Category: ग़ज़ल

  • तेरे दर से उठे कदमों को

    **तेरे दर से उठे कदमों को::गज़ल**

    तेरे दर से उठे कदमों को किस मंज़िल का पता दूंगा मैं,

    भटक जाऊंगा तेरी राह में और उम्र बिता दूंगा मैं l

    हां मगर अपने होठों पे तेरा ज़िक्र ना आने दूंगा,

    इस फसाने को अज़ल के लिये दिल में दबा दूंगा मैं l

    मैं वफ़ा के समन्दर का इक नायाब सा मोती हूं,

    तुझपे गर सज न सका तो अपनी हस्ती को मिटा दूंगा मैं l

    तेरे पहलू में कभी था तो ज़िन्दगी का गुमां था मुझको,

    अब तेरी यादों के शरारे में खुद को जला दूंगा मैं l

    हां मगर तुझको जमाने में मेरे नाम से जानेंगे सभी,

    अपनी गज़लों में तुझे कुछ ऐसे बसा दूंगा मैं l

    मैं जानता हूं कि इक दिन तुझे अफ़सोस भी होगा,

    हां मगर तब तलक़ खुद को तेरी राहों से हटा दूंगा मैं l

    मैं जानता हूं के मैं सागर हूं और मेरी कश्ती भी मुझी में है,

    और एक दिन खुद ही इस कश्ती को खुद में डुबा दूंगा मैं ll

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             -Er Anand Sagar Pandey

  • मिल्कियत-ए-इश्क

    मिल्कियत-ए-इश्क

    लहू के आसूँ रोना,

    बमुश्किल समझ आएगा

    किसी से दिल लगा लो बस

    तजुर्बा खुद ही मिल जाएगा /

    जर्रा-ए-ख़ामोशी में है क्या रक्खा

    यहाँ कोई छुप न पाएगा

    तलाश-ए-महफ़िल रखो जारी

    कातिल मिल ही जाएगा /

    अपने गम को गाओगे

    बज़्म गमगीन हो जाएगी

    किसी सीने से लग के रोना

    बड़ा आराम आएगा /

    © ― अश्विनी यादव

  • “आँखें”

    मन की बात खुदा ही जानें आँखें तो दिल की सुनती हैं,
    जिनसे पल भर की दूरी रास नहीं उनसे ही निगाहें लड़ती हैं,

    दिल भँवर बीच यूँ फँस जाता साँसें भी मुअस्सर ना होतीं,
    आँखो आँखों के खेल में बस हर रोज सलाखें मिलती हैं,

    बज्म-ए-गैर में जब जब दिल-आवेज़ नज़र कोई आता हैं,
    बयान-ए-हूर में उनके येें आँखें ही कसीदें पढ़ती हैं,

    रंज-ए-गम के अय्याम यूँ ही हँसते हँसते कट जाते हैं,
    बिस्मिल की गफ़लत आँखें जब महफिल में नगमें बुनती हैं,

    खाना-ए-गुल-ए-ना-शाद में गर कुछ भी उधारी रह जाता,
    इक तार-ए-नज़र भर से ही ये आँखें तक़ाजे करती हैं,

  • जिन्दगी

    एक ताज़ा ग़ज़ल के चन्द अश’आर आप हज़रात की ख़िदमत में पेश करता हूँ; गौर कीजिएगा…

    चाहता था जिसे जिन्दगी की तरह,
    वो रहा बेवफ़ा जिन्दगी की तरह।

    हाँ मेरा प्यार था बस उसी के लिए,
    जिसने लूटा मुझे था सभी की तरह।

    दूर जाके मुझे आजमाता रहा,
    जो ज़ेहन में बसा सादगी की तरह।

    पास आया न मेरे कभी वो देखो,
    मुझमें शामिल रहा तिश्नगी की तरह।

    कैसे बीते सफ़र अब ये काफ़िर भला,
    रूह में उतरे वो शायरी की तरह।

    #काफ़िर (10/07/2016)

  • ये वो कली है जो अब मुरझाने लगी है..

    कश्तियाँ समंदर को ठुकराने लगी है..
    तुमसे भी बगावत की बू आने लगी है..

    मत पूछिए क्या शहर में चर्चा है इन दिनों..
    मुर्दों की शक्ल फिर से मुस्कुराने लगी है..

    मैं सोचता हूँ इन चबूतरों पे बैठ कर..
    गलियाँ बदल-बदल के क्यूँ वो जाने लगी है..

    गुजरे हुए उस वक़्त की बेशर्मी मिली थी कल..
    वो आज की हया से भी शर्माने लगी है..

    किस चीज को कहूँ अब इंसान बताओ..
    ये वो कली है जो अब मुरझाने लगी है..

    -सोनित

  • मैंने तय किया है

    कतरा-कतरा करके समन्दर निकाल दूंगा मैं,

    मैने तय किया है अपनी आंखें खंगाल दूंगा मैं ll

    मेरे सदमों का सबब तुम हो ये राज राज रहेगा,

    कोई गर पूछ भी लेगा तो टाल दूंगा मैं ll

    मुहब्बत, रूसवाई, तन्हाई फ़िर नफ़रत और नाले,

    ना जाने इस दिल को और  कितने मलाल दूंगा मैं ll

    सुना है तुझमें डूबकर भी मौत आती है ऐ “सागर”!

    तो इस दिल को एक दिन तुझमें उछाल दूंगा मैं ll

    All rights reserved.

             -Er Anand Sagar Pandey

  • देखना उनकी नियत भी बे-असर हो जायेगी

    देखना उनकी नियत भी बे-असर हो जायेगी,
    चालबाज़ी जब हमारी कारगर हो जायेगी.

    देखना है खेल मुझे साफ़ पौशाको का उस दिन,
    भोली जनता जब कभी भी जानबर हो जायेगी.

    बिगडे लोगो के लिए बिगडे तरीके चाहिए जी,
    बदसलूकी भी हमारी तब हुनर हो जायेगी.

    दुनियाँ मानेगी लोहा फ़िर हमारा सदियों तक,
    जिधर चलेगे एक हो वही डगर हो जायेगी.

    ढूँढ लेंगे हम आँधेरे मे सफ़र अपना हुजूर,
    सूर्य की ये रोशनी भी कम अगर हो जायेगी.

    हम अकेले ही चलेंगे देश की खातिर मियाँ,
    चीखती चिल्लाती दुनियाँ रहगुज़र हो जायेगी.

    फ़िर चलेंगे काफिले अधिकार की लडाई के,
    अखबार के बस्ते भी एक खबर हो जायेगी.

    फ़िर से बदलेगा जमाना नई पीडी से यहाँ,
    जब इंकलाब की ज़ुबानी घर व घर हो जायेगी.

    हरेन्द्र सिंह कुशवाह
    “एहसास”

  • तेरी बुराईयों को हर अखबार कहता है,

    तेरी  बुराईयों  को  हर अखबार कहता है,
    और  तू  है  मेरे  गाँव  को गँवार कहता है.

    ऐ  शहर  मुझे  तेरी सारी औकात पता है,
    तू  बच्ची  को भी हुश्न-ए-बहार कहता है.

    थक  गया है वो शक्स काम करते -करते,
    तू  इसे  ही अमीरी और बाज़ार कहता है.

    गाँव  चलो  वक्त  ही  वक्त है सब के पास,
    तेरी  सारी  फ़ुर्सत  तेरा इतवार कहता है.

    मौन  होकर फ़ोन पे रिश्ते निभाये जा रहे,
    तू इस  मशीनी दौर को परिवार कहता है.

    वो  मिलने  आते थे कलेजा साथ लाते थे,
    तू  दस्तुर  निभाने को रिश्तेदार कहता है.

    बडे – बडे मसले हल  करती थी पंचायते,
    तू अंधीभ्रष्ट दलीलो को दरवार कहता है.

    अब  बच्चे  तो बडो का अदब भूल बैठे है,
    तू  इसे  ही नये दौर का संस्कार कहता है.

    हरेन्द्र सिंह कुशवाह
    “एहसास”

  • **बगावत कर लेंगे**

    ****बगावत कर लेंगे::गज़ल****

     

    छुप के बैठे हैं कई अल्फाज़ मेरे होठों की तहों में,

    तुम कोई बात करोगे तो ये बेबात बगावत कर लेंगे l

     

     

    बड़ी मुश्किल से मेरे हालात मेरे काबू

    में हुए हैं,

    तुम मेरा हाल ना पूछो वरना हालात बगावत कर लेंगे l

     

     

    तुम्हें खयाल नहीं शायद कि तुम्हारे खयाल में अक्सर,

    ऐसा लगता है कि जैसे खयालात बगावत कर लेंगे l

     

     

    मेरी आंखों का लहू पीकर जो मेरी रग-रग में रवां रहते हैं,

    देखना एक दिन वो सब-के-सब लम्हात बगावत कर लेंगे l

     

     

    छोड़ जाना ही था तुमको तो पास आये क्यूं थे,

    कभी मिलोगे तो ऐसे ही कई सवालात बगावत कर लेंगे l

     

     

    तुम अगर दूर हुए हो तो अब दूर ही रहना मुझसे,

    पास आओगे तो फ़िर से मेरे जज़्बात बगावत कर लेंगे ll

     

     

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    -Er Anand Sagar Pandey

  • Ek Aur Gazal…..

    Ek Aur Gazal…..

    **…..TERA NAAM…..**

    Mere Honthoon Per Jab Bhi Tera Naam Aaya
    Aankh Main Aansu, Haath Main Jaam Aaya

    Tere Ishq Ki Talab DIl Ko Aaisi Padi
    Yaad Dil Ko Tu Subah-Shaam Aaya

    Mere Honthoon Per Jab Bhi Tera Naam Aaya
    Aankh Main Aansu, Haath Main Jaam Aaya

    Har Kucha, Har Gali Charchaa Mera
    Har Seher, Main Badnaam Aaaya

    Mere Honthoon Per Jab Bhi Tera Naam Aaya
    Aankh Main Aansu, Haath Main Jaam Aaya

    Loota Baithe Jab Sabkuch Ham Apna
    Zindagi Ko Tab Aaraam Aaya

    Mere Honthoon Per Jab Bhi Tera Naam Aaya
    Aankh Main Aansu, Haath Main Jaam Aaya

    Maut Bhi Tadpi Hamari Zindagi Per
    Na Jane Kaisa Ye Mukaam Aaya

    Mere Honthoon Per Jab Bhi Tera Naam Aaya
    Aankh Main Aansu, Haath Main Jaam Aaya

    Dekh Le Wo Bhi Hame Aakhri Dafa
    Khuwaish-e-Dil Ka Ye Farmaan Aaya

    Mere Honthoon Per Jab Bhi Tera Naam Aaya
    Aankh Main Aansu, Haath Main Jaam Aaya………………!!!!

    D K

  • गजल

    गजल

    मस्जिदों में काश की भगवान हो जायें
    मंदिरों में या खुदा आजान हो जाये !
    ईद में मिल के गले होली मना लेते
    काश दिवाली में भी रमजान हो जाये !!
    बाअदब मतिहीन मिलते मौलवी साहब
    पूरोहित पंडित का भी सम्मान हो जाये
    जुर्मकारी को जेहादों को दफन कर दें
    इंसा अल्ला ये पुरा अरमान हो जाये ||
    उपाध्याय…

  • गजल

    गजल

    “मातृ दिवस पर चंद पंक्तियां ”
    ……………………………………………..
    जमाने में जो सच है जरा उसको बताइए
    दौर-ए भरम है युं नही बातें बनाईए |
    युं कहकहे लगा करार आये कब तलक
    चेहरे से बंया है न हकीकत छिपाईए||
    माँ बाप को रखें है कही घर से बहुत दूर
    त्योहार ना अवसर का तमाशा दिखाईए |
    पाला है जितना आप भी उनको तो पाल दो
    माँ-बाप आप भी है ये मत भूल जाईए||
    उपाध्याय…

  • गजल

    गजल

    मेरी पुरानी रचना…
    ………………………..
    खाक पर बैठ कर
    इतना भी इतराना क्या
    दर्द चेहरे पे लिखा है
    इसे छिपाना क्या…!
    कब कहां किस तरह
    से क्या होगा ,
    जब चले जाना है जहाँ से
    तो घबराना क्या !!
    मै तो मतिहीन चेहरों को
    पढा करता हुँ,
    इस फरेब जमाने से
    दिल लगाना क्या !!
    उपाध्याय…

  • गजल

    भूल कर भूल से ये भूल मत किया किजे
    कभी किसी को भरोसा नही दिया किजे |
    मुकर गर जाइये करके करार दिलवर से
    इस अदावत पे कभी प्यार मत किया किजे ||
    जो पीछे आ रहा तेरे उसे जरूरत है तेरी
    पल दो पल ठहर उसकी खबर लिया किजे |
    जो रूकता नही आवाज लगाते मतिहीन
    उसके पीछे कभी न देर तक फिरा किजे ||
    उपाध्याय…

  • गजल

    गजल

    ……………गजल………….
    हम समंदर को समेटे चल रहे है
    ठंडे पानी में भी हम उबल रहे है !
    दुश्मनों के पर निकलते जा रहे है
    देख अपनो की खुशी हम जल रहे है ||

    है बडी मुश्किल उन्हे समझाये क्या
    जो नादानों की तरह बस पल रहे है |
    ये उन्हे शायद नही मालूम हो
    हम तो उनके ही सदा कायल रहे है ||

    आईनों से क्या करे शिकवा कोई
    दाग ही चेहरे से नही निकल रहे है |
    गैर तो मतिहीन होते गैर है लेकिन
    आज अपनो को ही अपने छल रहे है
    उपाध्याय…

  • गजल

    “गजल”

    चलो इक बार हम एक दुसरे में खो कर देख लें
    चलो इक बार हम एक दुसरे के होकर देख लें !

    बिताएँ है बहुत लमहा अजाब-ए तन्हाई के हम
    चलो हरेक पल को फिर से संजो कर देख लें !!

    है टूटी प्रीत की माला कि बिखरे है सभी मोती
    चलो एक बार मिल के मोतियाँ पिरोकर देख लें!

    बहुत बेताब है रोने को आँखे दिल तडपता है
    चलो जी भर गले मिल इनको भिंगोकर देख लें!!

    उपाध्याय…

  • गजल

    जिन्दगी जब भी मुस्कुराती है
    गीत उनके ही गुनगुनाती है |
    पलक गीरते जो पास होती है
    आँख खुलते ही चली जाती है ||
    कदम-कदम पे मुश्किलें मिलती
    जिन्दगी हमको आजमाती है |
    आशना जिसको बना रखा था
    ओ नही याद उनकी आती है ||
    नजर बचा के निकलने वाले
    तेरी हसरत बहुत सताती है ||
    दम तोडा है किसी ने शायद
    सलवटे गम की ये बताती है ||
    उपाध्याय…

  • मैं ग़ज़ल बन किसी कागज़ पर बिखर जाऊँगी

    तेरी आँखों में रहूँगी तो सँवर जाऊँगी
    गर तेरे बदले मिले दुनिया मुकर जाऊँगी

    ख्याल हूँ कैद न कर तू मुझे इन पलको में
    खुशबू बन तेरा मै दामन छू गुज़र जाऊँगी

    छूना मत तल्ख़ हक़ीकत भरे हाथों से
    ख्वाब नाज़ुक हूँ मै आँखों का बिखर जाऊँगी

    रोकते काश मुझे इक दफा यह हसरत थी
    रंज लेकर यही मिट्टी में उतर जाऊँगी

    तेरी आँखों से गिरी सूखे से पत्ते जैसी
    बह के सैलाब में इस गम के किधर जाऊँगी

    मेरे ज़ज्बात तो बहते हैं किसी दरिया से
    मैं ग़ज़ल बन किसी कागज़ पर बिखर जाऊँगी

  • ग़ज़ल

    तेरी तस्वीर रू ब रू कर ली
    जब भी जी चाहा गुफ्तगू कर ली
    हम ने दिल में बसा लिया तुम को
    अपनी हर सांस मुश्कबू कर ली
    प्यार के इक हसीन धागे से
    जिंदगी हम ने फिर रफू कर ली
    कारवां की नहीं खबर हमको
    हम ने बस तेरी जुस्तजू कर ली
    दम निकल जाये कब जुदाई में
    वस्ल के दिन की आरजू कर ली
    याद खालिक की आयी जब अज्ञात
    बंदगी हम ने बे वुजू कर ली

  • गजल

    गजल

    ” गजल ”
    जहर मौत और जिन्दगी भी जहर है
    सिसकती है रातें दहकता शहर है |
    सदमों का आलम बना हर कही पर
    सहम अपने घर में हम करते बसर है ||
    ना हम एक होंगे क्यों सय्याद माने
    हमी खुद ही खुद के कतरते जो पर है |
    हमारी ही करतूत के है खामियाजे
    न दहशत हुकूमत पे होता असर है ||
    न हिन्दू ना मुश्लिम नही कोई काफिर
    ना मजहब है कोई नही उनका घर है |
    जमी पर उगाते फसल जो बला की
    ना मंदिर ना मस्जीद नही कोई दर है ||
    उपाध्याय…

  • Ghazal

    हिसारे जात से बाहर निकल के देखते हैं
    चलो खुद का नज़रिया हम बदल के देखते हैं …
    सफर का शौक है हम को कहीं भी ले चलो तुम
    तुम्हारे साथ भी कुछ दूर चल के देखते हैं….
    ज़माने को बदलना तो नहीं वश में हमारे
    खुद अपने आप को ही हम बदल के देखते हैं ….
    किसी को फिक्र है कितनी चलो ये आज़माएँ
    खिलौनों के लिए हम भी मचल के देखते हैं…
    भला ये कौन है जो तीरगी से लड़ रहा है
    अँधेरों से ज़रा बाहर निकल के देखते हैं….
    चलो मौका मिला है दिल की हसरत पूरी कर लें
    तुम्हारे साथ भी कुछ पल टहल के देखते हैं….
    लकीरें हाथ की शायद बदल ही जाएँ मेरी
    ज़रा सा वक़्त के साँचे में ढल के देखते हैं ….

  • ग़ज़ल

    कौन है जिसने ज़ख्मों को सहलाया है
    चेहरे पर मुस्कान सजाये आया है
    क्या ग़म है, यह कैसा हाल बनाया है
    फूल सा हंसमुख चेहरा क्यों मुरझाया है
    डूब न जाये ये आकाश समंदर में
    कश्ती जैसा चाँद उतर कर आया है
    कितने ही घर टूटे हैं इस बस्ती के
    तब जाकर रस्ता चौड़ा हो पाया है
    क्या बतलायें हमने कैसे पलकों पर
    शब् भर ही ख्वाबों का बोझ उठाया है
    पाला है इक मीठा ग़म अज्ञात तभी
    मुश्किल से इक शेर कहीं हो पाया है

  • ghazal


    कौन है जिसने ज़ख्मों को सहलाया है

    चेहरे पर मुस्कान सजाये आया है

    क्या ग़म है, यह कैसा हाल बनाया है

    फूल सा हंसमुख चेहरा क्यों मुरझाया है

    डूब न जाये ये आकाश समंदर में

    कश्ती जैसा चाँद उतर कर आया है

    कितने ही घर टूटे हैं इस बस्ती के

    तब जाकर रस्ता चौड़ा हो पाया है

    क्या बतलायें हमने कैसे पलकों पर

    शब् भर ही ख्वाबों का बोझ उठाया है

    पाला है मीठा इक ग़म अज्ञात तभी

    मुश्किल से इक शेर कहीं हो पाया है

     

  • सिलवटें जाती नहीं..

    नींद भी आती नहीं.. रात भी जाती नही..

    कोशिशें इन करवटों की.. रंग कुछ लाती नहीं..

     

    चादरों की सिलवटों सी हो गई है जिंदगी..

    लोग आते.. लोग जाते.. सिलवटें जाती नहीं..

     

    जुगनुओं के साथ काटी आज सारी रात मैंने..

    राह तेरी भी तकी.. पर तुम कभी आती नहीं..

     

    कुछ शब्द छोड़े आज मैंने रात की खामोशियों में..

    मैं जो कह पाता नहीं.. तुम जो सुन पाती नहीं..

    – सोनित

  • कागज पे हालाते-दिल लिखते हुये इक दिन मौत आ जानी है

    कागज पे हालाते-दिल लिखते हुये इक दिन मौत आ जानी है

    कागज पे हालाते-दिल लिखते हुये इक दिन मौत आ जानी है
    मुझे मरते , तड़पते , बिलखते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

    लापता है कई रास्ते मुझ में ,कल रात घर खोने के बाद से
    वो गली वो शहर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

    ये कोई मौसम ही होगा बारिशो का आँखों की बस्तियों का
    नमी दिल की दीवारों से सूखते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

    ये क्या हो गया देख दिल को मेरे हर घडी बिमार रहता है
    मरिजें-दिल पे कोई दवा लगते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

    बो दिया आँसुओ को दिल के सहरा में बस बहार आने दो
    जख्मों पे दर्द के फूल खिलते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

    जो दर्द है अभी मेरी आहों में है मेरे जख्मो की खलिश में है
    लबों की ये खामोशी टूटते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

    आ फसा जी के इस जंजाल में जहाँ साँसे बोझ लगने लगी
    भीतर यूँ घुट-घुट के मरते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

    सो जायेगी तमाम ख्वाइशें मेरे साथ हमेशा हमेशा के लिए
    साँसों की थकान दूर करते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

    मरने के बाद दर्दे-दिल-पुरव के कई नये नये राज खुलेंगे
    तेरा नाम हथेली पर लिखते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

    पुरव गोयल

  • जिन्दगी ठहरी रही

    **ज़िन्दगी ठहरी रही और उम्र आगे चल पड़ी::गज़ल**

    (मध्यम बहर पर)

    उस ख्वाब की ताबीर जब शम्म-ए-फुगन में जल पड़ी,

    तब ज़िन्दगी ठहरी रही और उम्र आगे चल पड़ी l

    फ़िर कैफियत का ज़िक्र भी मुझको अजाबी हो गया,

    हर कैफियत की बात पर सोज-ए-निहां पिघल पड़ी l

    तू जब तलक पहलू में था ख्वाबों के दिल पर तख्त थे,

    हिज़रत हुई तुझसे तो यादें सांस-सांस ढल पड़ी l

    हर शय को मैंने मात दी दौर-ए-खुमारी के तहत,

    फ़िर उम्र ठंडी हो गयी और दास्तां उबल पड़ी l

    ऐ जिन्दगी ! तेरी रक़ाबी टूटकर गिरने लगी,

    कश्कोल जब हिम्मत की टूटी आके औंधे बल पड़ी l

    उम्रभर का ये बशर खामोशियों में था मगर,

    जब सीढ़ियां खतम हुईं, इक नज़्म सी मचल पड़ी l

    मैं अब भी तेरा ज़िक्र हंसकर टाल देता हूं मगर,

    तेरी कहानी क्या छुपे!,  जब तक मेरी गज़ल पड़ी ll

    word-meanings-

    ख्वाब की ताबीर=सपने की सच्चाई

    शम्म-ए-फुगन=आंसूओं की आग

    कैफियत=समाचार/हाल-चाल

    सोज़-ए-निहां=मन में छुपी तकलीफ़

    हिज़रत=जुदाई

    दौर-ए-खुमारी=जवानी के दिन

    रक़ाबी=तश्तरी

    कश्कोल=कटोरी

    All rights reserved.

                -Er Anand Sagar Pandey

  • ख़ुदकुशी करने के मैं रोज बहाने ढूँढने लगा हूँ

    ख़ुदकुशी करने के मैं रोज बहाने ढूँढने लगा हूँ
    जी में रड़क रही है साँसे जैसे मैं मरने लगा हूँ

    सीने के जख्मों पे लौट कर कोई बहार आई है
    सूना-सूना था भीतर से मैं अब खिलने लगा हूँ

    कई बरसों की गर्द जमा थी आज तक चहरे पे
    जी भर के जो रो लिया तो साफ़ दिखने लगा हूँ

    मुद्दत से लापता है इक शख्स मुझमे ही कहीं
    सहरा में दरिया के जैसे खुद को ढूँढने लगा हूँ

    आँखों को आखिर कब तक धोखे में रखूँगा मैं
    अब जागती हुई आँखो से ख्वाब देखने लगा हूँ

    दर्द भरी साँसे भीतर न जाने कौन खिंच रहा है
    रूह की तड़प देख के मैं और भी तड़पने लगा हूँ

    खो गया न जाने कहाँ खामोशियों के अंदर मैं
    चहरे से अब आईने की शनाखत करने लगा हूँ

    साँसों का सारा तेल जल चुका पुरव के दिल से
    मैं उम्मीदों का इक दिया हूँ जो बुझने लगा हूँ

  • रहने लगा है

    हिफाजत कर ले मेरी आजकल कहने लगा है,

    ना जाने क्यूं मेरा दिल खौफ़ में रहने लगा है l

     

     

    उम्र भर ख्वाब चुन-चुन कर जिसे तैयार किया था मैने,

    मेरे ख्वाबों का वो नन्हा सा घर ढहने लगा है l

     

     

    ज़रा से दर्द पर भी चीखकर इज़हार करता था,

    मगर दिल आजकल सारे सितम सहने लगा है l

     

     

    जिसको तमाम उम्र छुपा रखा था सीने में,

    वो दरिया अब मेरी आंखों में आ बहने लगा है ll

     

     

    All rights reserved.

     

    -Er Anand Sagar Pandey

  • “कोई राब्ता तो हो!!.”

    ღღ__ठहरा हुआ हूँ कब से, मैं तेरे इन्तज़ार में;
    आख़िर सफ़र की मेरे, कोई इब्तिदा तो हो!
    .
    मंजिल पे मेरी नज़र है, अरसे से टिकी हुई;
    पहुँचूं मैं कैसे उस तक, कोई रास्ता तो हो!
    .
    किस तरह छुपाऊँ, जो ज़ाहिर हो चुका उसपे;
    मैं कहना चाहता भी हूँ, पर कोई वास्ता तो हो!
    .
    वो कहता है ढूँढ लेंगे; तुझे दुनिया की भीड़ से;
    मगर उससे पहले मेरे यार, तू लापता तो हो!!
    .
    फिक्र तो बहुत होती है, “अक्स” उसको तेरी;
    हाल पूछे भी तो भला कैसे, कोई राब्ता तो हो!!….‪#‎अक्स‬

  • Tanhaa Hoga, Rehta Hoga….

    Tanhaa Hoga, Rehta Hoga….

    Ye Chaand Bhi Shaayad Tanhaa Hoga
    Meri Tarah Hi Rehta Hoga………………………!!

    Dikhta Nahi Ye Din Ke Ujaale Main Ye Bhi
    Meri Tarah Hi Darta Hoga……………………….!!

    Ye Chaand Bhi Shaayad Tanhaa Hoga
    Meri Tarah Hi Rehta Hoga………………………!!

    Dard-e-Dil Bayaan Karta Nahi Ye
    Meri Tarah Hi Sehta Hoga……………………..!!

    Ye Chaand Bhi Shaayad Tanhaa Hoga
    Meri Tarah Hi Rehta Hoga………………………!!

    Taaron Ka Saath Paa Kar Bhi Akela
    Meri Tarah Hi Kehta Hoga………………………!!

    Ye Chaand Bhi Shaayad Tanhaa Hoga
    Meri Tarah Hi Rehta Hoga………………………!!

    Kahe Kis Se Apna Gam-e-Kissa
    Meri Tarah Hi Sochta Hoga………………………!!

    Ye Chaand Bhi Shaayad Tanhaa Hoga
    Meri Tarah Hi Rehta Hoga………………………!!

    Dikhne Aur Dikhaane Ki Zindagi Kaisi
    Meri Tarah Hi Kosta Hoga………………………!!

    Ye Chaand Bhi Shaayad Tanhaa Hoga
    Meri Tarah Hi Rehta Hoga………………………!!

  • जी की इस आफत से पीछा कैसे छुडवाऊँ मैं

    जी में रड़क रही है साँसे की बस मर जाऊँ मैं
    बे-वक़्त के दिले-बीमार आहे किसे सुनाऊँ मैं

    मेरे टूटे हुये दिल की अब सदा हो गई हो तुम
    इस दर्दे-दिल को अब और कैसे गुन-गुनाऊँ मैं

    खैंच-खैंच के आहे-दर्द रोज साँसे लेनी पड़ती है
    खुल के इन हालातों में अब कैसे मुस्कुराऊँ मैं

    मेरे खाके-दिल में कुछ शरार अब भी बाकी है
    जी की इस आफत से पीछा कैसे छुडवाऊँ मैं

    चीख रही है भीतर भीतर ख़ामोशी अब मेरे
    मासूम से दिल को लोरी पे कैसे सुलाऊँ मैं

    आँखों से अब हर घडी मेरे खून टपकता है
    ये हलाते-हयात-पुरव अब किसे दिखाऊं मैं

  • जी की इस आफत से पीछा कैसे छुडवाऊँ मैं

    जी में रड़क रही है साँसे की बस मर जाऊँ मैं
    बे-वक़्त के दिले-बीमार आहे किसे सुनाऊँ मैं

    मेरे टूटे हुये दिल की अब सदा हो गई हो तुम
    इस दर्दे-दिल को अब और कैसे गुन-गुनाऊँ मैं

    खैंच-खैंच के आहे-दर्द रोज साँसे लेनी पड़ती है
    खुल के इन हालातों में अब कैसे मुस्कुराऊँ मैं

    मेरे खाके-दिल में कुछ शरार अब भी बाकी है
    जी की इस आफत से पीछा कैसे छुडवाऊँ मैं

  • मैं मर जाऊं तुम्हारे बिन

    **** तुम्हारे बिन****

     

    कोई धड़कन ना कोई सांस तक पाऊं तुम्हारे बिन,

    तुम्ही कह दो कि आखिर अब कहां जाऊं तुम्हारे बिन l

     

    खुदा से आज सजदे में यही फ़रियाद करता हूं,

    तुम्हारा आईंना हूं मैं बिखर जाऊं तुम्हारे बिन l

     

    तुम्हारे साथ के एहसास ने थामे रखा है मुझको,

    अगर तुम छोड़ दोगे तो किधर जाऊं तुम्हारे बिन l

     

    तुमसे इक कदम का फासला भी मुझसे कहता है,

    मैं बाकी क़्यूं रहूं, जां से गुजर जाऊं तुम्हारे बिन l

     

    मैं जब भी जिन्दगी पाऊं तुम्हारा साथ हो मुझको,

    इस फेहरिश्त से वरना उबर जाऊं तुम्हारे बिन l

     

    तुम्हारे बिन मेरा जीना तो मुमकिन है नहीं लेकिन,

    इजाजत दो तो चुपके से मैं मर जाऊं तुम्हारे बिन ll

     

    All rights reserved.

    -Er Anand Sagar Pandey

  • तुम्हारे नाम कर रहा हूं

    खयाल-ए-दिल, सभी जज़्बात फ़िर से आम कर रहा हूं,

    मैं इक ताज़ा गज़ल फ़िर से तुम्हारे नाम कर रहा हूं l

     

     

    तुम्हारे ही तसोव्वुर में गुज़रता है मेरा हर दिन,

    तुम्हारे ही तसोव्वुर में मैं हर इक शाम कर रहा हूं l

     

     

    तुम्हारे नाम से आये सुबह तुम्हारे नाम से ढलती है शाम,

    तुम्हारे नाम पर मैं ज़िन्दगी तमाम कर रहा हूं I

     

     

    तुम से शुरू तुम पर खतम आगाज़ से अंजाम तक,

    रफाक़त में तुम्हारी उम्र को गुल्फाम कर रहा हूं l

     

     

    मुशाफत हो चुकी है ज़िन्दगी से,तुम्हारे नाम में खोया हुआ हूं,

    बहुत मशरूफ हूं मैं आजकल ये काम कर रहा हूं l

     

     

    तुम्हारी यादें, तुम्हारी बातें सभी महफ़िल सजाती हैं,

    तुम्हारी आस में अश्कों को फ़िर से जाम कर रहा हूं l

     

     

    ज़िन्दगी ना जाने कब गुनाहों का हिसाब ले ले,

    फलसफा मैं आजकल “श्री राम” कर रहा हूं ll

     

    मैं इक ताज़ा गज़ल फ़िर से तुम्हारे नाम कर रहा हूं ll

     

    All rights reserved.

     

     

    -Er Anand Sagar Pandey

  • मेरी आंखों से रिस-रिस कर

    मेरी आंखों से रिस-रिस कर कोई तूफ़ान कहता है,

    सताओ यूं ना तुम मुझको ऐ मेरी जान कहता है l

     

     

    तुम्हें मैं याद करने की तलब में इस कदर खोया,

    कि अक्सर अब मुझे चेहरा मेरा अंजान कहता है l

     

     

    तुम्हारे ख्वाब में अक्सर मैं इतना डूब जाता हूं,

    कि बच्चों सा मेरा दिल भी मुझे नादान कहता है l

     

     

    अपने उजड़े घर की ओर जब भी देखता हूं मैं,

    मेरा घर मुझपे हंसता है मुझे वीरान कहता है l

     

     

    ये मेरा आखिरी खत है मैं खत अब लिख ना पाऊंगा,

    मेरा दम टूटने को है मेरा फरमान कहता है l

     

     

    तुम्हारा मुझसे क्या ताल्लुक है जब भी सोचता हूं मैं,

    कोई चुपके से आकर के इसे बेनाम कहता है l

     

     

    “सागर” मुझसे कहता है यहीं  पर डूब जाओ तुम,

    उबरना मेरी मौंजों से नहीं आसान कहता है ll

     

    All rights reserved.

    -Er Anand Sagar Pandey

     

  • पांव भर चुके हैं छालों से

    पांव भर चुके हैं छालों से,

    है दिल जख्मी पड़ा मलालों से l

     

     

    भरी आंखों में बक़रारी है,

    जेहन बेचैन है सवालों से l

     

     

    दिल में अफसुर्दगी का आलम है,

    अश्क चीखते हैं नालों से l

     

     

    एक बिजली सी जबसे कौंधी है,

    मुझको नफ़रत है इन उजालों से l

     

     

    बस इतने ही हम बाकी  बचे है,

    जैसे घर भर गया हो जालों से l

     

     

    कैसे उस भूख को मिटाएं अब,

    जो भूख पैदा हुई निवालों से l

     

     

    ऐ दिल! इतना ही बस एहसान कर,

    मुझको आज़ाद कर खयालों से l

     

     

    तू आज उस आह को रिहाई दे,

    जो लब पे बैठी हुई है सालों से ll

     

    -Er Anand Sagar Pandey

  • कौन जाने

    बारहा अब ये हक़ीक़त कौन जाने,
    आँख भी करती बग़ावत कौन जाने।

    मैं फ़िदा होता रुख़सार पे बस,
    इश्क़ है या है इबादत कौन जाने।

    जान देना था लुटा आये सनम पर,
    इसके भी होते मुहूरत कौन जाने।

    मौत की मेरी मुझे परवाह कब है,
    जान मेरी हो सलामत कौन जाने।

    गेसुओं की छाँव में होगी बसर फ़िर,
    ज़ुल्फ़ उनके दें इजाज़त कौन जाने।

    रात को उठ बैठ जाता हूँ अचानक,
    नींद में भी अब शरारत कौन जाने।

    जिस क़दर दुश्वारियाँ हैं आज कल ये,
    छोड़ दे काफ़िर मुहब्बत कौन जाने।

    #काफ़िर (11/06/2016)

  • बहकने लगा हूँ

    अदाओं से उसकी पिघलने लगा हूँ,
    खुदी की गिरह से निकलने लगा हूँ।

    बना मैं दिवाना मुहब्बत में उसकी,
    मुहब्बत में उसकी बदलने लगा हूँ।

    किसे फ़िक्र है अब कहे क्या जमाना,
    उसे देखकर अब सवरने लगा हूँ।

    कभी बेवज़ह ही करो रुख़ इधर का,
    ख्यालों से तेरे मचलने लगा हूँ।

    नशा तो नशा है ये मय हो क़ि आँखें,
    पिए बिन मैं साक़ी बहकने लगा हूँ।

    नहीं आरजू मेरी है चाँद तारे,
    मिला है जो तू तो चहकने लगा हूँ।

    ये आग़ोश तेरा ये बाहों के साये,
    ख़ुदा की क़सम मैं महकने लगा हूँ।

    तेरा जिस्म है या कुई संगमरमर,
    हुआ राब्ता तो फिसलने लगा हूँ।

    तराशा ख़ुदा ने बड़ी रहमतों से,
    तेरी ओर खुद मैं दरकने लगा हूँ।

    कहीं आइना भी न कर दे बग़ावत,
    ये सोचूँ अगर मैं उलझने लगा हूँ।

    बड़ा संगदिल है सनम तेरा काफ़िर,
    जुदाई की सोचूँ तो मरने लगा हूँ।

    #काफ़िर (10/06/2016)

  • आँखों में अब आंसू छिपाना कितना मुश्किल है

    आँखों में अब आंसू छिपाना कितना मुश्किल है

    आँखों में अब आंसू छिपाना कितना मुश्किल है
    जो रडकते है उनको बहाना कितना मुश्किल है !!

    साँसों पे लिख लिया तुझको मैंने आयत की तरह
    तक़दीर का ये लिखा मिटाना कितना मुश्किल है !!

    न ख़ुशी महसूस होती न कोई गम महसूस होता
    भीतर चोट हो तो मुस्कुराना कितना मुश्किल है !!

    बनते बनते बिच में ढह जाती है ख्वाबो की हवेली
    आँखों की अब नमी सुखाना कितना मुश्किल है !!

    बदन पे निकल आये काँटे देख किस मौसम मे
    हर ज़ख्म हरा है ये दिखाना कितना मुश्किल है !!

    दिल के भीतर ये सब टुटा फूटा सब पुराना है
    घर आये मेहमां को ठहराना कितना मुश्किल है !!

    ख्वाईश की तितलियों के पर लहू-लुहान से है
    बाहरों का उजाड़ा बसाना कितना मुश्किल है !!

    कागज़ के कलेजे पे लिखता है पुरव जिगरे-लहू से
    हाल-ए-दिल गजल में सुनाना कितना मुश्किल है !!

    पुरव गोयल

  • एक ख़्याल सा

    याद के दरमियाँ हम मिलेंगे कभी,
    फूल गुलशन में भी तो खिलेंगे कभी।

    शक़ मेरे इश्क़ पे मत करो साथियाँ,
    खत तुम्हें खून से हम लिखेंगे कभी।

    आज तो दौर है मुफ़लिसी का मग़र,
    चाँद तारे मेरे सँग चलेंगे कभी।

    ज़िन्दगी ने किए सौ सितम गम नहीं,
    है यकीं ग़म हमारे जलेंगे कभी।

    छोड़कर जो गए वो अजीजों में थे,
    हाथ अपना बेचारे मलेंगे कभी।

    हो रहा है असर अब दुआ का मेरी,
    ख़्वाब आँखों में उसके पलेंगे कभी।

    हुस्न उसका नहीं है बतौरे बयाँ,
    जिद मेरी है गज़ल हम लिखेंगे कभी।

    जो गुज़र जाते हैं आज नजरें बचा,
    दर पे काफ़िर तेरे वो रुकेंगे कभी।

    #काफ़िर

  • फिर से मुहब्बत हो गयी

    ना चाहते हुए भी फ़िर से हिमाक़त हो गई,

    कल फ़िर उसे देखा,फ़िर से मुहब्बत हो गई l

     

     

    वही वो झील सी आंखें,वही बादल से वो गेसू,

    बलखाती कमर उसकी फ़िर से क़यामत हो गई l

     

     

    कुछ इस अदा से वो मेरे आगे से गुजरी कि,

    मेरी सांसों को उसकी ज़रूरत हो गई l

     

     

    इरादा कर लिया था कि मैं उसको भूल जाऊंगा,

    मगर वो सामने आई तो खुद से बगावत हो गई l

     

     

    मैं क्या ज़रा सा उसकी याद में खो गया,

    सारे शहर में चर्चा है मुझे पीने की आदत हो गई l

     

     

    कल सुबह सोचा था कि अब मर जाऊं मैं “सागर”,

    कल शाम उसे देखा तो फ़िर जीने की चाहत हो गई ll

     

     

    All rights reserved.

     

    -Er.Anand Sagar Pandey

  • **रहने दे**

    **रहने दे::गज़ल**

     

    यही चाहत का है दस्तूर तो दस्तूर रहने दे,

    मुझे बेबस ही रहने दे मुझे मजबूर रहने दे l

     

     

    तुझे जब याद करता हूं तो दुनिया भूल जाता हूं,

    तेरी नश्तर सी यादों को तू मुझसे दूर रहने दे l

     

     

    तू मेरा हो नहीं पाया मुझे ये ग़म नहीं होता,

    मै अब भी हूं तेरा तलबी, मुझे गुरूर रहने दे l

     

     

    ये जब भी साथ होते हैं तो दिल बेचैन होता है,

    मेरे ख्वाबों को यूं टूटा औ चकनाचूर रहने दे l

     

     

    मेरे ग़म छीन मत मुझसे ,मेरे आंसू मुझे दे दे,

    रहम कर मेरी गज़लों में ज़रा सा नूर रहने दे l

     

     

    मुझे ये जब भी चुभते हैं गज़ल होती है “सागर” झूमकर,

    मेरे दिल में तेरे वादों का ये नासूर रहने दे ll

     

     

    All rights reserved.

     

    -Er Anand Sagar Pandey

  • **बदला नहीं है वो**

    वही तल्खियत लहज़े में, वही कशिश अदाओं में,

    आज फ़िर यही लगा कि बदला नहीं है वो l

     

     

    उसको भी मयस्सर हैं मेरे हिज़्र के खसारे,

    मेरे उन्स से भी अबतक निकला नहीं है वो l

     

     

    चश्म-ओ-चिराग बुझ गये, मेरी चश्म है अब आबसार,

    उसका आब-ए-तल्ख इज़्तिरार, ढला नहीं है वो l

     

     

    कुर्बत है शरारों की उसे मेरी ही मानिन्द लेकिन,

    ये बात यूं निहां है कि पिघला नहीं है वो l

     

     

    वो आग है कुछ मुख्तलिफ़ जिस आग में जलता है वो,

    मैं हूं जला जिस आग में, जला नहीं है वो ll

     

    Word-meanings-

     

    उन्स-प्यार

    तल्खियत=कड़वाहट

    मयस्सर=उपलब्ध

    खसारे=नुकसान

    चश्म-ओ-चिराग=आंख का प्रकाश

    चश्म=आंख

    आबसार=झरना(Waterfall)

    आब-ए-तल्ख=आंसू

    इज़्तिरार=बेचैन/बेचैनी

    कुर्बत=नजदीकी/करीब होना

    निहां=छुपा हुआ/छुपी हुई

    मुख्तलिफ़=अलग(Different)

    हिज़्र=जुदाई

    मानिन्द=जैसे

     

     

     

    All rights reserved.

     

    -Er Anand Sagar Pandey

  • ख़ाहिश

    सज़ा सी बन गई है अब जहाँ में प्यार की ख़ाहिश,
    समझ आती नहीं मुझको कभी संसार की ख़ाहिश।

    न जाने याद कैसी है हमेशा ही रुलाती है,
    छुपा कर हाथ से चहरा सनम इक़रार की ख़ाहिश।

    बहुत ज़ालिम है मेरी जान मुझको मार डालेगी,
    सजाकर हाथ में मँहदी खुले इनकार की ख़ाहिश।

    कहाँ चाहत कुई ऐसी न पूरी कर सको जो तुम,
    ज़ियादा से ज़ियादा है तिरे दीदार की ख़ाहिश।

    भवर में आ फसा हूँ अब उबारो तुम सनम मुझको,
    बहुत जादा नहीं है कुछ तिरे बीमार की ख़ाहिश।

    मुक़म्मल हो मिरे जज़्बात कोई तो इशारा दो,
    रही काफ़िर पे बाकी अब यही उपकार की ख़ाहिश।

    ‪#‎काफ़िर‬

  • गुनहगार हो गया

    सच बोलकर जहाँ में गुनहगार हो गया,
    लोगों से दूर आज मैं लाचार हो गया।

    जो चापलूस थे सिपेसालार बन गए,
    मोहताज़ इक अनाज़ से ख़ुद्दार हो गया।

    इब्ने अदम ने लाख किए कोशिशें मगर,
    इन्सान उसके भीतर गद्दार हो गया।

    जाने कहाँ से हुस्न मिला ये तुम्हें सनम,
    तीरे नज़र तेरा ये दिले पार हो गया।

    हर कोई देखता मुझे शक़ की निगाह से,
    हर लफ़्ज़ मेरा जैसे क़ि तलवार हो गया।

    कर करके मिन्नतें तुझे मग़रूर कर दिया,
    जो इस क़दर ये जीना दुश्वार हो गया।

    देती रही सलाह ये दुनिया मुझे मग़र,
    था ये जुनूं सवार मुझे प्यार हो गया।

    हालात यूं हुए क़ि कहीं का नहीं रहा,
    इक दर्द ज़िन्दगी में कई बार हो गया।

    ऐसे ही कह दिया क़ि हसीं तुमसे कौन है,
    फ़िर सुर्ख़ लब हुआ हँसी रुख़सार हो गया।

    काफ़िर बदल नहीं सके वो ख़ाक हो गए,
    कैसा यहाँ रिवाज़ मेरे यार हो गया।

    ‪#‎काफ़िर‬

  • तेरे ये होंठ जानते है , मेरी सब हसरतें

    तेरे ये होंठ जानते है , मेरी सब हसरतें

    होठों को होठों से यूँ तुम दबाते क्यूँ हो
    बेचैनियां मेरी रोज यूँ तुम बढ़ाते क्यूँ हो ।।

    तेरे ये होंठ जानते है , मेरी सब हसरतें
    अगर बेखबर हो ,तो तुम शर्माते क्यूँ हो ।।

    मुझ से आने लगी तेरी साँसों की खुशबु
    हथेलियो में मेरा नाम यूँ लिखाते क्यूँ हो ।।

    ये इश्क़ नहीं तुम को तो और ये क्या है
    किसी ने टोका नहीं, यूँ मुस्कुराते क्यूँ हो ।।

    हो के परेशान पढ़ने लगते हो क्यूँ आयते
    हिचकियों से तुम , इतना घबरातें क्यूँ हो ।।

    कैसी साजिश है मेरे क़त्ल की ए क़ातिल
    नजर मिला के फिर नजरें यूँ चुराते क्यूँ हो ।।

    है इश्क़ तो खुल कर इजहार कीजिये ना,
    रोज मेरी किताब में गुलाब छिपाते क्यूँ हो ।।

    खोले नहीं ख़त तुने मेरे अगर आज तक
    तो बता ग़ज़ले-पुरव फिर गुनगुनाते क्यूँ हो ।।

    पुरव गोयल

  • बच्चों के स्कूल जाते ही सूना घर ,घर को खाता है

    बच्चों के स्कूल जाते ही सूना घर ,घर को खाता है
    ख़ुशी से मुफलिसी का बेटा कहाँ कारखाने जाता है !!

    भूख तोड़ देती है इक-इक ख्वाईशों के सब खिलौने,
    कोई पत्थर तोड़ता है,कोई अखबार बाँट के आता है !!

    न धुप लगती न मासूम बदन पे कभी बरसात लगती
    सर पे कई जिम्मेदारियाँ ओढ़ के वो बाज़ार जाता है !!

    दुकानें ताक के लौट आती है घर आँखों की हसरतें
    बिन माँ बाप के बस,बेचारियाँ खरीद के घर लाता है !!

    देख के मेरी इस बेबशी पे ,रूहे – पुरव रोने लगती है
    तितली जैसे परो पे जब ईंटों का कोई बोझ उठता है !!

    पुरव गोयल

  • आसमां ये मुझे कभी खरीद नहीं सकता मैं पाँव हमेशा जमीं पे टी’काके रखता हूँ ।।

    जिंम्मेदारियों का बोझ मैं उठा’के रखता हूँ
    मेले में बेटे को काँधे पे बिठा’के रखता हूँ ।।

    आसमां ये मुझे कभी खरीद नहीं सकता
    मैं पाँव हमेशा जमीं पे टी’काके रखता हूँ ।।

    रखते होंगे बेशक,दिल में लोग दुश्मनी
    मगर मैं फिर भी सबसे बना’के रखता हूँ ।।

    है ख्वाईशें मेरे दिल में भी बहुत दोस्तों
    मगर मैं पाँव चादर तक फैला’के रखता हूँ ।।

    मिलती है मेरी कमाई में बरकत यूँ मुझे
    पूरी तनख़्वाह माँ के हाथ में ला’के रखता हूँ ।।

    उतारती है ज़िंदगी मुझे भी कसौटियों पे
    हर हाल में ईमान,अपना बचा’के रखता हूँ ।।

    लोग तकते है मेरे आँगन में दीवार खींचे
    भाई कुछ भी कहे नज़र झुका’के रखता हूँ ।।

    महक आज भी ईंटों से आती है,पसीने की
    बुजुर्गों की यादें मैं सीने से लगा’के रखता हूँ

    जानता हूँ दुश्मनी का,बस ये इक नतीजा
    “पुरव” कब्र के बराबर कब्र बना’के रखता हूँ ।।

    पुरव गोयल

  • ज़िन्दगी खफा है अब मनाऊँ किस तरह

    ज़िन्दगी खफा है अब मनाऊँ किस तरह
    दिल पे चोट है अब मुस्कुराऊँ किस तरह

    चोट कोई अंदर है जिससे टिस उठती है
    चिर से दिल दर्द अब दिखाऊँ किस तरह

    आँखों के तलवों निचे,काई जमी रहती है
    आँसुओं को आँखों में छिपाऊँ किस तरह

    न सोता है न चैन से मुझे सोने देता है
    दिल को अपने अब बहलाऊँ किस तरह

    जल जल के हिज्र में दर्द खीरा हो गया
    भीतर लगी आग को बुझाऊँ किस तरह

    दिल तो सीने से “पुरव” निकलता नहीं
    दर्द-ए-दिल ग़ज़ल में सुनाऊँ किस तरह

  • आँखों की दीवारों में नमी अब बैठने लगी

    आँखों की दीवारों में नमी अब बैठने लगी
    भीतर की सब कच्ची , दीवारे ढहने लगी !!

    दर्द से अश्क़ो की मौजें , जब तड़पने लगी
    दुखती हुई रग दिल में और भी दुखने लगी !!

    तपती हुई आहे – दर्द जला ना दे दिल कहीं
    साँसे लेके तेरा नाम,तुझे सजदा करने लगी !!

    आने लगा जी में जी , साँसों को साँसे जैसे
    मेरे जख्मो पे जब तेरी तस्वीर उभरने लगी !!

    फलक के दामन पर मातम सा छाने लगा
    निकल के दर्दे-दिल से सदा जब गूंजने लगी !!

    इक शख्स को तड़पता देख के मेरे भीतर
    मौत भी मेरी मौत के अब लम्हे गिनने लगी !!

    रोया है दर्द-ए-दिल कागज पे पुरव अपना
    लोगो की नजर जिसे ग़ज़ल समझने लगी !!

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