Category: ग़ज़ल

  • तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है

    तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है,

    और तू मेरे गांव को गँवार कहता है।

     

    ऐ शहर मुझे तेरी औक़ात पता है,

    तू बच्ची को भी हुस्न ए बहार कहता है।

     

    थक गया हर शख़्स काम करते करते,

    तू इसे ही अमीरी का बाज़ार कहता है।

     

    गांव चलो वक्त ही वक्त है सबके पास,

    तेरी सारी फ़ुर्सत तेरा इतवार कहता है।

     

    मौन होकर फोन पर रिश्ते निभाए जा रहे हैं,

    तू इस मशीनी दौर को परिवार कहता है।

     

    वो मिलने आते थे कलेजा साथ लाते थे,

    तू दस्तूर निभाने को रिश्तेदार कहता है।

     

    बड़े-बड़े मसले हल करती थी पंचायतें,

    अंधी भ्रस्ट दलीलों को दरबार कहता है।

    अब बच्चे भी बड़ों का अदब भूल बैठे हैं,

    तू इस नये दौर को संस्कार कहता है।

    हरेन्द्र सिंह कुशवाह

    एहसास

  • इस क़ैद ए तन्हाई से कब रिहा होंगें हम।

    इस क़ैद ए तन्हाई से कब रिहा होंगें हम।
    सोचा तो था की मुकम्मल जहां होंगे हम।।
    ,
    रोज़ आते है ख़्याल हमकों परेशान करने।
    अब जितना कहेंगे उतने ही रवां होंगे हम।।
    ,
    तुम फ़लक ए हुस्न हो हमसे क्या है वास्ता।
    हुए जो जिंदगी से रूबरू क्या फ़ना होंगे हम।
    ,
    खुशियों की फ़ेहरिस्त में नहीं कही नाम मेरा।
    अब ग़मो से क्या कहें कोई सज़ा होंगे हम।।
    ,
    हमकों मिली नहीं मंजिल इक अरसा हुआ।
    साहिल मुमकिन ये है गुमनाम पता होंगे हम।।
    @@@@RK@@@@

  • ग़ज़ल-ऐ-शराब……

    एक शराब की कहानी है ये
    एक शराबी की जुबानी है ये

    पीता है वो सुबह-शाम जी भर के
    एक शराबी की ईमानदारी है ये

    सुकून देती है ये बहुत दिल में जाने के बाद
    एक शराबी की मन की मानी है ये

    क्यों कोसते है अक्सर सभी इसको दुनिया में
    एक शराबी की दिलबर जानी है ये

    बहुत हँसीन पल हो जाते है इसको पीने के बाद
    एक शराबी ने खुले-आम बात मानी है ये

    Dev Kumar

  • तेरे इश्क मे….

    तेरे इश्क मे…….तेरे इश्क मे ,
    तेरे इश्क मे बेबस हुए
    तेरे इश्क मे बेखुद हुए
    तेरे इश्क मे बेहद हुए दीवाने हम !

    तेरे इश्क मे…….तेरे इश्क मे ,
    तेरे इश्क के दरिया मे हम
    तेरे इश्क के सहरा मे हम
    तेरे इश्क के सावन मे हम देखो डूब गए !

    तेरे इश्क मे…….तेरे इश्क मे ,
    तेरे इश्क के कुंचो मे अब
    तेरे इश्क की गलियो मे अब
    तेरे इश्क के सायो मे अब मेरा बसेरा है !

    तेरे इश्क मे…….तेरे इश्क मे !

  • “इक जमानें मे सच है शज़र हुआ था मैं”

    इक जमानें मे सच है शज़र हुआ था मैं।
    जानें कितने परिंदों का घर हुआ था मैं।।
    ,
    अपनी छाह में बच्चों को खेलता देखके।
    जरूर ही जमाने से बेखबर हुआ था मैं।।
    ,
    मेरे सायें में बीती थी हाँ वैसे तो इक सदी।
    याद है की अख़बार में खबर हुआ था मैं।।
    ,
    पर राह ए जिंदगी में इक मोड़ ऐसा देखा।
    सबने छोड़ा जब शाख़ ए बेसमर हुआ था मैं।
    ,
    आखिरी वक़्त जब चली थी मुझपे आरिया।
    ख़ून नहीं था मुझमे पर तरबतर हुआ था मैं।।
    @@@@RK@@@@

  • माना तेरे काफ़िलो में शामिल नहीं हुए।

    माना तेरे काफ़िलो में शामिल नहीं हुए।
    पर ऐसा न था की हम मंजिल नहीं हुए।।
    ,
    इक उम्र गुजरी यूँ ही ख्वाबो ख्यालों में।
    कुछ देख न पाएं कुछ हासिल नहीं हुए।।
    ,
    जिंदगी ने दी है जिंदगी तो शुक्रिया करो।
    क्या करें अफ़सोस हम क़ामिल नहीं हुए।।
    ,
    चंद लफ़्जो में कैसे लिखें अधूरी दास्तान।
    यूँ कहें हम कश्ती थे जो साहिल नहीं हुए।।
    ,
    जानते थे जीत के भी हार हम ही जाएंगे।
    इसलिए उनके कभी मुक़ाबिल नहीं हुए।।
    @@@@RK@@@@

  • “कब तक करोंगे यूँ बेईमानी खुद से”

    कब तक करोंगे यूँ बेईमानी खुद से।
    मुझे छोड़कर करोगे,नादानी खुद से।।
    ,
    हमारी दास्तानों को फरेब कहने वाले।
    लिख नहीं पाओगें ये,कहानी खुद से।
    ,
    तन्हाई में मिलें है लोग जो समन्दर किनारे।
    उनका अश्क़ है,या है यहाँ पानी खुद से।।
    ,
    हमने बसर की जिंदगी ग़मो के दरम्यान।
    हमें दुश्मनो से नहीं, है परेशानी खुद से।।
    ,
    किताबो में हम तुमको नहीं मिलने वाले।
    याद करना हो तो कर लो ज़ुबानी खुद से।।
    ,
    बचपन ऐसे गुजरा की जैसे लम्हा हो कोई।
    ये उम्र ठहरी तो हैरान है जिन्दगानी खुद से।।
    @@@@RK@@@@

  • न”वो वक़्त रहा न याद है क़िस्सा कोई”

    न वो वक़्त रहा न याद है क़िस्सा कोई।
    मेरे हिस्से में ही नहीं है मेरा हिस्सा कोई।।
    ,
    ये किया है ख़िज़ाँओ ने जहाँ घर अपना।
    गुजरे जमानों में था यही गुलिस्ताँ कोई।।
    ,
    उनसे कौन पूंछे की क्या मिला खफा होके।
    अपनों को छोड़ता है क्या दानिस्ता कोई।।
    ,
    छोड़ दिया मेहफिलो में मैंने आना जाना।
    कही मिल न जाएँ शख़्स मुझे तुझसा कोई।।
    ,
    ख्वाहिशों की ख़ातिर हम परेशां रहे ताउम्र।
    पर जाते वक़्त साथ कहाँ गया खित्ता कोई।।
    @@@@RK@@@@

  • सफर फासलों का

    सफ़र फासलों का है ये बड़ा दर्द भरा,
    गर हो मुम्किन,तो कोई और अज़ाब दो ना बड़ा

    नहीं देखूँगा तेरी सूरत मैं कभी,
    इन आँखों को कोई और पता दो ना ज़रा

    बातों-बातों में बनी खामोशी की दीवार है ये
    लफ़्ज की एक चोट से गिरा दो ना ज़रा

    अश्क के दरिया में हूँ डूबा, गम के शरर में दहकता
    और कब तक है तड़पना, ऐ मुंसिफ़ बता दो ना ज़रा

    रोज मरता है विनायक, तुझपे मरता हुआ
    कर मुकम्मल मुझको,मेरी चिता सजा दो ना ज़रा…..

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  • हम तेरे वादों की जब गहराई में उतरे।

    हम तेरे वादों की जब गहराई में उतरे।
    सदमा सा लगा जब सच्चाई में उतरे।।
    ,
    तुमको ढूंढते रहें थे महफिल महफिल।
    पर सुकून मिला जब तन्हाई में उतरे।।
    ,
    जिसनें चाहा जैसा वैसा बनाया खुद को।
    कुछ ने बुरा किया कुछ अच्छाई में उतरे।।
    ,
    हमे जो तजुर्बा हुआ वही लिखतें रहें है।
    जो फुरसत दे जिंदगी तो रानाई में उतरे।।
    ,
    अज़ीब है वो ही कहतें है बेवफा हमकों।
    जिसने वफ़ा की ही नहीं,बेवफ़ाई में उतरे।
    ,
    ज़िन्दगी तेरी तपिश में हम तो राख हो गए।
    अब तो छाह कर जो बचे है परछाई में उतरे।।
    @@@@RK@@@@

  • इक अरसे से कोई ख्वाब नहीं देखा हमने।

    इक अरसे से कोई ख्वाब नहीं देखा हमने।
    जब से तुम गए आफ़ताब नहीं देखा हमने।।
    ,
    लफ्ज़ दर लफ्ज़ हम क्या क्या नहीं हुए थे।
    पर खुद का लिखा किताब नहीं देखा हमने।।
    ,
    हमारी मौत के बाद सजती रहती है महफिले।
    मगर जीते जी कभी ख़िताब नहीं देखा हमनें।।
    ,
    अब जिंदगी से नहीं है शिकवे शिकायत कोई।
    बस अधूरे सवाल थे जवाब नहीं देखा हमनें।।
    ,
    जिसकों जैसा देखना चाहा वैसा देखा ताउम्र।
    साहिल कभी खुद को खराब नहीं देखा हमनें।।
    @@@@RK@@@@

  • Untitled post 17038

    mai sab kuch hu tera lekin, mai tera kuch nahi lagta

    bahut kuch pa liya hai phir bhee khali khali sa lagta

    tujhe pane  ki koshish kar raha barso se hoo lekin

    tu mujhko kho nahi sakti , mai tujhko paa nahi sakta

    -altaf aarzoo

  • कुछ न कुछ दिल में चलता रहता है।

    कुछ न कुछ दिल में चलता रहता है।
    इक ख़्वाब अनदेखा पलता रहता है।।
    ,
    क़िस्मत कहें की मुक़द्दर कहें उसको।
    जो नाम सुबह शाम खलता रहता है।।
    ,
    वक़्त गुजरा है कुछ इस तरह से जैसे।
    मोम सी जिंदगी से मोम गलता रहता है।।
    ,
    अब धुंआ धुंआ ही बचा हूँ आकर देखों।
    वैसे मिटटी में राख़ कहाँ जलता रहता है।।
    ,
    हमने जो कह दिया उस पर ही कायम है।
    हम मौसम नहीं की जो बदलता रहता है।।
    ,
    अपनों अश्क़ो पर गुमान करते हो ठीक है।
    पर दरिया ए अश्क़ यहाँ भी निकलता रहता है।
    ,
    उसके यहाँ न शाम हुई न वो मिलने आया।
    यहाँ रोज सूरज निकलके ढ़लता रहता है।।
    ,
    साहिल जिसकी जुस्तजू में जिंदगी गुजार दी।
    वो बस हमको छोड़के सबसे मिलता रहता है।।
    @@@@RK@@@@

  • डर लगता है

    देखो तो मजमा आजकल उनका इधर लगता है
    मतलब की है यारी, सर-बसर लगता है

    कहते थे कभी मुल्क की आवाम के हैं सेवक
    देखो तो आज बनारस ही उनका घर लगता है

    कब्रिस्तान और श्मशान की हो रही बराबरी
    बनाएंगे पूरे हिन्दुस्तां को, मुजफ्फरनगर लगता है

    महंगा हुआ है खाना, महंगी है रसोई
    शिद्दतों से आये अच्छे दिन का असर लगता है

    आतंक और करप्शन तो हैं ही दर्द-अंगेज़
    नए पनपते देशभक्तों से भर गया शहर लगता है

    बंद लब कर, चुप बैठा है ‘विनायक’
    डर है किसी बात से, अब ये कहने में भी डर लगता है।

  • जो भी तुम कहते हो वही होगा।

    जो भी तुम कहते हो वही होगा।
    ऐसा सोचते हो तो नही होगा।।
    ,
    हमसें क्यूँ पूँछते हो पते ठिकाने।
    मैं आसमाँ नहीं पता ज़मी होगा।।
    ,
    किसकी राहों में अब पलकें बिछाएं।
    हम समंदर है मिलेगा जो नदी होगा।।
    ,
    ग़म जख़्म अश्क़ भरी दास्ताँने छोडो।
    कौन अपना था जो अजनबी होगा।।
    ,
    काफ़िलो में तेरे हम नहीं मिलने वाले।
    हम तन्हा रहेंगे तो गुजर नहीं होगा।।
    ,
    हमारी फ़ितरत में नहीं है मौसम होना।
    जो आज तक यहाँ था कल कही होगा।।
    @@@@RK@@@@

  • रात अँधेरा ख़ामोशी तन्हाई,अश्क़ मिला

    रात अँधेरा ख़ामोशी तन्हाई,अश्क़ मिला।
    यादें वक़्त पल तस्वीरें बातें,अश्क़ मिला।
    ,
    जिंदगी झूठ क्या वादें क्या क़समे इरादें।
    मौत सच तन्हाई सच आँखें,अश्क़ मिला।
    ,
    मिलना वादियां झरने ये पहाड़ ओ मौसम
    वीरानी निशानी नादानी क्या अश्क़ मिला।।
    ,
    जमी आसमाँ चाँद देखें हजारो तारे सितारें।
    टूटे हुए ख़्वाब अधूरी सी बात,अश्क़ मिला।।
    ,
    मासूम सी शक्ले फ़रेबी इरादें तज़ुर्बा हुआ है।
    ख़ुद को किया है जो तेरे हवाले,अश्क़ मिला।।
    @@@@RK@@@@

  • दर्द चोट आसूँ जख़्म अब मरहम चाहिए।

    दर्द चोट आसूँ जख़्म अब मरहम चाहिए।
    सफ़र में क्या कहें हमको हमदम चाहिए।।

    मेरी मुस्कुराहट पर हैरत क्यूँ करते हो तुम।
    बोल दो आँखों का मंजर नम नम चाहिए।।
    ,
    अब तक जिन्दा हूँ सुनो मौत भी फरेबी है।
    जिंदगी नादान को आवाज़ छमछम चाहिए।।
    ,
    वफ़ा करो मगर वफ़ा की उम्मीद न रखना।
    रखो अग़र ख़ुशी की जगह ग़म ग़म चाहिए।।
    ,
    जब दिल में दर्द हो बातों से फिरआँसू आएं।
    सच में कहूँ तो ऐसा मौसम कम कम चाहिए।।
    ,
    कही रात है ख़ामोशी है तन्हाई है अँधेरा है।
    कही मेहफिल सजी है रौशनी चमचम चाहिए।।
    @@@@RK@@@@

  • देखना है की हिस्सों में कैसे बँट पाउँगा मैं। इक बूढ़ा शज़र हूँ लगता है कट जाऊंगा मैं।। ‘

    देखना है की हिस्सों में कैसे बँट पाउँगा मैं।
    इक बूढ़ा शज़र हूँ लगता है कट जाऊंगा मैं।।

    मुझे सहारा देने में दिक्कतें तो है बच्चों को।
    ख़ामोश ही रहूँगा की जब थक जाऊंगा मैं।।
    ,
    सोचा नहीं था की मुझपे भी होगी पत्थर बाजी।
    जब इक फल जैसा शाख पे पक जाऊंगा मैं।।
    ,
    ज़मी ज़ायदाद तकसीम हुए तजुर्बे कौन रखेगा।
    वक़्त है पूँछो अफसोस होगा जब मर जाऊंगा मैं।।
    ,
    रूह भी मेरी माँगेगी तुम्हारी सलामती की दुआएँ।
    रोना नहीं जब मौत की रस्सी से बन्ध जाऊंगा मैं।।
    @@@@RK@@@@

  • दवा भी तुम दुआ भी तुम। हवा भी तुम फ़िजा भी तुम।।

    दवा भी तुम दुआ भी तुम।
    हवा भी तुम फ़िजा भी तुम।।
    ,
    घटा भी तुम अदा भी तुम।
    वफ़ा भी तुम सज़ा भी तुम।।
    ,
    हँसी भी तुम ख़ुशी भी तुम।
    कभी आँख में नमी भी तुम।।
    ,
    नदी भी तुम ज़मी भी तुम।
    कही भी तुम नहीं भी तुम।।
    ,
    सफ़र भी तुम लहर भी तुम।
    भँवर भी तुम शहर भी तुम।।
    ,
    नज़र भी तुम असर भी तुम।
    घड़ी भी तुम पहर भी तुम।।
    ,
    सही भी तुम ग़लत भी तुम।
    जमी भी तुम फलक भी तुम।।
    ,
    अज़ीब सा ख़्याल हो,
    हो करीब भी अलग भी तुम।।
    @@@@RK@@@@

  • मेरे घर में भी मुझे  पहचानने वाला ………..

    मेरे घर में भी मुझे  पहचानने वाला ………..

    मेरे घर में भी मुझे  पहचानने वाला बस एक शक्स हमेशा रहता है।

    जब मैं देखूं उसे  वो भी  आईने से  मुझे  बस देखता रहता है।

     

    यहां इस खु़शहाली में अमीरों को नींद बस ठंडी हवा में आती है

    लेकिन गरीब यहां का  जीवनभर  अपना तन  सेंकता रहता है।

     

    किसीको तो  प्यारा  है  अपना  इमान  अपनी जान  से  भी  ज्यादा

    और  कोई  तो  यहां  बस  चंद पैसों खातिर  इसे  बेचता  रहता है।

     

    अपने ज़ज़्बे के  ज़ोर से  कर  देता  है  कोई  तो  हर  मुसीबत  को  धवस्त

    लेकिन  कोई तो  यहां  मुसीबत को  बस देखते ही  घुटने  टेकता  रहता है।

     

    कोई पैसा कोई बुद्धि तो कोई  प्रेम  को हर मर्ज़ की दवा मानता है

    लेकिन बंदातो सबसे जरूरीबेहतरीन चीज़ को  बस नेकता कहता है।

     

                                                                                                  कुमार बन्टी

     

  • मंजिल का नज़ारा तो…………..

    मंजिल का नज़ारा तो…………..

     मंजिल का नज़ारा तो अपनी पालकों तले कम ही बीता है।

    हमारा ज्यादा वक़्त तो बस  सफर के बहाने ही  बीता है।

     

    किसीके  दिल  में  किसीके  खातिर  प्यार  है  कितना

    इस  उंचाई  को  नापने  खातिर  कहां  कोई  फीता है।

     

    वक़्त  की  रफ्तार  को  कोई  लगातार  चुनौती दे सके

    क्या  इस  दुनियाँ  में  कहीं  ऐसा भी  कोई  चीता है।

     

    वो पुराने दिन  पुरानी बातें सिर्फ इतिहास में ही रह गई

    इस  जमाने  में  तुम्हारे  खातिर  कहां  कोई सीता है।

     

    लेकिन  उनकी वफा पे उंगली उठाना भी  मुनासिफ नहीं

    ये मर्द भी तो  जानबूझकर  घाटघाट का पानी पीता है।

     

    अपने लिए भी जीने का वक़्त  कम मिलता है आज़कल

    तुम पूछते हो कि  यहां कौन  किसके  खातिर जीता है।

     

    हारजीत के दौर में  असल जीत सिर्फ तब हासिल हुई

    जबजब इस बंदे ने  पहले  खुद को  बखूबी जीता है।

     

                                                                           कुमार बन्टी

     

  • उम्र लग गई

    ख्वाब छोटा-सा था, बस
    पूरा होने मे उम्र लग गईं!

    उसके घर का पता मालूम था , बस
    उसे ढूंढने मे उम्र लग गईं !

    ख़त तो उसने भी लिखे थे, बस
    मेरा नाम लिखने मे उम्र लग गईं !

    दूर तो ना थे हम एक-दूसरे से, बस
    नजदीकियों का अहसास होने मे उम्र लग गईं !

    ख्वाब छोटा-सा था, बस
    पूरा होने मे उम्र लग गईं !

    इंतजार तो उसे भी था मेरा, बस
    उसे इजहार करने मे उम्र लग गईं !

    रोया तो वो भी था ऱज के मुझसे बिछड़कर, बस
    आँखों के पानी को अश्क बनने मे उम्र लग गईं !

    यू तो मेरा वक्त बदल गया, बस
    उसे बदलने मे उम्र लग गईं !

    ख्वाब छोटा-सा था, बस
    पूरा होने मे उम्र लग गईं!

  •         ज्यादा नहीं मुझे तो बस………..

            ज्यादा नहीं मुझे तो बस………..

     

     ज्यादा नहीं मुझे तो बस एक  सच्चा इंसान  बना दे तूँ ।

    एक बार नहीं चाहे हर बार सच में हर बार बना दे तूँ।

     

    आसमां  छूने की ख्वाहिश  मेरी नहीं  मन नहीं मेरा

    मुझे  तो  बस  सही  दिशा  में  उड़ना सिखा दे तूँ।

     

    गलत गति से  गलत राह पे दौड़ना  मैं नहीं चाहता

    मुझे  तो  सही  राह  पे  बस  चलना  सिखा दे तूँ।

     

    सैंकड़ों बरसों के कतरे जीकर भी मेर मन नहीं भरेगा

    मुझे तो बस  आज़ का पूरा दिन  जीना सिखा दे तूँ।

     

    लाखोंकरोड़ों के  झूठे  साथ  का  मुझे  क्या करना

    मुझे तो बस  एक सच्चे साथी का  साथ दिला दे तूँ।

     

    किसीकी बदलती हस्ती को जानकर  मुझे क्या करना

    कौन हूँ क्यों जिंदा हूँ मैं मुझे तो बस ये समझा दे तूँ।

     

    आज़कल दुनिया में  जीतेजीते भी बहुत मरते हैं रब्बा

    इस बंदे को  बस  मरने के बाद  जीना सिखा दे तूँ।

     

                                                                                –   कुमार बन्टी

     

  • जिंदगी  में   मेरी   एक  अपनापन है  आज़कल….

    जिंदगी  में   मेरी   एक  अपनापन है  आज़कल….

     

     जिंदगी  में   मेरी   एक  अपनापन है  आज़कल

    जेब में भले ही गोपाल ठनठन है  आज़कल।

     

    साथ   देने  को   कोई  दूसरा  साथ में नहीं

    बस  अपना बेचारा  साफ मन है आज़कल।

     

    तुम    जब   सुनोगे   तभी   तो  जानोगे     कि

    मेरी   बात  में  कितना   वज़न  है  आज़कल।

     

    मरने  से पहले   ही   मौत   को  देखने  के   बाद

    जिंदगी को जिंदा कर रहा जीवन है आज़कल।

     

    बेफिक्र  ज़माने  की  करतूतें बंदा बता  तो दे

    लेकिन फिक्र उसी ज़माने की अडचन है आज़कल।

     

                                                                   –   कुमार बन्टी

  • ग़ज़ल

     

    तेरा — मेरा इश्क पुराना लगता है ।
    दुश्मन हमको फिर भी जमाना लगता है ॥

    गुलशन – गुलशन खुशबू तेरी साँसों की ।
    मौसम भी तेरा ही दीवाना लगता है ॥

    पर्वत – पर्वत तेरा यौवन बिखरा है ।
    हद से गुजरना कितना सुहाना लगता है ॥

    इन्द्र – धनुष का बनना – बिगड़ना तेवर तेरे ।
    मस्त निगाहों का छलका पैमाना लगता है ॥

    गुजरी हयात का मैं भी इक अफ़साना हूँ ।
    सब कहते हैं ……. मर्ज़ पुराना लगता है ॥

    सांझ — सिंदूरी सूरज का घर तज़ आई ।
    चाँद निकलना एक बहाना लगता है ॥

    ‘अनुपम’ आसां दर्द का दरिया पीते जाना ।
    उनको भुलाने में एक जमाना लगता है ॥
    : अनुपम त्रिपाठी
    #anupamtripathi #anupamtripathiG
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  • कइस अकेला है वह, मुझे जाने दो…….

    कइस अकेला है वह, मुझे जाने दो
    जो किया है वादा, मुझे निभाने दो

    वो समां भी कितना रंगीन होगा
    जब मिल बैठेंगे दीवाने दो

    चलेंगी रात भर इस दिल की बातें
    और भरेंगे मय के पैमाने दो

    बनना चाहता है वो गवाह इस मंज़र का
    खैर,रोको मत उसको, अंदर आने दो

    अभी तो हाथ में लिया है जाम-ऐ-खुशनसीबी
    कुछ देर तेहरो, ज़रा इसको हलक में उतर जाने दो

    मुमकिन नहीं है समझना, बातें दिलो की
    रुको तुम, ज़रा उसको समझाने दो

    रोशन हो जाएगा तुम्हारा, ये बेहाल कूचा भी
    ज़रा उस चाँद को ज़मी पैर उतर जाने दो

    कहते हो की इश्क़ में कोई दर्द नहीं है
    ज़रा एक बार हमें भी इश्क़ को सताने दो

    सुना है हल्का हो जाता है दिल कइस,
    चलो आज हमें भी आंसू बहाने दो

    तुम्हारी मोहोब्बत का अंजाम भी ठीक वैसा ही है
    जैसे हो किसी सागर के किनारे दो………………………………!!

    D K

  • सको तो चलो………..

    हमारे साथ कदम से कदम मिला चल सको तो चलो
    के इस इश्क़ में कुछ देर ठहर सको तो चलो

    बहुत ही हौसला चाहिए, इस दिल की निगेबानी करने को
    अगर तुम इसकी पहरेदारी कर सको तो चलो

    सफर लंबा है ज़रा, मंज़िल-ऐ-वाम तक का
    बे-सरो-सामान निकल सको तो चलो

    यादों से लवरेज़ है दिल मेरा, खता मेरी नहीं
    तुम इसकी हर बात समझ सको तो चलो

    रात की ख़ामोशी और अजीब सा सन्नाटा भी
    तुम इन सब से निकल सको तो चलो

    सफर-ऐ-आम नहीं ये, औरो की तरह
    खुद को गुमनाम कर सको तो चलो

    इस सफर में कुछ दुश्मनो से भी मुखातिभ होंगे
    तुम ये ख़ंज़र रख सको तो चलो

    है पता है हमको बहुत से सवाल है तुम्हारे ज़हन में
    इन सब के जवाब अगर तुम सुन सको तो चलो

    कदम-कदम पर सबब-ऐ-परेशानी का मंज़र है
    तुम संभल-संभल कर गर चल सको तो चलो

    वादा किया है तुमने साथ निभाने का
    गर साथ सही से निभा सको तो चलो……………….!!

    D K

  • वक़्त तो लगता है…….

    किसी को भूल जाने मे वक़्त तो लगता है
    के आँखों के आंसू मिटाने में वक़्त तो लगता है

    जब बैठे हो चाहत-ऐ-किस्ती मे, तो सब्र करो
    इसको साहिल तक पहुचाने में वक़्त तो लगता है

    क्यों रोते हो अब अपने ही किये हुए उस काम पर
    गमो के दिन बिताने में वक़्त तो लगता है

    धीरे-धीरे भरेंगे, के ये गम और आंसू से बने है
    जख्म को भर जाने में वक़्त तो लगता है

    ए दिल ज़रा ठहर जा, ज़रा तस्सली रख
    किसी शहर जाने में वक़्त तो लगता है

    चलो मान लिया ये दरिया गहरा है लेकिन
    किसी की गहराई नापने में वक़्त तो लगता है

    तुम्ही ने कहा था एक दिन उसको मोहोब्बत जरूर होगी
    के किसी के दिल में जगह बनाने में वक़्त तो लगता है

    लौट जाऊँगा में भी इस शहर से लेकिन
    खुद को तालुक सब से करने में वक़्त तो लगता है

    इतनी जल्दी कहा ख़ाक होता है कोई
    खुद को जलने में वक़्त तो लगता है

    ये दिल भी एक कच्ची बस्ती है लोगो
    बस्तियां बसने में वक़्त तो लगता है………………!!

    D K

  • वादा न सही मगर, एक इंसा को बचाने के लिए आ……..

    वादा न सही मगर, एक इंसा को बचाने के लिए आ
    के एक बार मिल कर मुझ से, फिर बिछड़ जाने के लिए आ

    मुमकिन है अब ये होश भी साथ ने दे मेरा
    मुझ बेहोश पर एक चादर चढ़ाने के लिए आ

    कुछ तो मेरे पाक-ऐ-मोहोब्बत की जूनून को समझ
    के कभी तो तू भी मुझको मानाने के लिए आ

    जनता हू अब वो रिस्ता-ऐ-रस्म-ऐ-दिल नहीं है
    खैर एक नया रिश्ता ही बनाने के लिए आ

    किस किस को बताऊ मैँ, इस दिल के किस्से को
    तू मेरे लिए न सही, इस ज़माने के लिए आ

    यकीं-ऐ-चिराग अब भी जल रहा है मेरे सीने मैँ
    एक आखरी अहसान कर, इसको बुझाने के लिए आ………………….!!

    D K

  • बरसने के बाद…………

    हो गयी रुकसत घटा बरसने के बाद
    खिला मौसम नया बरसने के बाद

    मेरे गमो से रूबरू हो कर ये हवा भी
    जोर से बहने लगी बरसने के बाद

    होता आमना-सामना कुछ पल के लिए ही
    दिल-ऐ-खुवाईश बनी ये बरसने के बाद

    मेरी तन्हाईयों को देखने के बाद
    मेरी उदासी कुछ बोली बरसने के बाद

    उस चाँद को अकेला देख आसमा में
    एक तारा रो दिया बहुत बरसने के बाद

    चला जा रहा था मैँ अकेला ही उन रास्तो पर
    सरे पत्थड़ नर्म पड़ गए बरसने के बाद

    गीले कपड़ों पर नज़र पड़ी मेरी
    रो पड़ा दिल मेरा बरसने के बाद

    लिखा एक पन्ने पर मैंने उसका नाम
    कलम भी रो पड़ी बरसने के बाद

    चलो ये दिन भी याद रहेगा मुझ को इसलिए भी
    कोई बहुत याद आया था बरसने के बाद……………………………..!!

    D K

  • लंबी इमारतों से भी बढकर, कचरे की चोटी हो जाती है

    लंबी इमारतों से भी बढकर, कचरे की चोटी हो जाती है

    जिंदगी की सुंदर प्लास्टिक, कचरें में बदल जाती है
    अगर यूज न हो ढंग से, ऐसे ही जल जाती है

    कभी कभी जिंदगी से बढी मौत हो जाती है
    जिंदगी कभी कभी पानी में भी जल जाती है|

    कुछ को तो कचरे फैलाने से फ़ुरसत नहीं
    कुछ की तो जिंदगी कचरें में गुजर जाती है|

    फैलती हुई दुनिया में, जिंदगी कहीं सिमटी सी है
    लंबी इमारतों से भी बढकर, कचरे की चोटी हो जाती है|

  • कुछ लोग………..

    बहुत शराफत से पेश आये कुछ लोग
    हमारे जनाजे पर आये कुछ लोग

    आखरी रस्म की कदर करी उन सब ने
    हमें कांधा देने आये कुछ लोग

    रस्म-ऐ-बफा सब निभा नहीं सकते है
    काबा पर हमने बुलाये कुछ लोग

    सोचा था सब अपने है इस दुनिया मे
    मगर, रस्म-ऐ-अपनापन निभा पाए कुछ लोग

    यूँ तो मायूस दिख रहे थे वह पर सभी
    मेरी कब्र पर मगर आंसू बहा पाए कुछ लोग

    बहुत शराफत से पेश आये कुछ लोग
    हमारे जनाजे पर आये कुछ लोग…………………..!!

                                                   ……………….D K

  • अधूरी सी जिंदगी का अधूरा फ़साना हूँ मैं।

    अधूरी सी जिंदगी का अधूरा फ़साना हूँ मैं।
    नई सी दुनिया में शख़्स कोई पुराना हूँ मैं।।
    ,
    चल रही है सरहदों पे जंग न जाने कब से।
    पता नहीं की किस गोली का निशाना हूँ मैं।।
    ,
    मैंने भी देखी थी कई सदियां जिन्दा रहते।
    आज क़ब्र में सोया इक शहर वीराना हूँ मैं।।
    ,
    हमकों याद करके कभी गमज़दा न होना।
    इस मिटटी में दफ़्न हुआ तो खजाना हूँ मैं।।
    ,
    मुझको मेरी क़ीमत ख़ुद भी मालूम नहीं है।
    वो इस्तेमाल करके छोड़ा गया पैमाना हूँ मैं।।
    ,
    हमकों यूँ अलग किया जायेगा मालूम न था।
    जैसे नए घरों में पड़ा बर्तन कोई पुराना हूँ मैं।।
    ,
    अब तो मदद करती है आँधियाँ भी आ कर।
    कभी जुड़ ही नहीं पाया वो आशियाना हूँ मैं।।
    @@@@RK@@@@

  • हवा के नर्म परों पर सलाम लिखती हूँ

    हवा के नर्म परों पर सलाम लिखती हूँ
    गुलों की स्याही से जब जब पयाम लिखती हूँ

    बड़ा सहेज के रखती हूँ तेरे खत सारे
    जो सुब्हो शाम मैं तेरे ही नाम लिखती हूँ

    जिसे मैं दुनिया के डर से न कह सकी अब तक
    वही फसाने ख़तों में तमाम लिखती हूँ

    ज़ुनूने इश्क में तेरे मैं खो चुकी इतनी
    जो बेखुदी में सवेरे को शाम लिखती हूँ

    नहीं की मयकशी ता उम्र ,रिंद हूँ फिर भी
    इसलिए तेरी आँखों को जाम लिखती हूँ

    मिरे करीब से जिस वक्त तुम गुज़रते हो
    तुम्हारी चाल को मस्ते खिराम लिखती हूँ

    कलम की नोक पे आता है नाम ही तेरा
    मैं जब भी कोई अछूता कलाम लिखती हूँ

  • चल कोई ख़्वाब निचोड़ा जाये

    कब तलक ख़ुद को समेटा जाये,
    चल कोई ख़्वाब निचोड़ा जाये…

    कोई आया नहीं अपना हमारे कारवां में
    चलो आज कोई पराया जोड़ा जाये..

    जिंदगी चली जा रही है सीधी सी
    आज इसे कहीं और मोड़ा जाये..

    भर गयी है गुल्लक ख़्वाबों की
    चलो आज इसे फोड़ा जाये…

  • दूर रह कर कभी दूर नहीं रहता है

    दूर रह कर कभी दूर नहीं रहता है
    मेरी चाहत है सदा दिल के मकीं रहता है

    देखिए दिल और नज़र में है ताअल्लुक कैसा
    चोट लगती है कहीं दर्द कहीं रहता है

    बामो दर छूले अगर दिल के मोहब्बत आकर
    ज़िदगानी में वही लम्हा हसीं रहता है

    सोच कर फैसले करता तो संभल सकता था
    बेवफाई पे मोहब्बत का यकीं रहता है

    जिसने गुलज़ार किया है मेरी वीरानी को
    बन के तक़दीर वही दिल में मकीं रहता है

    घेर लेती हैं जहाँ बंदिशे दुनिया मुझको
    ज़ज्बा ए वस्ल मिरा सोग नशीं रहता है

    मुब्तिला रहता है शैदाई सा मन ख्वाबों मे
    इश्क में वक्त का एहसास नहीं रहता है

  • मैं ये नहीं कहता की तुम भला नहीं करते।

    मैं ये नहीं कहता की तुम भला नहीं करते।
    पर बेबसों को रौंदकर अच्छा नहीं करते।।

    मदद कर दिया करो कभी बेबसों की भी।
    खुद के लिए तो हम क्या क्या नहीं करते।।

    सच्चे दोस्त जिंदगी में होना बहुत जरुरी हैं।
    हमारी गलतियों पे वो वाह वाह नहीं करते।।
    ,
    मौसम मिज़ाजी को फ़िक्र है मौसमो की भी।
    हम बहते हुए दरिया कभी सूखा नहीं करते।।
    ,
    आग के खेल का सुने ले असर क्या होता है।
    घरौंदे जल जाते है परिंदे लौटा नहीं करते ।।
    @@@@RK@@@@

  • देखना है की हिस्सों में कैसे बँट पाउँगा मैं।

    देखना है की हिस्सों में कैसे बँट पाउँगा मैं।
    इक बूढ़ा शज़र हूँ लगता है कट जाऊंगा मैं।।

    मुझे सहारा देने में दिक्कतें तो है बच्चों को।
    ख़ामोश ही रहूँगा की जब थक जाऊंगा मैं।।
    ,
    सोचा नहीं था की मुझपे भी होगी पत्थर बाजी।
    जब इक फल जैसा शाख पे पक जाऊंगा मैं।।
    ,
    ज़मी ज़ायदाद तकसीम हुए तजुर्बे कौन रखेगा।
    वक़्त है पूँछो अफसोस होगा जब मर जाऊंगा मैं।।
    ,
    रूह भी मेरी माँगेगी तुम्हारी सलामती की दुआएँ।
    रोना नहीं जब मौत की रस्सी से बन्ध जाऊंगा मैं।।
    @@@@RK@@@@

  • कुछ इस तरह से भी मर जाता हूँ मैं।

    कुछ इस तरह से भी मर जाता हूँ मैं।
    जब सच होके झूठ से डर जाता हूँ मैं।।
    ,
    उम्र भर की दस्ताने जब याद आती है।
    आसुंओं सा आँखों में भर जाता हूँ मैं।।
    ,
    तरक्की शोहरत और दौलत की चाह में।
    अपनों को छोड़कर ये किधर जाता हूँ मैं।।
    ,
    दिनभर की मेहफिलो का अंदाज़ अलग है।
    शबे तन्हाई में टुटके न बिखर जाता हूँ मैं।।
    ,
    हमको नहीं है वैसे कोई आवाज़ देने वाला।
    पर जब भी तुम दिखते हो ठहर जाता हूँ मैं।।
    ,
    सच है हम भी माँगते है दुआएँ जिंदगी की।
    पर इसके पहलुओं को देख सिहर जाता हूँ मैं।
    @@@@RK@@@@

  • चलो अब तुमने कहा है तो मान लेते है

    चलो अब तुमने कहा है तो मान लेते है।
    पर ये बताओ अपने कहा जान लेते है।।

    यू खौफ न दिखाओ हमें मुश्किलो का।
    हम वो करते है कि जो हम ठान लेते है।।

    मेरी समझ पर तेरा हैरत होना जायज है।
    हम वो है जो बेवजह तेरा नाम लेते है।।

    इस तनहाई की दवा बनाई है तेरी यादो से।
    अब वही हम सुबह दोपहर शाम लेते है।।

    साहिल मुफलिसी से बस जदोजहद करो।
    ये दुनिया है जहाँ हर बात पे लोग दाम लेते है।।
    @@@@RK@@@@

  • इक ज़माना था जब डरता था मैं।

    इक ज़माना था जब डरता था मैं।
    जब तेरी गलियों से गुजरता था मैं।।
    ,
    तुम बेख़बर थे तुमको क्या मालूम।
    की कैसे ही पल भर में मरता था मैं।।
    ,
    हालात बदल गए है मानता हूँ मैं भी।
    पर बेवज़ह उन राहों पे ठहरता था मैं।।
    ,
    ख़ुद की नाकामियों का सिला किसे दूँ।
    यकीं किया तुझपे ये क्या करता था मैं।।
    ,
    तुम्हारी आँखों में साफ़ था मंजर सारा।
    इक सच होकर भी झूठ से डरता था मैं।।
    @@@@RK@@@@

  • चले आओ

    मेरी मौत का तमाशा देखने चले आओ
    के मैं मर रहा हु मुझे देखने चले आओ

    कुछ तो मेरे दिल मैं भी अरमान होंगे तुम जानते हो
    क्या है मेरी आखरी खुवाईश मुझसे पूछने चले आओ

    मोहोब्बत के खातिर न सही, एक इंसा की हैसियत से
    एक आखरी बार मुझ से मिलने चले आओ

    कब्र मैं जा कर भी मुझे चैन नहीं मिलेगा
    सब लोगो के साथ मेरी कब्र पैर माटी गेरने चले आओ

    एक आखरी अरमान-ऐ-दिल बचा है ज़िन्दगी का मेरे
    मेरी इन आँखों की प्यास बुझाने चले आओ

    छोड़ दिया है मैंने अपना वो पुराना घर
    मेरे नए घर मैं हाथ बटाने को चले आओ

    आखरी वक़्त है मेरा आखरी मेरी खुवाईश है
    मेरे कब्र पैर दो आंसू बहाने चले आओ

    मेरी मौत का तमाशा देखने चले आओ
    के मैं मर रहा हु मुझे देखने चले आओ……………………!!

  • कहते है

    खुद को शराब, और अपनी जवानी को नशा कहते है
    खुद है वो एक मुर्दा और हमको वो फनाह कहते है

    हुसन-ऐ-शबाब परोसना एक काम-ऐ-सबाब है उनके लिए
    इबादत-ऐ-मोहोब्बत को वो एक संगीन गुनाह कहते है

    रूह मर चुकी है उनकी, और जिस्म भी ताड ताड पड़ा है
    न जाने किस बात को लेकर वो खुद को जवां कहते है

    दिखती है उनकी महफ़िल मैं सबकी निगाहें भूखी हमको
    अपने इस माहौल-ऐ-महफ़िल को वो हसीं समां कहते है

    टूट कर बिखर गई है शख्शियत उनकी मगर
    सबको दिखने के लिए वो अपने जिस्म को गुमा कहते है

    खुद को शराब, और अपनी जवानी को नशा कहते है
    खुद है वो एक मुर्दा और हमको वो फनाह कहते है……………………….!!

  • अदा-ऐ-इश्क़

    बस एक यही अदा हमको उसकी भाती नहीं है
    के बुलाने के बाबजूद भी वो मिलने आती नहीं है,

    मोहोब्बत है उसको हमसे हम जानते है यूँ तो
    बस अपने मुँह से वो हमको कभी ये बताती नहीं है,

    बस एक यही अदा हमको उसकी भाती नहीं है
    के बुलाने के बाबजूद भी वो मिलने आती नहीं है,

    तड़पती है हमको ऐसे जैसे हम कोई गैर हो
    थोड़ा सा भी हमको वो सुकून दिलाती नहीं है,

    बस एक यही अदा हमको उसकी भाती नहीं है
    के बुलाने के बाबजूद भी वो मिलने आती नहीं है,

    हक़ है उसका हम पर पूरा जैसे चाँद का सितारों पर
    मगर कभी वो अपना हक़ हम पर जताती नहीं है,

    बस एक यही अदा हमको उसकी भाती नहीं है
    के बुलाने के बाबजूद भी वो मिलने आती नहीं है,

    जरूर दर है उसके दिल मैं भी शायद
    इशारा तो करती है, मगर कभी बुलाती नहीं है

    बस एक यही अदा हमको उसकी भाती नहीं है
    के बुलाने के बाबजूद भी वो मिलने आती नहीं है………………..!!

  • लोग तो पीते है इसको, हम पीते है इसको

    लोग तो पीते है इसको
    खुद को भुलाने के लिए,

    हम पीते है इसको
    उसको याद आने के लिए,

    लोग तो पीते है इसको
    किसी से दूर जाने के लिए,

    हम पीते है इसको
    उसको अपने पास बुलाने के लिए,

    लोग तो पिता है इसको
    खुद ही मर जाने के लिए,

    हम पीते है इसको
    थोड़ा और जी जाने के लिए,

    लोग तो पीते है इसको
    खुद को रुलाने के लिए,

    हम पीते है इसको
    खुद को हँसाने को हँसाने के लिए,

    लोग तो पीते है इसको
    मर जाने के लिए,

    हम पीते है इसको सिर्फ
    “अमर” जाने के लिए……………………….!!

  • तेरे शहर

    तेरे शहर का मौसम मैंने अजीब देखा
    लोगो का वह पैर एक अलग तहज़ीब देखा,

    खरीद सके न मुझ से इंसा को वो एक कौड़ी-ऐ-खुसी देकर
    तेरे शहर के लोगो को मैंने बहुत गरीब देखा,

    हर तरफ सन्नाटा और गम का माहौल देखा
    हर इंसा को तेरे शहर मैं मौत के करीब देखा,

    कैसी किस्मत पाई उन सब ने सोचता हु मैं
    मैंने उन सब की लकीरों को बदनसीब देखा,

    रोते, बिलखते और दर्द से जूझते हुए थे सब
    तेरे शहर का क़ानून बड़ा अजीब देखा,

    जिन्दा तो थे वो सब मगर जिस्म मर चूका था
    जैसे किसी मूर्दे को मैंने सजीव देखा

    तेरे शहर का मौसम मैंने अजीब देखा
    लोगो का वह पैर एक अलग तहज़ीब देखा……………….!!

  • सच है की इक उम्र से चल रहा हूँ मैं”

    सच है की इक उम्र से चल रहा हूँ मैं।
    पता नहीं कब से यूँ ही जल रहा हूँ मैं।।
    ,
    तुमसे मिलने की ख्वाहिशें दम तोड़ चुकी।
    फिर भी हर दिन घर से निकल रहा हूँ मैं।।
    ,
    मौसम मिज़ाजी हवाओ सी फितरत वाले।
    तुमने कहा भी कैसे की बदल रहा हूँ मैं।।
    ,
    ऐतबार करने का सिला ही हमको मिला है।
    ऐसी चोट लगी आज तक संभल रहा हूँ मैं।।
    ,
    दरिया समंदर तूफान क्या क्या नहीं देखा।
    एक हौसले की कश्ती थी जो चल रहा हूँ मैं।।
    ,
    साहिल उम्र भर किया है कैसा सफ़र हमने।
    मौत आई फिर से सफ़र पे निकल रहा हूँ मैं।।
    @@@@RK@@@@

  • मेरी ज़िंदगी का मैं ही हिस्सा नहीं था

    मेरी ज़िंदगी का मैं ही हिस्सा नहीं था।
    मुझे भूल जाओ मैं कोई किस्सा नहीं था।।
    ,
    मुझ पर इलजाम लगाकर के जाने वाला।
    क्या कहूँ शख्स वो भी मुझ सा नही था।।
    ,
    क़िस्मत के आगें कौन क्या कर सकता था।
    मिला हैं वो किसको की जिसका नहीं था।।
    ,
    इस तन्हाई की वज़ह ये भी हो सकती है की।
    मिले बहुत लोग मगर कोई तुझसा नहीं था।।
    ,
    कल अचानक मुलाक़ात हो गई थी राहों में।
    शख़्स कुछ बोला नहीं पर चुप सा नहीं था।।
    ,
    ताउम्र कहते रहें की पढ़ लेते है चेहरे हम भी।
    पर जैसा पढ़ा था चेहरा साहिल वैसा नहीं था।।
    @@@@RK@@@@

  • जिंदगी हौंसला जब टूटकर चूर हो जाए

    जिंदगी हौंसला जब टूटकर चूर हो जाए।
    शख़्स कैसे न यहाँ कोई मजबूर हो जाए।।

    जिंदा रहूँगा आखिर कब तक इस दुनिया में।
    जब दिलो की धड़कन ही दिलो से दूर हो जाए।।
    ,
    और सच का मुखौटा पहनकर झूठ बोलतें हो।
    ख़ामोश ही रहना जब मय का सुरूर हो जाए।।

    फ़रेब करने की अपनी फ़ितरत बदल डालो।
    वरना कही ज़माने भर का न ये दस्तूर हो जाए।।
    ,
    रंज नहीं की कौन खतावार था सजा किसको।
    अफ़सोस की सच बोलना जब कसूर हो जाए।।

    वफ़ा का सिला कुछ इस क़द्र मिला की क्या कहे।
    साहिल कोई दौलत के नशे में जब मगरूर हो जाए।।
    @@@@RK@@@@

  • वो रोती रही

    वो रोती रही

    वो रोती रही रात भर इसलिये
    कि सरहद से आई खबर इसलिए।

    बड़े नाज से उसने पाला जिसे
    वो आया तिरंगे में घर इसलिए।

    सुहागन लगी चूड़ियाँ तोडने
    चलेगी अकेली डगर इसलिए।

    कोई तो मिलेगा उसे रहनुमा
    चली आस की राह पर इसलिए।

    हुई हाल खस्ता बहुत जिंदगी
    बदलते हैं रिश्ते सफर इसलिए।
    …….. सतीश मैथिल “तनुज”

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