चलो एक बार हम
फिर से दिखावा आज करते हैं
तुम पूँछो की कैसे हो ?
हम कह दें की अच्छे हैं।
अब तो रातों में रोना भी
हमको खूब आता है
बस एक बार तेरी बेवफाई
याद करते हैं।
Category: शेर-ओ-शायरी
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चलो एक बार..
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जलन
नारी के अनेक रुप मिले।
इसलिए पुरुष नारी से जले।। -
वक्त
वक्त के सिकन्दर से पूछो दोस्त कितनी ताक़त है वक्त में ।
ठोकरें खा के भी वक्त को झुकने नहीं दिया इस ज़माने में।। -
दरियादिली
गम की दरिया में मुझे दरियादिली नहीं मिला।
जो भी मिला सब एहसान फ़रामोश ही मिला।। -
हैसियत बना डाली
‘अब इतनी ऊँची अपनी हैसियत बना डाली,
कभी न खत्म हो वो कैफियत बना डाली..
तेरी यादें, तेरी हसरत का वो एहसास जुदा,
पुरानी चीज़ें थी बस मिलकियत बना डाली..’– प्रयाग
मायने :
कैफियत – उल्लेख
मिलकियत – प्रॉपर्टी -
बेबसी का सैलाब
बेबसी का सैलाब कुछ ऐसा आया ,
सब रिश्तों को बहा ले गया,
तंगी कुछ ऐसी हुई कि,
हर कोई हमसे; तंग-सा हो गया,
और जनाब!कोरोना तो वैसे ही;
हैं बदनाम ;आजकल
कोरोना से बुरा तो ,
हमारा वजूद हो गया। -
तबाही
अनजाने में इश्क का गुनाह कर दिया
बंदिशों से खुद को रिहा कर दिया
पाक रूह कहकर कभी सजदा करने
वाले अब कहते हैं मोहब्बत ने तबाह कर दिया -
ख्वाहिश
हम बेकार में ही परेशान हो गए
उनकी नजर अंदाजी से
उनकी ख्वाहिश तो हमसे दूर हो
हमें अर्श पर पहुंचाने की थी -
तेरी बेवफाई..
नज़रंदाजी को तेरी मैं मजबूरी समझती थी..
तेरी बेवफाई को ये प्रज्ञा प्यार कहती थी.. -
तुलसीदास
तेरे दर्द के बाद सोंचती हूँ मैं
क्यों जन्म दिया ऊपर वाले ने मुझे !!
ठोकर खाने के लिए
या तुलसीदास बनने के लिए !! -
मेरे दामन को..!!
मेरे दामन को सरेआम
दागदार कहता है,
गंदी नाली का कीड़ा है तू
गंगाजल को अपवित्र
कहता है..!! -
बेदिल किसे कहें..
‘बेदिल किसे कहें, ज़माने को या खुदा को ?
‘वो’ जो कुछ देता है नही, या ‘वो’ जो छीन लेता है..’ -
बिना धागे के
मुझे जख्म लगते ही
वो सिलने बैठ जाता था…
बात इतनी-सी थी कि
वो बिना धागे के सिलता था… -
तुम्हें नहीं मालूम…
तुम्हें नहीं मालूम ,
मगर मंसूबों को तेरे ,
मैं जान लेता हूं,
रहता हूं परेशान,
मगर; फिर भी
खुद को हर हाल में ,
संभाल लेता हूं,
और इत्तेफाक से
तुम्हारी आंखों और
लफ्जों का तालमेल,
बिगड़-सा गया है आजकल ,
बस !इन्हीं हरकतों से ,
तुम्हें पहचान लेता हूं,
इन्हीं हरकतों से ,
तुम्हें पहचान लेता हूं। -
बेघर
तेरे दिल में अगर जगह मिल पाती
हम बेघर न समझती ये दुनिया -
दिन थे वो यकीन के
चले थे मेरे साथ साजन
घर से यह कह के।
निभाएंगे साथ हम
रिश्ते है सौ जन्म के।।
थक गए है आज
कुछ ही दूर पैदल चल के।
मत हो उदास ए दिल
जो मुहब्बत कर गए
दिन थे वो यकीन के।। -
फिकर होंदी है..
जित्थे वेखां ते मेनू तू ही नज़र औंदी है,
के जेया तू ही रूह तू ही जिगर होंदी है..
तेनू सौ रब दी मेनू छड न कदे वी जाणां,
मेनू हर वक्त हूण तां तेरी फिकर होंदी है..– प्रयाग
मायने :
वेखां – देखूँ
औंदी है – आती है
जेया – जैसे
हूण तां – अब तो -
आँसू हुए शुमार जब..
‘समंदर समझ रहा था कि मौजें यूँ ही बनी,
आँसू हुए शुमार कुछ, तब जाके कहीं बनी..’– प्रयाग
मौजें – लहरें
शुमार – गिनती में शामिल होना -
हक़
इतने मशरूफ हो गए हम
औरों में ए- ज़िंदगी…
कि भूल ही गए…
तुझ पर हमारा भी तो
कोई हक था। 😞😒💔
HEMANKUR❤️ -
परख
तेरे प्यार का दर्पण हूं,
मुझे पर रखना छोड़ दे|
कब तक सताएगी तू मुझे,
अब मुझे परखना छोड़ दे|(1)इश्क किया हूं कोई गुनाह नहीं
तुझे चाहा हूं क्या विश्वास नहीं|
आ गले लगा जा फिर से मेरे,
मत परख अब समय नहीं|(2) -
यादें
चंद लम्हे यादों के, जीना सिखा गए
वरना, ज़िन्दगी जीना आसान नहीं होता। -
गोधूलि
फिर वही ढलती गोधूलि मन में एक एहसास जगा दिया।
नादान था दिल, बिना सोचे दिल दग़ाबाज़ को दे दिया।। -
वादा
आंखों में नमी है,मगर रोती नहीं हूं मैं,
किसी से किया हुआ,एक वादा पुराना याद आया। -
मैं अपनी याद ..
‘मैं अपनी याद तेरे दामन से समेट लूँ तो मगर,
तेरे हिस्से की कोई खुशी न साथ आ जाए..’– प्रयाग
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नाकाम
हम दो जिस्म
एक जान हो कर भी
ज़माने को हम
कहाँ झुका पाए
आज फिर ज़माना
मुहब्बत पे भारी पड़ी
आखिरी बार भी तुम्हें
कहाँ गले लगा पाए। -
क़ाबिल
ए कविता चल आज कवियों के अंजुमन में।
शायद दीदार के क़ाबिल हो जाए उनके अंजुमन में।। -
आरज़ू
‘ज़िंंदगी को इतनी हसरत से नही देखा कभी,
जितनी तेरा साथ पाने की है मुझमे आरज़ू..’– प्रयाग
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मैं आग था पहले..
‘बुझा गया है कोई, मैं चिराग था पहले,
जो जगह आज बंज़र है, बाग था पहले..
बदल ली करवट कुछ इस कदर तकदीर ने,
डरता हूँ आज धुएँ से, मैं आग था पहले..’– प्रयाग
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उन्वान
‘उन्वान-ए-किताब-ए-ज़िन्दगी था रखा कुछ और,
लिखा कुछ और, छपा कुछ और, दिखा कुछ और, पढ़ा कुछ और..’– प्रयाग
मायने :
उन्वान ए किताब ए ज़िन्दगी – ज़िन्दगी की किताब का शीर्षक -
मैं छोड़ आया हूँ..
‘बेवजह ही है मुझसे जुड़ी हर उम्मीद तेरी,
क्या तेरे दिलो-ज़ेहन में खयाल नही उठता..
मैं छोड़ आया हूँ अभी-अभी समंदर को,
तेरी झील का रुख करने का सवाल नही उठता..’ -
मैं गुनहगार ही सही..
‘मैं गुनहगार ही सही उनका फकत लेकिन,
मैं शाद हूँ कि किसी तरह उनका तो हूँ..’– प्रयाग
मायने :
फकत – सिर्फ
शाद – खुश -
उफान-ए-समंदर
‘कैसे रोकेगा मेरे इरादों को ये उफान-ए-समंदर,
आतिश को दबाए रखा है आगज़नी के लिए..’– प्रयाग
मायने :
उफान-ए-समंदर – समुद्र का उफान
आतिश – चिंगारी -
माना कुछ बुराईयां…..
माना कुछ बुराईयां है मुझमें,
मगर सारी अच्छाईयां नहीं है तुझमें,
फर्क इतना-सा ,
मैं हुबहु कहता,
और तू बनाकर। -
जिससे ठोकर लगी मेरी…
जिससे ठोकर लगी मेरी,
एकाएक वो पत्थर बोला!
माना गिरे हो तुम,
मगर इतने भी नहीं गिरे हो तुम,
जो गिरते ही रहोगें हरदम। -
तमीज़दार
‘उँगली उठा तो दी हमने, पर साबित क्या करेंगे,
वो तमीज़दार भी इतने हैं कि पत्थर खुद नही फेंकते..’– प्रयाग
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सुर्खियों में..
‘वो मेरी बेबसी का इश्तिहार देने निकले हैं,
बतौर वजह सुर्खियों में कहीं खुद भी न आ जाऐं वो..’– प्रयाग
मायने :
बतौर वजह – वजह के तौर पर -
फिर गया हूँ मैं..
‘न देखा उसने इक दफा भी कभी,
के किन तूफानों से घिर गया हूँ मैं..
उसकी शिकायत है आज भी वही मुझसे,
कि अपने वादों से फिर गया हूँ मैं..’– प्रयाग
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सज़ा
हमने कभी बयां नहीं किया,
आदत नहीं थी गम बताने की।
वो भी नहीं समझे दर्द मेरा,
यही सज़ा मिली गम छिपाने की। -
ज़िन्दगी शायरी
जिंदगी में ये हुनर भी आजमाना चाहिए,
अपनों से हो जंग तो हार जाना चाहिए।और शायरी पढ़े : ज़िन्दगी शायरी
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…क्या कम है?
कौन कहता है, पुरुषों के जीवन में रौशनी नहीं है।
उनकी अर्धांगिनी की बिंदिया क्या रौशनी से कम है।। -
मैं आग में पला हूँ..
‘हर आग से वाकिफ हूँ मैं, हर वक्त मैं जला हूँ,
वो क्या जलाएगी मुझे, मैं आग में पला हूँ..’– प्रयाग
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तस्वीर हुआ जाता हूँ..
‘दे दे कोई तदबीर मुझे हरकत में रहने की,
मैं उसके तसव्वुर में तस्वीर हुआ जाता हूँ..’– प्रयाग
मायने :
तदबीर – तरकीब/उपाय
तसव्वुर – सोच/विचार -
साक्षात…..
युग युग से नारी पुरुष के हाथों, छलती आई।
तभी तो नारी आज की साक्षात देवी कहलाई ।।
—प्रधुम्न अमित -
आगाह किये देता हूँ…
‘आगाह किये देता हूँ मैं ज़माने की ठोकर को,
मैं ज़मीं पे पड़ा पत्थर नही, ज़मीं में गढ़ा पत्थर हूँ..’– प्रयाग
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उम्मीद-ए-जहाँ
‘यही हकीकत है मेरी, मैं उम्मीद-ए-जहाँ का पुलिंदा था,
मैं तब तक मरता रहा, जब तक कि मैं ज़िंदा था..’– प्रयाग
मायने :
उम्मीद ए जहाँ – दुनियाँ की उम्मीद
पुलिंदा – ढेर -
मुकम्मल
‘जा चुका होता मैं कब का इस जहाँ से,
किसी से किये वादे, गर अधूरे नही होते..
वो किया करते हैं औरों के ख्वाब मुकम्मल,
जिनके खुद के ख्वाब कभी पूरे नही होते..’– प्रयाग
मायने :
गर – अगर
मुकम्मल – पूर्ण -
जिसका ज़िक्र नही..
‘वो हादसा के सलीके से जिसका ज़िक्र नही,
और कुछ लोग थे जो सुर्खियों में आते रहे..
मदद के वास्ते लाज़िम थे कई हाथ मगर,
वो सारे हाथ फकत वीडियो बनाते रहे..’– प्रयाग
मायने :
सलीके से – स्वाभाविक ढंग से
लाज़िम – अनिवार्य
फकत – सिर्फ -
आपके लिए तो…
आपके लिए तो केवल वो शब्द थे,
जो निकल गए जुबान से,
मगर जो आघात हुए हैं हृदय से,
उनकी खता तो बताइए ,जनाब! -
उनसे की न गई..
‘फितरत-ओ-आदत की बात है के मोहब्बत,
उनसे की न गई, हमसे भुलाई न गई..’– प्रयाग
मायने :
फितरत ओ आदत – फितरत और आदत -
अनजान
अनजान बन कर चैन से जीने वाले ।
तू क्या जाने कौन गोरा कौन काले।।