मैं कितना अज़ीज़ था ये इस बात से ज़ाहिर हुआ, लगा के आग मुझे कुछ देर, कोई भी रुका नही..
मैं कितना अज़ीज़ था ये इस बात से ज़ाहिर हुआ, लगा के आग मुझे कुछ देर, कोई भी रुका नही..
रुकने नही दिया किसी की पलकों ने हमें, जब भी किसी की आँख का आँसू बने हैं हम..
कोई कह दे उनसे कि यूँ चूड़ियाँ खनकाया ना करें, पलट पलट कर देखता हूँ सुनकर मैं नाम अपना..
अगर दबा है कोई दर्द हाले दिल में , तो खुलकर रो लीजियेगा हमदर्द होते हैं; ये आंसू हमारे, ज़ख्मों को जरा धो लिजियेगा।
ना जाने क्या है इन आँखों में कुछ ठहर-सा गया है.. रोती हैं तेरी यादों में पर वक्त गुजर-सा गया है..
दिल का मचलना बार बार हिचकी पे हिचकी आना। बता “राहत ” किधर जाना इधर जाना या उधर जाना।।
खत्म हुआ खेल मुहब्बत का। गिर गया पर्दा मेरे अंजुमन का।।
मैं किसी फटी डायरी के पन्नों सा, जो हवा में उड़ रहे है इधर- उधर, मगर अफसोस ! पढ़ने वाला कोई नहीं। ……..मोहन सिंह मानुष
एक शब्द ने मुझे हिला डाला , अच्छी चल रही थी जिंदगी, मगर रुला डाला। ये शब्द बड़ा मीठा सा, तीखा सा, बड़ा परेशान करे ,नींदों को हराम करें, शोहरत से बदनाम हुए, और वजूद […]
शब्दों का पिटारा तो हम रखकर बैठें हैं लेकिन वो शब्द नहीं, जो हाल-ए-दिल बयां कर सके
मत निकाल अपने दिल से मुझे, मैं तो वक्त हूँ, गुज़र जाऊँगा इस भरे शहर में कोई आशना नही, ये जगह भी गई तो किधर जाऊँगा ? मायने : आशना – परिचित
लफ़्ज अक्सर लवों पर ही ठहर जाते है जमाने के खौफ़ है कि क्या कहेगा सुनकर
इतना प्यार मत बरसा तू मुझ पर ओ घिरे बादल, मैं तो पूरी की पूरी भीग कर तर हो चुकी हूँ अब।
हसीन अदा इनके अंग अंग में, अल्हड़पन सी लगती भली है। माना इन पर चढ़ी नही जवानी, फिर भी यह नाजुक कली है।।
जिन्हें समझते थे हम औरों से अलग, वो भी आज, ज़माने से निकले। जिनसे थी हमें चन्द खुशियों की आरज़ू, वो भी आज ,दर्द के जाने माने से निकले।
‘तुमसे तो चंद कदम तय भी हो सके ना कभी, मैंने मीलों का सफर चलके ही गुज़ारा है.. कम से कम तुम पर किसी कत्ल का इल्ज़ाम नही, मैंने तो उम्र भर ही ख्वाहिशों को […]
गम-ए-हयात की खातिर या किसी बात की खातिर, हम तो खामोश रहे इक नई शुरुआत की खातिर.. कुछ रहे पास, खुदा से ये भी बर्दाश्त ना हुआ, उसने आंँसू भी ले लिए मेरे, बरसात की […]
इस मायूस दिल को कौन समझाये मोहब्बत में बस तन्हाई ही मयस्सर है
हर हाल में मुस्कुराना हमें आता है, अपने .गम भी छिपाना हमें आता है। छोटी सी कश्ती में घूम कर भी ख़ुश हो जाती है”गीता,” और, बड़े- बड़े सागर भी पार करना हमें आता है।
वो कफन था जो दामन-ए-यार बना फिरता था, मेरा वहम मेरे अंदर ऐतबार बना फिरता था.. कुछ दिखा नही ज़माने में सिवाए मतलब के, एक मैं ही था जो दिलों में प्यार बना फिरता था..
एक चेहरे से पहचान मत हम मुखौटा लगाए हुए हैं, सच नहीं है हमारा दिखावा झूठ भीतर छुपाए हुए हैं।
बेगुनाही में अपने पास रख असर इतना, आसमाँ खुद कहे कि हाँ ये सही है बंदा..
मैं जब कभी कहीं मायूसियों में घिरता हूँ, तेरी उम्मीद मेरा हाथ थाम लेती है.. तेरी मौजूदगी का इल्म इसलिए है मुझे, तेरी चूड़ी की खनक मेरा नाम लेती है..
झुकने नही देंगे देश का सर, बस धुन ये रमाकर बैठे हैं माथे पर सादा तिलक नही, हिंदुत्व लगाकर बैठे हैं..
लगाकर सीने से फिरता हूँ मैं तस्वीर तेरी, ये वो वजह है जिससे दिल मेरा धड़कता है.. ‘प्रयाग धर्मानी’
Jeet unaki hui lab mere muskuraaye.. Ye mohabbat hai ya fir hone ko hai..
कोई तरकीब हो अगर तो जरूर बतायें तक़रीब ए इश्क कैसे हो हम
Aaj bekaraariyan khatm hone ko hain.. Hai jisaka intazar meri nazaron ko, Wah aaj mere dar par Aane ko hai..
मैने वो तस्वीर फाड़ दी जिस तस्वीर को देख कर, हम कभी बेहतरीन ग़ज़ल लिख लिया करते थे। हकिक़त जब सामने आई तस्वीर को जोडना चाहा , तस्वीर ने कहा मुहब्बत के मामले तुम बहुत […]
सबसे दुलारी हो! तुम ही प्यारी हो! अक्सर,ये कह तो देता हूं ; मैं प्रिय को मगर ज़रा सा कुछ भी हो जाए, मां याद आ ही जाती है।
आज मेरी मां के चेहरे पर मायूसी छाई है फिर भी देख कर मुझे वह मुस्कुराई है मेरी रोटी के खातिर जल जाते थे जो हाथ पहली बार मां के उन हाथों मे कम्पन अाई […]
माना दर्द मिला है, बहुत तेरे इश्क में मगर चीस बड़ी ही मीठी है, इस वेदना की।
वैसे नींंद नहीं आती , आजकल मुझे। जबसे देखा हैं , हमदम तुझे किस्मत में हैं, या नहीं तू पर कोशिशें करता हूँ , अब सो जाने की काश इक पल सपनों में ही , मिल जाए […]
हुस्न के बाजार में ए “मीर” हम चले थे, अपने जख़्म के मरहम खोजने के लिए। किसी ने जहरीली मुस्कान लिए कहा, अमीर संग कीड़े कब बने एक दूजे के लिए।।
चिड़ी के गुलाम था ए दोस्त गेसुओं के कैद में। उसे क्या पता था डसेगी नागिन चाँदनी रात में।।
धीरे-धीरे वो हमसे अनजान हो गए जो कभी खास थे आज आम हो गए गुफ्तगू करने से जिनका जी नहीं भरता आज उनकी खामोशी से हम बदनाम हो गए
ले दे के दो सिक्के ले कर चली थी बाजार में इक उछालने में खो गया, एक को रख भूली कहीं पर
दर्द ए इश्क़ और शराब! दोनों एक जैसे हैं, जनाब! नशा चढ़ने पर, ज़माना फर्जी सा लगता है।
ए ग़ालिब चल कल आते हैं। शायद आज मुहब्बत बंद है।।
मैं बुरा हूं या नहीं, मगर बनाने वाले बहुत हैं। मैं मौन-सा बना; चुप हूं, क्योंकि नहीं समझने वाले बहुत हैं।
सच्चाई को मारने चला था झूठ आवेग में आकर, मगर इकतफाक से, सच्च ! कहीं मिला ही नहीं।
हम तो शदियों से खुद को संभालना जानते है। अपना ख्याल रख ए नादान वक्त के तकाजा है।।
हम वो राह छोड़ दिए ” ग़ालिब “, जिस राह पे हम कभी चला करते थे। वह डायरी हम आज फाड़ दिए, जिस डायरी पे हम कभी, किसी के लिए ग़ज़ल लिखा करते थे।।
कैसे दूं हिसाब अपनी बेहिसाब मोहब्बत का वो पूछ बैठे जो आज कि कितनी मोहब्बत है मुझे
इक खुशी की चाह में , कितने गमों को गले लगाया हैं, सुकून तो मिला ही नहीं, अब दर्द से ही काम चलाया है!
कोई गरीबी का मारा , कोई बदनसीबी का मारा , कोई वक्त से परेशान हैं , कोई अपनों का मारा । मगर वो बेपरवाह सा, मगन अपने दर्द में, जो है इश्क का मारा।
Kavi man bahut hi komal hai. Hans kar jeena iska hal hai.
Chota sa dil hai toot hi jaata hai. Par koi nahi ye duniya hai. Yahan aisa ho jaata hai. Aawaz uthaane ki himmat hai Tujhame pagali. Rote nahi hain aise noor chala jaata. Just for […]
वह ज़ालिम हर मर्तबा इस दिल पे सितम पे ढाते रहे। हम उनके सितम को अपनी धड़कन समझते रहे।।
जीवन की आपाधापी में त्यौहार सांकेतिक हो गए, जबसे कोरोना आया है तब से ऑनलाइन हो गए। प्यार ऑनलाइन हो गया मुलाकात ऑनलाइन हो गई, राखी ऑनलाइन कलाई ऑनलाइन हो गई बस जज्बात ऑफ लाइन […]
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