चोर चोर मौसेरे भाई,
नेता अफसर दोनों लिप्त,
एक चुराता एक बचता,
इसी में है दोनों विलुप्त।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
चोर चोर मौसेरे भाई,
नेता अफसर दोनों लिप्त,
एक चुराता एक बचता,
इसी में है दोनों विलुप्त।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
मां की ममता बड़ी निराली,
बच्चों की करती है रखवाली।
एक एक दान चुग कर लाती,
अपने बच्चों को खिलाती।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
सरकार बेचारी फिसड्डी हो गयी,
जनता अब मारी मारी है फिरती।
लगकर लाईन में उम्मीद लगाएं,
कोरोना का प्रकोप इन्हें है डसती।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
मां की ममता पिता का दुलार,
दिखता है पशु पक्षी में भी ।
दाने चुग कर लाती है मां,
भरण पोषण करती बच्चों का भी।।
महेश गुप्ता जौनपुरी
किस किस पर आरोप लगाते,
अपने दुःख दर्द को किसे दिखाते ।
सरकार फिसड्डी बरसों से है,
कब तक हम आवाज उठाते।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
अपनी गलती कब तक हम ठेलेंगे,
विज्ञान के आड़ में कब तक बम फोड़ेंगे।
चुनौतियों से पिछा छुड़ा कर,
अपनी नाकामी से कब तक हम भागेंगे।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
कितनी भी सिढीयां चढ़ लो,
खाने के लिए मेरा है अन्न ।
खुद को महान भले ही समझो,
पैसे से कर्ज नहीं अदा होता सुन।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
बेहिसाब अहसासों को हम सिमटे कैसे
कहां हो पाता है मुकम्मल मकां-ए-नज्म मिरा
हर बार टूट जाते है अहसास,
ख्वाबों के जैसे
जिस नारी को समझ पातकी
पति ने पत्थर बना दिया था।
दे निज चरणन की धूल रामजी
पंचकन्याओं में सजा दिया था।।
प्रातकाल उठि सुमिरन करते
इनका जो भी नर -नारी।
उनके सारे पाप कटे और
बने मोक्ष के अधिकारी।।
पति ने पत्थर बना दिया था
एक जीती जागती नारी को।
परमेश्वर ने फिर नारी कर डाला
निज चरणन अधिकारी को।।
दादाओं के भी दादा थे
वो ना जाने
कितने युगों से
खड़े थे एक पाँव पर
अपने घर के पास।
खेल कबड्डी
गिल्ली डंडे
भाग भाग के
आँख मिचौनी
खेला करते
सदा हीं
उनके आस-पास।।
भूख लगी
होगी बच्चों कै
जान कुछ फल
फैला देते थे नीचे।
हम भी उन
विद्रुम सम फल
को चुन-चुन
बड़े चाव से
खा जाते
अँखियों को मीचे।।
एक दिन रोना
आया हम सबको
आँसू के धार
बहे पुरजोड़।
कारण कि
उनके ऊपर
क्रुर कपूत ने
आकर कुल्हाड़ी से
प्रहार बड़ी जोर।।
काट -काट के
कर के टुकड़े
सब ले गया
अपनी नजरों से दूर।
इस गलती
का हर्जाना
कौन भड़ेगा
अब सब
हो गए मजबूर।।
कीट कीटाणु
और विषाणु
फैल गया बिमारी बनकर।
‘विनयचंद ‘
नादान बनो मत
बृक्ष पितर की रक्षा
कर नित हितकारी बनकर।।
शिक्षा और शिक्षक का नाता है भरा बस्ता,
ज्ञान की बातों में छुपा है कोई रास्ता।
भारी बस्ते से आमदनी है होता,
बचपन के बोझ से उनका नहीं कोई वास्ता।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
रोटी के निवाले के लिए बचपन अपना खो दिया,
भूख की तड़प से मासूम बेचारा रो दिया।
दिन रात एक करके लगा है देखो पैसा कमाने,
अपने बचपन की सारी खुशियां हंसकर लुटा दिया।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
नशे की लत ने बर्बाद है किया,
हंसते खेलते घर को बर्बाद है किया।
खुशियों का गला घोंटकर देखो,
अपनी मंजिल को ही नजर अंदाज है किया।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
नशे की लत में डूब गया देखो इंसान,
धुम्रपान के चक्कर में हुआ बर्बाद,
एक एक पैसे के लिए हुआ परेशान,
जीवन अपना नशे में किया आजाद।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
पेट की भूख छुड़ा दिया,
कापी पेंसिल और चाक।
कारखाने में जिंदगी बीता रहा,
किया उम्र अपना अब राख।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
उम्मीदों पर बसा है यह संसार,
नशे को देगा हालात सुधार ।
उम्मीद कभी तुम ना हारना,
लौट आयेगा एक दिन भटका यार ।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
जन्नत के आश में लगाते है कस,
धुम्रपान करके पाते है नर्क ।
इतना ही समझ होता तो,
क्या रह जाता इनमें और मुझमें फर्क।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
बालश्रम के कलंक को,
चलो मिटाये मिलकर हम।
देकर छोटू को विद्या उपहार,
सारे कसक को मिटाये हम।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
नशे का व्यापार जो करते है,
लिप्त होता उनका परिवार।
चंद खुशियों के चक्कर में,
बर्बाद हो जाता पुरा परिवार।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
बच्चें को बचपन तपाना मंजूर था,
मेहनत मजदूरी की रोटी कुबूल था।
शान से जीना शान से मरना मां ने सिखाया था,
इसलिए आत्मसम्मान में रोटी कमाना आसान था।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
किस किस से उम्मीद लगा बैठेंगे,
चारों तरफ नशे का जंजाल है।
गली मोहल्ले चौराहों पर,
दुध से ज्यादा नशे का व्यपार है।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
उम्मीद और प्रेरणा का हम करते हैं सम्मान,
बाल बचपन का हम करते हैं सम्मान।
भूखे को रोटी खिलाना है मेरा अधिकार,
बचपन को संवारना है मेरा अधिकार।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
इसी समाज में
सीता को भी
अग्नि परीक्षा
देनी पड़ी थी।
इसी समाज के
कारण निर्दोष
जानकी वन
के बीच पड़ी थी।।
मां भारती वीणावादनी ये घाव कैसा है,
शब्दों की झुंझलाहट में फटकार कैसा है।
कण्ड से निकलते झूठ का ये भाव कैसा है,
ज्ञान की देवी मनुष्य का दुर्भाव ये कैसा है।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
नारी तुम हो बड़ी बलशाली,
हारना नहीं तुम कभी हालातों से।
लड़ते रहना खुद को साबित करना,
मात ना खाना तुम कभी अपने बातों से।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
कौन किया हालात तुम्हारा हे मां वीणावादनी,
शिक्षा के धरोहर ही लगा दिए है दाग मां वीणावादनी।
दृष्ट के कण्ठ,ज्ञान के भण्डार को छीन लो मां भारती,
कमल आसान छोड़कर पापी को सजा दो मां वीणावादनी।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
शिक्षा के आंगन में सौदेबाजी हो रहा,
शिक्षक ही शिक्षा का बोली बखुबी लगा रहा।
मां सरस्वती को तांक पर रखकर,
शिक्षक दिन रात ज्ञान को नीचा दिखा रहा।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
धरा पर जब जब बढ़ता अत्याचार,
नारी धारण करती रूप विकराल।
खुद से करके नारी सोच विचार,
पाप के अन्त के लिए उठाती भाल।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
ज्ञान की दो चार बातें सीखकर इंसान,
मां वीणावादनी का करता दुत्कार ।
सीख पढ़कर शब्दों का वर्ण संसार,
अपने ज्ञान को समझता इंसा महान ।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
कितना भी बना लो शिक्षा को व्यापार,
मां वीणावादनी करेंगी अपने बच्चों पर उपकार।
शीश आशीष ज्ञान का भण्डार मन मस्तिष्क में भरकर,
करती रहेंगी सदैव दृष्ट पापीयों का संहार।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
शिक्षा को शिक्षा ही रहने दो,
मां सरस्वती मुझे वर दो ।
सौदेबाज शिक्षकों को दण्डित कर,
हे हंसवाहनी मेरे उर का तम हर दो।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
झूठ फरेब की कलंक से कलंकित होती मां,
कण्ड ज्ञान का भण्डार देकर खाती अब मात।
हिंद के सिपाही थाम लिए अंग्रेजी का हाथ,
दाग लगाकर सरस्वती पर मिट्ठू बनके गाते गान।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
ज्ञान कि देवी सुर कण्ठ वरदायनी,
शत् शत् नमन तुम्हें करें हम सब ।
जीह्वा पर हम सबके करती हो वास,
हे वीणावादनी नमन करें हम सब।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
शत् शत् नमन करेंगे गुरूवर,
शिक्षा का वरदान दे दो ।
मां सरस्वती को प्रणाम करके,
विद्या दान का संकल्प हमें दे दो।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
मन्दिर बन्द है
फैक्टरी बन्द है
बन्द है कारोबार।
घर में सोना
बाहर कोरोना
जीना है दुश्वार।।
जनताओं को कैद कर दो’कोरोना के नाम पे।
बिजली पानी भी मुफ्त करो कोरोना के नाम पे।।
रंग बदलती दुनिया में बेरंग पड़ा है
सबका जीवन
फूलों से थोड़ा रंग चुरा कर
तितली से थोड़ा रंग चुरा कर
भर लो अपने जीवन में।
इस घर की कैद ने भी क्या खूब काम किया
बिखरी तस्वीरों को करीने से सजा दिया
फिर से याद आए वह पुराने साथी
कुछ बिछड़े पलों को फिर से मिला दिया ।
चलो दर्द को भूल जाते हैं
हंसी की ट्रेन पकड़ कर
खुशी के संसार में जाते हैं
पुरानी यादों में से ‘कुछ’ को चुनकर
फिर से नई दुनिया बसाते हैं
जब हम साथ होते हैं
हाथों में हमारे हाथ होते हैं
दुनिया की उलझनों से दूर
सिर्फ हम और हमारे जज्बात होते हैं❣️❣️
छोटा सा एहसान कर के
लोग ताउम्र जताते हैं
कितने मासूम है वह मां-बाप
जो सब कुछ करने के बाद
भूल जाते हैं….
बदले तो वो थे …..
इल्जाम हम पर लगा बैठे
हमने तो ख्वाब सजाए थे
वो तो उनको ही जला बैठे।
सब कुछ कहां कह पाते हैं
कुछ शब्द अधूरे रह जाते हैं
कुछ बातें मन में आती हैं
कुछ मन में ही रह जाती हैं
कहने को हम सब पूरे हैं
बिन लफ्जों के भाव अधूरे हैं।
तुम कृपाण रखते हो
तो मैं भी कटार रखती हूँ।
तुम एतवार रखते हो
तो मैं भी प्यार रखती हूँ।।
बेशक़ कड़ा है लोहे का
फिर भी है चूड़ियों का भाई।
भाई वीर कहलाता है तो
बहना क्यों कहाती अबला दाई।।
जब भी देखता हूँ मैं
इस रोटी के खुरचन को
तो माँ आ जाती है यादों में।
तवे पे रोटियाँ बनाती जब
जला -जला के रोटियाँ की
सौंधी सुगन्ध फैल जाती वातों में।।
तोड़ -तोड़ के खुरचन सारे
करती साफ रोटियों को।
चुपड़-चुपड़ घी से मैया
हमें खिलाती रोटियों को।
जब पूछता कारण इसका
मुस्कुरा के रह जाती माता।
आ परदेश में अपने हाथों
बना के रोटी जब भी खाता।।
मैया याद में आती है और
खुद हीं समझ जाता हूँ मैं।
सेहतमंद यही रोटी है
सबको अब बतलाता हूँ मैं।।
मां की लोरी बड़ी सुहाती,
मां की ममता याद दिलाती।
मां अपनी सर्वस्व अर्पण करती,
मां अपने हिस्से की निवाला खिलाती।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
मां की ममता बड़ी सुहानी लगती है सबसे न्यारी ।
बचपन को मेरे सिंच रहीं है बनाकर फूलों की क्यारी,
दुध पिलाकर गले लगाकर पलकों पर है रखती,
गुणगान करें हम कितना धरा पर मां है सबसे प्यारी।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
कांप उठे दुश्मन सुनकर नाम महाराणा का,
थर थर कांप उठे देख वीरता महाराणा का।
देश के लिए समर्पित प्राणों का दिया आहुति,
जयकारा लगाओ वीर धरती पुत्र महाराणा का।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
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