दरिया को हमेशा समंदर की चाहत है।
नर्म लहज़ा नर्म बातें समझों सियासत है।
,
मेरी जिंदगी की दुआ करने वालों शक्रिया।
मुझे तो हर रोज़ मर जाने की आदत है।।
,
ख़तावार ही सीखा गए सलीका ए जिंदगी।
सुने की पास उनके अभी नई नई ताक़त है।।
,
सच की जुबान मीठी लगें तो हामी भर दो।
वरना जो भी कहूँगा कहोंगे सब खिलाफत है।।
,
हर जिंदगी हर जिंदगी से रूबरू नहीं होती।
अब कहाँ रियायत है और कहाँ शराफत है।।
,
अबके जो मिलना तो बहुत सोंच समझकर।
साहिल हम पर भी बहुतों की नज़रे इनायत है।।
@@@@RK@@@@
Category: ग़ज़ल
-
दरिया को हमेशा समंदर की चाहत है।
-
“इक दास्ताँ अधूरी तुमको सुनाए कैसे”
इक दास्ताँ अधूरी तुमको सुनायें कैसे।
गिरती हुई दीवारे फिर से उठाए कैसे।।
,
जैसे पढ़ी थी दुनिया वैसी नहीं हक़ीक़त।
सच जो है मैंने जाना खुद को बताएँ कैसे।।
,
हर हर्फ़ में हमारी क्यूँ तेरी यादें बह रही है।
हम छिप रहें है खुद से तुमको बुलाएं कैसे।।
,
ऐतबार करना मुश्किल है मौसमी अदा का।
कट जाती है पतंगे हम उनको उड़ाए कैसे।।
,
रफ़्तार जिंदगी की बहुत ही तेज़ हो गई है।
हम ही नहीं है काबिल तुम्हें आजमाएं कैसे।।
,
तन्हा मेरा सफर है न मंजिल है न किनारा।
साहिल कश्ती है भवँर में साहिल पे जाएं कैसे।।
@@@@RK@@@@ -
बेवफ़ाई समझी नहीं वफ़ा वफ़ा करने लगे।
बेवफ़ाई समझी नहीं वफ़ा वफ़ा करने लगे।
जरा सी चोट खाई नही दवा दवा करने लगे।।
,
नासमझ हो तुमने काँटे है जंगल पे जंगल।
अब जब साँस रुकी है तो हवा हवा करने लगें।।
,
पुरानी दस्तानो इस कद्र न याद आया करों।
की जख्म अपना कोई खुद हरा हरा करने लगें।।
,
तुमको समझें थे हम तुमको समझते रह गए।
हम बोलों भी तो क्या तुम खता खता करने लगे।।
,
हममें है बुराई की हक़ीक़त ए जिंदगी कह देते है।
तुम क्या आये की ख्वाबो का धुँआ धुँआ करने लगे।।
,
फ़रेबियो की हिम्मत देख जब डर लगने लगा है।
साहिल आसमाँ को देखकर खुदा खुदा करने लगें।।
@@@@RK@@@@ -
हल्की हल्की सी हवा जो ये बह रही है।
हल्की हल्की सी हवा जो ये बह रही है।
न जानें क्या है जो ये मुझसे कह रही है।।
,
तन्हाइयों को देखा है मैंने रोते हुए अक्सर।
सब मेहफिलो का दर्द है जो वो सह रही है।।
,
तुम्हारे होने का बस इतना सा एहसास है हमें।
की बिना चाँद के ही रोशनी बिखर रही है।।
,
ता उम्र हम जीते रहे है इक वहम के साथ में।
बर्बाद होते रहें तो लगा की जिंदगी सुधर रही है।।
,
मेरा होना न होना किसके लिए मायने रखता है।
वो तो मुकर गया अब मेरी साँसे मुकर रही है।।
,
साहिल खुद को जो सैलाब ए बला समझतें है।
हमसे ज़रा मुखातींब तो हो क्यूँ डर रही है।।
@@@@RK@@@@ -
जब जब मैं बेबाक हुआ हूँ।
जब जब मैं बेबाक हुआ हूँ।
तब तब मैं मजाक हुआ हूँ।।
,
बेगुनाह होके सज़ा काटी है मैंने।
तब जाके कही इंसाफ हुआ हूँ।।
,
गवाह है मेरा जलता हुआ मकान।
की ज़िन्दा था मैं जो राख हुआ हूँ।।
,
मेरी रवादारी पे सवाल करने वालो।
मैं तुम्हारे गुनाहों का हिसाब हुआ हूँ।।
,
माना की कुछ नहीं हूँ नजरों में तुम्हारे।
इक शायरी था मैं जो किताब हुआ हूँ।।
@@@@RK@@@@ -
मोहब्बत के बदलें मोहब्बत नहीं है।
मोहब्बत के बदलें मोहब्बत नहीं है।
हक़ीक़त के बदले हक़ीक़त नहीं है।।
,
बहुत मर्तबा हम भी उलझें थे भँवर में।
पहले सी अपनी अब तबियत नहीं है।।
,
सुबह शाम मेरी थे जो फ़िक्र करने वाले।
अब जुबाँ पे उन्हीं के हिदायत नहीं है।।
,
मुझे तुम पढ़ो जो गिला कुछ न करना।
तज़ुर्बा है ये सब कोई शिकायत नहीं है।।
,
दिलों से कभी तुम किसी के न खेलों।
ये टूटे अगर जो कही भी मरम्मत नहीं है।।
,
सफर में है साहिल तुफानों से कह दो।
वो रोकेंगे हमकों ऐसी जुर्रत नहीं है।।
@@@@RK@@@@ -
ख़ुद को तेरे नाम पे करने से पहले।
ख़ुद को तेरे नाम पे करने से पहले।
जिंदा तो हम भी थे मरने से पहले।।
,
ये क्या जरा सी हवा हिला गई हमें।
चलों समेट लूँ खुद को बिखरने से पहले।।
,
फितरत उसकी समझना नामुमकिन है।
जो देता है नए जख़्म पुराने भरने से पहले।।
,
हर एक बात पे तेरे ऐतबार भी लाजिम है।
क्यूँ देखते हो ऐसे हमें गुजरने से पहले।।
,
कागज़ से दोस्ती पानी की कब तलक है।
साहिल समझों बादलों के बरसने से पहले।।
@@@@RK@@@@ -
खुद को ही खुद से मैंने जुदा कर दिया।
खुद को ही खुद से मैंने जुदा कर दिया।
इक इंसान था जिसे हमने खुदा कर दिया।।
,
मुक़म्मल होने में लगे थे हमको कई साल।
मगर तुमने मुझे पल भर में धुंआ कर दिया।।
,
जिंदगी मेरी तजुर्बो से आसान कहाँ हुई थी।
मुझे तो बस चंद मुश्किलो ने रवां कर दिया।।
,
इक इक लम्हा गुजरा है हम पर सदियो सा।
मुलाकातों के नाम पे बस तुमने दुआ कर दिया।।
,
अश्क़ जब पूँछते है अपने बेअसर होने का सबब।
फिर क्या कहें की खुद को कहाँ से कहाँ कर दिया।।
,
इक सच है हमारा रातों को यूँ ही जागते रहना।
पर ऐसा भी नहीं की हमने नींदों को मना कर दिया।।
,
साहिल जवाब ढूंढ़ने में यूँ ही दर ब दर होते रहें।
ज़िन्दगी से जिंदगी को पूँछा क्या गुनाह कर दिया।।
@@@@RK@@@@ -
तुमसे दूर होकर भी ज़िन्दा हूँ मैं।
तुमसे दूर होकर भी ज़िन्दा हूँ मैं।
बस इतनी सी बात पे शर्मिंदा हूँ मैं।।
,
ख़्वाहिशों की दुनियां में जाना तो था।
पर जो उड़ न पाया वो परिंदा हूँ मैं।।
,
ज़िन्दगी गुजारी है इक उम्मीद पे मैंने।
हाँ वीरान शहर का अकेला बासिन्दा हूँ मैं।
,
वैसे तो मेरी कोई हस्ती नहीं मानता हूँ।
पर खुद के लिए शख़्स कोई चुनिंदा हूँ मैं।।
,
उम्र भर रहा मगर एक हौसला साहिल।
की इक मुलाक़ात तो कोई आइन्दा हूँ मैं।।
@@@@RK@@@@ -
जब कभी भी तुमको पुकारा है हमने।
जब कभी भी तुमको पुकारा है हमने।
बस इक मीठे से दर्द को उभारा है हमने।।
,
सूनसान राहों पर हुई हो जो कोई आहट।
तो वही उम्मीद वही चेहरा निहारा है हमने।।
,
मेरी मौत का ज़िम्मेदार मैं ख़ुद हूँ सच है ये।
की खुद को जिन्दा रख रख के मारा है हमने।।
,
हक़ीक़त से जब भी आँखें मेरी चार हुई है।
फिर गलतियों को सौ बार संवारा है हमने।।
,
साहिल मुमकिन नही की चाँद तक जा सके।
पर कइयों बार चाँद को ज़मी पे उतारा है हमने।।
@@@@RK@@@@ -
बहते ही रहते है हम हवाओं की तरह।
बहते ही रहते है हम हवाओं की तरह।
मगर बदलेंगे नही कभी अदाओं की तरह।।
,
कल अचानक ही मौसम बदल गया था ऐसे।
जैसे वो मिला हो हमें कही घटाओं की तरह।
,
पहली बार चले तो गिरे उलझ उलझकर।
अब बहते है पहाडों में दरियाओं की तरह।।
,
ज़िंदगी भर कहते रहे हम महफिल महफिल।
जबकि तन्हाई का असर था दवाओं की तरह।।
,
इक बात कहे हमनें खुद से भी फरेब किया था।
बद्दुवाओं को भी कबूल किया दुवाओं की तरह।।
,
हमारे हालातों पर सवालातो का दौर चलने दो।
साहिल बिखेरेंगे रोशनी जलती शम्माओ की तरह।।
@@@@RK@@@@ -
इक शाम हूँ ख़मोशी की आवाज हूँ मैं।
इक शाम हूँ ख़मोशी की आवाज हूँ मैं।
मैं इक समंदर हूँ समझो बेहिसाब हूँ मैं।।
‘
सुनो उम्र भर मुझसे रूठकर रहने वाले।
कहते हो सबसे,की तुमसे नाराज हूँ मैं।।
‘
इक शहर था मैं जिसके बासिन्दे नहीं है।
फिर क्या कहूँ खुद से की,आबाद हूँ मैं।।
‘
मुफलिसी से घिरती है जब जिंदगी कोई।
न जगाओ नींद से,रोटी वाला ख्वाब हूँ मैं।।
‘
मेरे लफ्जो को पढ़ने की फुरसत तुम्हें नहीं।
माना की मैं कल रहूँ न रहूँ,पर आज हूँ मैं।।
‘
तमाम मुश्किलो से गुजरी है जिंदगी मेरी भी।
सबका नहीं पर कुछ सवालों का जवाब हूँ मैं।।
‘
खुद को तुम कहा कहा ढूंढ रहे हो साहिल ।
इक अधूरे पन्ने हो,न कहो की किताब हूँ मैं।।
@@@@RK@@@@ -
दर्द ऐसे भी अपने कोई संभाला करता है।
दर्द ऐसे भी अपने कोई संभाला
करता है।
जैसे चराग जलता है मगर उजाला
करता हैं।।
‘
सफर करने निकले थे कुछ रोशनी
को लेकर।
पर ये तूफान है कि हर वक्त दम
निकाला करता हैं।।
,
दिन गुजरता हैं जिसका बस सूखी
रोटी की लिए।
अफसोस हैं कि वो ख्वाबो में एक
निवाला करता हैं।।
,
जिक्र उसका भी था मेरे बिखरे हुए
कुछ पन्नों पर।
कि जो कागज के खेलों मे उसे उछाला
करता हैं।।
‘
और क्यूँ आए भी चाँद वो जब जमीन
का तो नहीं हैं।
फिर भी बेवजह ही ख्वाब कोई पाला
करता हैं।।
@@@@RK@@@@ -
जिंदगी में यहा सबका कोई हमदर्द नहीं होता!
जिंदगी में यहा सबका कोई हमदर्द नहीं होता!
गमों से कहना हो कह दो हमें अब दर्द नहीं होता!!
‘
की मौसम भी बदला है हवाएँ भी अब भी ठंडी है!
मगर जहाँ पर बर्फ गिरती थी वहां अब सर्द नहीं होता!!
‘
तेरे मिलने के वादो की कई किस्ते जो बाकी है।
उन्हें मिलकर पूरा कर दो कि अच्छा कर्ज नहीं होता।।
‘
हरदम ही तनहा तनहा हो किसकी याद मे साहिल।
उसे तुम सोचतें हो क्यों की जिसको फर्क नहीं होता।।
@@@@RK@@@@ -
मासूम चेहरे जो कभी,गुनाह नहीं करते।
मासूम चेहरे जो कभी,गुनाह नहीं करते।
हम यूँ जाग के रातो को,सुबह नही करते।।
,
हममें है लाख कमियां,चलो हम मानते है।
पर दिल से कहना,क्या तुम खता नहीं करते।।
,
तर्जुबा एक ये भी हो गया,चलो अच्छा ही हैं।
लोग अब वफ़ाओं के बदले,वफ़ा नही करते।।
,
जब संज़ीदगी के साथ,देखते है जिंदगी को।
फ़िर बहुत सी बातों पे,हम हँसा नही करते।।
,
बेवजह है तुम्हारा,मुलाकात की बातें करना।
हमकों मालूम है,शहर में तुम रहा नही करते।।
,
जज्बातों से खेलना है,अगर फितरत तुम्हारी।
तो सुनो साहिल भी,ज़ख्मो की दवा नही करते।।
@@@@RK@@@ -
चाँद जमीन पर कभी उतरता है क्या??
चाँद जमीन पर कभी उतरता है क्या??
बिन तपे कभी सोना निखरता है क्या??
‘
हम कहेंगे हजार बार फरेबी को फरेबी।
सच लिखने से यहाँ कोई डरता है क्या??
‘
हमें तो याद है हर मोड़ उस कहानी का।
तुम्हारे भी जहन में कुछ उभरता है क्या??
‘
जो भी कहना हो सोच समझकर कहा करो?
अब कोई वादों से अपने मुकरता है क्या??
‘
साहिल लिखते क्यूं हो बिना सबब के शायरी।
बताओ तुमको भी कोई कभी पढ़ता है क्या??
@@@@RK@@@@ -

सभी इल्ज़ाम शीशे पर ये जग कबतक लगायेगा
सभी इल्ज़ाम शीशे पर ये जग कबतक लगायेगा ,
भला। नाकामियों को वो यहाँ कैसे छुपायेगा ।
तुम्हारा है तुम्ही रख लो उजाला और सूरज भी ,
हमारा यार जुगनू है हमें रस्ता दिखायेगा ।
चरागों के लिए मैंने हवा से दुश्मनी कर ली ,
मुझे क्या था पता वो तो मेरा ही घर जलायेगा ।
सही मंज़िल हकीकत में उसे हासिल नहीं होगी ,
कभी जो साजिशों को कर किसी का दिल दुखायेगा ।
बिना मतलब उफनता है मियाँ खारा समंदर भी ,
किसी प्यासे शज़र की आग दरिया ही बुझायेगा ।
जिसे कंधे बिठाकर आज दरिया पार करवाया ,
यक़ीनन पीठ पर वो ही कभी खंज़र चलायेगा ।
हमारे हौंसले का इस कदर जो खूँन कर बैठा ,
मियाँ क्या खाक रिश्ता दोस्ती का वो निभायेगा ।
यक़ीनन भूलना उसको नहीं आसान होगा फिर ,
मेरी महफ़िल में आकर जो कभी दो पल बितायेगा ।
हरेन्द्र सिंह कुशवाह
~~~एहसास~~~
-
हज़ार दवा है बस इक बुख़ार के लिए
हज़ार दवा है बस इक बुख़ार के लिए।
अब दुआ ही करो इस बीमार के लिए।।
,
हम ख़ुशी से रहते है मौसम चाहें जो हो।
अब इंतज़ार थोड़े करेंगे बहार के लिए।।
,
यहाँ ज़ख्मो और चेहरो की बात न करेंगे।
बस अब हौसला नहीं है ऐतबार के लिए।।
,
जज्बातों से खेलने की सज़ा कोई हो गर।
इक जगह रखना उस गुनहगार के लिए।।
,
किसे फ़ुरसत की कोई हमकों भी मिलें ।
हम ही मिलते है नींदों से बस इतवार के लिए।।
,
साहिल आसान नहीं होती है जिंदगी कभी।
बस हौंसला न छोड़ना उस पार के लिए।।
@@@@RK@@@@ -
“किस वज़ह से मिली है ये तन्हाई हमको”
किस वज़ह से मिली है ये तन्हाई हमको।
दिखतीं ही नहीं है ख़ुद की परछाईं हमकों।।
,
सदियों पहले किसी ने पुकारा था हमें भी।
वो आवाज़ आज तक देती है सुनाई हमको।।
,
न तेरे काबिल हुए न खुद के ही काबिल हुए।
महँगी पड़ी है खुद से खुद की लड़ाई हमको।।
,
लाख कोशिशों के बावजूद तुम्हें भूल न पाए।
हर वक्त ही देती है तेरी तस्वीर दिखाई हमको।।
,
ताउम्र याद करने की सज़ा क्यूँ दे गए हो हमें।
बहुत हुआ अब चाहिए इस सजा से रिहाई हमको।।
,
कब तक लिखेंगे साहिल हल ए दिल यूँ ही।
की अब तो कम पड़ने लगी है रोशनाई हमको।।
@@@@RK@@@@ -
इल्तज़ा क्या करे।।
इल्तज़ा क्या करे कुछ न बाकी रहा।
न वो महफिल रही न वो साथी रहा।।
‘
इस क़द्र जिंदगी भी खफा हो गई।
साँसे चलती रही कुछ न बाक़ी रहा।।
‘
जख़्म देकर वो कहते है मिलते नहीं।
हम कहे क्या उन्हें इतना काफी रहा।।
‘
मंज़िलों का शहर मेरी किस्मत न थी।
इक मुसाफ़िर था मैं इक मुसाफिर रहा।।
,
जो उम्र भर रहे थे हम तनहा यहाँ।
था सबब कुछ नहीं मै बेवजह ही रहा।।
‘
रोशनी इक मिली थी फिर सहारा हुआ।
पर ये मौसम कहा तक मुआफ़िक रहा।।
‘
वो कहतें है साहिल तुम मुकम्मल हुए हो।
पर हक़ीक़त तो है की सब तबाह ही रहा।।
@@@@RK@@@@ -
“खुद को ही खुद में उलझा लिया मैंने”
खुद को ही खुद में उलझा लिया मैंने।
मुझे वहम था ,तुझे सुलझा लिया मैंने।।
,
दूर तलक देखा सब अँधेरा ही अँधेरा था।
फिर इक रोशनी को पास बुला लिया मैंने।।
,
चले थे हवाओं के रुख पर सफर करने।
खुद को ही बीच समंदर में डूबा लिया मैंने।।
,
तन्हाई में खुशियो की बातें अब हम क्या करे।
ज़रूरत के मुताबिक खुद को रुला लिया मैंने।।
,
टूटकर चूर चूर हो गए ख़्वाब शीशे की तरह।
क्या बताये तुमसे की अब कुछ बचा लिया मैंने।।
,
माना की गलत है चुराना कुछ भी किसी से।
पर साहिल जिंदगी को मौत से चुरा लिया मैंने।।
@@@@RK@@@@ -
बस इक लम्हा हूँ गुजर जाऊंगा मैं
कहाँ किसी को समझ आऊँगा मैं।
बस इक लम्हा हूँ गुजर जाऊंगा मैं।।
‘
तूफानों अब के दम भर के मिलना।
तिनका नही हूँ जो बिखर जाऊँगा मैं।।
‘
मुझे गुमराह करने वाले वहम में है।
मुझे छोड़ा हैं तो किधर जाऊंगा मैं।।
,
मंजिल करीब हो तो रास्ते खुद बनेंगे।
गिरने के डर से क्या ठहर जाऊँगा मैं।।
,
मेरी हैसियत नहीं के तुम्हें कुछ दे सकूँ।
चाहो टूटकर तारों सा बिखर जाऊँगा मैं।।
,
हज़ार जख़्म जिन्दा है अभी तक दिलो में।
ये जरा सी चोट पर क्या सिहर जाऊँगा मैं।।
,
मुश्किलो जितना चाहो तपा लो मुझको।
इक जिंदगी हूँ आखिर निखर जाऊँगा मैं।।
@@@@RK@@@@ -
जख़्म दे रहे है,दवा देने वाले।
जख़्म दे रहे है ,दवा देने वाले।
गुनाह कर रहे है,सजा देने वाले।।
,
चिरागों की हस्ती,मिटती नहीं है।
सुन लो तुफानो को,पता देने वाले।।
,
अभी मैं हूँ तनहा ,कल क्या रहूँगा।
महफिल से अपनी,उठा देने वाले।।
,
मुझे मेरी मंजिल अब,दिखने लगी है।
कर दो निगाह मुझपे,हवा देने वाले।।
,
सदिया है गुजरी,न आहट है कोई।
कहाँ तुम छिपे हो ऐ,जुबा देने वाले।।
,
लफ्ज़ो को मेरे है ,सभी का सहारा ।
वरना भँवर थे कई,डुबा देने वाले।।
,
अभी तक थे साहिल,हम भी वहम में।
बहुत शुक्रिया मुझको,दगा देने वाले।।
@@@@RK@@@@ -
ग़ज़ल
वो ख़्वाब; वो ख़याल, वो अफ़साने क्या हुए ।
सब पूछते हैं लोग; वो दीवाने क्या हुए ॥अपनों से जो अज़ीज़ थे आधे—अधूरे लोग ।
‘पहचान’ दी जिन्होंने; वो ‘बेगाने’ क्या हुए ॥किसने चुरा ली ‘धूप’ तुम्हारी ‘मुंडेर’ की ।
मिलने की वो कसक; वो पैमाने क्या हुए ॥क्यूँ; आग निगाहों की, लग रही बुझी—बुझी ।
जलवा—ए—हुस्न क्या हुआ; परवाने क्या हुए ॥दरवाज़े सारे बंद हैं; चुप के मकान के ।
लबरेज़ शोखियों के; वो ठिकाने क्या हुए ॥हम तो सफ़र में थे; चलो, बे-घर नसीब था ।
तुम्हारे हसीन चाँद से; आशियाने क्या हुए ॥तुमसे वो दिलकशी—वो हँसी; रूठ गई क्यों ।
ऐसे ‘गुनाह’ सोचो तो; अनजाने क्या हुए ॥खाई थी ये कसम जहां; न होंगे हम ज़ुदा ।
चश्मदीद वफ़ा के; वो बुत—ख़ाने क्या हुए ॥यादों का तेरी; सीने में, ‘जंगल दहाड़ता है’ ।
अहसास की नाज़ुक कली—याराने क्या हुए ॥काटी थीं हमने ‘हिज़्र’ की; रातें जहां कई ।
‘अनुपम’ जरा कहो तो; वो ‘मैख़ाने’ क्या हुए ॥
#anupamtripathi #anupamtripathiG
**************00000000************ -
ग़ज़ल
बंधु !
शक्ति–स्वरूपा माँ दुर्गा की आराधना के अकल्पनीय दिवस और अंतत: वैभव एवं विजय के पर्व ‘दशहरा’ पर मन–मानस में व्याप्त ‘लोभ–मोह–आघात’ के प्रतीक “रावण” का दहन । आप सभी का हार्दिक अभिनंदन एवं मंगल–कामनाएँ ।गोयाकि ; ग़ज़ल है ! [A03.E004] ग़ज़ल ———–: अनुपम त्रिपाठी
वो ख़्वाब में जो अक्सर दिखाई देता है ।
कौन है जो मुझको हरजाई कहता है ॥अपने गमों पे खुलकर दीवानगी है हँसना ।
गैरों के लिए रोना रूसवाई कहता है ॥वो फ़र्द आख़िरी था ‘कल रात’ जो गया ।
फ़िर भी ज़माना हमको तमाशाई कहता है ॥सब आईनों के अंदर ढूंढें अज़ीब दुनिया ।
है ‘रू…ह’ ‘रू-ब-रू’ तो परछाई कहता है ॥
#anupamtripathi #anupamtripathiG
**************************************
फ़र्द/आदमी -
वतन में आज नया आफताब निकला है,
वतन में आज नया आफताब निकला है,
हर एक घर से गुल ए इंकलाब निकला है।
सवाल बरसों सताते रहे थे जो हमको,
सुकूनबख्श कोई अब जवाब निकला है।
गये थे सूख समन्दर उदास आंखो के,
हर एक सिम्त से दरिया ए आब निकला है।
शुतुरदिली से जो छुप छुप के वार करते थे,
उन्हें चखाने मज़ा मुल्क़ताब निकला है।
सुकूं की सांस शहीदों के सारे कुनबे में,
खिला है चेहरा यूँ ताजा गुलाब निकला है।
अलग थलग है पड़ा मुल्क वो ही दुनिया में,
के जिसके मुल्क का खाना खराब निकला है।
इधर सुकूं तो उधर मौत का मातम पसरा,
असद को छेड़ने का ये हिसाब निकला है।
किसी की ईद किसी की “मिलन” है दीवाली,
नयी जगह से नया माहताब निकला है।
———–मिलन.
**********************************
कठिन शब्दों के अर्थ-
आफ़ताब-सूरज.
गुल ए इंकलाब-परिवर्तन का फूल.
सुकूनबख्श-संतोषजनक.
सिम्त-तरफ.
शुतुरदिली-बुजदिली.
मुल्क़ताब-मुल्क़ को रौशन करने वाला.
कुनबा-परिवार.
खानाखराब-बदनसीब
असद-शेर.
माहताब-चाँद.
*********************************
-
मैं तुझे अपनी वफाओं की दुहाई नहीं दूंगा
तेरी कलम को कभी अपनी रुबाई नहीं दूंगा,
मैं तुझको चश्म-ए-नम की कमाई नहीं दूंगा lतेरी आंखों में वहम के कई पर्दे टंगे हुए हैं,
मैं तुझे सामने रहकर भी दिखाई नहीं दूंगा lअभी गुरूर तेरे सर पे चढ के बोल रहा है,
ऐसे हाल में मैं तुझको सुनाई नहीं दूंगा lतू बेफिक्र होकर अपनी फितरतों से वफ़ा कर,
मैं तुझे अपनी वफाओं की दुहाई नहीं दूंगा lतेरा जो फ़ैसला है बेझिझक मुझको बताती जा,
मैं बेकसूर हूं मैं कोई सफ़ाई नहीं दूंगा lतू मुझे अपनी जिन्दगी से रिहा कर भी दे मगर,
मैं तुझे अपनी जिन्दगी से रिहाई नहीं दूंगा llAll rights reserved.
-Er Anand Sagar Pandey
-
तेरा होके और शर्मिन्दा नहीं होना
ज़रा सा गौर से सुन अब ये आईंदा नहीं होना,
कि मुझको तेरा होके और शर्मिन्दा नहीं होना|जहां मतलबपरस्ती आशनाई नोच खाती है,
मुझे ऐसी तेरी बस्ती का बाशिन्दा नहीं होना|बहोत ही बेरहम होकर किया था कत्ल खुद तूने,
मेरे दिल में तेरी ख्वाहिश को फ़िर ज़िंदा नहीं होना|जहां खुदगर्ज़ियों में रास्ते मंज़िल बदलते हैं,
मुझे ऐसी तेरी राहों का कारिन्दा नहीं होना|All rights reserved.
-अनन्य
-
अगर इश्क हो तो ही होती गज़ल है।
- अगर इश्क हो तो ही होती गज़ल है।
ख़यालों के बिस्तर पे सोती गज़ल है।।
दिशा है दिखाती ये भटके हुओं को,
दिलों की ख़लिस को भी धोती गज़ल है।।
जो साहित्य को हम कहें इक समन्दर,
तो सागर से निकली ये मोती गज़ल है।।
नयी पीढ़ियों को है माज़ी बताती,
अरूजो अदब को भी ढोती गज़ल है।।
है अम्नो अमां से ही रिश्ता गज़ल का,
मुहब्बत दिलों में भी बोती गज़ल है।।
अगर बहर से कोई ख़ारिज़ हो मिसरा,
तो आँसू बहाकर भी रोती गज़ल है।।
हँसाती रुलाती मिलन तंज कसती,
सभी नौ रसों में डुबोती गज़ल है।।
——मिलन..
-
हंसाकर कहीं तुम रुला तो न दोगे
-
हंसाकर कहीं तुम रुला तो न दोगे,
कोई जख़्म फिर से नया तो न दोगे।
हसीं वादियों के सपने दिखाकर,
कहीं यार तुम भी दग़ा तो न दोगे।
हिफ़ाजत का कर के बहाना कहीं तुम,
दिया जिन्दगी का बुझा तो न दोगे।
निहां राज़ ए दिल गर बता दूँ तुम्हें तो,
नजर से तुम अपनी गिरा तो न दोगे।
अगर याद आयी किसी दूसरे की,
मुहब्बत मेरी तुम भुला तो न दोगे।
भरोसे पे तेरे किए जो भरोसा,
उसे ख़ाक़ में तुम मिला तो न दोगे।
बड़ी मुश्किलों से सम्हाला है मैंने,
मुहब्बत की कश्ती डुबा तो न दोगे।
मुझे ख़ौफ़ यूँ बिजलियों का बताकर,
खुद अरमान दिल के जला तो न दोगे।
‘मिलन’ छोड़ जाओ मेरे हाल मुझको,
मुकद्दर का लिक्खा मिटा तो न दोगे।
———मिलन..
-
-
यही सोचा मैं ज़िंदगी की बेहिसी पर ग़ज़ल कहूँगा
******
यही सोचा मैं ज़िंदगी की बेहिसी पर ग़ज़ल कहूँगा
अज़ाब तेरे, तेरी अज़ीयत की चाशनी पर ग़ज़ल कहूँगाभटक रहा हूँ मैं कबसे तन्हा न हमसफर है न रौशनी है
ये सहरा सहरा भटक के यारों मैं तीरगी पर ग़ज़ल कहूँगान चाँद अपना न ये सितारे हैं मुझसे रूठे सभी नज़ारे
बयां कर के सभी अदावत में चाँदनी पर ग़ज़ल कहूँगाये फूल,खूशबू हसीन नज़ारे मेरे मुक़द्दर में ही नहीं हैं
सभी की मुझसे न जाने क्योंकर मैं दुशमनी पर ग़ज़ल कहूँगागरीब हूँ मैं खुदा की मर्जी क़सूर मेरा नहीं है कुछ भी
मगर सदाक़त से बेकसी और मुफलिसी पर ग़ज़ल कहूँगा******
-
तुम जो आओ ख्वाब में तो राब्ता रह जाएगा
********
तुम जो आओ ख्वाब में तो राब्ता रह जाएगा
इक दिया उम्मीद का दिल में जला रह जाएगापूछ लो तुम हाल मेरा बस दिखावे के लिए
के भरम दिल में मुहब्बत का ज़रा रह जाएगादूर होकर ज़िंदगी भी है पशेमाँ सी मेरी
तेरे बिन ज्यूँ रूह से पैकर जुदा रह जाएगाहम गुज़र जाएंगे इक दिन इस जहां ए फानी से
छूट जाएगा यहीं सब तज़किरा रह जाएगाउम्र के हाथों बदल जाएंगे सबके चेहरे भी
वह पुराना अक्स फिर तू ढूँढता रह जाएगावार दिल पर इस जुबां का देखो होता है बुरा
ज़ख्म तो भर जाएगा पर आबला रह जाएगाआँधियों की ज़द में हैं कुछ टिमटिमाते से दिये
जिस दिये में जान होगी वह दिया रह जाएगा********
-
ग़ज़ल
2.01(63)
मैं ! तुझे छू कर; ‘गु…ला…ब’ कर दूँगा !
ज़िस्म के जाम में, ख़ालिस शराब भर दूँगा !!
तू; मेरे आगोश में, इक बार सही; आ तो ज़रा !
ख़ुशबू—सा बिखर जाएगी, सारा हिसाब कर दूँगा !!
: अनुपम त्रिपाठी
*******************************************
011
गोयाकि ; ग़ज़ल है ! [A03.E010] ग़ज़ल———– : अनुपम त्रिपाठीऔर कुछ देर अभी हुस्न सजाये रखिए ।
नाज़ो—अंदाज़ अगर हैं तो उठाए रखिए ॥भेद ये; दिल का खोल दें न कहीं ।
अश्क; पलकों में कहीं गहरे दबाए रखिए ॥देखिए; वक़्त ! दबे पाँव गुज़र जाएगा ।
दिल के किस्सों से उसे पास बिठाये रखिए ॥रंगते—ज़िस्म हो कि; हो ये महक गेसू की ।
नीमकश तीरों को पलकों पे चढ़ाये रखिए ॥दिल के इस दर्द को न और जुबां देना तुम ।
गम का सहरां यूं ही सीने से लगाए रखिए ॥किसको मालूम है कि; कब वो इधर आ जाएँ ।
राह में उनकी नज़र अपनी बिछाए रखिए ॥देखिए; उनके ! इधर आने की, आई है खबर ।
आस की शम्अ को पुरज़ोर जलाए रखिए ॥इस तरह बात न कीजै कभी तनहाई से ।
दिल के ज़ख़्मों को जमाने से छुपाए रखिए ॥कौन जाने कि; कभी ख्वाव में आओ ‘अनुपम’ ।
ज़िस्मे—नाज़ुक को निगाहों से बचाए रखिए ॥
**********________*********** -
यादें
बचपन साथ बहारें देखें
बड़े हुए बंटवारें देखेंफिर आँगन में धुप ना आयी
आँखे अब दीवारें देखेंचल फिर रेत के महल बनायें
और नदियों की धारें देखेंमंदिर में तो मिला नहीं रब
चल बच्चों को पुकारें, देखेंचल भाई अब गले मिलें हम
उम्र हुई तकरारें देखेकत्ल हुआ तब बंद थीं लेकिन
खुलती खिड़की सारे देखेंकभी छाया कभी छाता बाबा
बारिश , गर्मी, जाड़ें देखें -
ग़ज़ल
ज़िंदगी को इस—–तरह से जी लिया ।
एक प्याला-–फिर; ज़हर का पी लिया ॥
वक़्त के सारे ‘थ…पे…ड़े’ सह लिए ।
गम जो बरपा, इन लबों को सी लिया ॥
अब अगर कुन्दन—सा दीखता….मैं दमकता ।
‘सूरज—मुखी’ या ‘रात—रानी’……बन गमकता ॥
छुपी हुई “अनुपम” दास्ताँ, ‘भीषण’ रण की ।
उम्र है : सहमी चिड़िया और वक़्त : क्रूर बहेलिया॥1.19॥
गोयाकि ; ग़ज़ल है ! [A03.01-018]
ग़ज़ल —– : अनुपम त्रिपाठी
गम का यारों रोज़ इक मैं, ‘सिलसिला’ हो जाऊंगा ।
‘देखना : तुम’ ; ‘सूखकर : मैं’, फिर हरा हो जाऊंगा ॥
आग में ‘विरहा’ की मुझको, ‘सु—र्ख—रू’ हो लेने दो ।
‘चौं-धि-या’ जायेगी दुनिया, जब ‘खरा’ हो जाऊंगा ॥
याद के जंगल में कहीं, गूँजेगी यूं ही ‘आहट’ मेरी ।
ढूँढने निकलेंगे सारे, [मैं] ‘गुम—शुदा’ हो जाऊंगा ॥
काटते हैं ‘पर’ : परिंदों के, यहाँ ज़ालिम हैं : लोग ।
‘छट…पटा…कर’ मैं ; उड़ूँगा, आसमां : हो जाऊंगा ॥
ख़ून से तर ‘ऊँ-ग-लि-याँ’ , अब वो छुपाएगा कहाँ ।
गीत गायेगा मिरे तो , “ मर्सिया “ हो जाऊंगा ॥
भूलना चाहो भी तो, कैसे ‘भु……ला’ पाओगे तुम ।
‘अक्स’ कैसे मिट सकेगा, ‘आ…ई…ना’ हो जाऊंगा ॥
जब ‘मिलन’ की रात कोई, ‘गुन—गुना’ के आएगी ।
‘प्रणय के अंतिम पहर’ की, इक ‘दुआ’ हो जाऊंगा ॥
हर ग़ज़ल में ‘आ…ग’ की, तासीर “अनुपम” की बसी ।
जब ‘ज़मीं’ ‘आवाज़’ देगी, ‘सरहद’ पे खड़ा हो जाऊंगा ॥
: अनुपम त्रिपाठी
*************_________**************
मर्सिया —-शोकगीत / तासीर —प्रकृति
अक्स —प्रतिबिंब / सुर्खरू––चमकदार
#anupamtripathi #anupamtripathiK
-

“ग़ज़ल लिक्खूँगा!”
ღღ_मैं भी लिक्खूँगा किसी रोज़, दास्तान अपनी;
मैं भी किसी रोज़, तुझपे इक ग़ज़ल लिक्खूँगा!
.
लिक्खूँगा कोई शख्स, तो परियों-सा लिक्खूँगा;
ग़र गुलों का ज़िक्र आया तो, कमल लिक्खूँगा!
.
बात ग़र इश्क़ की होगी, तो बे-इन्तहा है तू;
ज़िक्र ग़र तारीख का होगा, तो अज़ल लिक्खूँगा!
.
मैं लिक्खूँगा तेरी रातों की, मासूम-सी नींद;
और अपनी बेचैन करवटों की, नक़ल लिक्खूँगा!
.
हाँ ज़रा मुश्किल है, तुझे लफ़्ज़ों में बयां करना;
फिर भी यकीन मानो साहब, मुकम्मल लिक्खूँगा!
.
ये जानता हूँ “अक्स”, कि तुझे झूठ से नफरत है;
इसलिए जो भी लिक्खूँगा, सब असल लिक्खूँगा!!….#अक्स -

कफ़स
इन परों में वो आसमान, मैं कहॉ से लाऊं
इस कफ़स में वो उडान, मैं कहॉ से लाऊं (कफ़स = cage)हो गये पेड सूने इस पतझड के शागिर्द में
अब इन पर नये पत्ते, मैं कहॉ से लाऊंजले हुए गांव में अब बन गये है नये घर
अब इन घरों में रखने को नये लोग, मैं कहॉ से लाऊंबुझी-बुझी है जिंदगी, बुझे-बुझे से है जज्बात यहॉ
इस बुझी हुई राख में चिन्गारियॉ, मैं कहॉ से लाऊंपथरा गयी है मेरे ख्यालों की दुनिया
अब इस दुनिया में मुस्कान, मैं कहॉ से लाऊ -
ग़ज़ल
२१२२ १२१२ २२
अपने ही क़ौल से मुकर जाऊँ ।
इससे बेहतर है खुद में (खुद ही) मर जाऊँ ।।तू मेरी रूह की हिफ़ाजत है ;
बिन तेरे जाऊँ तो किधर जाऊँ ।तेरी साँसों को ओढ़कर हमदम ;
जिस्म से रूह तक सँवर जाऊँ ।इश्क में हद तो पार तब हो जब ;
जिस्म से रूह सा गुजर जाऊँ ।यूँ तो कतरा हूँ तुम छुओ गर तो ;
इक समन्दर सा मैं भी भर जाऊँ ।जिस्म को लाद कर चलूँ कब तक ?
दिल तो करता है अब ठहर जाऊँ ।तुमको पाना हो तब मुकम्मल जब ;
जिस्म में साये सा उतर जाऊँ ।राहुल द्विवेदी ‘स्मित’
-

उड़ान भरने दो::आनंद सागर
इस मंच से जुड़े सभी काबिल रचनाकारों के नाम-
****उड़ान भरने दो****
अपनी आगोश में ये आसमान भरने दो,
ये नये परिन्दे हैं,इन्हें उड़ान भरने दो lये जिन्दगी जीने का हुनर सीख जायेंगे,
ज़रा सब्र रखो,इन्हें ख्वाबों में जान भरने दो lइनका हर हर्फ क़यामत तलक आबाद रहेगा,
शर्त है कि इनके मुंह में इनकी ज़ुबान भरने दो lअभी तो चंद गज़ का फासला ही तय हुआ है,
अपने कदमों में इन्हें सारा जहान भरने दो lमैं थक गया तो तेरे ही पहलू में गिरूंगा,
अभी पुरजोश हूं थोड़ी थकान भरने दो lमैं छोड़ दूंगा शायरी,गज़लों से जूझना,
बस जो चोट है उसका निशान भरने दो llजुबान=भाषा/आवाज
All rights reserved.
-Er Anand Sagar Pandey
-
ग़ज़ल
काश! कोई तो रास्ता निकले.
मुश्किलों से मेरा गला निकले.जान..छूटेगी.. उसके.. छूने से,
जान आये तो मेरी जां निकले.लाख सदियों में तय नहीं होगा,
फ़ासले.. इतने दरमियां निकले.कौन.. होता हूँ.. दोष दूँ उसको,
क्या पता मुझमें ख़ामियाँ निकले.—डॉ.मुकेश कुमार (Raj Gorakhpuri)
-

मेरी गज़लों में तुझे
**मेरी गज़लों में तुझे ढूढ रहे हैं ज़माने वाले**
मेरी गज़लों में तुझे ढूढ रहे हैं ज़माने वाले,
अब कहां तुझको छुपाऊं छोड़ के जाने वाले l
कोई तो है जो इस खामोश उदासी का सबब है कहकर,
सौ क़यास लगा लेते हैं लगाने वाले l
कल तुझे भूलने की कोशिश में यूं याद किया था मैने,
कि रो पड़े थे तेरे खत वो पुराने वाले l
स्याह रातों में तेरी गज़लों की तड़पती आह सुनी है हमने,
मुझको ऐसा भी बताते हैं बताने वाले l
इक बात बताता हूं तुझे आसान से लफ्जों में,
तेरी याद बहुत आती है भुलाने वाले l
बड़ी मुश्किल से सम्भल पाया हूं बिछड़कर तुझसे,
फ़िर कभी लौट ना आना तू ऐ जाने वाले l
रोज ढलता हुआ दिन मुझसे जताता है कि,
तेरी यादों में बचे हैं दिन वो सुहाने वाले l
तू यूं छुप-छुप के मेरी गज़लें ना पढा कर वरना,
मेरा हर राज़ समझ जायेंगे ज़माने वाले ll
All rights reserved.
-Er Anand Sagar Pandey
-
मेरा ये हुक्म है सांसों
ताज़ा गज़ल-
मेरा ये हुक्म है सांसों::Er Anand Sagar Pandey
मेरा ये हुक्म है सांसों कि एहतियात रहे,
वो रहे ना रहे ता-उम्र उसकी बात रहे l
वो क़मर हो के मेरी ज़िन्दगी में रौशन हो,
तो इल्तज़ा है कि मुकद्दर में मेरे रात रहे l
वो अपने क़ल्ब में गर मेरे लिये नफ़रत पाले,
तो मेरे क़ल्ब में बस उसका इल्तिफ़ात रहे l
ज़ुस्तज़ू ये तो नहीं है कि मौत आये ना,
आरज़ू है कि पहलू में मगर हयात रहे l
वो जिस लम्हे में सिमट जाये मेरी बाहों में,
उसी लम्हे में मेरी बाहों में क़ायनात रहे l
मैं फलक़ की बुलन्दी का तलबगार नहीं “सागर”,
मैं क़ातिब हूं फक़त इतनी ही मेरी औकात रहे ll
Word meanings-
एहतियात=सावधानी
हुक्म=आदेश
क़मर=चांद
इल्तज़ा=आग्रह
मुक़द्दर=भाग्य
क़ल्ब=दिल/आत्मा/मन
इल्तिफ़ात=मित्रता/प्रेम
हयात=जीवन
क़ातिब=लेखक
All rights reserved.
-Er Anand Sagar Pandey
-
ख्वाबों की फस्लें
एक पुरानी गज़ल-
**ख्वाबों की फसलें आज भी मैं बोया करता हूं::गज़ल**
हक़ीक़त जान ले कि रात भर मैं रोया करता हूं,
बहुत हैं दाग दामन में जिन्हें मैं धोया करता हूं l
यक़ीनन बांझ हैं दिल की जमीं मैं मान लेता हूं,
मगर ख्वाबों की फसलें आज भी मैं बोया करता हूं l
मेरा अरसा गुज़र गया तेरी यादों की चौखट पर,
ना जाने क्यूं तेरी यादों में ऐसे खोया करता हूं l
उगा करती है तेरी याद इन पलकों के गोशों में,
जिसे मैं आंसुओं से सींचता,संजोया करता हूं l
एक मुद्दत से कई ख्वाब मेरी चौखट पे बैठे हैं,
मेरी आंखें बता देंगी मैं कितना सोया करता हूं l
ये बात सच है कि मैं लोगों से तेरा ज़िक्र नहीं करता,
मगर छुप-छुप के तुझे गज़लों में पिरोया करता हूं ll
All rights reserved.
-Er Anand Sagar Pandey
-
“सुझाव”
????????
ग़ज़ल
———
डगमगाती सी नाव है भाई ।
भाइयों में तनाव है भाई ।।याद कैसे रहे लगी दिल की ।
आज झूठा लगाव है भाई ।।दिल बड़ा पाक-साफ होता था ।
अब वहाँ भेद भाव है भाई ।।आखिरी बार पास थे कब हम ।
साथ बस मन मुटाव है भाई ।।दिल के रिश्ते संभालने होंगे ।
जो शुरू यूँ रिसाव है भाई ।।दरकने पर कगार आई तो ।
बीच अब क्या बचाव है भाई ।।आदमी की वज़ूददारी ही ।
पेश करती सुझाव है भाई ।।बात अपनी सदा मनाते हो ।
मानना भी पड़ाव है भाई ।।शेष अवदान सब कुशल ही है ।
पूँछना क्युँ दुराव है भाई ।।…अवदान शिवगढ़ी
१७/०६/२०१६
०९:२७ बजे, साँझ ।
शिवगढ़ जलालपुर,अमेठी । -
समझदार लोग धूल फांकते हैं
**समझदार लोग धूल फांकते हैं::आनन्द सागर**
जो अपने आगे दूसरों को कम में आंकते हैं,
ऐसे ही समझदार लोग धूल फांकते हैं l
जिनसे अपने घर का हाल सम्भाला नहीं जाता,
ऐसे ही जाहिल दूसरों के घर में झांकते हैं l
फितरत नहीं हमारी औरों में ऐब ढूंढना,
तहज़ीब है हमारी हम खुद में ताकतें हैं l
सकूत समन्दर की गहराईयां कहता है,
ये लोग कतरा भी नहीं और डींग हांकते हैं ll
All rights reserved.
-Er Anand Sagar Pandey
-
रात भर करवटें मैं बदलता रहा
रात भर करवटें मैं बदलता रहा
अँधेरो में खुद को छलता रहा
टूटा नहीं जमाने की चोट से
साँसों की तपिश से पिघलता रहा
ताल्लुक नहीं था जिनसे मेरा
उनको भी ताउम्र सहता रहा
दिल में यादों का तूफां समेटे हुऐ
लबबस्ता मैं आँखों से कहता रहा
दिल-ए- मुज्तर को मैं कैसे समझाऊँ
जो पल पल तुमसे बिछड़ता रहा
शब भर सबा को शिकेबाई नहीं थी
झोंका चेहरे को छूकर गुज़रता रहा
दीदा-ए-नमनाक तुझे कैसे दिखाऊँ
मेरी हालत पर तू भी हँसता रहा
अंगड़ाइयों को कैदखाने में रखकर
तेरी यादों से सौदा करता रहा
दश्त-ए-तलब हर बार उजड़ जाता
तेरे गुस्से को जब तलक सहता रहा
अनमोल छतपुरिया
लबबस्ता- बंद होठ वाले
दिल-ए-मुज्तर- व्याकुल दिल
शिकेबाई- धैर्य
दीदा-ए-नमनाक- आसूं भरी आंखें
दश्त-ए-तलब- इच्छा का जंगल -
अभी भी मेरी आंखों में
कदम हैं अब भी हरकत में कहीं ठहरा नहीं हूं मैं,
यक़ीनन टूट चुका हूं मगर बिखरा नहीं हूं मैं lअभी भी आईने में खुद को अक्सर ढूढ लेता हूं,
सुनो ऐ गर्दिश-ए-हालात बस चेहरा नहीं हूं मैं lअभी भी मेरे दम से ही मेरी परवाज़ होती है,
कभी रहम-ओ-करम पर आज तक फहरा नहीं हूं मैं lअभी भी मेरी आंखों में मुहब्बत डूब सकती है,
तुझे ऐसा क्यूं लगता है कि अब गहरा नहीं हूं मैं lमेरी गर मौज निकली तो तेरा सब डूब जायेगा,
मैं “सागर” अब भी “सागर” हूं कोई सहरा नहीं हूं मैं ll// सहरा=रेत का मैदान/रेगिस्तान //
All rights reserved.
-Er Anand Sagar Pandey -
अब बात मेरी जान पे है
पुरानी डायरियों से-
**अब बात मेरी जान पे है::गज़ल**
जेहन में दर्द जो उठता है आसमान पे है,
बात ये है कि अब बात मेरी जान पे है l
खौफ़ लगता है कि सांसें ना अब दगा कर दें,
खैर! ये बात ज़िन्दगी तेरे ईमान पे है l
आस जिस्म की चौखट पे थक के बैठी है,
क़रार बन के परिंदा कहीं उड़ान पे है l
तमाम उम्र इक आहट का मुन्तज़िर रहा हूं मैं,
चले आओ कि मेरी उम्र अब ढलान पे है l
तू मेरे सिवा और किसी का नहीं हो सकता,
ज़िन्दगी है अगर तो बस इसी गुमान पे है l
आज मत छेड़ मेरे दिल के तराने “सागर”,
मेरी आंखों का समन्दर आज उफान पे है ll
All rights reserved.
-Er Anand Sagar Pandey
-
ग़ज़ल
उपर चढ़ते , नीचे जाते
ईमान खरीदे बेचे जाते
~
ए सी कमरों में बैठ कर
क्या क्या नहीं सोचे जाते
~
सियासत का पहला पाठ
पाँव कैसे खींचे जाते
~
किरदार पे कैसा भी हो दाग
पैसों से सब पोंछे जाते
~
सच बोलने वालों के तो
सरे राह मुँह नोचे जाते
~
स्कूल भेजना बंद किया
जेल तभी तो बच्चे जाते
******************************
रचानकार :- गौतम कुमार सागर
