Category: गीत

  • आज मुझे आलिंगन देकर मुक्त करो हर भार से

    आज मुझे आलिंगन देकर मुक्त करो हर भार से

    आज मुझे आलिंगन देकर मुक्त करो हर भार से…
    प्रियतम मेरा हाथ पकड़ कर ले चल इस मझधार से…
    नयन मौन हैं किन्तु प्रणय की प्यास संजोये बैठे हैं..
    भाव हृदय के स्मृतियों में अब तक खोये बैठे हैं…
    तुमसे तृष्णा पाई है तृप्ति तुमसे अभिलाषित है..
    विगत दिवस आकुल श्वासों में..खुद को बोये बैठे हैं..
    निरीह हूँ लेकिन तुमसे तुमको माँग रहा अधिकार से..
    प्रियतम मेरा हाथ पकड़ कर ले चल इस मझधार से..
    मेरे स्वप्न तुम्हारी हठ की हठता पर नतमस्तक हैं…
    कुछ प्रश्न प्रतीक्षक बने खड़े जिनके उत्तर आवश्यक हैं..
    “मन” सोच रहा निज जीवन का सारांश तुम्हें ही कह डालूँ..
    ये सत्य है जग को मालूम है, पर उत्तम कहो कहाँ तक है..
    मेरे संशय को दो विराम , तुम अर्थपूर्ण उद्‌गार से..
    प्रियतम मेरा हाथ पकड़ कर ले चल इस मझधार से..
    आयाम छुये थे कभी प्रेम ने निच्छलता ,सम्मान के..
    भेंट चढ गये सभी हौसले , झूठे निष्ठुर अभिमान के.
    अब कौन दलीलों से व्याकुल उर की इच्छायें बहलाऊँ..
    मेरी आस का दीपक लड़ते-लड़ते बस हार गया तूफान से..
    ये अन्तिम जीवन सन्ध्या थी..अब चलता हूँ तेरे द्वार से..
    काश तू मेरा हाथ पकड़ मुझे ले जाता मझधार से..
    मुझे ले जाता मझधार से…
  • अब तुम्हारे बिना जी ना पाऊंगा मैं

    बेसबब प्रश्न हैं शब्द सब मौन हैं

    पूछते हैं कि हम आपके कौन हैं

    मैं युधिष्ठिर सा  सच झूठ भी बोल दूँ

    वो कहां शष्त्र त्यागे हुऐ द्रोण हैं

    जानते हैं वो सब मानते कुछ नहीं

    अब कहाॅ तक भरोसा दिलाऊगा मैं

    प्यार तुम सार तुम मेरा आधार तुम

    अब तुम्हारे बिना जी ना पाऊंगा मैं

     

    मन ये मंदिर बने देवता तुम बनो

    सारी इच्छाओं का इक पता तुम बनो

    जन्म जन्मों का कर लूँ सफर हस के मैं

    तुम ही मंजिल बनो रास्ता तुम बनो

    बिन किसी डोर के बंध गये हम औ तुम

    रिश्ता मर कर भी हमदम निभाऊंगा मैं

    प्यार तुम सार तुम मेरा आधार तुम

    अब तुम्हारे बिना जी ना पाऊंगा मैं

     

    एक सुर श्वांस स्वर एक बन्धन बनें

    एक दूजे के हम प्राण जीवन बनें

    मैं सजा दूँ सितारे सभी मांग में

    तुम सजो जब नयन मेरे दर्पण बनें

    तुम अमर दीपमाला जो बन जाओ तो

    बिन दियों के दिवाली मनालूॅगा मैं

    प्यार तुम सार तुम मेरा आधार तुम

    अब तुम्हारे बिना जी ना पाऊंगा मैं

  • तुम रहो तो,

    तुम रहो तो,

    आज कुछ हुआ है मेरे सनम को,-२
    पास आके कहती है भुल जाओ हम को, आज कुछ हुआ.•••••
    यु नदी बन मुझे दुर तक बहाया
    लहरो मे अपनी मुझको मिलाया ,
    अब यू किनारो पे ला के न छोडो,
    पास इतने आके तुम मुहँ न मोडो
    कैसे बतायेंगे हम अपने गम को,
    आज कुछ हुआ है.••••••••••
    चांदनी है राते और आंखे नम है,
    कैसा इन उजालो का मुझपे सितम है,
    हम इन सितारो से कहकर के रोये,
    सनम तेरे आने का अब भी भरम है,

    तोड कैसे पाऊंगा झुठे भरम को. आज कुछ हुआ हेेै •••••••••• (बागी)

  • जब चाँद भीगता था

    “जब चाँद भीगता था छत पर”

    बहका सावन-महकी रुत थी,
    ये हवा भी मीठी चलती थी.
    जब चाँद भीगता था छत पर,
    तब बारिश अच्छी लगती थी.

    वो बाल खुले बिखरे-बिखरे,
    होठों पे’ कभी आ रुकते थे.
    तेरे गालों से होकर के,
    बूंदों के मोती गिरते थे.
    आकर मेरी खिड़की पर तब,
    चिड़िया बनके तुम उड़ती थी.
    जब चाँद भीगता था छत पर,
    तब बारिश अच्छी लगती थी.

    कमरे की तन्हाई मेरे,
    इक पल में गुल हो जाती थी.
    जब मीठे -हलके क़दमों से,
    यूँ सीढ़ी से तुम आती थी.
    कानों की वो छोटी बाली,
    तब सच में तुम पर फबती थी.
    जब चाँद भीगता था छत पर,
    तब बारिश अच्छी लगती थी.

    पास मे’रे जब रहती थी तो,
    ये दिल भी तेज धड़कता था.
    दुनिया ज़न्नत सी लगती थी,
    और सब कुछ अच्छा लगता था.
    कमरा खुशबू से भर जाता,
    जब शरमा के तुम हँसती थी.
    जब चाँद भीगता था छत पर,
    तब बारिश अच्छी लगती थी.

    अब दूर हुये हो जबसे तुम,
    मौसम भी हमसे रूठ गया.
    ख़्वाबों में आने – जाने का,
    अब वो’ सिलसिला भी टूट गया.
    ये पल है’ कि नाराज़ हो तुम,
    तब अपनी कितनी बनती थी.
    जब चाँद भीगता था छत पर,
    तब बारिश अच्छी लगती थी.

    जब चाँद भीगता था छत पर,
    तब सावन कितना अच्छा था.
    अब सावन भी तो खार लगे,
    तब आँसू मीठा लगता था.
    मैं नीचे छत से नहीं आता,
    माँ कितना गुस्सा करती थी.
    जब चाँद भीगता था छत पर,
    तब बारिश अच्छी लगती थी.

    –डॉ.मुकेश कुमार (राज गोरखपुरी)

  • एक समकालीन गीत

    देहरी लाँघी नहीं

    घुटन में घुटती रहीं

    बच्चे रसोई बिस्तरे की

    दूरियाँ भरती रहीं

    बंदिशों की खिड़कियों के

    काँच सारे तोड़ डाले

    लो तुम्हें आजाद करता हूँ |

     ****

    पायलों ने पाँव कितने

    आज तक घायल किए

    घूँघटों की मार से

    तुम बहुत व्याकुल हुए

    कनक चूड़ी केयूर कंगन

    बीस कैरट के हुए

    तोड़ कर यह मेखला

    फिर से तुम्हें आबाद करता हूँ |

     ****

    पेड़ की छाया घनेरी

    कहो कैसे मान लूँ

    जागीर उनके वंश की

    कैसे कहो यह जान लूँ

    दो साथ मेरा

    और तुम आगे बढ़ो

    इस घृणित संवाद को

    बरबाद करता हूँ |

     ****

    तुम नहीं हो सोच लो

    लूट का सामान

    रोटियों का परोथन

    परित्यक्त पायेदान

    उगते हुए दिनमान की

    मुस्कान पहली

    पीढ़ियों के दमन का

    प्रतिवाद करता हूँ|

     ****

    बरबादियों के ढेर पर

    घेर कर जो ले गए

    ढेर होंगे वे अँधेरे

    जो अँधेरा दे गए

    रोशनी का हक़ तुम्हें

    मिल कर रहेगा

    लो भरी इजलास में

    फरियाद करता हूँ|

    ****

    • डॉ. मनोहर अभय

     

  • पतंग

    पतंग

    न बाँधों मन पतंग को,उड़ जाने दो नवीन नभ की ओर
    हंस सम भरने दो,अति उमंग मे नई एक उड़ान स्वतंत्र
    भावों की डोर मे बंध निर्भय,करने दो अठखेलियाँ स्वच्छंद
    न खींचो धरा की ओर,बाँध पुरानी रस्मों,नियमों की डोर
    उड़ जाने दो मन पतंग को सुदूर कहीं नील गगन की ओर

    ****

    सतरंगी भूले मधुर सपनों के झिलमिल कागज से सजकर
    कामनाओं की सुकोमल,मृणालिनी सी तीलियों से बंधकर
    आनन्दमग्न भरने दो उड़ान नई,खुली हवा मे चहुँ ओर
    डोर रिश्तों की बाँध,निष्ठुर खींचो न यूँ धरा की ओर
    उड़ जाने दो मन पतंग को सुदूर कहीं नील गगन की ओर

    ****

    नाप लेने दो व्योम इसे यह नव नीलाभ सा अपरिचित
    चख लेने दो प्यासे मन बावरे को उछाह मे आजादी का अमृत
    करने दो किलोल,विस्मृत कर भू को ,हो लेने दोअब हर्षित
    बाँध उम्र के बंधन,न काटो निर्ममता से कोमल मन की डोर
    उड़ जाने दो मन पतंग को सुदूर कहीं नील गगन की ओर

     

  • WO—-

    (Jawaa Dilo ke dharrkan aur ehsas ko chhone ka prayas : ek shringaar rachna.)——–
    WO—-
    ———
    WO……..
    Muskuraa rahi–yun door se hi
    Kbb qarib aayegi……
    Intezaar mei ,pal guzar rahe
    Lamhe bhi beqaraar ho rahe
    Sapno ki chilmann se nihaarti,
    Muskuraati mujhe sataa rahi
    Jhalak–jhalak si door se hi—-
    Kbb qarib aayegi————-!

    Pataa hai use—jal rahaa hu main
    Tanhaa raho pe chal rahaa hu main
    Baichainiyo ki tapan naa puchho
    Dharrkano ki tarrap naa puchho
    Nazaro ki aot se hasti–muskati
    Khilkhilaati mujhe jalaa rahi
    Mahak–mahakk si door se hi—-
    Kbb qarib aayegi———!!

    Kahataa hai kya–sun dil ki kabhi
    Ai “waqt” rukk jaa–naa jaanaa abhi
    “ranjit”dil ki betaabiyaan
    Pal–pal badhti baichainiyaan
    Yu adaa se eithlaati—
    Balkhaati—meri jaaan liye jaa rahi
    Khushboo–khushbu si door se hi—
    Kbb qarib aayegi…………..!!!
    Haaaaye .kab qarib aayegi………..!!!!

    Ranjit Tiwari”Munna”

  • Aaj khush ho rahe hain…

    Karke naadaani….
    Aaj khush ho rahe hain
    Jhelte pareshani-
    Aaj khush ho rahe hain

    Chhorr kar pehchan ki-
    Sabhi nishaniyaa
    Badh rahi hai naitikk baimaaniyaa
    Bannkarr ADHURE gyaani
    Aaj khush ho rahe hain

    Bhatakk rahe pashchyat ki galiyo mei
    Palash ke dikhawati phool chunn rahe
    Taras rahi bhartiyata– lagaane ko gale
    Pichhe hatate jo-unki kadam choom rahe
    Karke khud se khichaataani
    Aaj khush ho rahe hain

    Main kaun hoon……
    Tum kaun ho– woh kaun hain
    Kyu aaj sabhi abb maun hain..(?)
    Sabhi ki shashwatataa gaun hain
    Phirr bhi nhi hairaani
    Aur.aaj khush ho rahe hain

    Kyu harr koi BHARTIYA nhi
    Kahte sabhi abb indian hain
    Jee rahe bhram ki bhulbhualaiiya mei
    Dikhawe mei hi tann-mann- Jivan hai
    Bahane lagaa hai-rago mei bhi—-
    Aadambar ka paani………….phirr bhi..
    Aaj khush ho rahe hain….

    Dharrkane laachaar hai..biwash hai
    Sahte–sahte zindagaani–…..phir bhi
    Aaj khush ho rahe hain…………………
    Aaj khush ho rahe hain…………….(!!)

    —Ranjit Tiwari”Munna”

  • Kuchh yaadein..

    Ek waadaa phir Milne ka bs wada bhr rah jate hain
    Bah jata hai samay ka dariya wo udhar- hum idhar rah jate hain

    Nikal jate hai door bahut pichhe ojhal saare ho jate hai
    Prr jati hai dhul yaado pr khandahar nazaare ho jate hai

    Ujarr jati hai duniya sb registaan sa ho jata hai
    Tadipaar ho jati khushiya,hara-bharaa sb viran ho jata hai

    Haqiqat fasaanaa ho jata hai,atit ban jataa hai
    Itfaaq ki mitha ghol bhi neem ka tit bnn jata hai

    Shayad hi mil paate kbhi,jaise dharti aur aakash milte hai
    Lekin na wo pariwesh milte,naa ehsaas milte hai

    Gaarri badh jaati hai,sawaari chhut jaate hai
    Jiska kuchh chhut jata mano wo lutt jate hai

    Hrr chij badalti hai,badlaav prakriti ka niyam hai
    Kahin geet khushiyo ki kahin gamo ka maatam hai
    Aaj Jo vartmaan hai kal wo atit ho jati hai
    Kabhi-kbhi preet bhi dard ki tees bann jati hai

    Hai daastaan apni apni koi tut krr girr jate hain
    To koi bahaar-e-aasmaan mei taro ki tarah timtimate hain.

  • नमो नमो नमो बुद्धाय

    नमो नमो  नमो  बुद्धाय।
    मन हमारा शुद्ध हो जाए।
    कठोर वाणी त्याग दें।
    सत्य सबको बांट दे।
    कमजोरों को हाथ दें।
    निर्धन का हम साथ दें।
    अपंग के गले लग जाएं।
    नमो नमो नमो बुद्धाय।
    विचार में प्रकाश हो।
    करुणा पर विश्वास हो।
    ज्यादा की नहीं आश हो।
    ज्ञान हमारे पास हो।
    दया धर्म हम अपनाएं।
    नमो नमो नमो बुद्धाय।।
    मद से हमारा नाता न हो।
    झूठ हमको आता न हो।
    पाप से हम सब दूर रहें।
    कर्मों से हम सब सूर रहें।।
    थोड़े में ही खुशी मनाएं।
    नमो नमो नमो बुद्धाय।
    निश्चय पर अटल रहें।
    मैत्री से हम हरपल रहें।
    पाखड़ों को तोड़ दे हम।
    रुढ़ीवाद छोड़ दें हम।
    जात पात को अब मिटाएं।
    नमो नमो नमो बुद्धाय।।
    अपने मन के अंदर झांको।
    द्वेष नहीं कभी तुम बांटो।
    क्रोध पर हम काबू रखें।
    अंतस में हम साधु रखें।
    शत्रु को भी गले से लगाएं।
    नमो नमो नमो बुद्धाय।
    संतोष को धन बना लें।
    त्याग का मन बना लें।
    प्रेम को हम हल बना लें।
    साथ आओ कल बना लें।
    उपदेश ये घर घर में जाए।
    नमो नमो नमो बुद्धाय।
    ओमप्रकाश चंदेल “अवसर”
    पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़

    7693919758

  • मजा आ गया होली में

    सभी मित्रोजनो को होली की अग्रिम शुभकामनाये। आप सबों को होली पर
    एक भेट! ******

    प्रेम-रस का रंग बरसाने
    निकली भर के झोली में !
    क्युँ मैं सखियों से बिछङी
    क्या आया रास अकेली में
    ताँक रहे थे पिया गली में।
    धर ले गए खींच दहेली में।
    हाथो को पकङा रंग गालो
    पर रगङा
    मूक रही कुछ न बोली मैं ।
    हाथो को जोङा पैरो को पकङा
    सुनी एक न मेरी हमजोली ने।
    मनभावन मेल लता-तरु सा
    आहा! मजा आ गया होली में!?
    -रमेश
    जय राधे- कृष्ण–

  • रविदास को गुरु बनाकर हम भी मीरा बन जाएं

    रविदास को गुरु बनाकर हम भी मीरा बन जाएं

    रविदास को गुरु बनाकर हम भी मीरा बन जाएं।
    द्वेष -कपट सब त्याग कर आज फकीरा बन जाएं।

    कोयला जैसा मन लेकर भटक रहा है मारा-मारा
    ज्ञान अगर मिल जाए तो संवर जाएगा कल तुम्हारा।
    रविदास के संग चलें और हम भी हीरा बन जाएं।
    रविदास को गुरु बनाकर हम भी मीरा बन जाएं।।

    क्रोध को तुम छोड़कर करम करो प्यारा-प्यारा।
    एक दुजे के गले लगो तो जग प्रसन्न होगा सारा।
    अंधकार को दुर भगा कर हम उजियारा बन जाएं।
    रविदास को गुरू बना कर हम भी मीरा बन जाएं।

    परमेश्वर आएंगे द्वार पर कर्म उत्तम हो तुम्हारा।
    कठौती में गंगा होगी, निर्मल हो गर मन हमारा।
    ज्यादा की चाह छोड़ कर आज कबीरा बन जाएं।
    रविदास को गुरु बना कर हम भी मीरा बन जाएं॥

    ओमप्रकाश चंदेल “अवसर”
    पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़ 7693919758

  • होली, रुत पर छा गयी है

    होली, रुत पर छा गयी है

    होली, रुत पर छा गयी।
    मस्तों की टोली आ गयी।।

    लाज़ शरम तुम छोड़ो।
    आज मुख मत मोड़ो।।
    दिल को दिल से जोड़ो।
    झूम कर अब बोलो॥
    होली, रुत पर छा गयी है।
    मस्तों की टोली आ गयी है।।

    यार को गले लगा लो।
    रंग गुलाल उड़ा लो।।
    मनमीत को बुला लो।
    प्रीत से तुम नहा लो।।
    फागुन में मस्ती छा गयी है।
    होली, रुत पर छा गयी है।

    बैठ के फाग गा लो ।
    आज नंगाड़ा बजा लो।।
    गोरी को भी बुला लो।
    गालों पे रंग लगा लो।
    उसकी बोली भा गयी है।
    होली, रुत पर छा गयी है।

    हंसनी को हमें रंगने दो।
    उनके मन में बसने दो।।
    आज दलदल मचने दो।
    प्रेम अब तो बरसने दो॥
    हमें चुनरी भीगी भा गयी है।
    होली, रुत पर छा गयी है॥

    बादल तुम इधर देखो।
    धरती से कुछ तो सीखो।।
    अंतस में तुम रंग भरो।
    आज गुलाबी वर्षा करो।।
    देख हमजोली आ गयी है।
    होली, रुत पर छा गयी है।।
    ओमप्रकाश चंदेल “अवसर”
    रानीतराई पाटन दुर्ग
    छत्तीसगढ़
    7693919758

  • दाँस्ता : एक दर्द

    सामने खड़ी  थी  वो  चंचल  हसीना ,
    दीवाना था जिसका मैं पागल कमीना,
    सब कह रहे थे तुझे देखती है ,
    मुझे भी लगा वो मुझे देखती है ,

    मैं इस  ओर  था  वो उस ओर थी,
    बीच में खिंच रही प्यार की डोर थी ,
    समाँ खामोश था वक्त मदहोश था ,
    वो भी मशहूर थी मैं भी मजबूर था ,

    जैसे  लफ्जों को  कोई  जुबाँ से खी़च रहा था ,
    सर्द हवाओं में भी बदन पसीने से भीग रहा था,
    बस  यूँ  ही कट रहा  वक्त  का  वो दौर  था ,      कुछ दिनों तक यूँ ही चला प्यार का सिलसिला ,

    बात याद  है उस दिन  की  मुझे ,
    रक्त रूक सा गया पैर जम से गये ,
    मुस्कुरा  के  जो उसने  इशारा  किया ,
    मैं अकिंचन ही उस ओर था बढ़ चला,

    बीच में आया कोई जिससे लिपट वो गई,
    दिल  पर  मेरे  बिजली  सी  गिर  गई,
    अपनी प्रेम कहानी यूँ ही पड़ी रह गई ,
    आँखों के मुहाने वो यूँ ही खड़ी रह गई,

  • अजीब इत्तफ़ाक़ है

    अजीब इत्तफ़ाक़ है

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे जाने और सावन के आने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरी चुप और मौसम के गुनगुनाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    मेरे माज़ी और मेरे मुस्कराने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे मिलने और मेरे ज़ख्म खाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे गेसू और घटाओं के छाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे तीर और कहीं चल जाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    मिल के और ग़ुम हो जाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    बंद आँखें और ख्वाब टूट जाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    ‘अरमान ‘ तेरे और तेरे अनजाने का

    राजेश ‘अरमान’

  • रुकते नहीं वो काफिले

    रुकते नहीं वो काफिले
    कितने चले कितने रुके ये न हम से पूछिए
    चल पड़े जो बाँह थामें रुकते नहीं वो काफिले |

    अक्षरों को जोड़ने में हिस्सा हमारा भी रहा
    इस अधूरी पटकथा में किस्सा हमारा भी रहा
    मानिए मत मानिए हम कह रहे
    आदमी के बीच में घटते रहेंगे फासले |

    लाख कोशिश कीजिए धर्म ध्वज को तोड़ने की
    आस्था की अकारण गर्दनें मरोड़ने की
    क्या कमी है गवाहों की यहाँ होते रहेंगे नामुरादी फैसले |

    संहिताएँ वांचते थक गई हैं पीढ़ियाँ
    ऊँची बहुत हैं न्याय पथ की सीढ़ियाँ
    सौंप दीं जब फाइलें हैं मुन्सिफों को
    उम्र भर लटके रहेंगे मामले |

    घेरते हों अँधेरे औ’आँधियाँ
    तूफ़ान भी साँप से फुँकारते
    सिंधु के उफान भी डाल दी जब डोंगियाँ
    जलधार में मानिए मत मानिए कम न होंगे हौसले |

    @ डॉ. मनोहर अभय

  • दिन आ रहे मधुमास के

    दिन आ रहे मधुमास के
    शीत है भयभीत
    खुशनुमा वातावरण ले रहा अँगड़ाइयाँ
    तोड़ हिम के आवरण कह गई कोकिला कान में
    कुहास के दिन आ रहे मधुमास के |

    गुनगुनी सी धूप होगी मधुभरी सी सुनहरी
    मंजीरे बजाने आ रही मधुमती सी
    मधुकरी मकरंद ले कर
    झूमते झोंके झुके सुवास के |

    तितलियों से भर गईं क्यारियाँ फुलवारियाँ
    कलियाँ सियानी मारती रस गंध की पिचकारियाँ
    ढपली बजाते मधुप चंचल फागुनी उल्लास के |

    अब जलेंगीं अवदमन की थरथराती होलियाँ
    देखना है राजपथ पर कब तक बँटेंगीं थैलियाँ
    द्वार खुलने को विवश हैं अब नए आवास के |

  • VEKH BHAGAT SINGH !

    VEKH BHAGAT SINGH ! tere supney’n da desh,

    jagah-jagah te painda, jaat-dharam da kalesh.

    ditti si jaan tu,taan jo desh azaad ho jaawe,

    naa ki mulk andr,gareeb-berozgaar pachtaawe,

     

    ” faansi da fandha aapne gll paundey tu,

    socheya tan ni hona,

    kll nu saropey paingye, zaalam sarkaaran de gll..”

     

    Geet’n ch tan tera aksar zikr hunda hai,

    23 te 28 di chutti da v fikr hunda ay,

    nahi hunda j kuch,

    tan oh TERI SOCH DA SHIKHAR HUNDA  ay .

     

    khair! ajj v tu sochda howeinga,

    ik aas ch baitha howeinga,

    koi naujwaan ikalli teri soch,

    parheiga-likhega nahi,

    saraahega nahi,

    saggon,tere supney’n da BHARAT LAIKEY KHALOWEGA !!

     

  • ये गीत मेरे

    नैनो के सूखे मेघो से मैं आज अगर बरसात करूँ ,
    हल करुँ ज़मीन ए दिल में मैं नीर कहाँ से मगर भरूँ?
    है सूख चुका अब नेत्र कूप न मन का उहापोह बचा ,
    न मेघ रहा न सावन है ,मिट गया जो कुछ था पास बचा .
    एक बार हौसला करके मैंने बीज प्रेम के बोये थे ,
    न मौसम ने रखवाली की ,सावन ने पात न धोये थे .
    अब न मन है , न मौसम है ,न उर्वर क्षमता धरती की ,
    न नैनो में अब पानी है ,न दिल में इच्छा खेती की .
    रोते है मेघ और कूप सभी ,करता विलाप अब ये मन है ,
    फिर भी न आंसू गिरते है ,न नैनो में इतना दम है .
    अब बस अंधियारी रातो का यह निपट घना सन्नाटा है ,
    दिल रोता है , मैं लिखता हूँ ,जीवन से पल का नाता है .
    मैं जाऊँ पर ये गीत मेरे ,फिर किसी जमीन ए बंज़र में ,
    मेघ बने ,बरसात करे ,फिर किसी अकालिक मंज़र में …

    …atr

  • तुम ही हो

    कैसी कशिश हैं तुम्हारी आँखों में, पल में छपा दिल में अक्स तेरा,,
    मुझसे जुदा अगर हो जाएगा तो रब से भी छीन लाऊंगा सदा,,

    Because you are the one,
    Only you are the one,
    My destiny is only you are the one,,
    Tell a way,, I wanna rule your heart,,
    As you seem to be my dream one..

    तू हैं मेरी,, मैं हूँ तेरा,, कुछ भी और हमारा नहीं,,
    ये मेरा दिल भी हैं घर तेरा,, जिसमे गम भी तुम्हारा नहीं,,
    तेरे होठों की हर-एक मुस्कान पर मैं,,हाँ वार दूँ ये सारा जहाँ,,
    क्योंकि तुम ही हो, अब तुम ही हो,,
    मेरी आरज़ू अब तुम ही हो,,
    मेरा यार भी,, ऐतबार भी,,
    मेरा प्यार भी अब तुम ही हो,,

    मेरे दिल में तेरी यादें,,
    ऐसी बसी फरियादे,,
    तेरी यादों में हर पल गुज़ारा,,
    आके तू मिल जा,, मुझको दुबारा,,
    यूं तो इश्क किया तूने खुद कान्हा,,
    अब तेरी क्या हैं सलाह,,

    अब बोल भी दे ,, मुस्करा भी दे,,
    तेरे दिल में हैं वो बता भी दे,,
    यूं ना तू मुझको तडपा,,
    अपने दिल में तू बसा भी ले,,

  • शिक्षा

    हम सबकी तरफ से हर-एक अध्यापक-गुरुजन  को सादर नमन

     

    हैं पावन दिवस आज, करते हैं हम उनको प्रणाम,

    जो ज्ञान की लौ जला कर मन अलौकिक करते रहते।

    जन्म दिया माँबाप ने और राह दिखलाई हैं सबने,

    सबके आशीर्वाद से ही हम हैं आगे बढ़ते रहते॥

     

    जिन्दा रहने का असल अंदाज सिखलाया इन्होने।

    ज़िन्दगी हैं ज़िन्दगी के बाद बतलाया इन्होने।

    खुद तो तप की अग्नि में जल कर हैं बनते रहते कोयला,

    पर जहाँ को कोहिनूर मिला सदा इनकी खानों से ॥

    हमने तो माँगा था फल पर दी सदा इन्होंने ‘गुठली’,

    अपमान सा हमको लगा पर हो अंकुरित ‘कल्प’ निकली।

    उसी वृक्ष की छांव में हम नित्य बनाते बसेरे,

    पर उसे ही भूल जाते जो जड़ो में हैं समेटे॥

    जन्म दिया माँ बाप ……….

    हैं पावन दिवस……….

     

    आज जब देखा खुद को ज्ञान की गलियों में “अंकित”।

    विचित्र सी तबीयत खिली पर ख्वाब दिल में पनपे शंकित।

    शिक्षा जो पानी की भांति होनी थी सब के लिए पर,

    आवश्यक तत्व होने पर भी प्रतिरूप पानी बनाना काल्पनिक॥

    शिक्षा बनी व्यापार केंद्र, इसे बेचने सब आपाधाप निकले।

    औरो से क्या अरमां रखे जब सरकारी सब के बाप निकले।

    आश है, विश्वास हैं, अब आकुल सुंदर-सौरभित सुरभि पर,

    तम में ज्ञान-दीप जला कर कमनीय-कीर्ति गौरव गिरिवर निकले॥

    जन्म दिया माँ बाप ……….

    हैं पवन दिवस……….

     

    सस्वर पाठ:

    तो हैं नमन उनको की जो यशकाय को अमृत्व दे कर,

    इस जगत में शौर्य की जीवित कहानी हो गए हैं।

    तो हैं नमन उनको जिनके सामने बौना हिमालय,

    जो धरा पर रह कर भी आसमानी हो गए हैं।

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