Category: Poetry on Picture Contest

Submission for ‘Poetry on Picture’ Contest

  • दहेज

    दहेज

    मेरे माथे को सिंदूर देके
    मेरे विचारों को समेट दिया
    मेरे गले को हार से सजाया
    पर मेरी आवाज़ को बांध दिया
    मेरे हाथों मे चूड़ियों का बोझ डालके
    उन्हें भी अपना दास बना दिया
    मैं फिर भी खुश थी
    मुझे अपाहिज किया पर थाम लिया
    मेरे पैैरों में पायल पहनाई और
    मेरे कदमों को थमा दिया
    मैं फिर भी खुश थी
    कि मेरा संसार एक कमरे में ला दिया
    पर आज मुझे
    मेरा और मैं शब्द नहीं मिल रहे
    शायद वो भी दहेज में चले गये…

  • चील कौवो सा नोचता ये संसार

    चील और कौवो सा नोचता रहता संसार है,
    ये कैसा चोरों का फैला व्यापार है,
    दहेज के नाम पर बिक रही हैं नारियाँ कैसे,
    ये कैसा नारियों को गिरा कर झुका देने वाला हथियार है,
    न चाह कर भी बिक जाती है जहाँ अपनी ही हस्ती,
    ये मोल भाव का जबरन फैला कैसा बाज़ार है॥
    राही (अंजाना)

  • संसार के बाजार में दहेज

    संसार के बाजार में दहेज

    इस जहांँ के हाट में ,

    हर  चीज की बोली लगती है,

    जीव, निर्जीव क्या काल्पनिक,

    चीजें भी बिकती हैं,

    जो मिल न सके वही ,

    चीज लुभावनी लगती है,

    पहुँच से हो बाहर तो,

    चोर बाजारी चलती है,

    हो जिस्म का व्यापार या,

    दहेज लोभ में नारी पर अत्याचार,

    धन पाने की चाहे में,

    करता इन्सान संसार के बाजार में,

    सभी हदों को पार,

    दहेज प्रथा ने बनाया,

    नारी जहांँ में मोल-भाव की चीज,

    ढूँढ रही नारी सदियों से,

    अपनी अस्तित्व की थाह,

    सृष्टि के निर्माण में है,

    उसका अमूल्य योगदान,

    फिर भी देती आ रही,

    अपनी अस्तित्व का प्रमाण,

    सदियों से होती आ रही,

    उसकी अस्मिता तार-तार,

    फिर भी नहीं थकती,

    न हारती, होती सशक्त हर बार,

    ये संसार नहीं , चोरो  का है बाजार ,

    लाख बनाए दुनिया दहेज को,

    नारी को गिराने का हथियार,

    नहीं मिटा ,न गिरा सकेगा,

    नारी को कोई भी हथियार ।।

     


     

     

     

     

     

  • रंग गुलाल

    रंग गुलाल के बादल छाये
    रंगो में सब लोग नहाये
    देवर भाभी जीजा साली
    करें ठिठोली खेलें होली

    बोले होली है भई होली
    खायें गुजिया और मिठाई
    घुटे भांग और पिये ठंडाई
    गले मिलें जैसे सब भाई

    भांति भांति के रंग लुभावन
    प्रेम का रंग सबसे मन भावन
    प्रेम के रंग में सब रंग जाएँ
    जीवन को खुशहाल बनाएँ

    खेलें सभी प्रेम से होली
    बोलें सभी स्नेह की बोली
    मिलें गले बन के हमजोली
    ऐसी है अनुपम ये होली

  • होली है रंगों का खेल

    होली है रंगों का खेल

    होली है रंगों का खेल

    आवो खेले मिल के खेल

    देखो खेल रही है होली

    ये आसमा ये धरथी हमारी  

    आवो मिल के रंग चुराये

    सबको मिल के रंग लगाए

    रंग सच्चाई का आसमा से लाए

    रंग खुसी का हरयाली से चुराये

    रंग चेतना का सूर्य मे पाये

    रंग प्यार का फूलों से भर आए

    रंग सादगी का चाँद से ले आए

    आवो मिल रंग चुयारे

    सबको मिल के रंग लगाए

    मैं रंग जाऊँ तेरे रंग मैं

    तू मेरा रंग हो जाओ

    ओड़ तुझे मैं

    तन मन मे

    रंग दूँ मैं सारा बंधन

     एक रंग हैं सचाई का

    एक रंग अच्छाई का 

    ———————–

                                                                       -Dinesh Kumar-

  • होली की टोली

    होली पे मस्तों की देखो टोली चली,
    रँगने को एक दूजे की चोली चली,
    भुलाकर गमों के भँवर को भी देखो,
    आज गले से लगाने को दुनीयाँ चली,
    हरे लाल पिले गुलाबी और नीले,
    अबीर रंग खुशयों के उड़ाने चली,
    भरकर पिचकारी गुब्बारे पानी के,
    तन मन को सबके भिगाने ज़माने के,
    हर गली घर से देखो ये दुनियां चली॥
    राही (अंजाना)

  • आओ रंग लो लाल

    आओ रंग ले एक दूसरे को,

    बस तन को नहीं मन को भी रंग ले….

    हर भेदभाव जात-पात को रंग ले

    धर्म के नाम को रंग ले।

    मिला ले सबको एक रंग में

    वो रंग जो है मेरे तेरे प्यार का

    हर सरहद से पार का

    धरती से ले कर उस आकाश का

    रंग दो सबको उस रंग में।।

    सिर्फ अपना नही उस नन्ही परी का मुँह मीठा कराओ

    उस गरीब के घर तक भी रंग को पहुचाओ

    उस माँ के खाली दामन में भी ख़ुशी थोड़ी तुम डाल आओ।।

    सिर्फ अपनों को नहीं सबको रंग दो

    हर सपने को रंग दो

    हर पल को रंग दो

    हर रंज और नफरत को रंग दो

    सब कुछ लाल रंग दो मोह्ब्बत का लाल

    तेरे और मेरे सबके हर मज़हब धर्म का रंग लाल

    अमीरी और गरीबी का लाल

    ऊंच नीच का लाल

    फिर हर तरफ होगा लाल बस मोहब्बत का लाल

    और हर तरफ होगी होली

    बस खुशियों की टोली।।।।

    धन्यावाद

    द्वारा

    ज्योति भारती

     

     

  • आओ तन मन रंग लें

    आओ तन मन रंग लें

    चली बसंती हवाएँ ,

    अल्हड़ फागुन संग,

    गुनगुनी धूप होने लगी अब गर्म,

    टेसू ,पलाश फूले,

    आम्र मंज्जरीयों से बाग हुए सजीले,

    तितली भौंरे कर रहे ,

    फूलो के अब फेरे ,

    चहुंँ दिशाओं में फैल रही,

    फागुन की तरूणाई,

    आओ तन मन रंग लें,

    हम मानवता के रंग ,

    भेद-भाव सब भूल कर,

    आओ खेलें रंगों का ये खेल ,

    प्रेम , सौहार्द के भावों से,

    हो जाए एक-दूजे का मेल,

    होली पर्व नहीं बस रंगो का खेल,

    प्रेम , सौहार्द के भावों का है ये मेल ।।

     

     

     

  • सूखे नहीं थे धार आंशु के, पड़ गए खेतों मे फिर सूखे

    सूखे नहीं थे धार आंशु के
    पड़ गए खेतों मे फिर सूखे  (more…)

  • माटी मेरी पूछ रही  है मुझसे

    माटी मेरी पूछ रही  है मुझसे

    दो घूँट पानी कब मिलेगा?

    बहाने मत बना

    दम निकला जा रहा है

    जल्दी बता

    पानी कब मिलेगा

    कैसे मैं अंकुरित कर दूं

    अन्न के दानो को

    कैसे मैं विश्वास कर लूँ

    कि पानी कल मिलेगा

     

    वैसे  लगता तो नहीं

    कि अबकी बार

    मेरी माटी को जल मिलेगा

    लेकिन मैं भरोसा दिला रहा हूँ

    माटी को

    कि पानी जल्द ही मिलेगा

    क्योंकि मैं जानता हूँ

    कि इस माटी की प्यास बुझाकर ही

    इस आस्मां को

    सकून का कोई पल मिलेगा

     

                                                           -कुमार बंटी

  • बारिश का इंतज़ार

    लगाकर टकटकी मैं किसी के इंतज़ार बैठा हूँ,
    भिगा देगी जो मुझ किसान की धरती मैं उसी के एहतराम में बैठा हूँ,
    बेसर्ब बंज़र सी पड़ी है मेरे खेतों की मिट्टी,
    मैं आँखों में हरियाले ख़्वाबों के मन्ज़र तमाम लिए बैठा हूँ॥
    राही (अंजाना)

  • सूखी धरती सूना आसमान

    सूखी धरती सूना आसमान

    सूखी धरती सूना आसमान,

    सूने-सूने किसानों के  अरमान,

    सूख गयी है डाली-डाली ,

    खेतों में नहीं  हरियाली,

    खग-विहग या  हो माली,

    कर रहे घरों  को खाली,

    अन्नदाता किसान हमारा,

    खेत-खलियान है उसका सहारा,

    मूक खड़ा  ये  सोच रहा है,

    काश  आँखों में हो  इतना पानी,

    धरा को दे  देदूँ मैं हरियाली,

    अपलक आसमान निहार,

    बरखा की करे गुहार,

    आ जा काले बादल आ,

    बरखा रानी की पड़े फुहार,

    धरती मांँ का हो ऋंगार,

    हम मानव हैं बहुत नादान,

    करते प्रकृति से छेड़छाड़,

    माना  असंवेदनशील हैं हम मानव,

    पर तुम तो हो पिता समान,

    बदरा-बिजली लाओ आसमान,

    बरखा बिन है कण-कण बेहाल,

    ताल-तलैया सूख रहें हैं,

    भँवरे, मेंढक, तितली, कोयल,

    मोर, पपीहा सब कर रहे पुकार,

    आओ बरखा रानी आओ,

    जीवन में हरियाली लाओ,

    सूखी धरती सूना आसमान,

    सूने-सूने किसानों के अरमान ।।
    (more…)

  • ख़्वाबों की बंज़र ज़मी

    देख लूँ एक बार इन आँखों से बारिश को,
    तो फिर इन आँखों से कोई काम नहीं लेना है,
    बंजर पडे मेरे ख़्वाबों की बस्ती भीग जाए एक बार,
    तो फिर इस बस्ती के सूखे हुए ख़्वाबों को कोई नाम नहीं देना है,
    चटकता सा खटकता है ये दामन माँ मेरी धरती,
    सम्भल कर के बहल जाए फसल जो रूप खिल जाए,
    तो फिर धरती के आँगन से कोई ईनाम नही लेना है॥
    राही (अंजाना)

  • सूखी है जमीन

    सूखी है जमीन, सूखा आसमान है
    मगर उम्मीद है कायम, जब तक जान है

  • खोज…

    खोजते है बचपन अपना ,
    ढूंढते है नादानी अपनी ,
    कूड़े के ढ़ेर को समझते है
    कहानी अपनी !
    देखकर मुझको वैसे तो दया सब
    दिखाते है, पर
    जब कोई गलती हो जाए, तो
    पढ़े-लिखे बाबू भी गालियां दे जाते है !
    कोड़े का ढ़ेर किसी को पैदा नहीं करता , साहब
    हम भी किसी की ओलाद है
    सिर्फ गरीबी के नहीं मारे हम,
    हम आप सबकी ख़ामोशी के भी शिकार है !
    इसलिए कोड़े के ढ़ेर मे बचपन खोज रहे है,
    गलतफहमी है की कूड़ा बीन रहे है !

  • बच्चे हम फूटपाथ के

    बच्चे हम फूटपाथ के

    बच्चे हम फूटपाथ के,

    दो रोटी के वास्ते,

    ईटे -पत्थर  तलाशते,

    तन उघरा मन  बिखरा है,

    बचपन  अपना   उजड़ा है,

    खेल-खिलौने हैं हमसे दूर,

    भोला-भाला  बचपन अपना,

    मेहनत-मजदूरी करने को है मजबूर

    मिठई, आईसक्रीम और गुबबारे,

    लगते बहुत लुभावने ,

    पर बच्चे हम फूटपाथ के,

    ये चीजें नहीं हमारे  वास्ते,

    मन हमारा मानव का है,

    पर पशुओं सा हम उसे पालते,

    कूड़ा-करकट के बीच,

    कोई मीठी गोली तलाशते,

    सर्दी-गर्मी और बरसात,

    करते हम पर हैं वर्जपात,

    पग -पग काँटे हैं चुभते,

    हम फिर भी हैं हँसते,

    पेट जब भर जाए कभी,

    उसी दिन त्योहार है समझते,

    दो रोटी के वास्ते पल-पल जीते -मरते,

    बच्चे हम फूटपाथ के ।।

  • बचपन गरीब

    यूँ तो हर रोज गुजर जाते हैं कितने ही लोग करीब से,
    पर नज़र ही नहीँ मिलाते कोई इस बचपन गरीब से,
    रखते हैं ढककर वो जो पुतले भी अपनी दुकानों में,
    वो देखकर भी नहीं उढ़ाते एक कतरन भी किसी गरीब पे,
    बचाते तो अक्सर दिख जाते हैं दो पैसे फकीर से,
    पर लगाते नहीं मुँह को दो रोटी भी किसी बच्चे गरीब के॥
    राही (अंजाना)

  • गरीबी का बिस्तर

    गरीबी है कोई तो बिस्तर तलाश करो,
    रास्तों पर बचपन है कोई घर तलाश करो,
    कचरे में गुजर रही है ज़िन्दगी हमारी,
    कोई तो दो रोटी का ज़रिया तलाश करो,
    यूँ तो बहुत हैं इस ज़मी पर बाशिन्दे,
    मगर इस भीड़ में कोई अपनों का चेहरा तलाश करो,
    खड़े हैं पुतले भी ढ़के पूरे बदन को दुकानों में,
    जो ढ़क दे हमारे नंगे तन को वो कतरन तलाश करो॥
    राही (अंजाना)

  • गरीबी में जलते बदन

    दे कर मिट्टी के खिलौने मेरे हाथ में मुझे बहकाओ न तुम,

    मैं शतरंज का खिलाड़ी हूँ सुनो, मुझे सांप सीढ़ी में उलझाओ न तुम,

    जानता हूँ बड़ा मुश्किल है यहाँ तेरे शहर में अपने पैर जमाना,

    मगर मैं भी ज़िद्दी “राही” हूँ मुझे न भटकाओ तुम,

    बेशक होंगे मजबूरियों पर टिके संबंधों के घर तुम्हारे,
    मगर मजबूत है रिश्तों पर पकड़ मेरी इसे छुड़ाओ न तुम,

    माना पत्थर दिल हैं लोग बड़े इस ज़माने में तोड़ना मुश्किल है,

    मगर महज मोम हूँ मैं तो पिघल ही जाऊंगा, मुझे इस बेरहमी से जलाओ न तुम॥

    राही (अनजाना)

  • चाय का बहाना

    आओ बैठो संग मेरे एक एक कप चाय हो जाए,
    फिर से बीते लम्हों की चर्चा खुले आम हो जाए,
    कह दूँ मैं भी अपने दिल की, कहदो तुम भी अपने दिल की,
    और फिर तेरे मेरे दिल का रिश्ता सरेआम हो जाए,
    वैसे तो हर रात होती रहती है ख़्वाबों में मुलाक़ात तुझसे,
    चल आज चाय की चुस्की के बहाने नज़ारा कुछ ख़ास हो जाए॥
    राही (अंजाना)

  • आज कुछ चाय पे चर्चा हो जाये|

    आज कुछ चाय पे चर्चा हो जाये|

    आज कुछ चाय पे चर्चा हो जाये
    दिल के राज जो छुपे बैठे है अरसे से
    उनसे कुछ गुफ़्तगू हो जाये
    इससे पहले उम्र ए दराज धोखा दे
    ले ले कुछ लफ्जों का सहारा
    कहीं लाठी का सहारा ना हो जाये
    आज कुछ चाय पे चर्चा हो जाये|

  • Untitled post 16779

    कितने ही दिन गुज़रे हैं पर, ना गुजरी वो शाम अभी तक;
    तुम तो चले गए पर मैं हूँ, खुद में ही गुमनाम अभी तक!
    .
    तुम्ही आदि हो,…तुम्ही अन्त हो,…तुमसे ही मैं हूँ, जो हूँ;
    ये छोटी सी बात तुम्हें हूँ, समझाने में नाकाम अभी तक!
    .
    कैसे कह दूँ, …तुम ना भटको, …मैं भी तो इक आवारा हूँ;
    शाम ढले मैं घर न पहुँचा, है मुझपे ये इल्ज़ाम अभी तक!
    .
    प्यार से, ‘पागल’ नाम दिया था, तूने जो इक रोज़ मुझे;
    तुम तो बेशक़ भूले हो पर, सब लेते हैं वो नाम अभी तक!
    .
    तूने जो भेजा था ख़त मुझको, मेरे इक ख़त के जवाब में;
    पढ़ा नहीं, पर रक्खा है, ‘अक्स’ मैंने वो पैग़ाम अभी तक!!…#अक्स

    .

     

  • चुस्की चाय की

    वही चाय के दो कप और एक प्लेट लौटा दे,
    कोई तो तेरे साथ बीते पलों को वापस लौटा दे,
    एक चाय के कप का बना कर झूठा बहाना,
    वो तेरा रोज रोज मेरे घर चले आना लौटा दे,
    तेरे साथ बैठ कर वो नज़रें मिलाना,
    वो चाय की चुस्की वो वक्त पुराना लौटा दे॥
    राही (अंजाना)

  • महफ़िल-ए-चाय

    मैं मान लेती हूँ, की तुम्हे
    मेरी याद नहीं आती , पर
    वो महफ़िल-ए-चाय तो याद आती होगी !
    वो शाम की रवानगी ,
    वो हवा की दिवानगी,
    वो फूलो की मस्तांगी ,
    याद न आती हो , पर
    वो चाय की चुस्की की
    आवाज तो याद आती होगी !
    याद ना आती हो तुमको
    गूफ्तगू-ए-महफिल , पर
    निगाहों की शरारते तो
    याद आती होगी !
    मैं मान लेती हूँ , की तुम्हे
    मेरी याद नहीं आती , पर
    वो महफिल-ए-चाय तो याद आती होगी !
    हर शाम चाय के साथ
    अखबार पढ़ना , आदत है तुम्हारी
    चाय का प्याला गर्म है ,
    ये देखना याद नहीं रहता तुम्हे, पर
    चाय से आज भी जब
    तुम्हारे होंठ जलते होंगे , तो
    मेरी फ़िक्र तो याद आती होगी !
    मैं मान लेती हूँ, की तुम्हे
    मेरी याद नहीं आती , पर
    वो महफिल-ए-चाय तो याद आती होगी !
    (निसार )

  • चाय की प्याली

    तेरे साथ बिताई मस्ती और चाय की वो चुस्की याद आई है,
    लो आज फिर से बीते लम्हों की एक बात याद आई है,
    तेरे साथ बैठ कर जो बनाई थी बातें,
    उन बातों से फिर से दो कपों के टकराने की आवाज आई है,
    छोड़ दी थी चाय की प्याली कभी की हमने,
    मगर आज फिर से तेरे साथ चाय पीने की इच्छा बाहर आई है॥
    राही (अंजाना)

  • चंद पलों का चुनिंदापन

    जैसे

    उम्मीद की प्याली से

    चुस्की लेकर

    मानों मंज़िल की तरफ

    कोई सरिता बह जाती है

    वैसे ही

    मेरे चंद पलों का चुनिंदापन

    मुझे मिलते ही

    मेरे मन की विचारशक्ति

    कविता बनकर

    कुछ कह जाती है।

     

                                       कुमार बन्टी

     

  • Heroes of nation

    Ek rang ki chah  thi

    Ek daman ki chhav thi

    Khusub mitti ki

    Mere mathe ki shan thi

    Ek armano ki sham thi

    Ek riste ki sougat thi

    Door man mera  dol gya

    Jab khabar aayi ki vo gujar gya

    HVA ka rukh bhi badal  gya

    Na Jane vakat kyu ther  gya

    Tirnge ke liye fir ek jvan shhid ho gya

    Kyu kisi ke mathe ki bindiya ujad gyi  kyu kisi bahan se uska bhai chhot gya  kyu ma ke  keleje ka tudka aaj tirnge ke kafan me so gya

    Kyu pita ka shara  unhe chhod gya

    Aankhe nam hui seena chhoda  hua

    Desh ke liye aaj fir ek Javan bharat mata ki god me so gya

    Ye nihrate  nojvano Naman kro unhe Jo tumhe aajadi dete hai

    Apni jindi  tumhare jeevan ko surchhit  krne ke liye smarpit karte Hai
    “Veer sipahi bharat ke bhai ”

    “Dhushman se apne desh ko bchana ”

    “Dushman ki goli  ko chhati me Jo jhele  bharat ke sipahi ”

    “Bilkul bharat ke sipahi ”

    “Seema me dushman jab hunkare ”

    “Dod pade ye  sanchh skare  ”

    “Mar mar dusman ko khoob chhkaye *

    “Bharat ke sipahi ”

    “Ha bharat ke sipahi”

    We proud our soldiers

    Jay hind jay bharat

    Bharat mata ki jay


     

  • मिट्टी से जुड़े सैनिक

    आंधी और तूफानों में भी डटे रहते हैं,
    हम वो हैं जो हर मौसम में खड़े रहते हैं,
    उखड़ते हैं तो उखड़ जायें पेड़ और पौधे जड़ों से,
    हम तो वो हैं जो देश की ज़मी से जुड़े रहते हैं,
    आजाद दिख जाते हैं उड़ते परिंदे कभी,
    तो कभी बिगड़े हालात नज़र आते हैं,
    पर हम तो वो हैं जो हर हाल में तिरंगे की शान बने रहते हैं,
    धुंधली नज़र आती है जहाँ से सरहद के उस पार की धरती,
    उसी हिन्दुस्तान की मिटटी से हम हर पल जुड़े रहते हैं॥
    राही (अंजाना)

  • Veer Jawan

    Bhhanp leti hain ye aankhe aane vala hr khatra
    Iski hr saans desh k naam, desh ko samarpit hai khoon ka hr katra
    Ye mehaz banduk nahi hai iske paas , hr pal ka saathi hai
    Isike hone se hi to hum aam logo ko roz chain ki need aati hai
    Naa koi swarth hai naa koi abhiman hai
    Ye koi aur nahi hindustan ka Veer Jawan hai
    Ye jo vardi iske tan pr nazar aati hai
    Mehaz vardi nahi iski shaan ko darshati hai
    Kt jae chahe sir par vardi ka badhana maan hai
    Ese veero k hone se hi to bharat desh mahaan hai
    Ye koi aur nahi hindustan ka Veer Jawan hai
    Chahe karni ho sarhad pr pehredaari
    Ya ho siyacheen ki barfbaari
    Isne hr pal dikhai hai eemandari
    Apne seene pr jheli goliyan hazar aur kri hai raksha humari
    Ek Hindustani ka aaj Hindustan k prehri ko pranam hai
    Ye koi aur nahi hindustan ka Veer Jawan hai

  • फौलादी फौजी

    हाथ में हथियार और दिल को फौलाद किये बैठे हैं,
    सरहद के हर चप्पे पर हम बाज की नज़र लिये बैठे हैं,
    जहाँ सो जाता है चाँद भी चैन से हर रात में,
    वहीं खुली आँखों में अमन का हम सपना लिए बैठे हैं,
    ठण्ड से सिकुड़कर सिमट जाते हैं हौंसले जहाँ,
    वहीं बर्फीली चादर में भी उबलता जिगर लिए बैठे हैं,
    डर कर अँधेरी गलियों से भी नहीं गुजरते जहाँ कुछ लोग,
    वहीं हम सैनिक हर लम्हा दुश्मनों के बीच फंसे बैठे हैं॥
    राही (अंजाना)

  • जांबाज सैनिक

    धूप हो या छाया आंधी हो या तूफान

    करते रहते हैं हम देश की सुरक्षा दिन हो  चाहे रात

    मैं हूं इस  देश का सैनिक जो

    कभी भी झुकने नहीं देते हमारे देश की मान

    मैं बॉर्डर पर पड़ा रहता हूं,
    घनघोर घन, शीत आतप सहता हूं,
    मैं जो जाता हूं जब भी काम पर,
    सिल जाते हैं होंठ बीवी के, भर जाती है आंख मां की,
    और पापा वापस आएंगे
    का चर्चा रहता है बच्चों की जुबान पर।

    Written by Shubham

  • जाबाज सैनिक

    धूप हो या छाया आंधी हो या तूफान

    करते रहते देश की सुरक्षा दिन हो  चाहे रात

    ये हैं हमारे देश के सैनिक जो

    कभी भी झुकने नहीं देते हमारे देश की मान  (more…)

  • सैनिक कहलाते हैं हम

    माँ की गोद छोड़, माँ के लिये ही वो लड़ते हैं,
    हर पल हर लम्हां वो चिरागों से कहीं जलते हैं,
    भेजकर पैगाम वो हवाओं के ज़रिये सपनों में अपनी माँ से मिलते हैं,
    हो हाल गम्भीर जब कभी कहीं वो,
    चुप रहकर ही खामोशी से सरहद के हर पल को बयाँ करते हैं,
    लड़कर तिरंगे की शान की खातिर,
    वो तिरंगे में ही लिपट कर अपना जिस्म छोड़ते हैं,
    जो करते हैं बलिदान सरहद पर,
    वो सैनिक सैनिक सैनिक कहलाते हैं हम॥

    राही (अंजाना)

  • वो हिन्द का सपूत है..

    वो हिन्द का सपूत है..

    लहू लुहान जिस्म रक्त आँख में चड़ा हुआ..
    गिरा मगर झुका नहीं..पकड़ ध्वजा खड़ा हुआ..
    वो सिंह सा दहाड़ता.. वो पर्वतें उखाड़ता..
    जो बढ़ रहा है देख तू वो हिन्द का सपूत है..

    वो दुश्मनों पे टूटता है देख काल की तरह..
    ज्यों धरा पे फूटता घटा विशाल की तरह..
    स्वन्त्रता के यज्ञ में वो आहुति चढ़ा हुआ..
    जो जल रहा है देख तू वो हिन्द का सपूत है..

    वो सोचता है कीमतों में चाहे उसकी जान हो..
    मुकुटमणि स्वतंत्रता माँ भारती की शान को..
    वो विषभरा घड़ा उठा सामान नीलकंठ के..
    जो पी रहा है देख तू वो हिन्द का सपूत है..

    -सोनित

  • बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ

    बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ

    जिम्मेंदारी को जब उसने महसूस किया तो,
    ऑटो रिक्शा भी चलाने लगती हैं वो !
    पढ़ लिख के सक्षम होकर के वो अब,
    अंतरिक्ष में वायुयान उड़ाने लगती हैं वो !!

    कितने उदाहरण देखेंगे आप अब क्योकि,
    हर क्षेत्र में सकती आजमाने लगी हैं वो !
    पति की शहादत पे अर्थी को कांधा दे,
    सुना हैं शमशान तक जाने लगी हैं वो !!

    समस्त बाधाओं को वो हरती क्यों हैं,
    कुछ बोलने से पहले वो डरती क्यों हैं !
    प्रश्न ये ज्वलनशील है सबके सामने ये,
    जन्म लेने से पहले कोख में मरती क्यों हैं !!

  • बेटी की चाहत

    अँधेरे कमरे से बाहर अब मैं निकलना चाहती हूँ,
    माँ की नज़रों में रहकर अब मैं बढ़ना चाहती हूँ,
    धुंधली न रह जाए ये जिन्दगी मेरी, यही वजह है के मैं अब पढ़ना चाहती हूँ,
    खड़ी हैं भेदभावों की दीवारें यहाँ अपनों के ही मध्य,
    मैं मिटा कर मतभेद सबसे जुड़ना चाहती हूँ,
    दबा रहे हैं जो आज मेरी देह की आवाज को,
    अब धड़कन ऐ रूह भी मैं उनको सुनाना चाहती हूँ॥
    राही (अंजाना)

  • एक ख्वाहिश मेरी भी

    ख़्वाब देखती है आँखै मेरी भी
    उड़ना चाहती हु मै भी
    पढू , लिखू बनू अफसर मै भी
    आकाश मै उड़ता जहाज देखू मै जब भी
    साथ वो अपने मुझे ले जाता है
    पढ़ने , लिखने का जो तुम
    मुझको एक मौका दे दो
    है तो हक़ मेरा , पर तुम
    अपनी जायदाद समझकर देदो
    एक रोज अफसर बन
    तुमको भी जहाज मै बिठा
    आकाश की सैर कराऊँगी मै
    मुझे न सही मेरी, ख्वाहिश को अपना समझ लो
    बेटो को तो आजमा लिया सबने ,
    अब मुझको भी अपनी अजमाइस का एक मौका दे दो !

  • बेटी हूँ हां बेटी हूँ

    बचपन से ही सहती हूँ,
    मैं सहमी सहमी रहती हूँ,
    छुटपन में कन्या बन कर संग माँ के मैं रहती हूँ,
    पढ़ लिखकर मैं कन्धा बन परिवार सम्भाले रखती हूँ,
    फिर छोड़ घोंसला अगले पल मैं पति घर में जा बसती हूँ,
    पत्नी रूप में भी मैं हर बन्धन में बन्ध कर रहती हूँ,
    खुद के ही पेट से फिर माँ बनकर मैं (बेटी) जन्म अनोखा लेती हूँ,
    पढ़ जाऊ तो नाम सफल और जीवन सरल कर देती हूँ॥
    बचपन से ही सहती हूँ,
    मैं सहमी सहमी रहती हूँ,
    मैं बेटी हूँ मैं बेटी हूँ मैं हर रंग में ढलकर रहती हूँ॥
    राही (अंजाना)

  • बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ

    बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ

     

    माँ,मैं तेरे हर सपने को सच करके दिखाउंगी
    तेरे हर मुसीबत मे तेरे, मैं भी काम आउंगी
    रोशन कर दूंगी मैं तेरा नाम इस दुनिया मे
    मुझे भी आने दे माँ, इस दुनिया मे

    माँ,मैं तुझे कभी नहीं सताऊँगी
    तेरे होंठों पर हमेशा मुस्कराहट खिलाऊंगी
    कर दूंगी मैं भी कुछ ऐसा काम इस दुनिया मे
    मुझे भी आने दे माँ, इस दुनिया मे

    माँ,मैं तेरी ज़िन्दगी जीने की वजह बन जाऊंगी
    तेरे बुढ़ापे मे, मैं तेरी लाठी कहलाउंगी
    सब देखते रह जाएंगे तेरी इस बेटी को इस दुनिया मे
    मुझे भी आने दे माँ, इस दुनिया मे

    माँ,मैं तेरा घर के कामो मे भी हाथ बटाउंगी
    तेरे हर सुख-दुःख मे तेरा साथ निभाऊंगी
    मिसाल बन जाऊंगी मैं इस दुनिया मे
    मुझे भी आने दे माँ, इस दुनिया मे

    माँ, मैं हर कक्षा मे अव्वल आउंगी
    तेरा और बाबा का सर शान से उठाउंगी
    सब शाबासी देंगे तेरी बेटी को इस दुनिया मैं
    मुझे भी आने दे माँ, इस दुनिया मे

    माँ, मैं तेरे ही शरीर का एक हिस्सा हू
    तेरी अंतरात्मा का ही एक किस्सा हू
    न कर विदाई मेरी मुझे मार कर इस दुनिया मे
    मुझे भी आने दे माँ, इस दुनिया मे

    “देव कुमार”

  • बेटी की आवाज

    माँ की कोख में ही दबा देते हो,
    मुझको रोने से पहले चुपा देते हो,
    आँख खुलने से पहले सुला देता हो,
    मुझको दुनियां की नज़र से छुपा देते हो,
    रख भी देती हूँ गर मैं कदम धरती पर,
    मुझको दिल में न तुम जगह देता हो,
    आगे बढ़ने की जब भी मै देखूं डगर,
    मेरे पैरों में बेडी लगा देते हो,
    पढ़ लिख कर खड़ी हो न जाऊं कहीं,
    मुझको पढ़ाने से जी तुम चुरा लेते हो,
    क्यों दोनों हाथों में मुझको उठाते नहीं,
    आँखों से अपनी मुझको बहा देते हो॥
    राही (अन्जाना)

  • मुझको बचाओ मुझको पढ़ाओ

    कन्या बचाओ
    खुद कन्या कहती है-

    मुझको बचाओ तुम मुझको बचाओ,
    सपना नहीं अब हकीकत बनाओ,
    बेटा और बेटी का फर्क मिटाओ,
    बेटी बचाओ अब बेटी पढ़ाओ,
    बेटे के प्रति प्यार और बेटी को समझें भार,
    ऐसे लोगों की गलत सोंच भगाओ,
    मुझको बचाओ तुम मुझको बचाओ,
    रखने से पहले कदम ना मेरे निशाँ मिटाओ,
    आने दो मुझको तुम सीने से लगाओ,
    फैंको ना मुझको कचरे के देर में,
    मारो ना मुझको तुम ममता की कोख में,
    घर के अपने तुम लक्ष्मी बनाओ,
    मुझको बचाओ तुम मुझको बचाओ,
    कन्धे से कन्धा मिलाकर चलूंगी,
    कभी तुमको नज़र मैं झुकाने ना दूंगी,
    हाथों में मुझको तुम अपने उठाओ,
    मुझको बचाओ तुम मुझको बचाओ,
    दुनियां के रंग तुम मुझको दिखाओ,
    मैं गर्व् से तुम्हारे सर को उठा दूंगी,
    एक बार तो मुझमें तुम विश्वार जगाओ,
    मुझको बचाओ तुम मुझको पढ़ाओ॥
    राही (अंजाना)

  • जय हिन्द

    ये  अजूबा  किसने  कर दिया
    फक्त एक मुट्ठी मैं सारा हिन्द
    इकट्ठा कर दिया
    तीन ही रंगों मैं सारा
    हिन्द बया कर दिया
    केसरी है वीरो के , बलिदानो का प्रतीक
    जिन्होंने  स्वय को समर्पित कर
    अपने लहू से तिलक कर हिन्द
    के माथे को चन्दन-सा महका   दिया !
    सफेद है उस सांति का प्रतीक
    जिसके लिये फिरती है दुनिया मारी -२
    लेकिन हिन्द गोद को इससे शुशुभित कर दिया !
    हरा रंग है उस खुशहाली का प्रतीक
    जब हिन्द की मिटटी को दुश्मन ने
    लहू -लुहान किया
    तब सुबह सूरज से भी पहले जाग
    हिन्द को  खुशहाल किया !
    चक्र का नीला रंग प्रतीक है
    उस अशोक का
    जिसकी गाथा दुनिया आज भी गाती है
    हर  माँ अपने बच्चे को उस वीर की कहानी सुनाती   है  !
    शौर्य ,शांति और  हरियाली का प्रतीक हिन्द हमारा
    इसमे बसा है सारा हिन्द हमारा !

  • रंग नहीं महज़ ये तीनो……..

    रंग नहीं महज़ ये तीनो……..

    रंग नहीं महज़ ये तीनो
    हमारे हिंदुस्तान की शान है

    झंडा है ये हमारे देश का
    तिरंगा इसका नाम है

    सर से भी ऊँचा रखेंगे हम इसको
    जब तक जिस्म में जान है

    हर पल देते है सलामी दिल से
    के ये हमारी पहचान है

    दुश्मन क्या समझेगा इसकी ताकत
    अभी वो बहुत अनजान है

    पूछो जा कर उन लोगो से
    जिनकी ज़िन्दगी तिरंगे के बिना वीरान है

    मर मिटेंगे इसके खातिर हम
    के ये हमारा गुमान है

    अशोक चक्र से सुसज्जित है ये
    हर फौजी को इसका ध्यान है

    जा देकर भी इसको झुकने नहीं देंगे
    ये हम भारतीयों का अरमान है

    सबसे प्यारा देश हमारा
    हमारा भारत महान है…………………………!!

    जय हिन्द, जय भारत
    वन्देमातरम

    D K

     

  • गणतंत्र

    गणतंत्र

    राजा-शासन गया दूर कही, गणतंत्र का यह देश है |
    चलता यहाँ सामंतवाद नहीं, प्रजातंत्र का यह देश है |

    दिया गया है प्रारब्ध देश का, प्रजा के कर में;
    किन्तु है राजनीति चल रही यहाँ सबके सर में |
    तोड़ते है और बाँटने है प्रजा को अपने धर्म से,
    विमुख करने देश की प्रजा को निज कर्म से |

    यद्यपि है शक्ति आज भी प्रजा के साथ,
    यदि मिल जाए समस्त भारतीयों के हाथ;
    जोड़ी जा सकती है शक्ति एक मुष्टि में,
    बज सकता है डंका अपना भी सृष्टि में |

    यदि मिल कर बनाये हम ऐसा गणतंत्र,
    जो हो सर्वोच्च-शक्तिमान-श्रेष्ठ प्रजातंत्र |
    अंततः यही है हमारा भारत, हमारी मातृभूमि;
    कर्तव्य है हमारा इसे बनाना हमारी कर्मभूमि |

    -Bhargav Patel (अनवरत)

  • मुठ्ठी में तकदीर

    मुठ्ठी में तकदीर

    मुठ्ठी में तकदीर है मेरी, मेरे वतन की
    कर ले कोई कितनी भी कोशिश
    मिटा नहीं सकता|

    क्या करेगा वो इन्सान आखिर
    जो देश का राष्टगान भी
    गा नहीं सक्ता||

  • कचरेवाली

    कचरेवाली

    इक कचरेवाली रोज दोपहर..
    कचरे के ढेर पे आती है..
    तहें टटोलती है उसकी..
    जैसे गोताखोर कोई..
    सागर की कोख टटोलता है..

    उलटती है..पलटती है..
    टूटे प्लास्टिक के टुकड़े को..
    और रख लेती है थैली में..
    जैसे कोई टूटे मन को..
    इक संबल देकर कहता है..
    ठुकराया जग ने दुःख मत कर..
    ये हाथ थम ले..तर हो जा..
    इक कचरेवाली रोज दोपहर..
    कचरे के ढेर पे आती है..

    जहाँ शहर गंदगी सूँघता..
    वहाँ वही जिंदगी सूँघती..
    कूड़े की संज्ञा में कितनी..
    कमियाँ वह हर रोज ढूंढती..
    हर कूड़े को नवजीवन का..
    आशीष दिलाने आती है..
    दूषित होती हुई धरा का..
    दर्द सिलाने आती है..
    इक कचरेवाली रोज दोपहर..
    कचरे के ढेर पे आती है..

                                            -सोनित

  • कूड़े का ढेर

    कूड़े का ढेर

    जिसे कहते हो तुम कूड़े का ढेर;
    वह कोई कूड़ा नहीं!
    वह है तुम्हारी, अपनी चीजो का ‘आज’ |
    जिसे खरीदकर
    कल तुमने बसाया था घर में;
    उन्ही चीजो का है यह ‘आज’ |
    जिस जगह
    तुम उड़ेल देते हो अपना कल;
    उसी कूड़े के ढेर में खोजते है कुछ लोग
    अपना आज |

    जिन्हें ‘बेकार’ कहकर
    फैंक देते हो तुम कचरे में,
    उसी अपव्यय में तलाशते है कुछ लोग
    अपना बहुमूल्य रजत-कंचन |
    उनके थैलो में भरी हुई
    बासी, बदबूदार, बेकार चीजे
    उनके लिए कोई कूड़ा नहीं;
    भरते है वे प्रतिदिन
    उन मैले थैलो में अपनी रोटियाँ |

    वह भूखा-नंगा बच्चा
    जो बैठता है अपनी माँ के आँचल में,
    जाड़े की कातिल ठण्ड में ठिठुरता!
    जरा देखो!
    देखो उसकी उदासीन आँखों में!
    कैसे वह एक
    फटे हुए कपडे की गर्माहट में
    छिप जाना चाहता है!

    क्षुधा से पीड़ित
    वह बिमार बूढा!
    जो उठा रहा है अपने सामर्थ्य से अधिक बोझ
    अपने उन जीर्ण कंधो पर!
    चाहता है वह कि आज
    उसे सोना न पड़े खाली पेट!
    कि कही थोड़ा-सा अधिक बोझ
    उसे आज की रोटी कमा कर दे दें!

    ज़रा देखो दृश्य अम्लान!
    जिस अमीरी को तुम
    रास्तो पर फैंक देते हो,
    बेझिझक,
    कूड़ा बना कर;
    उस कचरे के ढेर में,
    कुछ लोग
    अपनी गरीबी मिटाने का उपाय ढूँढते है |
    जिसे कहते हो तुम कूड़े का ढेर;
    वह कोई कूड़ा नहीं!
    वह तुम्हारा, खुद का,
    ‘आज’ है!

  • बचपन

    बचपन

    जो बेबसी देख रहे हैं हम आज उनके चेहरो में ,

    वो ढूंढेंगे दो वक्त की रोटी कूड़े पड़े जो शहरों में !
    जात,पात,दुनियादारी उन्हें इन सबसे मतलब क्या,
    पेट की आग बुझाने को वो चल पड़ते हैं अंधेरों में !!
    शिक्षा,प्यार,खिलौना आदि ये शब्द वो जाने भी कैसे,
    जिनकी जिंदगी बीत जाती है इन कूड़ों की ढेरों में !!
    जिंदगी उनकी भी सुधरनी चाहिये ये सच तब होगा,
    उन्हें अपना बचपन मिल जाये एक नए से सवेरों में !!
    @नितेश चौरसिया 
  • बचपन

    बचपन

     

    जो बेबसी देख रहे हैं हम आज उनके चेहरो में ,

    वो ढूंढेंगे दो वक्त की रोटी कूड़े पड़े जो शहरों में !
    जात,पात,दुनियादारी उन्हें इन सबसे मतलब क्या,
    पेट की आग बुझाने को वो चल पड़ते हैं अंधेरों में !!
    शिक्षा,प्यार,खिलौना आदि ये शब्द वो जाने भी कैसे,
    जिनकी जिंदगी बीत जाती है इन कूड़ों की ढेरों में !!
    जिंदगी उनकी भी सुधरनी चाहिये ये सच तब होगा,
    उन्हें अपना बचपन मिल जाये एक नए से सवेरों में !!
    @नितेश चौरसिया 

New Report

Close