बड़े दिनों के बाद बेचारी आँखों ने, स्वप्नों भरी एक रात गुजारी आँखों ने, बेचैनी भरपूर दिखाई आँखों ने, जिस पल उनसे नज़र मिलाई आँखे ने, कल्पनाओं की कलम चलाई आँखों ने, हर दिन नई […]

मत लगाओ नफरत की आग दिवानों की दिल मे,जिसके दिल मे वर्षो से तुम्हारे नाम के महोब्बत की चिराग जलती हो । वरना वो बेधर हो जाएगा अपने दिलो वाले धर से।।

तुम मेरी जिंदगी में बेहद बेशुमार हो! तुम मेरे तसव्वुर में आते बार–बार हो! मुश्किल बहुत है रोकना तेरे सूरूर को, तुम मेरी नज़र में ठहरा हुआ खुमार हो! मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

तुम मेरी जिंदगी में बेहद बेशुमार हो! तुम मेरे तसव्वुर में आते बार–बार हो! मुश्किल बहुत है रोकना तेरे सूरूर को, तुम मेरी नज़र में ठहरा हुआ खुमार हो! मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

खामोश तस्वीरों की जैसे कोई आवाज बन गया हूँ, अनजाने में ही जैसे उनके अल्फ़ाज़ बन गया हूँ, जो कह नहीं पाती वो अपनी आँखों से खुलकर, मैं उनके कबीले का कोई सरदार बन गया […]

सब कुछ चाहिए जुबाएँ ना साथ देती, जब आती है रिश्ते शादी की जुबाएँ पर मिठास होती, देख अच्छे से ऐसी — वैसी बात होती– चाहिए सब कुछ जुबाएँ ना साथ होती। बात बन जाती […]

ए वक्त अब उससे दुर ना कर , ए वक्त इतना मुझे मजबुर मत कर। वरना टुट जाऊँगी, उसके बिना मुझे उससे इतन दुर ना कर, क्योकि उसके साथ जीना फुलवारी लगता, उसके साथ चले […]

वक्ते-सितम से रिश्ते टूट जाते हैं! राहे-वफा में रहबर छूट जाते हैं! दूरियाँ हो जाती हैं जिनसे दिलों की, बेरहम बनकर हमसे रूठ जाते हैं! मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

तु कहती तो तेरे कदमो मे गिर जाता, मै इतना मजबुर था चाहता था, तुझे क्योकि मेरे दिल को तु मंजुर था। प्यार के ब़दले तु करती प्यार ये शिर्फ तुम्हारा कहने का नाटक था। […]

रेत हाथों से यूँ ही न सरक पाएगा, गर उँगलियों में दूरी रखोगे नहीं, रंग चेहरे का फीका न हो पायेगा, गर रिश्तों में किस्से रखोगे नहीं, अब कुछ नहीं इन आँखों से हो पायेगा, […]

माँ के दिल और पिता के दिमाग से परखा जाएगा, ये बचपन का पौधा बड़े हिसाब से ख़र्चा जाएगा, मेहनत लगी है गहन किसकी परवरिश में कितनी, दो एक रोज़ में सरेआम इसका चर्चा हो […]

पत्थरों को भी खड़े होने का सलीका सिखाने में, कितना काबिल दिखता है वो पिरामिड बनाने में, सन्तुलन कोई रखता नहीं दो रिश्ते निभाने में, बेहद तस्सली सुझाता है वो शिलाओं को सिखाने में, सहज […]

सिखाता कोई नहीं बस सीखना पड़ता है, अपने रिश्तों को खुद ही सूझना पड़ता है, दिल की जितनी ही पहरेदारी की जाती है, उसको उतनी ही बिमारी से जूझना पड़ता है।। राही (अंजाना)

शीर्षक – अस्थिर जो सोचती हूँ अपने बारे में शायद किसी को समझा पाऊँ, मैं वो पानी की बूंद हूँ जो आँखों से आँसू बनकर छलक जाऊँ तस्वीर बनाना आसान हैं किसी की कोशिश करती […]

शीर्षक – मृत्योपरांत स्मरण (एक बेटी के भाव अपने पिता की मृत्यु पर ) जिसने हाथ पकड़कर चलना सिखाया आज साथ छोड़ कर जा रहा है वो… गिरकर सम्भलना सिखाया जिसने आज फिर उठने से […]

जब दिल नहीं कोई आत्मा दुखाने लगे, आँखों में ठहरा वो पानी छलकाने लगे, स्वप्नो की बनाई दुनियाँ को भुलाने लगे, अपने ही रिश्ते का दीपक बुझाने लगे, चेहरे से झलकते भावों से नज़र चुराने […]

मेरे जिस्म से हर रोज़ मेरे वस्त्र उतारे जाते हैं, दरख्त काटकर पंछियों के घर उजाड़े जाते हैं, साँसे हैं मेरी ही बदौलत यहाँ जिनके जीवन की, उन्हीं हाथों से अक्सर मेरे वजूद उखाड़े जाते […]

जाने अनजाने रिश्तों के मध्य खड़ा नज़र मैं आता हूँ, मैं मतलब हूँ बेमतलब लोगों के साथ कभी जुड़ जाता हूँ, कभी मैं आता काम बड़े कभी किसी मोल न भाता हूँ, थाली के बैगन […]

स्वप्नों के तराजू पर वजन मेरी जिम्मेदारी का ज्यादा निकला, मेहनत के कागज़ों पर नोटों का रंग थोड़ा ज्यादा निकला, बहुत बहाया पसीना दो रोटी कमाने की खातिर मैंने, मगर मेरे वजूद से मेरी कमर […]

जब मैंने पूछा – आज तुम्हारा बदन इतना मैला क्यों है क्यों हो तुम इतने गुस्से में, क्या कोई संताप है? उसने घूर कर देखा मुझे, और कहा आज कल तबीयत थोड़ा खराब है. ये […]

तुम खुद को किसी की याद में क्यों खोते हो? तुम जिंदगी को अश्कों से क्यों भिगोते हो? आती हुई बहारों को न रोको दर्द से, तुम हर घड़ी तन्हाई में क्यों रोते हो? मुक्तककार- […]

वो दर्द वो खामोशी का मंजर नहीं बदला! तेरी अदा-ए-हुस्न का खंजर नहीं बदला! शामों-सहर चुभते रहते हैं तीर यादों के, मेरी तन्हाई का वो समन्दर नहीं बदला! मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

वो दर्द वो खामोशी का मंजर नहीं बदला! तेरी अदा-ए-हुस्न का खंजर नहीं बदला! शामों-सहर चुभते रहते हैं तीर यादों के, मेरी तन्हाई का वो समन्दर नहीं बदला! मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

उत्कर्ष मेल में पहली बार मेरी ग़ज़ल बहुत बहुत शुक्रिया संपादक महोदय जी का । आपका सहयोग यूँ ही बना रहे ।

भारतीय हो-भारतीय रहो ———————————- भारतीय हो–भारतीय रहो सर ऊँचा कर भारतीय कहो मिट्टी यहाँ की,संस्कृति यहाँ की संस्कारों में पली-बढ़ी है शक़्ल-ओ-सूरत मनुष्य एक सा फिर,क्यों—? सबको भेदभाव की पड़ी है व्यथित विचारों की तोड़ो […]

सारी यादें बन्द दरवाज़े के पीछे कैद कर रहा हूँ, हर एक निशानी को मैं कैसे सुफैद कर रहा हूँ, कोई आंकलन ही नहीं मुझे इस सनक का मेरी, क्यों सांकल लगा कर मैं खुद […]

दुनिया की भीड़ में जब कभी अकेली होती हूँ तो बहुत याद आती है मुझे मेरी माँ खुशियाँ हो या गम हो हर सुख दुःख में बहुत याद आती है मुझे मेरी माँ जब भी […]

तेरे रवैये पे तू इतराया ना कर, ऐ दोस्त तू चेहरे को अपने यूँ बनाया ना कर, तू झूठ पर पर्दा उढ़ाया ना कर, यूँ सच को आईना दिखाया ना कर, तेरे रवैये पे तू […]

पेट भरने को कितनी जद्दोजहद दिखाता है, जब कोई बच्चा सड़कों पर खेल दिखाता है, चोट दिल पे लगे और जिस्म को झुकाता है, क्यों पैसों की खातिर यूँ मासूम जज़्बा दिखाता है।। राही (अंजाना)

एहसासों की एक चादर को रोज़ बिछाया करता हूँ, अपने दिल के टुकड़ों को उसपे रोज़ सजाया करता हूँ, बहुत अन्धेरा लगता है जब कभी मुझे अंतर्मन में, मैं उसकी एक तस्वीर मात्र को देख […]

बात करते हैं मगर चेहरा छिपा लेते हैं लोग, अक्सर खुद पर ही पेहरा लगा लेते हैं लोग, आते क्यों नहीं भला खुल के सामने सबके, जो दर्द भी दूजे के अपना बना लेते हैं […]

भला मौन रहकर भी कैसे कोई गहरे तीर चला लेता है, छोटी-छोटी बातों से ही मन की तस्वीर बना लेता है, लगे चोट अपनों से तो खुद को ही समझा लेता है, चेहरे पर झूठा […]

सारे प्रयास प्रत्यक्ष है के विफल हो रहे हैं, सभी अक्षर मुख से निकल अस्त वयस्त हो रहे हैं, पहुँच ही नहीं रही है आवाज़ उस बालक तक, जिसके मस्तिष्क में ठहरे प्रश्न चिह्न चल […]