Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • औरत खिलौना नहीं

    औरत खिलौना नहीं
    उसमें भी जान होती है….
    औरत होती है ममता की मूर्ति
    प्यार की उपमा
    हजारों फूलों की खुशबू
    विद्यमान होती है उसमें….
    औरत पैरों की जूती नहीं
    सिर का ताज है…
    तपती दोपहरी में
    वह पुरवा का झोंका
    ठंडी बयार है….
    औरत खिलौना नहीं
    उसमें भी जान होती है….
    स्पष्टता कुछ कह नहीं पाती
    क्योंकि सहनशीलता अपार होती है…
    समय पड़ने पर
    अग्नि ज्वाला से भी ज्यादा तपती है…
    निर्दयी बनकर
    प्रतिशोध भी लेती है क्योंकि
    औरत सब सहन कर लेती है….
    परंतु अपमान नहीं
    औरत पूजनीय है हर रिश्ते में
    हर रूप में आदरणीय है….
    नौ महीने गर्भ धारण करके
    औरत ही वंश बढ़ाती है
    अपनी ममता की छांव में
    शिशु को प्यार का पाठ सिखलाती है….
    इसीलिए ‘प्रज्ञा शुक्ला’ कहती है:-
    औरत निंदनीय नहीं
    हर रूप में वंदनीय है…..
    जय हो नारी शक्ति की जय।।
    हो भारत माता की।।

  • ज़िन्दगी के अँधेरे

    कोई तकलीफ नहीं है हमको उजालों से
    बस ज़िन्दगी के अँधेरे से डर लगता है

    रोज़ ही रूठना रहता था तुम्हारा भी
    बिछड़ने में गम ना होगा चलो अच्छा है

    तुम भी कहां रहे हो तुम
    हमें भी तो देखो ना अब हम भूल गए

    मुबारक हो तुम्हें जुदाई के हसीं लम्हे
    तुम्हें मुझसे दूर जाना ही अच्छा लगता है

    अब मुहब्बत कहो या तुम्हारी रुसवाई
    मेरा हर अंदाज़ अब शायराना लगता है

    हर लम्हात जुड़ा है तेरी यादों से
    भूलने से तुम्हें बहुत कुछ याद आता है

    जब साँस थमेगी तो चैन आयेगा ‘प्रज्ञा’
    अब तो जीना भी मुहाल लगता है

  • नकाब

    नकाब चेहरे पर लिपटा है शोख लगता है….
    ये उतर जाता तो बा-खुदा क्या आलम होता….

  • मेरे दर्द

    मेरे दर्द सिर्फ मेरे हैं

    इन्हें अपनी आँखों का पता

    क्यों दूँ

    तरसे और बरसे

    इन्हें अपने दर्दों से

    वो लगाव क्यों दूँ

    मेरा अंधापन मेरी आँखों को

    चुभता है

    पर अपने लिए फैसलों पर

    इसे रोने क्यों दूँ

    मेरे दर्द सिर्फ मेरे हैं

    इन्हें अपनी आँखों का पता

    क्यों दूँ

    बहुत कुछ देखा

    इन आँखों ने

    अब ये भी थक गई हैं

    चैन से जीने दूँ अब इनको भी

    थोड़ा आराम

    क्यों न दूँ

    मेरे दर्द सिर्फ मेरे हैं

    इन्हें अपनी आँखों का पता

    क्यों दूँ….

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”

    https://www.facebook.com/Saavan.in/photos/a.899919266721305/3023722441007633/?type=3&__xts__%5B0%5D=68.ARBqYvBz-AjsKiJzpvDzhFclFShu0mG5Srt2POx8L_bl3yC_J-vzt7H-vZqL822HdncHyBccYQTLbveEfBACHsKsoqrOuX-5b-NJlsedZvtdpiZntsSDERFWzTozEcxDwKstKb5CybylkMLYkmlVv28ZozbsJowVu8wVmNz6iwoEShz4YntVEsf-8UZeXjdgrqIDGmJf7NzFBDQBWsqPJ1_mBsXKLelX7_IuScMj3TPDSIj87rJJnHY7lm_3__WCD-tiUjr__GIfG9qv0wXTmI7ydpb1HfjIrBSPKWNW-oHjkcKd7lCAvliVZmTPLqf4E0zXd4f-NcZ27Bo-EXcSQvSwXQ&__tn__=-R

     

  • भोजपुरी देशभक्ति गीत-भारत देशवा हमार |

    भोजपुरी देशभक्ति गीत-भारत देशवा हमार |
    जहा बहे गंगा निर्मल धार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    उत्तर हिमालय गगनवा के चूमे |
    दखिन सगरवा लहरवा मे झूमे |
    लहकल खेतवा बहे पूरवा बयार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    जहा के जवान सिमवा पर दहाड़ेले |
    धई दुशमनवा बहिया उखाड़ेले |
    एक के बदले बदला चुकावेले हजार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    बिंध बिंधवासिनी वैशणु जम्मू बिराजेली |
    कामरूप कामाख्या दखिन काली माई साजेली |
    देवघर बाबाधाम होला जय जय जैकार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    झरखांड बिहार बाड़े देशवा के शान हो |
    यूपी गुजरात आज हऊवे मोर जान हो |
    रामराज आइल देशवा जगवा बधाई सरकार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    झाँसी क रानी माहाराणा के देशवा |
    आजाद भगत सिंह गांधी शुभाष के देशवा |
    फह फह फहरे झण्डा माने सारा संसार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    थर थर काँपे दुश्मन कुंवर सिंह के नाम हो |
    मारी तलवरिया करे दुशमन तमाम हो |
    काटी के बहिया आपन चढ़ावे गंगा जी के धार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    बीर बिरसा के गाथा बखान हम करीला |
    सिधु कान्हु के परणाम उनके नाम हम करीला |
    झन झन तेगवा करे दुश्मन के ललकार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    देशवा के माई हरदम शेरवा जनमावेली |
    दुधवा पियाई उनकर सिनवा बढ़ावेली |
    आवे न पावे दुश्मन सीमा यही पार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286
    व्हात्सप्प्स -8210525557

  • कविता- कौन जानता था |

    कविता- कौन जानता था |
    कर्मवीर होंगे बेचैन अपने घर कौन जानता था |
    राह निहारेंगे कब ताला खुलेगा कौन जानता था |
    आयेगा ऐसा भी एकदिन देखेगी दुनिया दुर्दिन |
    इसान खुली हवा को तरसेगा कौन जानता था |
    बाग बगीचा माल बाजार सिनेमा सब सुने पड़े |
    कोई किसी से नहीं मिलेगा कौन जानता था |
    मिलना गले तो दूर हाथ भी मिला सकते नहीं |
    महफ़िलों खूब सन्नाटा पसरेगा कौन जानता था |
    नुक्कड़ पर चाय की चुस्की पंचायत नहीं लगेगी |
    बारात बाजा बैंड अब न बजेगा कौन जानता था |
    जो जहा वही पड़ा है कब मिलेंगे सवाल खड़ा है |
    ट्रेन प्लेन मोटर अब ना चलेगा कौन जानता था |
    मामी मौसा मौसी नाना नानी फोन पर मिलते |
    हर रिस्ता मोबाइल पर मिलेगा कौन जानता था |
    ईस जाने कब लॉक डाउन हटेगा बाजार खुलेगा |
    बिछड़े अब मिलेंगे कोरोना मरेगा कौन जानता था |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286
    व्हात्सप्प्स -8210525557

  • मेरे रकीबों के साथ

    वो बैठते हैं आजकल
    मेरे रकीबों के साथ
    जिनके हाथों में
    रहता था मेरा हाँथ
    बुरा नहीं लगता है मुझे पर
    अच्छा भी नहीं प्रतीत होता है
    क्या करूँ दिल
    दिल ही दिल में रोता है
    कर कुछ भी नहीं सकती
    बड़ी मुश्किल में
    रहती हूँ
    अश्रु बहते नहीं
    आजकल पीती रहती हूँ

  • बे-वफा

    उनके मस्त अदाओं के जाल में,हम गिरफ्तार हो गए।
    जुस्तजू के मेले में हमारी मुकद्दर, हम से ही खफ़ा हो गए।।
    वफा से बे -वफा बनेंगे वो , हमने ऐसा सोचा ही कब था ।
    हम तो बस उनके लिए छोटा सा महल बनाने में लग गए।।
    बने थे कभी वो मेरे दोस्त, मेरे हमदम, मेरे इब्तिदा ।
    उनके मुस्कान को हम इश्क़ के सिलसिला समझने लग गए।।

  • एक ऐसी ईद

    एक ऐसी ईद भी आई

    एक ऐसी नवरात गई

    जब न मंदिरों में घंटे बजे

    न मस्जिदों में चहल कदमी हुई

    बाँध रखा था हमने जिनको

    अपने सोच की चार दीवारों में

    अब समझा तो जाना

    हर तरफ उसके ही नूर से

    दुनिया सजी

    एक ऐसी ईद भी आई

    एक ऐसी नवरात गई

    मैं जिधर देखूं वो ही वो है

    हर जीव हर ज़र्रे में वो है

    कोई जगह नहीं इस दुनिया में

    जहाँ से उसने अपने बच्चों की न सुनी

    एक ऐसी ईद भी आई

    एक ऐसी नवरात गई

    किसने सोचा था ऐसे भी

    दिन आयेंगे

    मंदिरों दरगाहों गुरूद्वारे और चर्च के

    बाहर से

    फूलों के ठेले हट जायेंगे

    उसका दिया उसको ही देकर

    हमने सोचा था हमारी बात बनी

    एक ऐसी ईद भी आई

    एक ऐसी नवरात गई

    ये वख्त हमे कुछ और सीखा रहा है

    ढोंग दिखावे से दूर ले जा रहा है

    ऐसा लगता है इश्वर ने नशा मुक्ति केंद्र

    है खोला

    जिसमे हम सब की भीड़ लगी

    एक ऐसी ईद भी आई

    एक ऐसी नवरात गई

    माना हमें तकलीफ बहुत है

    पर इसमे जो निखरेगा

    उस को ही हासिल रब है

    समझ लो हमारे गुनाहों की

    बस थोड़ी सी सजा मिली

    एक ऐसी ईद भी आई

    एक ऐसी नवरात गई ………

    आप सबको रमजान का महीना बहुत बहुत मुबारक !

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”

  • तीन मित्र

    तीन मित्र थे अपने
    वफादारी के परम मिसाल।
    मरणासन्न होकर मैं
    तीनों से पूछा एक सवाल।।
    कौन चलोगे मेरे साथ
    किसको पास सदा मैं पाऊँगा?
    बहुत दिया मैं साथ
    नहीं अब तेरा साथ निभाऊँगा।
    बोला पहिला मित्र
    है तेरा मेरा साथ यही तक।
    घर से निकलकर
    काँधे देकर मुख पर मिट्टी डालूँगा।
    धोप -थाप के कब्र को
    सुन्दरतम कर सुन्दर फूल चढ़ाऊँगा।।
    बोला दूजा मित्र
    इसके आगे क्या कर सकता हूँ?
    जन्म से पहले व जीवन भर का
    साथी मैं तुमसे अब भी कहता हूँ।।
    बाद कयामत और जन्मों तक
    प्यारे मैं तेरा साथ निभाऊँगा।
    तीजा का ये कहना
    तेरा हरदम साथ निभाऊँगा।।
    पहिला मित्र माल है भैया
    दूजा इयाल कहलाता है।
    तीजा साथी आमाल है
    जो पग-पग साथ निभाता है।।
    माल इयाल को छोड़ ‘विनयचंद ‘
    अर्जन कर आमाल सदा।
    जीवन सुखमय होंगे तेरे
    सुखकर हो इन्तकाल सदा।।

    माल :धन
    इयाल: परिवार
    आमाल: कर्म, सेवा

  • रुख्सत

    ये जो लोग मेरी मौत पर आज

    चर्चा फरमा रहे हैं

    ऊपर से अफ़सोस जदा हैं

    पर अन्दर से सिर्फ एक रस्म

    निभा रहे हैं

    मैं क्यों मरा कैसे मरा

    क्या रहा कारन मरने का

    पूछ पूछ के बेवजह की फिक्र

    जता रहे हैं

    मैं अभी जिंदा हो जाऊँ

    तो कितने मेरे साथ बैठेंगे

    वो जो मेरे रुख्सत होने के

    इन्जार में कब से घडी

    देखे जा रहे हैं

    इन सब के लिए मैं

    बस ताज़ा खबर रहा उम्र भर

    जिसे ये बंद दरवाज़ों के पीछे

    चाय पकोड़ों के साथ

    कब से किये जा रहे हैं

    ऐसे अपनों का मेरी मय्यत

    पे आना भी एक हसीं वाक्या है

    जहाँ ये अपनी ज़िंदगियों की

    नजीर दिए जा रहे हैं

    सिलसिला रिवायतों का जब

    ख़तम हो जायेगा

    फिर किसे मिलेगी इतनी फुर्सत

    फिर कौन नज़र आएगा

    सब रिवायते अदा कर

    ये भी अपनी “मंजिलों “को ओर

    बढे जा रहे हैं

    इतनी अदायगी कैसे कर लेते हैं लोग

    बिना एक्शन बोले भी

    आंसू बहाए जा रहे हैं

    न मेरे गम न मुफलिसी में

    कभी रहे शामिल

    अब मेरी तेरहवी पर भी

    दिल बहलाने को

    DJ लगवा रहे हैं …

    नजीर -: मिसाल, तुलना

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”

  • गलतफहमियों के बीज

    गलतफहमियों के बीज अविश्वास से पनपते हैं
    अधसुनी बातों को लोग पूरा सच समझते हैं

    बड़े तो हो चले हैं हम अपनी नजरों में प्रज्ञा !
    ना जाने लोग क्यों मुझे अभी छोटा ही समझते हैं

    जीने की उम्मीद खत्म हो चुकी है मगर जिंदा अभी हैं हम
    ये बात समझ ना आई! वो मुझे मुर्दा क्यों समझते हैं?

    दाग दर्पण में है चेहरे पर मेरे एक भी नहीं
    फ़क़त इतनी-सी बात वो क्यों नहीं समझते हैं

    उलझे हैं हम या हमारी जुल्फों में कई राज
    इस रहस्य के धागे कभी क्यों नहीं सुलझते हैं

    सामना कभी तो होगा उनका मेरी वफा(पवित्रता)से
    अभी तो दामन को मेरे वो मैला ही समझते हैं

    गम छुपाने के लिए हम जो जरा हंस बोल देते हैं
    हंसी तो छोड़ो उन्हें मेरे आंसू भी खटकते हैं

    जो दो-चार गजलें हम अपनी तन्हाई में लिखते हैं
    कुछ नासमझ हैं जो इसको प्रेमपत्र समझते हैं

    प्रेमपत्र तो लिखकर प्रेषित किया जाता है
    हम तो अपने जज़्बात कविताओं में निचोड़ देते हैं।

  • पहचान

    बेकद्रों की महफ़िल मे कद्रदान ढूंढ रहा हूँ
    अनजान लोगो मे अपनी पहचान ढूंढ रहा हूँ
    अंधेरा करने वालों से रौशनी की मांग कर रहा हूँ
    काली हुई रात मे रोशन जहान ढूढ रहा हूँ
    मशगूल है सब अपने मे किसको किसकी फ़िक्र है
    बेफिक्र ज़माने मे अपना फ़िक़्रदान ढूंढ रहा हूँ
    करूँ किस पर कितना एतबार अब इस जहाँ मे
    एतबार करने वाले ऐसे इंसान ढूंढ रहा हूँ
    कदम कदम मिला कर चलने वाले कहाँ गये
    बारिश मे उनके क़दमों के निशान ढूंढ रहा हूँ
    ख़्वाहिशें जो दबी रहे गई दिल की तन्हाइयों मे
    डूब कर दिल की गहराइयों मे अरमान ढूंढ रहा हूँ
    पंकज प्रिंस

  • मौजूदा हालात पे ग़ज़ल

    आदाब

    मुफ़लिसों को क्यों मिली है जिंदगी
    बारहा ये सोचती है जिंदगी

    ज़िंदगी जैसे मिली ख़ैरात में
    ऐसे उनको देखती है जिंदगी

    इस जहाँ में बुज़दिलों के वास्ते
    बस क़ज़ा है, तीरगी है ज़िन्दगी

    ख़ुदकुशी से क्या मिला है आज तक
    सामना कर कीमती है जिंदगी

    बंद आँखों से कभी सुन सरगमें
    इक सुरीली बाँसुरी है जिंदगी

    दिल में हो उम्मीद की कोई किरन
    रौशनी ही रौशनी है जिंदगी

    हर घड़ी तैयार रहना ‘आरज़ू’
    इम्तिहानों से भरी है जिंदगी

    आरज़ू

  • बेटियों पर एक ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    दौलत नहीं, ये अपना संसार माँगती हैं
    ये बेटियाँ तो हमसे, बस प्यार माँगती हैं

    दरबार में ख़ुदा के जब भी की हैं दुआएँ,
    माँ बाप की ही खुशियाँ हर बार माँगती हैं

    माँ से दुलार, भाई से प्यार और रब से
    अपने पिता की उजली दस्तार माँगती हैं

    है दिल में कितने सागर,सीने पे कितने पर्बत
    धरती के जैसा अपना, किरदार माँगती हैं

    आज़ाद हम सभी हैं, हिन्दोस्ताँ में फिर भी,
    क्यों ‘आरज़ू’ ये अपना अधिकार माँगती हैं?

    आरज़ू

  • करें भरोसा आखिर किस पर?

    कानून के रक्षक
    भी अब
    भक्षक हो गए ,
    करें भरोसा
    आखिर
    किस पर?
    खाकी वर्दी
    भी
    गुलाम बन
    हुक्म बजाती
    सफेदपोश की।
    काले कोट के जेब
    बड़े हो गए,
    करें भरोसा
    आखिर
    किस पर?
    लुच्चे,
    लम्पट,
    चोर,
    आतंकी
    खुल्ला
    घूम रहे हैं
    देखो।
    हिंसक भीर
    भेरिये की चहुदिश
    हो गई
    ज़िन्दगी
    मुश्किल खरगोश की।
    साधु
    संत
    सन्यासी
    को चोर समझ
    अनाचार
    कर रहा समाज।
    मुर्खता और
    गलतफहमी के
    सब शिकार
    हो गए,
    करें भरोसा
    आखिर
    किस पर?

  • धर्मराज़:- युधिष्ठिर

    चौसर खेलने वाले भी
    जग में पूजे जाते हैं
    राज़-काज,अनुज,पत्नी और प्रजा
    सर्वस्व दांव पर रखकर भी
    एक भी बाजी ना जीते
    सर्वस्व हार ही जाते हैं
    समय की विडम्बना देखो
    ऐसे लोग भी
    धर्मराज कहलाते हैं

  • सम्बन्ध

    रिश्तों की डोर मे मजबूरियों का यह क्या सिला है,
    अपनों के बीच यह कैसा नफ़रत का फूल खिला है

    गुलिस्तां महकता था कभी जिनकी किलकारियों से,
    खुश्बू बिखरती थी कभी बागीचे की फुलवारियों से
    सींचता था जो प्यार से उसे बिखरा चमन मिला है,
    रिश्तों की डोर मे मजबूरियों का यह क्या सिला है

    सच्ची चाहतों के भंवर मे फंसी यह कैसी जिंदगी है,
    इन पत्थर दिलो के लिए यह कैसी बंदिगी है
    मुझको भी क्यों ना बनाया उनसे यह गिला है,
    रिश्तों की डोर मे मजबूरियों का यह क्या सिला है

    बढ़ते फासले दरमियान के कहाँ तक जायेंगे
    दूर होकर भी एक दूजे को बहुत याद आयेंगे
    देख कर दुनिया के दावों को ऊपर वाला भी हिला है,
    रिश्तों की डोर मे मजबूरियों का यह क्या सिला है

    अनसुलझे सवालों के साथ पहेली यह जीवन रेखा,
    जवाबो को ढूंढ़ती मैंने अपनी ज़िन्दगी को देखा
    दांव पर लगी ज़िंदगियों का यह क्या सिलसिला है,
    रिश्तों की डोर मे मजबूरियों का यह क्या सिला है
    अपनों के बीच यह कैसा नफ़रत का फूल खिला है

    पंकज प्रिंस

  • ताज महल

    नाकाम मोहब्बत की निशानी

    ताज महल ज़रूरी है

    जो लोगो को ये बतलाये के

    मोहब्बत का कीमती होना नहीं

    बल्कि दिलों का वाबस्ता होना ज़रूरी है

    दे कर संगमरमर की कब्रगाह

    कोई दुनिया को ये जतला गया

    के मरने के बाद भी

    मोहब्बत का सांस लेते रहना ज़रूरी है

    वो लोग और थे शायद, जो

    तैरना न आता हो तो भी

    दरिया में डूब जाते थे

    मौत बेहतर लगी उनको शायद

    क्योंकि महबूब का दीदार होना ज़रूरी है

    मरते मर गए पर खुद को

    किसी और का होने न दिया

    चोट उसको लगे और छाले

    दिलबर के हाथों पे हो

    ऐसी मोहब्बत पे फ़ना होना ज़रूरी है

    कैद होकर यूं ताजमहल की

    सुन्दर नक्काशी में

    मुमताज़ महल आज भी सोचती होगी

    के सच्ची मोहब्बत का संगमरमर होना नहीं

    बल्कि मिसाल बन कर मशहूर होना ज़रूरी है ….

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”

  • जिसे सर झुकाने की आदत नहीं है

    जिसे सर झुकाने की आदत नहीं है
    उसे हर बशर से मोहब्बत नहीं है

    दुःखा दिल किसी का ख़ुशी मैं मनाऊँ
    मेरे दिल की ऐसी तो फ़ितरत नहीं है

    वो अपने किए पर पशेमां बहुत है
    नज़र भी मिलाने की हिम्मत नहीं है

    बहा आई दरिया में लख़्त ए जिगर को
    ज़माने से लड़ने की ताक़त नहीं है

    समझ आ चुका है ये रिश्तों का मतलब
    किसी आसरे की ज़रूरत नहीं है

  • नभ चढ़ने दो

    कागज का टुकड़ा बना पतंग
    उड़ना चाहे नील गगन में।
    हम पंछी का जीवन क्योंकर
    डाल रहे हो पिंजर बन्ध में।।
    पतंड उड़ाने के शौकीनों
    मुझको भी तो उड़ने दो।
    मेरे भी हैं कुछ अरमान
    ‘विनयचंद ‘नभ चढ़ने दो।।

  • प्रज्ञा की वेदना:-

    उनकी बगिया की बहार
    देखती ही रह गई
    कली जो खिली थी
    धूप की तपन में
    मुरझा गई ……

    अंजुमन में कितने मशरूफ थे
    तेरी स्मृतियों के अवशेष
    बातें बहुत-सी हुईं
    रह गए बस वचन शेष …..

    गीत गुनगुना रही थी
    नवविवाहिता वसंत
    स्तब्ध थे खड़े सभी
    सुन रहे थे प्रेमग्रंथ……

    प्रज्ञा की वेदना के साक्षी हैं
    सभी यहाँ
    रात्रि की कौमुदी और
    प्रभात की सुर्खियाँ……

  • भोजपुरी गीत – होले होले डोले |

    भोजपुरी गीत – होले होले डोले |
    तन मोरा होले होले डोले |
    मन मोरा डरे डरे बोले |
    कोरोना केहु जान ना ले ले |
    तन मोरा होले होले डोले |
    आइल कहा से बैरी कोरोनवा |
    घाइल भइल सगरो जमनवा |
    डरे केहु दुअरिया ना खोले |
    तन मोरा होले होले डोले |
    धक धक मोरा जियरा करेला |
    लुक छुप सबके कोरोना धरेला |
    हाली हाली हथवा तू धो ले |
    तन मोरा होले होले डोले |
    सोचा कइसे कोरोना भगाई |
    रही रही लोगवा सबके डराई |
    योद्धा कोरोनवा बजुआ मे तोले |
    तन मोरा होले होले डोले |
    रहिया केवनों ना लोगवा से सटके |
    जहिया जहवा रहिया तू फरके |
    धधकी जीयरा उठे मोरा शोले |
    तन मोरा होले होले डोले |
    मुहवा मसकिया लगईहा जरूर |
    घरवा रहे खातिर सिखला सहुर |
    बनिहा मती भईया तू भोले भोले |
    तन मोरा होले होले डोले |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286
    व्हात्सप्प्स -8210525557

  • प्रेम

    प्रेम, जिसमें मैं ही मैं हो

    हम न हो

    डूब गए हो इतने के

    उबरने का साहस न हो

    वो प्रेम नहीं एक आदत है

    उसकी

    जो एक दिन छूट जाएगी

    फिर से जीने की कोई वजह

    तो मिल जाएगी

    जब तू उस घेरे के बाहर

    निहारेगा

    तब ही तेरा आत्म सम्मान

    तुझे फिर से पुकारेगा

    तू झलांग लगा पकड़ लेना

    उसकी कलाई को

    उसकी आदत के चलते

    तूने नहीं सोचा खुद की

    भलाई को

    तब ही तू पुनः स्वप्रेम

    कर पायेगा

    फिर से खुद को “जीता ”

    हुआ देख पायेगा

    क्योंकि वो प्रेम नहीं जिसमे

    कोई डूबा तो हो

    पर उभरा न हो

    उसके सानिध्य में

    और निखरा न हो ….

    उबरना : विपत्ति से मुक्त होना/बचना

    उभरना : ऊपर उठना/उदित होना

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”

  • लॉक डाउन २.०

    लॉक डाउन २.०

    चौदह अप्रैल दो हज़ार बीस,

    माननीय प्रधान मंत्री जी की स्पीच ।

    देश के नाम संबोधन,

    पहुंचा हर जन तक ।

    कई बड़ी और अहम बातें,

    क्या क्या कहा, हम हैं बताते !

    उनकी बातों को संजोया,

    माला में है पिरोया ।

    ज़रा कीजिए ध्यान,

    रचना व्याख्यान ।

    कविता रही आपको ललकार,

    आपके धैर्य का इम्तिहान ।

    लंबी है पर है रोचक,

    संबोधक संकटमोचक ।

    उनकी कहानी,

    इस नाचीज़ की ज़ुबानी ।

    “नमस्ते, मेरे प्यारे देशवासियों,

    कस्बों, शहरों और वादियों ।

    कोरोना के ख़िलाफ़,

    एकजुट मैं और आप ।

    हमारा युद्ध,

    इस महामारी के विरुद्ध ।

    हो इसका नाश,

    भरसक प्रयास ।

    हम हुए मजबूत,

    सब हैं जागरुक ।

    कदम से कदम,

    अब मिला रहे हम ।

    आप सब की तपस्या,

    काफ़ी हद तक सफ़लता ।

    आपका ही त्याग,

    नुक़सान रहे टाल ।

    सहे आपने कष्ट,

    बने देशभक्त ।

    आई कितनी दिक्कतें,

    फ़िर भी आप डटे रहे ।

    देश की खातिर,

    आप बन गए सैनिक ।

    निभाए कर्तव्य,

    हिन्द सर्वप्रिय ।

    आप सबको नमन,

    आभार हर जन ।

    सच्ची श्रद्धांजलि,

    बाबा साहब को अंजलि ।

    उनका जन्मोत्सव,

    गरिमा और गर्व ।

    हमारा संविधान,

    आन, बान और शान ।

    ‘वी द पीपल ऑफ इंडिया’,

    नृत्य, भांगडा व डांडिया ।

    संस्कृतियों का मिलन,

    अधिकार दायित्व का संतुलन ।

    शक्ति स्वाभिमान,

    हमारा संविधान ।

    सामूहिक ताकत,

    अम्बेडकर जी की बदौलत ।

    यह संकल्प,

    संयम से सब ।

    चुनौती स्वीकार,

    परिश्रम आधार ।

    दे निरंतर प्रेरणा,

    आगे बस चलना ।

    त्योहारों का मौसम,

    सादगी का संगम ।

    उत्सवों से भरा,

    भारत हरा भरा ।

    बंधन बावजूद,

    अनुशासन वजूद ।

    नियमों का पालन,

    प्रशंसनीय उदाहरण ।

    घर में रहकर,

    दिल में कर गए घर ।

    हर परिवार की फ़िक्र,

    मंगलकामना का ज़िक्र ।

    स्थिति को भांप,

    भारत पहले गया था जाग ।

    उठाए अहम कदम,

    अर्थव्यवस्था चाहे गई थम ।

    पहले जान,

    फिर जहान ।

    विश्व का हश्र,

    जानकार हर कोई शख़्स ।

    अन्य देशों से बेअसर,

    हिंदी ने पहले कसी कमर ।

    संक्रमण की घुटे सांस,

    रोकथाम के अथक प्रयास ।

    आप इसके सहभागी,

    सहायक और साक्षी ।

    थी पहले से तैयारी,

    स्क्रीनिंग अतिशीघ्र की थी जारी ।

    विदेश से आने वाले,

    आइसोलनेशन अनिवार्य ।

    ठोस निर्णय लिए तेज़ तर्रार,

    समस्या बढ़ने का ना किया इंतजार ।

    दूसरे देशों से उचित नहीं तुलना,

    यह ऐसा संकट दूर रहकर पिघलना ।

    फिर भी कुछ सच्चाइयां स्वीकार,

    नहीं सकते हम उन्हें नकार ।

    दुनिया के सामर्थ्यवान देश,

    हाथ जोड़ सुनें हिन्द संदेश ।

    संभली स्थिति में है अभी भारत,

    नींव है पक्की, मज़बूत इमारत ।

    होस्लिटिक व इंटीग्रेटेड अप्रोच,

    हिन्द की शुरू से यही रही सोच ।

    ये पद्धति गर ना अपनाई होती,

    हमारी हालत फ़िर दयनीय होती ।

    कल्पना ना कर सकते उसे,

    रोंगटे सोचकर हो जाते खड़े ।

    बीते दिनों का यही अनुभव,

    चल रहे जिसपर, सही चुना पथ ।

    सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन,

    मिला बड़ा लाभ, इसमें नहीं डाउट ।

    आर्थिक दृष्टि से ज़रूर ये महंगा,

    जीवन मूल्य से पर नहीं मुकाबला ।

    माना बड़ी कीमत चुका रहा हिन्द,

    ज़िन्दगी से बढ़कर पर नहीं कोई चीज़ ।

    सीमित संसाधन संग चले जिस मार्ग,

    बने विश्व गुरु, हम बनें हैं पार्थ ।

    राज्य सरकारें व स्थानीय निकाय,

    ज़िम्मेदारी से कर रहे कार्य ।

    बख़ूबी निभा रहे ये उत्तरदायित्व,

    आपसी तालमेल ज़ोरदार घनत्व ।

    हालात को है सबने संभाला,

    बने सतर्क, दूरी ही सहारा ।

    जिस स्तर पर रहा विषाणु फ़ैल,

    सावधानी ही बस सकती झेल ।

    बीच राह में ना हो युद्ध विराम,

    चिंतन विवेक से लेना काम ।

    सबका यही आया सुझाव,

    ना लगाओ दांव पे अभी जान ।

    थोड़ा और संघर्ष, तप व संयम,

    थोड़ा और ठहराव, वश में हो मन ।

    ध्यान रखते हुए परामर्श,

    लॉकडाउन बढ़ेगा ३ मई तक ।

    ख़तरा अभी नहीं टला,

    इसलिए अवधि बढ़ाने का फैसला ।

    ग़रीब पे होगा पूरा ध्यान,

    ना रहेगा भूखा, मिले भरपेट अन्न ।

    राज्य सरकारों से हुई निरंतर चर्चा,

    लॉकडाउन २.० के वास्ते सुदृढ योजना ।

    कोरोना के खिलाफ लड़ाई,

    आगे बढ़ेंगे, होंगे विजयी ।

    लोगों की होंगी दिक्कतें कम,

    विचार विमर्श की कर रहे हम ।

    कम जानमाल का हो नुक़सान,

    जी जान से हो रहे प्रयास ।

    नए हॉट स्पॉट ना बनें,

    चौकन्ना रहना होगा हमें ।

    अनुशासन का करना होगा पालन,

    और सख़्ती, कुछ और नियंत्रण ।

    सबसे मेरी यही है प्रार्थना,

    किसी कीमत पर नहीं ये फैलना ।

    इसकी रोकथाम प्रथम काम,

    करना है इसका काम तमाम ।

    स्थानीय स्तर पर एक भी मरीज बड़े,

    हमारे लिए ये फ़िर चिंता का विषय।

    पहले से बहुत ज्यादा सतर्कता,

    रहने ना देंगे इसकी सत्ता ।

    हॉटस्पॉट में बदलने वाले ज़िले,

    कड़ी नजर व कठोर फ़ैसले ।

    नए हॉटस्पॉट से पैदा नए संकट,

    हमारी तपस्या को चुनौती बिन डर ।

    और कठोर अगला सप्ताह,

    कांटों वाली क्योंकि राह ।

    20 अप्रैल तक हर कस्बा ज़िला,

    हर थाना बारीकी से जाए परखा देखा ।

    वहां लॉकडाउन का कितना पालन,

    कितना बचाव, होगा मूल्याकंन ।

    जो क्षेत्र इस अग्निपरीक्षा में सफल,

    20 अप्रैल से जाए वहां रियायत मिल ।

    जरूरी गतिविधियों की वहां मिलेगी छूट,

    अनुमति सशर्त ना जाएं वो भूल ।

    बाहर निकलने के लिए नियम बहुत सख़्त,

    निभाओ दायित्व, बन जाओ देशभक्त ।

    लॉकडाउन के गर टूटते नियम,

    सारी अनुमित वापस, ना कुछ कायम ।

    लापरवाही ना ख़ुद करे,

    दूजा करे तो उसे वहीं धरें ।

    इस बारे में सरकार साफ़ या रिफाइन,

    जल्द आएगी वृस्तृत गाइडलाइन ।

    20 अप्रैल से चिन्हित क्षेत्र में सीमित छूट,

    ये प्रावधान वास्ते गरीबों की रोजी व भूख ।

    उनकी आजीविका को रखते हुए ध्यान,

    संवेदनशील फ़ैसला बिन कोई व्यवधान ।

    वे रोज कमाते हैं, रोज़ हैं खाते,

    हिन्द विकास में अहम भूमिका निभाते ।

    मेरा यही सर्वोच्च केंद्र बिंदु,

    उनकी मुश्किलें कुछ कम करूं ।

    पीएम गरीब कल्याण योजना,

    मदद का हर संभव प्रयास किया ।

    नई गाइडलाइन बनाते समय,

    उनके हित पूरे ध्यान रखे।

    रबी फसल कटाई का ये वक़्त,

    प्रयास कि किसानों को हो कम दिक्कत ।

    राशन से दवा तक पर्याप्त भंडार,

    विश्वास करें, हैं काबू में हालात ।

    सप्लाई चेन की जो बाधाएं,

    दूर शीघ्र, ये हैं आशाएं ।

    हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर,

    हम तेजी से हो रहे हैं अग्रसर ।

    देश में हैं अब,

    220 से ज्यादा लैब ।

    भरपूर मात्रा में हैं अस्पताल,

    समग्र बिस्तर, वैद्य व कुशल इलाज ।

    इन सुविधाओं को देके प्राथमिकता,

    और तेजी से बढ़ाया जा रहा ।

    आज भारत के पास भले सीमित संसाधन,

    मेरा वैज्ञानिकों से आग्रह व नमन ।

    विश्व कल्याण के लिए आगे आएं,

    वैक्सीन बनाने का बीड़ा उठाएं।

    सात बातों में मांग रहा हूं साथ,

    रखें धैर्य, काबू में जज़्बात ।

    करें नियमों का पालन,

    तभी बचेगा जीवन ।

    रहेंगे कोरोना को हम हराकर,

    दम लेंगे उसको तो भगाकर ।

    गौर करें मेरी पहली बात,

    रखें बुजुर्गों का विशेष ध्यान ।

    दूसरी बात पे रहें कायम,

    सोशल डिस्टेंसिंग का हरदम पालन ।

    घर में बने फेस कवर या मास्क,

    उपयोग अनिवार्य, ना मुश्किल टास्क ।

    तीसरी बात ये कि बड़ाएं इम्यूनिटी,

    आय़ुष मंत्रालय निर्देशों की हो स्वीकृति ।

    काढ़ा आदि का करें सेवन,

    निरंतर पिएं कोसा जल ।

    चौथी बात करें ऐप डाउनलोड,

    आरोग्य सेतू पे हो अब ज़ोर ।

    ख़ुद करें इंस्टॉल, औरों को भी कराएं,

    ये ऐप संक्रमण की जानकारी बताए ।

    संक्रमण फ़ैलाव में बने ये बाधा,

    संक्रमण आसपास तो करे ये आगाह ।

    पांचवीं बात से करें कर्म नेक,

    ग़रीब परिवार की करें देखरेख ।

    जितना हो सके करें उनकी मदद,

    उनको खिलाएं भरपेट भोजन ।

    छठी बात है उद्योग व्यवसाय,

    देते रहें कर्मचारियों को आय ।

    नौकरी से उन्हें ना निकालें,

    संवेदना रखें, पुण्य कमालें ।

    सातवीं बात चाहे आखिरी बात,

    इसमें छुपे सारे जज़्बात ।

    कोरोना योद्धाओं का करें सम्मान,

    डॉक्टर, नर्स, स्वास्थ्यकर्मी महान ।

    पुलिसकर्मी भी अहम सिपाही,

    उनके बिन अधूरी ये लड़ाई ।

    ये सब हैं इस देश के रक्षक,

    इनको बिठाएं सिर आंख पर ।

    करें इनका आदर सत्कार,

    इनसे ही खुलें, बंद जो द्वार ।

    इन बातों में मांगूं निष्ठूर साथ,

    विजय पाने का केवल यही है मार्ग ।

    जहां है वहीं रहें,

    सुरश्रित रहें, संयमित रहें ।

    राष्ट्र को बनाएंगे जीवंत,

    जागरूक और ज्वलंत ।

    इसी के साथ देता हूं विराम,

    अपनी वाणी को देता हूं ठहराव ।

    आपके परिवार की मंगलकामना,

    उत्तम स्वास्थ्य की मनोकामना ।”

    स्वरचित – अभिनव ✍🏻

  • मां

    लिये छः ऋतुयें आये नया साल,
    हर ऋतु गुजरे मेरी संग मां के,
    त्यौहार मेरे न तुमसे, संग मां के,
    मेहनत मेरी ,उगले सोना मेरी माँ,
    समझता मैं खिलखिलाना मां का,
    सिसकता मैं देख सुखी धरा को,
    सुनी सुखी आंखे मेरी देखे अंबर,
    सुख गया वो भी जैसे भूख मेरी,
    जा रहा मैं अब उसके द्वारे,
    लिये जा रहा अपने शिकवे,
    सौप दिये जा रहा मां अपनी,
    विलाप मेरा भरेगा अंबर,
    बन बूंदे टपकेंगे मेरे आँसू,
    मेहनत से थाम लेना मेरी माँ,
    जा रहा मैं अब उसके द्वारे।

  • ए काश!

    ए काश !मेरा प्यार भी कोरोना जैसा होता
    हम उन्हें छू लेते और उन्हें भी हो जाता

  • मेरे दिल का नज़राना

    कभी मायूस होती हूँ कभी बेचैन होती हूँ
    मगर तेरी मोहब्बत में डूबी दिन-रैन होती हूँ,
    कभी बातें कभी यादें कभी तन्हाई में तुझको
    भुलाकर सब ओ मेरी जान सिर्फ तुझमें ही खोती हूँ ।
    ——————————————————-
    मेरे दिल का नजराना मुबारक हो तुम्हें साहिब
    मेरे किस्से मेरे सपने मुबारक हो तुम्हें साहिब
    जो ना दे सके तुमको चाहकर भी मेरे हमदम,
    वो खुशियां और वो मंजिल मुबारक हो तुम्हें साहिब।
    ——————————————————
    इश्क फरमाते हो तुम भी इश्क फरमाते हैं हम भी
    जरा पास आते हो तुम भी जरा पास आते हैं हम भी
    बहुत मजबूर हैं हम यार दुनिया के उसूलों से,
    अतः खामोश हो तुम भी अतः खामोश हैं हम भी ।

    मोहब्बत ही मोहब्बत है तेरे जानिब मेरे जानिब
    शरारत ही शरारत है तेरे जानिब मेरे जानिब
    नजर आती हैं जब तेरी नजरें मेरी नजरों को,
    आग ही आग लगती है तेरे जानिब मेरे जानिब।

  • कुछ अनकहा, कुछ अनसुना

    कुछ अल्फाज बचा रखे थे
    उनके लिए वह आए और
    बिना बोले चले गए।

    कुछ नजरें बचा रखी थी
    उनके लिए वह आए और
    बिना देखे चले गए।

    कुछ गीत सजा रखे थे
    उनके लिए वह आए और
    अनसुना करके चले गए।

    अपना प्यार छुपा रखा था
    उनके लिए वह आए और
    बेवफा बता कर चले गए।

  • जीवन के इस मोड़ पर

    मेरे बच्चे साथ निभाओगे
    गर गुस्सा हो जाऊं किसी बात पर
    आकर मुझे मनाओगे ?
    इन सिकुड़न वाले हाथों को
    क्या प्यार से तुम सहलाओगे?
    बूढ़ा हूं कुछ , सुनने की शक्ति भी क्षीण हुई
    कोई बात समझ गर ना आए
    क्या बार-बार दोहराओगे ?
    ताउम्र सभी के साथ रहा
    इस बात को क्या भुला दोगे।
    गर घर छोटा पड़ गया तेरा है
    क्या वृद्धाआश्रम भिजवा दोगे?
    तेरी चांद सी रोशन दुनिया में
    माना कुछ बेरंग सा हूं
    जीवन की ढलती बेला में
    आखिर तेरे बच्चे जैसा हूं।।
    -Kanchan dwivedi

  • मेरे शिव

    ओ मेरे शिव, मैं सच में तुमसे प्यार कर बैठी

    सबने कहा , क्या मिलेगा मुझे

    उस योगी के संग

    जिसका कोई आवास नहीं

    वो फिरता रहता है

    बंजारों सा

    जिसका कोई एक स्थान नहीं

    सब अनसुना अनदेखा कर दिया मैंने

    अपने मन मंदिर में तुमको स्थापित कर बैठी

    ओ मेरे शिव, मैं सच में तुमसे प्यार कर बैठी

    सबने समझाया , उसका साथ है भूतो और पिशाचों से

    वो क्या जुड़ पायेगा जज्बातों से

    पथरीले रास्तों पे चलना होगा उसके साथ

    लिपटे होंगे विषैले सर्प भी उसके आस पास

    सब अनसुना अनदेखा कर दिया मैंने

    अपने प्राण तुम्हारे सुपुर्द कर बैठी

    ओ मेरे शिव, मैं सच में तुमसे प्यार कर बैठी

    किसी की नहीं सुनी , किसी की नहीं मानी

    एक तपस्वी को पाने मैं

    उसकी साधना में चली

    वर्षों तप किया मैंने, देखे कई उतरते चढ़ते पल

    फिर भी अपना विश्वास न डिगने दिया

    सिर्फ तुम्हारी धुन मन को लगी भली

    खुद को रमा लिया तुम्हारी ही प्रतीक्षा में

    मैं अपना सर्वस्व तुझ पर अर्पण कर बैठी

    ओ मेरे शिव, मैं सच में तुमसे प्यार कर बैठी

    तुम तो ठहरे मनमौजी , अपनी विरक्ति का कश लगया हुए

    ऊपर से शांत , पर कंठ में विष समाये हुए

    मैं जितना प्रेम दूँ वो कम है

    ऐसी तेरी दीवानी बन बैठी

    ओ मेरे शिव, मैं सच में तुमसे प्यार कर बैठी

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”

  • आख़िरी इच्छा

    कभी कभी सोचती हूँ

    अगर इस पल मेरी साँसें थम जाये

    और इश्वर मुझसे ये कहने आये

    मांगो जो माँगना हो

    कोई एक अधूरी इच्छा जो

    अभी इस पल पूरी हो जाये

    मैं सोच में पड़ जाती हूँ

    के ऐसा अगर सच हुआ तो

    तो क्या माँगू जो

    इसी पल मुझे तृप्त कर जाये

    बहुत कुछ पीछे छूट गया

    क्या वहाँ जा के कोई गलती

    सुधार ली जाये

    या कोई खुशनुमा लम्हा

    फिर से जिया जाये

    फिर सोचा जो बीत गया

    वो बात गई, तो

    चलो इस आखिरी पल में

    अपने जन्म से जुड़े रिश्तों

    से अलविदा ली जाये

    पर शायद मैं उनका सामना

    न कर पाऊँ तो

    जाते जाते क्यों

    आँख नम की जाये

    ऐसा बहुत कुछ अधूरा है

    जो इस एक लम्हें में

    सिमट न पायेगा

    जो भी माँगू सब यहीं धरा रह जायेगा

    इसलिए सोचा क्यों

    तो कुछ ऐसा माँगू

    जिसके होने से सारी कायनात

    इस पल मेरे आँचल में समां जाये

    फिर दिल ने कहा, ऐसा है तो

    चल उनसे मिलते हैं

    जिनके साथ ये आख़िरी लम्हा भी

    गुलज़ार हो जाये

    बिना जताए , महसूस कराये

    परछाई बन , चल उनको

    जी भर देख आते हैं

    वो मसरूफ होंगे अपने कामों में

    बिना रोके टोके उन्हें

    हर बची सांस में भर आते हैं

    फिर मौत आती है तो आये,

    अब कोई ख्वाहिश न रही ऐसी

    जो अधूरी रह जाये

    उन्हें सामने देख कर क्यों न

    सुकून से मरा जाये

    मर के भी जो साथ लिए जाऊं

    ऐसा एक ताज़ा लम्हा जिया जाये …

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”

  • बेटी

    आज पिघली-पिघली है
    देखो
    पथ्थर की दीवार
    बन्धु,सखा,माँ-बाप
    सभी छूट रहे हैं
    विडम्बना देखो समय की
    कुछ बिछड़ रहे तो
    कुछ रिश्ते जुड़ रहे हैं
    जिस आँगन में खेली- कूदी
    वही छोड़ कर जाती है
    बेटी ही है जो सारे
    कुल की लाज़ बचाती है
    बेटों को फिर भी सब अपने
    कुल का दीपक कहते हैं
    जबकि वंश को सबके
    एक बहू ही आगे
    बढ़ाती है
    सारे घर की दीवारें
    रोती हैं बिलखती हैं
    जिसने दहलीज़
    कभी ना लांघी
    आज घर को छोड़े जाती है
    बेटी है प्राणों से प्यारी
    सब परिजन बिलख-बिलख
    कर रोते हैं
    माँ-बाप का हाल ना पूँछो
    कैसे खुद को समझाते हैं
    भाई विदा कर अपनी
    लाडली को
    सुबक-सुबक कर रोते हैं

  • गजल -जीत लेंगे कोरोना |

    गजल -जीत लेंगे कोरोना |
    जीत लेंगे कोरोना तेरा नाम मिटा देंगे |
    मुरझाए चेहरों पर मुस्कान खिला देंगे |
    पहले न जान पाये अब जान चुके तुझे |
    तू पहचान हमे तुझको पानी पीला देंगे|
    आता हमे हिफाजत करनी खुद अपनी |
    आया तू जहा से तुझे वही लौटा देंगे |
    बहुत मचा लिया उत्पात अब रुक जा |
    कोरोना योद्धा तुझे मार लिटा देंगे|
    लगा लॉक डाउन अब तेरा वार न चले |
    जलती तेरी जीवन लौ अब मिटा देंगे |
    मानव दुशमन वायरस टिक न पायेगा |
    दो पल का जीव गहरी नींद सुला देंगे |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286
    व्हात्सप्प्स -8210525557

  • कविता -सुरक्षित वही है होता |

    कविता -सुरक्षित वही है होता |
    कोरोना देखे ना जात जान सभी लेता |
    रहता ज़ो घर मे सुरक्षित वही है होता |
    पहने न मुख बाहर मास्क खतरा बहुत |
    बचके रहना सभी आदमी आम या नेता |
    धोना हर घंटे हाथ अपना उपाय यही है |
    सब है एक समान अनपढ़ या वेद वेता |
    न भीड़ न जलसा ना महफिल सजानी है |
    रहना बनाके दूरी सभी जीत वही है लेता |
    लगा नहीं युही लोक डाउन कारण बड़ा है |
    तोड़ा जो नियम कोरोना बीमार कर देता |
    जीत लेता भारत जंग पर लापरवाही हुई |
    जारी जंग कोरोना देश संकट पार है खेता |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286
    व्हात्सप्प्स -8210525557

  • भोजपुरी गजल- कोरोना के कहर जारी बा |

    भोजपुरी गजल- कोरोना के कहर जारी बा |
    बच के चला कोरोना के कहर जारी बा |
    भइल जहा मनमानी अब सबकर बारी बा |
    ई कोरोना ह चिन्हे ला ना केहु के भाई |
    रहा घर मे लुकाई येही मे समझदारी बा |
    लागल लॉक डाउन नियम सबके मानेके |
    रही ला कुछ दिन अउर लड़े के तैयारी बा |
    जे ना मानी उ जान से जाई केहु का करी |
    माना बात भारती देशवा से वफादारी बा|
    लड़े जे सीमा योद्धा कहल जाला उनके |
    युद्ध हउवे कोरोना साची बात हमारी बा |
    संग अपने बाल बच्चन के खियाल करा |
    कोरोना बैरी के चाल तलवार दुधारी बा |
    कहल जाला आजादी केकरा अब बुझाइल |
    भाई परिवार छुटल अकेले रहल दुश्वारी बा |
    बांधी के हिम्मत करेजा कठोर करा अब |
    घरवे से लड़ा लड़ाई कृपा बाँके बिहारी बा |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286
    व्हात्सप्प्स -8210525557

  • भोजपूरी गीत – लुका जाला केहु |

    भोजपूरी गीत – लुका जाला केहु |
    कोरोना से जेतना जब डरा जाला केहु |
    बच जाला जब घरवा लुका जाला केहु |
    एकरा ज़ोर देखवला मे भलाई नईखे |
    जान आपन बचवला जग हँसाई नईखे|
    निकलल जे बाहर कोरोना धरा जाला केहु|
    सर्दी खांसी बुखार एकर निसानी हउवे|
    चीन से चलल बीमारी एकर कहानी हउवे |
    मानीना लॉकडाउन कबहु मरा जाला केहु |
    मचल दुनिया हाहाकार कोरोना देख ला |
    जेतना होखे कूड़ा कर्कट अब तू फेंक ला |
    होशियार देख कोरोना परा जाला केहु |
    सटा जनी सबसे दुरही रहा समझल करा |
    निकला जब बहरिया मास्क लगावल करा |
    तोड़े जे नियम पुलिस पिटा जाला केहु |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286
    व्हात्सप्प्स -8210525557

  • कविता – भीम हमारा अभिमान |

    अंबेडकर जयंती कि हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाये
    कविता – भीम हमारा अभिमान |
    किया निर्माण जो भारत का सविंधान |
    सत सत नमन भीम हमारा अभिमान |
    दिलाया अधिकार सबको जिसने समान|
    बाबा भीम को करता नमन हिंदुस्तान |
    दबे कुचले दलित पिछड़े राह दिखाई |
    रहना कैसे मिल सबको सीख सिखाई |
    हुआ अपनो खातीर बाबा जो कुर्बान |
    सत सत नमन भीम हमारा अभिमान |
    मिले शिक्षा सबको बाबा कि ईक्षा थी |
    खुद बना बैरिस्टर ऊंची उसकी दीक्षा थी |
    ब्यर्थ न जाये बाबा का अब बलिदान |
    सत सत नमन भीम हमारा अभिमान |
    खाकर ठोकरे खुद हार ना माना कभी |
    मान सम्मान होता क्या न जाना कभी |
    गुदड़ी का लाल देते जिसे सभी सम्मान |
    सत सत नमन भीम हमारा अभिमान |
    अगड़ो पिछड़ो लड़कर है भेद मिटाया |
    डरे सहमे दलितो ऊंचा स्थान दिलाया|
    आज जयंती तुम्हारी तुमको है प्रणाम |
    सत सत नमन भीम हमारा अभिमान |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286
    व्हात्सप्प्स -8210525557

  • कविता – तो बच जाने दो |

    कविता – तो बच जाने दो |
    बढ़ गया लोक डाउन तो बढ जाने दो |
    जान है जरूरी माल से तो बच जाने दो |
    इतने दिन बीते कुछ दिन और गुजारेंगे |
    घर की बिखरी चिजों को थोड़ा सवारेंगे |
    आखिर कट रही जिंदगी तो कट जाने दो |
    जो बताया गया वो हमसे निभाया गया |
    हाथ धोना घर रहना मास्क लगाया गया |
    योद्धा लड़ रहे कोरोना तो निपट जाने दो|
    अपनी ही नहीं परवाह जान गैरो भी करनी |
    घर मे रहो खाओ चाहे नमक रोटी चटनी |
    चढ़ रहा कोरोना गर फांसी तो चढ़ जाने दो |
    कभी सोचा नहीं देखना पड़ेगा यह दिन भी |
    रहना पड़ेगा सबसे दूर मन होगा खिन्न भी |
    पके गेंहू खेतो मे कटे नहीं तो सड़ जाने दो |
    रहोगे जिंदा और भी फसले उगा लोगे तुम|
    मनाओगे खुशिया और तबले बजा लोगे तुम|
    चढ़ा हत्थे योद्धाओ कोरोना तो चढ़ जाने दो |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286
    व्हात्सप्प्स -8210525557

  • ये समय फिर ना मिले दुबारा

    यह समय फिर ना मिले
    —————————-
    “दौड़ भाग की जिंदगी सुकून छीन ले गई,
    हम दौड़ते ही रह गए जिंदगी पीछे रह गई।”
    वक्त फिर भी ना रुका,
    सबको ठहरा सा दिया।
    भागी दौड़ी सी थी जो,
    बेबसी से वो थमी।
    जो कभी रुकी ना थी,
    ठहर गई यहीं कहीं।
    ऐसा तो हुआ ना कभी,
    जैसा हुआ इस बार अभी।
    विश्व संकट में पड़ा,
    डर से बुरा हाल हुआ।
    मौत का शिकंजा देखा,
    आंखों देखा हाल हुआ।
    हमने छोड़ा था सुकून,
    वक्त ने छीन लिया।
    जाना सबने फिर सही,
    जिंदगी और भी है।
    जीना अपनों के लिए,
    खुशियों का ठौर भी है।
    खुशियां समझो तो बहुत,
    मानो दुख तो और भी हैं।
    समझो बर्तन है भरा,
    आधा खाली भी वही है।
    जो मिले खुशियां ले लो,
    दुखों को छोड़ो वही।
    दौड़ो जिंदगी के लिए,
    न की घुड़दौड़ के लिए।
    वक्त ने दिया तुम्हें,
    बड़ा अनमोल समय।
    सदुपयोग करो इसका,
    समझो ना कैद इसे।
    जियो जी भर के इसे,
    यह समय फिर ना मिले।
    यह समय लौटेगा न,
    जियो जी भर के इसे।

    निमिषा सिंघल

  • प्रेम- पिपासु

    आज कुछ बदला- बदला मिज़ाज है
    दिल भी बेताब है
    ——————–
    सिसकियाँ भी खामोश हैं
    लफ्जों में मिठास है
    ———————-
    गूंजती जा रही है
    गलियों में शहनाई
    ——‐‐‐————–
    बींद के इन्तज़ार में
    बीती जा रही है स्वर्ण रात्रि
    ———————–
    गेसुओं की घनी छाँव के तले बैठी
    मेरी ख्वाइशों भरी एक शाम है
    ———————–
    उनकी आहटों पर फिर फिसला
    मेरी तमन्नाओं का हार है
    ————————
    खिसक रहे थे जो सपनें
    आज हाँथ में आया वही लम्हात है
    ————————-
    प्रेम-पिपासु हूँ जी भर के
    पिला दे साकी
    ————————–
    टपक रही जो तेरे
    लब से बादा(शराब)है ।

  • बहुत देर

    बहुत देर कर दी ज़िन्दगी तूने

    मेरे दर पे आने में

    हम तो कब से लगे थे

    तुझे मनाने में

    अब तो न वो प्यास है

    न वो तलाश है ,मानों

    खुद को पा लिए हमने

    किसी के रूठ जाने में

    बहुत देर कर दी ज़िन्दगी तूने

    मेरे दर पे आने में

    तेज़ हवा में जलाया चिराग

    क्यों बार बार बुझ जाता है

    जब की कोई कसर नहीं छोड़ी हमने

    उसके आगे घेरा बनाने में

    बहुत देर कर दी ज़िन्दगी तूने

    मेरे दर पे आने में

    मैं मायूस नहीं हूँ

    बस तुझको समझा गया हूँ

    ढूँढा किये तुझे हम औरों में

    पर तू तो बैठी थी कब से

    मेरे ही गरीबखाने में

    बहुत देर कर दी ज़िन्दगी तूने

    मेरे दर पे आने में ……

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”

  • हाय रे चीन

    हिंदी कविता व्यंग्य

    शीर्षक-: हाय रे चीन (कोरोना और चाइना )

    हाय रे चीन

    चैन लिया तूने

    सबका छीन

    कुछ भी न बचा

    तुझसे ऐसा

    जो न खाया

    तूने बीन बीन

    हाय तू कैसा शौक़ीन

    सारी दुनिया को

    दे के Covid 19

    कर दिया तूने

    शक्तिहीन

    जब वो रो रही

    बिलख रही

    तब तू बन ने चला

    महा महीम

    हाय रे चीन

    तुझ पर Biological Weapon

    बनाने का आरोप लगा

    फिर भी तू है

    लज्जाहीन

    ये बीमारी देने

    के बाद

    तू बढ़ा रहा

    अपना व्योपार

    दे कर दुनिया को

    Mask और

    वेंटीलेटर मशीन

    हाय रे चीन

    दुनिया तुझसे

    जवाब मांगे

    आरोप हैं तुझपे संगीन

    न जाने कितनो

    को लील गया

    तेरा Super Power

    बन ने का सपना रंगीन

    हाय रे चीन

    हाय रे चीन ….

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”

  • अनोखा रिश्ता

    दो मित्रों का जोड़ा भैया
    अमर इतिहास बनाया था।
    एक थे ब्राह्मण एक मुस्लिम थे
    रिश्ता खास बनाया था।।
    जंग- ए-आजादी में कूद गए थे
    राम -लखन की जोड़ी बनकर।
    “सरफरोशी की तमन्ना “गाए फिरते
    गली-गली और घर-घर चलकर।।
    क्रांति का पथ प्रशस्त किया
    और मातृभूमि को वास बनाया था।। दो मित्रों ़़़़़़।।
    हृदय एक थे दोनों के
    बेशक़ तन थे अलग- अलग।
    राम लखन संबोधन करते
    जब भी होते अलग- अलग।
    एक साथ हीं झूल गए थे
    बली रज्जु खास बनाया था।। दो मित्रों ़़़।।
    अमर अनोखा ऐतिहासिक रिश्ता
    आखिर जग क्यों भूल रहा।
    “सह न ववतु़़”का भाव सदा
    भारतभूमि पे मूल रहा।।
    ‘विनयचंद ‘ जयचंद बनो ना
    देश को दास बनाया था।। दो मित्रों ़़़़़।।

  • A Poem about the Lockdown

    Sitting on the swing by the window
    Looking over the giant tree outside,
    I pause to think and wonder
    At how this new phase unfolds in life…

    It’s been a crazy month lately
    And they say it’ll only get crazier,
    With the disease strengthening its hold
    And the doctors getting busier…

    Fear has become our unwanted neighbour
    Relentlessly keeps dropping by,
    With the numbers of new cases and deaths
    And with the markets scarily running dry!

    I would hear of the stories of the crisis
    Checking the latest statistics each day,
    With the loss of life, unemployment & poverty,
    “It’s a dreadful disaster!”, they say.

    After a few days of keeping up with the news
    Thinking it’s more important now than ever,
    I decided to take a break for my sanity
    And go on a ‘News-Upvaas’ and do myself a favour.

    I was also determined, as always,
    To find the blessing in disguise…
    And so, I started on my ‘Silver Lining’ spree
    And there were so many blessings to find!

    The first blessing was reminded by the birds
    Sitting on this tree, their chirping growing louder
    There was also the tree that now looked greener,
    And the sky seemed bluer, the air felt lighter…

    The noisy roads now are of course quieter.
    And without humans to disturb its peace…
    It feels like nature, too, can breathe again,
    They say, the dolphins now seem happier in the seas…

    Dwelling in this happy universe
    I too begin to do what makes me happy,
    I read and write and dance and meditate
    Do all the things that make me ‘me’…

    I also smile more and laugh a little louder
    Be grateful more often and say ‘Thank you’,
    ‘Cause especially in messy times like these,
    To uplift the world, we must all do what we can do…

    It’s weird how times like these
    Make you question everything,
    About the impermanence of life
    About death… and its certainty…

    And suddenly, you become a believer of prayer
    A believer of the kindness of humanity,
    You see what a blessing it is to go for a simple walk
    To go out for a picnic or movie with family…

    You see the ones serving the nation
    In these hard times with all their bravery,
    The doctors, the bankers, the police, the workers,
    Despite their religion, caste or creed…

    You see that adversity indeed brings us closer
    When humans help fellow humans selflessly,
    You see that a nation can glow up with light
    Or ring bells and clap together, as a sign of unity…

    But as we take precautions and stay at home
    I wish we’ll look within and deep,
    To understand and appreciate the meaning of life
    While we pray for the world to heal…

    I wish that at the end of this
    We’ll see each place a kinder, happier town…
    I wish that we’ll make the best of this chance
    I wish we ‘Open-Up’ in this ‘Lock-Down’.

    – Written by Prerna G. Dedhia

  • काव्य- सौंदर्य

    एहसास की पावन चौकी पर
    भाव की मूरत बैठी है
    ———————-
    शब्द अलंकार से सुसज्जित हैं और
    कल्पना की आराधना होती है
    ————————
    इसी को कहते हैं काव्य सौन्दर्य
    जो हर कवि की आत्मा कहलाती है
    ————————–
    इसके बिना हर रचना अपूर्ण ही है
    और हर कविता विकलांग सी है
    —————————-
    अलंकार बिना कविता अपूर्ण
    जैसे होती है नारी
    —————————–
    भाव की बेल पर खिलती है
    प्रेम की सुगंधित कली

  • आँचल

    आँचल में अपने छुपाकर वो,
    दुनियाँ की बुराइयों से बचाती है
    सारे जहान की खुशियाँ
    अपने दामन में लिपटाकर
    हमपर लुटाती है
    वही आँचल लाज़ बचाता है,
    और उसी से पसीना सुखाती है
    स्त्री की आबरू का सुन्दर
    श्रिगार बनता है आँचल,
    जब स्त्री माथे की बेंदी छुपाती है

  • महामारी से मुक्ति प्रार्थना

    महामारी से मुक्ति प्रार्थना
    ——————————
    हे दुख भंजन दयानिधे
    कृपासिंधु . .. भव पार करें।
    करो कृपा हम दीनजनों पर,
    दूर करो सब कष्ट धरा पर।

    करे तपस्या सब जन घर पर,
    बंद पड़े प्रभु द्वार धरा पर।

    मुक्ति दे दो कष्ट हरो सब
    खत्म करो यह महादानव अब।

    छिन गई खुशियां
    बंद हैं हंसी
    डर हैभीतर,
    सहम गए सभी
    भूख प्यास सब हो गयाआधा,
    विचलित मन जाए ना साधा।

    अब तो सुन लो अरज हमारी,
    दूर करो अब यह महामारी।
    हवा विषैली अब ना करेंगे मिलजुल कर हम काम करेंगे।
    नित नए पेड़ लगा देंगे हम
    धरती को स्वर्ग बना देंगे हम।
    रोक दिया जब जीवन तुमने
    दिखलाया दर्पण फिर तुमने
    समझाया
    यदि चाहो करना
    ठान लो मन में तो कुछ नहीं मुश्किल।
    दूर प्रदूषण करके दिखाया
    प्रकृति ने हम को बंधक बनाया
    पशु पक्षियों को फिर से आजादी देदी।
    हम सबको यू सबक सिखाया।।
    प्रण लेते हैं भगवन आज से
    हरी भरी धरती कर देंगे
    स्वस्थ रहेंगे धरा स्वच्छ रखेंगे।
    क्षमा प्रार्थना करते सब मिल
    कष्ट हरो अब बढ़ाओ ना मुश्किल।

    निमिषा सिंघल

  • मापदंड

    मापदंड
    ———-
    कुंठित हृदय से उपजती विषाक्त बेल,
    लील जाती है कितनी ही हरी कोपले।

    उनको कुचलती कोपलों से निकली,
    दर्दनाक चीखों का शोर दब जाता है फाइलों तले।

    उस हत्या के साथ पूरे परिवार की ही मौत हो जाती है।

    नहीं देख पाती हैवानियत…..
    इस कठोरता को।

    मानसिक दंश झेलते रोते बिलखते परिवार,
    और उनकी दुर्दशा को भुनाते अपनी टीआरपी बढ़ाते न्यूज़ चैनल्स …
    इंसान की संवेदनाओं की न्यूनता का मापदंड है।
    निमिषा सिंघल

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल
    ——-
    दूरियां ,नज़दीकियां, खुशफहमियां तेरे साथ में,
    हम मिले ना थे कभी पर बह गए जज्बात में।

    1. मौसमै अंदाज था कुछ खास था उस रात में,
    थे गिरफ्त में इश्क के उस बेवजह सी बात में।
    थी नहीं मंजूर हद …इश्क की बरसात में,
    दूरियां नजदीकियां खुशफहमियां तेरे साथ में……

    2. जब्बे सैलाबे मोहब्बत ले रहा उफान था,
    धड़कने बेकाबू थी दिल में अजब तूफ़ान था।
    तेरी आहट देती थी बस.. दिल को थोड़ा सा सुकून,
    बेजुबा सी थी मुहब्बत और मुझे तेरा सुरूर।
    दूरियां नजदीकियां खुशफहमियां तेरे साथ में……

    3. हो हकीकत तो निगाहों से बयां हो जाती वो,
    सपना था बंद आंखों का बस याद बन आ जाता वो,
    रात भर तारे चमकते चांद बन छा जाता वो,
    जुगनू बन गुनगुन वो करता
    अक्स सा छप जाता वो।

    दूरियां नजदीकियां खुशफहमियां तेरे साथ में….

    4. दरमियां था फासला इस छोर से उस छोर तक,
    दिलकशी थी बस धुआं था , छा गया पुरजोर जो।
    बेकरारी तुझ को पा लू
    दूरियां अपनी जगह
    धड़कने गाती थी सरगम, बेख्याली हर जगह।
    दूरियां नज़दीकियां खुशफहमियां तेरे साथ में……

    निमिषा सिंघल

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