हर किसी को यहां समन्दर नहीं मिलता ढूढते तो हैं हम भी मगर नहीं मिलता मुद्दतों पहले जो मुझसे छुट गया था अब मुझे वो पुराना सफर नहीं मिलता मौत भी भला कहाँ सस्ती है यारो बिना पैसों के तो यहां जहर नहीं मिलता […]

हाथ की रेखाओं को क्यों बदनाम करते हो खुद ही हर सुबह को क्यों शाम करते हो पशेमाँ होके न बैठेगा ये बेदर्द जमाना आप बेवजह बैठे क्यों जाम भरते हो किसको फुर्सत जो देखे […]

धुँधले आईने से कोई अक्स निकल नहीं पाता वक़्त की सुइयाँ पकड़ने से वक़्त बदल नहीं जाता वो मोम सा बना रहता , कोई पत्थर नहीं था क्या हुआ शख्स वो अब पिघल नहीं पाता […]

गांठ बंधे रिश्तों में एहसास क्यों ढूँढ़ते हो सेहरा की रेत में प्यास क्यों ढूँढ़ते हो हर शख्स कुछ न कुछ दे ही गया ज़ख्म ऐसे माहौल में तुम कोई खास क्यों ढूँढ़ते हो वहां […]

दुनिया की रस्मों में इन्सां कहाँ मगर गया वो शहर की रौनक में कौन भर जहर गया अब भी बैठे ही उन लम्हों की चादर ओढ़कर वो भी एक दौर था वक़्त के साथ गुजर […]

  निगाहें उठाकर जिधर देखते हैं तुम्हें बस तुम्हें हमसफर देखते हैं उडीं हैं गुबारों सी अब हसरतें भी खड़े हम तो बस रहगुजर देखते हैं न कर पाई आबाद शहरों की बस्ती तो वीरान […]

मोहब्बत की गवाही देने लगती हैं धड़कने सुलझाने से सुलझ जाती है सब उलझने चाँद को पाने की हिम्मत आने लगती है ज़िंदगी में आती हैं जितनी अड़चने ! Like Comment

उनके  अश्कों में  भी  इक  रंग नजर  आता है मुझे, तन्हा रातों  में  भी  कोई  संग  नजर  आता है मुझे, उल्फ़त  में   उनकी  मैं  भी  बे-जा़र  हो  गया लगता, अब्र  का  शाया  भी  गेसुओं […]

कुछ ख्वाब कुछ अफ़साने वही लोग आये कुछ सुनाने अपनी अपनी वीरानी सब की देखने आये वो तेरे कुछ वीराने देखने आये वो फिर ज़ख्म तेरे कहते आये तेरे ज़ख्म कुछ सहलाने वो भी उकता […]

वो फुरसतों के काफिले वो रोज़ मिलने के सिलसिले वो शहर कहाँ खो गया जहाँ पास रहते थे फासले कुछ तो हुआ अजीब सा खो गए रास्ते ग़ुम है मंज़िलें हर निगाह में जूनून सा […]

कल दिल ने फिर गोते मारे, उसके कजरारे नैनों में हम अपना सब कुछ फिर हारे, उसके कजरारे नैनों में उसके नैनों में उतरे जब, तब जा के हमने जाना ये हैं छुपे हुए कितने […]

अहवाल ए मोहब्बत की समझ हम में भी हैं तनिक सी , इश्क कर बेवफाई को बदनाम करना कुछ नया तो नहीं , यूँ मौत के वक़्त भी क्या तगाफ़ुल कर के जाओगे, हर रात […]

सहरा में मुझे तू किसी गुलशन की तरह मिल मैं मर रहा हूँ आ मुझे जीवन की तरह मिल तुझे देखकर शायद मुझे कुछ साँस आ जाए बेजान से इस दिल को तू धड़कन की […]

देखिए आज ज़माना भी नहीं अच्छा है इस तरह घाव दिखाना भी नहीं अच्छा है हम खतावार नहीं खता फिर भी मानी दिल बिना बात दुखाना भी नहीं अच्छा है दिल घिरा गम के समंदर […]

रुसवा हो गयीं हो तुम या फिर समझ मैं नहीं पाया , यूँ नखरें दिखाना तिरी अदाओं में तो शामिल ना था, तड़प गर मैं रहा हूँ तो खुश तो तुम भी नहीं होगे, यूँ […]

एक युद्ध में कितने युद्ध छिपे होते हैं हर बात में कितने किंतु छिपे होते हैं नींव का पत्थर दिखाई नहीं पड़ता अक्सर रेल चलती है पर पटरियों के जैसे सिरे दबे होते हैं जिसने […]

किया है कभी गौर की गये मयखाने में और ना चढी शराब तो क्या होगा , गर पिला जायें कोई हुश्न के दो चार जाम आँखों-आँखों में तो क्या होगा , इश्क तो कर बैठे […]

मोहब्बत की नज़्मों को फिर से गाया जाए अपनी आज़ादी को थोड़ा और बढ़ाया जाए हक़ मिला नहीं बेआवाज़ों को आज तक हक़ लेना है तो अब आवाज़ उठाया जाए किसी इंसान को भगवान बनाने […]

ज़्यादा दिमाग़ न आज लगाया जाए सिर्फ मन में ज़मी मैल को बहाया जाए धर्म और परंपरा की ऐसी भी न कट्टरता हो कि होलिका की तरह औरत को जलाया जाए सौहार्द और प्यार का […]

हर चेहरे अपने पर कोई आश्ना न मिला गिला खुद से मगर कोई आईना न मिला अपनी तक़दीर-बुलंदी का क्या कहना बर्क़ को जब कोई आशियाँ न मिला फ़िज़ां मिली तो मगर खुशगवार न थी […]

सिर्फ एहसास है वफ़ा फिर छूने को जी करता है यह कौन देता है सदा सुनने को जी करता है हर शख्स का वज़ूद जुदा फितरत भी जुदा फिर भी उम्मीद वो खुद के वज़ूद […]

कतरा कतरा लहूँ का जिस्म में सहम गया चलो इसी बहाने रगों में बहने का वहम गया वो कोई हिस्सा था मेरे ही जिस्म का जुदा हुआ वो तोड़ कोई कसम गया मेरे मिटने की […]

फासलों का मंजर देख कुछ याद आया किसी अजनबी शहर सा बस ख्याल आया कोई शोर नहीं किया आईने ने उस वक़्त जब देख चेहरा अपने कोई सवाल आया परदे ही परदे में रह गए […]

आयतों की खवाइश में इक मज़ार बन के रह गया दुनिया के कारखाने का बस औज़ार बन के रह गया न किसी मंदिर ,न मस्जिद न हरम के क़ाबील हूँ फूल बनना चाहा था ,बस […]

“ हद से बढ़ जाए कभी गम तो ग़ज़ल होती है । चढ़ा लें खूब अगर हम तो ग़ज़ल होती है ॥“ इश्क़ है—रंग , हिना—हुस्न ; याद है : खूशबू । फिर भी भूले […]

कुछ तो दायरे हो , जिसमे रहना जरूरी है जिस के अंदर खुद को भी रखना जरूरी है प्रगति के हम एक कारीगर है मगर वक़्त के साथ कारीगर बदलते रहना भी जरूरी है कुछ […]

चल पड़ा फिर जिस्म किसी राह में मन को छोड़ अकेला क्यों नहीं चलते दोनों साथ -साथ कोई रंजिश नहीं फिर भी रंजिश फूल की बगावत किसी टहनी से भवरे की शिकायत किसी फूलों से […]

रात अपना ही कोई किस्सा बन जाता हूँ दिन के उजाले में कोई हिस्सा बन जाता हूँ निकल तो जाता हूँ बाज़ारों में कहीं शाम के होते ही न चलने वाला कोई सिक्का बन जाता […]

दरके आइनों को नाज़ुकी की जरूरत है गर आ जाएँ इल्ज़ाम यही तो उल्फत है फासले वस्ल के यू सायें से बढ़े जाते है ये कोई मिलना या तुम्हारी रुखसत है हरसूँ बिखर गए तेरे […]

वक़्त की चाल के अंदाज़ निराले तो न थे ख्वाब ही सो गए लेके कोई करवट शायद कहाँ तो आरजुएं थी तेरे मिलने की यां तो खुद ही हिस्सों में बट गए शायद जुबान पे […]

धुंधले आईने में कोई अक्स नज़र नहीं आता वक़्त की सुईया पकड़ने से वक़्त ठेहर नहीं जाता वो चिरागों सा रोशन कभी एक नूर सा था क्या हुआ शख्स अब वो नज़र नहीं आता कहता […]

हर सांस है मुजरिम न जाने किस गुनाह में हर ख्वाईश है क़ैद न जाने किस गुनाह में न कुछ बस में तेरे न कोई डोर हाथ में जाएँ तो ज़िंदगी किन क़दमों की पनाह […]

ज़िंदगी कभी गूंथे हुए आटे की तरह लगती कभी फायदे की कभी घाटे की तरह लगती आस के फूल हर शाख पे खिलने दो टूटी आस चुभते हुए काटें की तरह लगती वक़्त की मार […]

कोई दिल का मेरे चारागर होता यूँ न तन्हा मेरा सफ़र होता आज फिर दिल ने आरजू की है घर के अंदर मेरा घर होता / वो जो रहते थे हमसाये की तरह मेरी परछाई […]

हर लम्हा गुजर गुजर कर कुछ कह गया अपनी आँखों में हल्का सा कुछ तैरता गया ज़िद जिनकी थी वो ज़िद में रह गए हाथ से उनके कोई फैसला सा गया ज़िंदगी कुनकुनी धुप तो […]

एक जरूरी दस्तावेज ही तो है जीवन न कागज़ अपना न स्याही अपनी फिर भी भ्रम अपना कहने का अपनी सासें अपनी धड़कन से विवाद करती कभी तालमेल नहीं मन से मन का फिर भी […]

मुड़े कागज़ की तरह माथे की लकीरें बन गई है मेरी किस्मत की हाथों की लकीरों से ठन गई है अपने हिस्से की गिरवी रखी उदासी को देख अब उस पे कितनी सूद चढ़ गई […]

कभी तो मेरे माजी का क़त्ल कर दिया जाएँ जख्म जैसा भी हो कुछ पल भर दिया जाएँ माना की शब की जीस्त दुआओं से है भरी हो असर ऐसा ख़्वाबों को सहर कर दिया […]

पत्थर ही पत्थर है दिल की जेब मेँ है बड़ी सच्ची मगर गर्दिशों की बात है अब के गर्मिओं मेँ ठंडक है तो हैरत किसलिए किस कदर गर्मियां थी पिछली सर्दियों की बात है किस […]

जाते जाते कुछ कह गयी ज़िंदगी समझ पाया तो ढह गयी ज़िंदगी करते गुजरा हर सांसों का हिसाब ज़िंदगी से कुछ कम रह गयी ज़िंदगी पहलूँ में लिए बैठे कई चाँद उदास जाने क्याक्या न […]

बिखरे ख्वाबों को बारहा चुनता क्या है ज़ख़्म तो जख्म है बारहा गिनता क्या है इन हवाओं से कब कोई मुड़ के देखा सेहरा की रेत पे बारहा लिखता क्या है गैर हो न सके, […]

हर चेहरे अपने पर कोई आश्ना न मिला गिला खुद से मगर कोई आईना न मिला अपनी तक़दीर-बुलंदी का क्या कहना बर्क़ को जब कोई आशियाँ न मिला फ़िज़ां मिली तो मगर खुशगवार न थी […]

सिर्फ एहसास है वफ़ा फिर छूने को जी करता है यह कौन देता है सदा सुनने को जी करता है हर शख्स का वज़ूद जुदा फितरत भी जुदा फिर भी उम्मीद वो खुद के वज़ूद […]

बुझे चरागों को हवाओं का करम न दे मेरी हस्ती मिटने का कोई भरम न दे जो गुजरा नहीं खुद , मगर आखिर गुजरा तुम फ़क़त कोई उदास सा वहम न दे जुबाँ जो है […]

मेरे सफिनों का नाखुदा हो , जो तूफानों का तलबगार न हो मुझे ऐसा चराग बना दे जो हवाओं का कर्ज़दार न हो मेरे हिस्से की हर शे पे लिख दिया तेरा नाम आखिर गिला […]