सूरज की किरणे भी सुबह-सुबह कयामत ढ़ा रही है,
पूछ रही है,कैसे है वो?जिनकी तुम्हे याद आ रही है।
सूरज की किरणे भी सुबह-सुबह कयामत ढ़ा रही है,
पूछ रही है,कैसे है वो?जिनकी तुम्हे याद आ रही है।
मुझमे ही रह गई
खामियां
या शायद मेरे
प्यार में
जो तेरी दहलीजें
ना पार कर पाये
किस बात पर
रोयें करे
अफसोस
अब कैसा
हम
कल भी
कल भी
अकेले
थे
हम अब भी
अकेले हैं
समझते थे जिन्हें हम अपने दिल के करीब।
मेरे खिलाफ शाजिसो में वो निकले शरीक।
हमें कोई शिकवा न होता, गर वो गैर होता,
पर वो तो थे, हमारे सबसे अज़ीज़ रफ़ीक।
देवेश साखरे ‘देव’
रफ़ीक-साथी
_”कोरा कागज़ था और कुछ बिखरे हुए लफ़्ज़,_
_ज़िक्र तेरा आया तो सारा कागज़ गुलाबी हो गया !!”_
दांस्ता सुनाऊं और मज़ाक बन जाऊं,
बेहतर है मुस्कुराऊं और खामोश रह जाऊं….!!
छिपे हुये दर्द को आज ताज़ा किया है उसने,
दिल को बहुत बेकरार फिर से किया है उसने।
याद उसकी आती है हर पल तो आने दो यारो…
कसम देकर अपनी मजबूर भी तो किया है उसने।।
जरूरत पड़ने पर आज मुकर गये हो तुम,
जमाने की तरह कितना बदल गये हो तुम।
दोस्त!ये मंजर भी गुजर जायेंगे किसी तरह से,
पर आज चुप रहकर बहुत दर्द दे गये हो तुम।।
दोस्तो!वो आईना देखकर अपनी नजरे चुराता होगा।
अक्स मेरा जब उन्हे आँखों मे नजर आता होगा।।
रहम ओ करम तो खुदा के हाथ है,
अब तुही बता मेरी क्या औकात है।।
राही अंजाना
अभी तो बस अभ्यास चल रहा है,
तेरी मोहब्बत का अध्याय चल रहा है।।
राही अंजाना
तुझसे बिगड़ी हर बात सुलझा लूँ,
आ मिल तेरे बालों में हाथ उलझा लूँ।।
राही अंजाना
वों पढ़ लेते हैं
आंखों ही आंखों में
मेरे दिल का हाल
ना बता चाहूं उनको
मुझ पर क्या बीता इस साल
क्यों ना उनसे कुछ दूरी बढ़ा ली जाए
ना पढ़ सके वों मेरे मन को
क्यों ना उन से आंखें चुरा ली जाए.
कहां हैं वो किधर
ढूँढू नही मालूम
मुझको
चले आओ उन्हें
आवाज़ देती जा रही
हूं मैं ।
ए खुदा! राह में
उन्हें दो पल
के लिए रोक ले
बनकर हवा
पहलू में
उनके
आ रही हूँ मैं ।
दो इन्सान एक हो
जाते हैं ।
हर रिश्ते से
खास हो
जाते हैं ।
नज़रों से दूर
होते हैं पर
दिल के करीब
हो जाते हैं ।
प्रज्ञा शुक्ला
सुबह के सपनें
सच होते हैं
क्या
यूं छोटी छोटी बातों पर
नाराज़ नहीं
होते
अपने से खफ़ा होते हैं क्या?
प्रज्ञा शुक्ला
तुम ना होतो जीने
की आस किसे है
तुम होतो
धूप की चादर
भी ओढ़ लेंगे
हम।मलमल के
बिस्तर की
आस किसे है।
उनकी चाहत में
जीती जा रही हूँ
मैं
यादों को उनकी दिल में
सींती जा रही हूँ
मैं
प्रज्ञा शुक्ला
आस होगी न आसरा होगा,
तेरे बिना मेरा क्या होगा।।
राही अंजाना
तेरी बातें बखूबी बड़ी निराली रहीं,
सुनकर उनको रातें मेरी खाली रहीं।।
राही अंजाना
गुज़र रही है
गुज़र जायेगी
ये रात भी
तेरी यादों
में सिमट जायेगी।
ज़िन्दगी बेरंग है
कुछ रंग होने चाहिये
है सफ़र लम्बा बहुत
एक दोस्त होना चाहिए ।
सब रूठे बैठे हैं हमसे
जाने क्यूँ ,
हमने जबसे तुम्हें
अपना कह दिया।
हम पीछे रह गये
तुम आगे ही सही
तुमसे हार कर
भी हम जीत गए
हैं देखो।
तुम्हारी तस्वीर को सीने से
लगा रखा है।
यूं महसूस होता है
की तुम हो।
कितना अच्छा होता
तुम होते और हम होते।
कुछ खुशियाँ होतीं
कुछ गम होते।
हमने किया था एक
वादा तुमसे
याद है या भूल
गये?
कहा था एक दिन
छोड़ जायेगें तुम्हें लो
छोड़ दिया जी लो तुम।
लो खत्म हो
गया मुलाकातों
का सिलसिला,
जो घर आता था
घर भूल गया।
हम जो
चाहें वो कर सकते हैं ।
बस हौंसला बनाकर रखना
चाहिए ।
जरूरी नही
जीत ही हांसिल हो,
हार भी स्वीकार
करनी चाहिए ।
छुप कर मेरी बातें
सुनते रहते हो।
मेरे सपनो की
रातें चुनते
रहते हो ।
मिलने की
फुर्सत जब तुमको
होती है।
तो मेरी ही
राहें चुनते चुनते
रहते हो।
आगे बढ़ने का
नाम है ज़िन्दगी
सफलता ठोकर खाकर
ही मिलती है।
हँसते रहने का
नाम है
ज़िन्दगी ।
बात करने से बात
बनती है ।
मुलाकात
करने से
बात बनती है।
कुछ भी तो नही
है हमारे पास
हमारे हुनर से ही
हर बात बनती है।
कुछ सपनॉ की
बातें है।
कुछ अपनों
की बातें हैं।
अधूरी कुछ
बातें थीं ।
अधूरी कुछ
बातें हैं ।
कुछ सपनॉ की
बातें है।
कुछ अपनों
की बातें हैं।
अधूरी कुछ
बातें थीं ।
अधूरी कुछ
बातें हैं
धीरे-धीरे बढ़ रहा
है काफ़िला।
धीरे-धीरे कम
हो रहे हैं फासले
मंज़िल है बस
कुछ ही दूर।
तू अपनी हिम्म्मत
भांप रे।
धीरे-धीरे बढ़ रहा
है काफ़िला।
धीरे-धीरे कम
हो रहे हैं फासले
मंज़िल है बस
कुछ ही दूर।
तू अपनी हिम्म्मत
भांप रे।
मंज़िल है नही
आसान
बहुत
मशरूफ हैं
राहें ।
जीत जायेगें
हम दुनिया
दो कदम
रोज़ चलकर के।
सुबह के मीठे सपनों
जैसा है तुम्हारा
एहसास ।
रहते हो यूं
दिल में
जैसे हो साँस ।
ना मिलने का
रोज़ बहाना
अच्छा है।
यादों से हमको
तड़पाना
अच्छा है ।
सोते-सोते आ जाते
हो ख्वाबों में
हमसे मिलकर
आँख चुराना
अच्छा है।
ना मिलने का
रोज़ बहाना
अच्छा है।
यादों से हमको
तड़पाना
अच्छा है ।
सोते-सोते आ जाते
हो ख्वाबों में
हमसे मिलकर
आँख चुराना
अच्छा है।
ना मिलने का
रोज़ बहाना
अच्छा है ।
सोते सोते आ जाते
हो ख्वाबों में ।
हमसे मिलकर
आँख चुराना
अच्छा है।
ना मिलने का
रोज़ बहाना
अच्छा है ।
सोते सोते आ जाते
हो ख्वाबों में ।
हमसे मिलकर
आँख चुराना
अच्छा है।
चुन लो तुमको
जो चुनना है।
मुझे हर फ़ैसला
मंज़ूर है।
तुम्हारी दोस्ती भी
तुम्हारी बेवफाई भी।
चुन लो तुमको
जो चुनना है।
मुझे हर फ़ैसला
मंज़ूर है।
तुम्हारी दोस्ती भी
तुम्हारी बेवफाई भी।
चुन लो तुमको जो
चुनना है।
मुझे हर फैसला मंज़ूर है।
तुम्हारी दोस्ती भी
तुम्हारी बेफफ़ाई भी।
तुम्हारी खामोशी भी
क्या चीज़ है
ना जाने क्या कह
जाती है।
जो कहना
चाहतें हो
नही कहती
हजारों फसाने सुनाती है।
तुम्हारी खामोशी भी
क्या चीज़ है
ना जाने क्या कह
जाती है।
जो कहना
चाहतें हो
नही कहती
हजारों फसाने सुनाती है।
मंज़िल अब दूर नहीं है
सफ़र भी अच्छा है ।
तुम हो तो सब
कुछ अच्छा है।
मंज़िल अब दूर नहीं है
सफ़र भी अच्छा है ।
तुम हो तो सब
कुछ अच्छा है।
मंज़िल अब दूर नहीं है
सफ़र भी अच्छा है ।
तुम हो तो सब
कुछ अच्छा है
पाने का अपना मज़ा
है।
खोने का अपना
मज़ा है।
हँसते तो सब हैं
पर रोने का
अपना मज़ा है।
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