फिर से बचपन में लौटना है आज मुझे कुछ पल फुर्सत के जीना है आज मुझे मां की गोद में रखकर सिर सोना है आज मुझे बहन की चोटी खींच आज फिर दौड़ लगाना है […]
फिर से बचपन में लौटना है आज मुझे कुछ पल फुर्सत के जीना है आज मुझे मां की गोद में रखकर सिर सोना है आज मुझे बहन की चोटी खींच आज फिर दौड़ लगाना है […]
एक वक्त था दिन रात सोचा करते थे तुम्हें आज तुम्हें सोचने की फुर्सत ही ना रही ….
तुम हमारे बारे में सोचते भी कैसे जिंदगी ने कभी इतनी फुर्सत ही नहीं दी
तुमने कह तो दिया मेरे दामन में दाग बहुत हैं पर शायद तुमने कभी अपने ज़िस्म पर पड़ी चादर नहीं देगी।
ना रही कोई हसरत ना कोई उम्मीद, तुझे जब से भूल गई जिंदगी बड़े आराम से कट रही है…
बड़ी घुटन होती थी जब हम तुम्हारे हुआ करते थे रिश्ता बोझ बन गया था जब हम तुम्हारे हुआ करते थे
यह घर नहीं दिल है मेरा जिसमें तुम बड़े आराम से रहते हो।
जब से दफ़न अपने दिल में तेरी यादों को कर लिया…. सब पूछते हैं मैं क्यों खामोश रहती हूं?
जबसे तुमको भूल गई सब कुछ अच्छा लगता है….. पहले कोई काम ना था तुझे याद करने के सिवा….
पहले तुम्हारे बिन कुछ भी ना अच्छा लगता था अब तुम्हारे बिन सब कुछ अच्छा लगता है
कोई छंद नहीं पदबन्ध नहीं। तुकबंदी का है प्रबंध नहीं दिल के भाव को लिखता हूँ चाहे कवियों को हो पसन्द नहीं।।
चोट अपनों के फूलों ने जो दिल को दिया, गैर के पत्थरों में वो दम था कहाँ।
हर कोई बोलता है क्या खूब लिखती हो मै तेरा ही दिया हर दर्द लिखा करती हूँ उन नासमझों को कौन बताये
चांद बनकर चमकती रहो नित गगन में। देखकर हीं मेरा मन रहेगा मगन में।।
रात बीती तारे गिनते और छाई खुमारी बेखयाली में भी हम तुझको बन हवा छू आये
तीर नजरों से तूने जो घायल किया अब खंजर उठाने से क्या फयदा।
लौहपुरुष नहीं मैं फिर भी फौलाद हूँ। आखिर भारत माँ का जो औलाद हूँ।।
भुला दूंगी अब ना याद करूंगी उस जालिम को ये झूंठा वादा मैं खुद से शुबहोशाम करती हूँ
धोखा देकर प्यार जताती है ए ज़िन्दगी! तेरी आदतें हूबहू मेरे दोस्त जैसी हैं ।
जो भी मेरी कविता पढ़ता था पूछता था एक मुस्कान- सी आती थी चेहरे पर आज उन्होंने भी पढ़ा:- और पूछा:-‘ किसके लिये लिखती हो? मेरा ज़िस्म ऊपर से नीचे तक कांप उठा… ज़ज्बात जागे […]
उसने कुछ यूं देखा मुझको जैसे रूह तक झांक लिया हो… कुछ कहा तो नहीं मगर सब कह भी दिया कुछ ऐसी थी उसकी नज़रें… दूरियाँ जरूर हैं हमारे बीच लेकिन ये सच है मुझे […]
जो भी मेरी कविता पढ़ता था पूछता था एक मुस्कान- सी आती थी चेहरे पर आज उन्होंने भी पढ़ा:- और पूछा:-‘ किसके लिये लिखती हो? मेरा ज़िस्म ऊपर से नीचे तक कांप उठा… ज़ज्बात जागे […]
शाम- सी ढल गई मैं तेरा इन्तज़ार करते करते।
कोशिश बहुत की मैनें नज़र चुराने की वो सामने आये तो हम देखते रह गए ।
मैनें कब मागा था उसको दुआओं में, जरा सा वक्त क्या मांगा माजरा बदल गया ।
अफसाना नहीं ये सदाकत है …. लफ्ज़ खामोश थे फिर भी हमनें बात कर ली …
खफ़ा ही रहना मत मानना है कसम तुमको चाहें कुछ भी हो जाए लौट के ना आना तुम ….
दर्द कितने दिए तूने आज तक ना भरे …. तेरा रंग धुल गया तेरे प्यार की तरह।
बिता कर कुछ क्षण अपनी तन्हाई के साथ जी कर देखा…. पता चला कितना सुकून मिलता है…
कोमल मन और आत्मा से आवाज़ दे रही है आहटे कुछ पन्ने किताबों के पलट कर वक़्त आया है मिलने…… सिसकियां खामोश होकर गुनगुना रही हैं कल के किस्से और तन्हाइयां बटोर लाई हैं तमाम […]
मीलों सफ़र करने के बाद तुझ तक पहुँचे फिर भी मीलों के फासले हैं
कुछ तुम सुनाओ कुछ मैं सुनाऊँ कुछ तुम कहो कुछ मैं कहूँ चुरा कर कुछ पल तन्हाईयों से खेलें आँख-मिचौनी कुछ तुम गुनगुनाओ कुछ मैं गुनगुनाऊँ गूँज उठेगी शहनाईयाँ मन के झर्झर खंडहरों में फिर […]
आहिस्ता-आहिस्ता रखना कदम इन नाजुक पगडंडियों में वक्त सो रहा है रात के सन्नाटे में चांदनी रात के आँचल तले खोया है कांच के सपनों की दुनिया में तुम्हारे क़दमों की इक आहट से कहीं […]
कभी बनकर कोई ख़्वाब मेरी निंदिया तू चुरा लेता कभी बनकर हवा का झोंका आँचल को तू खींच लेता बता तो सही तू है कौन कभी बारिश की बूँद बनकर कोमल बदन को भिगो देता […]
हिमालय के उतुंग शिखर से सिंह ने भरी ऊँची दहाड़ है तूफान क्या टकराएगा उससे जो स्वयं फौलादी पहाड़ है सारे जहाँ में अब भगवा ही लहराएगा माटी का लाल अब तिरंगा फहराएगा सौगंध इस […]
तुम्हारा मासूम सा चेहरा दिल तो धड़का सकता है मगर दिल चुरा नहीं सकता
फिर मन करता है तुमसे बात करने का मगर करेगें नहीं तुम्हें छोड़ने का फैसला ना बदलेंगे
उनके देखने का अंदाज़ कातिलाना है जब देखते हैं तो एक बिजली सी दौड़ जाती है
राज़ी हो गए वो और हमने रंग लगा दिया क्या हुआ अगर आज दूसरा दिन था…
तुझे महसूस करने की कोशिश की मगर महसूस कुछ भी ना हुआ ना जाने क्यूँ तेरे जाने के बाद आँख भर आई
करूँ कितना भी श्रिंगार मगर जानती हूँ मैं तेरे आगे कुछ भी नहीं हूँ
करूँ कितना भी श्रिंगार मगर जानती हूँ मैं तेरे आगे कुछ भी नहीं हूँ
बार- बार रोंकती हूँ मैं खुद को मगर उनकी सादगी पर मर ही जाती हूँ
दर्मियां उनको हमने पा करके ना हमने पाया और ना खो पाये
वो आये और हमें मुस्कुरा के देखते रहे हम नाराज़ थे आँख उठा के भी नहीं देखा उनको
तेरी अदा ने हमको दीवाना कर दिया मुझे मेरी ही दुनिया से बेगाना कर दिया आज सोचते हैं कि काश ना मिले होते तुझसे काश कि ना फना होते तुझपे।
ढो रही हूं एक बोझ सिर से लेकर पांव तक खोज रही हूं एक दिशा धूप से मैं छांव तक मीलों सा लंबा सफर जिंदगी का है मेरी फिर भी रुकी है वहीं जहां शुरू […]
मेहनत में जुटे हैं जी जान से हम तो परीक्षा की घड़ी में कहीं और मन ना भटके तर्जनी के छूने से ढहने का डर है तप की तपन बिना है कच्चे मटके
मेरे रंग धरे के धरे ही रह गए वो आये और मेरी बेचैनी बढ़ा के चल दिए
तुम जाते हो तो वापस भी आ जाते हो हम जिस दिन चले गए दिल में क्या ख्वाब में भी ना आएंगे
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