कोई क्यों मेरे लिए परेशान रहे कोई क्यों मेरे लिए आरजुमंद रहे ख़ुदकी आरजु सबकी ख़ुद घेरे रहे किसके पास किसके लिए वक्त रहे …… यूई
कोई क्यों मेरे लिए परेशान रहे कोई क्यों मेरे लिए आरजुमंद रहे ख़ुदकी आरजु सबकी ख़ुद घेरे रहे किसके पास किसके लिए वक्त रहे …… यूई
करना है तो पूरी तरह करना दिल की बस्ती का बाशिंदा हूँ कुछ भी ना तुम ऐसा करना के प्यार हमारा ना शर्मिंदा हो …… यूई
क्यों वोह तुमने किया जिसपे ख़ुद शर्मिंदा हो …… यूई
कौनसे बाज़ार में प्यार मेरा बिकवाओगी बेमौल चीज का क्या मौल लगवाओगी …… यूई
प्यार अनमोल है मेरा इसे क्या तुलवाओगी नाप तौल के फेर में सब कुछ गँवा जाओगी …… यूई
क्यों घिरी ही अजीब सी कश्मकश में रही हो सोच, पाऊँ या छोड़ दूँ प्यार को बना नही वह तराजू जो तोले प्यार को कौनसे बाज़ार में जा तुम यह तुलवाओगी …… यूई
कह कर बेवफ़ा क्यों तुम्हे परेशान करूँ दर्द तेरे को क्यों मैं इतना असान करूँ …… यूई
दर्द देकर तुम क्यों ख़ुद पे शर्मिंदा हो दर्द सह कर भी देखो मैं तो जिंदा हूँ …… यूई
जो दौलत है उस जहां की इसी जहां में तो कमानी है ….. यूई
पूछती है दुनिया क्या पाया तुमने जानती नही दुनिया क्या गँवाया उसने ….. यूई
प्यार में जो तुम कभी पा ना पाये वोही तो प्यार में हम गँवा ना पाये ….. यूई
हाल मेरा बेहाल है चाहे खुद का ख़ुद में जीता हुँ ….. यूई
मुझसे मेरी मंजिल ना पूछो पागलपन कबका छोड़ दिया हाल क्यो हुआ बेहाल ना पूछो आँखों में जीना था छोड़ दिया ….. यूई
देखा जो मंजिलों का असली चेहरा तबसे मंजिलों को ही दफना बैठे ….. यूई
हसीन सूरत की देखकर असली सीरत अपनी नजरों से ही शिकायत कर बैठे कह्ते रहे लोग इश्क होता है अंधा हम बहरे हो ख़ुद ही अन्धे हो बैठे ….. यूई
पाकर मंजिलों को ही मंजिलों की फितरत जानी फिर ना कभी मंज़िलो को पाने की हसरत जानी ….. यूई
दीवानगी रास्तों से कुछ यूँ बड़ी मंजिलों की चाह ही कहीं छूट गई ….. यूई
मंज़िल का कुछ पता नही कह्ता है मैँ तो मुसाफिर हूँ मैं भटका नही हूँ ख़ुद की राह से मैँ तो उसकी राह् का मुसाफिर हुँ ….. यूई
जरूरी नही के हर सफर की हो मंज़िल बिन मंज़िल भी कभी चल कर देखो सफर में खो जाओगे भूल कर मंज़िल पल पल ज़िन्दगी खुशी में जीकर देखो ….. यूई
मुझ जैसी भोली भाली को, “काली” बता दिया । झाङु ,पोछा, छितका की तो, घर वाली बता दिया । सज संवर के निकली तो मतवाली बता दिया । रोती बिलखती गुङिया को दिलवाली बता दिया […]
तुम संग खेली मैंने सात रंग की होली . तुम रंगो में नहाई . कि मुझसे भी अठखेली । वो लाल रंग सिंदुर का .लगा सिर इतराई . वो रंग गुलाबी होंठ का . ले […]
ღღ__वो तो अहद-ए-वफ़ा की खातिर, तुमसे मिलता रहा हूँ साहब; . वरना गुफ्तगू…..वो भी तुमसे…..क्या मज़ाक करते हो!!….#अक्स .
दिल की दवात से स्याही लहू का बहता रहा, कभी वक्त ने मुझको लिखा, कभी तारीख अपनी मैं लिखता रहा । कभी लिखा बेमुकद्दर दस्ताने-जीस्त अपनी, कभी अस्क बहाती आरज़ूओं को कहता रहा । […]
वो मिला ले नज़र तो इनायत, वो फेर ले नज़र तो शिकायत । वो पत्थर की सही पर, करता मैं उसकी इबादत । चखता वो मेरे दिल को देकर अपनी उल्फ़त, बढ़ता है नशा […]
सुरमा लगाया था आँखों में जिसका नज़रें मिलते ही खफा हो गए
रिश्ते तो अब बौने हो गए है ख्वाब तो बस बिछोने हो गए है
नवाजिश नवाज़िश जेहन में रहा वो दूर निकल गए अदावत लेकर
जुम्बिश न सही खलिश ही सही तुझे भूलने की कोशिश ही सही वो पा न सके जुस्तजू जो थी कुछ नहीं , इक खवाइश ही सही राजेश’अरमान’
लिखे जो भी तराने वो तेरे लिए थे तुमने उसे रेत पे लिखा समझा
न जा तू दूर थोडा पास आ मिलने की कोशिश कर, जरा हँसकर के मेरे साथ तू चलने की कोशिश कर, काश बदल जाए इरादा जो अभी तक था तेरे दिल में, दीया हूँ मैं […]
किधर से आया वो मालूम नहीं अँधेरे में ही कोई आवागमन था
पत्थर के बुतों में बस ढूँढ़ते रहे अपने अंदर के ख़ुदा को पत्थर करके
बंदिशें तोड़ के रख दी पिंजरे में रहते रहते
काफिर ही सही मुसाफिर ही सही वक़्त का खिलौना हाज़िर ही सही
मैं हूँ एक नन्ही कली जरा मुझको तू खिलने देना, होगा तेरा उपकार बड़ा मुझे इस दुनिया से मिलने देना, मैं हूँ एक नन्ही कली जरा मुझको तू खिलने देना, मान बढ़ाउंगी हरपल तेरा इतना […]
तिनके बटोर बनाया आशियाना बर्क ने फिर गिराया आशियाना मेरे हाथों से लिपटी फिर रेखाएं रेखाओं ने फिर बनाया आशियाना राजेश’अरमान’
ख्वाइशों की उम्र नहीं होती कमबख्त अजर अमर होती है
अपने ख़्वाबों के लिए कोई रात रखना अपने हिस्से की खुद से मुलाकात रखना मौसम चाहे जैसा बदले जब बदले अपने ही अंदर कोई बरसात रखना राजेश’अरमान’
मेरी खोज मृगतृष्णा तेरी वफ़ाएं मृगतृष्णा सारा जीवन मृगतृष्णा
वो फिर मिलेंगे फूल फिर खिलेंगे कुछ हादसें होंगे कुछ फासले होंगे कमबख्त वफ़ा ताउम्र इम्तहान देती रही राजेश’अरमान’
बर्क को नशेमन से क्या आश्ना आवाज़ कब देख सकी जलते आशियाने राजेश’अरमान’
रिश्तों में कोई फासला सा रखना तूफानों में हौसला सा रखना अपने ही घर में चाहे जितने कमरे हो अपने लिए इक घोसला सा रखना राजेश’अरमान’
किसी रंजिश से दो चार नहीं लोग जुगनुओं का भी फ्यूज ढूँढ़ते है
वक़्त का तमाचा हाथ क्या पूछे
वज़ूद तेरा बूँद सा शामिल है मगर समुंदर में
गिर के संभले तो मगर संभले मगर गिर गिर के
बगैर दुनिया के हम नहीं है दुनिया कौन सा अकेले चलती है
फिर वहीँ फ़रियाद कौन रखेगा याद सिरहाने बैठी रही सिसकियाँ अपनी आबाद
बिन तेरे कमीं तो थी आँख में कुछ नमी तो थी युँ तो सांसें चलती रही मगर सांस कुछ देर को धमी तो थी
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