‘तू करले जितना अपने दिल पे इख़्तियार मगर, निगाह जानती है उसकी, अपना वार मगर.. ये भी मुमकिन है आज पहली दफा बच जाए, मगर बचेगा कहाँ और कितनी बार मगर..’ – प्रयाग मायने : […]
‘तू करले जितना अपने दिल पे इख़्तियार मगर, निगाह जानती है उसकी, अपना वार मगर.. ये भी मुमकिन है आज पहली दफा बच जाए, मगर बचेगा कहाँ और कितनी बार मगर..’ – प्रयाग मायने : […]
गमज़दा सा हूं ;उसके लिए जो तुमने मेरे साथ किया। और बहुत ही निशब्द सा है, यह दर्द जो तुमने मुझे हर पल दिया। मगर रहे तू हमेशा बाग़-बाग़ , चल छोड़ो ! हमने तुम्हें […]
रास्ते जलमग्न हैं हर तरफ बरसात है, दूसरे की छतरियों में भीगते जज्बात हैं
जीवन में सबके होते हैं ऐसे लोग… जो रिश्तों महज खिलौना ही समझते हैं.. जब तक मन करता है खेल लेते हैं.. जब जी चाहे रिश्ते तोड़ देते हैं..
‘तेरे एहसास में रहूँगा मैं असर बनकर, या कभी दिल में ही साँसों की रवानी बनकर.. संभालकर मुझे रखना है इम्तेहान तेरा, अब मैं रहूँगा तेरी आँखों में पानी बनकर..’ – प्रयाग मायने : रवानी […]
कैसे रिश्ते और कहाँ के.. पल टूट ही जाते हैं.. अपना उल्लू ना सीधा हो तो खुद ही रिश्तों से मुकर जाते हैं..
हम खूबसूरती को अलग पैमाने से आंकते हैं, वे चेहरा देखते हैं, हम दिल में झांकते हैं। 1। हजारों बार कान भरे फिर भी हमें बदल नहीं पाये वे ऐसा क्यों करते हैं आशय नहीं […]
अपनी कुटिल मुस्कान से तू मुस्कुरा मत आज हम पर (भाजी बनाने को), आलू जरूरी हैं जरा सा दाम कम कर।
‘किसी की आह से महसूस हुआ है मुझको, कि बहुत दूर तक पहुँची है आज मौज-ए-लहू..’ – प्रयाग मायने : मौज ए लहू – खून की लहर
रोशनी आई अचानक बादलों ने घेर ली, दे गए खुद ही दिलासा आंख क्यों फिर फेर ली।
दूसरे को ठेस देने से पहले यह याद रखो चोट दिल पर लगेगी अहसास रखो चार दिन की जिंदगी में नफरत नहीं प्रेम पास रखो ककड़ी सी शीतल तासीर रखो जलेबी सी गर्म मिठास रखो […]
‘सोचता हूँ तो हर वजह ही बेवजह सी लगे, मेरी साँसों से मेरे दिल का वास्ता न होता तो क्या होता…? मुझ पर से गुज़र कर न जाने कितने चले गए, मैं औरो के मक़ाम […]
बहुत दिनों से ढूंढ रहा था, जिसे मैं डगर -डगर, वह मुझे घर के पास ही मिल गया। कौन कहता है विभीषण मर गया , जिंदा है वो, मुझे मेरे अपनो में ही मिल गया।
एटीएम सी है जिंदगी मेरी , जब तक कैश होता है, तब तक प्रेम की बरसात और लोगों की आवाजाही होती रहती है।
‘ये चाहता मैं भी हूँ के ठोकरें लगती रहें तेरी, तुझे मैं याद रख सकूँ, ये आग जलती रहे मेरी.. मेरे सब्र को मेरी बेबसी की इन्तेहाँ मत समझना, ये तूफाँ का इशारा है जो […]
‘हम तो समझ बैठे थे, ये काँटो की वफ़ा है, पर शुक्र हैं कि कभी नंगे पैर न थे..’ – प्रयाग
‘इतना कुछ लिखा गया फितरत किताबी आ गई, ज़िंदगी के मंच पर जुर्रत खिताबी आ गई.. उंगलियाँ उठी तो अल्फाजों को ताकत मिल गई, सवाल इतने उठ गए हाज़िरजवाबी आ गई..’ – प्रयाग मायने : […]
मुझे निगलने चला था , नाग-सा अभिमान मेरा, मगर मोर से संस्कार; मेरी मां के , मुझे बचा लेते हैं।
तल घिसा जूता समझ मुझको पहन मत बे-अकल काई लगे हैं रास्ते फिसलन अधिक है आजकल।
‘लड़ा था खुद से ज़मीं पर तेरी खुशी के लिए, फलक में रहके खुदा से भी जंग वही होगी..’ – प्रयाग मायने : फलक – आसमान
‘किस तरह रोकेगी गुज़रती हवा-ए-सर्द मुझे, ओढ़कर उसकी तमन्ना घर से निकलता हूँ मैं..’ – प्रयाग मायने : हवा ए सर्द – ठंडी हवा
इनायत की थी मैने कोई शिकायत नहीं। बेवजह कह गए वो आपसे कोई रिश्ता नहीं।।
“गौर से देख तू इस दिल के उजड़े मंज़र को, है जो खंडहर कभी आबाद हुआ करता था.. वो जिसे ‘अदना सा शागिर्द’ लोग कहते हैं, वो कभी इश्क में उस्ताद हुआ करता था..” – […]
‘यूँ बना खुद को के खुदा से भी ये कह सके, अब देखता हूँ तेरी आँधियों का करना क्या है..’ – प्रयाग
कोई मुझे समझाओं, मैं समझना चाह रहा हूं, ये ग़म की आंधी है, वो उड़ जाएंगी, ज़रा सा दिल्लासा दो, मैं तड़पे जा रहा हूं। अरे! कोई थोड़ा सा तो प्यार जताओ मुझे मैं तरसे […]
‘दिखा दिया ये तज़ुर्बा भी ज़िन्दगी ने हमें, हैं कितने शख्स ज़हर, और दवा है कितने.. न रोशनी को इल्म, न ही चिरागों को पता, है कितने बुझने और मंज़ूर-ए-हवा हैं कितने..’ – प्रयाग मायने […]
‘यही चलन सा हो गया है अब ज़माने का, हो जो खुदगर्ज़ी तो एहसान घट ही जाता है.. रास्ता कौन बदलता है किसी की खातिर, जो पेड़ बीच में आता है कट ही जाता है..’ […]
‘देखें ठोकर या फिर हम देखें सहारा उनका, कभी-कभी यूँ भी गिराते हैं संभालने वाले..’ – प्रयाग
‘बे-लौस किस ज़ुबाँ से कहें आज बशर को, साये में बैठकर भी काट डाला शजर को..’ – प्रयाग मायने : बे-लौस – नि:स्वार्थ बशर – इंसान शजर – पेड़
‘है ऐसा कुछ भी नही जिसको तू उजाड़ सके, मेरी नज़र में तूफाँ अब तेरी औकात नही..’ – प्रयाग
‘उथल-पुथल सी मुसलसल है ज़ेहन में मेरे, सुकून-ए-इश्क मगर बेशुमार है मुझमे..’ – प्रयाग मायने : मुसलसल – सिलसिलेवार/लगातार ज़ेहन – दिमाग सुकून ए इश्क – इश्क का सुकून
‘वो शख्स, खुद ही जो खाली हो अपने अंदर से, वो दूसरों को खालीपन के सिवा क्या देगा.. झूठ की परतों को परतों पे चढ़ाने वाले, तेरे किए का सिला अब वो आसमाँ देगा..: – […]
‘किनारे रखके ज़माने की नेमतें ए खुदा, मैं तुझसे माँगता फिरता था बस उसे लेकिन.. मेरी मासूम हसरतों को अधूरा करके, दर्द के काम आ गए वो हादसे लेकिन..’ – प्रयाग मायने : नेमतें – […]
गमों की बात ही न कर तू मेरे आगे, मुझे गम की नहीं उत्साह की जरूरत है। तेरी गलियों में आया चाह लेकर, मुझे बस प्यार की जरूरत है।
‘कुछ इस तरह ज़िन्दगी का फसाना बदल गया, वो क्या बदला कि सारा ज़माना बदल गया.. रिश्तों पर बेरूखी का असर कुछ यूँ हुआ, उसका रूठना बदला तो मेरा मनाना बदल गया..’ – प्रयाग
‘शायद कि उन ने जीस्त को बाजार था माना, वो हो अग्यार जिन्हें यार था माना..’ – प्रयाग मायने : जीस्त – ज़िन्दगी अग्यार – पराए लोग
‘न दुआ लगती है, न मुझको दवा मिलती है ज़ख्म दुखता है अगर उसको हवा मिलती है.. किसी तरह से उसे दिल से निकाला था मगर, वो अगले पल ही मुझे मुझमे रवाँ मिलती है.’ […]
‘गाँव में हाथ, कई हाथ थामे रखते हैं, शहर में खींचने को सिर्फ पांँव होता है.. तरक्की कहने को कितनी ही की हो शहरों ने, यूँ कुछ भी कह लो मगर गाँव, गाँव होता है..’ […]
‘ऐसे किरदार का यूँ भी है महकना वाजिब, कि नाम जिसका महज़ खुशबुओं से लिखा हो.. आखरी खत ये जो खाली सा नज़र आता है, यूँ भी हो सकता है कि आँसुओं से लिखा हो..’ […]
‘तुझे तो रोक न पाया, किसी तरह लेकिन शायद मैं तेरी याद को नाकाम कर सकूँ.. तू खुद नही मौजूद तो तेरा खयाल है, इतना तो दे दे वक्त के कुछ काम कर सकूँ..’ – […]
‘तेरे खयाल से बस ये सवाल पूछा है, किसी तरह से यूँ खुद को संभाल, पूछा है नही मिला है जब, कोई हमें अयादत को, तेरी ही बेरुखी से अपना हाल पूछा है..’ – प्रयाग […]
‘कुछ दुआ का असर है, कुछ दवा का असर है या फिर ये तेरे शहर की हवा का असर है.. दस्तकें देने लगी मोहब्बत ज़िन्दगी में अब, ये तेरे और मेरे दरमियां का असर है..’ […]
न उसे छोड़कर गया, न कभी जाऊँँगा इसी उम्मीद पर शायद वो ऐतबार करे.. मैं किये जा रहा हूँ अब भी मोहब्बत उससे, होके मजबूर वो कभी तो मुझसे प्यार करे.. – प्रयाग
मंजिल दूर है “राहत “, फिर भी इरादे बुलंद है। इसलिए तो आज भी मेहनत ज़िंदाबाद है।।
‘आज कहता है दिल कि एक फैसला कर दूँ तुझे दुनियाँँ के सारे सुख कहीं से लाकर दूँ.. तूने उस उम्र में सीने से लगाया हर पल, तुझे इस उम्र में कैसे मैं अकेला कर […]
न कोई सबूत ओ गवाह और ना कोई था निशां, सामने बैठकर कोई दिल को चुराया न करे..
खफा यूँ थे कि आज तक ज़िन्दगी ने, जो कुछ भी कहा, हमने माना ही नही..
बुरे वक्त में जो छोड़ जाए , सपने दिखाए और दिल तोड़ जाए, फिर अच्छे वक्त में वापिस लौट आए , उसे स्वार्थ ना कहें तो क्या कहें!
बात बहुत छोटी सी, मगर कंकड़ का पहाड़ बना देती है वो, कब तक उस पर अपना हक जताएं , पल भर में ही बेगाना बना देती है वो
मुश्किलों का कोई गम नही हमें, कि हर रास्ते पर मुस्कुरा कर चलते हैं.. ठोकरें हमें क्या ठोकर मारेंगी, हम तो खुद उन्हें ठुकरा कर चलते हैं.. – प्रयाग
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