rajesh arman

कुछ परछाइयाँ

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

कुछ परछाइयाँ सी चलती है मेरे पीछे ,
वक़्त भी बहरूपिया होता है गुमाँ न था
राजेश’अरमान’

कभी मन करता है

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

कभी मन करता है
फिर से दुनिया को
औरों की नज़र से देखूँ
शायद मेरी नज़र में
कोई भ्रान्ति दोष हो
एक बार देखा
जब दुनिया को
दूसरी नज़र से
लगा आँखों पे
कोई चाबुक सा पड़ा
जिसके दर्द से
आज भी कराह रहा हूँ
राजेश’अरमान’

गहरे राज़

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

गहरे राज़ छुपे है अपनी ही साँसों में
लो तो ठंडी छोड़ों तो गर्म -गर्म
राजेश’अरमान’

आँखें तो बस देखती रही

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

आँखें तो बस देखती रही
ज़िंदगी के आवागमन को
राजेश’अरमान’

कोई पुल ऐसा भी होता

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

कोई पुल ऐसा भी होता
जिस पर चलते सिर्फ तुम
राजेश’अरमान’

मर गई आत्मा

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

मर गई आत्मा ,शरीर कहने को ज़िंदा है
पंछी मन का उड़ गया ,आँखों में परिंदा है
राजेश’अरमान’

न सूत न

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

न सूत न कपास
फिर भी बंधी आस
जुलाहे ले के बैठे लट्ठ
कभी तो आएगी कपास
राजेश’अरमान

चारों और अधर्म

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

चारों और अधर्म के जंगल
भक्ति हो गई दावानल
राजेश’अरमान’

अच्छा हुआ आँखों

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

अच्छा हुआ आँखों से बह गए आँसूं
जो जिगर में जम जाते तो हादसा होता
राजेश’अरमान’

अपनी हर सांस तो

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

अपनी हर सांस तो बस तेरी चाह में गुजरी
तेरी सारी उम्र जमाने की परवाह में गुजरी
सोचा था कहोगे उदास तुम मेरी खातिर न हो
क्या कहेगा ज़माना ,फिक्र ज़िंदगी की राह में गुजरी
राजेश’अरमान’

मेरे लफ्ज़

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

मेरे लफ्ज़ ग़ुलाम बन गए
तेरे लफ़्ज़ों की सरफ़रोशी से
राजेश’अरमान’

कभी बादलों से

February 23, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

कभी बादलों से
कभी बिजलिओं से
बनती है सरगम

कलकल बहते पानी
चलती हवाओं से
बनती है सरगम

इठलाती घूमती
बेटियां होती झंकार
बनती है सरगम

अपनी साँसें भी
जब सुर में हो
बनती है सरगम

कुछ यादें भी
होकर मधुर
बनती है सरगम

किसी साज़ का दर्द
खुद सा लगे तब
बनती है सरगम

राजेश’अरमान’

कल रात फिर आँखों में गिरफ्तार हुए

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

कल रात फिर आँखों में गिरफ्तार हुए
कई ख्वाब नशे में आवारागर्दी करते
राजेश’अरमान ‘

कोई वज़ह यूँ भी

February 23, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

कोई वज़ह यूँ भी
निकल आती
तेरे मिलने की
तारों की सजी डोली
लेके आता कहार
मेरे मन के द्वार
मैं मन ही मन में
रूप लेता निहार
काश उस डोली में
कोई ख्वाब सजा होता
आँखों ने लिए थे
संग जिसके सात फेरे
राजेश’अरमान’

देख लेता

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

देख लेता मैं भी तेरे जलवे
गर तेरे जलवे पराये न होते
राजेश’अरमान’

की परवरिश जिन

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

की परवरिश जिन ख़्वाबों की औलाद की तरह
दफ़न कर मुझे फ़र्ज़ निभाया औलाद की तरह
राजेश’अरमान

गम की फसलें

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

गम की फसलें सींचता
आँखों की बारिश से
हर ख्वाब ने दम तोडा
अपनी ही गुजारिश से
राजेश’अरमान’

किसी ने सूद

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

किसी ने सूद से भरी पुरवाइयां चुनी
किसी ने दर्द भरी शहनाइयां चुनी
हमें कुछ चुनने का हुनर न आता था
सो गम से लिपटी तन्हाईयाँ चुनी
राजेश’अरमान’

चल पड़ा फिर जिस्म

February 23, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

चल पड़ा फिर जिस्म
किसी राह में
मन को छोड़ अकेला
क्यों नहीं चलते
दोनों साथ -साथ
कोई रंजिश नहीं
फिर भी रंजिश
फूल की बगावत
किसी टहनी से
भवरे की शिकायत
किसी फूलों से
मन की तिजारत
किसी जिस्म से
मन रहता है
जिस्म में किसी
मुसाफिर की तरह
जिस्म की हसरत
जिस्म की तरह
नश्वर है
काश रग़ों में
मन दौड़ता
जिस्म की
उमंगों जैसा
किसी जिस्म
किसी मन
की राह अलग न होती
राजेश’अरमान’

रात अपना ही

February 23, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

रात अपना ही कोई
किस्सा बन जाता हूँ
दिन के उजाले में कोई
हिस्सा बन जाता हूँ
निकल तो जाता हूँ
बाज़ारों में कहीं
शाम के होते ही
न चलने वाला कोई
सिक्का बन जाता हूँ
राजेश’अरमान’

जरूरत के हिसाब से

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

जरूरत के हिसाब से , खुद से पहचान हुई
कई हिस्से अब भी अजनबी है मेरे अंदर
राजेश’अरमान’

उसकी नज़रों की

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

उसकी नज़रों की तलाशी में
मेरे किरदार बदले से मिले
मैं ढूंढ़ता रहा उसकी आँखों में
चंद कतरे पर जमे से मिलें
राजेश’अरमान’

अब मंज़िल

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

अब मंज़िल मेरे साथ-साथ चलती है
जब से बनाया मंज़िल अपने साये को
राजेश’अरमान’

चंद क़दमों में

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

चंद क़दमों में थक के बैठ गया राही
मंज़िल मुसीबत नहीं जो बैठे- बैठे गले पड़े
राजेश’अरमान’

कुछ खास

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

कुछ खास है वो मेरे वास्ते
दे गए सब बिना मोल-भाव के
राजेश’अरमान’

वीराने भी

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

वीराने भी अब गुफ्तगू करने लगे
नज़र लग गयी इसे भी जमाने की
राजेश’अरमान’

चाहा था

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

चाहा था इक बार फिर अजनबी बन जाना
वो मिलते है हर बार अब अजनबी से
राजेश’अरमान’

मेरे जज्बात

February 23, 2016 in ग़ज़ल

मेरे जज्बात अब पत्थर हो गए है
अब फूलों की बातें पहरों में सिसक रही है
अब लहरें समुन्दर की सांसें बन गई है
अब हवाओं में फैल गए है नग्मे दर्द भरे
अब जमाने से खत्म हो गईं यारी अपनी
अब किताबों से गुम हो गए मेरे पन्ने
अब न कोई पिंजरा न कोई आसमान
अब न कोई शाम उदास ,न रातें तन्हा
अब खौफ खुद बन गया है हादसा
अब ख्वाब खुद हो गए है खवाइश
अब अलफ़ाज़ मेरे खुद हो गए बंदी
अब किसी ईमारत में जड जाना चाहता हूँ
मेरे जज्बात अब पत्थर हो गए है
राजेश’अरमान’

कुछ तो हैरान

February 23, 2016 in शेर-ओ-शायरी

कुछ तो हैरान होगी ज़िंदगी भी
जब हमने अपना मुँह मोड़ लिया
राजेश’अरमान’

बचपन की कागज़ की नाव

February 23, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

बचपन की कागज़ की नाव
जो बारिश के पानी में तैरती थी
जो कई बार तैरते तैरते थक जाती थी
और उसे फिर से सीधा कर पानी में छोड़
देते थे और वो फिर तैरने लगती थी
अब वो कागज़ की नाव बड़ी हो गई है
और हम उसके आगे बहुत ही बौने
अब भी कागज़ की नाव जब भी देखता हूँ
लगता हम सचमुच उसके आगे बहुत है छोटे
जो खुशिया वो अकेले हमें दे जाती थी
आज हर ख़ुशी भी मिलकर ,
उस ख़ुशी के सामने बहुत छोटी है
राजेश’अरमान’

मंज़िल

February 22, 2016 in शेर-ओ-शायरी

मंज़िल की बेताबी खत्म हुई
यूँ कारवां से दिल लगाया हमने
राजेश’अरमान’

सरल जीवन

February 22, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

 हम बढ़ते रहे
हम समझते रहे
हम पढ़ते गए
हम समझते गए
छोटे थे तो
बड़ा होने का ख्वाब
बड़े हुए तो बचपन लगा प्यारा
कुछ पाया तो खोने का डर
कुछ न था तो नसीब दुश्मन  
सयाने हुए तो खिलौने छोड़े
खेलने लगे जज्बातों से
ताउम्र बस ढूँढ़ते रहे
क्या ढूंढ़ना पता   नहीं
खुद  को कभी खोते  रहे
बेवज़ह   कभी रोते  रहे
यु  ही गुजरी  ज़िन्दगी  
यही है  अपना ‘ सरल  जीवन  ‘
           राजेश ‘अरमान’

 

 

दोस्त

February 21, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

दोस्त
इक अजीब सा रिश्ता
पनपने लगा हम दोनों के बीच
इक दूजे के दर्द को
महसूस सा करने लगे
कुछ खट्टी कुछ मीठी सांसों का
बँटवारा भी रजा से करने लगे
कुछ प्यार से कम था
कुछ प्यार से ऊपर
सवालों के उलझे धागों को
सुलझाने में लगा रहता वो
न अहम न ही कोई ख़ास उम्मीदें
इक खून में भी कहा ऐसा रिश्ता
न कोई शिकवा न कोई रंजिश
मुझे इस दोस्ती पर नाज़ रहा
इस रिश्ते ने बचाया
दर्द की बूंदों से
दर्द की बारिशों से
सारी उम्र देता रहा तस्सलियां,
मेरे ही अंदर का इक और” मैं ”
राजेश’अरमान’

जुर्म उनके

February 21, 2016 in शेर-ओ-शायरी

जुर्म उनके ,सितम उनके ,खता उनकी
हम तो अब भी खाली हाथ बैठे है
राजेश’अरमान’

रहस्य जीवन

February 21, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

रहस्य जीवन
अनेक प्रश्न
निरुत्तर प्रश्न

संभव जीवन
संभव मोक्ष
निरर्थक प्रश्न

पुनर्जन्म
संभव जन्म
सार्थक प्रश्न

मृत्यु प्रश्न
सत्य प्रश्न
यथार्थ प्रश्न

प्रारब्ध चिंतन
सार्वभौमिक चिंतन
अलोकिक प्रश्न

जीवन चिंतन
जीवंत प्रश्न
आलोकित प्रश्न

राजेश’अरमान’

जिधर का रुख

February 21, 2016 in ग़ज़ल

जिधर का रुख करें इन फ़िज़ाओं को साथ रख लेना
इन फ़िज़ाओं में बसी अपनी साँसों को साथ रख लेना

वक़्त मिलता कहाँ कभी खुद से रुबरूं होने का
कभी हाथों में तुम एक टूटा आईना रख लेना

ज़िंदगी के खेल में कभी शह मिली कभी मात हुई
इन हिसाबों को दबाकर तुम किताबों में रख लेना

अपना सा लगता है कोई आसमा से टूटा हुआ तारा
अपने आगोश में तुम बचपन के टूटे खिलोने रख लेना

ज़ंग मैदान की हो या अपने अंदर ,बस बुरी होती है
अपने अंदर ही तुम सुकून की कोई दवा रख लेना

बेसबब बात भी निकल जाती है हलकों से ‘अरमान’
क्या ज़रूरी है हर बात को अपने दिल में रख लेना
राजेश’अरमान’

जीतने की ख्वाइश

February 21, 2016 in शेर-ओ-शायरी

जीतने की ख्वाइश में कछुए सा चल रहा हूँ,
लेकिन ख्वाइशों का खरगोश सोने के लिए रूकता ही नहीं
राजेश’अरमान’

खौफ आईने का

February 21, 2016 in ग़ज़ल

खौफ आईने का हर शक्ल पर भारी है

हर शक्ल आईने के सामने आकर बिखर जाती है
कुछ तो रहस्य छिपा है आईने में शक्ल जो सिहर जाती है
आईने को तोड़ के देखा शक्लों में शक्ल बस नज़र आती है

सच के पीछे का सच, झूठ की ईमारत का खंडहर है
हर झूठ अपना ही बुना कोई आडम्बर है
चुभता आईना अपने ही अंदर का कोई घर है

चिंतन पे लगे है दरवाज़े पर खुलते नहीं
जेहन में आते है सब पर मन मिलते नहीं
सहमे से सच दम तोड़ते पर चीखते नहीं

खौफ आईने का हर शक्ल पर भारी है

राजेश’अरमान’

बंद कर देखों

February 21, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

बंद कर देखों
नयन अपने
खुली रहने दो ,
सब जो नयन नहीं है
नयन से देखने का
अभ्यास अविरल है
स्वयं अन्य इन्द्रियों
की दृष्टि शक्ति
कम की है
अभ्यास एक शास्वत
जीवंत परिणाम है
एक क्रिया है
कभी कण की
उपस्थिति को
स्पर्श किया है
कण की अनुभूति
खुले नयनों से नहीं हो सकती
उस कण को जिस
समय आत्मसात
कर लोगे
वहीँ से होगा प्रारम्भ
तुम्हारा जीवन
राजेश ‘अरमान’

अपने साये

February 21, 2016 in शेर-ओ-शायरी

अपने साये भी अब अनजान नज़र आते है
बिन बुलाये से मेहमान नज़र आते है
हर शक्स उदास हर रिश्ते अब तो
पत्थरों से ये बेजान नज़र आते है
राजेश’अरमान’

तालीम

February 21, 2016 in शेर-ओ-शायरी

तालीम कुछ गिनती की यूँ काम आई
बस जाती सांसों को गिनता रह गया
राजेश’अरमान’

मुसाफिर अपनी राह

February 21, 2016 in ग़ज़ल

मुसाफिर अपनी राह से भटक रहा है
मृग जाने किस चाह से भटक रहा है

रहस्य दर्पण में नहीं आकृति में नहीं
दर्पण किस गुनाह से भटक रहा है

किस सत्य की खोज में मन व्याकुल
कोई फ़कीर दरगाह से भटक रहा है

अदृश्य विलक्षण तरंगे घूमती तेरे अंदर
मानव फिर किस चाह से भटक रहा है

मोह तेरा कवच के चक्रव्यूह में फंसा
मन कवच की दाह से भटक रहा है

राजेश’अरमान’

सच ने जब

February 21, 2016 in शेर-ओ-शायरी

सच ने जब भी तोडा है दम
झूठ ने ही उसे अग्नि दी है
राजेश’अरमान’

था वो गुलाब

February 21, 2016 in शेर-ओ-शायरी

था वो गुलाब के मानिंद
नज़र बस तेरी काटों पे गड़ी
मैंने भी महसूस किया कैक्टस को
नज़रे जो कभी फूलों पे पड़ी
राजेश’अरमान’

जब अपनी ही

February 21, 2016 in शेर-ओ-शायरी

जब अपनी ही साँसें एहसान जताने लगे
समझ लो साँसें भी अपनी हो गई है
राजेश’अरमान’

कीमत

February 21, 2016 in शेर-ओ-शायरी

धर्म की दूकान सदियों से चल रही है ,
कीमत तो चुकाई पर सामान नहीं मिला
राजेश’अरमान’

बिखरी जा रही

February 21, 2016 in शेर-ओ-शायरी

बिखरी जा रही ज़िंदगी कुछ तेज रफ़्तार से
कोई मोहलत नहीं कुछ भी दुरुस्त करने को
राजेश’अरमान’

तेरी बेरुखी

February 21, 2016 in शेर-ओ-शायरी

तेरी बेरुखी इस कदर काम कर गई
बेवज़ह वक़्त को बदनाम कर गई
रिश्तों पे पड़ी धूल जब जमने  लगी
ख़ामोशी के राज़ सरेआम  कर गई

राजेश’अरमान’

काफिला

February 21, 2016 in शेर-ओ-शायरी

हर फैसले मेरे तेरे क़दमों में थे
तूने क़दमों का फ़ासला कर लिया
न हो दरम्यां सांसें भी अपनी लेकिन ,
तूने ज़ख्मों का काफिला चुन लिया
राजेश’अरमान’

मैं समझ नहीं पाता

February 21, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

मैं समझ नहीं पाता
अपने ही देश में देशद्रोहिता के रहस्य
मैं समझ नहीं पाता
अपने ही देश में असहिष्णुता के मायने
मैं समझ नहीं पाता
अपने ही देश में पलता धर्मो का खेल
मैं समझ नहीं पाता
चार स्तम्भो का घिनौना खेल
मैं समझ नहीं पाता
जनता ने चुना या जनता को चुना
मैं समझ नहीं पाता
पैतरे गोबुल्स के वंशजो के
मैं समझ नहीं पाता
अपने ही देश के आस्तीन के सांपों को
मैं समझ नहीं पाता
अपने देश की शिक्षा प्रणाली को
मैं समझ नहीं पाता
महत्व आज़ादी का
मैं समझ नहीं पाता
लोकतंत्र में छिपे अन्य तंत्र को
मैं समझ पाता
आखिर हो क्या रहा मेरे देश में
मैं समझ नहीं पाता
वर्गों में हो रहे संघर्ष को
मैं समझ नहीं पाता
हम कर क्या रहे है
मैं समझ नहीं पाता
हमारी सोच में दबा क्या है
मैं समझ नहीं पाता
अपने मूल्यों का अवमूल्यन
मैं समझ नहीं पाता
हम किस खोज में है
मैं समझ नहीं पाता
और भी बहुत कुछ
क्या ये असमंजसता
सिर्फ मेरी है ?
मैं समझ नहीं पाता
राजेश’अरमान’

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