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संपादक की पसंद

  • भोजपुरी चइता लोक गीत 2- काला तिलवा ये रामा|

    भोजपुरी चइता लोक गीत 2- काला तिलवा ये रामा|
    (श्रिंगार रस)
    गोरी-2 गलिया मे काला -2 तिलवा ये रामा|
    हथवा मे शोभेला सोना के कगनवा ये रामा |
    गोरी-2 गलिया मे काला -2 तिलवा ये रामा|
    बरछी कटारी बा तोहरी नजरिया |
    घायल करेलु सगरो बज़रिआ,तनी सोचा |
    कारी बदरिया काली केसिया ये रामा |
    मथवा पर चमकेला लाल बुंदवा ये रामा |
    गोरी-2 गलिया मे काला -2 तिलवा ये रामा|
    ये जान जुल्मी तोहरी ऊमीरिया |
    दावे लागल मोर जीनिगिया ,तोहरे प्यार मे |
    नागिन लचके तोहार चलिया ये रामा |
    अँचरा के ऊड़ावे बैरी पवनवा ये रामा|
    गोरी-2 गलिया मे काला -2 तिलवा ये रामा|
    ये गोरी मीठ मिसरी तोहार बोलिया |
    कनवा मे झूमे खूब कनबलिया |
    चान चमके तोहरे मूहवा ये रामा |
    दंतवा मे दमके मोतिया के दनवा ये रामा |
    गोरी-2 गलिया मे काला -2 तिलवा ये रामा|
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • भोजपुरी चइता लोक गीत 1-बितले फगुनवा ये सइया

    भोजपुरी चइता लोक गीत 1-बितले फगुनवा ये सइया
    बितले फगुनवा ये सइया ,
    गऊआ लागल कटनिया के ज़ोर |
    कईसे होइहे गेंहू के कटनिया मोर |
    गऊआ लागल कटनिया के ज़ोर |
    सुना-2 मोर परदेशी बालम
    धईके आवा जल्दी रेलगड़िया |
    चलल जाई खेतवा होते रे भोर |
    गऊआ लागल कटनिया के ज़ोर |
    सुना -2 मोर लेहुरा देवरवा |
    चलावा ना दिन रात मोबइलिया |
    करबा ना किसनिया खइबा का कौर |
    गऊआ लागल कटनिया के ज़ोर |
    सुना -2 मोर छोटकी ननदिया |
    घूमा जनी तू खाली खरीहनवा |
    मिली करा तू कटनिया माना न बतिया मोर |
    गऊआ लागल कटनिया के ज़ोर |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • आहिस्ता-आहिस्ता रखना कदम

    आहिस्ता-आहिस्ता रखना कदम
    इन नाजुक पगडंडियों में
    वक्त सो रहा है
    रात के सन्नाटे में
    चांदनी रात के आँचल तले
    खोया है कांच के सपनों की दुनिया में
    तुम्हारे क़दमों की इक आहट से
    कहीं बिखर न जाये
    उसकी कांच के सपनों की दुनिया
    आहिस्ता-आहिस्ता रखना कदम
    कांच का कोई खवाब टूट न जाये
    तन्हाई के आगोश में उड़ने दो
    स्वेत कांच के टुकड़ों को
    हवा के इक नन्हे झोंके से
    कांच के ये टुकड़े जब टकराते हैं
    जैसे पायल कोई झूम उठी
    आहिस्ता-आहिस्ता रखना कदम

  • बता तो सही तू है कौन

    कभी बनकर कोई ख़्वाब
    मेरी निंदिया तू चुरा लेता
    कभी बनकर हवा का झोंका
    आँचल को तू खींच लेता
    बता तो सही तू है कौन
    कभी बारिश की बूँद बनकर
    कोमल बदन को भिगो देता
    कभी शबनम बनकर
    पावों को शीतल कर देता
    बता तो सही तू है कौन
    कभी झरना बनकर
    प्रेम रस है बरसाता
    कभी बन नदिया कि धारा
    गीत कोई गुनगुनाता
    बता तो सही तू है कौन
    कभी घटाओं की ओट लेकर
    मेरे यौवन को निहारता
    कभी सूरज की किरण बन
    खिड़की से मुझे झांकता
    बता तो सही तू है कौन
    कभी हिम कण बन
    कोमल गालों को चूम लेता
    कभी रसिक भंवरा बन
    अधरों का मधुरस चूस लेता
    बता तो सही तू है कौन
    सफ़ेद कांच के टुकड़ों में
    सिमट गई दुनिया मेरी
    न जाने किस आहट से
    बिखरी गयी दुनिया मेरी
    बता तो सही तू है कौन

  • हिमालय के उतुंग शिखर से

    हिमालय के उतुंग शिखर से
    सिंह ने भरी ऊँची दहाड़ है
    तूफान क्या टकराएगा उससे
    जो स्वयं फौलादी पहाड़ है
    सारे जहाँ में अब भगवा ही लहराएगा
    माटी का लाल अब तिरंगा फहराएगा
    सौगंध इस लाल ने खाई है
    भारत की पवित्र माटी की
    फिर से लौट आएगी महक
    हरी-भरी कश्मीर घाटी की
    सारे जहाँ में अब भगवा ही लहराएगा
    माटी का लाल अब तिरंगा फहराएगा
    इस कर्मयोगी का साहस देख
    सारा ब्रह्माण्ड भी शरमाया है
    उसके कुशल नेतृत्व ने आज
    साडी दुनिया को भरमाया है
    सारे जहाँ में अब भगवा ही लहराएगा
    माटी का लाल अब तिरंगा फहराएगा
    कर्मपथ से भटक जाये कभी
    इस सिपाही का ये धर्म नहीं
    अपने कर्तव्य से विमुख होना
    माँ ने सिखाया ऐसा कर्म नहीं
    सारे जहाँ में अब भगवा ही लहराएगा
    माटी का लाल अब तिरंगा फहराएगा
    निकल पड़ा है लेकर प्रतिज्ञा
    इस माटी का क़र्ज़ चुकाऊंगा
    झुकने न दूंगा माथा इसका
    लहू देकर हर फ़र्ज़ निभाउंगा
    सारे जहाँ में अब भगवा ही लहराएगा
    माटी का लाल अब तिरंगा फहराएगा
    धरती से अंतरिक्ष तक आज
    भारत एक चमकता तारा है
    दुश्मन ने जब आँख दिखाई
    घर में घुसकर उसको मारा है
    सारे जहाँ में अब भगवा ही लहराएगा
    माटी का लाल अब तिरंगा फहराएगा
    बनकर सारथी समर भूमि में
    हर युवा को इसने जगाया है
    तरकश के अभेद्य तीरों से
    आतंक का किया सफाया है
    सारे जहाँ में अब भगवा ही लहराएगा
    माटी का लाल अब तिरंगा फहराएगा
    वक्त कम मगर सफ़र लम्बा है
    रुकना नहीं बस चलते जाना है
    आज का सूरज ढलने से पहले
    हर हाल में लक्ष्य को पाना है
    सारे जहाँ में अब भगवा ही लहराएगा
    माटी का लाल अब तिरंगा फहराएगा

  • स्त्री की पहचान ।

    ढो रही हूं एक बोझ सिर से लेकर पांव तक
    खोज रही हूं एक दिशा धूप से मैं छांव तक
    मीलों सा लंबा सफर जिंदगी का है मेरी
    फिर भी रुकी है वहीं जहां शुरू हुई थी घड़ी
    पहचान है क्या मेरी आज तक मैं ढूंढती,
    अबला होकर क्या है पाया आज तक मैं सोंचती
    “कौन हूं मैं ” आईने के सामने जाकर आज तक मैं पूछती
    खड़े होकर चौराहे पर हर नजर को झेलती
    हंसने वाली हर कली हर गली से पूछती
    कब मिलेगी? राह मेरी कब मुझे पहचान मेरी
    एक मील बाद भी क्यों अधूरी शान मेरी
    मिल सकी क्यों नहीं अब तक पहचान मेरी ।
    हर जिंदगी शुरु है मुझसे ,हर जिंदगी मुझ पर खत्म
    फिर भी ढाए जा रहे हैं मुझ पर ही बरसों से सितम
    ठान लिया है अब मैंने दूर तक जाऊंगी मैं
    पहचान है क्या मेरी खुद ढूंढ लाऊंगी मैं
    दे सकते अधिकार नहीं तो बस इतनी आजादी दो रोक सकूं खुद ही मैं खुद अपनी बर्बादी को।।
    कंचन द्विवेदी

  • ऊर्जा पुंज

    ऊर्जा पुंज
    ————-
    तुम ऊर्जा पुंज …..और
    तुम से बहता अविरल तेज!
    बन जाता है मेरे लिए प्रेरणा .. सृजन की।

    मेरे हृदय में बहने लगती है धारा…..
    जो जा मिलती है तुमसे…..
    और उपजने लगती हैं कुछ नन्ही कोपल
    जो जगाती है मुझे नींद से……।

    उठो!
    चलो लिखना है तुम्हें।
    और मैं एक आज्ञाकारी शिष्या सी, ”जी आचार्य जी “कहकर चल पढ़ती हूं कागज और कलम की ओर……
    देने आकार उपजती कोपलों को …
    जो हृदय के वेग से बाहर निकलने को आतुर हैं
    जैसे कलम से उड़ रहे हो कुछ शब्द और स्वयं ही किसी कोरे कागज पर किसी पहेली के हल की तरह लगते जा रहे हो यथा स्थान!
    निमिषा सिंघल

  • आहुति

    आहुति
    —————
    तुम्हारे साथ रागात्मक संबंध….
    और वीणा के तार सा झंकृत मेरा हृदय…..
    तुम्हारा मेरा अद्भुत अनुराग ….
    और अंखियों की लुकाछिपी…..
    सुकून देती है।

    एक तारतम्य हमारे बीच…..
    और प्रेम की पंखुड़ियों से सजे मधुर शब्द….
    जो देते हैं एक लय एक ताल….
    और जाग उठती है जिजीविषा।

    अट्टालिका पर रहते हो फिर भी ….
    अगाध अनुराग में डूबे
    तुम्हारे स्नेह निमंत्रण ……
    जो बहती पवन के साथ मुझ तक पहुंच ही जाते है,
    भिगो जाते हैं मुझे…
    शीतल बौछार की तरह।

    कुछ घड़ी धरती पर गुजारो……
    बैठो मेरे पास कुछ कहो!

    फिर यही अवशेष रह जाएंगे तुम्हारे पास मेरे प्रेम के …..
    और दे देना
    इस अनुराग के अवलंब की आहुति मेरे देहावसान पर जो शायद अगले जन्म तक नश्वर आत्मा के पास पहुंच जाएगी।

    बंधी हुईं प्रीत की डोरी
    फिर शायद किसी नए रूप में मिलवायेगी।

    निमिषा सिंघल

  • पुरुष

    इतना भी आसान नहीं होता
    पुरुष होना।
    जिम्मेदारियों का बोझ उठाकर हरदम मुस्कुराना होता है।

    एक पुरुष को
    सशक्त होना पड़ता है
    अपने परिवार के लिए।

    वह समस्याओं बाधाओं की शिकायत नहीं करता बल्कि खुद ही ढूंढता है हल उन समस्याओं से बाहर आने का।

    बाहर से कठोर अंदर से नरम,
    कभी-कभी अपना कठोर आवरण तोड़ बाहर आ जाता है
    अपना बचपन जीने।

    कुछ पल बचपन जी कर फिर से खुद को बना लेता है कठोर।

    अपने परिवार के लिए पुरुष कर्ता,धर्ता और भरता बन आशा और विश्वास का प्रतीक बन जाता है।

    पुरुष एक हाथ से साधता है परिवार व दूसरे हाथ से छू लेना चाहता है आकाश।
    दोनों कंधों पर पूरे परिवार का बोझ उठाए तनिक भी नहीं घबराता।

    अपने परिवार के लिए खुद को झोक देता है अग्निकुंड में।
    हवन कर देता है अपने सारे शौक अपनी सारी इच्छाएं

    और तृप्त हो जाता है परिवार के खिले चेहरे देख
    और ले लेता है कुछ घंटों की नींद
    क्योंकि पर चल पड़ना है उसे बिना थके अपनी राहों पर।

    कभी रोना चाहता है पर रोता नहीं।
    पुरुष है बना रो कैसे सकता है!

    और जब कभी पुरुष रोता है
    तो उसका रुदन कंपा देता है पूरे परिवार को।
    हिल जाती है नींव उस परिवार की
    जिस परिवार में पुरुष रोता है।

    निमिषा सिंघल

  • मौन संवाद ईश्वर से

    मौन संवाद ईश्वर से
    ———————–
    हे ईश्वर!
    मूर्त रूप में विद्यमान प्रेम हो तुम।
    अस्पृश्य शब्द है ही नहीं शब्द कोष में तुम्हारे !

    बेहद आलोकिक अनुभूति है तुम्हारे संसर्ग में,
    इस रंग बदलते आसमान तले भी बसेरा है तुम्हारा।

    मौन खड़े चुपचाप विध्वंस देखते हो!
    सुकून बेचते हो अपने सानिध्य तले।

    हृदय की घबराहट ,मन की छटपटाहट
    अनायास ही खींच लेती है तुम्हारी ओर।

    किस भाव है यह रहस्यमई प्रेम तुम्हारा?
    आकर्षक, मोहक सुकून देने वाला।

    यह सुनकर!
    मधुर मुस्कान जो खिलती महसूस होती है मूर्त चेहरे पर तुम्हारे,
    महसूस होती है हंसी
    जैसे कह रहे हो,”जो मांग रहे हो वही पलड़े में रखना होगा!”
    ” खुद में से मै को हटा
    मुझे स्थान देना होगा
    मंजूर हो तो खुद को लगा दो दाव पर।”
    आओ!
    मैं तुम्हें हृदय से लगाने बाहें फैलाए खड़ा हूं।
    क्या तुम बढ़ रहे हो मेरी ओर?
    मुक्ति की राह पर
    उजाले की ओर!

    निमिषा सिंघल

  • होली खेले रघुवीर बरसाने में

    होली खेले रघुवीर बरसाने में
    ______________________

    होली खेले मोसे रघुवीर बरसाने में,

    जाऊँ मैं जाऊँ कित ओर बरसाने में।

    रंग, अबीर हवा में उड़ायो,

    रंग मल मल के मुझे सतायो,

    हाथ पकड़ दिया मोड़ बरसाने में।

    गुपचुप आकर रंग लगायो,

    पिचकारी से मुझे भिगायो,

    डाले गलबहियां चितचोर बरसाने में।

    अच्छी लागे हँसी ठिठोली,

    मीठी लागे तोरी बोली,

    काहे करे मोसे अठखेली लड़ईया में।

    रंग दिया काहे अपने रंग में,

    गिर -गिर संभलू में प्रेम की भंग में,

    मुझ पर रहा ना मेरा जोर रंगरेज़वा रे।

    निर्लज्ज तोहे लाज ना आई,

    लोग करेंगे मोरी हँसाई,

    मारूंगी तोहे आज लट्ठ बरसाने में।

    आजा खेलूंगी होली तोसे बरसाने में,

    आजा खेलूंगी होली तोसे बरसाने में।

    निमिषा सिंघल

  • पलाश के फूल

    पलाश के फूल
    ——————-
    लाल बिछौना बनी बनस्थली
    जब अग्निदेव उतर आए।
    अपना अदभुत रूप दिखाने,
    पलाश के वृक्ष में आ समाए।

    झड़े जहां शीतल अंगारे,
    बाल चंद्रमा से छाए।
    धरती को सिंदूर दिया,
    बसंत का स्वागत किया।

    पलाश के फूलों की बात ही निराली,
    विरह में जलते प्रेमियों की व्यथा ही कह डाली।

    जिस तरह प्रेमी जन का
    प्रेम में जलना ही अनुराग है।
    उसी तरह आधे जले, आधे खिले
    पलाश के फूलों का भी प्रेमी जैसा हाल है ।

    इस सदी के सुर्ख गुलाब,
    पलाश तले खिलने को हैं,
    प्रेम रंग में सारोबोर…
    धरती, बसंत मिलने को है
    ——————
    निमिषा सिंघल
    —————–

  • रंगीन होली

    बेरंग सी गोली को रंगीन बनाना है
    रूठे हुए अपनों को दोबारा मनाना है
    डेविड अकरम और गुरमीत
    लेकर सबको साथ सुजीत
    होगी पिचकारी से बौछार
    आज मनाएंगे त्योहार।
    गुजिया पापड़ और मठरी से स्वाद जमाना है
    बेरंग सी होली को रंगीन बनाना बनाना है ।
    लाल लगेगा रीता को ,
    पीला बहन सुनीता को
    काला छोड़ सभी रंगों में रंग जाना है
    बेरंग सी होली को रंगीन बनाना है ।
    रंगों में सब रंग जाएंगे
    मन के मैल भी धुल जाएंगे ।
    पत्थर बम बौछार ना होंगे
    शब्दों से फिर वार ना होंगे
    मिलकर फिर से सबको
    गुलाल उड़ाना है
    बेरंग सी होली को रंगीन बनाना है।

  • बीती रात मैं

    बीती रात मैं तेरी यादों के
    आगोश में जाने लगी
    विरह की वेदना से
    मन को तड़पाने लगी
    आँसुओ से भीगा लतपत
    तन मेरा ओर मन मेरा
    सेज की सिलवट और नर्मी
    रूह को जलाने लगी
    और तेरी जुस्तजू
    में हम लगे सिमटने
    फिर तेरे होंठो की नर्मी
    मुझे याद आने लगी ।

  • रंग से परहेज़ कैसा

    नवगीत

    आजकल है
    खुब चलन में
    झूठ का ये क्रेज़ कैसा ?
    रंग सच का
    हो अगर तो
    रंग से परहेज़ कैसा ?

    धर्म की
    पिचकारियों में
    द्वेष का भर रंग ताने ।
    जाति की
    लेकर अबीरें
    छेड़ते कौमी तराने ।
    स्वार्थ में
    मदमस्त होकर
    लोग रँगते जा रहे है
    हो रहा
    बेरंग जाने
    जिंदगी का पेज़ कैसा ?

    प्रेम का
    सबरंग मिलकर
    खेलते उनसे न बनता ।
    खेलते
    हुड़दंग नेता
    हो रही बदरंग जनता
    उड़ रहीं हैं
    इन गुलालों
    सी चुनावी घोषणाएं
    सिर्फ़ ख़ुद को
    रँग रहा है
    आज का रँगरेज कैसा ?

    प्रेम का
    देकर छलावा
    खेलकर हुड़दंग लौटे
    अधखुले पर
    फब रहे हैं
    गिरगिटी जिनके मुखौटे
    टोलियाँ में
    बाँट रिश्ते
    लोग अंधे हो गए हैं
    पेपरों से
    छप रहे ख़ुद
    पूछते कवरेज़ कैसा ?

    -रकमिश सुल्तानपुरी

  • नारी तेरे मान को

    नारी तेरे मान को
    आखिर जग क्या लिखेगा?
    कलम भी तू है काॅपी भी तू है।
    सरस शब्द कविता भी तू है।।
    तू वाणी विद्या बद्धि की
    सरिता सम किताब है तू।
    तू हीं शारदे तू हीं कालिका
    हरिप्रिया की प्रभाव है तू।।
    तूने हीं दी है ‘विनयचंद के जान को।
    आखिर जग क्या लिखेगा
    नारी के सम्मान को।।

  • वक्त कटता नहीं

    वक्त कटता जा रहा है
    दीये की लौ भी
    धीमी हो गई
    आंखों में नींद नहीं
    चैन नहीं हम क्या करें
    यही सोंचते रहे ओर
    सुबह हो गई

  • भोजपुरी होली 13 -करे ले ठिठोली रे कान्हा |

    भोजपुरी होली 13 -करे ले ठिठोली रे कान्हा |
    करेले ठीठोली रे कान्हा कदमिया पर चढ़ी के |
    रंगवा नहवावे रे सखिया गगरिया मे भरी के |
    बड़ा रे ई बाउर लागे जमुना के पनिया हो |
    मीठी फुसलाई कहे आवा राधा रनीया हो |
    मारी पिचकारी ये सखिया अँचरा के धरी के |
    करेले ठीठोली रे कान्हा कदमिया पर चढ़ी के |
    केतनों लुकाई रे बनवा खोजी हमे ले ले हो |
    झटके से आई कान्हा अंकवारी भरी ले ले हो |
    डूबी मरी जाई रे सखिया जमुना मे डूबी के |
    करेले ठीठोली रे कान्हा कदमिया पर चढ़ी के |
    काहे लगवला कान्हा राधा संग पिरितीया हो |
    रुकमनी के धई हथवा कईला काहे घतीया हो |
    उठाई लेता हमके बिधना जईती हम मरी के |
    करेले ठीठोली रे कान्हा कदमिया पर चढ़ी के |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • भोजपुरी होली 12- बड़ा डर लागे केरोनवा से |

    भोजपुरी होली 12- बड़ा डर लागे केरोनवा से |
    रंगवा लगाइब न अबिरवा लगाइब |
    बड़ा डर लागे केरोनवा से |
    अबकी फगुनवा खेलब ना होली ये भौजी |
    बड़ा डर लागे केरोनवा से |
    गलवा ना छूअब ना अँचरा के रंगब |
    ना हथवा मिलाईब फगुनवा से |
    साली से खेलब ना सरहज से खेलब |
    केकरा से खेलब हम होलिया ये भौजी |
    बड़ा डर लागे केरोनवा से |
    झारखंड मे खेलब ना बिहार मे खेलब |
    दिल्ली मे खिल्ली उढ़ावे केरोनवा ये भौजी |
    कान्हा रंग बरसावे बरसनवा मे |
    सर्दी से बची की खांसी से बची |
    बीमारी से बची की महामारी से बची ये भौजी |
    केकेरो ना देहिया सटाइब जजनवा से |
    घरवा ना खेलब बहरिया ना खेलब |
    खेलब ना होलिया बहरिया ये भौजी |
    रंगवा लगाइब खरीहनवा मे |
    पुआ ना खाइब पकवनवा ना खाइब |
    घोरी भंगिया मुहवा ना चढ़ाइब ये भौजी |
    बड़ा डर लागे केरोनवा से |
    ना हथवा मिलाईब फगुनवा से |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • गुमनाम

    गुमनाम सा हो गया है
    मेरा आशियां
    इन दिनों
    क्यूँ कि मैं तो बैठी थी
    तेरा घर बनाने में

  • होली

    चलो होली मनाते हैं
    सड़कों से पत्थर हटा कुछ गुलाल उड़ाते हैं
    चलो होली मनाते हैं।
    महरूम है बरसों से कोई बस्ती होली में
    वहां जाकर गुझिया पापड़ बांट आते हैं
    चलो होली मनाते हैं
    डर से बंद हो गई है खिड़कियां जिनकी
    प्रेम की थोड़ी बारिश से चलो उनको हंसाते हैं
    भूल कर सब कुछ चलो एक रंग में रंग जाते हैं
    चलो होली मनाते हैं चलो होली मनाते हैं ।

  • श्याम के रंग में राधा दीवानी

    प्रीत की डोरी बांधें चली आई,
    तुझसे श्याम होली खेलन चली आई।
    बांसुरी तुम्हारी मुझको है प्यारी,
    दीवानी राधे गोपियां सारी।
    बांसुरी के स्वर लहरी में छुपा लो,
    कान्हा मुझे होठों से लगा लो।
    पिया के संग बांसुरी में है रहना,
    आज श्याम मोहे तुझे है रंगना।
    मुझ पर चढ़ा तेरी प्रीत का जादू,
    रंगों की नेह से मन बेकाबू।
    तू क्या नटखट हंसी उड़ाता?
    सबको तो उंगलियों पर नाचता।
    कौन सा जादू जादूगर सीखा,
    बरसाने तेरे रंग में भीगा।
    निमिषा सिंघल

  • आई सुहानी होली

    देखो आई सुहानी होली।
    कैसी रंगों की रंगी रंगोली।।
    कण-कण में नया उल्लास है।
    आज धरती बनी रे खास है।।
    लाओ रंगों की भर-भर झोली।
    सब मिलकर हम खलेंगे होली।।
    देखो आई सुहानी होली। कैसी रंगों की रंगी रंगोली।।
    नहीं काला रहे नहीं गोरा रहे।
    लाल पीले हरे छोरी छोरा रहे।।
    आज कोयल भी बनीं हंसोली।
    सब मस्ती में मस्त नव टोली।।
    देखो आई सुहानी होली। कैसी रंगों की रंगी रंगोली।।
    न कोई राजा रहा न कोई रानी रही।
    सिर्फ खुशियाँ खुशी मस्तानी रही।।
    बाँह-बाँहों की बन गई डोली।
    हर तरफ है मस्ती की बोली।।
    देखो आई सुहानी होली। कैसी रंगों की रंगी रंगोली।।
    हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई।
    लगते गले बन भाई-भाई।।
    देख ‘विनयचंद ‘ की लेखनी बोली।
    धवल मुख स्याह रंग से प्यार की बोली।।
    देखो आई सुहानी होली। कैसे रंगों की रंगी रंगोली।।

  • जवानों की होली

    जवानों ने खाई है, सीने पर अपने गोली
    ना भागे दिखाकर पीठ , प्राणों की लगा दी बोली
    आये दिन खेलते रहते, वो खून के रंग संग होली
    तब जाकर देश में बन पाती, रंगो वाली होली

    उनके लिए हर दिन ही, होली और दीवाली है
    खून बहे तब होली मनती, बंदूक चले तब दीवाली है
    बारुदों के ढ़ेर को समझे, वे तो अबीर गुलाले है
    तत्पर देश की रक्षा में, हरपल वो मतवाले है

    कारतूसों की जय माला पहन, विजय श्री वरने हुए खड़े
    शत्रु की पिचकारी छोड़ती गोलियां, फिर भी कभी नहीं है डरे
    बन प्रहलाद; दहन करने होलिका, दुश्मन सीमा में कूद पड़े
    फ़ाड़ दुश्मन का सीना रण में, नृसिंह बन वे है डटे

    ढाल बनाते बंकर को ऐसे, जैसे लठमार होली है
    कारण उनके ही तो हैप्पी, होली और दीवाली है
    परिचय अदभुत वीरता का देकर, अपना बना लिया हम गैरो को
    इस होली सब मिल नमन करें, हम देश के हर रणधीरों को
    देश के सच्चे हीरो को

  • Holi

    आहट पाकर फागुन की, पेड़ों ने ओढ़नी बासंती ओढ़ी
    धमाल फाग संग चंग बजाने, निकली मस्तानों की टोली
    हल्की फुल्की ठंड के साथ, मौसम करे आंख मिचौली
    धूम मचाओ, रंग उड़ाओ, क्यों कि आ गया है होली

    बच्चे निकले घरों से ले, हाथों में अबीर गुलाले
    लगी महिलाएं गोबर संग, बड़कुल्ले ढाल बनाने
    मिठाइयों की महफिल सजती, किसे छोडे होठों से लगा ले
    ऐसी है होली की मस्ती, सबको रंग में अपने मिला ले

    कोई खेले रंगो से, कोई खेले फूलों की होली
    बरसाने की लठमार होली, भूले ना हमजोली
    नाच उठी वृंदावनी गलियां, देख भक्तों की टोली
    रंग पंचमी ऐसा रंग जमाये, हर दिल हो holy holy

    बुरा ना मानो होली है, इस दिन बहुत हंसी ठिठोली है
    हर कोई इसके रंग में रंगता, ऐसी यह भंग की गोली है
    भुला कर पुराने गिले शिकवे, अपनों के बीच की चुप्पी तोड़ी है
    हां नाम इसी का होली है, हां इसी का नाम होली है

  • हिन्दी गजल- निभाते चले गए |

    हिन्दी गजल- निभाते चले गए |
    हम अपनी वफा निभाते चले गए |
    वो मुझसे दूरिया बढ़ाते चले गए |
    शामिल था उनकी खुशी ओ गम |
    मेरे वक्त वो मुंह चिढ़ाते चले गए |
    प्यार के सिवा कुछ नहीं दुनिया मे |
    वो आग दुश्मनी क्यो बढ़ाते चले गए|
    तन्हा आना जाना मगर जरूरत सबकी |
    नीसा रिश्तो ज़िंदगी मिटाते चले गए |
    तन्हा रहना दोस्त जरूरी हंसी के लिए |
    दिल अजीज दोस्तो दुखाते चले गए |
    पसीना जरूरी दो वक्त रोटी के लिए |
    चाह ज्यादा छवि खुद गिराते चले गए |
    कर लो चराग रोशन अंधेरों डर जाओगे |
    उम्मीदों के दिये सारे बुझाते चले गए |
    तुम देवता न शैतान अकेले रह लोगे |
    हर रिश्ता जरूरी कीमत सुनाते चले गए |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • हिन्दी गीत- देख लेना |

    हिन्दी गीत- देख लेना |
    कीमत मेरी मोहब्बत तुम समझ न पाओगे |
    याद मे मेरी तड़पते रह जाओगे देख लेना |
    जिंदगी मुझसा दोस्त शामिल न कर पाओगे|
    तन्हाइयों ढूंढते रह जाओगे मुझे देख लेना |
    मेरी पाक मोहब्बत को मजाक बना डाला |
    पाक साफ रिश्तो को ताख चढ़ा डाला |
    होगी जरूरत हाथ मलते रह जाओगे देख लेना |
    प्यार मुझसा किया न करेगा कोई |
    जान सिर्फ तुम पर दिया न मरेगा कोई |
    मेरा वफा सिला ना दे पाओगे देख लेना |
    अपनी हुशनों जवानी नाज बहुत करते हो |
    मुझसे दूर बहुत दुर खूब रहते हो |
    हाथ रख दिल मचलते रह जाओगे देख लेना |
    याद मे मेरी तड़पते रह जाओगे देख लेना |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • हिन्दी गीत- तेरे रूप का सिंगार करूँ |

    हिन्दी गीत- तेरे रूप का सिंगार करूँ |
    तेरे रूप का सिंगार करूँ |
    तुझपे दिल निसार करूँ |
    आंखो मे काजल लगा दूँ |
    पांवो मे पायल पहना दूँ |
    तेरी बांहों दिल बहार कर दूँ |
    तेरे रूप का सिंगार करूँ |
    बाली तेरे कानो मे पहनाऊंगा |
    कील हीरे की नाक मे लगाऊँगा |
    तेरे दिल मे जीवन गुजार सकूँ |
    तेरे रूप का सिंगार करूँ |
    चम चम बिंदिया लगाऊ माथे पे |
    खन खन कंगना पहनाऊ हाथो मे|
    तू है मेरी यही विचार करूँ |
    तेरे रूप का सिंगार करूँ |
    काँच की चूड़िया कोमल कलाइयो मे |
    सुन के खनके मेरी याद तन्हाइयों मे |
    तेरी आंखो मे वीहार करूँ |
    तेरे रूप का सिंगार करूँ |
    माला फूल चम्पा गले मे डालू मै |
    काली जुल्फों फूल गजरा साजू मै |
    हर गम तुझसे किनार करूँ |
    तेरे रूप का सिंगार करूँ |
    चाँद तारे सजा दूँ तेरी चुनरी मे |
    तुझसे ही दिल लगाउँ ना दूसरी मे |
    सुखी मै तेरा संसार करूँ |
    तेरे रूप का सिंगार करूँ |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • होली

    बजे ढोलक,बजे नगमे
    मचे हुड़दंग होली में
    रंगी धरती, रंगा अंबर
    उड़े है रंग होली में ।
    कोई गुब्बारे से खेले तो
    कोई मारे पिचकारी
    पड़ी है पान की छीटें
    चढ़े हैं भंग होली में।

    घुला है बाल्टी में रंग
    और तैयार पिचकारी
    आपकी राह देखे है
    सांवरे राधा तुम्हारी
    आपके आते ही हम
    आपको यूँ रंग डालेंगे
    भूल जाओगे तुम राधा
    याद आएंगे गिरधारी ।

    आपको रंग डालेंगे
    हाथ में रंग है पीला
    पहले सूखा लगाएंगे
    भर के पिचकारी में गीला
    आप जब गुस्से में आकर के
    हम पर तिलमिलाओगे
    आपका साँवला मुखड़ा
    कर देंगे बैंगनी-नीला।

    हमने पकवान और गुझिया
    बनाई आपकी खातिर
    मिठाई फूल और तोहफे
    मंगाए आपकी खातिर
    अपने घर को हमने है
    बनाया स्वर्ग से सुंदर
    अपने आपको हमने संवारा
    आपकी खातिर।

  • हिन्दी गजल

    गम के आँसू सदा हीं बरसता रहा।
    मेरा जीवन खुशी को तरसता रहा।।
    मैंने मांगा था कोई ना सोने का घर
    प्यार की झोपड़ी को तरसता रहा।
    ना तुम्हारा रहा ना हमारा रहा
    गेन्द-सा दिल हमेशा उछलता रहा।।
    गैर की है दुनिया में तेरी खुशी ,फिर
    तेरा मन मेरे मन को काहे लपकता रहा।
    जरा बचके निकलना ‘विनयचंद ‘यहाँ
    प्यार की राह अश्कों से धधकता रहा।।

  • क्षणिकाएं

    1.

    कदम छोटा हे या बड़ा
    हर मोड़ पर
    इंतज़ार है ज़िंदगी को –
    चुन लिए जाने का

    2.

    राम
    लिखा सुनहरा
    इतिहास ने तुम्हारा नाम ;
    तुमने –
    गढ़ ली सीता सोने की !

    ( तज दी सीता सोने सी !!! )

  • क्षणिकाएं

    1.

    पहली ही सीढ़ी पर
    एहसास हुआ,
    सर पर खुला आसमां हो भले ही
    अब –
    पैर तले ज़मीन नहीं

    2.

    चाहे-अनचाहे उग आए हैं
    संबंधों में
    अपरिचय के विंध्याचल ;
    हम भी जो
    पा लेते थोड़ा सा
    अगस्त्य का बौनापन !!!

  • क्या हुआ है शहर को आख़िर

    आप सब की नज़र को आख़िर ,
    क्या हुआ है शहर को आख़िर .

    नफरतों की लिए चिंगारी ,
    लोग दौड़े कहर को आख़िर .

    चाँदनी चौक की वह दिल्ली ,
    आज भूखी गदर को आख़िर .

    मजहबी क्यों सियासत करके ,
    घोलते हो ज़हर को आख़िर .

    जिस्म से दूर रहकर भरसक ,
    रूह तड़पी सजर को आख़िर .

    ज़िन्दगी का हिसाब क्या दें ,
    जिंदगी भर बसर को आख़िर .

    ऐ ज़मानों वफ़ा मत परखो ,
    फैशनों में असर को आख़िर .

    खामखाँ प्यार करके ‘रकमिश’ ,
    रौंद बैठे जिगर को आख़िर .

    -रकमिश सुल्तानपुरी

  • हुड़दंग करेगे होली में

    फिर आज गुलालों के खातिर
    बदरंग बनेगे होली में ।
    अंग अंग पर रंग सजा
    हुड़दंग करेगे होली में ।।

    न जानेगे कितने रंग नये
    चेहरों पर खिल जायेगे ।
    न जाने कितने टूटेंगे
    कितने दिल जुड़ जायेगे
    कितनो को तो तन्हा आकर
    तंग करेगे होली में
    अंग अंग पर रंग सजा
    हुड़दंग करेगे होली मे।।2

    कुछ नये मुबारक आयेगे
    चाहत मे रंग लाने को
    कुछ दूर बहुत हो जायेगे
    यादो में तड़पाने को
    भींग किसी की बारिस में
    कुछ दंग करेगे होली में
    अंग अंग पर रंग सजा
    हुड़दंग करेगे होली में ।।3

    क्या सच्चा है इस जीवन में
    रंग कौन सा झूठा है
    पर प्यार में दिल से न खेलें
    इस प्यार का रंग अनूठा है
    कुछ आँशू भी तो बरसेंगे
    बेरंग बहेंगे होली में
    अंग अंग पर रंग सजा
    हुड़दंग करेगे होली मेँ।।4

    ✍रकमिश सुल्तानपुरी
    सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश

  • आंसू

    मिले हैं विरासत में आंसू मुझे
    पता न चला कि दोस्त कैसे बने
    उनका सैलाब है आशियां मेरा
    हंसी से नाता न मेरा रहा।
    जब पहुंचे मंज़िल से आगे कभी
    रहे याद दोस्ती सहारा बनी
    संभाला है उन्होंने गिरने से मुझे
    पता न चला कि दोस्त कैसे बने
    शिकायत मुझको कहां कब रही
    जैसी चली वैसी बढ़ती रही
    पलकों के साए में छिपाती रही
    सपनों को अपनों से बचाती रही
    आंसू कभी आंसू न रहे
    पता न चला कि दोस्त कैसे बने।।।

  • सुनते आए हैं…..

    सुनते आए हैं –
    अपनों का पर्व है होली

    मेरे आंगन जली होलिका
    मैं ही पंडित, मैं ही पूजा
    मैं ही कुंकुम, अक्षत औ” रॊली;
    सूनी गलियां, सूने गलियारे,
    सूने हैं आंगन सारे
    कौन संग मैं खेलूं होली!

    सुनते आए हैं –
    रंगों का पर्व है होली

    सुबह गुलाबी नहीं रही, अब
    सांझ नहीं सिंदूरी,
    धरती से रूठी हरियाली
    बेरंगा है अंबर भी;
    रंगों की थाल सजी, पर
    कौन रंग से खेलूं होली!

    सुनते आए हैं –
    खुशियों का पर्व है होली

    हर चेहरे पर भय-आशंका
    हर माथे पर काला टीका,
    थके हुए तन, हारे से मन
    सोच समझ पर पड़ा है ताला ;
    संदेहों के जालों में
    घिरा हुआ है हर आदम,
    कौन ढंग की खेलूं होली!

    सुनते आए हैं –
    अपनों का पर्व है होली !
    रंगों का पर्व है होली !!
    खुशियों का पर्व है होली !!!
    0य103य2020

    डॉ. अनु सोमयाजुला

  • सईया अइले ना भवनवा

    भोजपुरी होली 11 – सईया अईले ना भवनवा |
    होली खेले तरसे मोर मनवा ना |
    सइयाँ अइले ना भवनवा |
    सबकर लऊटी अइले सजनवा ना |
    उड़ेला गुलाल अब गगनवा |
    छोड़ा नोकरिया सइया घरे चली आवा |
    होलिया मे सइया जनी छछनावा |
    धक धक धड़के मोर परनवा हो |
    सइयाँ अइले ना भवनवा |
    सइया तोहरी याद मोर बरसे नजरिया |
    फागुन मे रंगवा खेले तरसे गुजरिया |
    पगली कहे हमके जमनवा हो |
    सइयाँ अइले ना भवनवा |
    अइबा जे घरवा सोरहो सिंगार हम करब |
    रंगवा अबिरवा तैयार हम करब |
    खेलब संगवा होली इहे बा अरमनवा हो |
    सइयाँ अइले ना भवनवा |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    गीतकार /कवि /लेखक
    ढोरी ,बोकारो ,झारखंड
    मोब -9955509286

  • हम भारत हैं

    “सारे जहाँ से अच्छा “जो कह दे
    वो इकबाल कहाँ से लाऊँ?
    “हिन्दोस्तां हमारा ” कह दे
    वो इकबाल कहाँ से लाऊँ?
    अपने देश को अपना कहो तो
    आखिर क्या घट जाएगा?
    ध्वजा तिरंगा के खातिर
    अपना शीश कट जाएगा।
    छाती ठोक कहने वाला
    “आजाद”लाल कहाँ से लाऊँ?
    कोई हिन्दू बन लड़ता है
    कोई मुस्लिम का सरदार।
    सिक्ख ईसाई दलित बना सब
    कोई बाभन का अवतार।।
    “हिन्दी हैं हम” कहने वाला
    वो इकबाल कहाँ से लाऊँ?
    बाँट के सबको जाति धरम में
    आपस में लड़वा दे जो।
    करा के दंगा हर कूचे में
    आम खास मरवा दे जो।।
    ऐसे नेता के झाँसे में
    ‘विनयचंद ‘ हरगिज़ न आऊँ।
    हम भारत हैं भारत अपना
    यही गान मैं दिल से गाऊँ।।

  • क्यों

    क्यों एक बेटी की विदाई तक ही
    एक पिता उसका जवाबदार है ?
    क्यों किस्मत के सहारे छोड़ कर उसको
    कोई न ज़िम्मेदार है?

    क्यों घर बैठे एक निकम्मे लड़के
    पर वंश का दामोदर है ?
    क्यों भीड़ चीरती अपना आप खुद लिखती
    एक बेटी का न कोई मदतगार है?

    क्यों कपूत हो या सपूत
    हर हाल में स्वीकार है ?
    फिर क्यों एक बेटी के घर रहने से
    कुटुंब की इज्ज़त बेकार है ?

    क्यों कोई जो नज़र डाले उस पर
    तो वो ही कसूरवार है ?
    क्यों कोई पूछता नहीं उस बेटे से
    जिसे मिले ऐसे संस्कार हैं?

    क्यों एक बेटे के विदेश से लौट आने का
    घर में रहता सबको इंतजार है
    पर एक बेटी का नाकामयाब रिश्ते से
    बाहर आना सबको नागवार है ?

    क्यों जीने से मरने तक तुमको सिर्फ
    बेटों से सरोकार है?
    ऐसा अब क्या रह गया है जो
    एक बेटी की पहुँच से बाहर है ?

    क्यों बेटियाँ ही पराई हैं और बेटो को मिला
    हर अधिकार है ?
    कोई ढूंढें उसे,जो ऐसी विकृत सोच दे कर दुनिया को
    न जाने कहाँ फरार है?

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”

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