किधर से आया वो मालूम नहीं अँधेरे में ही कोई आवागमन था
किधर से आया वो मालूम नहीं अँधेरे में ही कोई आवागमन था
पत्थर के बुतों में बस ढूँढ़ते रहे अपने अंदर के ख़ुदा को पत्थर करके
बंदिशें तोड़ के रख दी पिंजरे में रहते रहते
काफिर ही सही मुसाफिर ही सही वक़्त का खिलौना हाज़िर ही सही
मैं हूँ एक नन्ही कली जरा मुझको तू खिलने देना, होगा तेरा उपकार बड़ा मुझे इस दुनिया से मिलने देना, मैं हूँ एक नन्ही कली जरा मुझको तू खिलने देना, मान बढ़ाउंगी हरपल तेरा इतना […]
तिनके बटोर बनाया आशियाना बर्क ने फिर गिराया आशियाना मेरे हाथों से लिपटी फिर रेखाएं रेखाओं ने फिर बनाया आशियाना राजेश’अरमान’
ख्वाइशों की उम्र नहीं होती कमबख्त अजर अमर होती है
अपने ख़्वाबों के लिए कोई रात रखना अपने हिस्से की खुद से मुलाकात रखना मौसम चाहे जैसा बदले जब बदले अपने ही अंदर कोई बरसात रखना राजेश’अरमान’
मेरी खोज मृगतृष्णा तेरी वफ़ाएं मृगतृष्णा सारा जीवन मृगतृष्णा
वो फिर मिलेंगे फूल फिर खिलेंगे कुछ हादसें होंगे कुछ फासले होंगे कमबख्त वफ़ा ताउम्र इम्तहान देती रही राजेश’अरमान’
बर्क को नशेमन से क्या आश्ना आवाज़ कब देख सकी जलते आशियाने राजेश’अरमान’
रिश्तों में कोई फासला सा रखना तूफानों में हौसला सा रखना अपने ही घर में चाहे जितने कमरे हो अपने लिए इक घोसला सा रखना राजेश’अरमान’
किसी रंजिश से दो चार नहीं लोग जुगनुओं का भी फ्यूज ढूँढ़ते है
वक़्त का तमाचा हाथ क्या पूछे
वज़ूद तेरा बूँद सा शामिल है मगर समुंदर में
गिर के संभले तो मगर संभले मगर गिर गिर के
बगैर दुनिया के हम नहीं है दुनिया कौन सा अकेले चलती है
फिर वहीँ फ़रियाद कौन रखेगा याद सिरहाने बैठी रही सिसकियाँ अपनी आबाद
बिन तेरे कमीं तो थी आँख में कुछ नमी तो थी युँ तो सांसें चलती रही मगर सांस कुछ देर को धमी तो थी
किसकी हसरत कैसी हसरत अपने तो दुखों को मिली बरकत उसे गुनाहगार कैसे कह दो सब थी अपनी ही वैसी हरकत
जिल्द बिन किताब का फूल बिन हिज़ाब का रातों का नहीं ख्वाब हूँ आफताब का
न सही गम सही खुद बन मरहम सही
सीने में दबे अरमान आँखों में झलक जाते है आँखों में छुपे अरमान ख्वाब बनके ढलक जाते है
घर से निकलोगे तो जानोगे चांदनी का वज़ूद क्या है
कहीं पर लब मचल गए कही मतलब मचल गए इंसा की हसरतों का क्या जब देखो तब मचल गए राजेश ‘अरमान’
कोई पीर न था कोई राहगीर न था बहता हुआ नीर न था ज़िंदगी का फ़क़ीर न था बस कुछ ढूंढती है आँखें ज़माने की कोई तस्वीर न था
माना वो सिकन्दर था उसका भी मुक़द्दर था हमने अपने हाथों से उजाड़ा कुछ अपने भी तो अंदर था
मत रोको आंसुओं को कहीं बहता पानी रोक जाता है
ज़ख्म को गिनते क्यों हो गोया अब इन्तहा हो गई हो
कौन पी सका समुंदर को लहरे ही दर्द सहती है
मैखाने की बातें मैखाने तक रहने दो आंसुओं के सैलाब ही समुंदर होते है
कोरे कागज़ पे लिखी कोई दास्तां नहीं वज़ूद अपना बुलंद ज़माने से वास्ता नहीं
उन्हें ज़िद थी न हारने की कारण बन गई हार का
घर के अंदर घर नहीं मिलता कोई सुखनवर नहीं मिलता
बिक गया वो शक्स भी जिसे हम सौदागर समझते रहे
मंजिलों के बिना भी चलना सीखो ज़िन्दगी में कभी यूँही जीकर देखो …… यूई
न सूरत में न सीरत में सब कुछ मन की जीनत में
हर फुल की रूह भी फुल होता नही यह इंसानो में …… यूई
कहाँ गई वो हवाएं कहाँ गई वो फ़िज़ाएं बिखर गई अब वफ़ाएं
सुंदर सूरत में सीरत सुंदर कैसे तुमने यह सोच लिया …… यूई
गुमशुदा इंसा इस्तहार कहाँ दे
चाहते हो जाएगी सारी पूरी यह जीवन में नही ज़रूरी …… यूई
फुल ना हर डगर मिलेंगे मंज़िल ना आसान मिलेगी …… यूई
हर किताब की कहानी पन्नो की मेहरबानी
वापसी की राह याद तुम रखना कोई है प्यासा याद तुम रखना …… यूई
सब कुछ वैसा ही सब कुछ पैसा ही
अकेले ही सफर पे निकल गए हो अबके दूर की राह पकड़ गए हो …… यूई
वीराना अपना वीराना बेगाना वीराने को कौन जाना
खाली अरमान ज़िन्दगी तन्हा खाली सड़कें राहें तन्हा …… यूई
चलो फिर बांट ले गम को फेक डाले खुशिओं को छांट ले
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