आयो कान्हा देखि मोहे तोरे संगी साथी
कुछ भाग चलत, कुछ ले परदे कि आड़
छुप खम्ब कि ओट देखत मोहे कि
आज मेरो पकड़ में आयो कान्हा
जब यह आया चुपके से माखन खाने को
आज पकड़ में आयो कान्हा
Category: Poetry on Picture Contest
Submission for ‘Poetry on Picture’ Contest
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आज पकड़ में आयो कान्हा
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नटखट, ओ लल्ला मोरे
नटखट, ओ लल्ला मोरे तू काहें मोहे खिझायों।
संग सखा तू पुनि-पुनि मटकी पर नज़र लगायो।।
सब ग्वालन से मिलकर झटपट माखन खायो।
नटखट ओ लल्ला मोरे तू काहें मोहे खिझायों।।मैया, ओ प्यारी मैया मैं मन को न रोक पायो।
मटकी में माखन देख जी ललचाओ।।
तू तो जानत हैं मोहे माखन बहुत सुहायो।नटखट कान्हा मोरे, तिन्ही सकल हृदय में बस जायो।
तोरी मधुर बोली मोरे कानों को अति सुहायो।।
मनमोहक रूप को देख मोरे नयन तोहे निहारत जायो।
अद्भुत अखियन तिन्ही पाई, देखत ही इन कमल नयनों को इन्हीं में संसार खो जायो।।
झील-सी इन अखियन में तोरी मैया सुध भूल जायो।
इहि खातिर यर मैया तोरी तोहे खुल के न डाट पायो।।
ओ लल्ला, ओ कान्हा मोरे तू काहें मोहे खिझायों।। -
माखन चोर 🙏
छूप छूप के खाये माखन
है ये माखन चोर
बड़ा नटखट है
प्यारा नंद किशोरघुसे घर में मित्रो के संग
देखी माखन की मटकी
देखा खूब सारा माखन
सबकी नज़र उसी पे अटकीखाये माखन मस्ती में मित्रो के साथ
देखा आ रही माँ यशोदा
भागे सब इधर उधर
बच गए सब
बस माखन चोर का पकड़ लिया हाथपकड़ के कान्हा के कान को दिया कस
बह रहा कटोरी से माखन का रस
बोले क्यों नहीं समझता तू
बहुत बदमाशी करली अब बसछलका के आंसू
दिखाई भगवन ने लीला
देख आंसू माता ने
अपना हाथ कर दिया ढीलामन मोहित रूप देख
माँ ने लगाया नंदलाल को गले
माता का सुख पाके
फिर कान्हा माखन चोरी करने चले– हिमांशु ओझा
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कुछ नया करते
चलो कुछ नया करते हैं,
लहरों के अनुकूल सभी तैरते,
चलो हम लहरों के प्रतिकूल तैरते हैं ,
लहरों में आशियाना बनाते हैं,
किसी की डूबती नैया पार लगाते हैं lचलो कुछ नया करते हैं,
दुश्मनों की आँखों का सूरमा नहीं,
आँखे निकाल लाते हैं,
चलो दुश्मनों से दुश्मनी निभाते,
दोस्तों पे कुर्बान हो जाते हैं lचलो कुछ नया करते हैं,
दूसरों का श्रेय लेना बंद करते हैं,
पीठ – पीछे तारीफ करते हैं,
चलो साजिश करना बंध करते,
प्रेमभाव बढ़ाते हैं lचलो कुछ नया करते हैं,
असामाजिक तत्व को आंख दिखाते,
फ़न मारने से पहले फ़न कुचलते हैं,
चलो बुराई के खिलाफ लठ उठाते हैं,
पीड़ित का सहारा बन जाते हैं lचलो कुछ नया करते हैं,
हार के बाद भी सबके दिलों को छू जाते हैं,
एक और कोशिश करते हैं,
चलो जीवन को लचीला बनाते हैं,
हर सुबह नई चुनौती का स्वागत करते हैं,चलो कुछ नया करते हैं ,
फ़िजा में नई उमंग घोलते है,
जीवन में उल्लास भरते हैं,
जो जीना भूल गए हैं,
हर पल को जीना सिखाते हैं lचलो कुछ नया करते हैं ,
जिंदगी को यूंही नहीं खोते,
दो दिन की जिंदगी है,
कुछ खास करके जाते हैं,
चलो कुछ पल अपने लिए जीते हैं lचलो कुछ नया करते हैं,
मुझे क्या पड़ी है….. अब बोलना छोड़ दो,
जुल्म ढाने वाले को, बलून की तरह फोड़ दो,
चलो कुछ नया करते हैं ……. lRajiv Mahali
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संजना
सावन में ए सखी, खनके क्यों कँगना।
कोयलिया गीत सुनाए ,क्यों मेरे घर अँगना।।
बार बार दिल धड़काए, प्यास जगाए।
जाने क्या करेगी, मेरी नादान ए कँगना।।
जब सुनती हूँ, “ए शोभा पियु कहाँ ” की मीठी स्वर।
तब न पूछ सखी , घायल हो जाती है ए संजना।। -
गरीबी
गरीबी एक एहसास है,
इसमें एक मीठी सी दर्द है,
रोज़ की दर्द में भी संतोष छिपी है,
फकीरी में अमीरी का एहसास है,
शायद यही गरीबी है lमुर्गे की बांग से सुबह जग जाना,
नई उलझनों में फंस जाना,
उलझनों को सुलझाने की कोशिश करना,
पक्षी की चहक के साथ घर वापिस आना,
शायद यही गरीबी की पहचान है lगरीबी में न टूटना,
जरूरतों मे भी न झुकना,
ज़रूरतों को कर्म से पूरी करना,
विफलताओं में ईश्वर को कोसना,
शायद यही गरीबी रेखा है lकल की राशन को आज सोचना,
बच्चों को गले लगा नीत काम में निकल जाना,
नीर पी दिवा बिता लेना,
फिर बच्चों के लिए कुछ लाना,
उनकी हंसी से थकान दूर हो जाना,
शायद यही गरीबी की निशानी है lअपनों की ज़रूरत का पूरी न कर पाना,
घर आकर झल्ला उठना,
दूसरे दिन फ़िर से कोशिश करना,
गरीबी की दर्द को भाग्य समझ लेना,
शायद यही गरीबी की लकीर है lदर्द में थोड़ी खुशियाँ ढूंढ लेना,
आज की शौक को सालों में पूरा करना,
बच्चों का आदर्श बन जाना,
जीवन को धूप और छांव से श्रींगार करना,
शायद यही गरीबी में संतोष है lमिट्टी को विस्तर, आसमान को चादर समझना,
अँधेरी रात में चाँद को निहारना,
बेफिक्र होकर खर्राटे लेना,
दिन में भाग्य बदलने का अथक प्रयास करना ,
शायद यही गरीबी से जुझना है lहर रोज नई उड़ान भरना,
थक के चूर हो जाना,
गिर के फिर सम्भल जाना,
ग़रीबी में हर भाव का होना,
यही भाव फकीरी को अमीरी बनता l
फकीरी को अमीरी बनता llRajiv Mahali
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माखन
कविता- माखन
————————नटखट लाला नयनो के तारा, छोड़ दे तू सब काम निराला|
मैं सह लूंगी बात तुम्हारी,
आए शिकायत रोज तुम्हारी|
सुन सुन के मै हार गयी हू,
गगरी फोरा सब की सारी,घर का ही तो माखन चुराए,
बाल सखा संग माखन खाए|
खा ले बेटा दुख नहीं मुझको,
दुख तो मुझको माखन गिराए|डांट में तेरे प्यार छिपा है,
माखन से मीठा हाथ तेरा है|
कानों को तूने जब-जब पकड़ा,
माना हमने प्यार मिला है|देख जरा तू अपना साथी,
छोड़ तुझे वे भाग चले हैं|
कर ले मिताई मुझसे बेटा,
दूध दही सब तेरे लिए है|बिगड़ गया है इनके संग|
छोड़ दे बेटा इन सब का संग|
जो करना है तो घर में कर ले,
मत कर बेटा सब के संग|सब कोई तुझको न जान सकेंगे,
ना बेटा तुझको पहचान सकेंगे|
समझ ले बेटा मेरी ममता की कीमत,
कोई तुझको डांटे हम सह न सकेंगे|प्रेम रतन धन अनमोल खजाना,
आजा मेरे मदन गोपाला|
जब जब आउ इस दुनिया में,
हो मेरा बेटा तू नटखट लाला|नटखट लाला………कवि -ऋषि कुमार “प्रभाकर ”
पता- ग्राम खजुरी खुर्द ,थाना-तह.कोरांव
जिला- प्रयागराज, उ. प्र.
पिन कोड 212360 -
मनमोहन
जब भी मनमोहन, श्याम सलोना, बंशीधर मुरली बजाने लगा,
ह्रदय तल के धरातल पे वो प्रेम की ज्योति जलाने लगा,कभी गैयों और ग्वालों का प्यारा कन्हिया गोपियों संग रास रचाने लगा,
कभी माँ जसोदा का छोटा सा लल्ला फोड़ मटकी से माखन खाने लगा,कभी बन्धन में जो बंधा ही नहीं वो ओखल में बन्ध कर मुस्काने लगा,
कभी गोपियों संग श्री राधे के प्रेम में वो प्रेम से प्रेम निभाने लगा॥
राही (अंजाना) -
मैं निर्दोष हूँ मैया
मैया यशोदा से लिपट के, हँस के बोले नंदलाला।
माखन कहाँ खाया है, तेरा सबसे दुलारा नंदलाला ।।
दोष लगाना कान खिंचवाना, यही सभी को भाता है।
बाल सखा से पूछ ले मैया, कहाँ था तेरा नंदगोपाला।।
मैया – सारा दिन भाग रहा था मैं, गैया के पीछे पीछे।
फिर कैसे दोष दे रही है, ब्रज के समस्त ब्रजवाला ।।
झूठ के खेती करने आ पहुँचे है, समस्त ब्रजवासी।
कहना मान ले मैया, सच कहता है तेरा कन्हैया लल्ला।। -
पकड़ मत कान री मैया
पकड़ मत कान री मैया
कसम कुण्डल की खाऊँ मैं।
शिकायत कर रही झूठी
कहानी सच की बताऊँ मैं ।।
करूँ क्यों मैं भला चोरी
घर में हैं बहुत माखन।
नचाती नाच छछिया पे
चखूँ मैं स्वाद को माखन।।
चूमकर गाल को मेरे
करती लाल सब ग्वालन।
छुपाने को इसी खातिर
लगाती मूँह पे माखन।।
सताई सब मुझे कितना
तुझे कैसे बताऊँ मैं?
पकड़ मत कान री मैया
कसम कुण्डल की खाऊँ मैं।।
शिकायत कर रही झूठी
कहानी सच की बताऊँ मैं।।
चराए शौख से कन्हा
मिलकर ग्वाल संग गैया।
गरीबी में करे कोई
मजूरी हाथ से मैया।।
भरन को पेट मैं इनके
घर -घर खास की जाऊँ मैं।
‘विनयचंद ‘हो मगन मन- मन
लीला रास की गाऊँ मैं।।
पकड़ मत कान री मैया
कसम कुण्डल की खाऊँ मैं।
शिकायत कर रही झूठी
कहानी सच की बताऊँ मैं।। -
माखन चोरी मत करना
कान्हा देख आगे से ऐसे
माखन चोरी मत करना
बता दे रही हूँ कह दूंगी
मैया से
फिर मत कहना। -
चितचोर
मोहक छवि है कैसी, मनभावन कान्हा चितचोर की।
माखनचोरी की लीला करते ब्रिज के माखनचोर की।।वसुदेव के सुत, जो वासुदेव कहाते थे
नन्द बाबा के घर में नित दृश्य नया दिखाते थे
यशोदानन्दन नामथा जिनका मुख में ब्रह्माण्ड दिखातेथे
बात- बात में जो गिरिवर को कनिष्ठा पर उठाते थे
अपने सदन में छोङ,घर-घर माखन छिप कर खाते थे
यह दृश्य है ग्वालबाल की टोली के सरदार की।
मोहक—-माँ जशोदा थी बाबा नन्द की पटरानी
नौ लाख गौवन की थी वो गोकुल की महारानी
नित सवेरे दधी मथकर माखन को सिक पर रखती थी
कुछ पल में माखन मटके से, ना जाने कैसे घटती थी
चिन्तित थी वो देख पतीला खाली
माखन कहाँ गया बता दे कोई आली
क्या करू कैसे ख़बर लूँ उस माखनचोर की ।
मोहक—–योजना थी छिपकर चोरन को देखन की
पर यह क्या, ये मण्डली है अपने कृष्णन की
बङे शान से निजगृह में चोरी करन गोपाल हैं आयो
बंधुजन ने तुरत लियो हैं झुककर पीठ चढायो
कुछ खायो हैं कुछ आनन पर लपटायो
मित्र जनों को भी संग खाने का पाठ सिखायो
शब्द नहीं दृश्य हैं ,ऐसो माता हुई, विभोर की।
मोहक—-मैया ने मन को संभाला, कान पकङकर कृष्ण को थामा
चोरी क्यू की अब तो बता दे,जो कहना है वो भी सुना दे
मैया मैंने चोरी कहाँ की,जले हाथों में पीङा बङी थी
जलन की पीड़ा मिटाने,मैं तो चला था माखन लगाने
मुख पे जो चींटी लगी थीं,मैं लगा था उसको भगाने
मुखपे है बरबस लपटाये,मुझे तो चाहत है तेरे कोर की ।
मोहक—सुनकर कृष्ण की मीठी बातें सहसा ली गोदी में उठाके
कान्हा तू पहले बताते,क्यू छिपकर हो माखन खाते
तू तो जन-जन को भाते,फिर काहे को हो सताते
मैया मैंनो चोरी कहाँ की,ये करनी है मेरे सखा की
मुझे तो लत है माखनमिश्री व तेरे आँचल के छोङ की।
मोहक—-
सुमन आर्या -
माखन नहीं चुरायों है!
भ्रम हुआ है तुमको, मैया !
भोला तेरा कृष्ण कन्हैया,
माखन नहीं चुरायों है।लांछन लगाएं ब्रजबाला,
ग्वालिन बड़ी ही सयानी चपला,
मुझको बहुत नचायों हैं,
ना नाचूं तो चोर बताएं!
और मुख पर माखन बहुत लगाए।अगर नाचू तो; खुद ही खिलाएं !
मगर कमरिया नाजुक-सी मोरी ,
किस-किस का दिल बहलाए रे !
बहुत सताती हाए!वो मैया!
भोला तेरा कृष्ण कन्हैया
माखन नहीं चुरायों हैं।मैया तू मुझसे क्यो रूठी,
बात बताओ! सच्ची है या झूठी?
मैं नहीं क्या तुम्हारा लल्ला?
दाऊ भैया ! बहुत चिढ़ाए,
बाजार से खरीद तुम लाएं,
आंसू बहाकर मोहन बोलें!
मेरी मां से मिलाओं ,मैया!
भोला तेरा कृष्ण कन्हैया,
माखन नहीं चुरायों हैं।जज़्बाती हो ;यशोदा घबराई!
कान छोड़ , ममता दिखलाई।
झूठ कहता है ,तेरा भैया!
मैं ही तो हूं तेरी मैया,
तू है मेरा प्यारा कन्हैया।
गले लगाकर आंखें पूछीं,
नटखटता , इक पल में भुली।
कान्हा पहले आंचल में छुपे,
मन्द -मन्द वो फिर मुस्कुराएं,
झूठ-सांच का घोल पीला कर
मैया जी को लिया मनाएं।
भोला तेरा कृष्ण कन्हैया
माखन नहीं चुरायों हैं।
———मोहन सिंह मानुष -
माखन चोरी करते गिरधर,
ब्रज की एक सखी के घर
माखन चोरी करते गिरधर,
पकड़ लिए हैं रंगे हाथ
फिर भी करते हैं मधुर बात।
बोली ग्वालिन यूँ कान खींच
मन ही मन में रस प्रेम सींच,
बोलो क्यों करते हो चोरी,
किस कारण से मटकी फोरी।
सारा माखन गिरा दिया
मन-माखन मेरा चुरा लिया,
मात यशोदा है भोरी,
फिर तुझे सिखाई क्यों चोरी।
जाकर कहती हूँ अभी उन्हें
यह लल्ला करता है चोरी,
होगी खूब पिटाई तब
जायेगी दूर ढिठाई तब।
ना ना ऐसा मत कर गोरी
जो कहे करूँगा मैं गोरी
वैसे भी मैंने नहीं करी,
तेरे घर में माखन चोरी।
वो भाग रहे हैं ग्वाल-बाल
उन्होंने की माखन चोरी,
मैंने तो केवल स्वाद चखा
मीठा माखन तेरा गोरी।
तू मीठी, माखन मीठा है,
अब भी तेरा दिल रूठा है,
मैं तो बस चखने आया था,
यह माखन तेरा मीठा है।
जितना चाहे गाल खींच ले
कान खींच ले, नाच नचाले,
पर मैया से मत कहना
माखन चोरी की नन्दलाल ने ।
मन ही मन में हँसी खूब वह
मतवाली ग्वालिन गोरी ,
सुना रहे थे कृष्ण कन्हैया
मीठी सी बातें भोरी।
चोरी करते मिले कन्हैया
भीतर-भीतर हंसते हैं,
सबका मैं हूँ सब मेरे हैं
फिर चोरी क्यों कहते हैं।
—— डॉ0 सतीश पाण्डेय -
मैं नहीं माखन खाया
कहे नटवर मैया से, मैं कब माखन खाया।
झूठ के गगरी, समस्त ब्रजवासी है लाया।।
मैं तो था ,अपने भैया बलराम के संग।
अब आप ही बताए, मै कैसे माखन खाया।। -
माखन खाते पकड़े गए कन्हाई
यशोदा पूछ रही कान्हा से,
“लल्ला, मटकी से रोज़ – रोज़ माखन कौन चुराता है”।
लाड लड़ा के बोले कान्हा, डाल के गलबैयां मां के,
” मैं क्या जानूं , मैं हूं नन्हा बालक ,तू मेरी प्यारी माता है”।
मां बोली,” रहने दे कान्हा, हर दिन तेरा ही उलाहना आता है”
बलराम से पूछूंगी मैं, वो जो तेरा भ्राता है।
“ना मैया ना, बलराम तो झूठा है, वो कितना मुझे सताता है”
ये सब सुन के मैया मुस्काई,
माखन की मटकी एक कोने में रखवाई।
यशोदा की ज़रा देर आंख लग आई,
खटर – पटर सुन के मैया दौड़ के आई
माखन खाते पकड़े गए कन्हाई।
कान खींच के बोली मैया,”पकड़ी गई तेरी चतुराई” ।
कान्हा बोले________
” मारो ना मैया, मैं चाराऊंगा गैया,
सखाओं के लिए ले जाता हूं माखन,
मिलते हैं मुझे वो जमना के तीरे, कदम्ब की छैयां।
सखा मेरे भूखे हैं तो क्या पेट ना भरूंगा
तू भी ना रोक मैया, ऐसा तो में करूंगा”
यशोदा अपने लाल पे वारी- वारी जाए,
कान्हा तेरे गुण सदा ही ये जग गाए। -
कोरोना को हराना है
आजकल का यह जमाना है,
सबको बेवकूफ बनाना है।
समझदारी की कोई कदर नहीं,
बस शानो-शौकत दिखाना है।
नियमों को कोई यहां तोड़े,
नियमों को कोई वहां तोड़े,
बस एक दूसरे पे इल्जाम लगाना है।
बेवकूफी कर जो ना मास्क लगाए,
कोरोना को अपने घर बुलाए।
मैं हूं एक शिक्षिका,
यह संदेश सब तक पहुंचाना है l
मेरे संग है मेरे विद्यार्थी,
इस महामारी से लड़ कर दिखाना है,
अब न किसी को सताना है,
बेवकूफी छोड़ कोरोना को हराना है। -
साँवला सलोना
साँवला सलोना चला, माखन चुराने को।
मैया ने देख लिया, रंगे हाथ गिरधारी को।
कान पकड़ के मैया, कहती हैं नंद से।
क्यों चुराए है तू?, माखन यूँ मटकी से।
इतने में बोलते हैं, कन्हैया यूँ मैया से..
मैंने न चुराया माखन, पूछ लो तुम ग्वालों से।
मैया कहती हैं मैंने, तुझको ही देखा है।
माखन की मटकी से, माखन चुराते हुए।
बोल कन्हैया मेरा, क्यों तू ये करता है?
क्या मैं न देती तुझे?, जी भर खाने के लिए।
छुप – छुप देखें हैं सखा, कुछ न फिर बोलते हैं।
कान्हा को मैया आज, डाँट खूब लगाती हैं।
नटखट कन्हैया फिर, अश्रु बहाते हैं।
मैया को मीठी बातों में, फिर से फँसाते हैं।
कहते हैं मैया से, अब.. न मैं चुराऊं माखन।
एक बार मेरी मैया, बात मेरी भी मान ले तू।
मीठी – मीठी बातों से, मैया को रिझाते हैं।
लेकिन कहाँ ये कान्हा, किसी की भी माने हैं।
नटखट अठखेलियों से, लीलाएं दिखाते हैं।
मनमोहक अदाओं से, सबको रिझाते हैं।।
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मां
मां मैं तुमसे कुछ आज कहूँ।
जग से प्यारी तुम मेरी मइया,
नंदबाबा का मै अनमोल कन्हैया,
फिर क्यू दाऊ है मुझे चिढाए ,
मैं काला मां तू क्यू गोरी,
नंद मुझे क्या मोल के लाए,
माँ मुझे यही कह भइया चिढाए,
कहो मइया मैं नंद गोपाल,
हूँ तेरी आंखो का मै दीपक,
कान पकड़ मैं बोल रहा हूँ,
खीझ कराऊ ना मइया तुझको,
अब तेरी बातों का मान करूँ,
ना खाऊं माखन चोरी करके,
ना चटकाऊ अब गोपियों की मटकी,
फिर भी मां ये जब मुझे सताए,
आ के मैं तेरे आँचल में छिप जाऊं
माँ मैं तुमसे कुछ आज कहूँ, ।।
सिन्जू मौर्या -
ज्ञान का पहला मार्ग
अज्ञानता ही ज्ञान का पहला मार्ग है l
अज्ञानता से हीन भाव रखना, अपने आप में मूर्खता है l
अल्प ज्ञान भी ज्ञान है, जब तक अहम का वास नहीं है l
महाज्ञानी भी अज्ञानी है, जब शब्दों में अहम झलकता है l
ज्ञान में जब अहम का प्रभाव हो, तो वह अज्ञानी ही कहलाता है l
अज्ञानी अहम खोकर ज्ञानी बनता,अज्ञान तप कर ज्ञान बनता l
शब्दों में समाहित उद्देश्य, ज्ञानी को परिभाषित करता l
घिसी-पिटी ज्ञान भी ज्ञान होता है,ज्ञान का भाव अगर नेक होता l
शब्दों के भाव का आंकलन कैसा है, ज्ञानी के ज्ञान को बताता l
त्रुटियां निकालना ज्ञानी नहीं,ज्ञानवर्धक भाव ढूंढ लेता वे ज्ञानी हैl
शब्द अगर पीड़ादायक है, भाव प्रेरणादायक तो वो ज्ञान है l
अज्ञानता ही ज्ञान का पहला मार्ग है l
Rajiv Mahali -
श्यामल रूप है
श्यामल रूप है,नंद को लाल है।
मोर मुकुट संग, पायल झंकायो है।
नटखट अठखेलियों से, गोपियाँ रिझायो है।
माखन खायो है, रास रचायो है।
यमुना नदी किनारे, बंसी बजायो है।
मटकियाँ फोड़त है, गौये चरायो है।
घर – घर जाए के, माखन चुरायो है।
मैया के डाँटन पर, झूठ खूब बोलयो है।
मीठी – मीठी बातों में, सबको फँसायो है।
मिट्टी जब खाये तो, ब्रह्मांड दिखायो है।
पालना में झूलकर, राक्षस भगायो है।
मैया के बाँधन पर, रो कर दिखायो है।
संकट जब आयो है, गोबर्धन उठायो है।
गोकुल का श्याम ये, मथुरा से आयो है।
बाल्य अवस्था में, खूब खेल दिखायो है।
मित्रों के संग-संग, वस्त्र भी चुरायो है।
मुरली की तान से, राधा बुलायो है।
नटखट शैतानियों से, मन को लुभायो है।
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आदत से लाचार मेरा कान्हां
चुरा के माखन खाए नटवर नागर नंदा।
कान पकड़ के खींचीआज मैया यशोदा ।।
माखन चोर है, मैया यशोदा के नंद लाला।
तभी तो शिकायत कर गयी समस्त ब्रजबाला ।।
घर 🏡 घर में मटकी तोड़ना माखन खाना।
पकड़े जाने पर सुंदर सुंदर बहाना बनाना।।
परेशान हो कर जब पीटने दौड़ती यशोदा मैया।
फूट फूट कर रो पड़ते ब्रज के छोटे छोटे गैया।।
चुरा कर माखन ए मैया अब कभी न खाऊंगा।
अपनी माँ के मन को अब न ठेस पहुंचाऊंगा।।
यही सुन के लगा लेती गले अपने कान्हां को।
लाचार कान्हां चल पड़े फिर माखन चुराने को।।गोविंदा
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माखनचोर
मात हमारी यशोदा प्यारी,सुनले मोहे कहे गिरिधारी
नहीं माखन मैनु निरखत है,झूठ कहत हैं ग्वालननारी।मैं तेरो भोला लला हूँ माता,मुझे कहाँ चुरवन है आत
बस वही मै सब खाता, तेरे हाथों का माखन है भाता
ठुनक ठुनक कहते असुरारी,झूठ कहत हैं ग्वालननारी।।ये जो ग्वालन हैं,बङी चतुरन हैं,बरबस ही पाछे पङत हैं
ना जाने क्यू मोहे बैरन हैं,झूठ-मूठ तोसे चुगली करत हैं
मैं तो सीधा-सा हूँ बनवारी, झूठ कहत हैं ग्वालननारी ।।मैया अबतक मौन खङी थी,चुप्पी भी चुभ-सी रही थी कान्हा तू झूठ कहत है,हाथों का माखन भेद खोलत हैं
जा झूठे नहीं तेरो महतारी,झूठ कहत हैं ग्वालननारी ।।अश्रु लोचन में भरीं लायो,
तेरो पूत मै तू मोरो मात कहायो
भोर भये क्यू मोहे कानन पठवायो
मोरे हाथों में छाले पङी आयो
चुभन मिटाने को माखन लपटायो
सत्य कहत ,बही आयो वारी, झूठ कहत हैं ग्वालननारी।लला का रूदन माँ देख न पायीं,गोद उठा गले से लगायी
माँ- बेटे का संबंध हो ऐसा ही पावन,
कान्हा- यशोदा का संबंध हो जैसा मनभावन
अजब-गजब नित लीला रचते अघहारी
झूठ कहत हैं ग्वालननारी ।।
सुमन आर्या -
कान्हा फ़िर से तूने माखन खाया ……
ओ कान्हा तूने फ़िर से माखन खाया ,
तोड़ दी हांडी , सारा माखन भी गिराया…..
क्यों करता है तू , इतनी कुबद रे
क्यों करता है तू , इतनी कुबद रे….
थक जाती हूं मैं , बोल कैसे तू सुधरे……मित्र भी तेरे सारे साथ ही आते
पकड़ में तू आता और वो भाग जाते
कैसे मैं मारूँ तुझको या कैसे समझायूँ…
तू ही लाल मेरा , तुझ पर सारा प्यार मैं लुटाऊँ…..
मान जा रे लल्ला मेरे , अपनी माँ की तू अर्जी ,
चोरी छिपे न किया कर , अपनी मन मर्ज़ी…..देती हूँ तुझको जब मैं , तू वो खा लिया कर
ऐसे न सारा माखन , तू झूठा ना किया कर ….
प्रसाद भगवन का हैं हमको बनाना..
प्रसाद भगवन का हैं हमको लगाना
जाकर फ़िर है गईयों को चारा चराना…तेरी कुबद से मैं तो हार ही जाती हूँ
मार कर तुझको अपना दिल मैं जलाती हूँ
खा कसम मेरी , न तू वापिस ऐसे करेगा….
बनेगा मेरा अच्छा लाल , माखन ऐसे झूठा ना करेगा….खाता हूँ मोरी मैया मैं फ़िर से ऐसा करूँगा
मित्र जो मेरे भूखे , उनका पेट मैं हमेशा भरूँगा….
भगवन को तुम बड़ी देरी से भोग लगाते…
और हम बालक बेचारे , भूख से तड़प जाते….तुझको ना सताऊंगा , मैं बस चोरी चोरी आऊंगा ,
सारी गोपियों की हांडी , फोड़ माखन मैं चुराऊँगा…
कृष्ण नाम मेरा , मैं तो अपनी बंसी बजाऊंगा….
वासुदेव यशोदा का मैं , नटखट लल्ला कह लाऊंगा….
वासुदेव यशोदा का मैं , कान्हा कह लाऊंगा……… -
माखन चोर
माखन चोर माखन चोर।
ब्रज में मचा है यही शोर ।।
सब से नजरे बचा के देखो।
कैसे भागे माखन चोर।।
कहीं मटकी फूटी ,
कहीं माखन बिखरे ।
पकड़ो पकड़ो दौड़ो दौड़ो,
व्रज में आया कैसा चोर।।
कान पकड़ के मैया बोली,
कहाँ गया था, रात से हो गई भोर।। -
अपने देश में (INDEPENDENCE DAY)
हम उस देश के प्रहरी है जिस देश में तिरंगा लहराता है।
बुलंदी वाले छत्रपति शिवाजी के चर्चे शत्रु भी करता है।।
पंजाबी गुजराती मराठी गोरखा मद्रासी और मुसलमान।
सभी देश पे आज भी अपनी जान न्योछावर करता है।।
रणनीति के डगर पे ए वीर दिखाओ अब शान से चल के।
हिम गंगे के मिलन आज भी देश का इतिहास बताता है।।
सुभाष भगत आज़ाद और सावरकर के इस गुलिस्ताँ में। आज भी तिरंगा अपनी सुंदरता बड़ी शान से बिखेरता है। -
समय रूपी डोर
समय पतंग की डोर जैसी l
मांजा बड़ी तेज है l
किसकी पतंग काट जाए विश्वास नहीं l
कभी राजा संग कभी रंक संग l
पल में तेरा पल में मेरा हो जाए l
कब खुशियों की पतंग कट जाए l
कभी दर्द उड़ा ले जाए l
छोटो की क्या औकात l
मांजा ऎसी बड़ो- बड़ो को मात दे जाए l
हरिशचंद्र को सड़क पे लाया l
वाल्मीकि के हाथों रामायण रचाया l
इस डोर का क्या कहना l
मुझे इसी डोर से है, अपनी पतंग उड़ना l
इसी डोर से है, अपनी पतंग उड़ना llRajiv Mahali
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पहचान
महानता व्यक्तित्व मे नहीं,
शब्दों में होती है l
पहचान लिवास से नहीं,
आत्मा से होती है l
बल शारीरिक शक्ति में नहीं,
आत्म बल में होती है l
वीरता प्रवंचना से जीती विजय में नहीं,
युद्ध नीति के पालन में होती है l
श्रेष्ठता किसी को झुकाने में नहीं है,
बल्कि झुके को अँकवार में होती है l
मर्दानगी नारी की बर्बरता में नहीं,
बल्कि नारी की सम्मान में होती है
वीरता असहायों को कुचलने में नहीं,
बल्कि साथ खड़े होकर सहायता में होती है l
उच्च शिक्षा से कोई ज्ञानी नहीं,
ज्ञानी उच्च विचार से होता है l
अपना कहने से कोई अपना नहीं होता,
जब तक स्वार्थ को ताक में रखा नहीं जाता l
डर कमजोरी की पहचान नहीं ,
बल्कि सतर्कता की पहली सीढ़ी होती l
मन के आभा में तराश ले खुदको,
कौन सा चेहरा तेरा नकाब के पीछे है?
कौन सा चेहरा तेरा नकाब के पीछे है?
Rajiv Mahali -
ग़लतफ़हमी
चरखे से अगर आजादी मिलता,
हमें सेना की जरूरत न होता l
चरखे से हिंदुस्तान चलता,
हिन्द मे कोई विशेष ना होता l
न हिंदू मुसलमान होता,
सभी हिंदुस्तानी पूत कहलाता l
न करगिल, न चीन से युद्ध होता,
सही मायने मे भाई – भाई कहलाता l
विश्व क्रम में पहला स्थान होता,
चारो तरफ नमो: नमो:होता l
वीरों की शहादत न होता,
न जालियावाला कांड होता l
चरखे ने साजिस रचा,
हिन्द को बेवकूफ़ बनाया l
पर अब ना चल पाएगा,
निस्वार्थ शहीदों को दिल में बसाएंगे l
शहिदों के आगे श्रद्धा के सुमन बरसाएंगे ll
Rajiv Mahali -
…… भारत का (Independence Day)
गुलामी को आज़ादी में बदल दिया,
हम वो शख्स है अपने भारत का।
हर दिन लहू से सिंचे है देश को,
इसलिए कहलाता हूँ सपूत भारत का।।
गैरो ने लगाई थी पुरी ताक़त,
फिर भी बाल न बांका कर सका।
राहों में भी बिछाए काँटे ही काँटे,
काँटे को ही फूल समझ कर चल पड़े ,
किया नाम रौशन अपने भारत का।।
भ्रष्टाचारों के भी क्या तेवर थे,
थर्रा उठी इन्सानियत था राज हैवानो के।
फिर भी हम न घबड़ाए न रुके ,
क्योंकि लाज बचाना था अपने भारत का।।
“तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा “,
यही नारा था निडर वीर सुभाष का।
भारत के हर कोने से जाग उठे थे सपूत,
तब जा के सिर उँचा हुआ अपने भारत का।।
हारे बाज़ी को जीत गए,
वे सब सिकंदर थे अपने भारत का।
वीर जवानो के लहू की भेंट चढ़ी,
तब आन बची अपने भारत का।। -
मेरा नमन
हे वीर, नमन मेरा तुझको l
वीर पुत्र , सूरवीर हो l l
आप ही प्रहरी , प्रलय भी आप हो l
अश्व जैसी तेज, सिंह की दहाड़ हो ll
शांत प्रिय, रुद्र रूप हो l
जल – थल ,नभ में भी आप हो ll
आप रंग , बेरंग भी हो l
सीमा रेखा ,शत्रु की जीवन रेखा आप हो ll
आप हो तो संभव , न हो तो असम्भव हो l
आप ही शहीद , आप ही अमर हो ll
जीवन रक्षक , शत्रु भक्षक भी आप हो l
कठोर आप , प्रेम सागर आप हो ll
हिन्द को समर्पित हो , मोह के विमुख हो l
आप संगम , आप ही विरह हो ll
आप ही मुस्कराहट , वेदना भी आप हो l
दीपक की लौ , दीप – छांव भी आप हो ll
हे वीर, आप काव्य रस से परिपूर्ण हो l
शौर्य ऐसी, गाथा के लिए शब्द कम हो ll
हे वीर, नमन मेरा तुझको l
हे वीर, नमन मेरा तुझको ll
RAJIV MAHALI -
मैं (अहंकार)
मैं मन की भाव हूँ, अहंकार से लिप्त हूँ l
मैं लोभ , मैं मोह माया का जाल हूँ l
मैं हिंसा का रूप, मैं विनाशकारी हूँ l
मैं यूं ही बदनाम हूँ, वरना मैं विश्वकर्मा हूँ ll
मैं अनंत हूँ , विष भी मैं हूँ l
मैं चक्रव्यूह, मैं महाभारत हूँ l
मैं कौरव नाशक, रावण, मैं ही कंश हूं l
मैं तो यूँ ही बदनाम हूँ, वरना श्रीकृष्ण, जटाधारी हूँ ll
मैं निराकार हूँ, काली, दुर्गा भी मैं हूँ l
मैं वहुरूप्या हूँ, किसी को भी हर लेता हूँ l
हर संगत में ढल जाता हूँ, संगत जैसी वैसा बन जाता हूँ l
मैं यूं ही बदनाम हूँ, वस यूं ही……….. llRajiv Mahali
-
दहाड़
ज्यों पले इक मां की गोद में,
नन्ही सी जान।
त्यों पले तू भारत की गोद में,
पाकिस्तान।समुद्र है हिंदुस्तान मेरा,
लहरें हैं विशाल।
एक लहर भी क्रोधित हो तो,
तू हो जाए बेहाल।तिनके को भी तरसेगा,
भूख से होकर व्याकुल।
दर दर तू भटकेगा ,
प्यास से होकर पागल।ले छीन लिया वो हक हमने,
जो तुझे देके गलती की थी।
इस बूंद बूंद पानी की कीमत तूने ना पहचानी,
अब भूखा प्यासा फिरेगा तू,
हम हैं जिद्दी हिन्दुस्तानी।बहुत हो गए वार तेरे,
अब बारी हिंदुस्तान की।
भूल जाएगा, सच में अपनी
तू पाकिस्तान,
पहचान भी।शेरों का जंगल है ये ,
ओर खोफनाक दहाड़ है,
अरे तेरी क्या हैसियत है,
तू कुत्तों का सरदार है।।✍️✍️ऊषा शोना
-
चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर
लेके काँधे पे बन्दूक
दिल में देशप्रेम अटूट
चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।
न हीं जीवन की मोह
न हीं परिजन बिछोह
देश के खातिर दिया सब कुछ है छोड़।
चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।।
ये हमारे वीर सिपाही
लड़ने में न करे कोताही
जलती धरती अंबर बरसे घनघोर।
चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।।
नहीं किसी से वैर है
न अपना कोई गैर है
भारत माँ की रक्षा में है न कोई थोड़।
चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।।
विस्तारवाद नहीं इनकी चाह
विकासवाद के चलते राह
५६ इंच की सीना देख यार पुड़जोर।
चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।।
कारगिल में था वैरी रोया
रोया था गलवान में।
दुश्मनों के छक्के छुराए
डरे नहीं बलिदान में।।
‘विनयचंद ‘ इन वीरों के दिल से लागे गोर।
चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।। -
भारत चीन तकरार
करारा जवाब मिलेगा,
अभिनंदन अपने पास होगा
जब पाकिस्तान का बात होगा,
56″ इंच का साथ होगा,
युद्ध जब चीन से होगा,
जवानों का बलिदान होगा,
फिर भी उसका अभिमान होगा,
राजा रानी में तकरार होगा,
तब देश का बात होगा. -
सैनिक
प्रिय सैनिक,
जो तुम हो तैनात सीमाओं पर,
तो हम हैं निश्चिंत घरों घर।है तुम्हारी रडार सी पैनी नजर ,
तो हमारे नैनो में बसता है सुकुं प्रति पहर।तुम निभाते हो ड्यूटी अति कठोर,
तो हम हो जाते हैं चिंता मुक्त हर ठौर।इस चित्र कविता कांटेस्ट से है प्रेषित,
हमारा कोटि कोटि नमन तुम्हारी ओर। -
इम्तहान की घड़ी
उठा के बंदूक हाथ में, ए वीर तुम अब बढ़े चलो।
जान हथेली पे रख के, अपना कर्तव्य निभाते चलो।।
इस देश को तुम्हारे जैसे ही, सपूतों की जरुरत है।
जंग की घड़ी आई है, सिर पे कफ़न बांधते चलो।।
ए सपूतों कोई धर्म वीर बनो, तो कोई कर्म वीर बनो । धर्म कर्म के औजार से, दुश्मनों को अंत करते चलो। -
घोड़ा दबा दे सिपाही
कविता – घोड़ा दबा दे सिपाही
तीखी नजर से सिपाही
आज ऐसा निशाना लगा दे,
मार दे देश के दुश्मनों को
उनका नामोनिशां तू मिटा दे।
तूने सीमा में डटकर हमेशा
दुश्मनों के छुड़ाये हैं छक्के,
आज गलवान घाटी में तूने
दुश्मनों को लगाये हैं मुक्के।
तेरे मुक्के से दुश्मन पिटेगा
तेरी गोली से दुश्मन मरेगा,
हिन्द की जय हो जय हो हमेशा
तेरी बन्दूक का स्वर कहेगा।
तेरी नजर लक्ष्य पर है
सामने फौज दुश्मन खड़ी है,
अब तू घोड़ा दबा दे सिपाही
देश की आस तुझ पर टिकी है।
मार गोली उन्हें अब उड़ा दे
देश के दुश्मनों को उड़ा दे,
तू निडर वीर भारत का बेटा
अब सबक दुश्मनों को सिखा दे।
—- डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय,
पीएचडी, राजकीय फार्मा0 चम्पावत
उत्तराखंड। मो0 9536370020 -
जागो हे भरतवंशी
जागो हे भरतवंशी अलसाने की बेर नहीं ।
सहा सबकी साज़िशों को,करना है अब देर नहीं ।।
शालीनता की जिनको कदर नहीं,विष के दाँत छिपाये है
मौकापरस्त फितरत है जिनके,क्यू उनसे हम घबराये है
फ़ौलाद बन उत्तर दो इनको,पंचशील की बेर नहीं
जागो हे भरत——
सामने शत्रु है वो,वृतासुर सी प्रवृत्ति जिनकी रही है
हिन्द के सह से वीटो की छङी,जिनके हाथों में पङी है
दधीची बन, भेद उनको,बुद्ध की अभी दरकार नहीं
जागो हे भरत——-
चुपचाप तुम्हारी मनमानी को करते रहे स्वीकार जो
हिंद -चीन भाई-भाई कह,कर ना सके प्रतिकार जो
तेरी कायराना हरकतें सहने को, अब हम तैयार नहीं
जागो हे भरत ——
जो है उसीसे क्यू न अपना आशियाना सजाए हम
अमेरिका कभी रूस से,क्यू हथियार मंगवाए हम
सँवारे एकलव्य,रामानुज,आर्यभट्ट,नागार्जुन कलाम को,
इन जैसो की हिन्द में हङताल नहीं
जागो हे भरत——
चाणक्य को देंगे सम्मान नहीं चन्द्रगुप्त कहाँ से पाएंगे
चीन कभी रूस के आगे हथियार की आश लगाएँगे
द्रोण वशिष्ठ की परम्परा,रखी हमने बरकरार नहीं
जागो हे भरत ——-
पिछङते रहेगे, उपेक्षित रहेगी जबतक,पहली शिक्षिका
कैसे बढ़े,गर्भ में ही भक्षण कर,बन बैठे, हैं जो रक्षिका
ललक शिखर छूने की,
आधी आबादी की करते हैं सम्मान नहीं
जागो हे भरत ——-
सुमन आर्या
******** -
ये रणबांकुरे भारत के
ये रणबांकुरे भारत के,सीमा पर देखो खड़े हैं
हम चैन से सोएं रातों को, दुश्मन से वो लड़े हैं
गर्मी का मौसम हो,या पड़े कड़कती सर्दी
भारत मां की रक्षा करते ,पहन के फौजी वर्दी
याद आती है घर की मगर,फिर भी इन्हें सुहाती ये डगर
अड़ियल है दुश्मन, बर्फीली वादी
खाने को मिलती है, अक्सर रोटी सादी
देशभक्ति मन में लिए,सरहद पर सैनिक खड़े हैं
दिल से नमन है उन वीरों को,
भारत मां की रक्षा खातिर, जो बैरी से लड़े हैं -
कविता
तुम रहे हमेशा आगे ऐसे
तूफान भी न छू पाए
तुम्हारे देश के एक-
एक कण को…….
कोई अपना बनाकर
न ले जाए…..
जान हथेली पर लेकर
तुम चीर लाते हो
दुश्मन की आंख…..
तुम ढाल बने रहे ऐसे
कि शत्रु भी तुमसे
कांप जाते…..
अपनी करूणा की
चादर को छोड़
तुम वतन की रक्षा
में लौट आते ……
तुम हृदय के
सभी रिश्तों को
एक चुनौती दे आते…
रिश्तों के इन एहसासों में
एक राष्ट्रपूत प्राण हूं।
अपने स्वार्थ की
रक्षा से पहले
राष्ट्र का में
बलिदान हूं।
देश के लिए
तुम्हारा जीवन
का एक एक क्षण
तुम्हारा हिंदुस्तान है…
ए वीर देश के
वीर पुष्प….
तुम्हारा प्रेम
दुनिया के सभी
प्रेम से शक्तिमान है…… -
विश्व समर जीत
जाग हे पार्थ जाग तू,
दे काल को अब मात तू,
काल के कपाल पर अमिट रेखाएं खींच,
अब तू काल समर जीत।
स्वयं के सम्मान हेतु ,
विश्व के कल्याण हेतु ,
अपने अंदर के ज्वाल पुष्प को तू सींच,
अब तो दिव्य समर जीत ,
अब तो विश्व समर जीत ।।
हो रही हूंकार है ,
उठ रही तलवार है,
गांडीव के बाण से ,
विश्व के इतिहास में ,
गाथा नवीन लिख।
उड़ उड़ान बाज की ,
हुंकार हो वनराज की,
हर संकट में बने कठिनाई तेरी मीत,
अब तू धर्म समर जीत।
अब तो विश्व समर जीत।। -
किसने बनाई ये सरहदें??
सरहद की ये आड़ी-तिरछी लकीरें,
किसने खिंची क्या पता!
गर जो वो तुमको मिले,
मुझे भी उसका पता देना!!बस पुछुंगी इतना ही,
एकता ना तुमको भायी!
सीमांत बना कर क्या मिला,
इंसानो से ऐसी भी क्या थी रूसवाई!!पंछी, नदियां,रेतें,पवन,
उन्मुक्त से बहे तो कौन इनको रोक पाता!
इनमें ना कोई मजहब,जात ना पात,
ना कोई सीमा जो रोके इनका रास्ता!!ये तो लगता जैसे,
कुछ-कुछ भाईयों का बंटवारा!
कुछ जमीन,
तुम रखो कुछ हमारा!!लडेंगें -मिटेंगें,
ना रखेंगें भाईचारा!
इंसानियत से भारी हुआ,
अभिमान हमारा!!फिर भी ना हुयी संतुष्टि,
तो सिपाहियों को खड़ा किया!
गोली बंदूक और तोपों से सजी सरहद,
और कंटीली तारों का आवरण किया!!इंसानों को रोका ,
पर रोक ना पायें प्रकृति को!
वो सब जानती है,
इसओछी,घटिया राजनीति को!!इसलिये तो इसकी,
सुंदरता बरकरार है!
मानव जाती को ,
नरसंहार मिला उपहार है!!जब-जब हलचल हो सरहद पर रोजाना,
चुनावी बिगुल बजेगा समझ जाना!
नेता रुपी शकुनि होगा,
मासूमों की लहु बहवा खुद चैन से सोता होगा!!रंग एक लहू का ,
चाहे पाकिस्तानी, चीनी या हो भारतवासी!
मानवता है सबसे ऊपर,
चाहे हो कोई देशवासी!!सारे योद्धा होते हैं,
किसी के घरों का हैं आफताब!
सबका लहु है लाल,
सबको है जीने का अधिकार!!फिर भी कुछ इंच जमीन के लिये,
कितनी जानें गयीं होंगी कुर्बान!
कितनों के तो बलिदानों को भी,
नहीं मिला होगा उचित सम्मान!!इतिहास गवाह है ,
इन खुनी झड़पों में!
किसी के मांग का सिंदूर ,
किसी के घर का चिराग गया!!उस नेता का ,
कुछ ना गया!
जो युद्ध का हीरो बन,
गद्दी पर विराजमान हुआ!!सब अभिमान एक तरफ रख कर,
सुलह बेहतर ऊपाय है!
क्या ताबुतों में बंद लाल ,
किसी माँ से बर्दाश्त हो पाये है??जानती हुं देश के लिये ,
जान न्योछावर सौभाग्य कि बात है!
पर जब बातचीत से बात बनेगी,
फिर खून खराबे का क्या काम है!!कुछ ना मिलेगा,
आंसुओं, उजड़े गोद और मांग के सिवा!
अंत में पता चलेगा ,
कुछ ना बचेगा लहूलुहान विरान भूमि के आलावा!!हां,पर क्षमादान का ये मतलब ,
नहीं तुम सर पर चढ़ कर नाचोगे!
पर सुन लो ऐ चीन,पाकिस्तान,
तुम्हारी गलती को अब ना बख्शेंगे!!जितना झुक के किया ,
शांति वार्ता हमने!
हरबार पीठ में ,
छुरा भोंका है तुमने!!तुमलोगों को नहीं है ,
अपने शूरों कि कदर!
पर यहाँ लेकर घुमता है ,
हर भारतवासी उनको अपने जिगर!!इतिहास गवाह है जब-जब,
किसी फौजी कि अर्थी उठी है!
हरेक घर का चूल्हा बुझा ,
हरेक मां रोयी है!!भारत माँ के एक पुकार से ,
हर माँ अपना लाल भेज देगी!
ओ !!रिपु हमको कायर ना समझो,
गर जो कोई माँ तुम्हारे वजह से अब रो देगी!!मुंह कि खाओगे इसबार ,
छिन लेंगे तुमसे तुम्हारी जमीन भी!
जान न्योछावर को हैं तैयार ,
हम और हमारे जवान सभी!! -
करिश्मा अपने वतन के
मेरा आन वतन, मेरा बान वतन, मेरा शान वतन।
गैरो में दम कहाँ जो करे, हमारे वतन को पतन।।
अनेक आए अनेक गए, बाल न बांका कर सका।
मेरा भारत भारत ही रहा, कोई न इसे झुका सका।।
मशाल ले कर जंग में कूदना, यही हमारी करामाती है ।
वतन पे हो जाएं हँस के कुर्बान, यही हमारी शरारती है ।।
कहे कवि- दुश्मनो ने राहों में कांटे ही कांटे बिछा दिए।
हम कांटे को सिंच कर नेहरू के लिए गुलाब बना दिए।। -
हे कर्मवीर हे धर्मवीर
हे कर्मवीर हे धर्मवीर
हे परमवीर तुम शौर्य महान,
हेभारत मा के वीर सपूत
इस देश के लिए कुर्बान है जान
बलिदान तेरा न व्यर्थ जाएगा
तेरा लहू इस देश के काम आएगा
न झुकने देंगे हम शीश चमन का
तिरंगा यह हर पल गगन में लहराएगा
याद रखेंगे सदियों तक
तेरा यह अमूल्य बलिदान
हे कर्मवीर हे धर्मवीर
हे परमवीर तुम शौर्य महान
मैं भी चलूं उसी पथ पर
जिस पथ पर लाखों वीर गए
मिट गए देश पर हंसते हंसते
जंग लड़ने जो रणधीर गए
वीर समाधि बनी उन्ही की
इस पावन उज्ज्वल धरती पर
खून से सनी है भारत की सीमा
राख हुए जो देश के रण पर
धन्य है भारत मां का आचल
धन्य है भारत देश महान
हे कर्मवीर हे धर्मवीर
हे परमवीर तुम शौर्य महान। -
Vo foji h hm
Vo foji h hm
Bharat jinki mata h
Jiske vo rakshak h
Din ho ya raat kdhe rhthe h jo
Grmi ho ya thnd mdhe rhthe h jo
Vo foji h hm
Desh ki krte rksha h jo
Desh ke liye khun bhathe h jo
Desh ke aage family bhi nhi dikthi jinhe
Desh ke liye sda lete h shapth
Vo foji h hm
Desh me hota bura sluk h jiska
Desh me aate hi khun ho jata h jinka
Apne hi sath chod dete h jiske
Kuch rupyo ke liye bhula dete h risthe jinke
Is desh me hota jinka apmaan h
Vo foji h hm
Is desh me jhuth dikhaya jata h
Foji ki veergti pr sawal uthaye jate h
Dushmn ko mrne ke sbut mnge jate h
Jinki shadat pr bhi sawal uthaye jate h
Us desh ke foji h hm
Vo foji h hm…! -
हम सिपाही है….. सिपाही ही रहेंगे…..
….हर तरफ़ एक शोर है…..हर तरफ़ एक ही बात,
मुल्क़ के लिए अपनी जान जो दे गए,
यथासंभव हमें देना हैं मिलकर उनके परिवार का साथ…..
जोड़ सकते है हम अगर एक लहर को तो
जोड़ेंगे दिन और चाहे रात,
वापिस तो नहीं ला सकते अपने शहीदों को
पर मिटा भी नहीं सकते उनके अपनो के दर्द भरे जज़्बात…..
हमारे लिए वो लड़े जिनके वो बैरी नहीं
टुकड़ों में बिखर गया अब उनका शरीर , बिखरे है वो कहीं कहीं,
मुल्क अपना है लोग अपने है पर ,
अपनापन बस वहीं निभाते हैं….
क्या कैंडल मार्च या स्टेटस पोस्ट करने से कुछ होगा
बॉर्डर के इस पार पुतले फूँक फूँक कर ,
असली आतंकवाद तो हम आप जग जाते है….
एक बेटे , भाई, पति, पिता की कमी को ,
क्या अब कोई पूरा कर पाएगा ?
फ़िर भी उस माँ – बाप का कलेजा देखो ,
हमारे एक बेटे की शहादत का बदला लेने,
हमारा दूसरा बेटा भी बॉर्डर पर उनसे लड़ जाएगा….
तुम्हारी शहादत का बदला लेने ,
क़ाश अब देश पूरा एक जुट हो जाए….
अच्छे दिन तभी अच्छे लगेंगे ,
जब एक रोती माँ के आँसू ,
वापिस खुशियों में बदल जाए
वापिस खुशियों में बदल जाएं…………हम सिपाही है… सिपाही ही रहेंगे,
जिंदा हैं या शहीद हुए ,
अपने वतन की रक्षा हमेशा करेंगें……।।जय हिंद जय भारत…….
-
ललकार
देखो चली नौजवानो की टोली।
खेलेंगे लाल फिर लहू की होली।।
चारो दिशाओं में गूंज रहा है।
इंक़िलाब जिंदाबाद की बोली।।
अग्निपथ पे चल पड़े है सपूत।
ललकारे छोड़ के आसमां में गोली।। -
जागो
आज फिर ए वीर, इम्तहान की घडी आई है।
जागो ए सपूत, माँ फिर बेटा कह के बुलाई है।।
उठा के बंदूक हाथ में शरहद के तरफ चलना है।
माँ के कर्ज चुकाने का यही शुभ अवसर आया हैं।।
देश द्रोही आज फिर ,मुद्दत बाद माँ पे उंगलि उठाई है।
हमारे सुख चैन में फिर काली ग्रहण दुश्मन ने लगाई है।। -
हम वो पागल प्रेमी हैं जो मातृभूमि पर मरते हैं ।
न पायल पर, न काजल पर
न पुष्प वेणी पर मरते हैं
हम वो पागल प्रेमी हैं
जो मातृभूमि पर मरते हैं ।सियाचिन की ठंड में हम
मुस्तैद है बन इमारत माँ
सरहद की रेत पर हमने
लहू से लिखा भारत माँहमें डिगा दे हमें डरा दे
कहाँ है हिम्मत बिजली की
नहीं चाह है फुलवारी की
नहीं तमन्ना तितली कीनहीं गुलाब , केसर ,चम्पा
हम नाग फनी पर मरते हैं
हम वो पागल प्रेमी हैं
जो मातृभूमि पर मरते हैं ।हम तो वो रंगरसिया हैं
जो खेले होली खून -खून
हरी -हरी चूनर माँ की
देकर स्वेद बूंद -बूंदपीठ दिखाकर नहीं भागते
सिर कटाकर मिलते हैं
देख हमारी वर्दी पर
ज़ख्म वफ़ा के मिलते हैंजहां तिरंगे के रंग तैरे
उस त्रिवेणी पर मरते हैं
हम वो पागल प्रेमी हैं
जो मातृभूमि पर मरते हैं ।रचनाकर :- गौतम कुमार सागर , ( 7903199459 )