‘उन्वान-ए-किताब-ए-ज़िन्दगी था रखा कुछ और, लिखा कुछ और, छपा कुछ और, दिखा कुछ और, पढ़ा कुछ और..’ – प्रयाग मायने : उन्वान ए किताब ए ज़िन्दगी – ज़िन्दगी की किताब का शीर्षक

‘बेवजह ही है मुझसे जुड़ी हर उम्मीद तेरी, क्या तेरे दिलो-ज़ेहन में खयाल नही उठता.. मैं छोड़ आया हूँ अभी-अभी समंदर को, तेरी झील का रुख करने का सवाल नही उठता..’

हमने कभी बयां नहीं किया, आदत नहीं थी गम बताने की। वो भी नहीं समझे दर्द मेरा, यही सज़ा मिली गम छिपाने की।

‘दे दे कोई तदबीर मुझे हरकत में रहने की, मैं उसके तसव्वुर में तस्वीर हुआ जाता हूँ..’ – प्रयाग मायने : तदबीर – तरकीब/उपाय तसव्वुर – सोच/विचार

‘यही हकीकत है मेरी, मैं उम्मीद-ए-जहाँ का पुलिंदा था, मैं तब तक मरता रहा, जब तक कि मैं ज़िंदा था..’ – प्रयाग मायने : उम्मीद ए जहाँ – दुनियाँ की उम्मीद पुलिंदा – ढेर

‘जा चुका होता मैं कब का इस जहाँ से, किसी से किये वादे, गर अधूरे नही होते.. वो किया करते हैं औरों के ख्वाब मुकम्मल, जिनके खुद के ख्वाब कभी पूरे नही होते..’ – प्रयाग […]

‘वो हादसा के सलीके से जिसका ज़िक्र नही, और कुछ लोग थे जो सुर्खियों में आते रहे.. मदद के वास्ते लाज़िम थे कई हाथ मगर, वो सारे हाथ फकत वीडियो बनाते रहे..’ – प्रयाग मायने […]

‘निकलती है नेक मकसद को, मुकम्मल वो दुआ होती है, नही होती दुआ अकेली कभी, साथ क़ुव्वते-दुआ होती है..’ – प्रयाग मायने : मुकम्मल – पूरी क़ुव्वते दुआ – दुआ की ताकत

‘देर न लगी मेरी हकीकत के मायने बदलने में, मैं दरिया था कभी मोहब्बत का, आज दिल्लगी का ज़रिया हूँ..’ – प्रयाग मायने : ज़रिया – साधन

चलो ‘मैं’ को, ‘मैं’ से लड़ाते हैं! जीतकर , फिर ‘मैं’ से ‘हम’ बनाते हैं। विशेष–> यमक अलंकार का प्रयोग एक “मैं ” अपने आप के लिए दूसरा ” मैं ” अहंकार के लिए

हम वो शख्स नहीं जो, गड़े मुर्दे को भी कब्र में सोने न दे। मुद्दत बाद नींद आयी है कम से कम कुछ पल सोने तो दे।।

हमने दर्द को दावत दे दिया अपनी गुलिस्ताँ में। देखें क्या रंग लाती है इन अमीरों के अंजुमन में।।