Category: Poetry on Picture Contest

Submission for ‘Poetry on Picture’ Contest

  • सोचता हूँ….

    सोचता हूँ, क्यों ये बंदूकें है तनी?
    उन जीवों पर जो दिखते हूबहू हम जैसे,
    नेताओं के कठपुतले बन,
    मात्र खून के कतरे है बहे।

    सोचता हूँ जब माता-पिता के विषय में,
    आँखों से मन के भाव झलक पड़े।
    “हमारा आशीर्वाद है, लौट तुम्हे आना है”
    बस यही शब्द याद रहे।

    सोचता हूँ जब प्यारी बहन के बारे में,
    जिसकी डोली मुझे उठानी है,
    उसकी खुशियों में अपनेपन की मिठास मुझें मिलानी है।

    सोचता हूँ जब उन प्यारे नन्हें हाथों को,
    जिनके कोमल स्पर्श से माथे की शिकन हट जाती,
    प्यारी-सी मुस्कान सारी चिंता मिटा जाती।

    सोचता हूँ जब उस मन को,
    जिसमें बस मेरा ही ख्याल रहता है,
    जिसका दिल सदा मुझे खोने का दर्द सेहत है।

    ऐसी परिस्थिती में भी हम जवान भारत माँ के प्रति अपना कर्तव्य निभाते हैं,
    युद्धभूमि में हम मर मिटने को तैयार हो जाते हैं,
    पर एक सवाल जो युद्ध के समय हमेशा अखरता है,
    आखिर क्यों हम नेताओं की वजह से घुन से पिस जाते हैं?
    क्यों धरती माँ के सभी सपूत आपस में ही लड़ते हैं?
    नेताओं के कठपुतले बन,
    मात्र खून के कतरे ही बहते हैं।

  • आठवें वचन के साथ, गृहस्थ को अपनाता हैं…

    छोटी-सी ज़िंदगी में, हर कोई अपने सपनें सजाता हैं।
    विवाह तो सभी करते हैं… वह फौजी हैं साहब, जो आठवें वचन के साथ गृहस्थ जीवन अपनाता हैं।

    मात-पिता की सेवा को जो, भार्या घर छोड़े जाता हैं..
    खुद ‘भारत मॉं’ की रक्षा का बेड़ा उठाए सीमा को तैनात होता हैं।
    वह फौजी हैं साहब, जो आठवें वचन के साथ गृहस्थ जीवन अपनाता हैं।

    हमें अपना परिवार देखें बिना रहा न जाता हैं..
    बच्चे कब बड़े हुए, बहना कब सयानी हुई, उसे यह भान भी न हो पाता हैं।
    बहन-भाई की शादी को भी फर्ज़ के खातिर जो छोड़े जाता हैं।
    वह फौजी हैं साहब, जो आठवें वचन के साथ गृहस्थ जीवन अपनाता हैं।

    परिजनो संग त्यौहार मनाते, खुशिया भी लुटाते हैं…
    उसके तो त्यौहार-ऋतु सब बार्डर पर गुजर जाते हैं
    मौत के ख्याल भर से हमारी रूह भी कांप जाती हैं
    वह अपनी जान हथेली पर लिए, मातृ-भूमि के नाम कर जाते हैं।
    वह फौजी हैं साहब, जो आठवें वचन के साथ गृहस्थ जीवन अपनाता हैं।

    पैसा-मकान की झूठी शानें दिखलाते हैं…
    एक नज़र ‘तिरंगे’ में लिपटे ताबूतो पर डालो, उसके आगे सभी शानें फीकी पड़ जाती हैं
    अपने बलिदान के साथ, बाप का सीना..
    वह २६” से ४२” का कर जाता हैं
    वह फौजी हैं साहब, जो आठवें वचन के साथ गृहस्थ जीवन अपनाता हैं।

    HEMANKUR❤️

  • आज़ादी

    लगा के निशाना दुश्मन पे,
    अपनी ताक़त दिखा देंगे।
    ज़ुल्म के सिन्हा चीर कर,
    वतन को आज़ाद कर देंगे।।

  • जंग

    सिर पे कफ़न बांध चले हम,
    ईट के जवाब पत्थर से देने।
    देखे किस में कितना है दम,
    चले बस हम यही आजमाने।।

  • वंदेमातरम

    मां तुझ से है मेरी यही इल्तज़ा।
    तेरी खिदमत में निकले मेरी जां।

    तेरे कदमों में दुश्मनों का सर होगा,
    गुस्ताख़ी की उनको देंगे ऐसी सजा।

    गर उठा कर देखेगा नजर इधर,
    रूह तक कांपेगी देख उनकी कज़ा।

    कभी बाज नहीं आते ये बेगैरत,
    हर बार शिकस्त का चखकर मज़ा।

    दुश्मन थर – थर कांपेगा डर से,
    वंदे मातरम गूंजे जब सारी फिज़ा।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • दम

    जब जब ज़ुल्म कीआंधी हमारे देश में आयी।
    तब तब हम प्रहरी अपने देश की लाज बचायी।।
    निशाना हमारा चूक जाए ऐसा कभी हुआ नहीं।
    गर निकल गयी गोली तो समझ ले तेरी खैर नही।।
    आए हैं सिर पे कफन बांध कर छक्के छुड़ायेंगे हम।
    हम किस मिट्टी के बने है आज तुझे बतायेंगे हम।।
    डरा दे हमें किसी माई के लाल में इतना दम कहाँ।
    विजयी पताका गाड़ेंगे हम शहीदों के कब्र है जहाँ।।

  • हिन्दुस्तानी फौजी

    बदन पर लिपट कर उस घड़ी तिरंगा भी रोया होगा
    जब उसने अपने हिन्दुस्तानी फौजी को खोया होगा।
    माँ की छाती में भी दूध उतर आया होगा
    जब उसने अपने शहीद बेटे को गोद में उठाया होगा।

  • ‘जंग का ऐलान’

    जंग का ऐलान हम नहीं करते,
    पर जंग छिड़ जाने पर पीछे नहीं हटते।
    यही तो है हम हिन्दुस्तानियों का हुनर,
    सिर कटा सकते हैं पर झुका नहीं सकते।
    आखरी साँस तक लड़ते हैं हम फौजी देश के लिए,
    शहीद हो जाते हैं पर हिम्मत हार नहीं सकते।
    हारना तो हमको आता ही नहीं है और,
    कभी दहशतगर्द हम पर विजय पा नहीं सकते।
    मिट जाते हैं हँसते हुए हम अपने देश के लिए,
    पर कभी दुश्मन को पीठ दिखा नहीं सकते।
    हम दुश्मन को खदेड़ आते हैं उसकी जमीं तक,
    चीन हो या चाहे पाकिस्तान हमसे पार पा नहीं सकते।
    हम फौजी शेर का जिगरा रखते हैं,
    तिरंगे में लिपट सकते हैं मगर तिरंगा झुका नहीं सकते।
    कुर्बान हो जाये भले जिस्म का कतरा-कतरा,
    अपने देश की मिट्टी का एक टुकड़ा तक गवाँ नहीं सकते।
    आ तो सकते हैं बेशक जिन्दा हमारी सीमा पर दुश्मन,
    पर हमारी गोलियों से बचकर जिन्दा जा नहीं सकते।
    हमें हिन्दुस्तान ही प्यारा है, तिरंगा ही तो जान हमारा है।
    ‘भारत माता की जय’ के सिवा कुछ भी हम गा नहीं सकते।

    🇮🇳 ‘जय हिंद जय भारत’🇮🇳

    मेरा शत शत नमन सभी फौजी भाईयों को🙏🙏🙏

    रचनाकार:-
    प्रज्ञा शुक्ला ‘सीतापुर (उत्तर प्रदेश)

  • नारी शक्ति

    मैं पुत्र उस नारी की जिनकी आंखों में पीड़ा देखी ,
    उजागर करता हूं उन पीड़ा का……….।
    जनमानस से भरा जिसने धरती को ,
    घर के कोनों में मजबूर हुई जीने को।
    दुर्गा, काली के रूप में पूजा जिनको  ,
    शर्मसार किया उनको ।
    सृष्टि की उत्पत्ति का प्रारंभिक बीज है वो ,
    फिर भी गोद में कुचला उनको।
    नए – नए रिश्ते को बनाने वाली रीत है वो,
    हमने हर रिश्तो में नीचा दिखाया उनको।
    उसने हममें कोई फर्क नहीं किया ,
    हमने सामाजिक जंजीर दिया।
    उसने हमको नौ महीने गोद में रखा ,
    हममें से कोई उनका चीरहरण किया।
    कांटो में स्वयं चली, हमें फूलों की सेज दिया।
    हमने उन पर षड्यंत्र रचा,
    आखिर कैसी रीत है ये l
    सच में क्या नारी अबला है?
    ऐसी भूल ना कर, ये तो स्नेह है उनका ।
    कहीं धैर्य खत्म ना हो जाए,
    फिर से काली, दुर्गा ना बन जाए l
    बदल लो अपनी नजरिये को l
    बदल लो अपनी नजरिये को ll                    
                             
                                                राजीव महली

  • जूनून – काश सपने मैं जी लू

    बेवजह ख्वाब को हम जिए जा रहे हैं

    हकीकत को धोखा दिए जा रहे हैं

    पता है मयस्सर, न होंगी ये ख्वाहिश

    मगर कोशिशें हम, किए जा रहे हैं

    मिली मुफ्त में है, ये नींदे ये ख्वाहिश

    अगर टूटी ख्वाहिश, बेशक न रोना है

    खुलेगी जब आंखें, जनाब

    सामना हकीकत से ही होना है

    ✍️स्वरचित कविता-प्रिया वर्मा

  • कविता (स्वतंत्रता दिवस प्रतियोगिता)

    झांक हमारे अंदर लहू है, पानी नहीं।
    आज़मा कर देख, हम किसी से कम नहीं
    क्यों इतराता है, तू अपनी ताक़त पे।
    गर आज हम नहीं, तो कल तू भी नहीं।।
    अपना हक़, सिन्हा चीर कर ले लेंगे हम।
    झुका दे मुझे , तुझ में इतना दम नहीं।।
    गर गिर गये हम तो, संभलना जानते हैं।
    हम से है जमाना , जमाने से हम नहीं।।
    यही मिट्टी मांगा था , कभी लाल लहू।
    लहू से सिंचे है भारत को, पानी से नहीं।।
    मेरे वतन पे, बुरी नज़र रखने वाले।
    धूल न चटा दूं तो हम भी, वतन के सपूत नहीं।।
    तिरंगा मेरी आन बान शान के प्रतीक है।
    संभल जा देश द्रोही, अब तेरा खैर नहीं।।
    मिट्टी के कण कण में , लिखा है हमारे देश के नाम।
    वक्त आने पर आगे बढेंगे, पिछे कभी हटेंगे नहीं।।

  • Photo par kavita

    Ye tasveer suna rahi h,
    darde manjar ki kahani is tarah
    Na jane ab vaapas aana ho kab
    Is shahar, is gali, aur is jagah
    Tune o corona kya kar dala
    Kaam chhina, sukh- sukun chhina
    Aatamvishwas ki bhi dhhaziyan uda dali
    Ab rha gaye hum ghar, baar, bhojan bina Jhankti si ye aankhen ,lakho sawaal smate h
    Galti passport ki, rashan card ne jheli h
    Arre, kuch bacchhe anath hue, kai log baiaulad hue
    Dekhte h iski aukat, na jaane kitni jaane leni h
    Kahti ye aankhen , bula lena is desh fir ek baar
    Jahan manai eid, diwali manayen har tyohar
    Rhe to wapas aa jayenge , tujhe dhundne fir ek baar
    Wahi sukh, wahi sukun , wahi dilli ” dilwalo ki mere yaar”.

    Dhanywad. ( anjali)

  • प्रवासी की पीड़ा

    भारतवासी बना प्रवासी, कैसा किस्मत का खेल है
    मजदूरों की भीड़ से भरी, यह भारतीय रेल है
    घर जाने की जल्दी में, मची ये रेलमपेल है
    भाग रहे गृह राज्यों में ये, जैसे यहां कोई जेल है

    ना ही खाना ना ही छत है, भागना ही इक रास्ता है
    लाकडाउन ने कर दी सबकी, हालत बड़ी खस्ता है
    मरे भूख से या कॉविड से, डर नहीं बिल्कुल लगता है
    बस अपनो के बीच कैसे भी, पहुंचे उसकी चेष्टा है

    सरकारों की मजबूरी है, मानवता शर्मिन्दा है
    जिसने विकास की नींव लगाई, हालत ज्यो भीखमंगा है
    आओ हम सब हाथ बढ़ाए, कोविड़ से लडना सिखलाये
    ना समझे हम उन्हें प्रवासी, इक सूत्र में बंध जाये

  • भारती की अथहा पीड़ा

    क्षणभर में क्षीण हो
    छलकी आंख भारत मां की
    जब मजदूरों के छाले
    सीने में लेकर बैठ गई
    निज संतान का दर्द दिखा तो
    ऐसी दर्द की आह,,,,, भरे
    जैसे लोह पथ गामिनी
    सीने के छाले रौंद गई
    कटी छिली हाथों की लकीरें
    एक संघर्ष सुनाती हैं
    सूरज के ताप से जलती गोद मेरी
    उनके कदम जलाती है
    निराशा से ग्रस्त नयन
    आस को निहारते
    कहीं दिख जाए कोई
    जल भोज बाटते
    महामारी ने मुंह बांधा तो
    मार भूख की बड़ी लगे
    पेट पे कपड़ा बांध लिया
    आंसू की भी एक लड़ी लगे
    अथाह दर्द समेटे थी वो
    मेदनी अपनी गोदी में
    कृतहन बना जो समाज दिखा तो
    रक्त के आंसू रोती है
    कितने वर्ष से दबा हुआ वो
    तारतम्य दुख के नीचे
    सुख छाया निवासी क्या जाने
    की कैसी पीड़ा होती है
    आखिर किन शब्दों में कहूं मैं
    अपनी लहू की पीड़ा को
    भूख से बच्चे बिलख रहे
    ये भूली अपनी क्रीड़ा को
    यमराज के सामने खड़ी हुई
    कहे रोक ले इस मनमर्जी को
    तुझे अपना -अपना सूझ रहा
    मैं जानू तेरी खुदगर्जी को
    जाने कितने घरों से बली लिए
    नहीं भर्ती मौत की क्या मटकी
    नित- नित मेरी कोख उजाड़ रहा
    तू आया क्यों है रे कपटी

  • मजबूर हुए मजदूर……..

    सपनो की दुनिया आँखों में लिए चले थे दूर,
    पता नहीं था हो जायेंगे वो इतने मजबूर |

    षडयंत्रो की चालो में जो बुरे फंसे मजदूर,
    कहाँ पता था हो जायेगा वक़्त भी इतना क्रूर ||

    टूट रहा हैं पत्थर दिल पर महामारी की आहत में,
    शहर चले थे हालातों के परिवर्तन की चाहत में||

    बंद पड़े हैं दफ्तर सारे नहीं जेब में पूंजी हैं,
    खाली दिल की उम्मीदें ही सबसे वाजिब कुंजी हैं ||

    खैर चल रही रेल किसी प्यासे को लगती पानी हैं,
    पर पानी में साफ दिख रहा सियासी मनमानी हैं ||

    कभी रेल मंजिल से पहले खुदा द्वार तक जाती हैं,
    भूखो को गंतव्य बताकर वही छोड़कर आती हैं ||

    कभी भटकती रेलगाड़ियाँ कहाँ कहाँ चल जाती हैं,
    पांच दिनों के बाद वो वापस अपने मंजिल आती हैं

    नम हैं आँखें लोगों की इन हालातों की सिड़की से,
    धैर्यवान अपनों की राहें झाँक रहे हैं खिड़की से||

    –रितिक यादव

  • मजदूर की मजबूरी

    हां मजदूर है; सो मजबूर हैं, उनकी क्या खता; जो घर से दूर हैं
    पैदल चल- चल; थक कर चूर हैं, सड़कें सारी; तपती तंदूर है,
    ट्रेनों में भी; भीड़ भरपूर है, सरकारों को आखिर; कैसे मंजूर है
    कैसा यह; बना दस्तूर है, जो मजदूर है; आज मजबूर हैं

    जिसने सबके सपनों को, मेहनत से किया पूरा
    आज उसी के सपनों का, कोविड ने कर दिया चूरा
    कहीं पांव में छाले, कहीं खाने के लाले
    पानी पिये तो खाली, पड़े हैं सारे प्याले

    इंसानों की मंडी में अब, इंसानियत ना दिखती
    वरना पलायन करते मजदूरों की भीड़ यूं ना दिखती
    जब तक काम तब तक खुश, पूरे प्रदेश का वासी
    अब काम निकला तो फेंक दिया, समझ कर बासी

    कर्मस्थली से जन्मस्थली, की यह दूरी,
    लगने लगी है अब, धरती से चंदा की दूरी
    उनके पास नहीं चेक, ना ही है कोई जेक
    सरकार क्यों करे परवाह, वो नहीं है वोट बैंक

    आज सुअवसर आया है, चलो मानवता दिखलाये
    भूल जाये क्षेत्र की बातें सारी, सब भारतीय बन जाये
    ना बैठे सिर्फ सरकार भरोसे, सब हाथ मदद का बढ़ाये
    भावना वसुधैव कुटुंबकम् की, जागृत कर दिखलाये

  • लाचार

    वक्त ने कैसा करवट बदला बेज़ार होकर।
    तेरे शहर से निकले हैं बेहद लाचार होकर।

    पराया शहर, मदद के आसार न आते नज़र,
    भूखमरी करीब से देखी है बेरोजगार होकर।

    तय है भूख और गरीबी हमें जरूर मार देगी,
    भले ही ना मरे महामारी के शिकार होकर।

    आये थे गाँव से, आँखों में कुछ सपने संजोए,
    जिंदगी गुज़र रही अब रेल की रफ़्तार होकर।

    बेकार हम कल भी न थे, और ना आज हैं,
    दर-ब-दर भटक रहे, फिर भी बेकार होकर।

    जरूरत मेरी फिर कल तुझको जरूर पड़ेगी,
    खड़ा मैं तुझको मिलूँगा फिर तैयार होकर।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • मजदूर

    हमारा कसूर क्या था
    आखिर क्यों मजदुर हुए हम
    दर दर भटकने पर
    मजबूर हुए हम

    इस महामारी से तकरार है
    रोजी रोटी की दरकार है
    अपनों से मिलने के लिए
    बेक़रार हुए हम

    मरने का खौफ नहीं
    अपनों के साथ जीने मरने की खायी है कसम
    इस कसम को निभाने के लिए
    नाराज रास्तो पे चल पड़े हम

    जिन्दा रहे तो कीड़ों-मकोड़ों
    से रेंगते नजर आयेंगे ।
    मर गए तो ये सवाल,
    तुझसे पूछे जायेंगे ।

    मेरा कसूर बता,
    क्यों मजदूर हुए हम ।

  • आ अब लौट चले

    अब छोड़ चले हम परदेश ।
    जब से लगी किस्मत में ठेस ।।
    घर परिवार में मिल जायेंगे ।
    वहीं पे रूखी सुखी खायेंगे।।
    एक तरफ करोना के शैलाब ।
    दूसरे तरफ मौत के शैलाब ।।
    कहीं काल हमें निगल न ले ।
    क्यों न इससे पहले लौट चले। ।
    जान है तो ए सारा जहान है ।
    यहाँ सब अपनो में परेशान है ।।
    मास्क लगाये दिल घबड़ाए ।
    देखो सब अपनो से दूरी बनाए। ।
    सारे काम काज हो गए बंद ।
    करोना जो दिखाया अपना रंग ।।
    न मिला सहारा न मिला दाना पानी ।
    यही है प्रवासी मजदूर की कहानी।।

  • लौटकर शीघ्र आऐंगे बाद-ए-कहर

    चल रहे छोड़कर हम तो तेरा शहर दोस्तों।
    लौटकर शीघ्र आऐंगे बाद- ए-कहर दोस्तों।।
    साथ तेरा मिला हमें कदम -दर-कदम।
    चीन से आके वाइरस ये बड़ा बेरहम।।
    है ये कैसा मचाया जुल्म -ओ-कहर दोस्तों।
    चल रहे छोड़कर हम तो तेरा शहर दोस्तों ।।
    मेहनत से हमने भी तुझको अन धन का भंडार दिया।
    तूने भी तो मुझको निज बच्चे -सा हीं प्यार दिया।।
    बैठ के खाऊँगा आखिर कब तक इस कदर दोस्तों।
    चल रहे छोड़कर हम तो तेरा शहर दोस्तों।।
    लौटकर शीघ्र आऐंगे बाद -ए-कहर दोस्तों।।

  • मैं मजदूर हूँ

    विलासता से कोसों दूर हूँ।
    हाँ, मैं मजदूर हूँ।

    उँची अट्टालिकाएँ आलिशान।
    भवन या फिर सड़क निर्माण।
    संसार की समस्त भव्य कृतियाँ,
    असम्भव बिन मेरे श्रम योगदान।
    फिर भी टपकते छप्पर के तले,
    रहने को मैं मजबूर हूँ।
    हाँ, मैं मजदूर हूँ।

    वस्त्र, दवाईयाँ या फिर वाहन।
    संसार की अनन्य उत्पादन।
    असम्भव बिन मेरे परिश्रम,
    कारखानों की धूरी का घूर्णन।
    तपती धूप में पैदल नंगे पाँव,
    चलने को मैं मजबूर हूँ।
    हाँ, मैं मजदूर हूँ।

    कर्ण भेदती करुण क्रंदन।
    आतुर तीव्र हृदय स्पंदन।
    सुंदर वस्त्र, सजे खिलौने,
    निहारती बच्चों के नयन।
    बाल हठाग्रह पूर्ण करने में,
    असमर्थ हूँ, मैं मजबूर हूँ।
    हाँ, मैं मजदूर हूँ।

    छप्पन भोग तो मुझे ज्ञात नहीं।
    दो समय भी रोटी पर्याप्त नहीं।
    संसार की क्षुधा मैं तृप्त करता,
    किंतु मेरी व्यथा समाप्त नहीं।
    शांत करने क्षुधा की अग्नि,
    जल पीने को मैं मजबूर हूँ।
    हाँ, मैं मजदूर हूँ।

    जहाँ-तहाँ फैला कूड़े का अंबार।
    जिसे देख करते घृणित व्यवहार।
    अस्पृश्य गंदगी अपने हाथों से ,
    मैं स्वच्छ करता हूँ सारा संसार।
    फिर भी गंदी बस्ती में,
    रहने को मैं मजबूर हूँ।
    हाँ, मैं मजदूर हूँ।

    सदियों से हम शोषित, उपेक्षित वर्ग हैं।
    वैसे कई योजनाएँ, नाम हमारे दर्ज़ है।
    ज्ञात नहीं लाभ उसका किनको मिला,
    साहूकारों का सर पर हमारे कर्ज है।
    अंतहीन ॠण से उॠण होने हेतु,
    बाध्य हूँ, मैं मजबूर हूँ।
    हाँ, मैं मजदूर हूँ।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • मजदूर की व्यथा

    कोरोना नामक महामारी हमारे देश में है आई
    इस महामारी ने पूरे प्रशासन में हड़कंप है मचाई।

    सरकारों ने महामारी से निपटने के लिये कई तरकीब है अपनाई
    पर सबसे सख्त तरकीब तालाबंदी नजर आई।

    मध्यम वर्गीय और रईसों ने इस फैसले की खूब की बढ़ाई
    पर अंतत: सबसे ज्यादा पिसे हमारे गरीब मजदूर भाई।

    मध्यम वर्गीय और रईसों ने, तालाबंदी में घर में खूब बनाये व्यंजन और मिठाई
    लेकिन गरीब मजदूर ने भोजन कम, दर-दर की ठोकर ज्यादा खाई।

    मजदूरों ने हमारे घरों और जीवन की अपने खून पसीने से कि सिंचाई
    लेकिन बदले में हमने उन्हें दिया मिलों दूर कि पैदल चलाई।

    जिन मजदूरों ने सड़क और पटरी बनाकर हमारे देश की रफ्तार थी बढ़ाई
    आखिर में यही सड़क और पटरी उन्ही के काम आई।

    सरकारों ने भी एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर अपनी जिम्मेदारी है छुपाई
    क्या यही वह समाजवाद है जिसकी संविधान देता है दुहाई।

    गलती स्थानीय प्रशासन की भी है, जिन्होंने कभी नही की इनकी भलाई
    आखिरकार प्रवासी बनकर आ गये दूसरे प्रदेश में करने के लिए कमाई।

    अंतत: यह भी सिद्ध हो गया जब भी कोई विपदा देश में है आई
    सबसे मजबूर पाये गये हमारे गरीब मजदूर भाई।

  • फिर आएँगे

    कह चले हैं अलविदा उन शहरों को
    जिनमें हम कमाने-खाने आए थे,
    महामारी में बचे रहे तो.. फिर आएँगे l

    मजदूर हूँ, हुनर हाथों में और दिलों में सपने लिए आएँंगे
    इंतजार था बंद खुलने का,
    अपनों से मिलने का,
    चिंता मत करो साहब!
    महामारी बीत जाने दो,
    जिंदा रहे तो फिर आएँगे l
    कह चले अलविदा उन शहरों को,
    जिनमें हम कमाने-खाने आए थे l

    अब तो रेल गाड़ी की रफ़्तार कम सी लगती है ,
    यादों की रफ़्तार के आगे..
    चैन तो तभी मिलेगा ,
    जब अपनों से मिल जाएँगे l
    कह चले हैं अलविदा उन शहरों को,
    जिनमें हम कमाने-खाने आए थे l

    प्रवासी है साहब!
    यहाँ सब मतलब से बात करते हैंl
    प्यार और किसी की देखभाल कहाँ पाएँगे,
    ऐसे में तो सिर्फ अपने ही हैं
    जो गले लगाएँगे l
    कह चले हैं अलविदा उन शहरों को,
    जिनमें हम कमाने-खाने आए थे l

  • नमस्कार

    कवि /कवित्रियों की वेब गोष्ठी को पूनम का प्रणाम🙏
    आप अनुभवी गानों में एक कविता प्रस्तुत करने का साहस कर रही हूंँ आपके स्नेह और सहयोग की आकांक्षा है.

  • चल पडे बैठकर रेल में

    ये मेहनतकश हैं भारत के,
    चल पडे बैठकर रेल में
    इनकी दुविधा समझें हम सब,
    ना लें इसको खेल में
    देश बन्द हुआ, काम बन्द हुआ
    पेट बन्द तो नहीं होता
    काम नहीं, कमाई नहीं है,
    भूखे पेट कैसे सोता.,
    ना खाना है ना दूध मिला
    घर में भुखा बालक रोता
    भुखमरी की दुर्दशा रहे थे ये झेल
    गांव इनके इनको ले चली ये रेल

  • फोटो पर कविता प्रतियोगिता :- शीर्षक – “सुनों!!”

    !सुनों!
    सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर हैं, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|
    क्रूरता की पराकाष्ठा तो देखो, अब तक ये कुटुंब से दूर है|

    भूतल से नभतल तक यह जो हाहाकार मचा,
    प्रकृति ने शुरू अपना तांडव जो किया,
    मनुष्य के मुँह पर जोरदार तमाचा दिया,
    यह जो प्रकृति का बरसा है कहर,
    हकीकत में मनुष्य द्वारा ही दिया गया है जहर|
    सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर हैं, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|

    प्रश्न यह मन में उठता है..
    क्यों हर परिस्थिति में मजदूर ही पिसता है,
    समाजसेवा के यहाँ पर्चे फटने लगे,
    पर डोनों में तो करोना ही बटने लगे,
    गाँव पहुँचने की मन में लिए आस,
    पहुँच गए रेल गाड़ी के पास|
    सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर हैं, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|

    कोरोना का राक्षस बन बैठा सबका भक्षक,
    उल्लास न कहीं दिखता ,मातम ही पैर पसारे टिकता,
    इस महामारी के आगे सब अस्त्र-शस्त्र पड़े धराशाही,
    न रहा अब कोई किसी का भाई..
    इन्हें तो बस गाँव की याद आई..
    किस बात का रोना गाते हो, तुम ने जो बोया वही तो पाते हो|
    सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर हैं, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|

    अस्तित्व अपना बचाने को, घर वापस अपने जाने को|
    पोटली के साथ मुँह को बाँधे बैठे हैं खिड़की के सहारे,
    आँखों के साथ हाथ भी बाहर झाँके, गाँव-गाँव ही अब पुकारे|
    सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर है, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|
    क्रूरता की पराकाष्ठा तो देखो अब तक ये कुटुंब से दूर हैं|

    स्वरचित कविता
    रीमा बिंदल

  • कोरोना या करुणा

    कोरोना या करुणा ! मानव मन की तृष्णा या फिर समय को रोककर गीता ज्ञान सुनाए कृष्ण ! विकास का अवकाश या फिर प्रकृति का राज्य –
    अभिषेक ! कोरोना या करुणा ! दिखने लगे हैं जंगल के जान वर, घरों में छिपने लगे मानव जाति के सभी मान्य वर! दिखने लगा है हिमालय गंगा नदी का निर्मल पानी नहीं चलेगी मानव की मनमानी! कोरोना या करुणा! गलती की थी पासपोर्ट ने सजा काटता राशनकार्ड प्रकृति का न्याय कहो या शासन का अन्याय! शासन था मजबूर मीलों पेदल चला मजदूर! शहर का गार्डन सुंदर या गाव का मन्दिर कोरोना या करुणा! कोरोना बनकर आया है विश्व विजेता सिकंदर देखो इतिहास का मंजर! महान सिकंदर भी था जेन मुनि महावीर के आगे नटमस्तक, जेन मुनि की तरह मुह पर मास्क लगाओ कोरोना नहीं देगा दस्तक! चाणक्य की सुजबूज से भी सिकंदर का सेनापति गया हार बना रिश्ते दार! चाणक्य रूपी च्वनप्राश खाओ कोरोना रूपी सिकंदर खाली हाथ ही आएगा और खाली हाथ ही जाएगा

  • देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया

    देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया ?
    जिसे अपना बनाया वही बेगाना शहर हो गया।।
    लेके दिल में तमन्ना था आया यहाँ।
    बन्द सब कुछ हुआ अब जाए कहाँ?
    न खाने को कुछ है बचा और जीना दुष्कर हो गया।
    देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया।।
    बन्द फैक्टरी हुई सब धन्धा गया।
    कार रिक्शा चलाना भी मन्दा भया।।
    अब तो किराये के घर से भी बेघर हो गया।
    देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया।।
    कोई पैदल चला कोई साईकिल सवार।
    बस ट्रक से चला कोई यू•पी• बिहार।।
    कुछ अफवाहें उठी व टीशन पे भगदर हो गया।
    देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया। ।
    बड़ी मुश्किल से कुछ रेलगाड़ी मिली।
    जैसे तैसे श्रमिकों हित सवारी मिली।।
    बांध मुख पे सब पट्टी आठों पहर हो गया।
    देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया।।
    गाड़ी चलती रही मन मचलता रहा।
    देख खिड़की से हर मन पिघलता रहा।।
    गांव जाकर भी सब के सब बेघर हो गया।
    देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया।।
    आत्मनिर्भर बनो एक स्लोगन मिला।
    भूखे प्यासे को वाह क्या भोजन मिला।।
    देख दुनिया ‘विनयचंद ‘ किधर का किधर हो गया।
    देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया। ।??

  • “खिड़कियों से झांकती आँखें”

    कितनी बेबस हैं लोह-पथ-गामिनी (रेलगाड़ी)
    की खिड़कियों से झांकती 👁आंखें।
    इन आंखों में अनगिनत प्रश्न उपस्थित हैं।
    कितनी आशाएं कीर्तिमान हो रही हैं ।
    अपने परिजनों से मिलन की उत्सुकता
    ह्रदय को अधीर कर रही है।
    परंतु कोरोना महामारी का भय
    यह सोचने पर मजबूर कर रहा है,
    कि कहीं अपने परिजनों को हम
    भेंट स्वरूप कोरोना महामारी तो
    प्रदान नहीं कर रहे?
    यह बात लोह-पथ-गामिनी के इन
    सहयात्रियों को व्यथित कर रही है।
    मुख पर लगा मुखौटा(मास्क),
    इंनकी इस धारणा को बखूबी प्रदर्शित कर रहा है।
    इन श्रमिकों, प्रवासी मजदूरों को
    इस बात की अत्यंत खुशी है
    कि एक अर्से के बाद
    जिस रोटी की तलाश में वो परदेस गए थे।
    आज उसी रोटी की अभिलाषा में
    अपने गंतव्य प्रस्थान करेंगे।
    रूखी सूखी खाकर ही,
    अपनी जठराग्नि को शांत करेंगे।
    “मजबूरी में मजदूरी की
    मजबूरी में घर से निकले।
    आज फिर मजबूरी में
    मजदूरी छोड़ प्रवासी पहुंचेंगे।।”

  • यादों को फिर से समेटना है।

    जब छोड़ के आए थे गाॅऺव को हम,
    तब हमें न पता चला था अपना ग़म,
    लेकिन इस महामारी में याद आए गाॅ॑व के हसीन पल,
    जहां मिल जाता था हर समस्या का हल,
    आज लंबे अरसे के बाद वहां जाना है,
    क्योंकी यहां हर मजदूर बेबस और बेचारा है,
    रेलवे में बैठकर एक दफा इस शहर को देखना है,
    छुटी हुइ यादों को एकबार फिर से समेटना जो है।

  • बेहाल मजदूर

    आया ‘कोरोना वायरस’ सबसे
    ज्यादा हम बेहाल हुये।
    सच कहता हूँ हम
    मजदूरों के बहुत ही बुरे हाल हुये।
    छूटा रोजगार तो,
    दाल रोटी के लाले हो गये।
    मकान मालिक भी किराये के,
    तलाशी हो गये।
    हम मजदूर,मजबूर,
    बेबस व लाचार बन गये।
    उठा झोला परिवार संग,
    घर की ओर चल दिये।
    न ट्रेन,न ही मोटरकार,
    और न ही कोई बस मिली।
    पैदल ही चले क्योंकि न,
    कोई और आशा दिखी।
    हम गिरे,गिरकर फिर उठे,
    चल दिये,चलते गये।
    खुद रोये,खुद चुप हो गये,
    आगे बढ़े,बढ़ते गये।
    भूख,प्यास से हम जूझते गये
    फिर भी आगे बढ़ते गये।
    पैरों के छालों की ना फ़िक्र की,
    हम आगे चलते गये।
    जो आयी विपदा उसके
    हम गरीब न जिम्मेदार है।
    जो रईस आये विदेश से
    वही असली कर्णधार है।
    तुम ‘एअरपोर्ट’ पर अच्छे से,
    उनकी जाँच करते।
    होते लक्षण तो उन्हे वही,
    क्वारेंनटाईन करते।
    न फैलता वायरस और हम सब,
    सुरक्षित बच जाते।
    चन्द रईसों के चक्कर मे यूँ,
    न हम दर-दर की ठोकर खाते।
    करनी इनकी थी बदनामी पर बदनाम,
    हम गरीब मजदूर हो गये।
    इन पासपोर्ट्स के चक्कर में,
    राशनकार्ड के चिथड़े उड़ गये।”

  • टूटे अपने सपने

    थी ख्वाईश हमारे दिल को मगर,
    इतफाकन गम करोना के मिल गए।
    जब होने लगे थे साकार अपने सपने,
    तब महामारी के आगोश में हम समा गए।।
    क्या करे घर में जवान बहन बेटी थी हमारी,
    बेरोजगारी के देश में रोजगार कहाँ मिलता।
    पापी पेट का सवाल लिए खड़े थे हमारे बच्चे,
    गर न जाता परदेश होंठों पे हंसी कैसे आता।।
    सोचा था अपने गुलशन में गुल खिलायेंगे,
    गुल न खिल कर किस्मत में काँटे ही मिले।
    गरीब की गठरी सिर पर ले कर ए दोस्त,
    देखो जरा शहर से हम अपने गाँव चले।।

  • दिल हार गया

    गये थे परदेश दो वक्त के रोटी कमाने।
    क्या पता था करोना आएगा दिल जलाने।।
    दिल में सपने ले के, चले थे हम परदेश ।
    सपने सपने ही रह गए बदल गये हमारे भेष।।
    कभी एक गज की दूरी तो कभी दो गज की दूरी।
    कैसे कमाते हम यही थी हमारी मजबूरी।।
    किस्मत व करोना ने क्या क्या रंग दिखाए।
    मुंह (👄) में पट्टी बगल में करोना हाए हाए।।
    कहे कवि चलो वापस चले बहुत कमा लिए यार ।
    जिंदगी है अनमोल यही कहता है घर परिवार।।

  • प्रवासी मजदूर

    प्रवासी मजदूर

    मजदूर हूं, मजबूर हूं,
    कैसी है तड़प हमारी,
    या हम जाने, या रब जाने,
    आया कैसा चीनी कोरोना,
    ले गया सुख-चैन हमारा,
    जेब में फूटी कौड़ी नहीं,
    छूट गया काम- धाम हमारा,
    खाने को पड़ गए लाले,
    घर जाना अब है जरूरी हमारा,
    जाऊँ या न जाऊँ दोनों तरफ है मौत खड़ी,
    मंजिल है मिलोंं दूर फिर भी,
    घर जाना है जरूरी हमारा,
    कुछ पैदल ही चले गए,
    कुछ साइकिल से चले गए,
    कुछ रास्ते में ही दुनिया छोड़ गए,
    सामने है कोरोना खड़ी,
    जाऊं या न जाऊं,
    दोनों तरफ है मौत खड़ी,
    मंजिल है मिलों दूर फिर भी,
    घर जाना है जरूरी हमारा,
    महीनों से हूं पिंजरबद्ध पंछी बना,
    लॉकडाउन में मैं हूं पड़ा,
    ऐसे में आया राहत सरकार का,
    प्रवासी मजदूर के लिए चलेगी रेलगाड़ी,
    मन खिल गया हमारा,
    बुढ़ी माँ मुझे बुला रही,
    अब घर जाना है जरूरी हमारा ।

  • KISAN

    DESH KI AAN,BAN,SHAN KISAN KITNA PRESHAN KHET KI JAN,PHCHAN,ARMAN KISAN KITNA PRESHAN MEHNT KI JUBAN,MUKAN,PRWAN KISAN KITNA PRESHAN FASAL KE NA MILE DAM MHGAI KI MAR PED PR LTKA JMI PR BIKHRE ARMAN KISAN KITNA PRSHAN

  • अन्नदाता कहलाता हूं

    अन्नदाता कहलाता हूं
    पर भूखा मैं ही मरता हूं
    कभी सेठ की सूद का
    तो कभी गोदाम के किराये का
    इंतजाम करता फिरता हूं

    बच्चे भूखों मरते है
    खेत प्यासे मरते है
    अब किसकी व्यथा मैं दूर करूं
    मैं ही हरपल मरता हूं
    अन्नदाता कहलाता हूं

  • खामोश किसान

    खामोश किसान

    जवाब देने में हाज़िरजवाब बताये गए हम,
    के अपने ही घर में खामोश कराये गए हम,

    ज़िन्दगी बनाने को कितनी ही जगाये गए हम,
    के अपनी ही चन्द सांसों से दूर कराये गये हम,

    हर मौसम से क्यों सामने से भिड़ाये गये हम,
    के सूखी धरती पे ही सूली पर चढ़ाये गए हम।।
    राही (अंजाना)

  • किसान की व्यथा

    किसान की व्यथा

    पसीना सूखता नहीं धूप में।
    किसान होता नहीं सुख में।।

    अतिवृष्टि हो या फिर अनावृष्टि।
    प्रकृति की हो कैसी भी दृष्टि।
    किसानों के परिश्रम के बिना,
    कैसे पोषित हो पाएगी सृष्टि।
    संसार का पोषण करने वाला,
    क्यों रह जाता है भूख में।
    पसीना सूखता नहीं धूप में।
    किसान होता नहीं सुख में।।

    इनके परिश्रम का मूल्यांकन, हमारी औकात नहीं।
    ना मिल पाए उचित मूल्य, ऐसी भी कोई बात नहीं।
    मौसम की मार और सर पर कर्ज का भार,
    क्यों इनके हिस्से भी, खुशियों की सौगात नहीं।
    आत्महत्या करने पर विवश,
    कर्ज़ अदायगी की चूक में।
    पसीना सूखता नहीं धूप में।
    किसान होता नहीं सुख में।।

    सरकारें तो बस आएंगी और जाएंगी।
    किसानों को सही परितोष मिल पाएगी?
    इनका भी परिवार है, जरूरतें हैं, सपने हैं,
    अछूता वर्ग, मुख्यधारा से जुड़ पाएगी?
    हमें सुख में रखने वाला,
    क्यों रह जाता है दुख में।
    पसीना सूखता नहीं धूप में।
    किसान होता नहीं सुख में।।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • बेटी से सौभाग्य

    बेटी है लक्ष्मी का रुप,
    मिलतीं है सौभाग्य से,
    घर का आंगन खिल जाता है,
    उसकी पायल की झन्कार से।
    बेटी ही तो मां बनकर,
    हमको देती नया जनम,
    सम्मान करें हर बेटी का,
    यह है हर मानव का धरम,
    जनम न दोगे बेटी को तो,
    संसार ये रुक जाएगा,
    बिन बेटी के, बेटे वालो,
    बेटा न हो पाएगा।

  • सिर्फ़ बोझ न समझ मुझे

    सिर्फ़ बोझ न समझ मुझे

    जीना चाहती हूं मैं भी
    इस दुनिया को देखना चाहती हूं
    मां तेरे आंचल में सर रखकर सोना चाहती हूं
    बापू तेरी डाट फ़टकार प्यार पाना चाहती हूं

    मां मैं तेरा ही हिस्सा हूं
    तेरा अनकहा किस्सा हूं
    तू मुझे अलग कर क्या जी पायेगी
    इस दुनिया की भीड़ में तू भी अकेली पड़ जायेगी

    इक मौका तो दे मुझे
    बापू को अपने हाथ से रोटी बनाकर खिलाऊंगी
    कक्षा में प्रथम आकर मैं सबको दिखलाऊंगी
    बड़ी होकर जब अधिकारी बन घर आऊंगी
    बापू के सर को मैं ऊंचा कर दिखलाऊंगी

    जीना चाहती हूं मैं भी
    इक मौका तो दे मुझे
    सिर्फ़ बोझ न समझ मुझे|

  • बेटी घर की रौनक होती है

    बेटी घर की रौनक होती है
    बाप के दिल की खनक होती है
    माँ के अरमानों की महक होती है
    फिर भी उसको नकारा जाता है
    भेदभाव का पुतला उसे बनाया जाता है
    आओ इस रीत को बदलते है
    एक बार फिर उसका स्वागत करते है

  • बेटियाँ

    पैदा होने से पहले मिटा दी जाएँगी बेटियाँ,
    बिन कुछ पूछे ही सुला दी जाएँगी बेटियाँ,

    गर समय रहते नहीं बचाई जाएँगी बेटियाँ,
    तो भूख लगने पर रोटी कैसे बनाएंगी बेटियाँ,

    जहाँ कहते हैं कन्धे से कन्धा मिलायेंगी बेटियाँ,
    सोंच रखते हैं एक दिन बोझ बन जाएँगी बेटियाँ,

    चुपचाप गर यूँही कोख में छिपा दी जाएँगी बेटियाँ,
    तो भला इस दुनियां को कैसे खूबसूरत बनायेंगी बेटियाँ॥

    राही अंजाना

  • चुनावों के इस मौसम में

    चुनावों के इस मौसम में
    फिजा में कई रंग बिखरेंगे
    अगर कर सके हम अपने मत का सही प्रयोग
    हम नये युग में नयी रोशनी सा निखरेंगे

  • वोट डालने चलो सखी री

    वोट डालने चलो सखी री

    वोट डालने चलो सखी री
    लोकतंत्र के अब आयी बारी
    एक वोट से करते हैं बदलाव
    नेताजी के बदले हम हाव-भाव !
    सही उम्मीदवार का करते है हम चुनाव,
    बेईमानों को नहीं देंगे अब भाव !

    आपका वोट है आपकी ताकत
    लोकतंत्र की है ये लागत

    सुबह सवेरे वोट दे आओ
    वोटर ID संग ले जाओ !

  • जागरूक मतदाता

    सोंच समझकर वोट दें तो बन जायेगी तकदीर,
    चलो निकाले सोच समझ कर ऐसी कोई तदबीर,

    विश्व पटल पर छप जाये अपने देश की तस्वीर,
    जागरूक करे जो हर जन को हो ऐसी कोई तरकीब,

    लोकतन्त्र समझे नहीं और बहाते जो झूठे नीर,
    जनता के मतदान से ही जो बन जाते बलवीर,

    हर मतदाता का मान करे जो सरकार चलाये वीर,
    चलो लगादे हिम्मत कर अब कोई ऐसी तरतीब।।

    राही अंजाना

  • माँ

    माँ

    देखा किसी ने नहीं है मगर बहुत बड़ा बताते हैं लोग,
    कुछ लोग उसे ईश्वर तो कुछ उसे खुदा बताते हैं लोग,

    पता किसी के पास नहीं है मगर रस्ता सभी बताते हैं लोग,
    कुछ लोग उसे मन्दिर तो कुछ उसे मस्ज़िद बताते हैं लोग,

    ढूढ़ते फिरते हैं जिसे हम यहां वहां भटकते दर बदर,
    तो कुछ ऐसे भी हैं जो उसे तेरी मेरी माँ बताते हैं लोग।।

    राही (अंजाना)

    (Winner of ‘Poetry on Picture’ contest)

  • धुँआ

    पूरे शहर को इस काले धुंए की आग़ोश में जाना पड़ा,
    क्यों इस ज़मी की छाती पर फैक्ट्रियों को लगाना पड़ा,

    चन्द सपनों को अपने सजाने की इस चाहत में भला,
    क्यों उस आसमाँ की आँखों को भी यूँ रुलाना पड़ा,

    अमीरों की अमीरी के इन बड़े कारखानों में घुसकर,
    क्यों हम छोटे गरीबों के जिस्मों को ही यूँ हर्जाना पड़ा॥

    राही (अंजाना)

  • हवा में घुल रहा आज जहर है

    हवा में घुल रहा आज जहर है
    सांसो को आज तरस रहा आज शहर है

    बंद कमरे में कब तक कैद रहोगे
    खुले आम घूम रहा आज कहर है

  • सर्दी नहीं जाने वाली

    सर्दी नहीं जाने वाली


    बन्द मुट्ठी में हैं मगर कैद में नहीं आने वाली,
    हाथों की लकीरों की नर्मी नहीं जाने वाली,

    आलम सर्द है मेरे ज़हन का इस कदर क्या कहूँ,
    के ये बुढ़ापे की गर्मी है यूँही नहीं जाने वाली,

    जमाकर बैठा हूँ आज मैं भी चौकड़ी यारों के साथ,
    अब अकेले रहने से तो ये सर्दी नहीं जाने वाली।।

    राही (अंजाना)

  • फुलझड़ियाँ

    फुलझड़ियाँ

     

    आसमाँ छोड़ जब ज़मी पर उतरने लगती हैं फुलझड़ियाँ,
    हाथों में सबके सितारों सी चमकने लगती हैं फुलझड़ियाँ

    दामन अँधेरे का छोड़ कर एक दिन ऐसा भी आता है देखो,
    जब रौशनी में आकर खुद पर अकड़ने लगती हैं फुलझड़ियाँ,

    अमीरी गरीबी के इस भरम को मिटाने हर दीवाली पर,
    दुनियाँ के हर कोने में बिजली सी कड़कने लगती हैं फुलझड़ियाँ।।

    – राही (अंजाना)

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