Category: गीत

  • मन थिरक उठो

    *मन थिरक उठो…”*
    ***********
    कभी पुराने नहीं रहेंगे
    ये रसभरे , सुरीले गीत ।
    सदा नयापन। देंगे मन को ,
    यह है इन गीतों की रीत।

    आपका अपना मित्र
    जानकी प्रसाद विवश

  • बोल दू

    बोल दू !
    जो बातें दबी है इस दिल में
    बोल दू!
    जो साँसे महसूस होने लगी है।
    मोड़ दू!
    इन नगमों का रुख तेरी तरफ।
    जैसे कड़ी धूप में पिघलती बर्फ के पानी मे मेरे शब्दों का फिसलना
    भूझी आग की खाक में बनी राख-ए-तमन्ना
    बोल दू।
    इन गहरी आंखों में छुपे राज़ खोल दू!
    मोल दू?
    तेरी की उन बहकी बातों को
    हाथों को खोल दू!
    तेरा हाथ थाम लेने को?
    देने को!
    साथ उम्र भर का।
    कहो ना!
    बोल दू।
    जो बातें दबी है इस दिल मे।?

  • Sun Zara

    Sun Zara

    मैं आसमां की ऊंचाइयों को छू लूंगी,
    तू पिंजरा तो खोल ज़रा।
    मैं दिल की गहराइयों को छू लूंगी,
    तू1मुझे वक्त तो दे ज़रा।
    मैं हर कदम पर तेरा साथ दूंगी,
    तू मुझे समझ तो ज़रा।
    मैं हर मुसीबत को दूर कर दूंगी,
    तू मुझपर भरोसा तो कर ज़रा।
    मैं हर जगह मान बढ़ाऊंगी तेरा,
    तू मुझे सम्मान तो दे ज़रा ।
    मैं लड़की हूँ, हर कदम पर जीत जाउंगी,
    तू मुझे जीने तो दे ज़रा।

  • सार्थक भाव विक्षेप

    अवसाद का विक्षोभ नीरव, चपल मन का क्लांत कलरव
    देखता पीछे चला है लगा मर्मित स्वरों के पर ।

    शुष्क हिम सा विकल मरु मन, भासता गतिशील सा अब,
    भाव ऊष्मा जो समेटे बह चला कल कल हो निर्झर।

    विगत कल में था जो मन मरु और अस्तु प्रस्तर,
    विकलता का अमिय पी फूटा था अंकुर।

    हूँ अचंभित आज मै खुद, पा वो खोया अन्तः का धन,
    धन की जो था विस्मृत सा, मन विपिन में लुट गया था,
    स्वार्थ और संकीर्णता के चोर डाकू ले उड़े थे।

    आज लौटाया उन्हीनें हो शुचित उस विकलता मन्दाकिनी में डूबकर फिर….

    दृष्टि ये धुल सी गई है, सामने सृष्टि नई है,
    जगत सारा मित्र है अब, शत्रु अब कोई नहीं है ।

    अधर पर मुस्कान है अब, ना कोई अनजान है अब,
    विगत कल की स्वार्थपरता आज का अज्ञान है अब।

    विसम दृष्टित भाव जो थे सघन गुम्फित वेदना पुष्पावली के सघन भीतर
    वस्तुतः संचित किये सम्भाव्य विधि के अनकहे स्वर ।

    अस्तु आवश्यक विकलता खोजने निज वास्तविक मन,
    वरन खो देंगे खुद ही को, बना कृत्रिम शुष्क जीवन,

    मन विटप का तृषित चातक पा गया क्षण स्वाति का जल…..

  • ajo money porey

    sloth goti cholchey gari
    ajo thomkey daraye eye mon amari
    khub chena akta goli diye
    jekhaney hetey chilam bhalobashar sopno niye

    abujh se mon ajo korey smirti charon
    soney na kono baron
    moner ki esechey shrabon
    keno ajo bhijey jaye eye nayon

  • मैं अकेला….

    मैं अकेला था अकेला हूँ अकेला रह गया,
    ज़िन्दगी की धूप छाँव सब खुशी से सह गया।
    टूटा हूँ पत्ते सा क्यूँकि मेरी सूखी डाली है,
    न खता हवा के झोंकों की न दोसी कोई माली है।
    जबसे तुमने नींव तोड़ी है मेरे विश्वास की,
    मैं किसी कच्चे मकाँ सा भरभरा के ढह गया।
    मैं अकेला था अकेला हूँ अकेला रह गया।

    इक पवन मद्धम सी शीतल है मैं उससे जुड़ गया,
    बन के वो तूफान मुझको संग लेके उड़ गया,
    सारे हृदय की पीर बस एक साँस में ही पी गया,
    मुख से निकली आह न होठों को ऐसे सी गया।
    इक फूल था मैंने सजाया अपनें दिल की सेज पे,
    वो फूल मेरे हृदय में ही शूल बन के रह गया।
    मैं अकेला था अकेला हूँ अकेला रह गया।

    मैंने समझा खुद को जैसे मैं कोई चट्टान हूँ,
    आई तेरी बाढ़ ऐसी मैं ही मुझ से बह गया।
    तृप्ति की इक बूँद पीने को मैं मुख फैलाये था,
    वो गिरी जब कंठ, मैं आकंठ बिष से भर गया।
    तेरे अहसासों की छुवन अब बन गये मेरे कफ़न,
    तेरी यादों की चुनरिया में दफन हो सो गया।
    मैं अकेला था अकेला हूँ अकेला हो गया।

    अभिषेक सिंह।

  • बाबुजी की याद में…..

    *ओ बाबुजी…*

    बहुत याद आते हो ओ बाबूजी
    दिल को रुलाते हो ओ बाबुजी ।।

    जीना तुम्हारे बिन गवारा नहीं
    धड़कते हो सीने में ओ बाबुजी।।

    अंधेरी है दुनिया अंधेरी है राहें
    अंधेरी है खुशियां ओ बाबुजी।।

    रोता है सूरज पूरब सुबह से
    अश्क़ों में डूबे दिन ओ बाबुजी।।

    घर की दीवारें आसमा सितारे
    क्षितिज तक है सुबकन ओ बाबुजी।।

    नींद और निवाले भी दुश्मन हुए
    सांस भी खिलाफत में ओ बाबूजी।।

    सुबह के अज़ान और प्रभु आरती
    कुछ भी नहीं भाते ओ बाबुजी।।

    जिद्द है हमारी की लौट आओ तुम
    हठ न छोड़ेंगे हम ..ओ बाबुजी ।।

    @-1813/15.

  • भूल जाना मोहब्बत को मुमकिन नही

    भूल जाना मोहब्वत को मुमकिन नही
    भूल जाने की तुम यूँ ही जिद्द न करो
    अश्को को तुम छुपा लोगे माना मगर
    इन नजरों को कैसे संभालोगे तुम
    ये होठो की लाली झूटी सही
    इन सांसों को कैसे संभालोगे तुम
    ये आएंगी मिलने की रुत फिर वही
    सच मे मिलने कभी भी न आओगे तुम
    इस दिल की मुझे क्या पता क्या कहूँ
    बिन मेरे जिंदगी क्या बितालोगे तुम
    इस दुनियां में फिर मिल गए हम कभी
    खुद को खुद से ही कैसे छुपा लोगे तुम
    के इतना आसां नही ये कोई खेल है
    तुम न मानो मगर जन्मों का मेल है
    मैं तो जी लूंगा इक तेरे खाब में
    तेरी चाह में और तेरी राह में
    तेरी आँखों मे आंसू नही है पसंद
    ये ही सोच रख लेंगे तेरा भ्रम
    मेरी सांसो को अब भी यही काम है
    जीना मरना इन्हें बस तेरे नाम है
    अपने ख़्वाबों की तुमसे अब क्या कहूँ
    तेरे ख़्वाब अब भी मेरे ख़्वाब है
    जिंदगी से मुझे कुछ गिला ही नही
    इक तेरे प्यार में ये जहाँ जी लीया
    मौत आ जाये चाहे कभी भी मगर
    मुलाकात का एक सफर दीजिये
    मेरे मरने से पहले ओ बेखबर
    मौहब्बत का कुछ हक़ अदा कीजिये
    चलिए आइये आप फिर से वही
    जहां से चले थे संग मिल हम कभी
    जिंदगी तो मुझे बड़ी भारी रही
    मौत को मेरी आसां बना दीजिये
    चले आईये आप फिर से वही…
    @प्रदीप सुमनाक्षर

  • रंग क्या होंगे

    रंग क्या होंगे—?
    ————————-

    लिखेगी लेखनि कौन सा अक्षर
    स्याही के रंग क्या होंगे–?
    लफ़्जें कहेंगी कहानी कौन सी
    कथाओं में उमंग क्या होंगे—?

    झलकेगा इनमें कौन सा रूप
    झूठ बोलेगा,सच होगा चुप
    उपहासें या खिलखिलाहटें
    हँसी के रंग क्या होंगे—?

    फ़सानें-अफ़सानें हज़ार बातें
    मुद्दों का मसला नज़र नहीं आता
    किसलिए ये भागमभाग है मची
    कोई फ़ैसला नज़र नहीं आता
    तो,समय के रंग क्या होंगे—?

    ज़िन्दग़ानी ऐसी,सबब क्या–
    वक़्त मानो गुज़ार रहें हैं
    धर्म कहीं और कर्म कहीं
    पता नहीं लोग कहाँ जा रहें हैं
    तो,तहज़ीब के रंग क्या होंगे–?

    भेद पता नहीं—
    भौतिकता और यथार्थ में
    किसे छोड़ रहे,अपनाते किसे हैं
    स्वार्थ का मेल हो रहा हो जहाँ
    तो,प्यार के रंग क्या होंगे—?

    छिनना,बटोरना, पा लेना
    है आसान बहुत इस जहाँ में
    लुप्त हो रही मानवता —
    “मतलब”के संकीर्णता में जकड़े
    फिर,भावों के रंग क्या होंगे—?

    रंगीन होते मुखड़े सबके
    दिल फिर भी रंगहीन है
    उदासीन है रिश्तों की हँसी
    मुस्कुराहट भी ग़मगीन है
    तो,बंधनों के रंग क्या होंगे–?

    प्यार की बातें सिर्फ़ ज़ुबाँ पर
    किसने अर्थ को जाना है–?
    शाश्वतता और पवित्रता इनकी
    किसनें अबतक पहचाना है–?
    बनावटीपश और दिखावटीपन
    फिर,समर्पण के रंग क्या होंगे–?

    रंग भी शर्मशार रंग को.जानकर
    छुट रहे रंग,सभी रंग के
    हैं सभी उदासीन,बनकर मशीन
    एहसास,क़शिश और प्रेम बिना
    जीवन के रंग क्या होंगे—??

    ——-रंजित तिवारी “मुन्ना”

  • पत्र आता

    तन वदन मन खिलखिलाता ,
    जब किसी का पत्र आता ।

    पत्र के उर में बसे हैं ,
    प्रेमियों के भाव गहरे ।
    दूर हों चाहे भले वे ,
    पत्र से नजदीक ठहरे ।

    पत्र ही ऐसा सुसेवक ,
    दूरियाँ सबकी मिटाता ।

    बहुत दिन तक जब किसी के ,
    दर्शनों को मन तरसता ।
    मीत की पाती मिले जब ,
    प्यार अंतर में बरसता ।

    प्यार का पानी पिलाकर ,
    प्यास को पल पल बढा़ता।

    जब कभी आकुल हुआ मन ,
    लेखनी पर दृष्टि जाती ।
    विरह-गाथा कागजों पर ,
    चित्त के रूपक सजाती ।

    क्या लिखूँ आगे कलम से ,
    बीच में कोई रुलाता ।

    पत्र के द्वारा गए हैं ,
    गीत मन के मीत -द्वारे ।
    गूँजते जिसके अधर पर ,
    मिलन के संगीत न्यारे ।

    पीक को अनुकूल क्षण में ,
    स्वाँति के सीकर पिलाता ।

    पत्र म सुखदुख भरा है ,
    मेघ सा दृग पर सुहाता ।
    सांत्वना देता स्वरों से ,
    अंत में जो बरस जाता ।

    आँसुओं से सिंधु बनता ,
    नेह में मन डूब जाता ।

  • आ गया अब शीत का मौसम

    आ गया अब शीत का मौसम
    कंपकंपी के गीत का मौसम ।
    झील सरिता सर हैं खामोश
    अब न लहर में तनिक भी जोश
    वृक्ष की शाखें नहीं मचलें
    लग रहा अब है न तनिक होश

    धूप के संगीत का मौसम
    गर्मियों के मीत का मौसम

    उमंगों पर है कड़ा पहरा
    जो जहां पर है वहीं ठहरा
    किसलिये है भावना वेवश
    शीत का यह राज है गहरा

    शीत से है प्रीत का मौसम
    धूप से विपरीत का मौसम।

    अधर तक मन का धुँआ आता
    दर्द का हर छंद दोहराता
    चुभन की अनुभूति क्या प्यारी
    आँसुओं का सिंधु लहराता

    लगा मन की जीत का मौसम
    आ गया मन मीत का मौसम।
    निरंतर पढ़ते रहें रचना संसार…..

  • आपकी छवि

    सर्दियों में धूप मनको
    जिस तरह प्यारी लगे ।
    आपकी छवि व्यथित मन को
    परम सुखकारी लगे ।
    मौन रह.अनकही बातें ,
    शेष कहने को रहीं ।
    जिस जगह से भी गुजरते ,
    आप मिल जाते वहीं ।

    मुसकराहट मन चुराती ,
    कल्पना हो आपकी
    क्या पता कब याद आएँ ,
    याद बनजारी लगे ।

    दर्द भी कैसा दिया है ,
    अब दवा लगने लगा ।
    आगमन की आस में ,
    मन जागरण करने लगा ।
    द्वार पलकों के न इक पल,
    बंद हो पाते कभी ,
    चिर प्रतीक्षा की घड़ी ,
    अब ,और भी भारी लगे ।
    आ गए वे ,पलक वंदरवार से ,
    सजने लगे ।
    विपिन से एकांत मन में ,
    वाद्य से बजने लगे ।
    अश्रु आँखोंके पुलकने -किलकने
    अब लग.गए ,
    अश्रु की धारा नहीं अब,
    तनिक भी खारी लगे ।
    ढल गए वे दिवस निर्दय –
    नाग से डसने लगे ।
    आँख ने आँसू छिपाए ,
    पर अधर हँसते रहे ।
    मिलनकी बेला , उमंगों की,
    हृदय में उर्मियाँ ।
    इन क्षणों में , चिर विरह की ,
    आज लाचारी लगे ।

  • prem samandar hota hai

    ऊपर से कुछ दिख न पाए , अंदर अंदर होता है
    गहराई में नप न पाए , प्रेम समंदर होता है
    लोगो ने है कितना लूटा प्रेम तो फिर भी पावन है
    जिसमे आंख से आंसू छलके, प्रेम वो सूंदर होता है
    प्रेम का देखो साधक बनकर, व्याकुल ब्यथित कबीरा है
    लोक लाज को त्याग के नाची , प्रेम दीवानी मीरा है
    बिन देखे ही बिन परखे ही करते लोग समर्पण है
    दिल में तक जो घाब बनादे ,पेना खंजर होता है
    सहज सहज सा भलापन है ,सहज है इसमें कठिनाई
    प्रियतम को तुम भले भुला दो , पीछा करती परछाई
    जिसको वादा मिला ख़ुशी का नयन तो उसके गीले है
    छोटी बदरि नहीं प्रेम की , पूरा अम्बर होता है
    शेखर कुमार

  • अब ना गाऊंगा

    अब ना गाऊंगा

    अब ना गाऊंगा गित तेरे यादो की.

    अब ना चाहुंगा प्रित तेरे सांसो की.

    कुछ थमा तुम्हारे हमारे बिच यादो का गुलिस्ता.

    जो हमसफर रुठ चुका हमारे घर से.

    जो चूक चुका महफिल की रंजोगम से.

    फिर गित ना गा पाऊंगा.

    महबूब तुझे गुनगुना ना पाऊंगा.

    1. अवधेश कुमार राय “अवध”


  • मैं बस्तर हूँ

    मैं बस्तर हूँ

    दुनियाँ का कोई कानून चलता नहीं।
    रौशनी का दिया कोई जलता नहीं।
    कोशिशें अमन की दफन हो गयी
    हर मुद्दे पे बंदूक चलन हो गयी॥
    कुछ अरसे पहले मैं गुलजार था।
    इस बियाबान जंगल में बहार था।
    आधियाँ फिर ऐसी चलने लगी।
    नफरतों से बस्तीयाँ जलने लगी।
    मैं आसरा था भोले भालों का
    मैं बसेरा था मेहनत वालों का।
    जर्रा जर्रा ये मेरा बोल रहा है
    दरदे दिल अपना खोल रहा है।
    अबूझ वनवासियों का मैं घर हूँ।।
    आके देखो मुझे मैं बस्तर हूँ।।
    तुम सम्हालो मुझे,मैं बस्तर हूँ।
    तुम बचालो मुझे, मैं बस्तर हूँ॥

    दंडेवाड़ा से झिरम के घाटी तक।
    चारामा से कोंटा के माटी तक।।
    अपने ही घर में मैं शरणार्थी हूँ।
    हे।देन्तेश्वरी मै क्षमा प्रार्थी हूँ।
    अस्मत बेटियों का कौन लूट रहा।
    न्याय के मंदिर से कातिल छूट रहा।
    पहरेदार और माओ जब लड़ने लगे।
    शक में हम बेकसूर यूं ही मरने लगे।।
    मुखबिर समझकर माओ ने मारा।
    पहरेदारों को भी है तमगा प्यारा।
    नक्सलवाद से जला मैं वो शहर हूँ।
    तुम बचालो मुझे, मैं बस्तर हूँ
    तुम सम्हालो मुझे,मैं बस्तर हूँ।
    तुम बचालो मुझे, मैं बस्तर हूँ॥

    कुंटुमसर के घुमने वालों
    चित्रकोट में झूमने वालो
    तिरथगढ़ में नहाने वालों
    इंद्रावती के चाहने वालों
    रो रहा हूँ मैं फरियाद सुनो
    छत्तीसगढिया भाई आवाज सुनो।
    हिन्दुस्तानी आवाम सुनो।
    रायपुर के हुक्मरान सुनो॥
    मत काटो जंगल झाड़ी को
    पहचानों तुम शिकारी को
    उजाडो मत इस आशियाने को
    आदिवासी तरस रहे हैं खाने को
    अबूझ हल्बा मडिया और भतर हूँ
    आके देखो मुझे, मैं बस्तर हूँ॥
    तुम सम्हालो मुझे,मैं बस्तर हूँ।
    तुम बचालो मुझे, मैं बस्तर हूँ॥

    लाल सलाम के इस दंगल में।
    बारुद बिछ गया है जंगल में।
    जिन्दगी यहाँ पर महफूज नहीं।
    मौत भी यहाँ रहकर खुश नहीं।
    हर घर से जनाजा उठ रहा है।
    शमशान को कौन पुछ रहा है॥
    नौजवान खुलकर बोलता नहीं।
    दर्द है दिल में मगर खोलता नहीं।।
    कनपटी पे सबके बंदूक तना है।
    दरिंदा, हमारा मसीहा बना है।
    सलवा जुडूम में मैं मरता रहा।
    बदूंको से निहत्था लडता रहा।।
    नक्सलवाद में गुमराह हुये
    मेरे बच्चे देखो तबाह हुये॥
    तबाही का मैं वो, मंजर हूँ।
    आके देखो मुझे, मैं बस्तर हूँ।
    तुम सम्हालो मुझे,मैं बस्तर हूँ।
    तुम बचालो मुझे, मैं बस्तर हूँ॥

    शौक से यहाँ तुम उद्योग लगावो
    पर रहे हम कहाँ ये भी बताओ।
    अब महुआ बिनने जायेगा कौन।
    चार तेदुं जंगल के लायेगा कौन।।
    कौन सुनाएगा फिर अमिट कहानी।
    दिखाएगा कौन शबरी की निशानी।।
    हद से जियादा हमारी चाह नहीं।
    सोने चादीं का हमको परवाह नहीं।
    दो जून की रोटी ,और परिधान मिले।
    अपने ही माटी में,हमें सम्मान मिले।
    बस इतनी सी हमारी जो चाहत है।
    इस पर कहते हो आप आफत है।।
    मजाक मत उड़ाओ मेरे भोलेपन का।
    कुछ तो सिला दो मेरे अपनेपन का।
    बुद्ध भी हूँ मै,और मैं ही गदर हूँ।
    आके देखो मुझे,मैं बस्तर हूँ॥
    तुम सम्हालो मुझे,मैं बस्तर हूँ।
    तुम बचालो मुझे, मैं बस्तर हूँ॥
    ओमप्रकाश अवसर
    पाटन दुर्ग छ०ग०

    7693919758 

    दुनियाँ का कोई कानून चलता नही।
    रौशनी का दिया कोई जलता नहीं।
    कोशिशें अमन की दफन हो गयी
    हर मुद्दे पे बंदूक चलन हो गयी॥
    कुछ अरसे पहले मैं गुलजार था।
    इस बियाबान जंगल में बहार था।
    आधियाँ फिर ऐसी चलने लगी।
    नफरतों से बस्तीयाँ जलने लगी।
    मैं आसरा था भोले भालों का
    मैं बसेरा था मेहनत वालों का।
    जर्रा जर्रा ये मेरा बोल रहा है
    दरदे दिल अपना खोल रहा है।
    अबूझ वनवासियों का मैं घर हूँ।।
    आके देखो मुझे मैं बस्तर हूँ।।
    तुम सम्हालो मुझे,मैं बस्तर हूँ।
    तुम बचालो मुझे, मैं बस्तर हूँ॥

    दंडेवाड़ा से झिरम के घाटी तक।
    चारामा से कोंटा के माटी तक।।
    अपने ही घर में मैं शरणार्थी हूँ।
    हे।देन्तेश्वरी मै क्षमा प्रार्थी हूँ।
    अस्मत बेटियों का कौन लूट रहा।
    न्याय के मंदिर से कातिल छूट रहा।
    पहरेदार और माओ जब लड़ने लगे।
    शक में हम बेकसूर यूं ही मरने लगे।।
    मुखबिर समझकर माओ ने मारा।
    पहरेदारों को भी है तमगा प्यारा।
    नक्सलवाद से जला मैं वो शहर हूँ।
    तुम बचालो मुझे, मैं बस्तर हूँ
    तुम सम्हालो मुझे,मैं बस्तर हूँ।
    तुम बचालो मुझे, मैं बस्तर हूँ॥

    कुंटुमसर के घुमने वालों
    चित्रकोट में झूमने वालो
    तिरथगढ़ में नहाने वालों
    इंद्रावती के चाहने वालों
    रो रहा हूँ मैं फरियाद सुनो
    छत्तीसगढिया भाई आवाज सुनो।
    हिन्दुस्तानी आवाम सुनो।
    रायपुर के हुक्मरान सुनो॥
    मत काटो जंगल झाड़ी को
    पहचानों तुम शिकारी को
    उजाडो मत इस आशियाने को
    आदिवासी तरस रहे हैं खाने को
    अबूझ हल्बा मडिया और भतर हूँ
    आके देखो मुझे, मैं बस्तर हूँ॥
    तुम सम्हालो मुझे,मैं बस्तर हूँ।
    तुम बचालो मुझे, मैं बस्तर हूँ॥

    लाल सलाम के इस दंगल में।
    बारुद बिछ गया है जंगल में।
    जिन्दगी यहाँ पर महफूज नहीं।
    मौत भी यहाँ रहकर खुश नहीं।
    हर घर से जनाजा उठ रहा है।
    शमशान को कौन पुछ रहा है॥
    नौजवान खुलकर बोलता नहीं।
    दर्द है दिल में मगर खोलता नहीं।।
    कनपटी पे सबके बंदूक तना है।
    दरिंदा, हमारा मसीहा बना है।
    सलवा जुडूम में मैं मरता रहा।
    बदूंको से निहत्था लडता रहा।।
    नक्सलवाद में गुमराह हुये
    मेरे बच्चे देखो तबाह हुये॥
    तबाही का मैं वो, मंजर हूँ।
    आके देखो मुझे, मैं बस्तर हूँ।
    तुम सम्हालो मुझे,मैं बस्तर हूँ।
    तुम बचालो मुझे, मैं बस्तर हूँ॥

    शौक से यहाँ तुम उद्योग लगावो
    पर रहे हम कहाँ ये भी बताओ।
    अब महुआ बिनने जायेगा कौन।
    चार तेदुं जंगल के लायेगा कौन।।
    कौन सुनाएगा फिर अमिट कहानी।
    दिखाएगा कौन शबरी की निशानी।।
    हद से जियादा हमारी चाह नहीं।
    सोने-चांदी का हमको परवाह नहीं।
    दो जून की रोटी ,और परिधान मिले।
    अपने ही माटी में,हमें सम्मान मिले।
    बस इतनी सी हमारी जो चाहत है।
    इस पर कहते हो आप आफत है।।
    मजाक मत उड़ाओ मेरे भोलेपन का।
    कुछ तो सिला दो मेरे अपनेपन का।
    बुद्ध भी हूँ मै,और मैं ही गदर हूँ।
    आके देखो मुझे,मैं बस्तर हूँ॥
    तुम सम्हालो मुझे,मैं बस्तर हूँ।
    तुम बचालो मुझे, मैं बस्तर हूँ॥
    ओमप्रकाश अवसर
    पाटन दुर्ग
    7693919758

  • कम आंकी

    मेरी बातों में बस तुम थी , मगर मेरी बात कम आंकी

    तेरे यारों के कुनबे में , मेरी जात कम आंकी

    अपने अल्फाजों से मुझे दो पल में पराया करने वाले

    तूने प्यार के आगे मेरी औक़ात कम आंकी ।।

  • द्वय–वय–जीवन उत्कृष्ट विभूषित

    हृदय–पटल पर नृत्यमय
    नुपुर झनक से झंकृत
    हूँ विस्मित मैं मधु-स्वर से
    विह्वल अभिराम को आह्लादित

    तिमिर अंतस को कर धवल—
    कनक–खनक करके उज्जवल
    सारंग–सा हो भाव प्रज्जवलित
    सोम–सुधा सा रुप लक्षित

    दृग–कामना भी छलक रही—
    पलक पर व्याकुलता थिरक रही
    विधु–विनोद–अनुराग मिश्रित
    गुण–प्रभा इला चंचला सुसज्जित

    प्रखर–सौन्दर्य अपूर्व–अनुपम
    आलिंगन को प्रेयस मन सिंचित
    श्रृँगार–मधुरिम और मिलन–यामिनी
    शाश्वत–पुष्प सा स्वप्न ‘रंजित’

    चित्त निर्मल निर्झर सा कल–कल
    श्वास—वाटिका हों सुगंधित
    मति–सुमति का सुवास पल–पल—
    द्वय–वय–जीवन उत्कृष्ट विभूषित….||

    ——– रंजित तिवारी “मुन्ना”

  • ||देखो क्या है हालत मेरे हिन्दूस्तान की ||

    किस्मत हमारी लटक रही है जैसे पाव में पायल ,
    भारत माँ विलख रही है जैसे दीन-दुखी घायल ,
    जिस आँचल में पले- बढे उसमे बम- गोले फुट रहे है ,
    एक सिरे से खुद बेटा दूसरे से दुश्मन लूट रहे है ,
    रूह काँप उठता है देखकर हालत वर्तमान की ,
    देखो क्या है हालत विधाता मेरे हिन्दूस्तान की|
    जहा सोने की चिड़िया रहती वो भारत मेरा बगीचा था ,
    जिसको खुद ‘बिस्मिल’ ने अपने खुनो से सिंचा था ,
    जिसने भारत माँ की सेवा में कुर्बान किया जवानी को ,
    उसकी अम्मा क्यों तड़प रही आज बून्द-बून्द पानी को ,
    जनता भटक रही है खोज में रास्ता इससे निदान की ,
    देखो क्या है हालत विधाता मेरे हिन्दूस्तान की||
    जो कल तक वादा कर रहे थे हम लिखेंगे तक़दीर ,
    वो आज संसद जाते ही हरने लगे संविधान की चिर ,
    जिसको अपना रक्षक समझकर बनाये वजीर ,
    वो आजादी जागीर समझ कर फ़ेंक रहे वीरों की तस्वीर,
    अखबारों में छप के रह जाती कथा वीरो की वलिदान की,
    देखो क्या है हालत विधाता मेरे हिन्दूस्तान की||
    ©अभिषेक आर्य

  • दूर-दूर का रहना…

    तेरा दूर-दूर का रहना ले जाये
    मोर चैना
    तेरी रहा तकै है अंखिया
    ताने देती घर गालिया
    तेरी राह तकै हुए बरसो
    अब छोड़ भी कल परसो
    तेरी सोच मे बीती रैना
    मोर लोटा अब तू चैना
    तेरा दूर-दूर का रहना ले जाये
    मोर चैना !
    कब तक रहु मैं ऐसे
    कब तक राहु मैं वैसे
    इक पल मे ये  सोचू
    इक पल मे वो सोचू
    तू ज्यादा है छलिया या
    ज्यादा है मनबसिया
    तेरा दूर-दूर का रहना ले जाये
    मोर चैना !
    कभी तुझ पे दिल हारु
    कभी तुझ से हारु
    छोड़ हार जीत का पहरा
    अब तू दिखा भी दे चेहरा
    तेरा दूर-दूर का रहना ले जाये
    मोर चैना !

  • चला जाऊँगा एक दिन मैं।।

    चला जाऊँगा एक दिन मैं तेरी मेहफिल से उठ करके।
    हमारा काम ही क्या है क्या होगा अब यहाँ रुकके।।
    मेरी यादो को आँखों में कभी आने न तुम देना।
    जमाना जान जाएगा कभी रोना नहीं छुप के।।

  • मैं अकेला ही चलूँगा

    मैं अकेला ही चलूँगा ।

    शीश पर तलवार मेरे,
    पाँव में अंगार मेरे,
    या काटूँ या फिर जलूँगा ।
    मैं अकेला ही चलूँगा ।।

    तुम न मेरा साथ देना,
    हाथ में मत हाथ देना,
    अब सहारा भी न लूँगा ।
    मैं अकेला ही चलूँगा ।।

    दीन दिखलाना नहीं है,
    हाथ फैलाना नहीं है,
    सब अभावों में पलूँगा ।
    मैं अकेला ही चलूँगा ।।

    वेदना दो मैं सहूँगा,
    “हर्ष है”, दुख में कहूँगा,
    इस तरह तुमको छलूँगा ।
    मैं अकेला ही चलूँगा ।।

    घाव अपने कर गए हैं
    भाव मन के मर गए हैं
    बन गया पत्थर, गलूँगा ?
    मैं अकेला ही चलूँगा ।।

    लड़ सकूँ तूफान से मैं,
    भिड़ सकूँ चट्टान से मैं,
    वज्र के जैसा ढलूँगा ।
    मैं अकेला ही चलूँगा ।।

    मैं गया जग छोड़कर यदि,
    स्नेह तुमसे तोड़कर यदि,
    अत्यधिक ‘सौरभ’ खलूँगा ।
    मैं अकेला ही चलूँगा ।।

    1. – सुरेश कुमार ‘सौरभ’
  • मैं ही रहूँगा…..

    ———————
    तेरे दिल में याद बनकर समा जाऊँगा
    तेरी आँखों में नशा बनकर छा जाऊँगा
    कशिश की सरहद से दूर ना जा पाओग
    मैं खुशबू बनकर एहसास की———–
    ———–तेरी साँसों में घुल जाऊँगा

    ये तो सांसारिक बातेें हैं, कि…..
    मैं तुम्हारा रहा नहीं कभी–
    लेकिन—
    ख़्वाबों–ख़्यालों से छुड़ाओगे
    तुम पीछा कैसे—-?
    ‘सोच’ की तस्वीर बनकर दिख जाऊँगा

    तेरे इनकार की कोई वज़ह ना मिलेगी
    तेरे दिल में,प्यार मेरा बेवज़ह ना दिखेगी
    तेरी मुस्कुराहट की वज़ूद बनकर–
    तेरे चेहरे पर खिल जाऊँगा—
    देखोगी जब भी तुम आईने को–
    तेरे चेहरे की अक़्स में मिल जाऊँगा

    मेरे जीवन का आधार तुम हो
    ज़िन्दा हूँ,कि–मेरा प्यार तुम हो
    दुआओं में–इबादतों में तुम्हें देखता हूँ
    आभास मेरे होने की–तुम्हे भी मिलेगी
    खुली हवा में जब तुम आओगी–
    खिलते फूल देखकर मुस्कुराओगी—
    चहक उठेगा दिल तेरा खुशी के एहसास में
    उस “एहसास” की एहसास में—–
    मै ही रहूँगा…….मैं ही रहूँगा……..|

    —–रंजित तिवारी “मुन्ना”

  • Raahe …. (Like a Song)

    Raahe …. (Like a Song)

    Sapno me Sapne Hajar Hai, Yaado me Tuhi Dildar hai.

    Hume Zindagi se hua Pyar hai, Tera-hi-tera Intjaar hai.

    Ronak to Dekho in Raaho ki tum, Apne se ab lagne lage Hum.

    Khuli ye wadi Mahka Chaman, Dilbar ki bato me Dil h Magan.

    Ab Hume Zindagi se hua pyar hai, Tera-hi-tera Intjaar hai.

    Sapno me sapne Hajar hai, Yaado me ab tuhi Dildar hai…..

    (For you my Tamatar)

  • जिंदगी जिंदगी जिंदगी जिंदगी।

    जिंदगी जिंदगी जिंदगी जिंदगी।
    बेबसी बेबसी बेबसी बेबसी।।
    ,
    ख्वाहिशे ख्वाहिशें ख्वाहिशे ख्वाहिशे।
    कुछ नहीं कुछ नहीं कुछ नहीं कुछ नहीं।।
    ,
    काफिले काफिले काफिले काफिले।
    हम नहीं हम नहीं हम नहीं हम नहीं।।
    ,
    मंजिलो से फासले मंजिलोे से फासले।
    गम नहीं गम नहीं गम नहीं गम नहीं।।
    ,
    ख्वाब ही ख्वाब है ख्वाब ही ख्वाब है।
    हर जगह हर पहर हर घडी हर घडी।।
    ,
    रातो में काँपना काँपना जागना जागना।
    थी भूख भी ठंड भी मुफलिसी मुफलिसी।।
    ,
    क्या तुम्हे सोचना सोचना सोचना सोचना।
    अजनबी अजनबी हम तो थे अजनबी।।
    ,
    क्यों बारिशें बारिशें बारिशें हर जगह।
    तुमको पानी लगा अश्को की है नदी।।
    ,
    थक गई है कलम थक गई है कलम।
    सिलसिला है लफ्ज का आखिरी आखिरी।।
    @@@@RK@@@@

  • “चिड़िया”

    “चिड़िया”
    चीं चीं करती चिड़िया आती
    अम्बर ऊपर घोसला बनातीं |
    पानी जहां पर वहाँ मडरातीं
    औ जमी से उड़ -उड़ जाती |
  • मेरी ये जिंदगी सारी वतन के नाम लिख देना।

    मेरी ये जिंदगी सारी वतन के
    नाम लिख देना।
    कि है जिनकी वजह से हम उन्हें
    सम्मान लिख देना।।
    ,
    मैं कुछ भी हूँ नहीं इसके बिना न
    पहचान है मेरी।
    कोई पूँछे मेरा मजहब तो हिन्दुस्तान
    लिख देना।।
    @@@@RK@@@@

  • जब जब तेरी याद आई है,

    जब जब तेरी याद आई है,
    मैंने खुद को समझाया है।।
    बीते जीवन के लमहो में,
    तुमको ही बस पाया है।
    रह गया अकेला इस जीवन में,
    क्यू तूने मुझे भुलाया है।

    जब जब तेरी याद आई है।
    मैंने खुद को समझाया है।।

    जब मैं होता था तनहापन में,
    तेरी राहो को तकता था।
    तेरे सहारे ही जीवन के,
    हर तूफानो से लड़ता था।

    जीवन के सुलझे धागों को,
    क्या मैंने ही उलझाया है।

    जब जब तेरी याद आई है,
    मैंने खुद को समझाया है।

    मिलने की ख्वाहिश में मुझसे,
    जब तू खाली सा होता था।
    मेरे पास तुझसे मिलने का,
    समय न कयू तब होता था।

    अब मिलने की ख्वाहिश मेरी है,
    पर तुमने खुद को मजबूर बताया है।।

    जब जब तेरी याद आई है।
    मैंने खुद को समझाया है।।
    @@@@RK@@@@

  • माँ शारदे वरदान दो

    माँ शारदे वरदान दो
    वरदायिनी वरदान दो

    मेरे उर में तेरा वास हो
    हर रोम में प्रकाश हो

    सन्मार्ग पर मैं चल सकूँ
    मुझे अभय का वरदान दो

    शवेताम्बरी वरदान दो
    वरदायिनी वरदान***

    मैं पीर सबकी सुन सकूँ
    दुःख दर्द सबके हर सकूँ

    सबके लिए सद्भाव हो
    हंस वाहिनी वरदान***

    मेरी वाणी भी ओ ज हो
    मस्तक पे मेरे तेज हो

    मुझे सप्त सुर का ज्ञान दो
    माँ शारदे वरदान***

    जिव्हा पे तेरा नाम हो
    घट घट में तेरा वास हो

    वाणी मेरी मधुरिम बनें
    मुझे ऐसा तुम वरदान दो

    पदमासनी वरदान दो
    माँ शारदे वरदान दो

    वीणा वादिनी वरदान दो
    वरदायिनी वरदान दो

    माँ शारदे वरदान दो
    कमलेश कौशिक
    हिंदी अध्यापिका
    मो0 पुर अहीर
    जिला उपप्रधान मेवात

  • “नाम” में प्रभू के हम, मस्त हो के जी रहे ……! (गीत)

    नाम साधना के अभ्यास के दौरान उभरा हुआ यह गीत प्रस्तुत करने बहुत ख़ुशी महसूस कर रहा हूँ  ..!

    “नाम”  में  प्रभू  के  हम,   मस्त  हो  के  जी  रहे ……! (गीत)

     

    हम  है  भक्त  “नाम”  के,   हम  तो  मस्त  हो  लिए,

    “नाम”  में  प्रभू  के  हम,   विश्वमन  में  खो  लिए,

    “नाम”  में  प्रभू  के  हम,   मस्त  हो  के  जी  रहे ……!

    “नाम” में   प्रभु  के  हम ,  मस्त  हो  यूं   गा  रहे ……!

     

    चिंता  कुछ  हमें  नहीं,   ना  हैं  हम  अस्वस्थ भी,

    प्रभू  के  भेजे  काज  हैं,   और  है  पास  वक्त  भी,

    प्रेम दृष्टि   से  ये  सब,   जग  निहारते  चले,

    हम  तो  मस्त  हो  लिए,

    “नाम”  में  प्रभू  के  हम,   मस्त  हो  के  जी  रहे……!

     

    भक्ति  में  ये  शान्ति  और  मन  में  है  आनंद  सा,

    प्रभू  के  “नाम”  का  नशा,   जग  लगे  है  स्वर्ग  सा,

    देहबुद्धि  के  परे,   आत्मबुद्धि  से  जुटे,

    देहबुद्धि  के  परे,   आत्म ज्ञान  में  रमे,

    “नाम”  में  प्रभू  के  हम,   मस्त  हो  के  जी  रहे……!

     

    विश्वमन  ही  शक्ति  है,   विश्वमन  ही  ज्ञान  है,

    सूक्ष्म  से  अनंत  तक  विश्वमन  ही  व्याप्त  है,

    सत्य  शिवम्  सुन्दरम,  विश्वमन  ही  तो  है,

    विश्वमन  का  स्पर्श  हम,   भक्ति  में  ये  पा  रहे ….!

     

    हम  तो  मस्त  हो  लिए,

    “नाम”  में  प्रभू  के  हम,   मस्त  हो  के  जी  रहे……!

    “नाम”  में  प्रभू  के  हम ,  मस्त  हो  यूं   गा  रहे…..!

     

    ” विश्व नन्द”

     

    (This “bhaktigeet” on Naam Sadhana , had got composed inspired by the beautiful lovely tune of the song ” Ham hain rahi pyar ke” from film “Nau Do Gyarah (1957)” and may kindly be considered as my humble tribute to the great revered Shri Sachin Dev Burman da.)

     

  • सारी दुनिया का यही, क्यूँ है ये हाल सही..….!(गीत)

    सारी दुनिया  का  यही,  क्यूँ  है  ये  हाल  सही..….! (गीत)

    सारी दुनिया  का  यही,  क्यूँ  है  ये  हाल  सही,
    बाँहों  में  और  कोई,   ख्यालों  में  और  कोई…
    ख्यालों  में  और  कोई,   बाँहों  में  और  कोई..….

    यारों,   जिसे  कहते  वफ़ा,   वो  क्या  है  वफ़ा  सही,
    वफ़ा  ख़ुद  से  बेवफाईi,   तो  ये  कैसी  वफा,  भाई….
    सारी  दुनिया  का  यही,  क्यूँ  है  ये  हाल  सही,
    बाँहों  में  और  कोई,   ख्यालों   में  और  कोई ……

    जाने  क्या  है  सही  यहाँ,   जाने  क्या  है  गल्त  यहाँ,
    जाने  क्या  है  बुरा  यहाँ,   जाने  क्या  है  भला  यहाँ,
    जाने  क्या  है  पुण्य  यहाँ,  जाने  क्या  है  पाप  यहाँ,
    पाप  क्यूँ  दिल  लुभाए,   रुलाये  क्यूँ  भलाई…….
    सारी दुनिया  का  यही  क्यूँ  है  ये  हाल  सही,
    बाँहों  में  और  कोई,   ख्यालों  में  और  कोई…

    जाने  ये  कैसे  हुआ,   झूट  ही  सच  है  यहाँ,
    जिसे  सच  कहते  सभी,   वो  तो  सच  है  ही  नहीं…..
    सारी दुनिया  का  यही,  क्यूँ  है  ये  हाल  सही,
    बाँहों  में  और  कोई,   ख्यालों  में  और  कोई…
    ख्यालों में और  कोई,   बाँहों  में  और  कोई..….
    ” विश्व नन्द ”

     

  • ख़ुशी जिसे कहते हैं


    ख़ुशी जिसे कहते हैं, वो चीज ढूंढता हूँ
    गैरों की इस दुनिया में अपनों को ढूंढता हूँ
    अकेला तो न था पहले कभी इतना
    साथ चले थे जो उन क़दमों को ढूंढता हूँ
    ख़ुशी जिसे कहते हैं, वो चीज ढूंढता हूँ

    वक़्त बदला, लोग बदले, तुम बदले, और मैं…
    जो संभाल कर रखी थी यादें
    उन यादों की टूटी हुई मालाओं के मोती ढूंढता हूँ
    गैरों की इस दुनिया में अपनों को ढूंढता हूँ
    ख़ुशी जिसे कहते हैं वो चीज ढूंढता हूँ

    मुसीबतों की तपती धुप में मैं बंजारा सा
    पल दो पल की छावँ ढूंढता हूँ
    बांतों में बात, हाथों में हाथ और
    जो मिटगई इन हाथों से वो लकीरें ढूंढता हूँ
    ख़ुशी जिसे कहते हैं, वो चीज ढूंढता हूँ

    दुःख तो है पर दुखी नही हूँ
    खुश भी नही, नाखुश भी नही
    जो होगया वो क्यों हुआ बस इसकी वजह ढूंढता हूँ
    गैरों की इस दुनिया में अपनों को ढूंढता हूँ
    ख़ुशी जिसे कहते हैं, वो चीज ढूंढता हूँ


     

  • तेरे गीत प्यार के हैं सुख मेरा …..! (गीत)

    तेरे गीत प्यार के हैं सुख मेरा …..! (गीत)

    मै तो पहले गाता न था, गीत क्या है ये न जानता,
    तुझसे प्यार क्या हुआ, दिल मेरा चहक उठा,
    अब तेरे ही गीत गा रहा, तेरे गीत गुनगुना रहा …..!

    जाने क्या है पाया तेरी भोली आंखों में,
    रात दिन जो तरसूँ  मैं इन्हें ही  देखने,
    मुझपे अपनी रहम नजर कर ज़रा….!
    मैं तो पहले गाता न था….!

    कब से तेरे प्यार में  मैं जी रहा मगर,
    कैसे मानूँ तुझको  ही नहीं है ये ख़बर,
    मेरी दिल की बात दिल से सुन ज़रा ….!
    मैं तो पहले गाता न था….!

    अब तो तेरे गीत मैं  गाऊँगा जीते जी,
    चाहे प्यार की कदर ये  तूने की न की ,
    तेरे गीत प्यार के हैं सुख मेरा …..!
    मैं तो पहले गाता न था….!

    ” विश्व नन्द “

     

  • दुनिया हमारे दम से है …..!( गीत )

    दुनिया हमारे दम से है …..!

    बदले हज़ार बार ज़माना तो गम नहीं,
    दुनिया हमारे दम से है, दुनिया से हम नहीं …..!

    क्यूँ फ़िक्र है तुम्हे मेरे यारों बेकार की,
    मंजिल मिलेगी आ के खुद, जो मंजिल का गम नहीं,
    दुनिया हमारे दम से है, दुनिया से हम नहीं …..!

    दुनिया की न परवाह, तो दुनिया बेजार है,
    आ कर मनाएगी तुम्हें, तुम मानो या नहीं,
    दुनिया हमारे दम से है, दुनिया से हम नहीं …..!

    चाहे सताए लाख ज़माना हमें तो क्या,
    खुशियाँ हमारे पास हैं, कहीं और तो नहीं,
    दुनिया हमारे दम से है, दुनिया से हम नहीं …..!

    बदले हज़ार बार ज़माना तो गम नहीं,
    दुनिया हमारे दम से है, दुनिया से हम नहीं …..!

    ” विश्व नन्द “

     

  • स्मृति::इंजी. आनंद सागर

    स्मृति::इंजी. आनंद सागर

    **के जब तुम लौट कर आओ::स्मृति**

     

    हौसला टूट चुका है, अब उम्मीद कहीं जख्मी बेजान मिले शायद,

    जब तुम लौट कर आओ तो सब वीरान मिले शायदll

     

     

    वो बरगद का पेड़ जहां दोनों छुपकर मिला करते थे,

    वो बाग जहां सब फूल तेरी हंसी से खिला करते थे,

    वो खिड़की जहां से छुपकर तुम मुझे अक्सर देखा करती थी,

    वो गलियां जो हम दोनों की ऐसी शोख दिली पर मरती थीं,

    वो बरगद,वो गलियां, वो बाग बियाबान मिले शायद,

    के जब तुम लौट कर आओ……………l

     

     

    खेत-खलिहान तक तुमको बंजर मिले,

    मेरी दुनिया का बर्बाद मंजर मिले,

    ख्वाबों के लहू और लाशें मिलें,,

    और तुम्हारी जफाओं का खंजर मिले,

    तबाहियों का ऐसा पुख्ता निशान मिले शायद,

    के जब तुम लौट कर आओ…………ll

     

     

    यहां जो हंसता मुस्कुराता मेरा आशियाना था,

    जिसके हर ज़र्रे में बस तुम्हारा ठिकाना था,

    ये शहर जो मेरे साथ मुस्कुराया करता था,

    मेरे साथ तुम्हारे बाजुओं में बिखर जाया करता था,

    वहां उजड़ा हुआ शहर, खंडहर सा इक मकान मिले शायद,

    के जब तुम लौट कर आओ……  I

     

     

    तुम आओ तो शायद ना मिलें ये बाग बहारें,

    ये शहर मिले ना मिलें मेरे घर की दीवारें,

    तुम बहार थी मैं फूल था मैं अब नहीं खिलूं,

    के जब तुम लौट कर आओ तो शायद मैं नहीं मिलूं,

    मगर कंधे पर अपनी लाश ढोता एक इंसान मिले शायद,

    के जब तुम लौट कर आओ…………ll

     

    All rights reserved.

     

              -Er Anand Sagar Pandey

  • विजय पर्व

    आजादी का विजय पर्व , हम मिलकर आज मनायें |
    आज की मधुरिम बेला पर ,हम गीत खुशी के गायें |
    एक झोपडी भी भारत में , कहीं सूनी न रह जाये |
    एक भी बन्दा भारत का , कहीं भूखा न सो जाये |
    रोटी ,कपडा और मकान , सबको अब मिल जाये |
    बुलेट- ट्रेन दौड़ा कर के , हम भारत को चमकाये |
    रक्षा कर जंगल की अपने , हम पर्यावरण बचायें |
    गंगा माँ को साफ़ रखेगें , आज कसम यह खायें |
    भारत को जो आँख दिखाये, उससे हम लड़ जायें |
    शांति दूत बनकर के हम , जगद गुरु कहलायें |
    लाल किले यह प्राचीर , हमको आज बुलाये |
    देश के खातिर हर बच्चा , सैनिक अब बन जाये |
    भारत का यह भव्य तिरंगा , झुकने कभी न पाये |
    पंकज जान चली जाये , पर इसकी लाज बचायें |
    आदेश कुमार पंकज

  • “भीगी रातें”

    ????????
    ————————-
    भीगी रातें
    —————

    सावन को जरा खुल के इस बार बरसने दो ।
    राजी ही नही यारा दिल और तरसने को ।।

    दो तीन बरस बीते कुछ प्यार भरी बातें,
    अक्सर ही सताती हैं कटती ही नहीं रातें ।
    मौसम बदला बदले हालात बदलने दो,
    राजी ही नही यारा दिल और तरसने को ।।

    पाए तन्हाई में आसार खयालों के,
    ऐसे भीगी रातें किस तरह बिता लोगे ।
    छेंड़ेंगे तुम्हे भी तो पुरजोर तड़पने को,
    राजी ही नही यारा दिल और तरसने को ।।

    इक बार जरा फिर से आँचल लहराने दो,
    कुछ देर जवाँ तन से पुरवा टकराने दो ।
    बेचैन हुईं कलियाँ आलम में महकने को,
    राजी ही नही यारा दिल और तरसने को ।।

    …अवदान शिवगढ़ी
    १४/०७/२०१६
    ०९:३६ बजे, रात्रि ।
    नवगिरवा,अमेठी ।

  • विदाई गीत

    *एक विदाई गीत*

    हरे हरे कांच की चूड़ी पहन के,
    दुल्हन पी के संग चली है ।
    पलकों में भर कर के आंसू,
    बेटी पिता से गले मिली है ।

    फूट – फूट के बिलख रही वो,
    फूट – फूट के बिलख रही वो,
    बाबुल क्यों ये सजा मिली है,
    छोड़ चली क्यों घर आंगन कू,
    बचपन की जहाँ याद बसी है,

    बाबुल रोय समझाय रह्यो है
    बेटी ! जग की रीत यही है,
    राखियो ख्याल तू लाडो मेरी,
    माँ – बाबुल तेरे सबहि वही है

    नजर घुमा भइया को देखा
    भइया काहे यह गाज गिरी है,
    में तो तेरी हूँ प्यारी बहना,
    यह अब कितनी बात सही है,

    भइया सुनकर बोल बहन के,
    अंसुअन की बरसात करी है,
    रोतो रोतो यह भइया बोलो-2
    देख विधि का विधान यही है,

    बीत रही जो तेरे दिल पे बहना
    “मेरा” भी अब हाल वही है ।।

    © नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”
    +91 84 4008-4006

  • झूकने न देंगे तिरंगे को हम

    झूकने न देंगे तिरंगे को हम

    दिनांक-२०-७-२०१६

    विधा- गीत

    संदर्भ- स्वतंत्रता दीवस

    तर्ज- बहुत प्यार करते है तुझसे सनम…

    ……………………………………………………

    झूकने न देंगे तिरंगे को हम-२

    हमको हमारी भारत माता की कसम -२

    झूकने न देंगे तिरंगे को हम-२

    हमे मातृभूमि अपने प्राणों से प्यारी-२

    हम है दुलारे ये है माता हमारी -२

    सब कुछ न्योछावर इस पर पाये जनम…

    झूकने न देंगे तिरंगे को हम-२

    प्यार में इसके हम लोग दीवाने -२

    हंस के है जाते इस पर प्राण गवाने-२

    इसे जो झुकाएगा हो जाएगा खतम…

    झूकने न देंगे तिरंगे को हम…

    इसी हेतु भगत आजाद चले आये

    लडते हुए गोरों से जान गंवाए -२

    हमे प्राण से प्यारा है अपना वतन…

    झूकने न देंगे तिरंगे को हम…

    जीना सिखाया हमे मरना सिखाया-२

    मातृभूमि हेतु कुछ करना सिखाया

    हमे याद रखने है हमे याद रखने है

    अपने करम्…..

    झुकने न देंगे तिरंगे को हम..-३

    मनोज उपाध्याय (मतिहीन)

    हमको हमारी भारत माता की कसम…

  • अधूरा गीत

    अधूरा गीत

    तुम बिन मेरे साजन बोलो कैसे ये जज़्बात लिखूँ,
    दिन मेरा कैसा बीता कैसे बीती रात लिखूँ।

    मन में उलझन भारी था तो ख़त तुमको ये लिख डाला,
    याद तुम्हारी दर्द लिखूँ या लम्हों की बारात लिखूँ।

    #काफ़िर

  • निर्झर झरता गीत

     

    यह गीत धरा का धैर्य

    गर्व है, नील–गगन का

    यह गीत झरा निर्झर-सा

    मेरे; प्यासे मन का ….

     

    यह गीत सु—वासित् : चंदन–वन

    यह गीत सु-भाषित् : जन-गण-मन

    यह गीत प्रकाशित् : सूर्य–बदन

    यह गीत गरल का आचमन

    यह गीत समर्पण् जीवन का

    यह गीत झरा…………..

     

    यह गीत वसन् नंगे तन का

    यह गीत रंग अल्हड़पन का

    यह गीत अलाव जीवन-रण का

    यह गीत भीष्म के भीषण-प्रण का

    यह गीत व्यथित् भारत–मन का

    यह गीत झरा……………

     

    यह  गीत ‘तपस्या’ का इक ‘फल’

    यह गीत ‘कलशभर’ अमृत–जल

    यह गीत पपीहा–सा : ‘बे—कल’

    यह गीत ‘लगन’ ‘अनुपम’ प्रतिपल

    यह गीत है मन का, इक ‘मनका’

    यह गीत झरा…………….

     

    यह गीत साँस का उच्छवास्

    यह दिव्य–आर्य का पुनर्वास्

    यह गीत राम का अरण्यवास्

    यह गीत ‘त्रि-काल’ का अट्टहास्

    यह गीत है;  देश का, जन-जन का

    यह गीत झरा…………….

     

    यह गीत ‘लहू’ से मैंने ‘रचा’

    यह गीत ‘भाव का नीर’ भरा

    यह गीत सनातन आवाहन

    यह गीत “शहीदों की है चिता”

    यह गीत देश के जागरण का

    यह गीत झरा……….

     

    यह गीत ‘समर’ का शंख–नाद

    यह गीत विधा का ‘नवल वाद’

    यह गीत ‘विरह’ का विकल–प्रमाद

    यह गीत ‘विजय’ का परम्–प्रसाद

    यह गीत है; ‘पाँखी का तिनका’

    यह गीत झरा……………

     

    यह गीत है, गुंजित् आसपास

    यह गीत है ‘मन का कारावास’

    यह गीत ‘कालिन्दी-तट’ का ‘रास’

    यह गीत ‘अहिल्या का विश्वास’

    यह गीत “प्रणाम“ है; ‘अनुपम’ का

    यह गीत झरा………..

    ——-**********——

  • रहम करना ज़रा मौला

    रहम करना ज़रा मौला

    रहम करना ज़रा मौला, नमाजी हूँ तेरा मौला।
    तू ही तो मीत है मेरा, तू ही तो गीत है मेरा॥

     

    किसी को गैर ना समझूं, किसी से बैर ना रख्खूं।।
    मेरा दिल बस यही चाहे, सितम कोई नहीं ढ़ाये।।
    नेकी ही रीत है तेरा, तू ही तो मीत है मेरा।
    करम ये हो मेरा मौला, रहम करना ज़रा मौला।।

     

    भला क्या है बुरा क्या है, तेरा क्या है मेरा क्या है।
    लड़ाई छोड़ देना है, दिलों को जोड़ लेना है।
    तू ही तो जीत है मेरा, तू ही तो मीत है मेरा।
    वचन ये है मेरा मौला, रहम करना ज़रा मौला।।

     

    रहे अल्लाह हू दिल में, यही है आरजू दिल में।
    खुशी से झोलियां भरना, खुदा हम पर दया करना।
    तू ही तो प्रीत है मेरा, तू ही तो मीत है मेरा।
    सजन है तू मेरा मौला, रहम करना ज़रा मौला।

     

    ज़मीं औ आसमाँ है तू, यहाँ है औ वहाँ है तू।
    पुरब है पश्चिम है तू, उत्तर है दक्षिण है तू।
    तू ही तो दीन है मेरा, तू ही तो मीत है मेरा।
    वतन ही है मेरा मौला। रहम करना ज़रा मौला॥

     

    मिली है जिंदगी जबसे, कि मैंने बंदगी तबसे।
    तेरा ही आसरा मुझको, मिटाना तू हरेक गम को।
    तू ही तो ईद है मेरा, तू ही तो मीत है मेरा।
    चमन है तू मेरा मौला। रहम करना ज़रा मौला।
    ओमप्रकाश चंदेल “अवसर”
    पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़
    7693919758

  • गीतिका-मुक्तक

    …………गीतिका………..

    श्रृंगार उत्पति वही होती जब खिली फूल की डाली हो
    कुछ हास्य विनोद तभी भाता हंसता बगिया का माली हो |
    कलरव करते विहगों की जब ध्वनि प्रात:कान में आती है
    बरसाती मधुरसकंण कोयल जब बागों में हरियाली हो
    कृषकों के कंधो पर हल और होठों पर जब मुस्कान खिले
    क्लांतमयी ग्लांनिण चित्त को होता सुख जब खुशिहाली हो |
    कान्हा की बंशी की धून लगती मन को जब मतवाली हो
    मलयांचल भी शोभित होता जब आरुणिमा की लाली हो ||
    उपाध्याय…

  • गीतिका

    संदर्भ:- वर्तमान में परिवार की परिभाषा …
    ………………………………………………….
    बदल गये रिश्ते नाते बदल गया परिवार
    बदल गये रीति रिवाज बदल गया घरबार |
    सिमित हुआ संबंध नही पहले वाली बात
    गांठ पाल मन में रखते पर करे प्रेम उद्गार ||

    मियां बीबी बच्चे साला साली साढू के साथ
    छूट गये माता पिता और भाई बहन के हाथ |
    परिचर्चा झूठी कहते कि थकी बहू कर काज
    फुरसत नही जिनको ब्यूटी पार्लर से आज ||

    है अपवाद कोई जो खाते इक थाली मे आज
    करते साले और ससुर के बदले भाई पर नाज |
    भेद – भाव की बनी हुई है वृहदाकार दीवार
    हम दो और हमारे दो बस यही सकल संसार ||
    उपाध्याय…

  • गीतिका

    “गीतिका”

    मन को छोटा मत कर मानव
    तन्मय हो धर्म निभाता चल |
    सोया जग घोर तिमिर तो क्या
    तू मन का दीप जलाता चल ||मन को..
    क्या होगा क्या होने वाला
    ये सोच के ना घबराता चल |
    जो बीत गई ओ बात गई
    उस कल पर ना पछताता चल ||मन को..
    जो भटक गये है नीज पथ से
    उनको तू पथ बतलाता चल |
    अंधे लंगडे गूंगे बहरे को
    अपना संदेश सूनाता चल ||मन को..
    हो भाग्य नही अनुकूल भी तो
    कर से करतब दिखलाता चल |
    संघर्ष की वेदी पर चढ कर
    तू पत्थर को पीघलाता चल ||मन को..
    सोना तप कर पावन होता
    इसलिए तू आग लगाता चल |
    फड शेषनाग का डोलेगा
    धरती में भी होगी हलचल || मन को..
    हे क्रांति पथिक अपने पथ को
    निष्कंटक राह बनाता चल |
    धर धैर्य अग्रसर हो पथ पर
    जो आये गले लगाता चल ||मन को..
    उपाध्याय…
    #copyright

  • कविता

    कविता

    कविता…
    हम जाते है स्कूल
    हाँ हम जाते है स्कूल |
    अपना भविष्य गढने अनुकूल ||
    हम जाते है स्कूल……
    पढ लिख कर होनहार बनेंगे
    मातु पिता का प्यार बनेंगे |
    घर आंगन फूलवारी अपनी
    हम सब इसके फूल …||
    हम जाते है स्कूल…
    गुरू हुए भगवान हमारे
    हम सब बच्चे उनको प्यारे |
    हमे ज्ञान की बात बताते
    बडे प्यार से हमे पढाते
    कुछ न हमें होता प्रतिकूल ||
    हाँ हम जाते है स्कूल…
    हम सब आशा ज्योति जलाएं
    आओ मिल कर पढे पढाएँ |
    अंधकार को दूर भगाएँ
    मिटा दे सब के शूल ||
    हाँ हम जाते है स्कूल…३
    उपाध्याय…

  • “मैहर वाली माई”

    मैहर वाली माई के ,
    मनावै के होई |
    जागि जागी जगत के ,
    देखावै के होई |
    दुनिया में माई  को ,
    बतावै के होई |
    नारियल माला फूल ,
    चढ़ावै के होई |
    माँ की ममता गितिया ,
    सुनावै के होई |
    निमिया दरिया पालना ,
    झुलावै के होई |
    माई के चुनरी ,
    चढ़ावै के होई |

  • khamoshi

    khamoshiyon ko khamoshi se khamosh rehne do

    bhari yadon ko khamoshi se gungunane do

    chale aye ho khayalon me bina dastak diye

    ab to ansuon ko palakon se khamosh behne do

     

  • खत्म हुई कहानी आज

    खत्म हुई कहानी आज

    खत्म हुई है कहानी आज बरबाद हुई जवानी आज।
    दुल्हन बनके चली गई है मेरे  दिल की रानी आज।

    नजरें झुका के रहती थी, तेरी हूँ हरदम कहती थी।
    गोद में सिर मैं रखता था, वजन वो मेरा सहती थी।
    छूट गया है उनका साथ,दिल में बाकी रह गयी याद।
    कानों पर गुंज रही है सिसकी भरी उसकी फरियाद ।
    खत्म हुई कहानी……………………………

    गीत प्यार के गाता हूँ, मैं तुमको भूल नहीं पाता हूँ।
    उतनी ही तुम याद आती हो, जितना मैं भुलाता हूँ।
    यादों की निकली बरात, सावन में बरसती आग।
    शोर-शराबा मत करना, कदम रखो अपने चुपचाप ।
    खत्म हुई कहानी आज…………………….

    जब खत तुम्हारा पढ़ता हूँ, आंसूओं से मैं लड़ता हूँ।
    डूब रहे है अक्षर सारे,रुको अभी मैं सम्हलता हूँ।
    बिछड़ गया है जबसे यार , तबसे जीना है  बेकार।
    मरता रहा गर युं ही प्यार,डूब जायेगा ये संसार।
    खत्म हुई कहानी आज……………………

    वादे सारे बिखर गये,सपने पलकों पर ठहर गये,
    शमशान नजर आया शहर में चाहे हम जिधर गये।
    धीमे धीमे जलती आग,जली है चिता ढूढ़ो राख।
    कान लगाकर सुनना लेकिन अस्थि दे शायद
    आवाज                             
    खत्म हुई कहानी आज………………………

    मिलते थे जब नदी किनारे,दिलदार थे हम तुम्हारे।
    हमारी कहानी कहती थी गाँव के सारे चौंक चौबारे।
    चौराहों पर अब विवाद, सोनी करती है फरियाद।
    महिवाल की खोज में निकल चुके हैं शहरों के सारे सैयाद।
    खत्म हुई कहानी आज……………………..
    ओमप्रकाश चंदेल “अवसर”
    पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़
    7693919758

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