Author: rajesh arman

  • हालात फिर बदले

    कल भी हम थे ,ये जमीं थी
    पर वो पाँव नहीं थे
    ढूंढ सकते जो तेरे क़दमों के निशाँ

    हालात फिर बदले

    इन पाँव को
    मिली कोई मंज़िल
    जो थी तेरे
    पलकों की महफ़िल

    हालात फिर बदले

    मेरे पाँव ,तुम्हारे पाँव
    अब हमारे हो गए
    लगने लगे सब बेगाने
    तुम इतने हमें प्यारे हो गए

    हालात फिर बदले

    तुम लौट गए सफर से
    मिटाकर उन क़दमों के निशां
    जिस राह पर कदम थे मेरे
    नहीं थे तुंम्हारे क़दमों के निशां

    हालात फिर बदले

    हम तुम और मैं हो गए
    जमीं रही वही मगर
    हम भी रहे ,सफर भी रहा
    पर रहा न कोई हमसफ़र

    हालात फिर बदले

    मैं हूँ मेरे पाँव है
    तुम हो तुम्हारे पाँव है
    पर तले उसके
    वो साँझा जमीं न रही

  • छोड़ आया थी

    छोड़ आया थी अपनी तन्हाई को भींड में
    लुत्फ़ अब ले रहां हूँ तन्हाई की भीड़ में
    राजेश ‘अरमान’

  • अजीब इत्तफ़ाक़ है

    अजीब इत्तफ़ाक़ है

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे जाने और सावन के आने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरी चुप और मौसम के गुनगुनाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    मेरे माज़ी और मेरे मुस्कराने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे मिलने और मेरे ज़ख्म खाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे गेसू और घटाओं के छाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे तीर और कहीं चल जाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    मिल के और ग़ुम हो जाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    बंद आँखें और ख्वाब टूट जाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    ‘अरमान ‘ तेरे और तेरे अनजाने का

    राजेश ‘अरमान’

  • चलो चुप लफ्जों

    चलो चुप लफ्जों को मिल के बाँट लेते है
    चल निकले लफ्जों को मिटटी से पाट देते है

    वो तेरा कहना मुझे मौसम की तरह
    चल तीर को किसी शाख पे गाड़ देते है

    वो तेरा मिलना किसी अजनबी जैसे
    चल इसे पहली मुलाक़ात का नाम देते है

    वो तेरा बारहा जाना फिर रूठ के मुझसे
    चल इसे तेरे क़दमों की ख़ता मान लेते है

    वो हर बात पे कहना तुम वैसे न रहे ‘अरमान’
    चल इसे वक़्त के साथ चलना जान लेते है

  • न माथे पे

    न माथे पे कोई बिंदिया
    न हाथों में कोई कंगन
    न होठों पे कोई लाली
    न पोशाक में तेरी खुश्बू
    न जुल्फें सवरी हुई
    न माथे पे कोई टीका
    न आँखों में काजल
    न पैरों में है पायल
    न हिना की महक
    आ तुझे प्यार करूँ
    ज़िंदगी तू सज के तो आ

    राजेश ‘अरमान’ १२/११/१९८९

  • मैं संघर्ष कर रहा हूँ

    मैं संघर्ष कर रहा हूँ
    मैं संघर्ष कर रहा हूँ

    एक ‘मैं’ हूँ अपने ही जैसा एक ‘मैं’ और भी है
    इन दोनों ‘मैं’ में तालमेल बिलकुल भी नहीं
    फिर भी मैं रखता हूँ दोनों को अपने साथ
    अपने जिस्म में ,रूह की गहराईयों में
    कभी एक ‘मैं ‘ मेरा दर्द होता है
    तो दूसरा ‘मैं’ दवा बन जाता है
    कभी एक ‘मैं’ मेरा दोस्त होता है
    तो दूसरा ‘मैं ‘ दुश्मन बन जाता है
    इन दोनों ‘मैं’ में से बस एक ही
    समय एक ही ‘मैं ‘मेरे अस्तित्व
    की परछाई बन दुनिया को दिखता है
    मेरे अंदर दो ‘मैं’ रहते है
    अस्तित्व केवल एक ‘मैं’ का
    आज तक मैं दुसरे ‘ मैं’ को उसका
    हक़ नहीं दिला पाया हूँ
    क्योकि दोनों में से एक ही ‘मैं’
    को मिली है नागरिकता
    बस अपराधबोध पनपता है
    एक उस दुसरे ‘मैं’ के
    नाजायज होने का
    अब भी उस दूसरे ‘मैं ‘के लिए
    मैं संघर्ष कर रहा हूँ ..
    मैं संघर्ष कर रहा हूँ ..

    राजेश’अरमान’

  • गर वाबस्ता हो

    गर वाबस्ता हो जाता रूहे-अहसास से जमाना
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    गर वफ़ा करने की आदत होती जहाँ में
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    गर न तेरे शिकवे होते न शिकायत होती
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    अंधे ख्वाबों का न सिलसिला गर होता
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    जज़्बे की तौहीन न दिल तार तार होता
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    तेरी कलम की रोशनाई सूख जाती ‘अरमान’ गर
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    राजेश’अरमान’ 12/04/1991

  • बिखरे बिखरे ख्वाब

    बिखरे बिखरे ख्वाब
    सुलगते सुलगते आंसूं
    सीने में तूफ़ान
    दिल में बस कशिश
    काफिले यादों के लम्बे
    कोई शै मुकम्मल नहीं
    तनहा तनहा सफर
    लम्बी लम्बी रातें
    न वफ़ा का इल्म
    न जफ़ा का तजुर्बा
    बस एक गहरी खाई सी जीस्त
    उस पर भी सुकु के ,
    पंख होते तो उड़ते फिरते
    खुली हवा में भी ,
    पिंजरे का बंदपन
    सांसें भी लेते है ,
    खुद पे अहसान जताकर
    लगता है सृष्टि रचते वक़्त ही ,
    ग़ज़ल भी रच दी गई थी
    राजेश ‘अरमान’ १४/०२/१९९०

  • वर्तमान ही सत्य

    वर्तमान ही सत्य बाकी सब मिथ्या है.
    भूत तो बिन बाती तेल का दीया है
    मत सोच में डुबो, तुझे किसी से क्या मिला
    कर हिसाब तूने किसी को क्या दिया है

    राजेश ‘अरमान’

  • फरियाद बन के

    फरियाद बन के निकली मेरी वफ़ा तेरी गली में
    कौन सुनता मेरे दिल की सदा तेरी गली में

    यूँ तो बस आवाज़ हूँ एक बुतखाने की
    कौन बख्सेगा यूँ मेरी खता तेरी गली में

    दरो-दीवार से लिपटी हुई एक तस्वीर सही
    कौन मुड़ के देखेगा यहाँ तेरी गली में

    बात दरियां की करों या समुन्दर की
    डूब के देखेगा मुझे कौन भला तेरी गली में

    मेरी आहट भी मुझे नागवारा गुजरी ‘अरमान’
    मेरे सनाटों को सुनेगा कौन भला तेरी गली में
    राजेश ‘अरमान’

  • ग़मे-ए-मुदाम

    ग़मे-ए-मुदाम से इस कदर परेशां न हो ,
    सुना है हर गम के पंख भी होते है
    राजेश’अरमान’

  • तेरे साथ गुज़ारे

    तेरे साथ गुज़ारे चंद लम्हों की
    जागीर की बस मिल्कियत रखता हूँ
    ये अलग बात है खुद को
    सबसे अमीर अब भी समझता हूँ
    राजेश’अरमान’

  • वो समझते रहे ताउम्र

    वो समझते रहे ताउम्र, बस एक किस्सा मुझे
    हम वहम् में रहे वो समझते है ,अपना हिस्सा मुझे

    फरेब खाने की तो तालीम अपनी बड़ी पुरानी है
    हम फूलों की तरह मिलते, वो दिखाते काटों का गुस्सा मुझे

    राजेश’अरमान’

  • तूफां मन के

    तूफां मन के अंदर हो या समुन्दर में
    लहरें कुछ न कुछ खींच के ले ही जाती है
    राजेश ‘अरमान’

  • मैंने खुद ही

    मैंने खुद ही
    खींची लकीरें
    अपने दरम्या

    मैंने खुद ही
    बना दिये
    इतने धर्म

    मैंने खुद ही
    सीखा दिया
    भूर्ण को छल कपट

    मैंने खुद ही
    गिरा दिए
    अपने संस्कार

    मैंने खुद ही
    मिटा दिए
    अपने हर्ष को

    मैंने खुद ही
    बना लिए
    खाली मकान

    मैंने खुद ही
    जला दिए
    अपने सपनो को

    मैंने खुद ही
    ओढ़ लिए
    कई चेहरे

    मैंने खुद ही
    सब किया है
    अब तक

    मैंने खुद ही
    रचा है
    अतृप्त रंगमच

    मैंने खुद ही
    सजाये है
    सूनी सेज

    मैंने खुद ही
    बहाये है
    आँखों से नीर

    मैंने खुद ही
    नहीं माना
    खुदको दोषी

    क्या हो अंत
    इस खुद का
    जो है अनंत

    जिजीविषा के
    इस मायावी
    अंतर्मन को

    किसी की नहीं
    दस्तक चाहिए, बस ,
    अपने खुद की

    राजेश’अरमान’

  • बंदगी तेरी

    बंदगी तेरी यूँ मेरे काम आ गई
    अब किसी दुआ की जुस्तजू न रही

    राजेश’अरमान’

  • मन की चेतना

    मन की चेतना
    आत्मा की वेदना
    सत्य का भेदना
    अधीर प्रश्न
    बुझे उत्तर
    बिलखते प्रश्नचिन्ह
    निष्कर्ष कुंठित
    आज का आदमी

    राजेश ‘अरमान’

  • आँखों में रखा

    आँखों  में रखा बुलंदिओं का जोश है
     यहाँ हर इंसा खुद में   मदहोश है

    वहां से निकल तो आया था जहाँ शोर था
    कैसे निकलू जो अपने ही अंदर सरफ़रोश है

    कौन सी दुनिया को कोसते हो जी भर के
    कौन नहीं  भला यहाँ अहसान-फरामोश है

    न हवाओं न फ़िज़ाओं का कोई कसूर यहाँ
    हर शख्स अपनी ही दौड़ का सोता खरगोश है

                                   राजेश’अरमान’

  • aankhon mein rakha

    aankhon mein rakha bulandion ka josh hai
     yahan har insaa khud mein  madhosh hai

    wahan se nikal to aaya tha jahan shor tha
     kaise nikaloon jo apne hi ander sarfarosh hai

    kaun si duniya ko koste  ho jee bhar ke
    kaun nahin bhala yahan ahsaan-faramosh hai

    na hawaon na fizaon ka koi kasoor yahan
    har shaksha apni hi daud ka sota khargosh hai

                      rajesh’armaan’

  • हासिल कुछ भी

    हासिल कुछ भी नहीं नफरतों से
    क्यों खेलते हो फिर जज्बातों से
    जब इंसा ही इंसा का दुश्मन हो
    क्या मिलेगा किसी को इबादतों से
                        राजेश’अरमान’

  • कमबख्त दिल

    कमबख्त दिल

    कमबख्त दिल सब समझता है
         खुद  दिल से दूरियां रखते है
    वज़ूद  सामने होता है लेकिन
          खुद को बहरूपिया रखते है
                    राजेश’अरमान’

  • जिनके आने से पहले

    जिनके आने से पहले, मौसम का गुमाँ हो जाता था
    आज वो खुद ही हो गए, इक मौसम की तरह
    राजेश’अरमान’

  • इम्तिहाँ लेते है वो

    इम्तिहाँ लेते है वो कुछ इस अंदाज़ से
    आता हुआ जवाब भी हम भूल जाते है
    राजेश’अरमान’

  • अब भी मेरा नाम

    अब भी मेरा नाम उनके अपनों में शुमार है
    उनके हाथों के पत्थर को मेरा इंतज़ार है

    ये चादर जरा आहिस्ते से संभल कर ही हटाना
    ये फूलों से नहीं ,चुभते काटों से सजी मजार है

    वो नाम भी मेरा लेते है और कसम भी खाते है
    हम तो पहलू में उसके मिटने को कब से तैयार है

    यक़ीनन उसके इरादों पे कोई शक नहीं मुझे
    भरे ज़ख्मों को भी हिला देंगे मुझे ऐतबार है

    अभी तो इब्तिदा है तेरे सितम की ‘अरमान’
    तेरे सहने को पड़े कतार में अभी गम हज़ार है

    अब भी मेरा नाम उनके अपनों में शुमार है
    उनके हाथों के पत्थर को मेरा इंतज़ार है

    राजेश’अरमान’ २१/०४/2012

  • सब कुछ है जहाँ में

    सब कुछ है जहाँ में ,बस यहाँ किल्लत कुछ और है
    ज़िंदगी तुझे जीने के लिए ,बस जिल्लत का दौर है

    आईने ने कब माफ़ की है ख़ता किसी गुनाहगार की
    और हमें सच बोलते आईनों की इल्लत से बैर है

    देखिये उस तरफ फिर कोई मकां जल रहा है
    शायद वहीँ अपने अपने हिस्से की आदमियत का शोर है

    हर्फ़ निकलते ही लब से, बन जाते है अफ़साने कई
    कौन देखेगा यहाँ किस अफ़साने से मिटा कोई दौर है

    चल कोई ऐसी फिज़ा इफ़्फ़त भरी तलाश करें ‘अरमान’
    या तो पहले ही से फैला फिज़ाओं में हर तरफ जहर है

    राजेश ‘अरमान’
    इफ़्फ़त= शुद्धता, पवित्रता
    इल्लत= दोष, बुरी आदत,

  • आराईश अपने अंदर

    आराईश अपने अंदर की तो हम अब खो चुके है
    तलाश आलम की करते फिरते रहने को नासबूर है

    परस्तिश बन्दे की हो या फिर ख़ुदा की हो
    बस कुछ न कुछ मांगने का अजीब सा दस्तूर ह

    तिरा हर फैसला निकलता है सिर पे पत्थर की तरह
    कोई मेरे हक़ में भी हो ,जिसे मैं भी कहूँ मंजूर है

    या के इन परिंदो के आसमां में भी कोई पिंजरे न सजा दे
    ताक के इनको उड़ता है कोई ,जो अपने पंख से मजबूर है

    इस तस्सली के दरिया में कब तक रहे ‘अरमान’
    मेरे हिस्से का भी बना कोई समुन्दर कहीं जरूर है

    राजेश’अरमान’

  • मेरी खिड़की से

    मेरी खिड़की से
    कोई ख्वाब निकल
    फिर खो गया
    इन हवाओं में
    अब मैं खिड़की
    बंद रखने लगा
    अब ख्वाब आते है
    भागते भी नहीं
    बस इक घुटन सी
    फैलती है उनके
    साथ रहने से

    हवा सी चीज़ है
    ये ख़्वाब भी
    बस महसूस होते है
    इन्हे मुठी में
    जकड नहीं सकते
    ख्वाब हवाओं में ही
    रहने को बने है
    अब फिर मैंने
    खिड़की खोल दी है
    राजेश’अरमान’

  • आए न रास किश्तों के क़त्ल

    आए न रास किश्तों के क़त्ल ,क़त्ल हो तो एक बार हो
    मेरे क़ातिल दुआ मेरी ,तेरे खंजर की न खत्म कभी धार हो

    देते है खुद को धोखा ,औरो के फरेब से क्या बच पाएंगे वो
    अपने गिरेबां में झाकने से जो गुरेज करें,वो खुद से क्या शर्मशार हो

    चल के बैठे फिर उस महफ़िल पे क्यों गैरत के खिलाफ
    उस महफ़िल कभी न जाना जहाँ तेरे वज़ूद की मजार हो

    तिनके तिनके से बिखर जाते है न जाने क्यों ये नशेमन
    किसी नशेमन का इन आंधिओं से इस कदर न प्यार हो

    आ लेके चल खाक अपने सफर की निशानी समझ ‘अरमान’
    ना जाने किस मोड़ पे आके , यही खाक तेरी ग़मगुसार हो

    राजेश ‘अरमान’

  • अनंत की खोज

    अनंत की खोज

    व्याकुल सा कण कण
    मन चंचल अपार चिंतन
    जिजीविषा मृतप्राय
    अपने होने का अभिप्राय
    एक खोज अनंत की
    निष्कर्ष मरीचिका
    एक खोज मोक्ष की
    निष्कर्ष अज्ञात
    एक खोज सृष्टि की
    निष्कर्ष मौन
    मोक्ष किसका
    निष्कर्ष शून्यता का
    राजेश’अरमान’

  • वो इतना ही कह सका

    वो इतना ही कह सका था तुझसे रुखसत पे
    जान हाज़िर है तेरे वास्ते तेरी निस्बत पे

    बाग़ की रौनके पूछिए उस बागबाँ से
    जिसने खिलाये है फूल तेरी चाहत पे

    कौन समझा है इन हवाओं के रुख को यहाँ
    इख्तियार नहीं है इन हवाओं के आक़िबत पे

    हर्फ़ निकले लबों से ,ज्यों जां निकलती है
    जब तेरी बेरुखी को सजाया था अपनी आदत पे

    लो फिर छेड़ दी दास्ताने-हिज़्र तुमने ‘अरमान’
    क्या हो जाता है हासिल तुझे खुद की उक़ूबत पे

    वो इतना ही कह सका था तुझसे रुखसत पे
    जान हाज़िर है तेरे वास्ते तेरी निस्बत पे

    राजेश ‘अरमान’
    उक़ूबत= दंड, सजा, उत्पीड़न, यातना
    आक़िबत= अन्त, परिणाम, भविष्य
    निस्बत= सम्बन्ध, स्मोह, सम्बन्ध लगाना,

  • दर्द के चरागों को बुझने का

    दर्द के चरागों को बुझने का

    दर्द के चरागों को बुझने का कोई बसेरा दे दो
    ग़ुम हुए लोगों को कोई इक नया चेहरा दे दो

    इन सुर्ख आँखों का कसूर तुम्हारा हिस्सा है
    इन आँखों को तुम कोई ख्वाब सुनहरा दे दो

    न शजर, न कोई शाख, न पत्तों का कसूर
    अपने बाग़ों को बस थोड़ा सा चेहरा दे दो

    छोटी छोटी बातों से क्यों जख्म रोज़ देते हो
    एक बार ही कोई ज़ख्म मुझे गहरा दे दो

    निस्बत कुछ ज़माने से यूँ निभाए न कोई
    हर रिवाज़ों पे ज़माने का कोई पहरा दे दो

    चीखें सुनकर भी वो खामोश से बैठे है
    काश मुझे साथी कोई बहरा दे दो

    समुन्दर न मिला कोई बात नहीं
    दिल बहलाने को कोई सेहरा दे दो

    हर तरफ बदलने का गर्म बाजार ‘अरमान’
    ले के पुराना कोई नया गम ठहरा दे दो
    राजेश ‘अरमान’

  • दर्द के चरागों को

    दर्द के चरागों को बुझने की कोई हवा दे दो
    ग़ुम हुए लोगों को लौटने का कोई पता दे दो

    इन सुर्ख आँखों का कसूर इतना तुम्हारा हिस्सा है
    इन आँखों को तुम कोई ख्वाब सुनहरा दे दो

    न शजर, न कोई शाख, न पत्तों का कसूर
    अपने बाग़ों को बस थोड़ा सा चेहरा दे दो

    छोटी छोटी बातों से क्यों जख्म रोज़ देते हो
    एक बार ही कोई ज़ख्म मुझे गहरा दे दो

    निस्बत कुछ ज़माने से यूँ निभाए न कोई
    हर रिवाज़ों पे ज़माने का कोई पर्दा दे दो

    हर तरफ बदलने का गर्म है बाजार ‘अरमान’
    ले के पुराना मुझे कोई नया गम दे दो
    राजेश ‘अरमान’

  • है तो इंसा ही हम

    है तो इंसा ही हम कोई खुदा नहीं है,
    गुस्ताखिओं की और कोई वज़ह नहीं है

    गिरते झरने से, अच्छे लगते है उड़ते परिंदे
    पर मेरा अक्स ये जमीं है कोई आस्मां नहीं है

    यूँ तो रखते है हम भी बेइंतेहा पाक नज़र
    पर वज़ूद खाक है ,किसी मस्जिद की चौखट नहीं है

    सरफ़रोश हो भी जाते गर गमजदा न होते
    पर तुझ पे मिटना भी सरफ़रोशी से कम नहीं है

    गर्दिश-ऐ -मुदाम से हम हो गए इतने आज़र्दाह
    आब-ए-आईना हूँ ,पर अपनी ही सूरत नहीं है

    हमने ढोये है जिनके इलज़ाम अपने सिर पर
    अब उनके किस्सों में मेरा नाम तक नहीं है

    कल जो गुजरी वो रात बहुत लम्बी थी
    बात तन्हाई की है , एक रात की नहीं है

    अबद से टूटे कई शीशे ज़माने के पत्थरों से
    हम खुद हो गए पत्थर अब कोई शीशा नहीं है

    ले के बैठे रहे ताउम्र वसीयत में वफादारी ‘अरमान’
    लोग कहते के, ये इस ज़माने का आदमी नहीं है

    राजेश’अरमान’
    अबद=अनन्तकाल
    आब-ए-आईना= दर्पण की चमक
    आज़र्दाह= उदास, दु:खित, खीजा हुआ, व्याकुल,बेचैन

  • मेरे अस्तित्व

    मेरे अस्तित्व
    के इर्दगिर्द
    बैठे है
    कई जाल मकड़ी के
    भेदना असंभव
    मगर प्रयास अनवरत

    मेरे सत्य
    के इर्दगिर्द
    बैठे है
    असत्य के पंछी
    उड़ाना असंभव
    मगर प्रयास अनवरत

    मेरे मन
    के इर्दगिर्द
    बैठे है
    अहंकार के पशु
    भगाना असंभव
    मगर प्रयास अनवरत

    मेरे कामना
    के इर्दगिर्द
    बैठे है
    भाग्य के दानव
    हटाना असंभव
    मगर प्रयास अनवरत

    मेरी आत्मा
    के इर्दगिर्द
    बैठा हूँ
    मैं स्वयं
    निहारना संभव
    पर प्रयास अतृप्त

    राजेश’अरमान’

  • अनुभूति से ओतप्रोत

    अनुभूति से ओतप्रोत
    जीवन चलता है

    जैसे कोई लहर
    जैसे कोई झोँका
    जैसे कोई मौसम
    बस अनुभूति
    ही तो है
    अनुभूति से परे
    अपने भीतर का
    अपने मन का
    अपने अंतर्द्वंद का
    कोई नाता होता है
    किन्तु बिखरा बिखरा
    किन्तु टूटा टूटा
    इस टूटे टूटे को
    जोड़ना जोड़ना होगा
    पंछी को खुले आकाश
    पे उड़ने के लिए छोड़ना होगा
    कहीं पिंजरे में
    रहकर कोई पंछी
    आकाश को नाप सकता है
    नापना आकाश का
    उतना अनिवार्य नहीं
    जितना अपने को नापना
    लहर का अपना
    स्वभाव होता है
    हिलोरे मारना
    महज एक क्रिया नहीं
    एक जीवन्ता है
    उसके और प्रकृति
    के मध्य का सम्बन्ध
    क्या कोई सम्बन्ध
    इस शरीर का प्रकृति से
    स्थापित किया है
    इस शरीर के
    तत्वों को आलोकित किया है
    शब्द मौन
    पर ये मौन
    अपराधबोध से ग्रस्त
    कभी इस मौन
    की गूँज से
    हो जाओं न
    व्यथित असीमित
    स्पर्श स्वयं का
    कर दे भयभीत

    अनुभूति से ओतप्रोत
    जीवन चलता है

    राजेश’अरमान’

  • तुम एक परिणाम हो

    तुम एक परिणाम हो
    तुम क्रिया नहीं हो
    सृष्टि एक क्रिया
    है जो रची गयी है
    रचने की क्रिया
    एक अलोकिक सत्य है
    प्रकृति ,पानी .वायु ,अग्नि
    सब परिणाम है
    बस तुम्हारी तरह
    तुम भयभीत क्यों हो ?
    परिणाम के पश्चात
    कुछ नहीं होता
    न भय ,न प्रश्न
    सृष्टि जब -जब
    रची जाएगी
    तब-तब तुम
    उसके परिणाम होगे
    क्योकि?
    तुम एक परिणाम हो

    राजेश’अरमान’

  • गैरों से क्या करें

    गैरों से क्या करें शिकायत
    अपनों से ही मिली तिज़ारत
    रूसवाइयां तेरी साथ लेकर
    कर लेंगे इस जहाँ से रुखसत
    राजेश ‘अरमान’

  • सहारे बदल गए

    हम भी है तुम भी हो ,पर ये सहारे बदल गए
    लहरें तो वही है मगर ये किनारे बदल गए

    लोग पत्थर के बन गए है , ,दिल हमारे है आईने
    हम तो अब भी वही मगर ये हमारे बदल गए

    कल तक महका करती थी बगियाँ ये फूलों से ,
    माली तो वहीँ मगर चमन के नज़ारे बदल गए

    इस ईमारत की बुनियाद तो अब भी है बुलंद
    बस रहने वालों के हाथों के इशारे बदल गए

    यादों के दिए आखिर कब तक जलाये ‘अरमान’
    अफ़सोस तेरे बदलने का यूँ तो सारे बदल गए

    राजेश’अरमान’
    २७/०७/१९९०

  • गर निकल पड़े जो सफर को

    गर निकल पड़े जो सफर को
    देख मुड़ के न फिर डगर को

    आएँगे यूँ तो कई विघ्न
    पड़ेंगे देखने कई दुर्दिन
    हौसला हो साथ अगर
    हो जायेंगे ये छिन-भिन्न

    तट से जो भटक गई हो,
    तो दो मोड़ उस लहर को

    गर निकल पड़े ———

    गर काली रात हो सामने
    बढ़ाओ हाथ अंधेरों को धामने
    देंगे फिर घुटने टेक
    दो पल के ये है पाहुने

    गर डस ले सर्प कालरूपी
    उगल डालो उस जहर को

    गर निकल पड़े ——–

    गर फस जाएँ तूफा में कस्ती
    लगने लगे मौत जीवन से सस्ती
    अगर ठान लो जूझने की ,
    फिर इस तूफा की क्या है हस्ती

    पा लोगे अपने किनारे
    कर परास्त इस भवर को

    गर निकल पड़े ——

    क्यों हो ढूँढ़ते उत्तम अवसर
    होता आया है यही अक्सर
    जिसने किया इंतज़ार इसका
    प्रयास उसका वहीँ गया ठहर

    गर हो प्रतिकूल समय तो
    बदल डालो उस पहर को

    गर निकल पड़े जो सफर को
    देख मुड़ के न फिर डगर को

    राजेश’अरमान’
    २७/०७/१९९०

  • निकला ढूंढने

    निकला ढूंढने
    अपने दुश्मन को
    कोई मिला नहीं
    टटोला जो अपने
    मन को
    पहचान गया
    अपने दुश्मन को
    राजेश ‘अरमान’

  • तुम महज एक तस्वीर हो

    तुम महज एक तस्वीर हो

    मैं जानता हूँ कि,
    तुम महज इक तस्वीर हो
    ओर उससे आगे कुछ भी नहीं
    मगर दिल ये कहता है
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    सुना था तस्वीरें बोला नहीं करती
    पर तुम क्यों बोलती हो
    क्यों मेरे निहारने से तुम्हारी
    तस्वीर का रंग सूर्ख हो जाता है
    क्यों कन्खिओं से देखते
    तस्वीर का रुख बदल जाता है
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    क्यों मेरा आँगन भरा रहता है फूलों से
    जो तेरे हसने से झरते है
    जबकि मैं जानता हूँ
    मेरे आँगन में
    कोई पौधा नहीं लगा है
    किसी भी फूल का
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    क्यों तुम्हारी बिखरी जुल्फें
    ललाट को चूमती हुई
    पूरे चेहरे को स्पर्श करती है
    एहसास कराती किसी घटाओं का
    घिर आये बादलों का
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    क्यों कानो में घोलती माधुर्य रस
    तुम्हारी चूडियों की खनखन
    बिखर जाते असंख्य प्रसून
    तेरे अधरों के प्रस्फ़ुट कम्पन se
    ज्योति को परिभाषित करती
    तेरे माथे की बिंदिया
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    कविता हो तुम मेरी कल्पना की
    या फिर हो मेरे होठों की ग़ज़ल
    कपोलों पर छवि शशि की ,
    जैसे झील में खिला हो कँवल
    क्यों देख इस कंचनकाया को
    हो जाती है साँसें प्रबल
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    क्यों मदहोश कर देती
    तेरी चारूं देह की भीनी सुगंध
    क्यों देखने से लगता तुझे
    पतझड़ भी ,मदमाया मौसम
    कब तक रखें कोई
    अपने चंचल मन में संयम
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    क्यों देती है तेरी अधखुली पलके
    सुधापान का मौन निमंतरण
    क्यों न करदे तुझ पे
    अपना सारा
    जीवन अर्पण
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    तुम महज एक तस्वीर हो
    इसका भी मुझे एहसास है
    तुम महज एक तस्वीर नहीं हो
    इसका भी मुझे विश्वास है

    मैं जानता हूँ तुम नहीं ,
    मेरे हाथों की लकीर हो
    फिर भी कैसे कर लूँ यकीं

    तुम महज एक तस्वीर हो

    तुम महज एक तस्वीर हो

  • मेरे ज़ख्मों का खाता

    मेरे ज़ख्मों का खाता इक दिन नीलाम हो गया
    दुश्मनों को मिला न हिसाब और इन्तेक़ाम हो गया

    वाबस्ता थे जिन चेहरों से ,जो थे मेरे रात दिन
    उनके चेहरों का रंग सारे शहर में सरे-आम हो गया

    कब तलक छुपती है किसी चेहरे पे पड़ी नक़ाब
    मेरे क़ातिल का खुद-ब-खुद क़त्ल -ऐ -आम हो गया

    उसकी गैरत से कब भला मेरा वास्ता न था ,
    उसकी निगाहों में मेरा और कोई इंतज़ाम हो गया

    सुर्खिआं अखबार की बन जाओगे क़त्ल कर भी ‘अरमान’
    तिरी नादानिओं का देख कैसा बद अन्जाम हो गया

    राजेश ‘अरमान’

  • टूटे अल्फ़ाज़ों को

    टूटे अल्फ़ाज़ों को

    टूटे अल्फ़ाज़ों को  नसीहत की जरूरत क्या
     बिखरे ख्वाबों को किस्मत की जरूरत क्या

      जो बिक गया खुद ही  सरेआम बाज़ारों में
     फिर   इंसान की कीमत की जरूरत क्या

      हर इक शै का मुक़द्दर जब मुक़र्रर है
      लहूँ में लिपटी वसीयत की जरूरत क्या

     मैंने खुद ही जो इलज़ाम उठा रखे थे
    फिर ज़माने को  हक़ीक़त की जरूरत क्या

                                     राजेश’अरमान’

  • समझते सब है

    समझते सब है

    समझते  सब  है पर मानता कोई नहीं
        पहचान सब से है पर जानता कोई नहीं
      यूँ तो पड़ा हूँ खुली किताब की तरह
         पढ़े लिखे  सब है पर बांचता कोई नहीं

                              राजेश’अरमान’

  • एक वो बचपन

     एक वो बचपन था अल्हड सा
     आज तो सावन भी है पतछड सा
     थक गए ढूँढ़ते अब तो पल वो प्यारे
     खुला आसमान भी मिला पिंजरे सा
    कोई वज़ह नहीं थी कभी दौड़ने की
     अब तो चलता भी हूँ दौड़ने सा
     कहाँ छूट गए वो सुहाने दिन
     था जीवन  फूलों की तरह महका सा
                      राजेश ‘अरमान’

  • उठे जब भी सवाल

    उठे जब भी सवाल

    उठे जब भी सवाल ज़िंदगी की तरफ
    उठे है हाथ मेरे तेरी बंदगी की तरफ
    महज इत्तफ़ाक़ था या और कुछ
    मेरा इशारा है दिल्लगी की तरफ
    वो हर जगह जो मोज़ू था मगर
    नज़र पड़ी बस आवारगी की तरफ
    उन किताबों से हासिल भला क्या
    बढते है कदम किस तिश्नगी की तरफ
    इन्तहा हुई हिस्सों में बटते बटते
    अब चलें किसी पाकीज़गी की तरफ
    राजेश’अरमान’

  • हर शख्स बस

    हर शख्स बस

     हर शख्स बस अपने ही ख्याल बुनता है
     जिसका जवाब नहीं वही सवाल चुनता है

      कोई कैसे कहे वो गुमसुम सा  क्यों है
     जिसे  भी देखिये अपने ही जाल बुनता है

                                       राजेश’अरमान’

  • याद है आज भी वो दिन

    याद है आज भी वो दिन
    जब किताब के बीच
    कोई फूल दबा देते थे
    और खाली लम्हों को
    उस सूखे फूल से महकाया करते थे

    याद है आज भी वो दिन
    किताबों के पन्नें मोड़ देते थे
    इक निशानी के तौर पर क़ि,
    फिर कहाँ से शुरू करना है
    याद रखने के लिए

    याद है आज भी वो दिन
    कुछ जरूरी अध्याय को
    रेखांकित कर देते थे
    ज्यादा ध्यान लाने के लिए
    रंगों से सजा देते थे
    किताबों के जरूरी पन्नें

    याद है आज भी वो दिन
    बिखर जाती थी रोशनाई
    इन किताबों पर और
    चाक के टुकड़े से सोखते थे
    स्याही के धब्बों को, कहीं
    धब्बों का अक्स न पड़ जाये

    अब के दिन याद नहीं रहते
    सुना था ज़िंदगी भी
    एक किताब होती है
    बस किताब समझ कर
    जीने लगे ज़िंदगी
    और बस कुछ न समझा

    अब के दिन याद नहीं रहते
    ज़िंदगी की किताब के
    दबे पन्नो में मुरझाये फूल से
    ख़ुश्बू नहीं मिलती ,सच तो ये
    ताज़े फूलों की खुश्बूं भी
    लगता कोई चुरा ले गया

    अब के दिन याद नहीं रहते
    ज़िंदगी के जरूरी अध्याय
    के पन्नो को मोड़ तो दिया
    पर ज़िंदगी को फिर कहाँ से
    शुरू करना है ये पता ही नहीं
    बस पन्नें मुड़ते ही जा रहे है

    अब के दिन याद नहीं रहते
    रोशनाई बिखर गई है
    ज़िंदगी के बिखरे पन्नो पर
    कोई चाक इसे सोख नहीं पाती
    इनके धब्बों का अक्स गहराता हुआ
    कई पन्नो पर निशां छोड़ गया है

    अब के दिन याद नहीं रहते
    ज़िंदगी के जरूरी अध्याय को
    रेखांकित करता रहा
    अलग अलग रंगों से
    पर इस पर ध्यान नहीं जाता
    अरेखांकित भाग पर ही
    ध्यान टिक जाता है

    अब के दिन याद नहीं रहते
    मैं तुम्हे इक किताब समझ
    जीने लगा था ,पर तुम निकली
    मेरे बिखरे पन्नें ,जिस में कोई फूल
    दबा कर मैं रख नहीं पाया

    ज़िंदगी तुम किताब नहीं
    बस बिखरे पन्नें हो
    बस बिखरे पन्नें
    जिसे बस समेटता
    फिर रहा हूँ रात दिन

    याद है आज भी वो दिन, पर
    अब के दिन याद नहीं रहते

    राजेश’अरमान’

  • अजी कैसा विकास करते हो

    अजी कैसा विकास करते हो
    छलों को बाहुपाश करते हो

    जिन पेड़ो से मिलती है साँसें
    उन पेड़ों का विनाश करते हो

    हर चीज़ है, पर समय नहीं
    ख़ुदकुशी का क्यों प्रयास करते हो

    मौन होकर बैठा है घर और
    उस पर क्यों मौन उपवास करते हो

    ठिठक कर सोई है ज़िंदगी
    दीवारों से क्यों उल्हास करते हो

    मुठी बंद कर क्यों बैठे हो
    रेखाओं का उपहास करते हो

    गर तुम ने जहाँ जीता है
    मन फिर क्यों उदास करते हो
    राजेश’अरमान’

  • कोई कोना जिस्म का

    कोई कोना जिस्म का
    उड़ के बैठा किसी कोने में
    अब सफर साँसों का गुजरता है
    कभी जिस्म में कभी, किसी कोने में
    राजेश’अरमान’

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