Author: Jay Mishra

  • अनकही

    दिल की दवात से

    स्याही लहू का बहता रहा,

    कभी वक्त ने मुझको लिखा,

    कभी तारीख अपनी मैं लिखता रहा ।

     

    कभी लिखा बेमुकद्दर दस्ताने-जीस्त अपनी,

    कभी अस्क बहाती आरज़ूओं को कहता रहा ।

    कभी लिखी खोई खनक ख्वाबों की,

    कभी दर्द वसल का सहता रहा ।

     

    पर लिख न पाया दूरियाँ उन फासलों की

    जो दरमियाँ थी फलक और ज़मीं में,

    और लिख न पाया दर्द उन पलों की

    ख्वाईश जिसे जीने की, बदल न पाया यकीं में ।

     

    लिख न पाया उस प्यास को

    कागज़ों से रिसते लहू से जिसे भिगोता रहा ।

    लिख न पाया उस अनजानी आस को

    सीने के अन्तर में हरदम जो सोता रहा ।

     

    कही हर बात जितनी वो चुप हैं, खामोश हैं ।

    हर नज़्म मेरी, ज़िन्दगी के लगते अवशेष हैं ।

    और कहने को थी जितनी बातें, जितने किस्से

    वो आज भी अनकही, शेष हैं ।

  • छलक जाए दिल से तो मोहब्बत

    छलक जाए दिल से तो मोहब्बत

    वो मिला ले नज़र तो इनायत,

    वो फेर ले नज़र तो शिकायत ।

    वो पत्थर की सही पर,

    करता मैं उसकी इबादत ।

     

    चखता वो मेरे दिल को देकर अपनी उल्फ़त,

    बढ़ता है नशा उतना जितनी बढ़ती है कुर्बत ।

    दर्द वो जो भर दे दिल को,

    ग़र छलक जाए दिल से तो मोहब्बत ।

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