मेरा पहला प्यार – मेरी मां

September 10, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

क्या वो मेरा पहला प्यार था
जब तुम्हारा स्पर्श
इस दिल की धड़कनों को
चेतक बना देता था
या तुम्हारी लटों का
उड़ कर बार बार
मेरे चेहरे पे आना
मुझे बेसुध कर जाना
छण भर में फिर आना
और फिर चेतन कर जाना
जैसे वो सिर्फ लटें न हो
संजीवनी हो।

समय गुजरता है
लोग आते है,
लोग जाते है
अक्ल आती है
मन खुद से सवाल करता है
कि क्या ये सच में मेरा पहला प्यार था?
अनेकों सवालों का सैलाब
उमड़ पड़ता है
फिर अचानक
तमाम सवाल शांत हो जाते हैं
जब मां याद आती है
उसका संजीवनी स्पर्श
याद आता है
सारे सवालों का जवाब
खुद मिल जाता है
हां,मेरी मां
मेरा पहला प्यार
मेरी मां

कहाँ से देगा

September 5, 2021 in शेर-ओ-शायरी

जो सावन में भी न मिल पाया
वो ये माह कहां से देगा

इस महीने का तो नाम ही “सितम-बर” है
ये रहम कहां से देगा

मेरा हकीम तो खुद बीमार है
वो मरहम कहां से देगा

“तुम भी मुझसे प्यार करते हो”
इतना सुकूं कोई और वहम कहां से देगा

“एक तारा”

September 4, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जब इस आसमां में
नया तारा जन्म लेता होगा
तो क्या होता होगा?
क्या उसे कोई सैर कराता होगा?
या अकेले ही उन्मुक्त
मड़राता होगा
कोई दिल तोड़ता होगा उसका
या वो खुद ही टूट जाता होगा?
क्या वो भी चांद को मामा पुकारता होगा?
या रह जाता होगा
किसी कोने में जल रही
ढिबरी की तरह गुमसुम सा
और चमक धमक में
खो जाता होगा
अपने आसमां की
और अपनी भागदौड़ भरी
जिंदगी में
एक दूसरे से ज्यादा चमकने
की होड़ में
फिर एक दिन तंग आकर
तोड़ देता होगा
अपने ही तार
और अंधेरे में बैठ कर
बिताता होगा
कुछ पल सुकून के साथ

ठहराव ठीक नहीं

September 4, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ठहराव ठीक नहीं
फिर वो जीवन का हो
या पानी का
मुझे दादाजी ने सिखाया था
बूढ़े सागर ने जवां नदियों को
समझाया है

ठहराव ठीक नहीं

फिर वो नया सीखने की ललक का हो
या मंजिल में पहुंचने से पहले
सफर का
मुझे असफलताओं ने सिखाया है
और रुके तालाब ने प्यासे राहगीरों को
ठहराव ठीक नहीं

मेरे घर मैना आई है

September 4, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

-सत्य घटना पर आधारित काव्य-

एक नन्ही मेहमान आई है
मेरे घर मैना आई है

जब अकेले थी तो
पेड़ की डाल में रह लेती थी
अब मां बनने वाली है
तो जिम्मेदारी भी आई है
इसीलिए मेरे गौशाला के पास
घोंसला बनाने आई है

मेरे घर मैना आई है

जिस दिन से अंडे दिए हैं
बरामदे से बाहर ज्यादा जाती नहीं
देखते रहती है दिन भर घोंसला
बस उन्ही की चिंता सताई है
मैंने भी बरामदे में ही
दाना-पानी की सुविधा बनाई है

मेरे घर मैना आई है

पर नियति को कुछ
और ही मंजूर था
दुर्भाग्य ने उन मासूमों पर
अपनी कुदृष्टि जमाई है
एक दिन अचानक सांप के रूप में
मौत दस्तक लाई है

मेरे घर मैना आई है

आज सुबह से ही मैना
ख़ूब रोई चिल्लाई है
खा गया वो दुष्ट उनको
उसने अपनी भूख मिटाई है
पिताजी बोले देखो बेटा
उसने दुनियां ऐसी ही बनाई है

मेरे घर मैना आई है

कुछ दिन तक दिखी नहीं
न घोंसले में आई न बरामदे में थी
इंसान हो या कोई पक्षी
ऐसा कुठाराघात कौन मां सह पाई है
यह दृश्य देख मेरी भी
आंखे भर आई है

मेरे घर मैना आई है

कुछ हफ्ते बीत गए
मैं भी भूल गया था
एक दिन अचानक इसी घोंसले में
मैने एक हलचल पाई है
एक नई आस लिए
एक बार फिर वही मैना आई है

मेरे घर मैना आई है

समय

August 28, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

यह समय बड़ा बलवान है
समय पर लिखना कितना आसान है
पर समझ पाना मुश्किल
जितना उलझो इसे समझने में
उतना ही जटिल
किसी के लिए हाथों से फिसलती रेत
तो किसी के लिए बेवफा सनम जैसा
आज इसके साथ
कल उसके साथ
इसके फेर से कहां कोई बच पाया
न राम न विक्रमादित्य
जब अच्छा समय हो
तो जल्दी गुजर जाता है
बुरा कहां कट पता है
आज कोई शेर है जंगल का
कल कोई और ही पहलवान है
समय बड़ा बलवान है

अगर ये प्रकृति भी बदल जाए

August 28, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

दुनियां कितनी बदल जाए
अगर इंसानों की तरह
प्रकृति में भी प्रतिस्पर्धा हो जाए
घोसले की जगह चिड़ियों की भी
अट्टालिकाएं बन जाए
फूलों में सुंदरता को लेकर
प्रतियोगिताएं हो जाए
वृक्ष भी अपने फलों के
आकार को चिंतित हो जाए
ये पर्वत गंगन चुंबी होने को
बस ईर्ष्या से जल जाए
एक होड़ लगी है जीतने की
अगर ये प्रकृति में आ जाए
इंसानों का धरती में
जीना मुश्किल हो जाए
अगर बदलते लोगों की तरह
ये प्रकृति भी बदल जाए

मृदुल छवि

August 27, 2021 in ग़ज़ल

तुम्हारे खूबसूरत चेहरे पे जो गुस्सा रहता है
जैसे हर गुलाब की हिफाजत में कांटा रहता है

जंगल में किसी कस्तूरी हिरन सी लगती होगी
जब अपने पायल की खनक से तुम खुद डर जाती होगी

वो और होंगे जिन्हें नीद आ जाती होगी
तुम तो रात के सन्नाटे से ही जग जाती होगी

रास्ते में फूल बिछा भी दिए जाएं
पर कहीं फूलों की चुभन से छाले न पड़ जाए

✍️ रोहित

रक्षाबंधन

August 22, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

उदास बाजार में भी खुशी आ जाती है
बेरंग बाजार रंगीन हो उठता है
जब बाजार में बिकने राखी आ जाती है

खुद न आए तो भी उसकी राखी हर साल आती है
भाइयों के चेहरे भी खिल उठते हैं
जब शहर में गांव से बहन की राखी आती है

दूर किसी सैनिक को जब राखी मिलती है
पाँच रुपए के इस लिफाफे में मानो
सिर्फ राखी ही नहीं, खुद बहन भी आती है

ये राखी के धागे भी
किसी ढाल से कम नहीं होते
युद्ध से भाई को सकुशल घर ले आते हैं
ये रेशम की डोर में मामूली धागे नहीं होते

लाख धागे बांध लो कलाई में
वो खुशी नहीं होती
ये खास त्यौहार भी आम सा लगता है उनको
जिनकी कोई बहन नहीं होती

अजीब इत्तिफाक था

August 19, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

अजीब इत्तिफाक था

याद है……

छत पे हमारा चोरी छिपे मिलना
तुम्हारे पिताजी के आते ही
बिजली का चले जाना
अजीब इत्तिफाक था

एक छतरी में कॉलेज से घर आना
तुम्हारा गले मिलने का मन
और बिजली का कड़क जाना
अजीब इत्तिफाक था

तुम्हारे गांव सिंदूर ले कर आना
मेरे मंदिर पहुंचने से पहले
तुम्हारा गांव छोड़ कर जाना
अजीब इत्तिफाक था

भरे बाजार तेरी याद में रोना
मेरी फजीहत बचाने को
वो बिन मौसम बरसात का होना
अजीब इत्तिफाक था

ये उत्तराखण्ड है

August 16, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ये उत्तराखण्ड है
हिमालय की गोद में
उत्तर का एक अखंड प्रदेश
पहाड़ों के बीच खड़ा
एक दुखों का पहाड़ लिए
कुछ आपदा का शिकार
कुछ राजनीति का
जन्म एक बार
नामकरण दो बार
अजीब विडंबना है
औषधियों से ओतप्रोत
लेकिन अंदर से बीमार
न अस्पताल न एंबुलेस
बस डोली से जनाजे तक का सफर
जीवन जीना ही एक चुनौती है
राजधानी को लेकर
हमेशा आंदोलनों से घिरा
महादेव की भूमि होकर
हमेशा आपदाओं की मार
मजबूर है जाने को गांव
पलायन की ओर
ज्यादा उम्मीदें नहीं पालता
बस शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार
बाहरी दुनियां के लिए स्वर्ग
यहां वालो को नर्क का दर्शन कराता
ये अद्भुत अखंड है
ये उत्तराखण्ड है

मुक्ति की तलाश

August 14, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

*यह कविता एक ऐसे व्यक्ति पर आधारित है जो की अपनी मृत्यु के पश्चात अपनी व्यथा सुना रहा है*

मैं अब दुबारा जीना नहीं चाहता
जब जिंदा था तब कौन सा जीने दिया तुमने
अब जाकर सुकून से बैठा हूं
कभी इस डाल पे कभी उस डाल पे

यहां से कुछ दूर ही
मेरा घर हुआ करता था
मरने के बाद रहा कुछ दिन वहां भी
फिर कुछ लोग आए
और तोड़ गए
सोचा घर के पीछे वाले आम के पेड़ में रह लूं
पर गली के बच्चे पत्थर बहुत मारते हैं
जून की इस गर्मी में
छांव भी नसीब नहीं होने देते

घर तोड़ने वाले फिर आए
विकास के नाम पर यह पेड़ भी काट दिया
अब वहां से एक सड़क गुजरती है
जहां मैं गुजरा था

बड़ी मुश्किल से एक पेड़ मिला
इन पर्यावरण प्रेमियों के शहर में
पर तुम लोगों की सांसों का शोर यहां भी सोने नहीं देता

तुमसे अच्छा तो यह पेड़ हैं
चुपचाप सोते हैं, खर्राटे भी नहीं लेते
बरसी होने को है अगले महीने
पर कभी किराया भी नहीं लेते

इस संसार से मुक्त होकर बैठा हूं मुक्ति की तलाश में
मरने के बाद भी मरने के इंतजार में क्योंकि, मैं अब दुबारा जीना नहीं चाहता

तुम्हारा साथ

August 12, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मुझे यह बताते हुए हर्ष होता है की यह कविता मेरी पहली कविता थी जो मैंने दिनांक 22-11-2010 को लिखी थी
आशा करता हूं कि आप सब लोगों को भी यह पसंद आएगी ।

जब तुम थे मिले
बहार आ गई थी जिंदगी में
सुबह की पहली किरण भी
हमसे मिलकर जाती थी
पंछी हमें देख गाते थे
झरने हमें देख झरते थे
अपने अलग अंदाज में
क्योंकि
तब तुम भी साथ थे

रास्ते की धूल
लिपट जाती थी पैरों से हमारे
जैसे रोक रही हो हमें दूर जाने से
देवदार के गगनचुंबी पेड़
हमारी राह तकते थे
तरसते थे, हमें अपनी छांव बिठाने के लिए
इन सब को इंतजार था हमारा
क्योंकि
तब तुम साथ थे

शाम के समय
बहती हुई वो ठंडी बयार
काली नदी* का शांत बहता जल
ठंडी पड़ी हुई नरम रेत
गंगेश्वर बाबा का मंदिर और उसके सामने दूब घास
वह एहसास ही कुछ अलग था
क्योंकि
तब तुम साथ थे

चांदनी रात में
आँगन से खाट में बैठकर
तारों से घिरा चांद
हमसे मीठी-मीठी बातें करता था
उसकी दूधिया शीतल रोशनी में
डूबी हुई बगोटी*
अच्छी लगती थी
क्योंकि
तब तुम साथ थे

आज जब मैं सुबह उठा
सब कुछ बदल गया था
सूरज की किरणे
अपना प्रकाश फैला चुकी थी
“बिना हमसे मिले”
पंछी व झरने शांत थे
मौसम बदल चुका था
क्योंकि
अब तुम साथ न थे

रास्ते की धूल
पैरों से चिपकने से डर रही थी
जैसे मैं अछूत हो गया हूं
पेड़ भी अपना मुंह फेर रहे थे
अपनी छांव का बिछौना समेट रहे थे
जैसे गांव से पलायन कर रहे हो
सब हमसे रूठ गए थे
क्योंकि
अब तुम साथ न थे

शाम के समय
ठंडी बयार चुभ रही थी
कांटों की तरह
काली नदी* का शांत जल
आज गुस्से में उफान पर था
गर्म रेत अजनबी सा बर्ताव कर रही थी
जैसे उलाहना दे रही हो मेरे स्पर्श पर
क्योंकि
अब तुम साथ न थे

उस रात में
आसमान में अंधेरा था
चांद की रोशनी, तारों से भी कम थी पूरी बगोटी* में अंधेरा था
शायद आज अमावस है
लेकिन मुझे इंतजार है उस रात का जब फिर पूर्णिमा होगी
क्योंकि
तब तुम फिर साथ होगे

*बगोटी – उत्तराखंड का एक गांव(मेरा गांव)
*काली नदी – उत्तराखंड की एक नदी जो भारत तथा नेपाल के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा बनाती है।

तुम्हारा साथ

August 10, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जब तुम थे मिले
बहार आ गई थी जिंदगी में
सुबह की पहली किरण भी
हमसे मिलकर जाती थी
पंछी हमें देख गाते थे
झरने हमें देख झरते थे
अपने अलग अंदाज में
क्योंकि, तब तुम भी साथ दे

तुम्हारा बेवक्त आना

August 10, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

तुम्हारी बेवक्त आने की आदत
एक दिन मुझे खो देगी
इंतजार करते करते चला गया तो
तुम रो दोगी
अभी सावन है आ जाओ
सितंबर के बाद ये बरसात न होगी
मैं शहर चला जाऊंगा फिर
शायद ये मुलाकात न होगी

बस छोटी सी ख्वाइश

August 10, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बस इतनी सी ख्वाइश है
जैसे आज मिले हो, हर बार यूं ही मुस्कुरा कर मिलोगे क्या

दौलत शोहरत ज्यादा मिले ना मिले
एक ही घर में मां पिताजी के साथ रहोगे क्या

ये गुलाब किताबों के बीच पड़ा सूख जाएगा
मगर फिर भी पास रखोगे क्या

पूरी दुनियां तो घूमनी नही मुझे
एक बार बस केदारनाथ साथ चलोगे क्या

यादें

August 10, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बीते सुनहरे पल
तब क्यों याद आते हैं
जब बैठो अकेले
यादों की दरिया के किनारे
यादों की एक लहर सी आती है
सुर्ख दिल की सुर्ख रेत को गीला कर देती है
दिल आज भी ढूंढता है
वही फुरसत के पल
वक्त की धारा रोक कर
लगता है अतीत में डुबकी
पर खाली हाथ आता है
हाथ खाली और आंख भरी हुई
मानो दिल आंखों के रास्ते हल्का हो रहा हो
भरी हुई आंखें और दिल हल्का सा
सीमल के फूल की तरह
फिर एक डर बैठ जाता है मन में
इस दरिया के किनारे में बैठने से
क्युकी यादों की लहरें छूती तो बस कुछ पल है
और परेशान देर तक कर जाती है

यादें

August 8, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

पलकों में अटके हैं वो
उसकी याद की तरह
आज फिर तन्हा हैं हम
तारों से घिरे चाँद की तरह

रो अगर जाएं
तो यादें बह जाएं
अंजुली में भर लो इन्हें
बस एक प्यास की तरह

चमक न जाएं यादें कहीं
मोतियों की माल की तरह
थमा दो किसी का हाथ
रेशमी रुमाल की तरह

बूंदों से जाकर कह दो
सावन तो बहुत दूर है
मेरी आंखें न बरस जाएं
एक बरसात की तरह

रावण अभी जिंदा है

August 6, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

रावण अभी जिंदा है

अमृत सुखा के नाभी का
रावण कहाँ मर पाया है

वापस अयोध्या लौटे तो
फिर से जिंदा पाया है

पहले लंका में रहता था
अब प्रजा के मन में पाया है

रावण कहाँ मर पाया है

वहीं प्रजा के मन में बैठ
सीता पर दोष लगाया है

सीता को वनवास करा कर
फिर से अलग कराया है

रावण कहाँ मर पाया है

कलयुग में भी कहा नहीं है
हर चौराहे पे पाया है

अहम आज भी मिटा न उसका
कि मुझे कौन मार पाया है

रावण कहाँ मर पाया है |

दिवाली में मेरा घर आना

August 1, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बूढ़ी थकी सी पलकों में
पल रही वो उम्मीद का जग जाना
उनके लिए पर्व का महापर्व बन जाना
वो दिवाली में मेरा घर आना

पुराने पर्दों का एकाएक नया हो जाना
धूल खा रही किताबों का
खुद से धूल हटाकर खुद से संवर जाना
रूठी खुशियों का बिन मनाए मान जाना

लंबे-लंबे देवदारों का आपस में खुशफुसाना
एक हलचल या जंगल में आग की तरह
खबर बूढे पीपल तक पहुंचाना

वह पुराने फूलों का
नई कलियों को समझाना
उस दिन तक खिल ना सको तो भी
स्वागत में बिछ जाना

उसी बूढ़ी पलकों में
जीने का नजरिया बदल जाना
पिताजी के लंबे इंतजार के बाद
वो दिवाली में बेटे का घर आना

माँ

July 21, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

माँ का प्यार है बड़ा निराला

मिले उसे जो किस्मत वाला

माँ ममता करुणामय सागर

धन्य हुआ जग तुझको पाकर

वेद पुराणों की गाथा में

तुझे मैं देखूं गौ माता में

गंगा में भी तेरा प्यार

बहती रहती अमृतधार

माँ के धैर्य की थाह नहीं

कष्ट सहे पर आह नहीं

कष्टों से तू हमें बचाए

जब अपना आँचल लहराए

आंखों में है स्नेह पताका

संजीवनी स्पर्श माँ का

मृतक में भी डाले जान

ऐसे हैं लाखों गुण गान

शब्दों की बन्दिश ना होती

करके भावों की अभिव्यक्ति

माँ पर लिख दूं ग्रंथ हजार

अफसोस, कम पड़ जाएगा शब्द संसार

पत्थर भी पिघलता है

July 20, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जब प्यास से व्याकुल होकर धरती चिल्लाती है
चट्टानें भी रो पड़ती हैं
अपनी आंखों से झरना बहा देती हैं
तब लगता है
पत्थर भी पिघलता है

मां जब बेटी की विदाई के बाद
दीवार में सर रखकर रोती है
मैंने उस दीवार को पिघलते देखा है तब लगता है
पत्थर भी पिघलता है

पिता के सामने बेटी जब
विधवा खड़ी होती है
स्वर्ग से देवता रो पड़ते हैं
तब लगता है
पत्थर भी पिघलता है

सावन के महीने जब
दूर जाता साथी है
आकाश भी रो पड़ता है
तब लगता है
पत्थर भी पिघलता है

क्रोंच वियोग का दृश्य हो
फिर चाहे वह रत्नाकर हो या महर्षि हो
पत्थर दिल भी रो पड़ता है
तब लगता है
पत्थर भी पिघलता है

कुमाऊनी कविता: धन्न्न पैसा त्यर कमाल

July 19, 2021 in Other

धन्न्न पैसा त्यर कमाल
कस्स्ये बतूं त्यर हाल
जों ले जांछे वों बबाल
धन्न्न पैसा त्यर कमाल

जब ऊंछे तू देश बटी
तू भले क्वे जिन भैटे
त्वै के हाल्छया सब अंग्वाल
धन्न्न पैसा त्यर कमाल

त्वै है ठुला झुकी रूछ्या
बाट-घाटा में रुकी रूछ्या
त्यर सामान कान में ल्याल
धन्न्न पैसा त्यर कमाल

घमंड में तू चूर रुंछे
आफ जैसो क्वे ना देखछै
त्यर बौल्याट कुछै साल
धन्न्न पैसा त्यर कमाल

जै लै त्वैके धर्मे ल कमा
तू लै हुंछै वांई जमा
उ घरा का बडिया हाल
धन्न्न पैसा त्यर कमाल

दुनियादारी

July 17, 2021 in शेर-ओ-शायरी

पियक्कड़ों के शहर में शरबत ढूंढ रहा हूं
खारे सागरों से मीठा पानी पुकारता रहा हूं
अपने हाथों से अंजुली भर के पानी पिलाती हो मुझे
मैं वही छोटा सा तालाब अपने घर रोज चाहता हूं

जो सीखा दुनियां से वही आजमा रहा हूं
इन आँख के अंधों के शहर से कहीं दूर
एक गांव है अक्ल के अंधों का
वहीं कुछ सपने थोक के भाव बेच रहा हूं

एक वक्त था कि वक्त भी नहीं था खुद के लिए
आज बेवक्त यूँ ही जिए जा रहा हूं
थक गया इन घड़ियों की दुकानों में ढूंढते ढूंढते
एक अरसे से अच्छा सा वक्त ढूंढ रहा हूं ।

चाय और नमकीन

July 16, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

तुम नमकीन थी

मैं चाय था

दोनो एक प्लेट में आकर मिलते थे

वहीं से हमारी गुड मॉर्निंग शुरू होती थी

बगल वाली प्लेट के बिस्कुट

हमें देख जलते थे, इतना जलते थे

कि वहीं पर सिल जाया करते थे

सर्दियों की सुबह

कितनी सुहानी होती है

बस हमें पता था

तुम नमकीन थी

मैं चाय था

दोनो एक प्लेट में आकर मिलते थे

वहीं से हमारी गुड मॉर्निंग शुरू होती थी

एक शाम मयखाने से लौट रहे

चुगलखोर पैमाने ने आवाज दी

कहा चाय जो नमकीन सुबह तुम्हारे साथ होती है

वो हर शाम दारू के साथ बिताती है

बेवफा नमकीन चाय को सबक सीखा गई

सच्ची मोहब्बत तो मुझसे बिस्कुट ने की

जो इंतजार करते करते सिल गए

पर कभी किसी और के न हुए ।

चिठ्ठी और मोबाइल

July 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आज एक नयी धुन लगी मेरे मोबाइल को

बोला आज याद आ रही है चिट्ठी अम्मा की

मिलने की जिद पकड कर के

निकला पडा जेब से तड़के

चल पड़ा किसी पुराने कमरे की ओर

फिर उसमे कोने मे पडी

एक अलमारी खोल ली

बहुत ढूँढा, बहुत आवाज दी

सारी किताबें टटोल ली

फिर किसी बंद पुरानी किताब में

आखिर मिल ही गई चिट्ठी अम्मा

काफी बूढ़ी हो गई थी

दसको से कोई मिलने नहीं आया था

बरसों बाद दादी पोते से मिल रही थी

पोता दादी के चेहरे से धूल साफ करने के लिए

बाहर कमरे में ले आया

दादी के चेहरे की झुर्रियाँ एक टक देखता रहा

उधर दादी की खुशी का ठिकाना न था

बरसो के बाद किसी ने हाथो में हाथ थामा था

बंद पड़ी और बरसों दबी

सलवटों में कुछ शब्द मिट चुके थे

दादी की स्मृतियों की तरह

दादी की पुरानी बातें, पुराना अंदाज

आज का स्मार्ट पोता समझ नहीं पा रहा था

एक बहुत बड़ा जनरेशन गैप आ गया था

दोनो की बातो में

दिन भर खूब गपशप हुई दादी पोते में

पोते ने एक सेल्फी भी ली, दादी के साथ

सोचा स्टेटस में लगाऊंगा

और आज दादी भी बहुत खुश थी

अब चैन से वापस सो जाएगी

वापस उन्ही पन्नों के बीच कहीं

और मीठे सपनों में खो जाएगी

लेकिन पोता उदास था

ये सोचकर कि एक दिन वो भी बूढ़ा हो जाएगा

वो भी इसे ही पडा रहेगा किसी कोने में

पड़ा रहेगा अकेला गुमसुम सा
और
स्विच ऑफ सा ।

“मेरी अभिलाषा”

July 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

तेरे एक इशारे पे
जो तू चाहे मैं वो ले आता
तेरे जीवन के अंधेरे मिटाने को
सौ जुगनुओ से उजाला चुरा ले आता
तेरे बंजर पड़े खेतों में
अपनी आँखों से बरसात करा देता
तुझे क्यूँ लगता है रुलाऊँगा कभी तुझे
मुझसे तो टपकता नल भी देखा नहीं जाता

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