Category: शेर-ओ-शायरी

  • चूड़ी की खनक

    मैं जब कभी कहीं मायूसियों में घिरता हूँ,
    तेरी उम्मीद मेरा हाथ थाम लेती है..
    तेरी मौजूदगी का इल्म इसलिए है मुझे,
    तेरी चूड़ी की खनक मेरा नाम लेती है..

  • हिंदुत्व

    झुकने नही देंगे देश का सर, बस धुन ये रमाकर बैठे हैं
    माथे पर सादा तिलक नही, हिंदुत्व लगाकर बैठे हैं..

  • तस्वीर

    लगाकर सीने से फिरता हूँ मैं तस्वीर तेरी,
    ये वो वजह है जिससे दिल मेरा धड़कता है..

    ‘प्रयाग धर्मानी’

  • jeet unaki

    Jeet unaki hui lab mere muskuraaye..
    Ye mohabbat hai ya fir hone ko hai..

  • तक़रीब ए इश्क

    कोई तरकीब हो अगर तो जरूर बतायें
    तक़रीब ए इश्क कैसे हो हम

  • bekaraariyain

    Aaj bekaraariyan khatm hone ko hain..
    Hai jisaka intazar meri nazaron ko,
    Wah aaj mere dar par Aane ko hai..

  • तस्वीर

    मैने वो तस्वीर फाड़ दी जिस तस्वीर को देख कर,
    हम कभी बेहतरीन ग़ज़ल लिख लिया करते थे।
    हकिक़त जब सामने आई तस्वीर को जोडना चाहा ,
    तस्वीर ने कहा मुहब्बत के मामले तुम बहुत नादान थे।।

  • मां याद आ ही जाती है(शायरी)

    सबसे दुलारी हो!
    तुम ही प्यारी हो!
    अक्सर,ये कह तो देता हूं ; मैं प्रिय को
    मगर ज़रा सा कुछ भी हो जाए,
    मां याद आ ही जाती है।

  • माँ

    आज मेरी मां के चेहरे पर मायूसी छाई है
    फिर भी देख कर मुझे वह मुस्कुराई है
    मेरी रोटी के खातिर जल जाते थे जो हाथ
    पहली बार मां के उन हाथों मे कम्पन अाई है

  • शेर(वेदना)

    माना दर्द मिला है, बहुत तेरे इश्क में
    मगर चीस बड़ी ही मीठी है, इस वेदना की।

  • शेर(चाह)

    वैसे नींंद नहीं आती ,
    आजकल मुझे।
    जबसे देखा हैं , हमदम तुझे
    किस्मत में हैं, या नहीं तू
    पर कोशिशें  करता हूँ ,
    अब सो जाने की
    काश इक पल सपनों में ही ,
    मिल जाए तू मुझे ..!

  • अमीर संग कीड़े

    हुस्न के बाजार में ए “मीर” हम चले थे,
    अपने जख़्म के मरहम खोजने के लिए।
    किसी ने जहरीली मुस्कान लिए कहा,
    अमीर संग कीड़े कब बने एक दूजे के लिए।।

  • गेसूओं में मौत

    चिड़ी के गुलाम था ए दोस्त गेसुओं के कैद में।
    उसे क्या पता था डसेगी नागिन चाँदनी रात में।।

  • ख़ामोशी

    धीरे-धीरे वो हमसे अनजान हो गए
    जो कभी खास थे आज आम हो गए
    गुफ्तगू करने से जिनका जी नहीं भरता
    आज उनकी खामोशी से हम बदनाम हो गए

  • दो सिक्के

    ले दे के दो सिक्के ले कर चली थी बाजार में
    इक उछालने में खो गया, एक को रख भूली कहीं पर

  • शायरी (दर्द ए इश्क़ और शराब)

    दर्द ए इश्क़ और शराब!
    दोनों एक जैसे हैं, जनाब!
    नशा चढ़ने पर,
    ज़माना फर्जी सा लगता है।

  • शेर

    ए ग़ालिब चल कल आते हैं।
    शायद आज मुहब्बत बंद है।।

  • नहीं समझने वाले बहुत हैं… (शायरी)

    मैं बुरा हूं या नहीं,
    मगर बनाने वाले बहुत हैं।
    मैं मौन-सा बना; चुप हूं,
    क्योंकि नहीं समझने वाले बहुत हैं।

  • इकतफाक से

    सच्चाई को मारने चला था झूठ
    आवेग में आकर,
    मगर इकतफाक से, सच्च !
    कहीं मिला ही नहीं।

  • तकाजा

    हम तो शदियों से खुद को संभालना जानते है।
    अपना ख्याल रख ए नादान वक्त के तकाजा है।।

  • बीते लम्हे

    हम वो राह छोड़ दिए ” ग़ालिब “,
    जिस राह पे हम कभी चला करते थे।
    वह डायरी हम आज फाड़ दिए,
    जिस डायरी पे हम कभी, किसी के लिए
    ग़ज़ल लिखा करते थे।।

  • बेहिसाब मोहब्बत

    कैसे दूं हिसाब अपनी बेहिसाब मोहब्बत का
    वो पूछ बैठे जो आज कि कितनी मोहब्बत है मुझे

  • खुशी की चाह

    इक खुशी की चाह में ,
    कितने गमों को गले लगाया हैं,
    सुकून तो मिला ही नहीं,
    अब दर्द से ही काम चलाया है!

  • इश्क का मारा (शायरी)

    कोई गरीबी का मारा ,
    कोई बदनसीबी का मारा ,
    कोई वक्त से परेशान हैं ,
    कोई अपनों का मारा ।
    मगर वो बेपरवाह सा,
    मगन अपने दर्द में,
    जो है इश्क का मारा।

  • shayri:-kavi man

    Kavi man bahut hi komal hai.
    Hans kar jeena iska hal hai.

  • shayri

    Chota sa dil hai toot hi jaata hai.
    Par koi nahi ye duniya hai.
    Yahan aisa ho jaata hai.
    Aawaz uthaane ki himmat hai
    Tujhame pagali.
    Rote nahi hain aise noor chala jaata.
    Just for you…

  • सितम

    वह ज़ालिम हर मर्तबा इस दिल पे सितम पे ढाते रहे।
    हम उनके सितम को अपनी धड़कन समझते रहे।।

  • राखी ऑनलाइन

    जीवन की आपाधापी में
    त्यौहार सांकेतिक हो गए,
    जबसे कोरोना आया है
    तब से ऑनलाइन हो गए।
    प्यार ऑनलाइन हो गया
    मुलाकात ऑनलाइन हो गई,
    राखी ऑनलाइन
    कलाई ऑनलाइन हो गई
    बस जज्बात ऑफ लाइन रह गए।

  • आज तो राखी है भाई

    दिल खोल कर त्यौहार मनाओ
    दिल खोल कर प्यार दे दो
    राखी में बहन आई होगी
    दिल खोलकर उपहार दे दो।1।
    रोज-रोज ठगता है
    आज तो कंजूसी छोड़
    आज तो राखी है भाई
    आज तो गुल्लक तोड़।2।

  • दिल की अदालत में

    यूँ ना उड़ाओ मेरी नींद
    मैं रिपोर्ट लिखा दूंगी,
    दिल की अदालत में।
    ज़माना कुछ भी कहे
    अपना बनाकर
    सजा दिला दूंगी,
    दिल की अदालत में।

  • तू मुझे चाह ले

    तू मुझे चाह ले संवर जाऊं।।
    या कहे टूट कर बिखर जाऊं।।

    रास्ता कौन मेरा तकता है
    लौटकर किसलिए मैं घर जाऊं।।

    तू सफ़र में हो तो ये मुमकिन है
    मैं संग-ए-मील सा गुज़र जाऊं।।

    जो न पूछे तो तेरा ज़िक्र करूं
    कोई पूछे तो मैं मुकर जाऊं।।

    इश्क़ का मर्ज़ लाइलाजी है
    चाहे अमृत पिऊं, ज़हर खाऊं।

  • चोर सा नींद मेरी चुरा ले गया

    चोर सा नींद मेरी चुरा ले गया
    आँख थक सी गयी दिल व्यथित हो गया,
    किस तरफ को गया कुछ पता ना चला
    जिंदगी की भरी भीड़ में खो गया।

  • नींद तो बेवफा है

    उलझन भरी जिंदगी में
    नींद के लिए समय ही कहाँ है
    जब समय होता है
    नींद आती ही कहाँ है।
    नींद भी जरुरी है
    इंसान के लिए
    पर इंसान जरुरी कहाँ है
    नींद के लिए।
    नींद तो बेवफा है जो
    उलझन के समय
    साथ छोड़ देती है,
    हम पलटते रह जाते हैं
    वो मुंह मोड़ देती है,

  • नींद से मेरी

    #Shayri 2liner

    नींद से मेरी तो अनबन ही रहती है,
    कभी-कभी आ जाती है मुंह दिखाई के लिए।

  • शायरी संग्रह भाग 3

    मेरे इलाही मेरे रक़ीब को सलामत रखना। वो भी रोयेंगे मेरे मह़सर में।।1।।
     विकास कुमार कमति

    मेर रक़ीब मेरे माशुक को गुल दे दो। वो समझेंगे हमराह शव-ए-विशाल है।।2।।
     विकास

    मेरे इलाही मेरे माशुक को मेरे रक़ीब से मिला।
    मैं चाहता, उनके चेहरे पर तब़सूम हो।।3।।
     विकास कुमार

    किसी वज्म़ में मेरे रक़ीब ने मेरा कलाम सुनाया। सुनके अश्क भरे आये, मेरे महब़ुब की।।4।।
     विकास कुमार

    मेरे मर्ग पर रोयेंगे मेरे रकीब भी। देखेंगे मेरे नवाज भी।।5।।
     विकास कुमार

    मेरे रक़ीब रहीम-ओ- करीम ले।
    वो हिमायत करेंगे जहां की।।6।।
     विकास कुमार

    सुराग-ए-जिन्दगी कुछ यूँ हुआ।
    नवाजिश आज बातिल बना।।7।।
     विकास कुमार

    मेरे रब हमें ताकत-ए-परवाज दें की। मैं रकीब के लिए नूरी बनूँ।।8।।
     विकास कुमार

    किसी अंजुमन में सुराग-ए-जिन्दगी का चला। किसी फक़ीर ने रहीम-ओ-करीम का नाम लिया।।9।।
     विकास कुमार

    मेरे रहीम हमें वो इबादत दें कि।
    मैं तेरे घर से तेरी जीऩत चुरा लूँ।।10।।
     विकास कुमार

    मेरे इलाही, मेरे खुद़ा ! हमें वो इबादत दे। मैं खूद में देखूँ तेरी जीऩत देखूँ।।11।।
    विकास कुमार

    मेरे नवाजीश मैं तेरा इबादत करता। हमें सुराग-ए-जिन्दगी बता।।12।।
     विकास कुमार

    किसी अंजुमन में अब अपनी वस्ल न होगी। लव-ए-दार हूँ, जरा जीनत़ दिखा मेरी जां।।13।।
     विकास कुमार

    थक गया मय पी-पी कर।
    फैक-मस्ती में लुप्त-ए-बहार अच्छा नहीं।।14।।
     विकास कुमार

    तेरे बगैर अंजुमन में लुप्त-ए-बहार अच्छा नहीं। तेरे बगैर शव-ए-विसाल, लव-ए-दार है।।15।।
     विकास कुमार कमती।।

    आजकल तेरे दीदार होते नहीं, लगता है, तेरी आँखें बेवफा हो गई।16।।
     विकास कुमार

    तेरे वज्म़ में हम भी आयेंगे, तू तौहिन करना मेरी मुफ़लिसी की।।17।।
     विकास कुमार

    हमराह दुआ करेंगे, अपने ईलाही से, हमें गमे-ए-जहां दे। और अपने बंदे को फुर्शत-ए-गुनाह दें।।18।।
     विकास कुमार

    मेरे रक़ीब कहते मेरी माशुक ने तो तुझे रुसव़ा कर दिया। मेरे यार कहते है, तेरी जान ने तो तुझे फुर्शत-ए-गुनाह दी।।19।।
     विकास कुमार

    मेरे माशुक मेरी मुफ़लिसी की तौहीन करना। मैं चाहता, तेरे रक़ीब अपने आँगन में दो गुल देंखे।।20।।
     विकास कुमार

    हमें शर्म नहीं रुसवाई की, तू और तौहीन कर मेरी मुफ़लिसी की ।।21।।
     विकास कुमार

    कभी आया करो, मेरी जां, हम मुफ़लिसों के घर, हम पानी नहीं, प्रीत के अश्रु पीलाते हैं।।22।।
     विकास कुमार

  • शायरी संग्रह भाग 1

    मुहब्बत हो गयी है गम से,
    खुशियाँ अच्छी नहीं लगती।
    पहले दुश्मन मुहब्बत करते थे,
    अब दोस्त नफरत करते हैं।।1।।
     विकास कुमार कमति..
    बदलते वक्त के साथ,
    उसकी आँखें भी बदल गयी।
    पहले मुहब्बत भरी निगाहों से देखती थी,
    अब शक भरी निगाहों से।।2।।
     विकास कमार कमति..
    सुना था लड़की बेवफा होती,
    मौलिकता गुण होती,
    उनके रगों में बेवफाई की।
    आज पता चला,
    मर्दों की मंडी में भी बेवफाई बिकती।। 3।।
     विकास कुमार कमति..

    संजोते गये ख्या़बों की गठरियाँ,
    इक दिन ऐसी बरसात आयी की।
    उसकी डॉली निकली,
    और मेरी बारात, फर्क़ सिर्फ़ ये था कि वो।
    रो रही थी, और मैं हँस रहा था,
    क्योंकि वो जिन्दगी जीने जा रही थी।
    और मैं जिन्दगी जी चुका था।।4।।
     विकास कुमार कमति..

    मेरी इतनी औकात नहीं,
    कि मैं तेरे जुल्फें तले सो सकूँ।
    मेरे लिए मुहब्बत भरी निगाहें ही सही।।5।।
     विकास कुमार कमति…

    मेरी मुहब्बत कोई जिस्मानी संबंध नहीं,
    जो क्षणभर में लुप्त हो जायें।
    मेरी मुहब्बत तो इच्छा है,
    जो तेरे साथ ही जायेगी।।6।।
     विकास कुमार कमति…

    बहुतेरे को स्त्री ने बदल दी,
    कोई कालि बने, तो कोई तुलसी।
    अब मेरी बारी है, जरा हमें भी बदल दें।।7।।
     विकास कुमार कमति…

    जानता हूँ मैं, मुहब्बत करती हैं, मुझसे तू।
    तु कहने में शर्माती, मैं बोलने में लजाता।।8।।
     विकास कुमार कमति…

    तेरी अदायें देखकर,
    मुहब्बत हो गई तुमसे।
    तेरा व्यवहार देखकर,
    रोना आ गया खूद पे।।9।।
     विकास कुमार कमति…

    तेरी बेवफाई ने शायर,
    बना दिया मुझको।
    ऐ! दिले गुलजार,
    जरा वफा तो दिखा,
    इंसान बनने को जी चाहता।10।।
     विकास कुमार कमति..

    आग उधर भी लगी है, आग इधर भी लगी है।
    उधर सहनशक्ति ज्यादा,
    इधर बर्दाश्त करने का क्षमता कम।।11।।
     विकास कुमार कमति..
    साख की जमीं पर थमीं थी,
    अपनी मुहब्बत की मंजिल।
    जरा शक क्या हुआ ?
    खाक! में मिला दी।।12।।
     विकास कुमार कमति..
    तेरी हुस्न की तारीफ़, क्या करूँ? जानम!,
    नजर थमती नहीं तेरे बदन पे।
    जरा नजरें तो मिला,
    आँखों में समाने को जी चाहता।।13।।
     विकास कुमार कमति..

    थक गया हूँ, संसारिक ग्यान अर्जित करते-करते।
    अब आध्यात्मिकता में रूझान अच्छा लगता।।14।।

     विकास कुमार कमति..

    वक्त हर समस्या का समाधान होता है।
    वक्त के साथ चलना चाहिये।।15।।
     विकास कुमार कमति..

    मेरी प्रेरणा है तु, जरा रूख़ से नाकाब़ हटा।
    दुआ माँगता हूँ, रब से जीने के वास्ते।।16।।
     विकास कुमार कमति..

    रूठ़ गई जिन्दगी, तेरा इन्तजार करके।
    खो गई कहाँ तू, वफा करके।।17।।

     विकास कुमार कमति..

    क्यूँ सितम कर रही हो,
    इन बेवस-बेजुवान हवाओं पे।
    कसूर तो मेरा था, जो बाँधा था,
    जुल्फें तेरे कहने पर हमने।।18।।

     विकास कुमार कमति..

    रूठ गई जिन्दगी, तेरे जाने के बाद।
    कमबक्त! मौत भी नहीं आती,
    तेरे आने के बाद।।19।।

     विकास कुमार कमति..

    जी ली अपनी जिन्दगी,
    तुने किसी के जिन्दगी बर्बाद करके।
    जरा बता संगदिल! कैसी दिललग्गी रही।।20।।
     विकास कुमार कमति..

    मुक्त कर दो, इन बेवस हवाओं को।
    सितम ढ़ाने के लिए, मैं हूँ ना,
    हम पे ढ़ा लेना।।21।।

     विकास कुमार कमति..

    ना दौलत की कमी , न शोहरत की कमी,
    ना एैश्वर्य की कमी।
    एक कमी थी, तेरी वो खत्म हो गई,
    तेरे जाने के बाद।।22।।
     विकास कुमार कमति..

    कुछ दर्द तेरे जाने के बाद रहा,
    कुछ दर्द तेरे आने के बाद रहा।
    बीच का सिलसिला, यूँहीं बेकार रहा।।23।।
     विकास कुमार कमति..

    रूठ़ कर कहाँ चली मेरी जानम,
    जरा वक्त तो दे संभलने का।
    साथ-साथ बेवफाई निभायेंगे।।24।।
     विकास कुमार कमति..

    तेरी बेवफाई ने इक नया मोड़ दी।
    तु किसी और के साथ,
    और कोई और मेरे साथ चलीं।।25।।

     विकास कुमार कमति..

    रोता नहीं हूँ अब मैं,
    मेरे अश्क अब बहते नहीं।
    जब तुने जिन्दगी जी ली,
    किसी के साथ घर बसाकर।
    तो हमने भी वफा निभा दी,
    किसी और के साथ।।26।।

     विकास कुमार कमति..

    बिखड़ाकर जुल्फें न चला कीजिए जानम!।
    हम आशिको! को ऐसे न तड़पाया कीजिए जानम! ।।27।।
     विकास कुमार कमति..

    मत कर ग़ुरुर अपने हुस्न पर मेरी जां।
    ढ़ालता सभी का ये, बस इन्तेजारे वक्त का!।।28।।

     विकास कुमार कमति..

    वो वक्त भी क्या थी तेरे जानम,
    लाखों दिवाने मरते थे तुझपे।
    अब मैं मरता हूँ तेरे वास्ते! मुहब्बत के आस्थे।।29।।
     विकास कुमार कमति..

    तेरे जुल्फें को गुत्थें कभी,
    काश! हमारे पास बैठते।
    मँझधार में ना डूबते कभी,
    काश! तुम्हारे सहारे मिलते।।30।।
     विकास कुमार कमति..

    तेरी बेवफाई के किस्से,
    गैरों से सुनते, तो खंजर सा लगता दिल पे।
    ना जाने! कौन सी वो मनहूस घड़ी थी,
    जो दिल तुझपे लगी।।31।।
     विकास कुमार कमति..

    बेरहम! इतना तो रहम करता,
    अपने लिये ना सही।
    किसी और के लिए, तो छोड़ता।।32।।

     विकास कुमार कमति..

    तू वफा नहीं बेवफा है,
    तू रहमदिल नहीं, बेरहम है।
    तु, तु नहीं,मैं में गुम- गुम है।।33।।

     विकास कुमार कमति..

    छोड़ दी सारी दुनिया मैंने तेरे खातिर।
    तु छोड़ ना सकी, किसी को मेरे खातिर।।34।।

     विकास कुमार कमति.
    हमने वफा तुझसे की, तुमने किसी और से की।
    और उसने तिहि और से की। सच तो है– वफा कोई किसी से की ही नहीं।।35।।
     विकास कुमार कमति..

    सारा जहां सोता, तू भी सोती बेवफा बनकर। हम तेरे विरह में रात में रोते, और दिन में सोते।।36।।
     विकास कुमार कमति।।

    कुछ वक्त जो तेरे साथ गुजारे, वो वक्त नहीं तेरे हँसने और मुस्कुराने के दिन थे। कहाँ चली मेरी जां, विरह के आग में झोंक के, जाते-जा हवा तो देती जा।।37।।
     विकास कुमार कमति।।

    साथ-साथ ही अपनी डॉली उठेंगी, फर्क़ सिर्फ ये होगा। तेरे पिया तेरी घुंघट उठायेंगे, और मेरे पिया मेरे कफन।।38।।
     विकास कुमार कमति।।

    तेरे याद में लिखें हमने सैकड़ों शेर।
    ये शेर नही,अपनी मुहब्बत की दास्तां है।।39।।
     विकास कुमार कमति।।

    मेरे खूदा मेरे महबूब को सलामत करना। अगर गम हो, उन्हें तो दर्द हमें देना।।40।।
     विकास कुमार

    मेरी जां रूठ़ी हो, तुमझे क्या ? क्या आप नहीं जानते, क्रोध स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह है। मेरे दोस्त, मेरे भाई !, क्यूँ खफा हो ? मुस्कुराकर जिओ ना!।।41।।

     विकास कुमार

    जरा पूछ ए मेरे दोस्त इनसे, इन्हें मुफ़लिसी से इतनी मुहब्बत क्यूँ। इन्हें खेलने के लिए मुफ़लिस और झेलने के लिए रईस चाहिए, क्या यही इनकी मुहब्बत है?।।42।।
     विकास कुमार कमति।।

    तुझे देखूं को दिल को शकुन सा मिलता। तुझे ना देखूं तो मायूसी सी छाई रहती।।43।।
     विकास कुमार

    यह सच हैं कि आप जिससे मुहब्बत करते हो। वो भी आपको चाहता है, पर वो बोल नहीं सकता और आप कह नहीं कहते।।44।।
     विकास कुमार

    तु ऐसी ही करतुतें दिखाती रहो, अपनी संस्कारों की,और मैं लिखता रहुँ मानवोंहित के बारे में।।45।।
     विकास कुमार

    मानता हूँ,वक्त सभी जख़्मों का मरहम है। ये वक्त ही है। जो बेनाम रिश्ते बनाते है। कुछ दिल में बसते है,कुछ दिमाग में।।46।।
     विकास कुमार

    यह मन का लगाव भी कुछ अजीब सा होता है।
    जिसको लगी उसकी जुबां चली जाती है।।47।।
     विकास कुमार

    यह मन का लगाव भी कुछ अजीब सा होता।
    जिसको लगा वो जुबां रहते बेजुबां हो जाते।।48।।
     विकास कुमार

    वो राती में सोती,हम दिन में सोते।
    वो रात में भोग करती,हम दिन में योग करते।।49।।
     विकास कुमार

    प्यार दो व्यक्तियों के बीच का वह सम्बन्ध है। जिन्हें सिर्फ महसूस किया जा सकता है।।50।।
     विकास कुमार

    प्यार को परिभाषित करना,प्यार को अपमानित करने के समान है,क्योंकि समय और परिस्थिति के अनुकूल इनके अलग-अलग प्रकार हो सकते है।।51।।
     विकास कुमार

    प्यार करने वाले एक नदी के दो राही है। जो कभी नहीं मिलते है। प्यार एक एहसास का नाम है। यह ईश्वरीय देन है। यह सेवा का दूसरा नाम है।।52।।
     विकास कुमार

    कुछ दोस्त जो हमें प्रोत्साहित करते है। वो दोस्त नहीं,हमारी दिल की धड़कन व आत्मविभोर की कल्पना है। कुछ लोग जो चुप रहते हैं। वो हमारी सोच व चिंतन की विषय है। मेरी महबूब की हरकतें,मेरी लेख है,और उनकी वेबफाई मेरी कलम उठाने की वजह।।53 ।।
     विकास कुमार

    जो मुहब्बत करते,सो इजहार नहीं करते। जो इजहार करते सो,मुहब्बत नहीं करते।।54।।
     विकास कुमार

    इजहार दो प्रेमियों के बीच का सबसे सन्देहजनक शब्द है।।55।।
     विकास कुमार

    हमने कुछ ऐसी भी प्रेमिकाओं के देखा हैः- जो अपने प्रेमी के खतों को अखबारों में छपवाना पसंद करती है।।56।।
     विकास कुमार

    वो दुहाई देती रही अपनी सभ्यता का। मैं देखता रहा उनकी संस्कारों को।।57।।
     विकास कुमार

    तु अच्छी नहीं,बुरी है,क्योंकि तेरे अन्दर आत्मा नहीं,प्रेतात्मा का वास है। अतः तु अहंकार की दुनिया में खोई हुई एक बहुत ही सुन्दर खुबसूरत,हसीं,जवां बूत के स्वरूप में मेरे समझ खडी है। बता संगदिल क्या नाम दू तुझे।।58।।
     विकास कुमार

    तेरी महफ़िल में कुछ ऐसे भी तेरे यार-आशिक होंगे। जो तेरे दिलो-दिमागो,हुश्नो-शरीरों,आत्मा-रूहों व तेरी आबरू को भी लूटेंगे। तू बेह्या की तरह सबकी मनोकामना पूर्ण करेगी। हमने देखा है। तुझे जवान होते हुये भी. तू करतुते करती बच्चों वाली. दुहाई देती है. अपनी ऊँची आदर्शों सभ्यता-संस्कृति व भाषा की. और करतुतें करती विदेशों वाली।।59।।
     विकास कुमार

    तेरे साथ जो हुआ वो तेरे ही नादानी की सजा थी. अब उसके साथ जो होगा. वह उसके वेवफाई की सजा होगी. क्योंकि वह अच्छी थी. इसलिए उसके साथ बुरा हुआ. और मैं बुरा था. इसलिए मेरे साथ अच्छा हुआ।।60।।
     विकास कुमार

    जय श्री सीताराम ।।

    नाम विकास कुमार
    पिता भोल कमति
    माता फूलकुमारी देवी
    घर मोहनपुर
    राज्य बिहार
    जय श्री सीताराम ।।

  • शायरी संग्रह भाग 2 ।।

    हमने वहीं लिखा, जो हमने देखा, समझा, जाना, हमपे बीता ।।

    शायर विकास कुमार

    1. खामोश थे, खामोश हैं और खामोश ही रहेंगे तेरी जहां में । करतुते तो तु करती मेरी जहां में, हम तो हरवक्त खामोश रहते हैं तेरी जहां में ।।

     विकास कुमार

    2. अब कैसा सिला है वफा का, अब तो वो भी थक गई बेवफाई से । हम खामोश हैं, और वो शान्त ।।

     विकास कुमार

    3. मेरी सोच हैं तु, मेरी विचार है तु, मेरी शेर है तु, मेरी शायरी हैं तु, मेरी कलम उठाने की वजह है तु । हर चीज है जहां में तु मेरे लिए ।।

     विकास कुमार

    4. नादान थे हम, समझदार थे तुम । इसलिए तो बेवफा निकले तुम और तन्हा रहे हम ।।

     विकास कुमार

    5. किसी की जरूरत हो सकती हो तुम । मेरी तो बस ख्याब हो तुम । ख्याब थी, ख्याब है, और ख्याब ही रहेगी ।।

     विकास कुमार

    6. कुछ था, कुछ है और कुछ होंगे, अपनी जिन्दगी के अधुरे सपने । तु गैर के बाहों में सोयेगी, हम गहराइयों में डूब जायेंगे ।।

     विकास कुमार

    7. बिखड़ी जुल्फें देखकर यूँ ऐसा लगा कि अपनी जिन्दगी में बहार आने वाला है । कमबख्त़ दिल को क्या मालूम था? उन्हें तो बिखड़ाकर जुल्फें चलने की अदा है ।।

     विकास कुमार

    8. ये कीबोर्ड तो नहीं, ये जिन्दगी की राहें है । इसमें स्पीड नहीं, बारिकियाँ जरूरी है ।।

     विकास कुमार

    9. मोह रूलाती, मुहब्बत रूलाती और कुछ बेनाम रिश्ते भी रूलाती । कमबख़्त बेनाम जिन्दगी भी खुब रूलाती ।।

     विकास कुमार

    10. उसकी हर एक बेवफाई की सलीका से वाकिफ़ थे हम । फिर भी कमबख्त ये दिल! उनसे मुहब्बत कर बैठा ।।

     विकास कुमार

    11. वो मनाये और मैं रूठूँ, वो सिलसिला ना दे प्रभु! अब सदा-सदा के लिए खामोश कर दे प्रभु!

     विकास कुमार

    12. ये जुल्फ नहीं, ये तो घनघोर घटा है बादल की । कभी बरसे तो सावन के महीनों में ।।

     विकास कुमार

    13. हम उनको चाहे, वो किसी और को चाहे । कमबख्त ये मुहब्बत है या उलझी पहेली । कभी मरके जिये तो, कभी जी के मरे ।।

     विकास कुमार

    14. जहां की दौलत है जहां के पास, पर वो नहीं है, जहां के पास, जो हैं मेरे पास ।।

     विकास कुमार

    15. कभी ख्याबों में तेरी जुल्फें तले सोये थे हम । जहांवालों ने आग लगा दी तेरी जुल्फ में । रूठ़ गई तु, सोये रह गये हम ।।

     विकास कुमार

    16. बेरंग थी जिन्दगी रंग लायी थी तुम । कुछ साथ क्या छूटा? खो गये तुम, बिखड़ गये हम ।।

     विकास कुमार

    17. बेमतलब थी अपनी मुहब्बत, कमबख्त दिल हरवक्त मतलब ढ़ूढती । खोये-खोये थे तुम, बिखड़े-बिछड़े थे हम ।।

     विकास कुमार

    18. रूख ये वक्त का, कुछ तो साथ दिया । हम शायर बने तेरी शायरी का ।।
     विकास कुमार

    19. आती है मन में अभी-भी वो छवि । तेरा मुस्कुराना और खामोश रहना मेरा ।।
     विकास कुमार

    20. जहां के नियम है, जहां में । वो बदले गये जहां के साथ ।।
     विकास कुमार

    21. क्या हाल था? क्या हाल है? क्या हाल होगा? दोस्त ने दुश्मनी निभाई, दुश्मन ने दोस्ती निभाई । अब सिला है कैसा वफा का वेवफा भी वफा निभाई।
     विकास कुमार

    22. कुछ हद तक तेरी वेबफाई सही थी । अब वेबफाई भी तंग आ चुकी है तुझसे।

     विकास कुमार

    23. सवाल करें तो जवाब मिले, उनके आशिकों से । कमबख्त तेरी औकात क्या थी?

     विकास कुमार

    24. सबाल करें तो जवाब मिले, उनकी खामोशी का । वो हँस के बोले, अदा तो मेरी व्यवहार है जीने की ।।

     विकास कुमार

    25. थकती हैं मस्तिष्क आती है नींद, पर सोने का नहीं । ताजा होकर, फिर से पढ़ने, लिखने व कुछ नया सोचने का ।।

     विकास कुमार

    26. मुझे क्या मालुम था? मेरे शेर मुझे ही पलटवार करेगा । कमबख्त ये दिल का मामला है, कभी अश्क बहने नहीं दिया ।।

     विकास कुमार

    27. कभी देखकर मुस्कुराना, और सखियों (गैरों) से बात करना, उनकी आदत बन चुकी थी । अब वो दौर है, कमबख्त नजर तक नहीं मिलती ।।

     विकास कुमार

    28. तेरी हँसी को मुहब्बत समझे, वो नादान आशिक थे हम । हमारी आशियाना में आग लगायी, वो अहं लड़की थी तुम ।।

     विकास कुमार

    29. रूठ़ी मुहब्बत शेर नहीं लिखती, उनकी खामोशियाँ गुमनाम बाजार में बिकती है ।।

     विकास कुमार

    30. कभी नैनों से झर-झर झरते थे नीर, अब ना मुहब्बत रही ना लगाव ।।

     विकास कुमार

    31. कभी ख्याबों में जीते थे, अब वास्तविक में मरते है । उनके लिए जो कभी मेरे लिए कभी ख्याब में जीते थे, और कड़कड़ाती तेज धूप में कमाते हैं।।

     विकास कुमार

    32. मगरमच्छ के आँसु तो अब बहते नहीं, अब प्रीत के आँसु क्या बहाऊँ।।

     विकास कुमार

    33. अब दिन कटती है, चैन से । रात आती है नींद । वेपनाह थी तेरी मुहब्बत, और बेवफा थे हम ।।

     विकास कुमार

    34. उलझे-उलझे सुलझ गये हम । यार ने यारी दिखाई संभल गये हम ।।

     विकास कुमार

    35. लैला तो हम तुझे कह नहीं सकते, हीर तो तू हैं नही, सोहनी वाली तेरी आदत नहीं, जुलिएट की परछाई तुझमें कहीं देखती नहीं, बता संगदिल क्या नाम दूँ तुझे ।।

     विकास कुमार

    36. पत्थर बना था दिल मेरा, मोम बनाय था तुमने । अब रूठ़ी हो तुम, मनाते है हम ।।

     विकास कुमार

    37. हर दर्द की दवा हैं जहां में , कोई हँस के पीये तो कोई रो के ।।

     विकास कुमार

    38. मुस्कुराहट खामोशी की बात बयां करती ।।

     विकास कुमार

    39. खामोशियाँ इजहार की पहली पहल होती । जो समझते सो प्यार करते। कुछ दिल, कुछ दिमाग व कुछ जज़बात से खेलते ।।

     विकास कुमार

    40. बेवफाई की सजा और यारों की दगाबाजी इंसान को बहुत समझदार बना देता है । एक दिल मुहब्बत नहीं करता, और दूसरी विश्वास नहीं करता यारों पर ।।

     विकास कुमार

    41. दिल तोड़ना ही था, तो दिल लगाना ही क्यूँ? कहीं जाना ही था, तो फिर सुनसान बेरंग नगरी में अपनी जुल्फों की बहार व रंग की होली आया ही क्यूँ? कमबख्त! ये तेरी मुहब्बत है या दिल उजाड़ने की आदत । कभी हँस के रोये तो कभी रो के हँसे । तेरी बेवफाई का आलम भी कुछ ऐसा था । तुझे गैर की बाहों में सोना ही था. तो फिर अपनी बाहों का सहारा दिया ही क्यूँ?

     विकास कुमार

    42. जाओ नई सिरे से अपनी नयी जिन्दगी जीना । गैरों को भूलाकर, अपनों को याद करना, याद ये भी करना गैर दिल में और अपना दिमाग में बसते हैं । हर एक कदम सोच-समझकर उठाना । खेलने के खिलौने है जहां में हजार । किसी की जिन्दगी बनकर, किसी के जिन्दगी से मत खेलना । टूट जाते हैं, अक्सर वो रिश्ते, जिनकी बुनियाद शक की जमीं पर ठहरी होती, क्योंकि मुहब्बत साख की जमीं पर थमी होती । खास क्या लिखूँ मेरी जान! मेरी बुत! मेरी प्रेरणा!– जहां की खुशियाँ झुके तेरी कदम में , हर एक वला तेरी नसीब की लगे हमें।।

     विकास कुमार

    43. खेलने के लिये खिलौने हैं जहां में हजार । फिर ये कमबख्त! दिल ही क्यूँ जहां के लिये ।।

     विकास कुमार

    44. टूट जाते हैं, अक्सर वो रिश्ते जिनकी बुनियाद शक की जमीं पे ठहरी होती , क्योंकि मुहब्बत साख की जमीं पे थमी होती ।।

     विकास कुमार

    45. जहां भी टिप्पणियाँ करती, तुम अच्छी शेर लिखते हो । उन्हें क्या मालूम है? यह शेर है या हृदय की वेदना ।।

     विकास कुमार

    46. लाख मौके मिले थे तेरे जिस्म से खेलने के लिये । कमबख्त! दिल ने मुहब्बत की लाख रखी । हमें क्या मालूम था! तुझे हमसफर की जरूरत थी, जो तुझे गैरों में नसीब हुई ।।

     विकास कुमार

    47. वो गैर की दुनिया में कल भी खुश थी, आज भी खुश है । ना जाने! भावी काल उनके चेहरे पे मायूसी क्यूँ झलकाती? मेरे रब! मेरी महबूब, मेरी प्रेरणा, मेरी बुत को, फिर से उसके वह दिन लौटा दे । उसकी लबों की वो खुशियाँ लौटा दे । चाहे मेरी दुनिया की सारी खुशियाँ छीनले मुझसे । उन्हें हर खुशी दे ! मेरे रब!

     विकास कुमार

    48. गैर होकर भी अपने की तरह चाहा था तुम्हें । सारी दुनिया को छोड़, सिर्फ़ तुमको गले लगाया था हमने । कमबख्त! ये वक्त बेवफा है या अपनी मुकद्दर । ।

     विकास कुमार

    49. खुद का शेर , अब खुद से पढ़ा नहीं जाता । अपना हाल ही अब अपने से देखा नहीं जाता । उनसे मुलाकात हो तो पुछुँ ? -क्या हाल है अपनी? कैसी शेर है आपकी?

     विकास कुमार

    50. नये लोग, नयी शहर, नयी जहां मुबारक हो तुम्हें । जहां की सारी खुशियाँ नसीब हो तुम्हें ।।

     विकास कुमार

    51. तेरे साथ बिताये हर एक लम्हा को अपनी शेर में ढ़ालेंगे हम । तेरी बेवफाई की किस्से जहां को सुनायेंगे हम ।।

     विकास कुमार

    52. तेरे साथ बिताये हर एक लम्हा को अपनी शेर में ढ़ालेंगे हम । तेरी बेवफाई की किस्से दिल-ही दिल में दफनायेंगे हम ।।

     विकास कुमार

    53. जिन्दगी गुजरेंगी अब अगम जी के गीतों के साथ । क्योंकि बेवफाई की हर एक लब्ज़ बयां करती अगम जी अपनी आवाज के साथ ।।

     विकास कुमार

    54. ख्याब टूटी, दुनिया लूटी, बची है कुछ आसें । गैरों ने अपना कहा, और अपनों ने गैर । कमबख्त! दिल को क्या मालूम था? जिसे चाहा वो ही बेवफा निकला ।।

     विकास कुमार

    55. दिल में ही दफनेंगे अब वो सपने जो कभी साथ हमने देखे थे । साथ वो वक्त का मेहरबां, कभी हमने एकसाथ देखे थे ।।

     विकास कुमार

    56. मेरे सामने ही वह अपनी नयी जिन्दगी की तैयारियाँ शुरू करने लगी थी. वफा होकर बेवफाई की तरह गैर की जिन्दगी में जाना शुरू कर चुकी थी. अपना होकर भी गैरों की तरह बर्ताव करने लगी थी. निभाई की वफा की हर वह लम्हा, अपना बनकर. अब छोड़कर जा रही, गैर कहकर. पूछें जो! उनसे सवाल तो वो बोले मेरा जान क्या है तेरा हाल?

     विकास कुमार

    57. वो लाख कोशिश की थी इज़हार करवाने की । कमबख्त़ दिल ने खामोशी साधी थी । हमें क्या मालूम था? दिल की ये नादानी, हृदय की वेदना कहलायेंगी ।।

     विकास कुमार

    58. लाख कोशिशों के बावजूद भी तुझे भूलाया नहीं जाता । कमबख्त़! ये दिल का मामला है, दिल-ही-दिल में दफनाया नहीं नहीं जाता । किसे कहें अपनी दिल की दास्तां, दिल-ही-दिल में रखा नहीं जाता । तेरे साथ बिताये हर वह लम्हा याद किये बेगैर रहा नहीं जाता ।।

     विकास कुमार

    59. वो रहने वाली महलों में, मैं लड़का फुटपाथ का । उसकी हर एक अदा पे मरना । यही मेरा जज्बात था ।।

     विकास कुमार

    60. जहां के सारे-के-सारे बच्चें को लायेंगे हम तेरे मुहल्ले में और मिलकर खेलेंगे होली तेरे संगे में ।।

     विकास कुमार

    61. जहां की सारी-की-सारी रंगों को लायेंगे हम अपनी टोली में और मिलकर खेलेंगे होली तेरे संगे में ।।

     विकास कुमार

    62. जहां की सारी-की-सारी रंगों को बाँटंगे हम अपनी नन्हीं-नन्ही बच्चों की टोली में, और पुरी तैयारी के साथ आयेंगे हम तेरे मुहल्ले में, और खेलेंगे होली तेरे संगे में ।।

     विकास कुमार

    63. वो होली का दिन. वो रंगों का मौसम. वो बच्चों की टोली. वो फागुन का महीना, उपर से वो तेरा मुस्कुराना याद है कुछ!

     विकास कुमार

    64. वह होली का दिन. वह रंगों का मौसम. वह बच्चों की टोली. वह फागुन का महीना. वह बसंत-बहार का मौसम ,उपर से वह तेरा मुस्कुराना याद है कुछ!

     विकास कुमार

    65. मुहब्बत की नशा, प्यार की खामोशी, चाहत की रंग, लगाव का दर्द, इश्क का दुःख, स्नेह का आदर, प्रेम का समर्पण पवित्र होता है ।।

     विकास कुमार

    66. तेरा वह बेवफा होकर भी वफा निभाना याद है हमें । तेरा वह गैर होकर भी अपना बनाना याद है हमें । तेरा वह दुनिया में खोकर भी हमें पहचानना याद है हमें । तेरा वह हमारी हर एक नादानी पे मुस्कुराना याद है हमें । तेरा वह मेरा देखकर औ सखियों से बात करना याद है हमें । तेरा वह मेरा देखकर गैरों से बात करना और हमें तड़पाना याह है हमें । फिर वह समय का झोंका और हमारी मुहब्बत को रोका याद है हमें । फिर वह तेरा हमसे दूर होना याद है हमें । फिर वह तेरा नयी जिन्दगी जीना और मेरी जिन्दगी मायूस करना याद है हमें । फिर वह तेरा मेरा देखना और मेरा तेरा देखना याद है हमें । फिर वह तुझे अपनी दुनिया में खोना याह है हमें । फिर वह तेरा शुक्रिया अदा करना और मेरा यू.पी.एस.सी. क्लीयर करना याद है हमें । फिर वह तेरी दुनिया में पुनः आना और तेरा बार-बार शुक्रिया अदा करना याद है हमें । फिर वह तेरा मेरा बधाई देना और नयी जिन्दगी जीने की सलाह देना याद है हमें । फिर वह तेरा बार-बार मुस्कुराना और हमें देखना याद है हमें । फिर वह तेरा बार-बार शुक्रिया अदा करना और हमें समाज-सेवा में लगना याद हैं हमें । फिर वह हमें मौत की गोद में सोना और तेरा मेरा अधुरा कार्य पुरा करना याद है हमें- 3

     … विकास कुमार

    67. वह फागुन का महीना वह रंगों का मौसम । उपर से तेरा इतराना और मेरा रूठ जाना वह फागुन का महीना…. फिर वह तेरा रंगों में डूबना और हमें दिखलाना । वह फागुन का महीना…. फिर वह तेरा हँसना और हमें भी हँसाना । वह फागुन का महीना …. फिर वह तेरा रूठ जाना और बार-बार देखना । वह फागुन का महीना …. फिर वह तेरा रूठकर आना और हमें बार-बार मनाना । वह फागुन का महीना ….. फिर वह तेरे साथ हमें भी रगों में डूबना और तुझे भी डुबोना । वह फागुन का मौसम … फिर वह साथ-साथ कसम-वादे करना और तेरा हमें बार-बार देखना । वह फागुन का महीना …. फिर वह आँधियों को आना और हमदोनों को सावधान करना । वह फागुन का महीना … फिर वह समय का झोंका और हमदोनों को रोका । वह फागुन का महीना…. फिर वह साथ-साथ बिताये लम्हों का याद करना । वह फागुन का महीना…. फिर वह सभी सपनें को दिल-ही-दिल में दफनाना । वह फागुन का महीना …. फिर वह तेरा नयी जिन्दगी जीना और दिल-ही-दिल में रोना । वह फागुन का महीना …. फिर वह बार-बार समय को कोंसना और अपनी पुरानी बात को दुहराना । वह फागुन का महीना … फिर वह चुपके से जाना और खामोशियाँ साध लेना । वह फागुन का महीना …. वह रंगों का मौसम ।। …

     विकास कुमार

    68. एक शानदार टिप्पणी करने को जी चाहता । आपकी बातों को जिन्दगी में उतारने को जी चाहता । कमबख्त जिन्दगी किस रुख पे खड़ी है । उसे लौटाने को जी चाहता । किसी की हँसी को मुहब्बत समझा । उसकी परिणाम भुगतने को जी चाहता । वह गैर की दुनिया में खुश । हमें भी खुश रहने को जी चाहता । तोड़ के सारे बंधन अब नयी जिन्दगी जीने को जी चाहता । उसे कैसे कैसे कहुँ तेरे साथ बिताये हर एक लम्हा भुलाने को जी चाहता । तेरे साथ सोचे अब वो सारे सपने दिल-ही-दिल में दफनाने को जी चाहता । तेरे साथ किये हर वह कसम-वादे तुझे लौटाने को जी चाहता । तेरे साथ बिताये हुये एक लम्हा भुलाने को जी चाहता । तुझे भुलाने को कमबख्त दिल अब मजबुर नहीं करता । तुझे यह मन याद करके हृदय की वेदना की को भड़काना चाहता । हर वक्त तेरे यादों सु मुक्त होने को जी चाहता ।…

     विकास कुमार

    69. ऐसी रंग में खोयेंगे अबकी बार होली में । जहां की सारी-की-सारी कोशिशें नाकाम होगी हमें बेरंग करने में । जहां को ढ़ालेंगे हम अपनी रंगों में । वो लाख कोशिश करेगी हमें बेरंग करने की । फिर भी वो नाकाम रहेगी हमें असफल करने में ।

     विकास कुमार

    70. मुहब्बत की दुनिया में जुबां कुछ बयां नहीं करती, नहीं तो मुहब्बत की बदनामी होती है ।

     विकास कुमार

    71. कौन कहता है? रोना दुःख को दुर कर देता है । कभी मुहब्बत करके देखो । कमबख्त सीधे हृदय में वेदना होती है ।।

     विकास कुमार

    72. माना झुठी थी अपनी मुहब्बत. तेरी अदायें के काय़ल हो गये हम. अब रोते हैं हम. क्योंकि खोये हो तुम ..

     विकास कुमार

    73. पहली बार किसी युवती को हृदय की वेदना प्रकट करते हुये देखा है ।।

     विकास कुमार

    74. दूसरों की नापसंद की चिन्ता करना अपकी असफलता की पहली व आखिरी चरण है ।।

     विकास कुमार

    75. पैसे की भूखे लोग कभी-भी महान कार्य नहीं कर सकते हैं ।।

     विकास कुमार

    76. उँची उक्तियाँ, उँची सोच व उँजी आवाज में महान तथ्यों की व्याख्या अर्थात बोलने से कोई महान नहीं बन जाता है । अगर बन जाता तो आज सभी फिल्म जगत के सभी दिग्गज अभिनेता महापुरूष होते होते । लेकिन ऐसा है नहीं ।।

     विकास कुमार

    77. कितनी भी बेशकीमती बहुमूल्य भौतिक रत्न आपकी खुशी से ज्यादा मायने नहीं रखती । परमान्द की प्राप्ति तो अन्न-जल से ही होता है ।।

     विकास कुमार

    78. डॉली तो उठती है जहां में सबकी , कोई हँसके चढें तो कोई रो के ।।

     विकास कुमार

    79. वो जो तेरा बाहर राह ताकना और मायूस हो जाना, याद है कुछ !
    फिर वो संध्या का बेला, और सुरज का डुबना याद है कुछ !
    फिर वो चाँदनी रात, और तारों का चमकना याद है कुछ !
    फिर वह सुरज की आस, और ख्याबों में सो जाना याद है कुछ !
    फिर वह सुरज का उगना, और चिड़ियों का चहचहाना याद है कुछ !
    फिर वह नयी जिन्दगी की शुरूआत, और नये लोगों से मुलाकात याद है कुछ !
    याद है कुछ मेरी जां तुझे ।
    फिर वह अपना होकर गैरों से बात करना और हमें तड़पाना याद है कुछ !
    फिर वह गैरों से दिल को लगाना, और मेरा दिल तोड़ना याद है कुछ !
    फिर वह गैरों को दिल में बसाना, और हमें दिल से निकालना याद है कुछ !
    फिर वह गैरों को अपनी जुल्फों की छाँव में सुलाना, और हमें रातभर जगाना याद है कुछ !
    फिर वह बाहों का सहारा गैरों को देना, और हमें बेसहारा करना याद है कुछ !
    फिर वह तेरा बेवफा की तरह हँसना, और हमें रूलाना याद है कुछ !
    फिर वह तेरा चुपके से शादी करना, और मेरा संन्यासी बनाना याद है कुछ !
    फिर वह तेरा पिया के साथ रति (संभोग) और उन्हें पितृऋण से मुक्त करवाना,
    और हमें शायर, लेखक, दार्शनिक व बनाना याद है कुछ !

     विकास कुमार

    80. बदलते थे, बदलते हैं, और बदलते रहेंगे जहां में लोग हजार । पर जो वक्त का रूख बदल दें, वहीं कहलायें लाखों में महान ।।

     विकास कुमार

    81. गैरों से बात करते-करते वो थक गई थी मेरे बारे में । आखिरकार वो रोकर चली गई मेरी जिन्दगी से ।।

     विकास कुमार

    82. उसकी खामोशी देखकर, हमें ऐसा लगा किः- जैसा टूटा दिल मेरा और दर्द उसे हुआ ।।

     विकास कुमार

    83. तेरे जाने के खबर से ही हृदय में वेदना सी झलकती है । होंठ मुस्कुराकर हँसती, और हृदय में वेदना सी होती है ।।

     विकास कुमार

    84. तोड़ के दिल मेरा, वह किसी नये दिल के तलाश में चला । आज फिर कोई नादान आशिक हमारी तरह उसकी हँसी को मुहब्बत समझा ।।

     विकास कुमार

    85. तोड़ के दिल वह मेरा किसी नये दिल के तलाश में चला । आज फिर कोई नादान आशिक हमारी तरह उसकी मुहब्बत के जाल में फँसा ।।

     विकास कुमार

    86. सभी बात एक तथ्य पर आकर खत्म हो जाती है. किः- यहाँ हम जीने आये थे, और मरके चले गये ।।

     विकास कुमार

    87. सभी बात एक तथ्य पर आकर खत्म हो जाती हैं किः- यहँ हम मरने आये थे, और जी के चले गये ।।

     विकास कुमार

    88. दिल-ही-दिल में दफन गई वो सपनें जो कभी हमने साथ देखे थे । तेरा क्या था? तुझे तो किसी और को नयी जिन्दगी बनाया था ।।

     विकास कुमार

    89. तेरे साथ बिताये हर एक लम्हा को अपनी शेर में ढ़ालने को जी चाहता है । तेरी बेवफाई के किस्से को जहां को सुनाने को जी चाहता है ।।

     विकास कुमार

    90. उसे तो दिल से खेलने की आदत बन चुकी थी । कमबख्त! दिल को क्या मालुम था? वह पहले भी किसी के दिल से खेल चुका था ।।

     विकास कुमार

    91. गैर होकर भी उसने मुझे अपना बनाया था । अब हाल है, कैसा बेवफा का, अपना होकर भी गैर बनाया है ।।

     विकास कुमार

    92. उसे तो गैरों का सहारा पहले ही मिल चुका था । फिर, यह नादान दिल उनसे मुहब्बत क्यूँ कर बैठ चुका था?

     विकास कुमार

    93. मिलते हैं जहां में खिलौने खेलने के लिए हजार । फिर यह लोगों का शौक क्यूँ बनाया तोड़ने को दिल हजार ।।

     विकास कुमार

    94. खिलौने कम पड़ गये थे क्या? तुझे खिलौने के लिए जहां मे, जो तुझे इस कमबख्त मुफलिस गरीब का दिल ही सुझा । मिलते हैं जहां में खेलने के लिए खिलौने हजार, फिर यह कमबख्त मुफलिस गरीब का दिल ही क्यूँ तोड़ा ।।

     विकास कुमार

    95. तेरी रईसी ने मेरी मुफलिसी का अच्छा मजाक उड़ाया है । गैर के बाहों का सहारा बनके, तुने अपनी रईसी का औकात दिखाया है ।।

     विकास कुमार

    96. खिलौना समझके तोड़ा था दिल उसने मेरा । अब जा रही है कहीं गैर कहकर अपना ।।

     विकास कुमार

    97. तोड़ के दिल मेरा वह पुराना दोस्त चला । एक बेवफा हरजाई के कारण वर्षों का गहार रिश्ता तोड़ा था ।।

     विकास कुमार

    98. टूट के दिल मेरा पत्थर-सा बना था । आज फिर किसी की याद इस दिल में जगा ।।
     विकास कुमार

    99. हुश्न के बाजार में उसे आबरू लूटाने की आदत सी हो गई थी । हमें क्या मालूम था? उसे खूद का ही पहचान नहीं था ।।
     विकास कुमार

    100. कमबख्त क्या नजारा अंजुमन में एक दिल तोड़ के एक दिल जोड़ने जा रहा कोई ।।

     विकास कुमार

    101. कमबख्त क्या सलीका है बेवफाओं की जाने की इक जिन्दगी बर्बाद करके एक जिन्दगी जीने जा रही है ।।

     विकास कुमार

    102. कभी मुलाकात अगर हो मुहब्बत के खूदा से पूँछू मैं उनसे कमबख्त इस मुफलिसों को पत्थर क्यूँ बनाया?

     विकास कुमार

    103. अपनी अदा दिखाके हुश्न के बाजार में मेरा भाव लगाया तुमने । मिल गया कोई रईसजादा तो इस मुफलिस गरीब को ठुकराया तुमने ।।

     विकास कुमार

    104. मुहब्बत की जहां में मुफलिसों की आशियाना की मैय्यत उठती है । रईसजादी मुफलिसों के दिल से जी-भर के खेलती है और जब भर जाते हैं दिल तो रईसजादा से दिल जोड़ती जहां में ।।

     विकास कुमार

    105. बदुआ तो हम गैरों को भी नहीं देते, तुझे क्या खाक देगें? दुआ ही दुआ लगें, ये दुआ है तुम्हें ।।

     विकास कुमार

    पहली बार किसी युवती को हृदय की वेदना प्रकट करती हुये देखा है । इससे प्रतीत होता है किः- हर युवती बेवफा नहीं होती है ।।
    जमाने के रंग बदलते थे, बदलते हैं, और बदलते रहेंगे । लेकिन कुछ लोग अपनी सादगी, भाषा व संस्कृति को कभी नहीं बदलते । ऐसे ही लोग जहां में महान आत्मा के रूप में उभरते है ।।
     विकास कुमार

    नाम विकास कुमार
    पिता भोला कमति
    माता फुलकुमारी देवी
    घर मोहनपुर
    डाक-घर बरैठा
    पंचायत बसघट्टा
    थाना कटरा
    जिला मुजफ्फपुर
    राज्य बिहार
    देश भारत
    सम्पर्क सूत्र — 8340411428/9771607504

    जय श्री राम

  • अलग सी शायरी

    मित्र दिल के सैनिकों की
    जब खड़ी होंगी कतारें
    उन कतारों में विभूषित
    आप सेनापति रहें।

  • आपसे हम दूर रहकर

    जिन्दगी में मुश्किलें हैं,
    और भी तो अड़चनें हैं,
    आपसे हम दूर रहकर
    क्या हमेशा खुश रहे हैं।

  • बुरा नहीं हूँ मैं

    सख्ती से नहीं नरमी से पेश आएंगे
    किसी के प्यार में हम यह भी कर जाएंगे।
    यूं तो बुरे नहीं हैं हम साहब
    पर किसी के मार्गदर्शन में हम और सुधर जाएंगे।

  • मेरे गम! मुझे तू.……. (शायरी)

    मेरे गम!मुझे तू,
    इतना रुसवा ना कर ,
    मैं बारिश के इंतजार में हूं,
    फिर उसमें नहाकर ,सब आंसू बहाकर,
    तुझे हल्का-सा कर दूंगा।

  • इतनी दीवानी

    #shayri 2liner

    इतनी दीवानी नहीं हूँ तेरी
    जो तेरे प्यार में अपनी नब्ज काट लूंगी,
    ज्यादा तड़पाया जो तुमने
    इस रक्षाबंधन तुझको राखी बाँध दूंगी।

  • शायरी

    अभी-अभी धारा से उठे हैं ,
    चलना भी सीख जाएंगे,
    कभी उठेंगे तो कभी गिरेंगे,
    कभी बिना गिरे भी संभल जाएंगे।

  • आँखों में पानी लेकर…

    #shayri 2liner

    🤣 आँखों में पानी लेकर
    मुझे मत भरमाया करो।
    मैं तुम्हारी सारी हकीकत जानती हूँ
    यूं बातें ना बनाया करो।

  • दुःख-दर्द दूर हो मानव का

    चल मेरे प्यारे साथी
    अब असली कविता करते हैं।
    दुःख-दर्द दूर हो मानव का
    ऐसी कवितायें करते हैं।

  • करते कब हो मुझसे प्यार।

    खूब प्यार बरसाते बादल
    से सीखो तुम तुम भी मनुहार
    खाली-मूली बोल रहे हो
    करते कब हो मुझसे प्यार।

  • मेरा कातिल ,बड़ा शातिर!

    ये कातिलों का शहर है,
    जनाब!
    यहां किसी को गन से मार दिया;
    तो किसी को छुरे से ,
    मार दिया‌।
    मगर मेरा क़ातिल बड़ा ही शातिर है
    कम्बख़त ने इश्क से मार दिया।

  • मैं शिक्षक हूँ…

    मैं शिक्षक हूँ संसार में ज्ञान फैलाता हूँ
    अपनी कलम की धार को
    अपने साहित्य की तलवार बनाता हूँ।
    तुम जी लो तुम्हारे लिए यह नया मन्ज़र है
    मैं तो हर मन्ज़र के उस पार एक समंदर बनाता हूँ।

    🌹🌹शुभ रात्रि🌹🌹🎑

  • छोटी सोंच

    तुम्हारी छोटी सोंच मुझे हैरान करती है
    सदियों से मेरा अंदाज़ निराला है।
    बस तुम जैसों के ही पेट में दर्द होती है।
    चंद सिक्कों और ताज़ की जरूरत नहीं मुझको
    शोहरत तो अभिषेक के कदमों में होती है।

  • हुनर की पैमाइश

    मैं सिर्फ अपने हुनर की पैमाइश करता हूँ
    नुमाइश नहीं करता।
    सभी के साथ मोहब्बत से पेश आता हूँ
    पक्षपात नहीं करता।

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