दर्द देना गर फितरत है तेरी , अपनीयत का तुम गला दबा दो  चाहें जितने भी फिर ज़ख्म दिला दो, अपनीयत के दर्द से मुझे बचा दो                                                       ……  यूई

दर्द अपनों को , भूले से भी दिया नहीं करते  गर देना ही है दर्द तो , अपना उन्हें कहा नहीं करते                                                        ……  यूई

कभी बादलों से कभी बिजलिओं से बनती है सरगम कलकल बहते पानी चलती हवाओं से बनती है सरगम इठलाती घूमती बेटियां होती झंकार बनती है सरगम अपनी साँसें भी जब सुर में हो बनती है […]

कोई वज़ह यूँ भी निकल आती तेरे मिलने की तारों की सजी डोली लेके आता कहार मेरे मन के द्वार मैं मन ही मन में रूप लेता निहार काश उस डोली में कोई ख्वाब सजा […]

चल पड़ा फिर जिस्म किसी राह में मन को छोड़ अकेला क्यों नहीं चलते दोनों साथ -साथ कोई रंजिश नहीं फिर भी रंजिश फूल की बगावत किसी टहनी से भवरे की शिकायत किसी फूलों से […]

रात अपना ही कोई किस्सा बन जाता हूँ दिन के उजाले में कोई हिस्सा बन जाता हूँ निकल तो जाता हूँ बाज़ारों में कहीं शाम के होते ही न चलने वाला कोई सिक्का बन जाता […]

मेरे जज्बात अब पत्थर हो गए है अब फूलों की बातें पहरों में सिसक रही है अब लहरें समुन्दर की सांसें बन गई है अब हवाओं में फैल गए है नग्मे दर्द भरे अब जमाने […]

बचपन की कागज़ की नाव जो बारिश के पानी में तैरती थी जो कई बार तैरते तैरते थक जाती थी और उसे फिर से सीधा कर पानी में छोड़ देते थे और वो फिर तैरने […]

बिना कलम मैं कौन क्या परिचय मेरा कहां का रहवासी मैं शायद कविता लिखने वाला कवि था मैं पर अब मै कौन बिना कलम मैं कौन   कलम के सहारे नन्ही नन्ही लकीरों से रचता […]

होठों से बयाँ होता है आँखों का दर्द सुनहरा , जब अश्क रूठ जाते हैं किसी बेगाने की यादों में , हर दर्द जवाँ हो जाता बीते हुये हर उस पल सेें, जिनकी यादों की […]

दोस्त इक अजीब सा रिश्ता पनपने लगा हम दोनों के बीच इक दूजे के दर्द को महसूस सा करने लगे कुछ खट्टी कुछ मीठी सांसों का बँटवारा भी रजा से करने लगे कुछ प्यार से […]

स्वयम्‌ सृजन    पाने की चाहत मालिक को, कैसे पूरी कर पाएगा, ख़ुद की अनुभूति कर ना पाया, उसको कैसे पाएगा ? है नग्न इंसान उसके हिसाब में, छुपा उससे कुछ ना पाएगा, अंत उतरने […]

मौलिक–विचार है म्हा–शक्ति, जो उसने ख़ुद तेरे चित्‌ जगाई है, रहते ख़ास कारण उसके काम मैँ,क्यों उसने तुममे यह भरपाई है ?   निर–विचार जो जीवन जी जाएगा,कैसे मूड़–मन को बदल तूं पाएगा, गर मौलिक–विचार […]

क्यों यह परदा दारी है, आ खुल के मेरे सामने आ मुझसे नज़र मिला के कह, तू कभी ना ग़लत हुआ सब नजरों में बन खुदा, भय का यह व्यापार चला मुझसे ना कहना ओ […]

गरूर–ए–नजर में तेरी, मेरा सर झुका रहा तूने जब आवाज़ दी, दिल ने पलट कर कहा शायद तूँ बदल गया, घर मेरा मुझे मिल गया फिर तू मुझे छल गया, दिल से मेरा घर गया […]

रूह मेरी तड़प तड़प गई, तूने ना पुकार सुनी तुझसे ना–उम्मीदी में, बैरंग सी यह फिज़ा बुनी ज़िन्दगी तो बसर गई, हर रिश्ता तार–तार हुआ तेरे–मेरे इस खेल में, हर किरदार दागदार हुआ                                                        …… […]

जाने क्यों तुम नाराज हुए, ख़ुद ही मुझको ज़ुदा किया ना थे हम हमराज़ कभी, फिर क्यों यह शिकवा किया ता–उमर चली तूने अपनी राह्, दिल मेरा लोच्ता रहा चला जब मैं अपने दिल की […]

था मैं चला कहां से, इसकी ना कोई याद मुझे हुआ मैं ग़लत कहां पे, इसका ना आभास मुझे चेतना है धुंधली सी, शायद था मैं कोई अंग तेरा क्या वोही है घर मेरा, जिस्मे […]

रहस्य जीवन अनेक प्रश्न निरुत्तर प्रश्न संभव जीवन संभव मोक्ष निरर्थक प्रश्न पुनर्जन्म संभव जन्म सार्थक प्रश्न मृत्यु प्रश्न सत्य प्रश्न यथार्थ प्रश्न प्रारब्ध चिंतन सार्वभौमिक चिंतन अलोकिक प्रश्न जीवन चिंतन जीवंत प्रश्न आलोकित प्रश्न […]

जिधर का रुख करें इन फ़िज़ाओं को साथ रख लेना इन फ़िज़ाओं में बसी अपनी साँसों को साथ रख लेना वक़्त मिलता कहाँ कभी खुद से रुबरूं होने का कभी हाथों में तुम एक टूटा […]

खौफ आईने का हर शक्ल पर भारी है हर शक्ल आईने के सामने आकर बिखर जाती है कुछ तो रहस्य छिपा है आईने में शक्ल जो सिहर जाती है आईने को तोड़ के देखा शक्लों […]

बंद कर देखों नयन अपने खुली रहने दो , सब जो नयन नहीं है नयन से देखने का अभ्यास अविरल है स्वयं अन्य इन्द्रियों की दृष्टि शक्ति कम की है अभ्यास एक शास्वत जीवंत परिणाम […]

जब किसी सितम की कभी इन्तहाँ होती है! सोती हैं ‘तकदीरें मगर आँख रोती है! वक्त के कदमों तले कुचल जाती हैं मंजिलें, डूबती तमन्नाओं की सहर कब होती है? Composed By #महादेव