दिल खोल कर त्यौहार मनाओ दिल खोल कर प्यार दे दो राखी में बहन आई होगी दिल खोलकर उपहार दे दो।1। रोज-रोज ठगता है आज तो कंजूसी छोड़ आज तो राखी है भाई आज तो […]

तू मुझे चाह ले संवर जाऊं।। या कहे टूट कर बिखर जाऊं।। रास्ता कौन मेरा तकता है लौटकर किसलिए मैं घर जाऊं।। तू सफ़र में हो तो ये मुमकिन है मैं संग-ए-मील सा गुज़र जाऊं।। […]

उलझन भरी जिंदगी में नींद के लिए समय ही कहाँ है जब समय होता है नींद आती ही कहाँ है। नींद भी जरुरी है इंसान के लिए पर इंसान जरुरी कहाँ है नींद के लिए। […]

मेरे इलाही मेरे रक़ीब को सलामत रखना। वो भी रोयेंगे मेरे मह़सर में।।1।।  विकास कुमार कमति मेर रक़ीब मेरे माशुक को गुल दे दो। वो समझेंगे हमराह शव-ए-विशाल है।।2।।  विकास मेरे इलाही मेरे […]

मुहब्बत हो गयी है गम से, खुशियाँ अच्छी नहीं लगती। पहले दुश्मन मुहब्बत करते थे, अब दोस्त नफरत करते हैं।।1।।  विकास कुमार कमति.. बदलते वक्त के साथ, उसकी आँखें भी बदल गयी। पहले मुहब्बत […]

हमने वहीं लिखा, जो हमने देखा, समझा, जाना, हमपे बीता ।। शायर विकास कुमार 1. खामोश थे, खामोश हैं और खामोश ही रहेंगे तेरी जहां में । करतुते तो तु करती मेरी जहां में, हम […]

सख्ती से नहीं नरमी से पेश आएंगे किसी के प्यार में हम यह भी कर जाएंगे। यूं तो बुरे नहीं हैं हम साहब पर किसी के मार्गदर्शन में हम और सुधर जाएंगे।

ये कातिलों का शहर है, जनाब! यहां किसी को गन से मार दिया; तो किसी को छुरे से , मार दिया‌। मगर मेरा क़ातिल बड़ा ही शातिर है कम्बख़त ने इश्क से मार दिया।

मैं शिक्षक हूँ संसार में ज्ञान फैलाता हूँ अपनी कलम की धार को अपने साहित्य की तलवार बनाता हूँ। तुम जी लो तुम्हारे लिए यह नया मन्ज़र है मैं तो हर मन्ज़र के उस पार […]

तुम्हारी छोटी सोंच मुझे हैरान करती है सदियों से मेरा अंदाज़ निराला है। बस तुम जैसों के ही पेट में दर्द होती है। चंद सिक्कों और ताज़ की जरूरत नहीं मुझको शोहरत तो अभिषेक के […]

किसी को मत गिराया करो लंगड़ी देकर, किसी को मत रोका करो टंगड़ी दे कर। दुनिया में तो कैसे कैसे पहलवान हैं, कमजोर को मत डराया करो धमकी देकर।

हंसता चहरा रो दिया, आचंल पूरा भीगो दिया, आज पहली बार। बन्जर है अब दिल की जमीं, शायद कुछ थी हम में ही कमी, मायूस दिल है रो दिया, लगता कुछ है खो दिया, आज […]

तुम्हारे हुस्न के मुट्ठीगंज में फंसकर इश्क़ अरैल घाट में डूब जाता है। दिल धड़कता था सिविल लाइन सा, अब यादों का कंपनी बाग बन जाता है।। ~सुरेंद्र जायसवाल (प्रतापगढ़)