ख़्वाहिशें दिल में ही दफन होती हैं कह्ते हैं दिल की भी ज़ुबान होती है यह कभी ना बोल के बयाँ होती है खामोशियाँ ही इसकी पहचान होती है ….. यूई
ख़्वाहिशें दिल में ही दफन होती हैं कह्ते हैं दिल की भी ज़ुबान होती है यह कभी ना बोल के बयाँ होती है खामोशियाँ ही इसकी पहचान होती है ….. यूई
कह्ते हैं सब में रह्ता तूं क्यों इतने दुःख सह्ता तूं क्या इससे बेहतर काम नही या हममें तुझको मान नही ….. यूई
कोई कहता तू ऐसा है कोई कहता तूं वैसा है मिल जाऊँ कभी तुमसे तो कैसे तेरी पहचान करूँ ? ….. यूई
मैं इतने जो पाप करूँ क्यों मैं इतना नीचे गिरूँ क्या मैं तेरे जैसा नही या तेरा मैं वो रुप नही ….. यूई
मुझे ख़ुद की लगी रहती है तुझे सबकी पड़ी रहती है मैं ख़ुद के समेट ना पाता हूँ तू सबके दुःख हर जाता है ….. यूई
मैं सोच ही ना पाता हूँ कैसे तू यह सब करता है सबके अन्दर बसता है सबको ख़ुद में रखता है ….. यूई
ख़ुद का करके सब देख् लिया ख़ुद का चाह के भी देख् लिया अंत में जब सबको जोड़ पाया पाया तुझसे आगे ना सोच पाया ….. यूई
नास्तिक सब कह्ते हैं मुझको क्यों ना तेरे दर पे जाता हूँ अब कैसे समझाऊं मैं सबको तुझको हर दर पर तो पाता हूँ ….. यूई
तूने सोच का जो बीज भरा कुछ तो सोच के होगा भ्ररा उस सोच की लाज रखता हूँ हर कदम सोच के बडता हूँ ….. यूई
हर दिन इक जीवन जीता हूँ उसको हाँ पर पूरा जीता हूँ जो भी तूने आज कम दिए उनको पूरा करके मरता हूँ ….. यूई
जब से यह एहसास हुआ मेरा है जो सब कुछ यहा वोह असल में तो तेरा है तबसे हलका हो गया हू उड़ने की अब तैयारी है ….. यूई
कहते है जो कुछ होता है सब यहा होती सब में सिर्फ़ तेरी मर्ज़िया है होता था पहले कभी शक़ मुझको अब बची ना कोई शिकायत है ….. यूई
जाने क्यों कोई शिकायत नही तुमसे मालूम नही के कैसा तुझ्से रिश्ता है हाथ उठ भी नही पाते दुआ में तेरी रह्मत तेरी पहले ही बरस जाती है ….. यूई
ए मालिक मेरी चाहतों का अंत ना हुआ तेरी रहमत और बरकतो का अंत ना हुआ शायद मेरी चाहतो में थी छुपी रज़ा तेरी या मेरी नादानियों को ना मिली सजा तेरी ….. यूई
क्या कहे जो अब तक न कहा क्या सुने जो इन कानों से अब तक न सुना क्या बात होती गर बिना कहे बिना सुने समझ लेते हाल ए दिल
प्यास तेरी चाहत की बेशुमार आजकल है! मेरी नजर में हरपल आती तेरी शकल है! खामोश़ हो गया हूँ गम-ए-जुदाई से मगऱ, साँसों’ में तेरी दौड़ती तस्वीर की नकल है! Composed By #महादेव
. ღღ__क्यूँ उड़ा-उड़ा सा लगता है, तुम्हारे चेहरे का रंग “साहब”; . सब लोग तो कर रहे हैं, कि रंगों का त्यौहार आया है !!…..#अक्स .
हंस देते अगर कभी हँसना सीखा होता हाथ थामे रही शाम-ए-उल्फ़त हमारा बता देते धुप क्या है अगर सेहर में आफताब को देखा होता -सत्य ‘प्रिय’ खन्ना
उसने ख़ामोशी को भी चीखते देखा रंजिश हुई जब क़ल्ब के शोर से राजेश’अरमान’
मेरी कलम में तो कोई बात न थी तेरे तजुर्बों ने मुझे कलमकार बना दिया राजेश’अरमान’
वफायें कब हुई किसी को हासिल महज एक लफ्ज है उम्मीदों के आसपास राजेश’अरमान’
समुन्दर में भी प्यासा ही रहा ज्यों ख्वाब सेहरा में देखा समुन्दर का राजेश’अरमान’
किसी रंजिश से क्या हासिल ज़माने को जानते सब फिर भी मसखरी करते है राजेश’अरमान’
रविदास को गुरु बनाकर हम भी मीरा बन जाएं। द्वेष -कपट सब त्याग कर आज फकीरा बन जाएं। कोयला जैसा मन लेकर भटक रहा है मारा-मारा ज्ञान अगर मिल जाए तो संवर जाएगा कल तुम्हारा। […]
कोई तो फर्क नज़र आता है जब अंधेरों में जुगनू जगमगाता है राजेश’अरमान’
चमन से हासिल वही होता है जो माली के लिए सही होता है राजेश’अरमान’
वक़्त के खेल में मौका देर से सही आदमी की पारी भी आती है राजेश’अरमान’
लौट आओ अपने खेतों पर अब हरित क्रान्ति लिख देंगे। उजाड़ गौशाला को सजाकर अब श्वेत क्रान्ति लिख देंगे। फिर से नाम किसानों का लाल बहादुर शास्त्री लिख देंगे। अपनी लहू सिंचित करके माटी को […]
पृथ्वी, सूरज, तारे और ग्रह सब चलते ही तो रहते है में भी ब्रह्मांड का हिस्सा हू फिर क्यों में आराम करू …… यूई
हम उसकी रज़ा में जीते है जिसमे सब चलता रहता है सदियों से यह ऐसा ही है जैसा यह अबके दिखता है …… यूई
रुकना हमने सीखा ही नही झुकना ही ह्मारी नीयती है मुश्किलें हजारों चाहे आयी हो रुकना हमारी सोचो में नही …… यूई
ओ चलने वाले मुसाफिर गल्ती से रुक मत जाना उसके मिलन की चाह में इक पल भी ना गँवाना …… यूई
कितनी मंजिले पायी है उनकी गिनती याद नही जो सर करनी बाकी है उनकी शक्लें याद सभी …… यूई
जन्मो जन्मो की राह् है दिल में जलती तेरी चाह है सफर में है आराम नही तुझे पाए बिना थाह नही …… यूई
हम तो वोह परवाने है जो शमा का दम भरते है शमा ने महफिल दूर् स्जायी हम इसका कब गम करते है …… यूई
फिर पीछे मुड़ कर देखना हमने कभी सीखा ही नही कदम जो आगे बड़ा लिए उनको कभी खींचा ही नही …… यूई
मुड़ के देखे यह वक्त कहां हम तो सफर के शौदायी है …… यूई
रास्तों की मुश्किलों की हमें परवाह नही जानते नही हम तो मंजिलों के दीवाने है …… यूई
कबसे हूँ मै सफर में मुझको भी अब याद नही रुकना मेरी नीयती नही चलना मेरी रवानी है …… यूई
बेवज़ह इतना कुछ हो गया क्या पागलपन की बीमारी है ख़ुद का तीर, ख़ुद का कमान ख़ुद के मरने की पूरी तैयारी है …… यूई
तुम मेरी बारी के प्यासे हो बच तो तुम भी ना पाओगे मेरी वजह तुम क्या बने हो तुम्हारी वजह की तैयारी है …… यूई
आज नही तो कल आएगी बस तेरी मेरी ही तो बारी है आज बच जाएँ भी तो क्या कल को बस मेरी ही बारी है …… यूई
करता क्रम सब है उसके सब उसके ही तो अधीन है वजह है हर शय में उसकी हर शय उसके अधीन है …… यूई
बेवज़ह चाहे दिखता यहा पे बेवज़ह यहा कुछ भी तो नही …… यूई
ऐसे जाना या वैसे जाना यह तो सब बहांने है …… यूई
यह सब मन की उलझनें है के हम ही सब यहां करते है हम तो कुछ ना करते यहां पे वोही तो सब कुछ करता है …… यूई
तीर चलाने से पहले सोचो ज़ुबान चलाने से पहले सोचो कमान से निल्का हुआ तीर ज़ुबान से निकला हुआ तीर दोनों वापस क्भी नही आते …… यूई
आज आनी है कल आनी है बारी तो सबकी आनी ही है …… यूई
कुछ भी ना होता बेवज़ह हर चीज में उसकी मर्ज़ी है …… यूई
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