Praduman Amit's Posts

क्या जिंदगी है

बचपन में खेल का तकाजा, जवानी में मौसम के तकाजा तो बुढ़ापे में उम्र की तकाजा ।। जब आ जाए अंतिम घड़ी , उठ जाता है हम सब के जनाजा ।। »

लत

तुम हर मर्तबा यही कहते हो, इश्क़ बुरी लत है। चुपके चुपके दिल चुरा लेना,ए कौन सा लत है।। »

पत्थर दिल

अश्क़ बहा के भी उस बेवफा को मैं अपना न सका। उनको खबर थी मेरी हालत फिर भी वो बेखबर रहा।। »

लेखक की गरीबी (३)

(भाग दो में आपने पढ़ा – रुपा अपने पति के पेट की आग बुझाने के लिए खुद को दिलचंद के हाथों बिकने के लिए तैयार हो जाती है। वह अपने पति के ख़ातिर इज्ज़त क्या अपनी जान तक न्यौछावर कर सकती है। दिलचंद उसकी इज्ज़त दूकान के चंद पैसों के उधार से वह खरीदना चाहता है। क्या , दिलचंद रुपा के इज्ज़त को खरीद पाता है? क्या जीवनबाबु अपनी पत्नी को दिलचंद के हाथों बेच देता है?) यह जानने के लिए अब आगे — रुपा... »

दम नहीं तुझ में

अरे पागल आशिक़ बस इतने में ही तुम घबड़ा गए। ज़ुल्म के दौड़ आया ही नहीं तुम अभी से घबड़ा गए।। »

गर दम नहीं

प्यार भी करती हो ज़माने से भी डरती हो। गर दम नहीं है तो दो नाव पे क्यों चढ़ती हो।। »

इश्क़ फरमाते है

चलो हम तुम इश्क़ फरमाते है। ज़माना यों ही जल जल मरते हैं।। »

दिल है कि मानता नहीं

इश्क़ हम करते कहाँ है ए दिल ही फिसल जाता है। दिल को क्या समझाएं जब देखो बर्बाद हो जाता है।। »

वश

ए अमित इश्क़ भी क्या बीमारी हैं। इश्क़ पे वश न हमारी है न तुम्हारी है।। »

चाहत

सोचा था अपनी मुकद्दर को एक नया नज्म देंगे। उन्हीं नज्म के आर में हम उनकी दास्तां लिखेंगे।। »

दीवाना

दिन गुजर गए महीने गुजर गए साल गुजर गए। किसी की चाहत में, हम खुद को ही भूल गए।। »

लेखक की गरीबी (२)

आपने पहले अंक में पढ़ा — जीवनबाबु के घर में अन्न के एक दाना तक नहीं है। रुपा एक भारतीय नारी की परंपरा पर चलने वाली है। वह अपने पति को भूखे पेट सोने देना नहीं चाहती है। जीवनबाबु के कहने पर रुपा दिलचंद बनिया के पास उधार राशन लाने के लिए चल पड़ती है। जबकि पिछला हिसाब भी चुकता नहीं हो पाया है… (अब आगे) कुछ देर बाद रुपा दिलचंद बनिया के दूकान पर पहुंच गई। दिलचंद रुपा को देखते ही कहा –&... »

उफ़…

दांतों तले आंचल दबा लेना। उफ़… कहाँ गया वो ज़माना।। »

सिखे कहाँ से

दिल ले के दर्द देना, यह अदा सिखे कहाँ से। बताइए न यह राज़,आपने ने सिखे कहाँ से।। »

लेखक की गरीबी

जीवनबाबु अपने मोहल्ले में प्रतिष्ठत व्यक्ति थे। वह एक साहित्यकार भी थे। हमेशा किसी न किसी पत्र व पत्रिकाओं के लिए रचनाएं तैयार करते थे। उनकी पत्नी रुपा इतनी सुंदर थी कि वह कभी कभार अपनी पत्नी को ही देख कर कविता, गीत व ग़ज़ल रच लिया करते थे। कमी थी तो केवल अर्थ व्यवस्था की। वह अपना घर परिवार चलाने के लिए प्राइवेट कोचिंग व स्कूल में पढ़ाया करते थे। तब कहीं जा कर दो वक्त की रोटी जुटा पाते थे। कभी कभा... »

पागल आशिक़

लोग कहने लगे है, हम इश्क़ में पागल हो गए है। मैं कहता हूँ इश्क़ में पागल तो कोई कोई होते है।। शाहजहाँ भी मुमताज़ के लिए ही पागल हो गया। इसलिए आगरा में मुमताज़ महल प्रसिद्ध हो गया।। »

झूम झूम के…..

हमने उड़ते हुए बादल से पूछा कब तुम्हें बरसना है। उसने कहा नादान यह भी कोई पूछने की बात है ।। सभी को वफा के आशियाना तो एक मर्तबा बनाने दो। फिर देखना कैसे हम आँखों से झूम झूम के बरसते है।। »

मुझे पसंद नहीं है

हम उस राह से गुजरना नहीं चाहते, जिस राह में खड़े हो जाए दिल्लगी। कह दो पागल आशिक़ दीवानो से, मुझे पसंद नहीं है किसी की आवारगी।। »

अपना पराया

तुम से दूर रह कर भी, हमने अब जीना सिख लिया है। कौन है अपना कौन है पराया, हमने यह देख लिया है।। »

ए भी कोई मुहब्बत है

वो जवानी ही क्या जिस जवानी में कोई कहानी ही न हो। वो मुहब्बत मुहब्बत ही नहीं जिसमें कोई अश्क ही न हो।। »

ईशारा

आज फिर फलक से सितारे जमीं पर आने लगे है। शायद उनका ईशारा होगा जो मेरा एक अंदाज़ है।। »

घूंघरू की आवाज़

फिर वही, कहीं से आयी घूंघरू की आवाज़। दिल को लुभा रही है, फिर वही पुरानी साज।। »

बाद में पता चला…..

सोचा रहा था मैं, इश्क़ है बेदाम की। बाद में पता चला, इश्क़ है बड़े काम की।। »

शेर व ग़ज़ल

कहीं हीर की टोली तो कहीं रांझे की टोली। अंजुमन में गूंज उठा शेर व ग़ज़ल की बोली।। »

वाह!!

जब वो अपनी स्याह भरी गेसूओं को अपनी अंदाज से संवारने लगी। खुदा की कसम तब वादियों के नियत भी धीरे धीरे बदलने लगी।। »

उनके शहर में

क्या करूंगा “अमित “जा के उनके शहर में। वफा के बदले मिला बेवफ़ाई उनके शहर में।। »

तक़दीर और तदबीर

जब तक़दीर से दोस्ती की, तब तदबीर ने मुझ से कहा। मुझे मत छोड़ ए नादान गर मैं नहीं तो तकदीर कहाँ।। »

फिर क्यों न…..

माना कि मुकद्दर पे जोर चलता नहीं किसी का। फिर क्यों न मेहनत से ही दोस्ती कर लिया जाए।। »

वक्त और तक़दीर

वक्त को हमने वक्त की तरह बड़ी मेहनत से कदर किया। तभी तो आज मैं अपनी तक़दीर को अपने वश में किया।। »

यही दोस्ती यही प्यार ?

रास्ते कठिन है प्यार के, फिर भी मैने हिम्मत नहीं हारा। तुम तो थोड़े ही दूर चल के कहने लगे अब मैं जीवन से हारा।। »

बिन बरसात के ही….

इश्क़ क्या करे हम, वो कहते है इसके पास दिल ही नहीं है। उन्हें क्या पता कभी कभी बिन बरसात के ही हम भीग जाते है।। »

कहीं पे दिल तो कहीं पे निशाना

हम इतने भी नादान नहीं थे, जितना की वो मुझे समझते थे। कस्मे वादे मुझ से करते थे, इश्क़ जनाब कहीं और फरमाते थे।। »

ए कैसा इश्क़ है ??

।। आवारा से क्या पूछना इश्क़ किसे कहते हैं।। ।। हवस के नजरों से देखना भी क्या इश्क़ है।। »

इश्क़ में रिश्क़

चल हट जा !! नहीं करना है मुझे इश्क़ विश्क़ मैं बर्बाद होता गया ले ले के इश्क़ में रिश्क़।। »

ग़म की दवा

मय से मैने पूछा ग़म की दवा है क्या आपके मयख़ाने में। मय कहा किस ग़म की दवा चाहिए आपको मयख़ाने मे। »

किसी को किसी से….

कौन किस पे कुर्बान होता है इस ज़माने में। कोई वास्ता ही नहीं है यहाँ किसी को किसी से ।। »

आज हमारी टक्कर है

लड़का – मैं वो आशिक़ नहीं जो अपनी, फ़ितरत को धूल में मिला दे। गर यकीन न हो तो एक मर्तबा, दिल दे के तू मुझे अपना बना ले।। 💇 — अपना दिल ए पागल आशिक़, तुझे ऐसे कैसे हवाले कर दूँ । लाख जतन से संभाला यौवन को, बदल जाता है तू कैसे यकीन कर लूँ।। लड़का – तेरा यौवन किस काम का जो किसी, आशिक़ के कांतिल निगाह न पड़े। लाख बचा ले तू अपना दामन, फिर भी दीवानो से तू कैसे बचे।। 💇 ——तेरे... »

धोखा ही धोखा

यहाँ धोखा वहाँ धोखा, चारो तरफ धोखा ही धोखा है। कैसे कोई इश्क़ करे इसलिए हमने फैसला बदल दिया है।। »

एग्रीमेंट

बालू के रेत में हमने आशियाना बनाया समंदर से कोरे कागज पे एग्रीमेंट करके । अचानक अमित ने कहा ए पागल आशिक़ लहरों पे यकीन करना जरा सोच समझ के ।। »

इन्सान और जानवर (भाग – २)

(आपने भाग १ में पढ़ा – वीराने में कलूआ की मुलाकात एक अदभुत गिद्ध से होता है। वह मनुष्य की भाषा में बात करता है। वह अपने घर परिवार व समाज को छोड़ चूका है। क्योंकि सभी गिद्ध जानवर के मांस खा खा कर जानवरों जेसे बर्ताव करने लगे है। गिद्ध स्वंय अपनी आहार तालाश करने मे सक्षम नहीं है।वह इंसान के मांस खा कर जीवित रहना चाहता है। वह अपनी व्यथा कलूआ को कहता है ।कलूआ क्या जवाब देता है) अब आगे — कल... »

इन्सान और जानवर

कलूआ डोम श्मशान से लाश जला कर शाम के समय घर जा रहा था। अचानक किसी की आवाज़ उसके कानो में टकरायी।वह खड़ा हो कर चारो तरफ देखने लगा। उसे कहीं भी कुछ दिखाई नहीं दिया। कुछ क्षण पश्चात वह दो कदम आगे बढा ही था कि झाड़ी में एक बूढ़े गिद्ध को देखा। कलूआ –“सारा दिन मांस खाता ही रहता है। फिर भी शाम के समय टें टें करता ही र हता है “।गिद्ध–“भाई। मैं चार दिनों से भूखा हूँ। मुझे कही... »

मुहब्बत को बदनाम न करो

सुनो ए दोस्त तुम ए काम न किया करो। मुहब्बत को यों बदनाम न किया करो।। माना कि रास्ते बहुत कठिन है इश्क के। फिर भी अपनी इश्क़ पे यकीन किया करो।। जो हर मर्तबा खोता है वही शख्स पाता है। बस थोड़ा सा इन्तजार की घड़ियाँ गिना करो।। ए क्या पल में पागलपन पल में ही मयख़ाना। खुदा के लिए तुम ऐसा पागलपन न किया करो।। »

ऐसा साथी

मुझको संभाल कर वो खुद गिर गए। ऐसा साथी सब को कहाँ मिल पाए।। »

यह क्या हो गया

यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ नकाब ही नकाब है। यह कैसा मातम आज शायरो पे आया है।। ना नज्म है ना ग़ज़ल है ना नातशरीफ है। मौसम भी कुछ कुछ शायरों से ख़फा है।। गुलशन में भी गुल खिलना भूल गया है । ए नकाब इतनी कयामत भी अच्छी नहीं है।। »

घर घर की यही कहानी

दिन रात घर घर की यही कहानी है। सास बहू के झगड़े युग युगांतर पुरानी है।। सास की कड़वी – बोली मैं तुमसे कम नहीं कलमुंही। बहू की कड़वी जबाब – तू ही जहर की पुरिया है।। सास उठाए झाडू तो बहू उठाए बेलन। यही दो अस्त्र की चर्चे घर में है आँगन में है।। यही दकियानूसी विचार हर घर को बर्बाद किया। नफ़रत की चिंगारी इधर भी है उधर भी है।। काश !! सास समझ पाती मैं भी कभी बहू थी। काश !! बहू भी समझ पाती मा... »

देखे जरा

चलो जरा इश्क़ करके देखे, किसमें कितना है दम । सुनता हूँ जिसको डस ले , उसको निकल जाता है दम ।। »

बेख़बर

जनवरी से दिसंबर गुजर गए, उस बेख़बर को खबर ही नहीं। उसे क्या पता इश्क़ करने वाला कोई आशिक़ ज़िंदा है भी या नहीं।। »

ख्वाईश

दिल के आगरे में मैं भी एक ताजमहल बनाउंगा। पत्थर ना सही संगदिल से ही महल को सजाउंगा।। »

बीते कल

हम उनमें थे — वो मुझमें थे, उफ़ !!!! , वो क्या दिन थे। जब हम रुठ जाते थे, तब वो चाँद सितारे तोड़ लाते थे।। »

पुरानी हवेली

कई वर्षों से इस पुरानी हवेली में कोई आया ही नहीं। जो भी आया मैं गैर समझ कर उसे अपनाया ही नहीं।। »

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