मुक्तक

जीवन सारथी

जीवन न्यौछावर कर दो हेतु परमार्थ। प्रतिफल की अभिलाषा बिना निःस्वार्थ। ईश्वर स्वयं बन जाएंगे जीवन सारथी, और बना लेंगे अपना सखा पार्थ। देवेश साखरे ‘देव’ »

मुक्तक

मेरी नज़र के सामने साक़ी को रहने दो। हाथों में जाम है मगर बाक़ी को रहने दो। धधक रही हैं तस्वीरें यादों की दिल में- चाहत की ज़ेहन में झांकी को रहने दो। मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

मुक्तक

मां भारती का सहस्त्र वंदन, रही है आवृत ये गोधुली से यहीं दिगम्बर ये अन्नदाता, लगे है पाथेय संबली से। यहीं पे खेले चराए गैया, जगत खिवैया किशन कन्हैया यहीं त्रिलोकेश सूर्यवंशी, यहीं कपिश्वर महाबली से। मंदाकिनी का है काव्य अविरत, है धैर्य अविचल सा हिमगिरी का प्रथमवृष्टि की सुगंध अनुपम, है स्वाद अद्भुत सा पंजिरी का। युगों युगों से युगों युगों तक रहा सुशोभित रहेगा चिन्हित आशीष है ये स्वयं प्रभु का, है ... »

अँधेरा कहीं भी हो दूर होना चाहिए

अँधेरा कहीं भी हो दूर होना चाहिए, सूरज न सही दिए के माफ़िक जलना चाहिए, क्या हुआ जिंदगी में उदासियाँ बहुत हैं, औरों की ख़ुशी देखकर भी मुस्कुराना चाहिए। »

मुक्तक

तेरे बग़ैर तन्हा रहने लगा हूँ मैं। तेरी बेवफ़ाई को सहने लगा हूँ मैं। जब भी ग़म तड़पाता है मेरे ख़्यालों को- अश्क़ बनकर पलकों से बहने लगा हूँ मैं। मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

मुक्तक

मैं तेरे बग़ैर तेरी तस्वीरों का क्या करूँ? मैं तड़पाती यादों की जागीरों का क्या करूँ? मैं अश्कों को पलकों में रोक सकता हूँ लेकिन- मैं दर्द की लिपटी हुई जंजीरों का क्या करूँ? मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

मुक्तक

मेरे दर्द को तेरा अफ़साना याद है। मेरे ज़ख्म को तेरा ठुकराना याद है। लबों को खींच लेती है पैमाने की तलब- हर शाम साक़ी को मेरा आना याद है। मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

वो कहती है

वो कहती है लिखा हुआ आज सुना दो मैंने सिर्फ इतना ही कहा जुबाँ लड़खड़ा जाएगी एहसास बड़े गंभीर हैं -मनीष »

न तन पर कपड़े न पैरों में चप्पल का होश होता है

न तन पर कपड़े न पैरों में चप्पल का होश होता है

न तन पर कपड़े न पैरों में चप्पल का होश होता है, ये बचपन बस अपने आप में मदहोश होता है, इच्छाओं की दूर तलक कोई चादर नहीं होती, बस माँ के आँचल में सिमटा हुआ स्वरूप् होता है।। – राही (अंजाना) »

अदब से झुकने की कला भूल गए

अदब से झुकने की कला भूल गए

अदब से झुकने की कला भूल गए, मेरे शहर के लोग अपना गुनाह भूल गए, भटकते नहीं थे रास्ता कभी जो अपना, आज अपने ही घर का पता भूल गए, महज़ चन्द पैसों की चमक की खातिर देखो, यहां अपने ही अपनों की पहचान भूल गए।। राही (अंजाना) »

खेल खेलने बैठा तो खिलाड़ी न मिला

खेल खेलने बैठा तो खिलाड़ी न मिला

खेल खेलने बैठा तो खिलाड़ी न मिला, एक बन्दर को उसका मदारी न मिला, ज़िन्दगी की बिसात में हम कुछ फंसे ऐसे, कि हमारी चालोन को कोई जबाबी न मिला।। राही (अंजाना) »

यूँ तो नज़रन्दाज़ नहीं करते लोग खामियाँ मेरी

यूँ तो नज़रन्दाज़ नहीं करते लोग खामियाँ मेरी, तो मैं भी क्यूँ दिखाऊं खुलकर उनको खूबियां मेरी, अभी सीख रहा हूँ तैरना तो हंसी बनाने दो मेरी, जब डूब कर समन्दर से निकल आऊंगा तो देखेंगे वो करामात मेरी॥ राही (अंजाना) »

कई साल बीत गये

कई साल बीत गये

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उनकी तरफ से तो

उनकी तरफ से तो इक इशारा भी ना हुआ… ऒर हम कम्बखत… उनसे इश्क़ कर बैठे हैं…. राजनंदिनी रावत »

कोई तो ऐसा मिले ‘खुदा’….

कोई तो ऐसा मिले ‘खुदा’…. जब भी तेरे दर पे आऊँ…. उसके संग ही आऊँ ! राजनंदिनी रावत-राजपूत »

मै जब से तेरी एक तस्वीर बनाने में वयस्त हूँ

मै जब से तेरी एक तस्वीर बनाने में वयस्त हूँ

मै जब से तेरी एक तस्वीर बनाने में वयस्त हूँ, मैं तब से अपने ही ख्यालों में वयस्त हूँ, रंग तो बहुत हैं ज़माने में मगर, मैं इंद्रधनुष के रंग छुड़ाने में वयस्त हूँ, चाँद है सितारे हैं आसमाँ रौशन है मगर फिर भी, मैं अपने ही घर के जुगनू जलाने में व्यस्त हूँ।। राही (अंजाना) »

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ पानी में बहाते नज़र आते थे, एक रोज़ मिले थे वो बच्चे जो अपने सपने बड़े बताते थे, बन्द चार दीवारों से निकलकर खुले आसमान की ठण्डी छावँ में, इतने सरल सजग जो अक्सर खुली किताब से पढ़े जाते थे।। राही (अंजाना) »

लौट आने दो उस हवा को

लौट आने दो उस हवा को गुनगुनाने दो उस हवा को वह आयी है गीत सुनाने थरथराने दो उस हवा को। अशोक बाबू माहौर »

बहुत दूर तलक जाकर भी कहीं दूर जा पाते नहीं

बहुत दूर तलक जाकर भी कहीं दूर जा पाते नहीं, परिंदे यादों के तेरी मेरे ज़हन से उड़ पाते नहीं, बनाकर जब से बैठे हैं मेरी रूह पर घरौंदा अपना, किसी जिस्म पर चैन से ये ठहर पाते नहीं।। राही (अंजाना) »

प्यार के गीत

रोज प्यार के गीत गुनगुनाए हर कोई मन , मुसीबतों को ,सबक सिखाए हर कोई मन। नाच ले ,झूम ले मस्ती भरे , मधुर तरानों पर, खुशियों की बाँहों में ,झूल जाए हर कोई मन । ^^ जानकी प्रसाद विवश^^ »

मुक्तक

कदम दर कदम मै बढाने चला हूँ। सफर जिन्दगी का सजाने चला हूँ। ज़माने की खुशियाँ जहाँ पें रखकर दौर जिन्दगी बनाने चला हूँ।। योगेन्द्र कुमार निषाद घरघोड़ा »

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