलम हो ला देता नवका बिछौना |
बलम हो भगा देता बैरी केरौना |
सगरो देशवा मे लागल बा करफू नजरिया |
बंद भईले स्कूल कालेज बंद बा बज़रिआ |
मोदी जी लगवले देशवा मे लोकडौना |
मोर सुनरो हो कैईसे लियाई नवका बिछौना |
मोर सुनरो हो भगा देईब बैरी केरौना |
निकलबू जे बहरिया केरोना लग जाई |
घरवे मे रही के पहिले जनवा बचाई |
जनवा जे बची त लीआ देईब बिछौना |
मोर सुनरो हो भगा देईब बैरी केरौना |
बलम हो भगा देता बैरी केरौना |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286 -
कविता – भारत जानता है |
कविता – भारत जानता है |
कोरोना हो या सेना दुशमन लड़ना भारत जनता है |
एटम हो वाइरस दुशमन लड़ना भारत जानता है |
प्रधान मंत्री मोदी जी ने जो कहा वो करेंगे हम |
काहे का डरना रोना धोना लड़ना भारत जानता है |
बचना कैसे रहना कैसे कोरोना सब हमने जान लिया |
नमस्ते कहना हाथ धोना मुंह जाली लगाना भारत जानता है |
बाबा रामदेव ने कहा योग करो हम रोज करेंगे |
नित्य शुबह प्राणायाम कपालभाती करना भारत जानता है |
करो या मरो मत डरो परीक्षा की घड़ी हमारी है |
बिना घबड़ाये हर महामारी निपटना भारत जानता है |
सदा सजग रहो सबको सजग करो भीड़ से अलग रहो |
होगा जो सरकारी फरमान चलना भारत जानता है |
गए जो बिदेश कमाने भाई वो भी घर वापस आने लगे |
पहले अपनी जांच सबसे अलग रहना भारत जानता है |
बंद है अभी सभी स्कूल कालेज माल बाजार जरूरी है |
खुल जाएँगे सभी थोड़ा धीरज धरना भारत जानता है |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286 -
कोरोना बुरा है
कोरोना बुरा है
पास बुलाये कोई पास जाना बुरा है |
बुलाकर दे दे तुमको कोरोना बुरा है |
पास जाना अगर हाथ न मिलाना मगर
गले मिल गये लग जाये कोरोना बुरा है|
मिलना मिलाना तदबीज़ है करना जरूरी |
लगाया न नकाब सांस समाये करोना बुरा है|
जाना जहाँ तुमको जाओ जरूर मगर |
हाथ हर चीज तुमको लगाना बुरा है |
उम्र मात्र कुछ लम्हो कोरोना वाइरस की |
मर जाएगा वो बिना हाथ धोये खाना बुरा है|
सर्दी जुकाम खांसी बुखार हो भी जाये अगर |
जाकर डॉक्टर से ना इलाज कराना बुरा है |
तुम अकेले नहीं साथ तुम्हारे कई जान है |
बचके रहो मज़ाक कोरोना उड़ाना बुरा है |
वक्त हैं बुरा वतन जतन मगर टल जाएगा |
हम हिन्द आवाम कोरोना ना हराना बुरा है |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286 -
छुट्टी मना लेने दो
आज स्कूल नही जाना माँ
आज तो छुट्टी मना लेने दो
कल सर दर्द का बहाना काम न आया
आज पेट दर्द आजमा लेने दो
घर के जैसे मस्ती कहाँ
स्कूलों में बसती
इसकी सच्चाई भी परख लेने दो
करूँगा अगर तो
तुम परेशानी भी थोड़ी सह लेना माँ
पर आज घर पर ही किताब पलट लेने दो
गोद में अपने सर रख कर
आज आराम फरमा लेने दोआज हर दर्द से बचने के लिए
और सबको बचाने के लिए
अब दुनिया से इस जंग में शामिल हो जाने दो
आज तो छुट्टी मना लेने दोमाँ तुम से बेहतर घर को कौन समझता है
आज हमे भी घोंसले का सही मतलब बतला दो
घर से प्यार करना सीखला दो
आज के इस जंग में हमें विजेता बना दो
आज आराम फरमा लेने दो
मुझे छुट्टी मना लेने दोWritten by : Tanu Priya Chaudhary
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कोई मिल गया
इस हसीन शाम में ,
उमर की ढलान में
हाथ थामे चलने को
कोई मिल गया है
हाँ मुझे कोई मिल गया है
कल क्या हो नहीं जानती , पर
इस मंजिल तक आते आते जो थकान थी
उस से थोडा आराम मिल गया है
हाँ मुझे कोई मिल गया है
दिल खोल के रख दिया उसके सामने
मैं बस आज में जीती हूँ , वो छोड़ दे या थाम ले
वो समझता है मेरी इस बेफिक्री का सबब,
कि आस रखने से कोई गहरा तजुर्बा मुझे मिल गया है
हाँ मुझे कोई मिल गया है
कुछ और कहूँ तो जल्दबाजी होगी
पर उसके बिना ज़िन्दगी में कोई कमी तो होगी
जिसमे उसकी सोहबत का रंग मिल गया है
हाँ मुझे कोई मिल गया है
उस से हुज्ज़तें हज़ार करती हूँ
रोज़ अपनी खामियां आप ही गिनवाती हूँ
फिर भी वो अटका हुआ है मुझपे, लगता है
उसका दीमाग भी मेरी तरह हिल गया है
हाँ मुझे कोई मिल गया है
खवाहिश एक अगर पूरी हो तो
ज़िक्र दूसरी का करूँ, फिर भी
एक नया ख्वाब इस लिस्ट में
जुड़ने को मिल गया है
हाँ मुझे कोई मिल गया है
अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”
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कल किसने देखा कल आये या ना आये
जीवन संदेश
कल किसने देखा कल आये या ना आये
आज की तू परवाह कर ले कही यह भी चला न जायेदेख दुनिया की हालत अब तो तू संभल जा
कहे रही तुझसे जो सरकार वह तू मान जा
कल के लिए तू आज घर पर ही रहे जाये
कल किसने देखा कल आये या ना आयेसाफ सफाई हाथ की धुलाई है जीवन आधार
कर लो यह सब जो खुद के जीवन से है प्यार
निकल कर बाहर तू कोरोना क्यों फैलाये
कल किसने देखा कल आये या ना आयेवक़्त है देश के लिए कुछ कर गुजरने को
बना के रखो दूरी अपनों से आगे जीने को
ऐसा न हो कोरोना तुझे या अपनों को खा जाये
कल किसने देखा कल आये या ना आयेआओ करें यह वायदा खुद से आगे बढ़ कर
हराएंगे हम सब कोरोना को इस पर चढ़ कर
दुआ है ईश्वर से अब किसी की जान न जाये
कल किसने देखा कल आये या ना आये
पंकज प्रिंस -
सावन के फुहार
पतझर के मौसम
उस पे बसंत बहार
आसमान से बरसे
सावन के फुहार।
कहीं मन जले
कहीं ख्वाबो के
आशियाना जले
यही मौसम में होता है
अपनो से अपनो का प्यार।।
बिन पायल के
पग में घूंघरू बजे
कोयल की बोली
साजन के याद दिलाये
बड़ा दर्द जगाता है
सावन के फुहार। -
इश्क की गोद
इश्क की गोद में जा बैठी
जो कातिल था उसी को मीत बना बैठी।बुझ गई थी बहुत पहले ही क्यूँ आज
दिल की आग जला बैठी।वो ख्व़ाब था किसी की नींदों का
क्यूँ उसे अपनी रात बना बैठी।जो झूठ के दायरे में रहता था
क्यूँ उसी के आगे सदाकत की नुमाईश लगा बैठी।जख्मों पे नमक चिढ़कना पेशा था जिसका
दिल के छाले उसी को दिखा बैठी।प्यार सुन्दरियों का व्यापार था जिसके लिए
उसी को मोहब्बत का खुदा बना बैठी।ख्व़ाब देखे थे जो हमनें नींदों में
उन्हीं को छत पर मैं सुला बैठी।कितनी पागल है तू ‘प्रज्ञा’
जो प्रेम का खिलाड़ी था
उसे ही जज्बातों से खिला बैठी। -
वो बूढ़ी माँ
एक पन्ना और जुड़ गया
जीवन के अध्याय में
चिरंजीव चिरस्थायी का जो
आशीर्वाद दिया था माँ ने
आज धुंधला प्रतीत हो रहा है
अकस्मात एक प्रारब्ध बेला पर
विचलित कर देने वाली घटना
स्मरण हुई
जो अन्तर्मन को दुखा रही थी
मेरी वेदना के शूल चुभ रहे थे
नयनों से अश्रुधारा बह चली
एक माँ के बुढापे का सहारा
जो मृत्यु की गोद में सो गया था
अकारण ही दुर्घटना का
शिकार हो गया था …..
वो बूढ़ी माँ अपने मृत पुत्र को
गोद में लेकर कह रही थी:-
उठ बेटा उठ तुझे भूख लगी होगी कुछ खाले××××
कुछ बोलता क्यूँ नहीं…
मैं ऐसा करुण दृश्य देखकर अवाक सी रह गयी×××× -
एक दौर वो भी गुजरा है
एक दौर वो भी गुजरा है!
जब हम कागज और कलम
लेकर सोते थे।यादों में पल-पल भीगा
करती थीं पलकें ,
अभिव्यक्ति के शब्द
सुनहरे होते थे।ना दूर कभी जाने की
कसमें खाई थीं
मिलने के अक्सर वादे
होते रहते थे।कोई यूं ही कवि
नहीं बनता है यह सच है
हम भी तो पहले
कितना हंसते रहते थे। -
रास्ता कहीं से तो जाता होगा
वो आते तो हैं
मेरे आशियाने में..
मुझी से मिलने मगर जताते नहीं हैं
बस हम समझ जाते हैं..
नज़रे झुकाए रहते हैं और
दिल लगाने की बात करते हैं..
कितने नादान हैं
चुपके से देख लेते हैं
रुख पर मुस्कान लिये…
मैं जानती हूँ वो तगाफुल
करने में माहिर हैं
पर हम भी दिल में
बस जायेंगे आहिस्ता- आहिस्ता…
रास्ता कहीं से तो जाता होगा
उनके दिल तक!
पहुँच ही जाऊँगी उन तक
फिर देखूँगी कहाँ जाते हैं
हमसे बचकर… -
इंतज़ार
इंतज़ार झिलमिलाता रहा
रातभर आंखों में!
तुम नहीं
तुम्हारा पैग़ाम आया
‘आज न सही, कल की बात रही’।चलो मान लेते हैं;
एक और झूठ
तुम्हारे नाम पर जी लेते हैं -
क्यूँ देखूँ
तुमने कह तो दिया मगर
दिल को तसल्ली ना हुई
शब तो हो गई पर
मैं ना सोई
गुजार दी ज़िन्दगी तेरी
आरज़ू करने के बाद
किसी और को क्यूँ देखूँ तुम्हें देखने के बाद
रूबरू तुम आये भी नहीं मगर
महसूस तो किया मैनें हर लम्हा तुमको
दिल लगा लिया तुमसे मिलने के बाद
किसी और को क्यूँ देखू तुम्हें देखने के बाद -
भरोसा
आज की सच्ची घटना पर आधारित हिंदी कविता
शीर्षक :- भरोसा
आज मेरी क्यारी में बैठा परिंदा
मुझे देख छुप गया
मैं रोज़ उसको दाना डालता हूँ
फिर भी वो डरा सहमा
अपने पंखो के भीतर छुप गया
जैसे बचपन में हम आँखों पे
हथेली रख छुप जाया करते थे
वैसे ही भोलेपन से वो भी
मुझसे छुप गया
उसने सोचा के मैंने जाना नहीं
के वो वहाँ बैठा हुआ है
मैं भी चुपके से पानी रख
वहाँ से निकल गया
उसके भोलेपन पर मुस्कुराया भी
और थोडा रोना आया भी
फिर समझा के वो क्यों सहम गया
हम जितना चाहे पुण्य कमा ले
दाना डाल के उनको अब,
उनका भरोसा हम मानवों से
उठ गया
वो मुझे देख सहमा था इतना
के अपने उड़ने का हुनर
भी भूल गया
आज मेरी क्यारी में बैठा परिंदा
मुझे देख छुप गया
अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”
सारांश -: दोस्तों ये घटना आज सुबह की है , जो कि मेरी दैनिक दिनचर्या है कि मैं रोज़ सुबह उठते ही परिंदों को दाना डालती हूँ तब अपने दिन की शुरुआत करती हूँ , पर आज इस घटना ने मुझे एक कविता की सोच दी जो मैं आप लोगों से साँझा कर रही हूँ l भरोसा ऐसी चीज़ है जो एक बार टूट जाये तो फिर होता नहीं , चाहे वो मानव का मानव पे हो या परिंदों अथवा पशुवों का मानव पर l ये कविता हम सब की मानसिकता और भावनाओं को झकझोरती है, के हमने इंसानियत के बजाय इन पक्षी पशुओं को क्या दिया??
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हाँ
तुम उस दिन जो हाँ कर देते
तो किसी को नया जीवन देते
पर तुम्हारी ज्यादा सतर्क रहने की आदत ने
देखो किसी का मनोबल दबा दिया
कोई पढना चाहता था
तुम्हारी मदत से
आगे बढ़ना चाहता था
पर तुमने अपने बटुए झाँक
उसे नए जीवन से मरहूम किया
फिर वही लौटने को मजबूर किया
जहाँ से वो निकलना चाहता था
कुछ ख्वाब देखे थे
उन्हें पूरा करना चाहता था
पर हाय ,तुमने ये क्या किया
अपना बटुआ दिखा
उसे अपने दर से रुखसत किया …
चलो माना उसकी इसमे कोई चाल हो
तुमसे पैसे ऐंठने का कोई जाल हो
जिस पर शायद वो कुछ दिन
अपना महल खड़ा कर लेता
और दो घडी के लिए
तुम्हारे पैसे पर ऐश कर लेता
पर सोचो वो तुमसे क्या ही ले जाता
पैसा ले जाता, तुम्हारी किस्मत नहीं
तुमको उस ऊपर वाले ने बख्शा
और इस लायक समझा
तभी वो फ़कीर तुम्हारे दर पर
आस लिए आ टपका
ज़रा सोचो, शायद वो सच में ज़रूरत में हो
पर तुमने उस से कहा कि
तुम अभी पैसों की किल्लत में हो
वो पैसे जो शायद तुम्हारे एक
महीने की फ़िज़ूल खर्ची से कम हो
कर के मायूस उसे तुमने
अपना पैसा तो बचा लिया
पर ये क्या,
अख़बारों की सुर्ख़ियों में
उसका ज़िक्र सुन दिल थाम लिया
काश तुम उसकी मदत जो कर पाते
तो उसके जीवन को बचा पाते
जिस से वो निकलना चाहता था
पर यूं नहीं .. ??
वो कुछ करना चाहता था
तुम्हारी ज़रा सी मदत से
आगे बढ़ना चाहता था
पर तुम्हारे ज्यादा सतर्क रहने
की आदत ने
देखो क्या अंजाम दिया
तुम अपना बटुआ झांकते रह गए
और उसने अपने सपने का अंत किया
खैर अब पछताए होत क्या
जब उसका जीवन ही रहा न शेष …
तुम उस दिन जो हाँ कर देते
तो इस पछतावे से खुद को बचा लेते
पैसा जाता तो जाता
तुम उसे फिर कमा लेते
पर किसी के घर का दीपक बुझने
से बचा लेते
तुम उस दिन जो हाँ कर देते
तुम उस दिन जो हाँ कर देते ….
अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”
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जनता कर्फ्यू
कहर ढा रही प्रकृति हर पल,
कितनी आहें समेटे भीतर,
हर दरिंदगी, हर हत्या का
चुकता आज हिसाब यही है,
एक तरफ पलड़े में आहें,
एक तरफ संपूर्ण विश्व है,
इतनी बड़ी कायनात पर
एक सुक्ष्म जीव की आज धमक है
एक तरफ सारे आका है,
एक तरफ एक तुच्छ जीव है।
कांप रहे डर से सब थरथर,
घबराहट का हर जगह दंगल।
छीक भी दे तो डर से हाफे
भयाक्रांत हो हर पल कांपे।दिन हीन जन खुद को पाते,
यमराज साक्षात नजर हैं आते,
अभी एक कहर से उबर न पाए,
दूजी आफत दे रही सुनाएं।
अगले महीने उल्कापिंड आने को है
इस पूरी कायनात से टकराने को है।
तो क्यों ना मित्रों!
परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताया जाए,
समय दिया है कोरोना ने
भागदौड़ से फुर्सत पाए,
जो कीमती समय दे ना पाए इतने सालों,
क्यों न इस बहानेअपने परिवार के साथ कुछ अच्छे पल बिताएं।
कुछ प्रार्थना करें,
भगवान से अपनी कृत्यों की माफी मांगे।
संक्रमण को फैलने से भी रोके,अनावश्यक घर से बाहर ना निकले,
इन कठिन परिस्थितियों में, खुद को भी बचाएं और संक्रमण ना फैले
घर में रहकर इस कठिन परिस्थिति में अपना सहयोग दें।
22 मार्च जनता कर्फ्यू को सफल
बनाएं।निमिषा सिंघल
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रात का फ़ितूर अब भी है
उस रात का फ़ितूर अब भी है
तेरे होठों से पिया था जी भरकर,
जाम-ए-उल्फ़त का नशा अब भी है ।
बहुत खलतीं हैं तुमसे ये अब दूरियाँ
क़रीब आने की वजह अब भी है ।
पास आओ, करो फ़िर वही नादानियाँ
दिल लगाने की इल्तज़ा अब भी है ।
मुझ में फ़िर से बिखर कर समा जाओ तुम
लिपट जाओ मुझसे किसी बेल की तरह
मेरे पहलू में आकर सिमट जाओ तुम
ग़र शौक़-ए-वफ़ा उधर अब भी है । -
थोड़ी सी नमी
तूफानों को आने दो
मज़बूत दरख्तों की
औकात पता चल जाती है
पेड़ जितना बड़ा और पुराना हो
उसके गिरने की आवाज़
दूर तलक़ आती है
सींचा हो जिन्हें प्यार से
उन्हें यूं बेजान देख कर
एक आह सी निकलती है
पर उसे जिंदा रखने की ललक
सब में कहा होती है
ज़रा कोई पूछे उस माली से
जिसकी एक उम्र उसकी देखरेख
में निकल जाती है
थोड़ी सी नमी
हर बात सवाँर देती है
रिश्ता हो या पौधा
जडें मज़बूत हो तो
थोड़ी से परवाह, उन्में
नयी जान डाल देती है
गिर कर सूख भी गया हो
तो क्या हुआ
उस पर बहार
फिर आ ही जाती है
तूफानों को आने दो
मज़बूत दरख्तों की
औकात पता चल जाती है
अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”
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इस बार
सोचती हूँ,
क्या इस बार तुम्हारे आने पर
पहले सा आलिंगन कर पाऊँगी
या तुम्हें इतने दिनों बाद देख
ख़ुशी से झूम जाउंगीचेहरे पे मुस्कान तो होगी
पर क्या वो सामान्य होगी
तुम्हें चाय का प्याला दे
क्या एक मेज़बान की तरह
मिल पाऊँगीतुम सोफे पर बैठे
शायद घर की तारीफ करोगे
माहौल को हल्का करने
ज़िक्र बाहरी नजारों का करोगे
तुम्हारी इधर उधर की बातों से
क्या मैं खुद को सहज कर पाऊँगीमेरी ख़ामोशी पढ़ तुम सोचोगे
जैसा छोड़ा था सब कुछ वैसा ही है
मैं भी उसे भांप कर कहूँगी
हाँ, जो तोडा था तुमने वो
बिखरा हुआ ही है
क्या मैं अपनी चुप से
वो चुभन छुपा पाऊँगीबहुत कोशिशें कर भी,
जब मैं खुद को न रोक पाऊँगी
पूछूंगी वही बात फिर से ,
न चाहते हुए भी दोहराऊंगी
ज़ुबानी ही सही
क्या पल भर के लिए भी वो लम्हा
मैं दोबारा जी पाऊँगीमेरी ये बात सुन तुम मुझ पर
खिंझोगे चिल्लाओगे
अपने को सही साबित करने
तर्क वितर्क तैयार कर आओगे
मैं सिर्फ एक सवाल पूछूंगी तुमसे
तुम मेरी जगह होते तो क्या करते
तुमने जो अपने मन की कही, तो ठहर जाऊं शायद
वरना तुम्हें माफ़ कर आगे बढ़ जाउंगीतुम्हारा जवाब मुझे मालूम है कब से
तुम औरों के दिल की कहा करते हो
सिर्फ अपनी ही सुनते हो
और अपना अहम् साथ लिए चलते हो
तुम शायद मुझे मनाओगे, और
फिर मुझे पीछे छोड़, चले जाओगे
तुम्हारे इस रुख से तारुफ्फ़ है मेरा
इसलिए इस बार अपने फैसले पर
नहीं पछताऊँगी
उस पल को एक और सौगात समझ
थोड़ी और पत्थर दिल हो जाऊंगी,पर
इस बार तुम्हारा यकीन न कर पाऊँगी
खुद को फिर से
बिखरा हुआ न देख पाऊँगी …..अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”
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भोजपुरी चइता गीत 4 – आज केरोनवा भगाइब ये रामा |
भोजपुरी चइता गीत 4 – आज केरोनवा भगाइब ये रामा |
आज केरोनवा हम भगाइब ये रामा |
भारत देशवा |
सबकर जनवा हम बचाइब ये रामा|
भारत देशवा |
चिनवा से आइल ई पापी केरोनवा |
हरी लेला सबकर धईके परनवा |
मारी इनके माटी मे मिलाइब ये रामा|
भारत देशवा |
आज केरोनवा हम भगाइब ये रामा |
भारत देशवा |
मुहवा मे जलिया पहिनिया ये भईया |
सर्दी खांसी बुखरवा से बचिहा ये भईया |
नमवा केरोनवा देशवा मिटाइब ये रामा |
भारत देशवा |
करिहा नमस्ते हथवा केहु ना मिलइहा |
गंदा मत रहिहा हथवा हरदम धोइहा |
जाइके डॉक्टर साहेब जांचिया कराइब ये रामा |
भारत देशवा |
आज केरोनवा हम भगाइब ये रामा |
भारत देशवा |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286 -
कौन हो तुम?
मैने बहुत सोचा अब नहीं मिलूंगी तुमसे,
नहीं कहूंगी कुछ भी।
कोई फरमाइश नहीं करूंगी
कन अंखियों से देखूंगी भी नहीं।
पर इस दिल का क्या करू,
तुम्हारी आहट, पदचाप महसूस करते ही,
धड़कने बहकने लग जाती है।
बिना देखे ही जान लेती है
तुम्हारी उपस्थिति।
हैरान हूं मै!
आखिर कैसे संभव है?
इस लेखनी को है स्याही का नशा
और मुझे तुम्हारे आने की तलब।
जैसे पलाश के फूल और आम की बौर की सुगंध खीच लेती है बरबस अपनी ओर अचानक!
परमल हो क्या ?
या गगनचुंबी इमारत या व्योम में
अंतर्ध्यान शिव!और मैं ज्योत्सना सी निर्वाक, निर्बोध, निर्निमेष तकती रह जाती हूं तुम्हे!
हे पीड़ाहर्ता!
क्या बला हो तुम?निमिषा सिंघल
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प्रेम
चिरायु,चिरकाल तक रहने वाला चिरंतन है प्रेम,
निष्काम, निः संदेह निश्चल है प्रेम।
पुनरागमन, पुनर्जन्म ,पुनर्मिलन है प्रेम।संस्कार, संभव संयोग है प्रेम,
लावण्य, माधुर्य, कोमार्य सा प्रेम।निर्वाक,निर्बोध,निर्विकल्प है प्रेम,
यामिनी,मंदाकिनी, ज्योत्सना सा प्रेम।यशगान,गंधर्वगान,स्वर लहरियों सा प्रेम।
स्खलित हुआ जो हृदय से
वेद ऋचाओं सा प्रेम।जवाकुसुम, कुमुदनी,परिमल सा प्रेम
अक्षरक्ष:, पांडुलिपि, स्वर्णपल्लव सा प्रेम,धड़कनों से अलंकृत मधुमास है प्रेम,
अविराम,अभिराम,आभरण है प्रेम।आतप, अंगार, मनोज्ञ है प्रेम।
हृदय से प्रस्फुटित इन्द्रधनुष सा प्रेम,
मधुकंठ,सजल नयन,दिवास्वप्न सा प्रेम।निमिषा सिंघल
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मै और तुम
मै और तुम
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अतीत के फफोले,
मरहम तुम।अध्याय दुख के
सहारा तुम।तपस्या उम्रभर की,
वरदान तुम।बैचेनिया इस दिल की,
राहत तुम।दिल में फैली स्याही,
लेखनी तुम।अक्षुष्ण मौन इस दिल में,
धड़कनों का कोलाहल तुम।रुदन धड़कनों का,
मुस्कुराहट तुम।लौह भस्म सा ये दिल,
चुम्बक तुम।पिंजर बद्घ अनुराग
उन्माद तुम।बहती धारा सी में,
सागर तुम।निमिषा सिंघल
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काश कभी गले लगाकर
सोचता हूँ अक्सर
कि तुमको देखे बिना
पता नहीं
कितनी सदियाँ
गुजर गयीं हों जैसे
और तुम
अभी भी बुन रहे होगे
मेरी दुनिया से परे
मेरे लिए
कुछ और इल्ज़ाम
कि जब अचानक
किसी मोड़ पर
मिल गए हम
तो पहना सको मुझे
झट से उन्हें
मेरे कुछ कहने से पहले ही ।
एक छोटी सी
नाराज़गी ही तो थी
या एक पागलपन
जिसे ढो रहे हो अब तक,
काश कभी गले लगाकर
बस एक बार
देख तो लेते…
शायद पिघल कर
लिपट जाता मैं भी
तुमसे
और भूल जाता
अपनी नाराज़गी
और
तेरे हाथों से मिले
वे सारे ग़म। -
क्या है कोरोना वायरस
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सर्दी खाँसी हो जाती है
बहुत तेज ज्वर आता
हांथो पैरों का दर्द
बढ़ता ही जाता है
पहले सूखी खाँसी आती है
फिर ज्वर ज्वलंत हो जाता हैबचाव:-
बचाव ही निदान है
कोई सफल दवा अब
तक सम्भव ना हो पाई है
हांथो पैरों और मुँह को
साबुन से हरदम स्वच्छ रखो
लोगों के सम्पर्क से दूर रहो
और आसपास को स्वच्छ रखो
भीड़-भाड़ में मत जाओ
मुँह पर मास्क लगा के रखो
खांसने छींकने से पहले
मुँह पर कपड़ा या हाँथ रखोउपचार:-
सफल इलाज़ अभी तक
सम्भव ना हो पाया है
इसी लिये कोरोना से
सारा विश्व घबराया है
गिलोय पीयो और
खुद को सर्दी खाँसी
होने से बचाओ
तुलसी का काड़ा पीते रहो
बुखार होने पर जाँच करवाओ
और विटामिन-सी वाली चीजें खाकर
इम्यूनिटी सिस्टम मजबूत बनाओ।
god bless you -
निर्दोष मानोगे???
मैं जानती हूँ कि तुम भी
मुझे ही गलत ठहराओगे
कुछ कहने से कोई फायदा नहीं—-मैं कह भी दूँ मैं सही थी
पर तुम कहाँ मानोगे—तुमने जो जिम्मेदारी दी थी
उसी को पूरा कर रही हूँ —-तुम्हीं ने कहा था:-
‘ना किसी की तुम सहना’—
वही कर रही हूँ
पर तुम कहाँ मानोगेक्यूँ बुरा लग रहा है जब
बात अपनों पर आई—
मै जानती हूँ
तुम मुझे निर्दोष मानोगे नहींतुम्हारी संगत में थोड़ी
निर्भीक हो गयी हूँमै जो कर चुकी हूँ
वो सही था पर तुम कहाँ
मानोगेतुम्हारी ही तरह सनकी सी
हो चुकी हूँ जब बात अपनों पर
आयी तुम मानोगे नहीं -
अपनो के दिए ज़ख्म
हर दर्द का इलाज है जहान में
पर अपनो के दिए ज़ख्म कहाँ भरते हैं
टूट जाते हैं जो रिश्ते तो फिर कहाँ
जुड़ते हैं
कैसी कश्मकश है जिंदगी में
जो प्रिय होते
वही बिछड़ते हैं
कितनी भी कोशिश करो
खुश रहने की
जब आंख में आँसू हो तो
लब कहाँ हँसते हैं
खुद को बदलने की हर कोशिश
करती हूँ पर दिल के
अंगार कहाँ बुझते हैं
हमेशा मै ही झुकूं
ये तो मुनासिब नहीं
स्वाभिमान के अल्फ़ाज
कहाँ चुप रहते हैं
हर दर्द का इलाज है मगर
अपनों के दिए ज़ख्म नहीं
भरते हैं । -
गूलर का फूल
वो तो गूलर का फूल लगता है
मेरे दिल का फ़ितूर लगता है ।ना शाम लगता है ना सुबह लगता है
सर्दी की दोपहर वो लगता है ।वो तो भीगा गुलाब लगता था
वो तो भीगा गुलाब लगता हैमेरा दर्पण तो वही है लेकिन
चेहरा कितना उदास लगता है ।वो तो छूते ही चीख उठता है
कितना कोमल है फूल टेसू कादर्द मेरा बढ़ गया है अब इतना
फूल से प्यारा शूल लगता है ।वो रजनीगंधा है महकता है
जाने दिन-रात किसके दामन मेंमेरी किस्मत में नहीं है फिर भी
मुझको मेरा नसीब लगता है । -
तुम्हारी चादर में
तुम्हारी चादर में लिपटे
कुछ शक के दाग थे।तुम मेरी मंज़िल और
तुम्ही हमराज थे।क्या थे दिन और
क्या लम्हात थे।कुछ अंजाम और
कुछ आगाज़ थे।इल्जाम लगा किस्मत और
हालात पर हम तो,
बचपन से ही बर्बाद थे।सुबह हुई तो देखा
तकिये पर पड़े सूखे,
अश्कों के दाग थे।वो खिड़कियाँ अब
बन्द ही रहती हैं ,जिनके दीदार के कभी
हम मोहताज़ थे।अर्सा हुआ ना मिले उनसे
जिनके हुआ करते कभी हम
तलबगार थे। -
ज़रा देखूँ तो सही
जरा देखूं तो सही
तुम्हारे दिल में उतर कर
दिल है अभी या दिल है ही नहीं
दिल है तो उसमें पत्थर हैं
या मांस के कुछ लोथड़े भी हैं
एहसास है या है ही नहीं
मैं हूं या हूं ही नहीं
या हृदय विहीन हो तुम
जो मुझसे प्यार नहीं
मेरा एहसास नहीं
कोई जज्बात नहीं
जरा देखूँ तो सही
तुम्हारे दिल में उतर कर
मैं हूं या मैं हूं ही नहीं।
यदि मैं हूँ तो अपने
एहसास छुपाते क्यूँ हो
भली महफिल में रूसवा
कर जाते क्यूँ हो।
जरा देखूँ तो सही
मै तुझे स्वीकार हूँ या
हूँ ही नहीं
तू गुनहगार है या
निर्दोष—–
ज़रा देखूं तो सही -
आज फिर से
आज फिर से
खिल जाने दो रात
महकती हुई साँसों से भीगी
तेरी हँसी की ख़नक
उतर जाने दो
एक बार फिर से
रूह तक
जैसे गूँज उठती हैं
वादियाँ
पर्वत से उतरती
किसी अलबेली नदी की
कल-कल से
और तृप्त हो जाती है
बरसों से प्यासी
शुष्क धरा
मन्नतों से मिली
किसी
धारा से मिलकर । -
अम्बर रहा टपक
बादल गरज़ यूं रहे थे
के बरस ही जायेंगे
बिज़ली कड़क के
हमको तेरी याद दिला रही
कुछ
बर्फ के टुकड़े पड़े है
सड़क पर—–
बूँद तो बरस रही हैं स्नेहिल
झीसियाँ थी पड़ रही
मसल रही थी चैन—
सब कहीं थी शान्ती
और था रात का पहर
जुगनू भीग जाने कहाँ
छुप गए सभी–
सब थे स्वप्न में खोये
अम्बर रहा टपक।
उफ़ कितनी बर्फ की
चादर बिछी श्वेत वस्त्र सी
श्याम- श्याम रात थी
बर्फ़ में छुपी। -
तेरे शहर में
तेरे शहर में मेरा कितना नाम हो गया
तेरे नाम से जुड़कर मेरा चर्चा आम हो गया -
जीवन का अवकाश
अब जीवन का अवकाश रहेगा
कल से मेरे पास रहेगा
__________क्षुब्ध होकर
अपंग से तेरे बोल के टेसू
अब ना सूखेगे मेरे आँगन में
______कुसुम का बंदन
ना महकेगा प्राणवायु के दामन में
गलियारों की उड़ती_ _ _धूल
ना पड़ेगी निर्विघ्न मुख पर
____व्यथित मन की
वेदना को अब ना बूंदे
महकायेँगी—-‘
निस्तेज यौवन पर अब
प्रीतम की छटा ना छायेगी
सुखद जीवन की कल्पना
में अब ना दंश आएगा
निस्पंंदन करती नब्ज़ में
मेरा अतरंगी अब ना
गुनगुनायेगा_ __ _ __
अब ना होगी कोई
अभिलाषा और ना
कोई स्पंदन…..
क्यूँ कि अब से जीवन का अवकाश
रहेगा……..। -
हम मुर्दा हैं
हम मुर्दा हैं या जीवित तुम्हें कोई
फर्क नहीं
तुम्हें इस बात का कोई इल्म नहीं
के हम किस हाल में रहते हैं
सब दिल का खेल है
तुम्हें मेरे जीवन की भी खबर नहीं
मगर तू मेरी हर
नब्ज़ में धडकता है
और हर साँस में महसूस
होता है
रूबरू होने का मौका नहीं
देती दुनिया
पर तू तो हर एहसास में
रहता है मौजूद
बस दिल का फर्क है
तेरा किसी और की खातिर धडकता है
मेरा तेरे लिये धडकता है -
छोटी सी मुलाक़ात
वह छोटी सी मुलाक़ात
विचरती रहती है अक्सर
स्मृतियों में मेरी ।जब सिमट आए थे तुम
मेरी पलकों के दायरे में,
सकुचाते हुए,
छोटे-छोटे कदमों से…
मुस्कुराती हुई कोई बहार
उतर आई हो
किसी वीरान उपवन में जैसे ।सुनो न !
एक बार फिर से भर दो
मन की सूनी टहनियों में वही फूल
तितलियों से एकाकी आकाश
और फ़िज़ाओं में उन्हीं साँसों की महक ।
सदियों तक रहेगा इंतज़ार
कभी फिर से आ जाना
उसी उपवन की देहरी पर,
सकुचाते हुए,
छोटे-छोटे कदमों से चलकर
ऐ बहार ! -
मेरे वीराने जहाँ को भी कोई बसाएगा
मेरे वीराने जहाँ को भी कोई बसाएगा
क्या यह ऐसे ही उजड़ा रहे जाएगा
दो चार दिन को तो आते है सब
पर जिसका इंतजार वह कब आयेगाइंतजार करते हुए थक सी गई है आंखियां
उनके इंतजार मे सूनी पड़ी है गलियां
बरसो हो गए पथ निहारते हुए
क्या इस पथ अब कोई नहीं आयेगा
मेरे वीराने जहाँ को भी कोई बसाएगाथक सी गई आँखे आसमान की तपिश से
ठहर गई ज़िन्दगी उनके प्यार की बंदिश से
अब तो प्यास बुझा दे ऐ मेरी ज़िन्दगी
ना जाने वह कब प्यार बरसाएगा
मेरे वीराने जहाँ को भी कोई बसाएगामेरे वीराने जहाँ को भी कोई बसाएगा
क्या यह ऐसे ही उजड़ा रहे जाएगा
दो चार दिन को तो आते है सब
पर जिसका इंतजार वह कब आयेगा
पंकज प्रिंस -
प्रारब्ध
प्रारब्ध
———
सदियों से ठंडी, बुझी, चूल्हे की राख में कुछ सुगबुगाहट है।राख़ में दबी चिंगारियों से चिंतित हूं मैं!
अपने गीले- सूखे मन की अस्थियों का पिंजर…
दबा आयी थी मैं
उस गिरदाब (दलदल) में…..
वहां कमल उग आए है।राख में दबी चिंगारियों के भग्नावशेषों से उठता धुंआ जैसे
लोहे के समान
चुम्बक की ओर खिचा चला जा रहा हो..
धुएं को जैसे खीच लिया गया हो फुंकनी से उल्टा ।
बांध लिया हो जैसे किसी अदृश्य पाश में।
हवा में उड़ती स्वर लहरियां, आलिंगन जैसे खीच लिया हो मैंने!
ओढ़ लिया हो जैसे अक्षुष्ण अनुराग का मौन।
जानती हूं …..अंगार पहन लिया है मैंने।
अब जलना ही नियति है मेरी
यह भी जानती हूं
तबले की थाप बिना स्वर लहरी के राग को पूर्णता ना दे पाएगी।इस राग का अधूरापन ही प्रारब्ध है मेरा।
पिंजरबद्घ अनुराग का उन्माद,
सुलग – सुलग ठंडा हो जाएगा,
शांत हो जाएगा उस दिन…
जिस दिन रुक जाएगी मेरी कलम की अनवरत यात्रा मेरे साथ।
निमिषा सिंघल -
हिन्दी गजल- तेरा इंतजार तो है |
हिन्दी गजल- तेरा इंतजार तो है |
तू मुझे चाहे न चाहे दिल तेरा तलबगार तो है |
तूझे तलब मेरी हो न हो मुझे तेरा इंतजार तो है |
जब भी वक्त मिले आवाज दे देना तुम मुझे |
तू साथ चले न चले तेरी याद मेरी पतवार तो है |
लब कुछ कहे न कहे आंखे सच बया करती है |
मै खुश हूँ सच मे तुझे मुझसे बहुत प्यार तो है |
तू रहे जहा भी मेरी यादे चैन से रहने न देंगी |
ठुकराकर मेरी मोहब्बत तू मेरा गुनाहगार तो है |
क्या कहू तुझसे जो तूने वादे किए थे बहुत |
जमाना जाने न जाने तू मेरा राजदार तो है |
अपनी हुश्नों जवानी का गरुर है बहुत तुझको |
बागो भवरा की फूल को कभी दरकार तो है |
अपने महबूब को मान खुदा सर आंखो भारती |
कबुल नहीं मेरी मोहब्बत तू मेरा सरकार तो है |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286 -
भोजपुरी गजल- ठीक नईखे |
भोजपुरी गजल- ठीक नईखे |
दिल लगाके दिल तोड़ल केहु के ठीक नईखे |
प्रीत लगाके मुंह मोड़ल केहु से ठीक नईखे |
कईली केतना प्यार तोहसे का काही हम |
छोड़ हमरा दिल दुशमन से जोडल ठीक नईखे |
राज क बात बा राज ही रहे दा अब |
बेवफा तू गाड़ल मुरदा उखाड़ल ठीक नईखे |
आँख से आँख मिला के देखा एक बार |
लहरात प्यार क गागर फोड़ल ठीक नईखे |
रख़ब तोहके अपने दिल मे करेजा नियन |
करेजा के कागज नियन फाड़ल ठीक नईखे |
तोहरे एक मुस्कान हजार जान कुर्बान बा |
कदरदान के मजधार मे छोडल ठीक नईखे |
रहा हरदम जवान जईसे गुलाब के बगान |
आशिक मेहरबान के निचोडल जान ठीक नईखे |
हमरी आँख के आँसू के मोल तू का जनबू |
यार टुटल घाव दिल के कूदेरल ठीक नईखे |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286 -
भोजपुरी चइता लोक गीत -3- बयार पुरवा ये रामा
भोजपुरी चइता लोक गीत -3- बयार पुरवा ये रामा
लगे लागल आम के टिकोरवा ये रामा |
चइत मासे |
बहे लागल बयार पुरवा ये रामा |
चइत मासे |
मसूरी मटर खूब गदराई गइली |
पीयर सरसो अब नियराई गइली|
मगन कोयल गाए गनवा ये रामा |
चइत मासे |
पाकल बाली गेहूँ खेतवा लहराये |
पागल पपीहवा पीहू पीहू गाये |
चुये टप टप महुआ रस मदनवा ये रामा |
चइत मासे |
अँखियाँ मे नसा चढ़ल गोड्वा न जमीन पड़े |
बहकल बदनवा सजनवा कहा कहे |
मदन सतावे गोरी नजरवा ये रामा |
चइत मासे |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286 -
कल किसने देखा कल आये या ना आये
कल किसने देखा कल आये या ना आये
आज की तू परवाह कर ले कही यह भी चला ना जाये
देख परायी चुपड़ी तेरा मन क्यों ललचा जाय
पास तेरे जो है तू उससे मन को समजाये
रुखा सूखा जो कुछ है कही वह भी छूट ना जाए
कल किसने देखा कल आये या ना आयेआज तेरा है जो वह कल था और किसी का
आने वाले कल मैं वह होगा और किसी का
फिर उस जगह पर अपना हक़ क्यों जताये
कल किसने देखा कल आये या ना आयेकरम किये जो तूने उसका फल भी यही मिलेगा
आज नहीं तो कल सब कुछ यही मिलेगा
बोया पेड़ बबूल का तो आम कहा से खाये
कल किसने देखा कल आये या ना आयेजैसी करनी वैसी भरनी रीति तो है यह पुरानी
अंत समय सब याद करते अपनी भूली कहानी
गुजर गया जो वक़्त अब लौट कभी ना आयेकल किसने देखा कल आये या ना आये
आज की तू परवाह कर ले कही वह भी चला जाएपंकज प्रिंस
-
प्रकृति का सिंगार
देखो रितुराज ने अपने हाथों
कैसे प्रकृति का सिंगार किया।
रंग बिरंगे फूलों से
कुदरत का रूप सँवार दिया।।
हार गले में गेन्दा के
और कर कंगन कचनार दिया।
बेली चमेली जूही के
बालों में गजरा सँवार दिया।।
गुल- ए-गुलाब सुंदर -सा
बेणी मूल में गाड़ दिया।
केशर का रंग लबों पे
संग कर्णफूल गुलनार दिया।
कली लवंग नकबेसर
अलसी अंजन दृग धार दिया।।
मोर पंख कोयल का रूप
तन गुदना से छाड़ दिया।
‘विनयचंद ‘ मधुमास मनोहर
मन मन्दिर मह धार लिया।। -
मैं कुछ भूलता नहीं
मैं कुछ भूलता नहीं ,मुझे सब याद रहता है
अजी, अपनों से मिला गम, कहाँ भरता हैसुना है, वख्त हर ज़ख़्म का इलाज है
पर कभी-२ कम्बख्त वख्त भी कहाँ गुज़रता हैमैं अब बेख़ौफ़ गैरों पे भरोसा कर लेता हूँ
जिसने सहा हो अपनों का वार सीने पे , वो गैरों से कहाँ डरता हैबुरी आदत है मुझमें खुद से बदला लेने की
जब आती है अपनों की बात,तो खुद का ख्याल कहाँ रहता हैमैं कुछ भूलता नहीं ,मुझे सब याद रहता है….
अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”
-
तुम्हारे घर आने की
तुम्हारे घर आने की बड़ी बेसब्री थी
मगर जब वापस आ रही थी
तो कोई मेरे कदम पीछे को खींच रहा था
वो मेरा दिल था
कदम भारी थे
रास्ता बहुत कठिन और दिल में बेचैनी सी थी
ना जाने क्यूं किसे पता
तुम्हारा इन्तज़ार किया मगर
दीदार ना हुआ
तभी तो उस दिन ठगा सा
महसूस हुआ मुझे
ऐसा एहसास फिर
कभी ना हुआ -
और पूँछा
जो भी मेरी कविता पढ़ता था
पूछता था एक मुस्कान- सी आती थी चेहरे पर
आज उन्होंने भी पढ़ा:-और पूछा:-‘ किसके लिये लिखती हो?
मेरा ज़िस्म ऊपर से नीचे तक
कांप उठा…
ज़ज्बात जागे पर जुबां
खामोश रही…
कोई जवाब सूझा ही नहीं
ठगा सा महसूस हुआ
आया समझ
कितनी दूरियाँ हैं
हमारे दर्मियां…
जो शायद ही कभी मिट पायें । -
शाम-सी
जो भी मेरी कविता पढ़ता था
पूछता था एक मुस्कान- सी आती थी चेहरे पर
आज उन्होंने भी पढ़ा:-और पूछा:-‘ किसके लिये लिखती हो?
मेरा ज़िस्म ऊपर से नीचे तक
कांप उठा…
ज़ज्बात जागे पर जुबां
खामोश रही…
कोई जवाब सूझा ही नहीं
ठगा सा महसूस हुआ
आया समझ
कितनी दूरियाँ हैं
हमारे दर्मियां… -
कोमल मन
कोमल मन और आत्मा से
आवाज़ दे रही है आहटे
कुछ पन्ने किताबों के पलट कर
वक़्त आया है मिलने……
सिसकियां खामोश होकर
गुनगुना रही हैं कल के किस्से
और तन्हाइयां बटोर लाई हैं
तमाम यादें…..
चलो कुछ ताज़े पानी के छींटे……
मार कर उन्हें ताज़ा करें
जो यादें पीछे छूट गयी ….
और मखमली ख्वाब जो
ना पूरे हो पाये उन्हें
फिर से देखें और
सच कर दें
सारी ख्वाहिशे अपनी…..