‘उन्वान-ए-किताब-ए-ज़िन्दगी था रखा कुछ और, लिखा कुछ और, छपा कुछ और, दिखा कुछ और, पढ़ा कुछ और..’ – प्रयाग मायने : उन्वान ए किताब ए ज़िन्दगी – ज़िन्दगी की किताब का शीर्षक
‘उन्वान-ए-किताब-ए-ज़िन्दगी था रखा कुछ और, लिखा कुछ और, छपा कुछ और, दिखा कुछ और, पढ़ा कुछ और..’ – प्रयाग मायने : उन्वान ए किताब ए ज़िन्दगी – ज़िन्दगी की किताब का शीर्षक
‘बेवजह ही है मुझसे जुड़ी हर उम्मीद तेरी, क्या तेरे दिलो-ज़ेहन में खयाल नही उठता.. मैं छोड़ आया हूँ अभी-अभी समंदर को, तेरी झील का रुख करने का सवाल नही उठता..’
‘मैं गुनहगार ही सही उनका फकत लेकिन, मैं शाद हूँ कि किसी तरह उनका तो हूँ..’ – प्रयाग मायने : फकत – सिर्फ शाद – खुश
‘कैसे रोकेगा मेरे इरादों को ये उफान-ए-समंदर, आतिश को दबाए रखा है आगज़नी के लिए..’ – प्रयाग मायने : उफान-ए-समंदर – समुद्र का उफान आतिश – चिंगारी
माना कुछ बुराईयां है मुझमें, मगर सारी अच्छाईयां नहीं है तुझमें, फर्क इतना-सा , मैं हुबहु कहता, और तू बनाकर।
जिससे ठोकर लगी मेरी, एकाएक वो पत्थर बोला! माना गिरे हो तुम, मगर इतने भी नहीं गिरे हो तुम, जो गिरते ही रहोगें हरदम।
‘उँगली उठा तो दी हमने, पर साबित क्या करेंगे, वो तमीज़दार भी इतने हैं कि पत्थर खुद नही फेंकते..’ – प्रयाग
‘वो मेरी बेबसी का इश्तिहार देने निकले हैं, बतौर वजह सुर्खियों में कहीं खुद भी न आ जाऐं वो..’ – प्रयाग मायने : बतौर वजह – वजह के तौर पर
‘न देखा उसने इक दफा भी कभी, के किन तूफानों से घिर गया हूँ मैं.. उसकी शिकायत है आज भी वही मुझसे, कि अपने वादों से फिर गया हूँ मैं..’ – प्रयाग
हमने कभी बयां नहीं किया, आदत नहीं थी गम बताने की। वो भी नहीं समझे दर्द मेरा, यही सज़ा मिली गम छिपाने की।
जिंदगी में ये हुनर भी आजमाना चाहिए, अपनों से हो जंग तो हार जाना चाहिए। और शायरी पढ़े : ज़िन्दगी शायरी
कौन कहता है, पुरुषों के जीवन में रौशनी नहीं है। उनकी अर्धांगिनी की बिंदिया क्या रौशनी से कम है।।
‘हर आग से वाकिफ हूँ मैं, हर वक्त मैं जला हूँ, वो क्या जलाएगी मुझे, मैं आग में पला हूँ..’ – प्रयाग
‘दे दे कोई तदबीर मुझे हरकत में रहने की, मैं उसके तसव्वुर में तस्वीर हुआ जाता हूँ..’ – प्रयाग मायने : तदबीर – तरकीब/उपाय तसव्वुर – सोच/विचार
युग युग से नारी पुरुष के हाथों, छलती आई। तभी तो नारी आज की साक्षात देवी कहलाई ।। —प्रधुम्न अमित
‘आगाह किये देता हूँ मैं ज़माने की ठोकर को, मैं ज़मीं पे पड़ा पत्थर नही, ज़मीं में गढ़ा पत्थर हूँ..’ – प्रयाग
‘यही हकीकत है मेरी, मैं उम्मीद-ए-जहाँ का पुलिंदा था, मैं तब तक मरता रहा, जब तक कि मैं ज़िंदा था..’ – प्रयाग मायने : उम्मीद ए जहाँ – दुनियाँ की उम्मीद पुलिंदा – ढेर
‘जा चुका होता मैं कब का इस जहाँ से, किसी से किये वादे, गर अधूरे नही होते.. वो किया करते हैं औरों के ख्वाब मुकम्मल, जिनके खुद के ख्वाब कभी पूरे नही होते..’ – प्रयाग […]
‘वो हादसा के सलीके से जिसका ज़िक्र नही, और कुछ लोग थे जो सुर्खियों में आते रहे.. मदद के वास्ते लाज़िम थे कई हाथ मगर, वो सारे हाथ फकत वीडियो बनाते रहे..’ – प्रयाग मायने […]
आपके लिए तो केवल वो शब्द थे, जो निकल गए जुबान से, मगर जो आघात हुए हैं हृदय से, उनकी खता तो बताइए ,जनाब!
‘फितरत-ओ-आदत की बात है के मोहब्बत, उनसे की न गई, हमसे भुलाई न गई..’ – प्रयाग मायने : फितरत ओ आदत – फितरत और आदत
अनजान बन कर चैन से जीने वाले । तू क्या जाने कौन गोरा कौन काले।।
मुद्दत बाद आज ही नहाया हू़ँ अपने अश्क ए तालाब में। कहीं कोई काली नैनो़ से देखा तो नहीं मुझे नहाते हुए।।
पागल पुकारो आवारा पुकारो या तुम दीवाना पुकारो। जो भी पुकारो जरा प्यार से अपना कह कर पुकारो।।
‘निकलती है नेक मकसद को, मुकम्मल वो दुआ होती है, नही होती दुआ अकेली कभी, साथ क़ुव्वते-दुआ होती है..’ – प्रयाग मायने : मुकम्मल – पूरी क़ुव्वते दुआ – दुआ की ताकत
‘दिल में छिपाए रखोगे, जज़्बात कब तलक, इतनी ही हुई बात बस नज़रों से अब तलक..’ – प्रयाग
‘देर न लगी मेरी हकीकत के मायने बदलने में, मैं दरिया था कभी मोहब्बत का, आज दिल्लगी का ज़रिया हूँ..’ – प्रयाग मायने : ज़रिया – साधन
चलो ‘मैं’ को, ‘मैं’ से लड़ाते हैं! जीतकर , फिर ‘मैं’ से ‘हम’ बनाते हैं। विशेष–> यमक अलंकार का प्रयोग एक “मैं ” अपने आप के लिए दूसरा ” मैं ” अहंकार के लिए
‘चारागरों, हम में से किसी एक का इलाज करो, आज़ार उन्हें नफरत का है, तो हमें मोहब्बत का..’ – प्रयाग मायने : चारागर – डॉक्टर आज़ार – रोग
वो ना जाने कहाँ रहते हैं आज कल, हमें उनके दीदार का इन्तजार है… बड़ा मीठा बोलतें हैं वो, हमें उनकी हाँ का इन्तजार है..
मेरे इश्क के बीमार नजर आ रहे हैं.. बड़े सीधे सरकार नजर आ रहे हैं..
आँखों से हुई थी अश्कों की बरसात। याद है मुझे वो थी बरसात की रात ।।
‘छोड़ गए थे इसी जगह, अब चलना मुनासिब नही, वो लौट आए तो मेरी जुस्तजू में परेशां होंगें..’ – प्रयाग मायने : जुस्तजू : तलाश
शिकवा है मुझे उससे, जिसने लिखी हैं अधूरी कहानियां, क्यों कराया था मिलन, गर परवान- ए- मोहब्बत की औकात ना थी। AK
बहुत आ रहे हैं लोग ; आजकल ,पास तुम्हारे ! पहले तो नहीं आते थे , सच बताओ ये रजा क्यों है, डॉक्टर हो शायद ,स्वार्थ के! सच तो बताओ , वजह क्या हैं?
माना शराफत भली हैं ,इंसानियत के लिए, मगर, हे मानुष ! ज्यादा युधिष्ठिर ना बन, तेरे आस-पास सुगनी बहुत रहते हैं।
जिंदगी कितनी सुलझी हुई है, अगर हम माहिर हो उसे सुलझाने में।
मेरे दिल ने एक सवाल किया.. आज लखनऊ का मौसम कैसा है? हूबहू मेरे महबूब जैसा है..
हम वो शख्स नहीं जो, गड़े मुर्दे को भी कब्र में सोने न दे। मुद्दत बाद नींद आयी है कम से कम कुछ पल सोने तो दे।।
हमने दर्द को दावत दे दिया अपनी गुलिस्ताँ में। देखें क्या रंग लाती है इन अमीरों के अंजुमन में।।
जो कभी दुश्मन था मेरा, वो आज मुझसे हमदर्दी रखता, ये मेरा दर्द ही अब मुझे , आजकल तसल्ली देता है।
आ सनम तुझे मैं आज, अपनी इन गेसूओं में छुपा लूं। ए आँखें बंद होने से पहले, मैं तुझे आँखों में बसा लूं।।
जितना रोकूं उतना ही बहते , दर्द का किस्सा पल में कहते, आंसू मेरे बड़े ही मनमाने-से, जरा सी बात पर बहते रहते।
‘ये रब करे कि मोहब्बत मेरी असर कर ले, वो दिल को भेज दे, दिल को ही नामाबर कर ले..’ – प्रयाग मायने : नामाबर – डाकिया
नारी है वह यह मत समझ वह तो हुनर की रात है… एक बीमारी से वह लड़ रही है बस यही दु:ख की बात है…
उम्र में एक छोटे जीव के पीछे बड़े दिग्गज पड़े हैं. और कहते हैं हम रिश्ते में उनके करीबी ही रहे हैं…
अगर दर्द समझता तू तो अपनी हरकतों पर शर्मिन्दा होता.. अलग-अलग पहचान से यूँ ताने ना मार रहा होता…
दिल दुखाने की बात ना कर तो अच्छा है एक दिन तुझे सब छोड़ जाएगे.. रह जाएगा बस तेरा ही निशान बाकी तो सब तेरी बातों से ही मर जाएगे..
खाली कविता नहीं करते हैं दर्द भी समझते हैं, दूसरों को दिया हुआ भी, दूसरों से लिया हुआ भी।
अपने दिल का हाल हमें न सुनाओ, हम तो मजाक बना देंगे, बेदर्द राही हैं हम तुम्हारे दर्द पर कविता बना देंगे।
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