जटायु अंत में आंखें खोले

February 3, 2020 in गीत

जटायु अंत में आंखें खोल
हाथ जोड़ के करे वंदना रोता रोता बोली
जटायु अपनी आंखें खोली
जली जो पीले तो वह नहीं पीता राम बचा लो दुखी है सीता
भक्ति रस में डुबके देखो देखो अशू नयन बोले
जटायु अंत में आंखें खोली
खेल रहा जो मौत से क्रीड़ा देखी ना जाती उसकी पीड़ा हरि की गोद में पड़ा हुआ वो माटी का तन डोले
जटायु अंत में आंखें खोलो
चलते समय हरी पास मेरे

आफताब

January 29, 2020 in शेर-ओ-शायरी

बड़ा इतराता है जुगनू चांद की धूल को मल कर
तेरी तारीफ तो बस इस रात ने की है
बेपर्दा कर सके जो अख्ज की भीड़ को इतनी हिम्मत तो
बस अफताब ने की है

गुरु रूप भगवान

January 28, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मेरे जीवन की पहली कविता मेरे गुरु को समर्पित
Teachers Day
स्कूल का वह दिन मेरे जीवन का एक सबसे खास दिन बन गया जिसे मैं कभी भुला नहीं सकती उस दिन मुझे पहली बार मेरी टीचरों ने बताया कि यह भी एक काबिलियत है आज उन्हीं टीचरों की वजह से मैं आप सबके बीच अरे अपने विचार लिख रही हूं

गुरु रूप भगवान मेरी
जा छुपे हैं कहां
ढूंढ ली है जमी
मैंने ढूंढ लिया ये आसमा

पलके झुका के मैंने फिर
आंखों से यह फरियाद की
ज्योति रूप में दिखाना मुझे
छवि मेरे गुरु रूप भगवान की

कठोरता होती है भले
जिनकी मार और ललकार में
तीन लोग का ज्ञान गुरु
हमें देते हैं उपहार में

दूर अंधेरा कर देते हैं
जो गुरु अपने ज्ञान से
खुद बनकर ज्योति जो
दूसरों को सदा प्रकाश दें

जिसने ज्ञान का दान देकर
जीवन मेरा धन्य किया
तीन लोक के ज्ञान से
मेरे जीवन को संपन्न किया

इतना कहकर जब मैंने
आंखों को अपनी खोल दिया
ऐसा लगे गुरु ज्ञान के कारण
आत्मा से सच बोल दिया

काश स्कूल लाइफ कैसे जी पाते भले 1 दिन के लिए ही सही

देश की मिट्टी

January 26, 2020 in शेर-ओ-शायरी

मैं नहीं रहा अफसोस नहीं
उस त्याग की भट्टी में जलकर
मैं देश की धमनी बहता हूं
इस देश की मिट्टी में मिल कर

वीरांगना शक्ति

January 26, 2020 in शेर-ओ-शायरी

त्यागा श्रृंगार ले नयन अंगार
क्या खूब वीरांगना शक्ति है
अब पूत खड़ा किया सरहद पर
क्या प्रबल राष्ट्र की भक्ति है

महफिल

January 25, 2020 in शेर-ओ-शायरी

जाने के बाद तुम्हारे
हम दोस्त तो बनाते हैं
वो महफिलों में खो जाते हैं
हम फिर अकेले हो जाते हैं

शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है

January 20, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

शक्ति संपन्न की जनक दुलारी
जब तुमने लांछन लगाया था
चाहती प्रलय वो ला सकती थी
धरती की गोद में सो जाती है
शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है

धरती पर एक कण बचता
जो काली शांत ना होती तो
अर्धांग की छाती पैर धारा
फिर दुख संताप में खो जाती है
शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है

जब क्रोध में नारी रोए तो
घर में महाभारत हो जाती है
अपने परिवार में शांति रहे
आंसू से क्रोध को धो जाती है
शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है

जाने कितनी वीरांगना भारत में
रण जाने को खड़ी हो जाती है
खंजर की धार देखे उंगली पर
फिर लहू देख खुश हो जाती हैं
पर शुक्र मनाओ कि रो जाती हैं

सीरत

January 19, 2020 in शेर-ओ-शायरी

कोई दिल दरबारे खास बने
तो जान निछावर करते हैं
हमें सूरत की प्रवाह नहीं
सीरत से मोहब्बत करते हैं

क्रांति की धारा

January 15, 2020 in मुक्तक

मेरे देश मुझे तेरे आंचल में
अब रहने को दिल करता है
जो जख्म दिए अंगारों ने
उसे सहने को दिल करता है

कांटो पर जब तू चलता था
हम चैन से घर में सोते थे
हम देश पराए जाते थे
तेरी आंख में आंसू होते थे

क्रांति की आग में अर्थी थी
यह खून से रंग दी धरती थी
हर मां की आंख में आंसू थे
चौराहे लाश गुजरती थी

सीने पर जख्म हजारों थे
सुनसान यह गलियां रहती थी
यह वेद कुरान भी ठहर गए
आंसू की नदियां बहती थी

मैंने हिमालय की धरती पर
सिंहासन लगाकर देखा था
हथियार की महफिल सजतिथी
हर गली में बैठा पहरा था

यह धरती फिर आजाद हुई
इसे थाम लिया रणधीरओं ने
विजय आजादी का आकर
आगाज किया था वीरों ने

आज विदेशी छोड़ दिया
स्वदेशी का आगाज हुआ
है मेरा नमन उन वीरों को
जिसने भारत आजाद किया

🇹🇯 जय हिंद 🇹🇯

आखिर क्या बदला

January 14, 2020 in शेर-ओ-शायरी

🥀आखिर क्या बदला बेटी के लिए 🥀

जब पिता की तरफ से दहेज आता था तो पति कहता था तो कितना लाई तेरे आने पर
पति की तरफ से दहेज आता है तो पति कहता है मैंने कितना दिया तुझे लाने पर

ज्ञान की वैशाखी

January 12, 2020 in शेर-ओ-शायरी

💐 शायरी 💐

पंछियों के बगीचे आसमान में होते हैं
बुद्धिमानी के चर्चे जहान में होते हैं
उठाकर जो चलते हैं ज्ञान की वैशाखी
हजारों सितारे उसकी शान में होते हैं

सकरात की रंग

January 8, 2020 in साप्ताहिक कविता प्रतियोगिता

आज मैं खुश हूं सभी बुराई
पोंगल पर्व में झोंक
जलधर फाटक आज ना बंद कर
पतंग ना मेरी रोक

सजि पतंग वैकुंठे चली थी
अप्सरा संग करे होड़
रंभा मेनका झांक के देखे
किसके हाथ में डोर

बारहअप्सरा सोच में पड़ गई
कैसी यह रितु मतवाली
कल्पवृक्ष से धरा द्रम तक
सबकी पीली डाली

सब वृक्षों की डाल से उलझे
पवन के खुल रहे केश
केशु रंग फैलाते फिर रहे
कहां है कला नरेश

नदी नहान को तांता लग रहा
मिट रहे सबके रोग
मूंगफली ,खिचड़ी ,तिल कुटी का
देव भी कर रहे भोग

सकरात के रंग

January 8, 2020 in साप्ताहिक कविता प्रतियोगिता

आज मैं खुश हूं सभी बुराई
पोंगल पर्व में झोंक
जलधर फाटक आज ना बंद कर
पतंग ना मेरी रोक

सजि पतंग वैकुंठ चली थी
अप्सरा संघ करे होड़
रंभा मेनका झांक के देखे
किसके हाथ में डोर

बारह अप्सरा सोच में पड़ गई
कैसी रितु मतवाली
कल्पवृक्ष से धरा द्रम तक
सबकी की पीली डाली

नदी नहान को ताता लग रहा
मिट रहे सबके रोग
मूंगफली ,खिचड़ी ,तिल कुटी का
देव भी कर रहे भोग

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