अजैविक गम
February 20, 2016 in शेर-ओ-शायरी
अजैविक गम की खाद से
ख़ुशी हो गई बोन्साई
राजेश’अरमान’
by rajesh arman
by rajesh arman
February 20, 2016 in शेर-ओ-शायरी
होठों पे ख़ामोशी की लहरें
ढूंढ़ती है लफ़्ज़ों के समुन्दर
राजेश’अरमान’
by rajesh arman
February 20, 2016 in शेर-ओ-शायरी
कुछ तो बात है तेरे शहर की
ये ज़ख्मों को भी तन्हा नहीं रखते
राजेश’अरमान’
by rajesh arman
February 20, 2016 in शेर-ओ-शायरी
वो खफा है अब इस बात पर
आता नहीं सलीका गम उठाने का
राजेश ‘अरमान’
by rajesh arman
February 20, 2016 in ग़ज़ल
ज़िक्र तिरी वफ़ा का मसला था , जो अब न रहा
मैं कब तिरी आँखों में बसा था, जो अब न रहा
इक बुतखाने की तिश्नगी से बढ़कर कुछ नहीं
कभी बुलंद जमाना मैं था ,जो अब न रहा
मेरी आवाज़ह भला क्यों करता ये तेरा शहर
मैं इक मिसाल हुआ करता था ,जो अब न रहा
हवाओं के रहमोकरम पर जलता मैं कोई चराग हूँ
खौफ बुझने का अक्सर होता था, जो अब न रहा
नब्ज़ भी कुछ तेज थी ,फ़िज़ां भी थी कुछ बीमार
वो तेरे मौसम का इक ज़ख्म था ,जो अब न रहा
अपनी दीवानगी के अज़ाब कुछ कम करों ‘अरमान’
वो पहले का जमाना था दौर ,जो अब न रहा
राजेश’अरमान’
आवाज़ह= चर्चा, प्रसिद्धि
अज़ाब= पीड़ा, सन्ताप, दंड
by rajesh arman
February 20, 2016 in ग़ज़ल
गुज़ारिश गुज़ारिश
गुम हुआ अपने शहर की गलिओं मेँ अपना साया है
मैंने भी कब अपने शहर का कोई क़र्ज़ चुकाया है
अब तो हो गए वो रास्ते भी किसी अजनबी से
जिन रास्तों ने कभी तुमको चलना सिखाया है
उम्र गुजरी है गैर लोगों को अपना बनाते हुए
अपने लहू को मगर मैंने ही ठुकराया है
ताउम्र ढूंढ़ता रहा अक्स अपना अजनबी शहर में
मैंने खुद अपने हाथों से शहर अपना दफनाया है
माना ख्वाइशों का जुनूँ हर एहसास पे भारी है
तेरी खवाइश ने तेरे अपनों को बहुत रुलाया है
सोच के देख तू ज़िंदगी में , इतना तनहा हुआ कैसे
न पास अपने माँ का आँचल, न अपनों का साया है
इक दिन वो भी आएगा होगा तुझे भी महसूस
इस ज़माने ने कब किसी गैर को अपनाया है
अपनी मिटटी ,अपनी फ़िज़ाओं पे ऐतबार तो कर
अपने वास्ते भी ख़ुदा ने सब कुछ वहां बनाया है
एक दिन कभी . बैठ के करना हिसाब लम्हों का
तूने ज़िंदगी में कितना खोया ,कितना पाया है
तालीम लेता है इंसा तरक्की की खातिर लेकिन
खुद को खोना मगर किताबों ने नहीं सिखाया है
गुम हुआ अपने शहर की गलिओं मेँ अपना साया है
मैंने भी कब अपने शहर का कोई क़र्ज़ चुकाया है
राजेश ‘अरमान’
by rajesh arman
February 20, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता
फेहरिस्त में भुलाने के नाम, मैं रोज़ सजा लेता हूँ
इसी बहाने मैं सबको , याद करने का मज़ा लेता हूँ
चाक किस्मत के रहने दो ताउम्र मेरी जागीर की तरह
अपने हिस्से के गुनाहों की मैं हर रोज़ क़ज़ा लेता हूँ
आये मौसम कोई भी मगर, टिकते कहाँ बदलते रहते है
मैं वो मौसम हूँ जो सदा ,खुद में छुपा ख़ज़ां लेता हूँ
तेरे खत आज भी रखता हूँ ,किसी वसीयत की तरह
रोज़ लिख के तुझे खत ,तन्हाइयों में खुद जला लेता हूँ
क्या कोई किसी को भूलने की , कोई दवा होती है
तमाम कोशिश कर के देखा मगर ,खुद ही को भुला लेता हूँ
क्या परस्तिश तेरी पशेमाँ होके बस रह गई ‘अरमान’
चल एक बार फिर तेरी बंदगी के , इलज़ाम उठा लेता हूँ
राजेश’अरमान’
by rajesh arman
February 20, 2016 in ग़ज़ल
जो यादों में बसा है ,उसे वहीँ रहने दो
मेरी दी हुई हिचकिओं में, उसे रहने दो
आज साकी तू रुख से पर्दा नहीं नक़ाब उठा
मैखाने के बातें बस मयखानों तक रहने दो
किसने देखे है कितने ज़माने हिसाब न कर
मेरे ज़ख्मों के जमाने बस साथ रहने दो
कोई पूछे सबब फिर तन्हाई का तो कह देना
मेरी तन्हाई मेरी दवा है जिसे बस रहने दो
मुद्दत हुई कोई नया गम न पा सके ‘अरमान’
अपने ज़ख्मों के खजाने , यूँ न पड़ा रहने दो
राजेश’अरमान ‘
by rajesh arman
February 20, 2016 in ग़ज़ल
कोई शाम फिर रात की बाँहों में दम तोड़ गई
रात भर वो शाम दरवाज़े पे देती रही दस्तक
कुछ धुँधले से साये करीब आकर छूते तो है
अपना पता पूछते है मुझ अजनबी से
कोई लफ्ज फिर गुमसुम है होठों पर
फिर कोई सदा टकराई है कानों में
चौंकते दिन की शक्ल में रात फिरती है
कई रातें बिखर जाती है छोटी छोटी रातों में
कहीं कुछ सहमे हुए मैं बिखरे है भीड़ में
और तलाश है अपने ही किसी टुकड़े की
हाथ की रेखाओं सा बना कुछ जाल
अंदर से झाकता हुआ कोई और मुझसा
लेता हिसाब शामों का, करता कई सवाल
सिहर के निकलती बस यही आवाज़ दबी
कोई शाम फिर रात की बाँहों में दम तोड़ गई
राजेश ‘अरमान’
by rajesh arman
February 20, 2016 in शेर-ओ-शायरी
अपनी उलझनों के हम यूँ आदी हो गए है
कभी मुजरिम तो कभी फरियादी हो गए है
न होता कुछ तो कुछ और जरूर होता
बस इसी सोच में कोई बर्बादी हो गए है
राजेश’अरमान’
by rajesh arman
February 20, 2016 in ग़ज़ल
तेरे सायें से लिपटना मेरी आदत भी नहीं
प्यार तो दूर बहुत मैं तेरी नफरत भी नहीं
क्या दबा रखा है अंदर किसी खंजर की तरह
अब मरासिम न सही मगर ऐसी अदावत भी नहीं
ज़ख्म गीले है अपने कहीं तो निशां रहेंगे लेकिन
दिल में इक शोर है मगर ऐसी बगावत भी नहीं
अपने अंदर हूँ खुद किसी अजनबी की तरह
जान पहचान की मगर कोई फुर्सत भी नहीं
यूँ तो मिलते है सभी अपने ही सायों की तरह
हाथ तो बढ़ते है मगर ऐसी कुर्बत भी नहीं
राजेश ‘अरमान’
२०-०२-२०१६
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