Pt, vinay shastri ‘vinaychand’'s Posts

राम नाम का महत्ता

………….पिछले का शेषांश…………… है चमत्कार कैसा स्वामी मैं भी तो जानूँ। राज आपके नाम का मैं भी तो पहचानूँ।। शक्तिरूप सती नारी से सत्य नहीं छुपा पाया। रावण नाम लिखते मेरे मन में ख्याल आया।। रा लिखते राम कहा वण लिखते वन जाए। विनयचंद इस रामरुप को भला कौन डूबा पाए।। ……… . पं़विनय शास्त्री »

राम नाम का महत्ता

सेतु बनाकर सेना संग राम जब लंका। लंका के गलियों में होने लगी ये शंका।। जिसके नाम का पत्थर भी सागर पे गया है तैर। स्वामी तोसे करु विनती नहीं बढ़ाओ उनसे बैर।। चमत्कार तो राम के जैसा मैं भी कर सकता हूँ। पत्थर क्या पूरा पर्वत पानी पर तैरा सकता हूँ।। एक छोटा टुकड़ा ही तैराओ जो पानी में। मैं भी देखू दम कितना है लंकापति की वाणी में।। लो मंदोदरी एक पत्थर पानी में अब छोड़ रहा। सचमुच तैर गया वह मंदोदरी का क... »

हनुमान भजन

हनुमान गदाधारी श्रीराम के प्यारे हैं। करते हैं सदा भक्ति सीता के दुलारे हैं।। सुग्रीव पे विपति पड़ी। रिशमुक पे चरण धड़ी।। श्रीराम मिलाए हैं दुखरे को मिटाए हैं। हनुमान गदाधारी श्रीराम के प्यारे हैं।। रीछपति नल नील। दक्षिण को गए सब मिल।। अंगद के संंग संग ये सिय खोज में धाए हैं। हनुमान गदाधारी श्रीराम के प्यारे हैं।। »

मेरी चाहत

तुम मुझे चाहती हो इसका मुझे पता तो नहीं। मेरा तुझको चाहना शायद मेरी खता तो नहीं।। »

रसखान

पान खाने गया था वो पनवाड़ी के पास। एक सलौना सा सूरत था नजरों के पास।। लाल लाल होंठ थे उसके और घुंघराले बाल। श्याम रंग और तिरछी चितवन टेढ़े मेढ़े चाल।। कोमल कोमल पाँव मनोहर बिन जूते का देखकर। चित्रलिखे से बने मियाजी टगे चित्र को देखकर।। होश में आके पूछ गए ये बालक कौन कहाँ का है। यमुना तट पर वृन्दावन है ये बालरुप जहाँ का है।। पान रहा पनवाड़ी के पास भागा वृन्दावन की ओर। हाथ में जूते और सलवार लेकर पहु... »

नन्दकिशोर

रक्तिम अधर रक्तिम कपोल श्याम वरण था उसका। कजरारी नयना थी उसकी नरम चरण था उसका। घुंघरे घुंघरे बाल थे उसके मेरा वो चितचोर था। विनयचंद वो रसिया जिसका नाम नन्दकिशोर था। »

वीर जवान

हम हैं वीर जवान साथियों शरहद पे लड़नेवाले। हमसे देश सुरक्षित हम नहीं किसी से डरनेवाले।। भूख-प्यास को छोड़ा छोड़ा घर परिवार। देश भक्ति का जज्बा दिल में छोड़ेगे संसार।। विनयचंद हम देश के खातिर वीर लड़ाकू मरनेवाले। हमसे देश सुरक्षित हम नहीं किसी से डरनेवाले।। »

भजन

मेरी ज़िन्दगी बदल गई तेरे द्वार आके। हो गया मैं प्यारा सबका तेरा प्यार पाके।। चला जा रहा था दिशाहीन पथ पर। उदसीन होकर मैं दुनिया के रथ पर।। तूने सम्हाला मुझको अपने द्वार लाके। हो गया मैं प्यारा सबका तेरा प्यार पाके।। दुनिया में अब तो कुछ भी नहीं है। तुझे पा लिया फिर मुझे क्या कमी है।। तुझको रिझाए आज “विनयचंद”गाके। हो गया मैं प्यारा सबका तेरा प्यार पाके।। ज़िन्दगी बदल गई तेरे द्वार̷... »

सिपाही

मैं देश का सिपाही हूँ। दुश्मन की तबाही हूँ, ।। काँधे पे बन्दूक है और तिरंगा हाथ है। कदम मिला चलता, जज्बा एक साथ है।। देश के खातिर जान जो जाए करता नहीं कोताही हूँ। »

भजन

सिर्फ एक बार दर्शन तू दे दो और कोई भी दिल की तमन्न।नहीं है। साथ कितना मिला जगत में मुझे। सारे नातों के दीपक पलक में बुझे।। मुझे अपनी शरण में तो ले लो और कोई दिल की तमन्न ।नहीं है। हर कदम पर मैं ठुकराया गया हूँ। गैर क्या अपनों से भी रुलाया गया हूँ।। मुझे अपनी शरण में तो ले लो और कोई दिल की तमन्न।नहीं है।। »

अनुराग

तेरा दीदार हीं, मेरे जीवन को, साकार करता है। तुम जान हो मेरे, मुहब्बत तुझ से तेरा यार करता है।। »

अबला का आँचल

जब भी कोई हाथ जगत में, अबला का आँचल खींचा है। शमशीर सदा हीं टकड़ाया और रक्त धरा को सींचा है।। »

भजन

ब्रजरज का मस्तक पे चन्दन करू। मैं श्रीराधे के चरणों में वन्दन करू।। मैंने जीवन किए अब हवाले तेरे। आके इसको सम्हालो दाता मेरे। सामने किसके जाने क्रंदन करू। मैं श्रीराधे के चरणों में वन्दन….. »

मोर का नाचना

बादलों को देख मोर झूम-झूम नाचता। मोरनी है साथ फिर व्योम क्यों निहारता।। बादलों की चाह में मोरनी के प्यार में, या फिर नयनश्रवा के हार में पंख को पसारता। बादलों को देख मोर झूम-झूम नाचता। »

मोर का नाचना

बादलों को देख मोर झूम-झूम नाचता। मोरनी है साथ फिर व्योम क्यों निहारता।। बादलों की चाह में मोरनी के प्यार में, या फिर नयनश्रवा के हार में पंख को पसारना। बादलों को देख मोर झूम-झूम नाचता। »

भजन

मुझ शरणागत की रख ले लाज प्रभु। मैं दर तेरे पे आया हूँ देखो आज प्रभु।। तुमने कितने पापी तारे नाम गिनाया जा नहीं सकता। जो भी तेरे दर पे आता खाली झोली जा नहीं सकता।। तेरा रंक भगत भी पाया तख्त- ओ-ताज प्रभु। मैं दर तेरे पे आया हूँ देखो आज………… ना मांगू मैं धन और दौलत ना चांदी न सोना। विनयचंद को देदे दाता मन मंदिर का कोना।। नहीं निज भक्तों से होते नहीं नाराज प्रभु। मैं दर तेरे पे ... »

लाचारी

गाँव की एक चिड़ियाँ शहर को गई। ना जाने उसकी अस्मत कहाँ खो गई।। बूढ़ी माँ से वो बोली मैं बेटी नहीं हूँ लड़का तेरा। भाई अच्छे से पढ़ना तूहीं छोटू तूहीं है बड़का मेरा।। इतना कहते हुए वो रो गई । गाँव की एक चिड़ियाँ शहर को,,,, थक गई ,खोज कर, नौकरी हर जगह। कुछ मिले मतलबी कुछ हुए बेअसर।। अब तो मजबूर इस कदर हो गई। गाँव की एक चिड़ियाँ शहर को,,,,,, शर्म का अब तो घूंघट हटाना पड़ा। गंदगी को भी खुद से सटाना पड... »

प्रेम का पागल

तुम फूल हो तो मैं कोई काँटा नहीं जानम। तेरा स्पर्श कोमल है मेरा चाँटा नहीं जानम।। तुम चाँद हो नभ के, मैं चकोर हूँ जानम। तुम मेघ अम्बर के , मैं तो मोर हूँ जानम।। मेरे प्रेम को तू ना समझो है ये तेरी मर्जी। मैंने तो तेरे दर पे लगाई आश की अर्जी।। अपनालो या ठुकरा दो ,शिकवा हम नहीं करते। विनयचंद प्रेम का पागल मुहब्बत कम नहीं करते।। »

गाँव के किसान

शहर को देखने वाले जरा तुम गाँव भी देखो। वदन पे गर्द मत देखो फटे वो पाँव भी देखो।। गुजरते नार कीचड़ से हमें नित फीड हैं देते। मखाना वो कहे जिसको लोटस सीड हम कहते।। विनयचंद प्रेम कर इनसे ये पालनहार हैं अपना। सुख के नींद सोकर भी न तोड़ो औरों का सपना।। »

गजल

तेरी सूरत सदा रहती नजरों के पास नाम हाथों पे लिखने से क्या फायदा? तुम रहते सदा मेरे दिल में प्रिये सामने आके मिलने से क्या फायदा? दिल जख्मों को सहता मेरा इस कदर अब जख्मों को गिनने से क्या फायदा? विनयचंद मुहब्बत के सागर में आ साहिल पे कंकर बीनने से क्या फायदा? »

मेंने पीना छोड़ दिया

गाना न कोई अब रिन्दाना मैंने पीना छोड़ दिया। बोतल तोड़ी जाम मैं तोड़ा साकी से नाता तोड़ लिया। मैंने पीना’……… . ….. . ।। पीबाकों से नहीं अब याराना नहीं अपने रहे अब बेगाना मयखाने की डगर अब छोड़ दिया। मैंने पीना छोड़ दिया।। »

प्यार की दुनिया

था प्यार करने से पहले रंगीन ज़माना। प्यार करके बनाया गमगीन जमाना।। न भूख रही न हीं प्यास रहा हर पल तुम्हारा आभाश रहा अब तो अपना हुआ एक दो तीन जमाना। प्यार करके बनाया गमगीन जमाना।। प्यार किया नहीं चोरी करी दुनियां मेरे क्यों पीछे पड़ी बदनाम किया नामचीन जमाना। प्यार करके बनाया गमगीन जमाना।। प्यार करना है साहस का काम यारों प्यार के रास्ते में ना होना नाकाम यारों विनयचंद होगा फिर से रंगीन ज़माना। »

काव्य

काव्य

अश्क आँखों से बहता हो लबों पर मुस्कुराहट हो। दया से दिल लबालब हो मन में प्रेम की आहट हो।। निकलकर भाव जो आये वही तो काव्य है प्यारे।। लगे प्रेमालाप में पक्षी परम आनन्द का कायल। लगा जो तीर- ए-शैय्याद हुआ मुनिवर का मन घायल।। दिया जो श्राप वाणी से बना एक काव्य वो प्यारे।। समझो पीड़ औरों का विनयचंद जिन्दगानी में। बनोगे ज्ञान का सागर जो सेवा कर जवानी में ।। लिखा जो कोड़े कागज पर नहीं वो काव्य है प्यारे।... »

श्याम की मुरली

श्याम ने मुरली बजाई कि घर से गोपियाँ निकली। इधर से गोपियाँ निकली उधर से गोपियाँ निकली श्याम ने मुरली बजाई कि घर से गोपियाँ निकली।। पीलाती दूध बच्चे को कलेबा कर रही कोई। लगी परिजन की सेवा में मीठी नींद में सोई।। सुनकर वंशी की धुन को घर से गोपियाँ निकली।। श्याम ने मुरली बजाई कि घर से गोपियाँ निकली।। »

कवि कहलाओगे

कभी होंठों को देखते हो। कभी बालों को देखते हो।। कभी आँखों को देखते हो। कभी गालों को देखते हो।। दिल में उतर के देखो तो फिर कवि कहलाओगे।। कभी लंबू को देखते हो। कभी नाटों को देखते हो।। कभी फूलों को देखते हो। कभी काँटों को देखते हो दिल में उतर के देखो तो फिर कवि कहलाओगे।। »

नसीहत

नसीहत

कृष्ण के भजने पर कभी राम पराए नहीं होते। पंथ बदलने पर भी भगवान पराए नहीं होते।। दम है अरदास में तो अजान पराए नहीं होते। कतरा-ए-लहू एक हो तो इंसान पराए नहीं होते।। खुदगर्ज बनकर न जी अंजान पराए नहीं होते। “विनयचंद “दुनिया में मेहमान पराए नहीं होते।। पं़विनय शास्त्री »

दीपावली

दिल का दीप जलाओ सजनी आई मधुर दिवाली रे। प्रेम भाव का तेल भरो और सेवा सत्य की बाती। संकल्प ज्योति से प्रज्ज्वलित कर जगमग कर सुखरासी।। वीर सपूत को अर्पण करो अबकी मधुर दिवाली रे।। दिल का दीप जलाओ सजनी आई मधुर दिवाली रे।। शुभकामनाओं के साथ पं़विनय शास्त्री »

विनती

मिले काँटे या मुझको फूल। पर हो मेरे अनुकूल।। इतना सुख न देना स्वामी जो मुझ में अभिमान जगाए। इतना दुख न देना मालिक जो मुझको पल पल तड़पाए।। सुख दुःख में ये विनयचंद कभी जाए न तुमको भूल। मिले काँटे या मुझको फूल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, थन सम्पत्ति का ठाठ मिले या टूटी फूटी खाट मिले। भोजन मधुर दिन रात मिले या निराहार दिन आठ मिले।। पर विनयचंद की झोली में प्रभु मिले तुम्हारी चरण धूल। मिल... »

भजन

कर ले राम भजन रे भाई। राम भजन की महती महिमा वेदों ने है गाई । तड़े अजामिल गणिका तड़ गई तड़ा सदनकसाई।। ध्रुव प्रह्लाद विभीषण सबरी सतानंद की माई। राम राम कह जरठ जटायु परम गति को पाई।। दुख दुनिया में मनका मेरे सुख की आग लगाई। राम नाम के गान बिना यह जीवन है दुखदाई।। मानव तन अनमोल तुम्हारे ना कर पाई -पाई। ‘विनयचंद ‘रे राम भजन कर रट ले कृष्ण कन्हाई।। पंडित विनय शास्त्री »

विनती

हे घनश्याम गोपाल मुरारी। मेरी सुधि लो गिरिवरधारी।। दीनबंधु करुणा के सागर। भगतबच्छल प्रभु आरतहर।। जगतपति जगतारनहारी, मेरी सुधि लो गिरिवरधारी।। तेरी कृपा बरस रही निश-दिन। बाहर-भीतर किनमिन किनमिन।। दो बूंद का चातक ‘विनयबिहारी’, मेरी सुधि लो गिरिवरधारी ।। »

रिक्शावाला आई़ 0ए0एस0

शेषांश,,,,,,,,, दो रुपये का ब्लेड भला दाढ़ी काटे फिर उग आये। मुट्ठी एक चना से भूखा अपनी भूख मिटा पाए।। लो मैडमजी आ गए हम महिला काॅलेज के द्वारे। दस के बदले बीस रुपये देने लगी मैं उसको भाड़े।। वह बोला मैडमजी मुझपे क्योंकर कर्ज चढ़ाती हो? दस रुपये के कारण क्यों मेरा इमान हिलाती हो? कर्ज नहीं है तेरे ऊपर मेहनत का इनाम है ये। सदाचार की करे प्रशंसा पढ़े लिखे का काम है ये।। देना चाह रही हो आप तो इतनी वि... »

रिक्शावाला आई0 ए0एस0

बढ़ी हुई दाढ़ी थी उसकी फटा पुराना कपड़ा था। सुन्दर सुखद सुशील सलौना रिक्शावाला तगड़ा था।। कह के बैठ गई रिक्शा में महिला काॅलेज चलो भाई। खींच खींच के चलने लगा वह ओवरब्रिज की चढ़ाई।। टाईम पास में पूछ गई मैं नाम तुम्हारा क्या है? मैडमजी कहके टाल गया वह काम तुम्हारा क्या है? बात बदल के पूछी मैं दाढ़ी क्यों न करवाते हो? एक ब्लेड बहुत सस्ता है सूरत क्यों घटवाते हो? आगे,,,,,,, »

पंछी

जालिम हमें हमारी दिल की गुमान दे दो। रखो जमीन अपनी कुछ आसमान दे दो।। जज़्बात की ये कैंची मेरे पंख पे चलाके। पंगु बना न देना जालिम करीब आके।। मत छीन जिन्दगानी ना मौत का सामान दे दो। रखो जमीन अपनी कुछ आसमान दे दो।। राही हूँ मैं मस्त मौला नभ पथ पे चलने वाला। पिंजरे में बन्द होकर रोएगा हँसने वाला।। मांगू मैं तुमसे इतना मत खान-पान दे दो। रखो जमीन अपनी कुछ आसमान दे दो।। जल्लाद था वो अच्छा जिसने पकड़ के ... »

रावण दहन

रावण का पुतला जला जला अम्बर को काला कर डला। अहंकार का पुतला जला न पाया खुद को रावण कर डाला।। सत्य धर्म के ख़ातिर वन-वन भटके नारायण। जिनकी दिनचर्या कथा रुप में लिखा गया रामायण।। सेवा और त्याग की मूरत लक्ष्मण और भरत थे सुखरासी। स्वार्थ की बेदी पर बाली हो गए कैसे स्वर्गवासी।। विनयचंद रे देख तू दुनिया बन जा मानव सुखकारी। सेवा त्याग तपस्या से पाओगे प्रभु दुखहारी।। पं विनय शास्त्री »

चांद की ब्यथा

निज आंगन में बैठा- बैठा देख रहा था चन्द्र वदन को। धवल सुशीतल चन्द्रकिरण ने नहलाया बसुधा के तन को।। सुधा सुधाकर बरसाए पर निज मस्तक न धो पाए। दाग चढ़ा कैसा माथे पर अंखिया मीच न सो पाए।। मैं भी जागूँ तुम भी क्योंकर रात सुहानी में। तुझे देख मैं जाग रहा और तुम किसके कुर्बानी में।। कहा चांद सुन प्रेमी मेरे एक चकोर के कारण मैं रच रजनी रजनीचर बन आंगन खूब सजाया था। पर्वत शर सरिता बसुधा को कुसुमित सेज बनाया... »

गुलशन

गुलशन तेरी बात हीं कुछ और है। तेरी महक से महके सब क्या सज्जन क्या चोर है।। »

गुलाब

गुलाब

काँटों में देखा खिला फूल, क्षण भर अपने को गया भूल। पलकों में आई शीतलता, ये भूल गया है वहाँ शूल।। »

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