मुसाफिर अपनी राह से भटक रहा है मृग जाने किस चाह से भटक रहा है रहस्य दर्पण में नहीं आकृति में नहीं दर्पण किस गुनाह से भटक रहा है किस सत्य की खोज में मन […]
मुसाफिर अपनी राह से भटक रहा है मृग जाने किस चाह से भटक रहा है रहस्य दर्पण में नहीं आकृति में नहीं दर्पण किस गुनाह से भटक रहा है किस सत्य की खोज में मन […]
सच ने जब भी तोडा है दम झूठ ने ही उसे अग्नि दी है राजेश’अरमान’
था वो गुलाब के मानिंद नज़र बस तेरी काटों पे गड़ी मैंने भी महसूस किया कैक्टस को नज़रे जो कभी फूलों पे पड़ी राजेश’अरमान’
जब अपनी ही साँसें एहसान जताने लगे समझ लो साँसें भी अपनी हो गई है राजेश’अरमान’
धर्म की दूकान सदियों से चल रही है , कीमत तो चुकाई पर सामान नहीं मिला राजेश’अरमान’
बिखरी जा रही ज़िंदगी कुछ तेज रफ़्तार से कोई मोहलत नहीं कुछ भी दुरुस्त करने को राजेश’अरमान’
तेरी बेरुखी इस कदर काम कर गई बेवज़ह वक़्त को बदनाम कर गई रिश्तों पे पड़ी धूल जब जमने लगी ख़ामोशी के राज़ सरेआम कर गई राजेश’अरमान’
हर फैसले मेरे तेरे क़दमों में थे तूने क़दमों का फ़ासला कर लिया न हो दरम्यां सांसें भी अपनी लेकिन , तूने ज़ख्मों का काफिला चुन लिया राजेश’अरमान’
मैं समझ नहीं पाता अपने ही देश में देशद्रोहिता के रहस्य मैं समझ नहीं पाता अपने ही देश में असहिष्णुता के मायने मैं समझ नहीं पाता अपने ही देश में पलता धर्मो का खेल मैं […]
अजैविक गम की खाद से ख़ुशी हो गई बोन्साई राजेश’अरमान’
होठों पे ख़ामोशी की लहरें ढूंढ़ती है लफ़्ज़ों के समुन्दर राजेश’अरमान’
कुछ तो बात है तेरे शहर की ये ज़ख्मों को भी तन्हा नहीं रखते राजेश’अरमान’
What if the Sun desires not to shine? What if the birds desire not to chirp? What if the flowers desire not to bloom? What if the rivers desire not to flow? What if the […]
वो खफा है अब इस बात पर आता नहीं सलीका गम उठाने का राजेश ‘अरमान’
ज़िक्र तिरी वफ़ा का मसला था , जो अब न रहा मैं कब तिरी आँखों में बसा था, जो अब न रहा इक बुतखाने की तिश्नगी से बढ़कर कुछ नहीं कभी बुलंद जमाना मैं था […]
गुज़ारिश गुज़ारिश गुम हुआ अपने शहर की गलिओं मेँ अपना साया है मैंने भी कब अपने शहर का कोई क़र्ज़ चुकाया है अब तो हो गए वो रास्ते भी किसी अजनबी से जिन रास्तों ने […]
फेहरिस्त में भुलाने के नाम, मैं रोज़ सजा लेता हूँ इसी बहाने मैं सबको , याद करने का मज़ा लेता हूँ चाक किस्मत के रहने दो ताउम्र मेरी जागीर की तरह अपने हिस्से के गुनाहों […]
जो यादों में बसा है ,उसे वहीँ रहने दो मेरी दी हुई हिचकिओं में, उसे रहने दो आज साकी तू रुख से पर्दा नहीं नक़ाब उठा मैखाने के बातें बस मयखानों तक रहने दो किसने […]
कोई शाम फिर रात की बाँहों में दम तोड़ गई रात भर वो शाम दरवाज़े पे देती रही दस्तक कुछ धुँधले से साये करीब आकर छूते तो है अपना पता पूछते है मुझ अजनबी से […]
अपनी उलझनों के हम यूँ आदी हो गए है कभी मुजरिम तो कभी फरियादी हो गए है न होता कुछ तो कुछ और जरूर होता बस इसी सोच में कोई बर्बादी हो गए है राजेश’अरमान’
तेरे सायें से लिपटना मेरी आदत भी नहीं प्यार तो दूर बहुत मैं तेरी नफरत भी नहीं क्या दबा रखा है अंदर किसी खंजर की तरह अब मरासिम न सही मगर ऐसी अदावत भी नहीं […]
मेरी आवाज दबा दी गयी मेरे अल्फ़ाज मिटा दिये गये जला दिया मेरा जिस्म भी दुनिया ने मगर ख्वाहिशे कहां मिटती है ढ़ूढ़ लेती है कोई न कोई राह निकल पडती है परत दर परत […]
दुबले-पतले,गोरे-काले। तन पर कपड़े जैसे जाले।। दिख जाते हैं। नुक्कड़ पर,दुकानों पर। ढाबों पर,निर्माणधीर मकानों पर।। देश में इन की पूरी फौज। बिना लक्ष्य ये फिरते हैं यहां वहां हर रोज़।। ज़िन्दगी के पाठ ये […]
ღღ__मैं कह ही नहीं पाता, या तुम समझ नहीं पाते साहब; . कि अक्सर कुछ सवालों के, कोई जवाब नहीं होते !!…..#अक्स .
जॅंहा बचपन गुजारा , उन गलियों में जाना चाहती हूं ; जिन्होनें बचपन सॅंवारा, उन पत्थरों से खेलना चाहती हूं ; आलीशान बगांले को छोड़कर, मम्मी की साड़ी से बने घर में रहना चाहती हॅू […]
चाहतों के दरमियाँ दर्द की दीवारें हैं! ख्वाहिशों में हरतरफ दौड़ती दरारें हैं! खोजते हैं सब्र को मयखानों में सभी, मयकशी में डूबते ख्वाब के नजारे हैं! Composed By #महादेव
तुम ! किसी दुर्दम्य वासना में क़ैद छटपटातीं रहीं जल — हीन मछली सी ……. और मैं ; तमाम वर्जनाओं में घिरा मोम–सा पिघलता रहा अनमना सुलगता रहा यक़ीनन , यह समझौता था—सम्बंध नहीं कहीं […]
ग़ज़ल : अनुपम त्रिपाठी इक शख्स कभी शहर से ; पहुँचा था गाँव में । अब रास्ते सब गाँव के ; जाते हैं शहर को ।। खेत–फ़सल–मौसम ; खलिहान हैं उदास । ग़मगीन चुभे पनघट […]
व्यंग्य …………………………………… ****** पूंछ— पुराण (समग्र)****** कभी देखा है ;आपने , ऐसा कुत्ता ! जो ; देखने में हो छोटा–सा मगर;पूंछ उसकी लंबी हो यानि कि ; —— भली–चंगी हो. जी हाँ ! कई ऐसे […]
ख़्वाबे-वफ़ा के ज़िस्म की खराश देखकर इन आँसुओं की बिखरी हुई लाश देखकर जब से चला हूँ मैं कहीं ठहरा न एक पल राहें भी रो पड़ीं मेरी तलाश देखकर ©® लोकेश नदीश
सब लफ़्जो का खेल है इस दुनिया में ये ही रिश्ते बनाते भी है बिगाड़ते भी यही है
ღღ__इसमें कोई शक नहीं, कि तुम सबसे जुदा थे “साहब”; . मगर ऐसा भी क्या जुदा होना, कि हमसे ही जुदा रहो!!…..#अक्स .
वक्त गुजरता है मगर खामोशी नहीं जाती! तेरी #चाहतों की मदहोशी नहीं जाती! किसतरह अब रोकूँ मैं यादों का सिलसिला? धड़कनों से तेरी सरगोशी नहीं जाती! Composed By #महादेव
मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से फ़ुरसत में आज गिन रहा हूँ इत्मिनान से आँगन तेरी आँखों का, न हो जाये कहीं तर डरता हूँ इसलिए मैं वफ़ा के बयान से साहिल पे […]
ღღ__तू गर नाराज़ है मुझसे, तो रह, खुदा करे; . मैं भी चाहता हूँ मेरे हक़ में, कोई बद्दुआ करे!!……#अक्स .
जिसको प्यार सिखाया मैने ! राह सही दिखलाया मैने !! आज वही है जान का दुश्मन ! अपना जिसे बनाया मैने !!
जी रहा हूँ मैं तेरी यादों को लेकर! दर्द़ बन गया हूँ मैं मुरादों को लेकर! खोजता हूँ हरतरफ़ मंजिलों को अपनी, हालात के भँवर में इरादों को लेकर! Composed By #महादेव
गरीबी ख़ुद के सिवा, औरों पे असरदार नहीं होती; शायद इसीलिए भूखों की, कोई सरकार नहीं होती !! . महज़ दो वक़्त की रोटी, और चन्द पैरहन तन पे; फक़ीरों को इससे ज्यादा की, दरकार […]
इक वक्त, इक रब्त जुड़ा था, [रब्त = Relation] वक्त गुजर गया, रब्त रह गया कुछ लम्हो की दास्ता बनकर ये याराना पक्के अल्फ़ाजों में ज़हन में छप गया कुछ पल अजीज है बहुत, […]
वो आंखे आज तक चुभती है मुझको एक दम खाली, खाली कटोरे सी जो पूछ रही हों, कह रही हो अपनी भूखी दास्तां लफ़्ज ही बेबस है, नहीं समेट सकते दर्द को उनके खाली है […]
ღღ__इबादतगाह भी जाऊं तो, तुझे ही ढूँढती हैं नज़रें; . शौक-ए-दीदार ने तेरे, मुझे काफ़िर बना दिया !!…..#अक्स .
सुनो, मैंने भी एक दौर देखा हैं.. पिछले कुछ समय में मैंने एक दौर देखा हैं, मैंने अन्ना का आंदोलन देखा हैं, मैंने निर्भया की माँ देखी हैं, मैंने रोहित वेमुला की लाश देखी हैं, […]
नहीं हो जब कोई अंजाम, अगर आगाज़ का बस इक राह हो, न कोई मंजिल हो दिल में बस मोहब्बत हो, दिल मिलने को मुन्तजिर हो
ღღ__आखिर इसमें उनकी, खता भी क्या है साहब; . जब मोम सा दिल रखोगे, तो दुनिया जलाएगी !!……#अक्स .
पथरों के शहर बस्ती है यह पथरों की शहर जिसे कहते लोग बस्ती यह ऊँची मंजिलों की जहां छोटे दिल के बस्ते लोग बस्ती है यह मकानों की यहां घर नहीं मिला करते बस्ती […]
Wo khwabon me rha,hakikat ko na dekha.. hwao me udne walon me,jameen ko na dekha.. dur se haste hue dikha jo shaks,uske chupe dard ko kisi ne na dekha.. byan krne wale ki ankhon me […]
aansu bhane se hi dard kam kyu nhi ho jata, sochne bhar se hi koi hamdard kyu nhi ban jata, kuch kehne bhar ki hi tamanna rhi h dil me, sb kuch ankho se byan […]
सुनते हो साहब, मोहब्बत गुज़र रही है अपनी; . ღღ__मैंने देखा था उसे, तेरे साथ जाते हुए !!….#अक्स .
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