मोहब्बत ऐ इम्तेहान की इंतहा तो तब हुई, जब दिन में भी उसके ख्वाबों से बाहर न आ सके हम।। राही (अंजाना)
मोहब्बत ऐ इम्तेहान की इंतहा तो तब हुई, जब दिन में भी उसके ख्वाबों से बाहर न आ सके हम।। राही (अंजाना)
मुझे कुछ भी कहने की ज़हमत नहीं होती, वो खुद ब खुद मेरी आँखों से छलक जाती है।। राही (अंजाना)
मेरी ये हालत को देखकर सब दिवाने कहते, मेरी नजरो से पुछ तेरे ही आँख से मिली थी मेरी आँख , इसलिए मै तेरा दिवानगी करते फिरते। Jp Singh
मत हँस जवाने मेरी हालत पर, मैने भी दो हाथ ,दो पैर साथ लाया।
क्या कहूँ इस जवाने से मै, मेरी इस दशा को देखकर जब अपने ने छोड़ दिये, तो क्या कहूँ परवाने से !जवाने से। Jp singh
किससे सिकवा करू, किस से गिला करू, जब अपना ही नही समझा तो किससे कुछ बात करू। Jp singh
मत पुछ भबड़ मुझे से तेरी क़्या हालत है, जैसे तुने बनाई वही तो मेरी हालत है। Jp singh
जब-जब तु पास आती क्यो शरमाती हो, मैने तो तुम्हारी बड़ी–बड़ी आँखो से प्यार किया क्यो शरम के मारे हाथ से आँख ढ़क लेती हो
ह्रदय में है यदि ,संकल्प शक्ति तो तुझे कोई रोक नहीं सकता लक्ष्य पाने के लिए तो गिर गिर कर है ,उठना पड़ता -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
क्यों बुझे हैं ,द्वीप ह्रदय के तुझे जग आलोकित ,है करना नव उमंग उत्साह लिए, प्रति पल बाधा से है लड़ना -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
जिस दिशा में दृष्टि जाती, दिखता तम ही तम है दूर करदे शीघ्रता से, तेरे उर में जो अहम है -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
न डरना तुम काली रातों में, न आना माया मोह की बातों में फास न जाना झूठे, रिश्ते नातों में -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
सदियों से छाए अंधकार को, दूर भगाओ मानव तुम ,अंतर् तम के, द्वीप जलाओ -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
ऐ दुनिया वालों, तुम्हे हम मान गये हैं ठोकरें खा क्र तुम्हे, पहचान गए हैं -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
मेरे तिमिरमय जीवन में , अलोक बन के आओगे आओ तुम ,में एक मरुपथ हूँ, घनघोर घटा बन छाओगे -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
नवल सृजन हो,नवल सृष्टि हो उर अंतर में,नवल बृष्टि हो नवल दिशा हो नवल दृष्टि हो -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
अभी हस रही थी , कितनी द्वीप मालाएं अभी रो उठी, बुझ गयीं आशाएं -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
अभी साथ थे देखो, प्राण प्यारे साथी अभी अभी जाली एक नवल बाती कहीं रुदन है ,कहीं हास् है समय बड़ा घाती -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
है कैसी अंतर पुल कन, जिससे में पुलकित हूँ है घनघोर पतझड़, फिर भी में सुरभित हूँ -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
है अकेला हर पथिक, अपने पथ को पाना होगा घोर अँधेरा छा रहा है , तम निशा से लड़ना होगा -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
सांझ दिवस और रैन में, बीएस तुमको ही पुकारा है सृष्टि के कण कण में, तुमको ही पुकारा है -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
आज ये मन मेरे , मीत अपना ढूंढ ले खींच ले जो मीत को, मीत ऐसा ढूंढ ले -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
पास मेरे आते हो, क्यों बार बार पुछा मैंने जब तूफ़ान से, तूफान बोलै ,तुम्ही हज़ारों में मिले इंसान से -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
मिल जाये कहीं , मुझे पूछना है भगवान से तुमने चुने क्यों रास्ते, मेरे लिए वीरान से -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
पौधा लगाया मैंने , सोचा बृक्ष बन छाया देगा बृक्ष बन गया जब, गिरा दिया,मिटा दिया मुझे -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
कोई उस दर का नाम बता दे, जहाँ जाने पर मन्नत पुरा होता। मै भी जाना चाहता, क्योकि मै अकेला रहता। मै भी अपना जोड़ी चाहता
मेरी जवानी, मेरी पहचान !मेरा अपना नही है, जिसने इस काबिल मुझे बनाई वो दुनिया मे नही है।
ये जालिम मै अपने दिल के टुकड़े को पहाड़ लूँगा, लेकिन सुन ले इसके बाद तुम्हारा क्या होगा।
कितने सोलह सोमवार किए…. इस ‘सावन’ में तो “पिया” मिले !
खेल खेलने बैठा तो खिलाड़ी न मिला, एक बन्दर को उसका मदारी न मिला, ज़िन्दगी की बिसात में हम कुछ फंसे ऐसे, कि हमारी चालोन को कोई जबाबी न मिला।। राही (अंजाना)
खेल खेलने बैठा तो खिलाड़ी न मिला, एक बन्दर को उसका मदारी न मिला, ज़िन्दगी की बिसात में हम कुछ फंसे ऐसे, कि हमारी चालो को कोई जबाबी न मिला।। राही (अंजाना)
भवर मैं था ,सोचा न था तूफ़ान भी आएगा गिरिफ्त मैं ले मुझे अपरिचित दिशा पहुँचाएगा -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
दौड़ते परायी है जो अपनी मंजिल छोड़ कर कठिन है रास्ता कदम रखना सोच कर साथ न कोई आएगा अकेले तुझे जाना है जग मेरी मंजिल नहीं कुछ पल का ठिकाना है रास्ता पहचान लो […]
उजाला पाने की छह मैं में, चलता रहा चलता रहा पर अँधेरा बस अँधेरा रह मैं मिलता गया -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
भवर मैं पहुंचा तो, सोचा मुझे आएगा कोई बचाने किनारे पर भीड़ थी लाखों की, कुछ चेहरे कुछ जाने अनजाने देखती रही दुनिया मुझको न आया कोई बचाने -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
ऐ वक़्त तू कितने रंग बदले, बह रही हो सृजन धार क्यों प्रलय बन निकले तू कितने रंग बदले -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
बरखा जरा प्यार बरसा दे कब से प्यासा अंतर है तू प्यास बुझा दे बरखा जरा प्यार बरसा दे बरस बरस बरखा मेरी कितने तुमको बरस गए सिंधु की एक बूँद को हम कबसे तरस […]
मैं गा रहा हूं, तुम स्वर मैं स्वर मिलाओ मैं जा रहा हूँ , तुम संग संग आजाओ जाऊंगा न छोड़ कर, गाऊंगा न बिन तेरे मैं भवर मैं, तुम पतवार बनके आओ -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा […]
संसार मैं रहना है, संसार मैं जीना है मिलती हैं कुछ खुशियां, कुछ गम भी पीना है कभी होंठों पर मुस्कान कभी आंसू पीना है संसार मैं रहना है संसान मैं जीना है -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा […]
मैं गीत क्या रचूंगी, तुम प्रेरणा न बनते मेरे निष्ठुर उर मैं, वन वेदना न उठते मैं गीत क्या रचूंगी तुम प्रेरणा न बनते -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
खामोश न रहो , नज़रों को न झुकाओ पीछे न तुम देखो, आगे कदम बढ़ाओ -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
मै शिर्फ बेरोजगार हूँ,, बेकार नही यारो, अगर मै मर भी जाऊँगा, मेरा कीमत कम नही होगा यारो। Jp singh
ये मेरी ख्वाब अपना नही हो पाया, क्योकि रिश्ते दौलत की तलवार ,हवा की रूख बनाती है।
इस शहर मे मेरा कोई नही अपना है, शिर्फ मेरी तन्हाई ,मेरी चिल्लाहट की घुँज मेरी बेचैनी—- मेरा अपना है Jp singh
अगर पैसा से सब कुछ खरीदा जाता , तो !मेरे पास मेरी ख्याबो की रानी रहती। Jp singh
मेरी बेचैनी का कोई दवा बता दे, या उस शहर का नाम बता दे।
मै बीमार हूँ बर्षो से, इसकी दवा मेरे शहरो मे नही मिलती, अगर मिलती भी है उसकी शायद खिड़की बंद पडी मिलती
इस शहर मे सभी अजनबी है, लेकिन जिस शहर मे मेै आया हूँ, इस शहर के लिए मै ही अजनबी है ।
हरेक के समाने अपने हारे हुए जख्म की कहानी मत कहो, ये फौलाद की वस्ती है ,अपनी कायरता की कहानी मत कहो । JP singh
करोड़ो की मकान है मेरे पास लाखो की कमाई , ना मेरे घर मे माँ है, ना किसी की परछाई. ज्योति मो–9123155481
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