Author: Ankit Bhadouria

  • Untitled post 16779

    कितने ही दिन गुज़रे हैं पर, ना गुजरी वो शाम अभी तक;
    तुम तो चले गए पर मैं हूँ, खुद में ही गुमनाम अभी तक!
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    तुम्ही आदि हो,…तुम्ही अन्त हो,…तुमसे ही मैं हूँ, जो हूँ;
    ये छोटी सी बात तुम्हें हूँ, समझाने में नाकाम अभी तक!
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    कैसे कह दूँ, …तुम ना भटको, …मैं भी तो इक आवारा हूँ;
    शाम ढले मैं घर न पहुँचा, है मुझपे ये इल्ज़ाम अभी तक!
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    प्यार से, ‘पागल’ नाम दिया था, तूने जो इक रोज़ मुझे;
    तुम तो बेशक़ भूले हो पर, सब लेते हैं वो नाम अभी तक!
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    तूने जो भेजा था ख़त मुझको, मेरे इक ख़त के जवाब में;
    पढ़ा नहीं, पर रक्खा है, ‘अक्स’ मैंने वो पैग़ाम अभी तक!!…#अक्स

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  • “ना पा सका “

    “ना पा सका “

    ღ_ना ख़ुदी को पा सका, ना ख़ुदा को पा सका;
    इस तरह से गुम हुआ, मैं मुझे ना पा सका!
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    जिस मोड़ पे जुदा हुआ, तू हाथ मेरा छोड़ के;
    मैं वहीँ खड़ा रहा, कि फिर कहीं ना जा सका!
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    मुझसे इतर भला मेरे, अक्स का वजूद क्या;
    जो रौशनी ही ना रही, साया भला कहाँ रहा!
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    साथ है तो अक्स है, जुदा हुआ तो क्या रहा;
    अरे मैं ही ग़र ना रहा, अक्स फिर कहाँ रहा!
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    मेरे अक्स, पे ही मेरे, क़त्ल का इल्ज़ाम है;
    जो आईना गवाह था, वो आईना तो तू रहा!
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    अब ऐ मेरे हमनवा, ये फ़ैसला तुझ पर रहा;
    कि दोनों ही का साथ दो, या कहो अलविदा!!…#अक्स
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  • “मैं कौन हूँ”

    “मैं कौन हूँ”

    ღღ_मैं कौन हूँ आखिर, और कहाँ मेरा ठिकाना है;
    कहाँ से आ रहा हूँ, और कहाँ मुझको जाना है!
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    किसी मकड़ी के जाले-सा, उलझा है हर ख़याल;
    जैसे ख़ुद के ही राज़ को, ख़ुद ही से छुपाना है!
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    मेरी पहचान के सवालों पर; ख़ामोश हैं सब यूँ;
    जैसे पोर-पोर दुखता हो, और बोझ भी उठाना है!
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    वैसे तो इन गलियों से, मैं मिला ही नहीं कभी;
    पर इस शहर से लगता है, रिश्ता कोई पुराना है!
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    इक भूला हुआ फ़साना, ज़हन में उभर रहा है;
    कोई जो मुझको पूछे, कहना कि ये दिवाना है!
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    कोई शख्श हो शायद, मेरी पहचान का शहर में;
    कि तलाश-ए-इश्क़ में हमने, छोड़ा आशियाना है!!…#अक्स

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  • “महबूब”

    “महबूब”

    शबनम से भीगे लब हैं, और सुर्खरू से रुख़सार;

    आवाज़ में खनक और, बदन महका हुआ सा है!

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    इक झूलती सी लट है, लब चूमने को बेताब;

    पलकें झुकी हया से, और लहजा ख़फ़ा सा है!

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    मासूमियत है आँखों में, गहराई भी, तूफ़ान भी;

    ये भी इक समन्दर है, ज़रा ठहरा हुआ सा है!

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    बेमिसाल सा हुस्न है, और अदाएँ हैं लाजवाब;

    जैसे ख़्वाबों में कोई ‘अक्स’, उभरा हुआ सा है!

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    जाने वालों ज़रा सम्हल के, उनके सामने जाना;

    मेरे महबूब के चेहरे से, नक़ाब सरका हुआ सा है!!

    ღღ__अक्स__ღღ

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  • “मुलाकात रहने दो”

    “मुलाकात रहने दो”

    ღღ_आज ना ही आओ मिलने, ये मुलाकात रहने दो;
    कुछ देर को मुझको, आज मेरे ही साथ रहने दो!
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    अन्धेरों की, उजालों की, हवाओं की, चिरागों की;
    या अपनी ही कोई बात छेड़ो, मेरी बात रहने दो!
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    मैं सोया कि नहीं सोया, मैं रोया कि नहीं रोया;
    और भी काम हैं तुमको, ये तहकीकात रहने दो!
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    यूँ तो सैकड़ों रात जागा हूँ, तुम्हारे ही ख्यालों में;
    पर सोना चाहता हूँ अब, आज की रात रहने दो!
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    जाते-जाते ‘अक्स’, मेरा इक मशविरा है तुमको;
    कि इश्क़ करो तो बे-हद, यूँ एहतियात रहने दो!!…#अक्स
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  • “देखा नहीं तुमने”

    “देखा नहीं तुमने”

    ღღ_ख़ुद से लेते हुए इन्तक़ाम, देखा नहीं तुमने;
    अच्छा हुआ मेरा अस्क़ाम, देखा नहीं तुमने!
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    उतर ही जाता चेहरा मेरा, शर्म से उसी दम;
    अच्छा हुआ मेरा अन्जाम, देखा नहीं तुमने!
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    कल रात को हर ख़्वाब से, लड़ गया था मैं;
    अच्छा हुआ मेरा इत्माम, देखा नहीं तुमने!
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    रोया था मैं ही चीखकर, ख़्वाबों की मौत पे;
    अच्छा हुआ ये ग़म तमाम, देखा नहीं तुमने!
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    सुबह तक पड़े रहे, टुकड़े ख्वाबों की लाश के;
    अच्छा हुआ मुझे नाकाम, देखा नहीं तुमने!
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    मैंने ही ‘अक्स’ आग दी, मैं ही था शमशान में;
    अच्छा हुआ सोज़—ए-निहाँ, देखा नहीं तुमने!!…..#अक्स
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    शब्द…………………..अर्थ
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    अस्क़ाम = बुराईयाँ, कमियां
    इत्माम = प्रवीणता, सिद्धि
    सोज़-ए-निहाँ = जलने के निशान

  • “ग़ज़ल होती है”

    “ग़ज़ल होती है”

    ღღ_महबूब से मिलने की, हर तारीख़ ग़ज़ल होती है;
    महफ़िल में उनके हुस्न की, तारीफ़ ग़ज़ल होती है!
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    ग़ज़ल होती है महबूब की, बोली हुई हर बात;
    आशिक के हर ख्वाब की, तकदीर ग़ज़ल होती है!
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    गर आज़माओ तो ज़ंजीर से, मज़बूत है ग़ज़ल;
    तोड़ना हो तो विश्वास से, बारीक़ ग़ज़ल होती है!
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    आशिक़ के दिल की आह भी, होती है इक ग़ज़ल;
    कहते हैं कि मोहब्बत की, तासीर ग़ज़ल होती है!
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    ‘अक्स’, कलमकार की कलम का, तावीज़ है ग़ज़ल;
    अग़र नाम हो जाये, तो हर नाचीज़ ग़ज़ल होती है!!….#अक्स

  • “ग़ज़ल लिक्खूँगा!”

    “ग़ज़ल लिक्खूँगा!”

    ღღ_मैं भी लिक्खूँगा किसी रोज़, दास्तान अपनी;
    मैं भी किसी रोज़, तुझपे इक ग़ज़ल लिक्खूँगा!
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    लिक्खूँगा कोई शख्स, तो परियों-सा लिक्खूँगा;
    ग़र गुलों का ज़िक्र आया तो, कमल लिक्खूँगा!
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    बात ग़र इश्क़ की होगी, तो बे-इन्तहा है तू;
    ज़िक्र ग़र तारीख का होगा, तो अज़ल लिक्खूँगा!
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    मैं लिक्खूँगा तेरी रातों की, मासूम-सी नींद;
    और अपनी बेचैन करवटों की, नक़ल लिक्खूँगा!
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    हाँ ज़रा मुश्किल है, तुझे लफ़्ज़ों में बयां करना;
    फिर भी यकीन मानो साहब, मुकम्मल लिक्खूँगा!
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    ये जानता हूँ “अक्स”, कि तुझे झूठ से नफरत है;
    इसलिए जो भी लिक्खूँगा, सब असल लिक्खूँगा!!….#अक्स

  • “जाने दे!”

    “जाने दे!”

    ღღ__महज़ एक लम्हा ही तो हूँ, गुज़र जाने दे;
    इस तरह तू जिंदगी अपनी, संवर जाने दे!
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    ले चलें जिस डगर, दुश्वारियाँ मोहब्बत की;
    मेरे महबूब अब मुझको, बस उधर जाने दे!
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    तुझे ठहरना है जिस ठौर, तू ठहर, जाने दे;
    मुझे क़ुबूल है इश्क़ का, हर कहर, जाने दे!
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    तू बोलता रहा, और मैं सुनता रहा, खामोश;
    मुझे भी कहना है बहुत कुछ, मगर जाने दे!
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    इससे पहले “अक्स”, तू अपना रास्ता बदले;
    मैं ही मुड़ जाता हूँ, मेरे हमसफ़र, जाने दे!!….#अक्स
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  • मगर कब तक!

    मगर कब तक!

    ღღ_कर तो लूँ मैं इन्तजार, मगर कब तक;
    लौट आएगा बार-बार, मगर कब तक!
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    उसे चाहने वालों की, कमी नहीं है दुनिया में;
    याद आएगा मेरा प्यार, मगर कब तक!
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    प्यार वो जिस्म से करता है, रूह से नहीं;
    बिछड़कर रहेगा बे-क़रार, मगर कब तक!
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    दर्द अहसास ही तो है, मर भी सकता है;
    बहेंगे आँखों से आबशार, मगर कब तक!
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    कहीं फिर से मोहब्बत, कर ना बैठे ‘अक्स’;
    दिल पे रखता हूँ इख्तियार, मगर कब तक!!…..#अक्स
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  • “अलग है”

    ღღ_यूँ हर एक शख्स में अब, मत ढूँढ तू मुझको;
    मैं “अक्स” हूँ ‘साहब’, मेरा किरदार ही अलग है!
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    झूठ के सिक्कों से, हर चीज़ मिल ही जाती है;
    पर जहाँ मैं भी बिक जाऊं, वो बाज़ार ही अलग है!
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    यूँ तो हुस्न वाले, कम नहीं हैं इस दुनिया में;
    पर जिसपे मैं फ़ना हूँ, वो हुस्न-ए-यार ही अलग है!
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    यूँ तो इन्तज़ार करना, मेरी फितरत में नहीं शामिल;
    पर तेरी बात कुछ और है, तेरा इन्तज़ार ही अलग है!
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    राँझा, फ़रहाद, मजनू अब, गुज़रा हुआ कल हैं;
    मैं ख़ुद ही ख़ुद की मिसाल हूँ, मेरा प्यार ही अलग है!!….

    #अक्स

  • ღღ_कभी यूँ भी तो हो

    ღღ_कभी यूँ भी तो हो, कि दिल की अमीरी बनी रहे;
    फिर चाहे तो ज़िन्दगानी, ग़ुरबत में बसर कर दे!
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    कोई एक शाम फुरसत की, कभी मेरे लिए निकाल;
    फिर उस मुलाकात में ही, तू शाम से सहर कर दे!
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    तेरे होठों की मिठास तो, मुझे चख लेने दे एक बार;
    फिर बाकी की उम्र सारी, गर चाहे तो ज़हर कर दे!
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    दिन-रात माँगता हूँ, रब से बस तुझको दुआ में मैं;
    ऐ-काश कि वो तुझको ही, मेरा हमसफ़र कर दे!
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    सूना लगता है जहाँ सारा, तुझ बिन ऐ-साहिबा;
    कभी यूँ भी तो हो, कि तू मेरे ख्वाबों में रंग भर दे!!….‪#‎अक्स‬
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  • “देर तलक”

    ღღ_कल फ़िर से दोस्तों ने, तेरा ज़िक्र किया महफ़िल में;
    कल फ़िर से अकेले में, तुझे सोंचता रहा मैं देर तलक!
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    कल फ़िर से तेरी यादों ने, ख़्वाबों की जगह ले ली;
    कल फ़िर से मेरे यार, तुझे देखता रहा मैं देर तलक!
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    कल फ़िर से तेरी गली में, भटकने की आरज़ू हुई;
    कल फिर से एक बार, ख़ुद को रोकता रहा मैं!
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    कल फिर से तेरा एहसास, मुझे छूकर गुज़र गया;
    कल फिर से तेरी तलाश में, यूँ ही भागता रहा मैं!
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    कल फिर से मैंने नींद से, वादा कियां था सोने का;
    कल फिर नींद में “अक्स”, जागता रहा मैं देर तलक!!…..‪

    #‎अक्स‬

  • “ख़ुदा-ख़ुदा करके”

    ღღ_तजुर्बे सब हुए मुझको, महज़ उससे वफ़ा करके;
    दुआ जीने की दी उसने, मुझे खुद से जुदा करके!
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    मैं कहना चाहता तो हूँ, यकीं उसको अगर हो तो;
    ग़ैर का हो नहीं सकता, उससे अहद-ए-वफ़ा करके!
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    मैं मुजरिम हूँ अगर तेरा, सजा जो चाहता हो दे;
    न ख़ुद से दूर रख तू यूँ, मर जाऊंगा ज़रा-ज़रा करके!
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    शिकायत है अगर मुझसे, तो बताते क्यूँ नहीं आख़िर;
    सुकून थोडा तो मिल जाता, हाल-ए-दिल बयां करके!
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    नज़र किसकी लगी है “अक्स”, ख़ुदाया प्यार को अपने;
    कौन है अपना, जो मुझको लूटता है ख़ुदा-ख़ुदा करके!!…..‪#‎अक्स‬
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  • “नहीं होता”

    ღღ_वो चाँद जो दिखता है, वो सबको ही दिखता है;
    महज़ देख लेने भर से ही, वो हमारा नहीं होता!
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    दिन तो कट ही जाता है, कश्मकश में जिंदगी की;
    तेरे बिन एक पल भी, रातों में गुज़ारा नहीं होता!!
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    कैसे कह दूँ कि मुझे तुमसे, मोहब्बत ही नहीं है;
    आख़िर मैं यूँ ही तो बे-वजह, आवारा नहीं होता!!
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    एक रिश्ता है कई जन्मों से, दरमियान अपने शायद;
    वरना ज़रा-सी बात में तुम मेरी, मैं तुम्हारा नहीं होता!!
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    मैं एक शायर हूँ “अक्स”, और वो मेरी ही गज़ल है;
    ना इश्क़ होता और ना मैं, गर तेरा इशारा नहीं होता!!….‪#‎अक्स‬
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  • “कहाँ रहते हो”

    “कहाँ रहते हो”

    ღღ_हम ढूँढ आए ये शहर-ए-तमाम, कहाँ रहते हो;
    अरे अब आ जाओ कि हुई शाम, कहाँ रहते हो!
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    इज्जत ख़ुद नहीं कमाई, विरासत ही सम्हाल लो;
    कहीं हो जाए ना ये भी नीलाम, कहाँ रहते हो!
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    रस्मो-रिवाज़ इस दुनिया के, तुझे जीने नहीं देंगे;
    जब तक मिल जाए ना इक मुकाम, कहाँ रहते हो!
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    तेरे दिल से जो कोई खेलेगा, तो समझ जाओगे;
    किसे कहते हैं सुकून-ओ-आराम, कहाँ रहते हो!
    .
    अब तुम्ही बताओ “अक्स”, और कैसे तुझे पाऊँ;
    कि रब से माँगा है सुबह-ओ-शाम, कहाँ रहते हो!!….‪#‎अक्स‬
    .

     

  • “नहीं देखा”

    ღღ_मोहब्बत करके नहीं देखी, तो ये जहाँ नहीं देखा;
    मेरे महबूब तूने शायद, पूरा आसमां नहीं देखा!
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    तुझमें खोया जो एक बार, फ़िर मिला नहीं कभी;
    खुद की ही तलाश में मैंने, कहाँ-कहाँ नहीं देखा!
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    मंज़िल की क्या ख़ता जो, भटकता रहा मैं ही;
    की जिधर रास्ता सही था, मैंने वहाँ नहीं देखा!
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    मेरे शहर के सब लोग, अमनपसंद हो गये शायद;
    एक अरसे से किसी घर से, उठता धुआँ नहीं देखा!
    .
    नासमझ हो तुम “अक्स”, जो मासूम समझते हो;
    उनका हुस्न तो देखा तुमने, उनका गुमाँ नहीं देखा!!….‪#‎अक्स‬
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  • “बुरा लगता है”

    ღღ__तेरे लब पे सिवा मेरे, कोई नाम आये तो बुरा लगता है;
    इक वही मौसम, जब हर शाम, आये तो बुरा लगता है!
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    जागते रहने की तो हमको, आदत हो गयी मोहब्बत में;
    नींद अब किसी रोज़, सरे-शाम आये तो बुरा लगता है!
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    गर इन तन्हाईयों में गुमनाम ही, मर जाऊं तो बेहतर है;
    अब किसी महफ़िल में, मेरा नाम आये तो बुरा लगता है!
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    ज़र्द पड़ चुके हैं सारे, वो टूटते पत्ते, बेजुबाँ मोहब्बत के;
    अब इश्क़ के नाम से, कोई पयाम आये तो बुरा लगता है!
    .
    ज़िन्दा हैं जब तक “अक्स”, उन लबों के बे-हिसाब पैमाने;
    मेरे इन होठों पे कोई और, जाम आये तो बुरा लगता है!!…
    .‪
    #‎अक्स‬

  • “रंग” #2Liner

    ღღ__कुछ एक बे-रंग क़तरों में, बह गया ज़िन्दगी का हर एक रंग;
    .
    सबक क्या-क्या नहीं सीखे, “अक्स” हमने आंसुओं की जानिब से!!…‪#‎अक्स‬
    .

  • “याद”#2Liner…..

    ღღ__ना जाने आज इतना, क्यूँ याद आ रहे हो “साहब”;
    .
    तुझे भूलने की कोशिश, तो हमने की ही नहीं कभी!!….‪#‎अक्स

    .

  • “कोई राब्ता तो हो!!.”

    ღღ__ठहरा हुआ हूँ कब से, मैं तेरे इन्तज़ार में;
    आख़िर सफ़र की मेरे, कोई इब्तिदा तो हो!
    .
    मंजिल पे मेरी नज़र है, अरसे से टिकी हुई;
    पहुँचूं मैं कैसे उस तक, कोई रास्ता तो हो!
    .
    किस तरह छुपाऊँ, जो ज़ाहिर हो चुका उसपे;
    मैं कहना चाहता भी हूँ, पर कोई वास्ता तो हो!
    .
    वो कहता है ढूँढ लेंगे; तुझे दुनिया की भीड़ से;
    मगर उससे पहले मेरे यार, तू लापता तो हो!!
    .
    फिक्र तो बहुत होती है, “अक्स” उसको तेरी;
    हाल पूछे भी तो भला कैसे, कोई राब्ता तो हो!!….‪#‎अक्स‬

  • “डर लगता है!!”

    “डर लगता है!!”

    ღღ__जब दर्द भी दर्द ना दे पाए, तो डर लगता है;
    आशिक़ी हद से गुज़र जाये, तो डर लगता है!!
    .
    डर लगता है अक्सर, किसी के पास आने से;
    पास आके वो गुज़र जाये, तो डर लगता है!!
    .
    कुछ ख्वाहिशें बेशक़, मर जाएँ तो ही बेहतर है;
    कुछ ज़रूरतें यूँ ही, मर जाएँ तो डर लगता है!!
    .
    इक बार कहा था उसने, आशिक़ी बे-मतलब है;
    ये मतलब गर समझ आ जाये, तो डर लगता है!!
    .
    कोई ऐसा भी घाव होगा, जिससे मरने में हो मज़ा;
    जो वही घाव भर जाए ‘अक्स’, तो डर लगता है!!…..‪#‎अक्स‬

    .

     

  • “इलाज” #2Liner-111

    ღღ__कुछ इस तरह भी करता है “साहब”, वो मेरे दर्द का इलाज;
    .
    कि पहले घाव देता है, फिर अपने आंसुओं से धोता है!!…..‪#‎अक्स‬

  • “चाँद” #2Liner-110

    ღღ__कल शब मिला था इक चाँद, हाँ “साहब” चाँद ही रहा होगा;
    .
    मिले भी तो दूर से, प्यार पर गुरूर से, और दोनों ही मजबूर से!!….‪#‎अक्स

  • “ना-समझ ख्वाब” #2Liner-109

    ღღ__ब-मुश्किल थपकियाँ देकर सुलाती है, नींद मुझको “साहब”;

    पर कुछ ना-समझ ख्वाब हैं उनके, जो बे-वक़्त जगा देते हैं!!…‪#‎अक्स‬

  • “मजबूरी” #2Liner-108

    ღღ__मजबूरी में सुनने पड़ते हैं “साहब”, लोगों के ताने अक्सर;
    .
    कोई भी शख्स इस जहाँ में, शौक़ से रुसवा नहीं होता!!…‪#‎अक्स
  • “गुफ्तगू” #2Liner-108

    ღღ__दुश्वारियाँ लाख सही लेकिन, गुफ्तगू करते रहो “साहब”;
    .
    मुसलसल चुप रहने से भी कोई, मसला हल नहीं होता!!…..‪#‎अक्स‬

  • “आवाज़”

    ღღ__कौन-सी दुनिया में रहते हो, तुम आज-कल “साहब”;
    .
    जो सपनों में भी तुम तक, मेरी आवाज़ नहीं जाती!!….#अक्स

  • “मजबूरियाँ” #2Liner-107

    ღღ__मजबूरियों का आलम कुछ ऐसा भी होता है “साहब”;
    .
    मुसाफिर हूँ फिर भी, अपनी मंजिलें छोड़ आया हूँ!!….‪#‎अक्स‬

  • “ख़ामोशी” #2Liner-106

    ღღ__कह तो सब दूँ “साहब”, पर कभी ख़ामोशी भी पढ़ा करो;
    .
    वैसे भी मोहब्बत में, हर बात, कहने की नहीं होती!!……‪#‎अक्स‬
  • “चाँद” #2Liner-106

    ღღ__गलतफ़हमी में जागते रहे, रात भर उनको जगता देखकर;
    .
    भला क्या ज़रूरत थी चाँद को, यूँ रात में निकलने की!!….#अक्स
    .
  • “दस्तक” #2Liner-105

    ღღ__कल शब तुम्हारी यादों ने “साहब”, क्या दरवाज़े पर दस्तक दी थी?
    .
    सुबह को मेरी गली में, कुछ क़दमों के निशान मिले थे आज!!…..‪#‎अक्स‬

  • “क़दमों के निशान” #2Liner-104

    ღღ__कल भी आये थे “साहब”, घर तक उनके क़दमों के निशान;
    .
    वो मुझसे मिलते तो नहीं लेकिन, मिलने आते ज़रूर हैं!!….‪#‎अक्स

  • “असर” #2Liner-104

    ღღ__आपकी मोहब्बत का, इतना तो असर हुआ है “साहब”;
    .
    कि अब अक्सर वहाँ होता हूँ, जहाँ होता नहीं हूँ मैं !!….‪#‎अक्स‬

  • “ख्वाब” #2Liner-103

    ღღ__गर इजाज़त हो आपकी, तो कुछ ख्वाब देख लूँ “साहब”;
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    यूँ तो अरसा गुज़र चुका है, आप सुलाने नहीं आये !!….‪#‎अक्स

  • “ख़त” #2Liner-102

    ღღ__यूँ भी कई बार “साहब”, मोहब्बत का सिला मिला मुझे;
    .
    कि मेरे ख़त के जवाब में, मेरा ही ख़त मिला मुझे!!…..#अक्स
  • “ख़ुदकुशी” #2Liner-101

    ღღ__न जाने किस कशिश से कब्र ने, पुकारा था आज “साहब”;
    .
    कि ना चाहते हुए भी मुझको, आज ख़ुदकुशी करनी पड़ी!!…‪#‎अक्स‬
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  • गुफ्तगू #2Liner-100

    ღღ__गुफ्तगू बेशक नहीं करते, निगाहें फिर भी रखते हैं;
    .
    ना जाने प्यार है कैसा, जो कभी बयाँ नहीं होता!!…..‪#‎अक्स‬

  • कहाँ रहते हो #2Liner-96

    ღღ__कहाँ रहते हो तुम भी, आज-कल “साहब”;
    .
    बात-बिन-बात, दिल दुखाने नहीं आते!!….‪#‎अक्स

  • याद #2Liner-97

    ღღ__कोई याद ही ना करे, ये तो हो सकता है “साहब”;
    .
    मगर भूल जाए मुझको, भला ये कहाँ मुमकिन है!!….‪#‎अक्स‬

  • “फुरसत” #2Liner-97

    ღღ__कई बार खुद को, यूँ भी बहलाया है हमने “साहब”;
    .
    कि वो आते तो ज़रूर, मगर फुरसत ही कहाँ होगी!!…..‪#‎अक्स‬

  • “तजुर्बा” #2Liner-96

    ღღ__कम उम्र में ही ज्यादा, तजुर्बे हो जाने का ये खतरा है “साहब”;
    .
    कि फिर वो उम्र तो रहती है, मगर कोई बच्चा नहीं रहता !!…..‪#‎अक्स
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  • ज़िद #2Liner-95

    ღღ__ये ज़िन्दगी अक्सर, ज़िद से नहीं चलती “साहब”;
    .
    कुछ धडकनों की खातिर, दिल से समझौता ज़रूरी है!!….‪#‎अक्स
  • “वहम” #2Liner-94

    ღღ__ये भी हो सकता है मुझको, फिर से वहम हुआ हो “साहब”
    .
    फिर भी पूछ लो ना दिल से, क्यूँ मुझे आवाज़ देता है!!…‪#‎अक्स‬
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    AkS_Bhadouria

  • “ख़ानाबदोश-सी ज़िन्दगी” #2Liner-94

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    ღღ__ख़ानाबदोश-सी ज़िन्दगी ही, लिखी है नसीब में “साहब”;
    .
    कुछ लोगों का इस जहाँ में, अपना ठिकाना नहीं होता!!…..‪#‎अक्स

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  • “इंतज़ार” #2Liner-93

    ღღ__इंतज़ार लम्बा ही सही “साहब”, पर मैं समझौता नहीं करता ;
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    हमसफ़र वो ही बनेगा मेरा, जिसे भी मेरी ज़रूरत हो!!…..‪#‎अक्स‬

  • “ख़याल” #2Liner-92

    ღღ__सुना है कि तुमको, बहुत ख़याल है मेरा “साहब”;
    .
    मैं भी जा रहा हूँ खुद को, तेरे पास छोड़ के आज!!….‪#‎अक्स‬

  • “गुफ्तगू” #2Liner-82

    ღღ__वो तो अहद-ए-वफ़ा की खातिर, तुमसे मिलता रहा हूँ साहब;
    .
    वरना गुफ्तगू…..वो भी तुमसे…..क्या मज़ाक करते हो!!….‪#‎अक्स‬
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