चोर चोर मौसेरे भाई, नेता अफसर दोनों लिप्त, एक चुराता एक बचता, इसी में है दोनों विलुप्त।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
चोर चोर मौसेरे भाई, नेता अफसर दोनों लिप्त, एक चुराता एक बचता, इसी में है दोनों विलुप्त।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
मां की ममता बड़ी निराली, बच्चों की करती है रखवाली। एक एक दान चुग कर लाती, अपने बच्चों को खिलाती।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
सरकार बेचारी फिसड्डी हो गयी, जनता अब मारी मारी है फिरती। लगकर लाईन में उम्मीद लगाएं, कोरोना का प्रकोप इन्हें है डसती।। ✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
मां की ममता पिता का दुलार, दिखता है पशु पक्षी में भी । दाने चुग कर लाती है मां, भरण पोषण करती बच्चों का भी।। महेश गुप्ता जौनपुरी
किस किस पर आरोप लगाते, अपने दुःख दर्द को किसे दिखाते । सरकार फिसड्डी बरसों से है, कब तक हम आवाज उठाते।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
अपनी गलती कब तक हम ठेलेंगे, विज्ञान के आड़ में कब तक बम फोड़ेंगे। चुनौतियों से पिछा छुड़ा कर, अपनी नाकामी से कब तक हम भागेंगे।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
कितनी भी सिढीयां चढ़ लो, खाने के लिए मेरा है अन्न । खुद को महान भले ही समझो, पैसे से कर्ज नहीं अदा होता सुन।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
तुम लाखपति हो गए कोरोना आखिर मेरे भारत में। हम मध्ययबर्गी मिल गए देखो आज कितने गारत में।।
मजदूर हू मजबूर नहीं तेरे जैसे वीडियो के सामने मदद लेने से इनकार करता हू लाखों दूर घर की और सफर करता हूँ बिना किसी मदद के पैदल किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया कभी […]
जीत कर दिल का जहान हार गया सब कुछ खुश बहुत हूँ मगर खुद से हैरान बहुत हूँ मैं ।
बेहिसाब अहसासों को हम सिमटे कैसे कहां हो पाता है मुकम्मल मकां-ए-नज्म मिरा हर बार टूट जाते है अहसास, ख्वाबों के जैसे
भोजपुरी देवी गीत –फेरिहा ये मइया | नजरिया तनी हमरो पर फेरिहा ये मइया | सुधिया तनी हमरो आज लिहा ये मइया | सब के त दिहलु माई अन धन सोनवा | अंधरन के अँखिया […]
आज दिल फिर बच्चा होना चाहता है बचपन की अजूबी कहानियों में खोना चाहता है जीनी जो अलादिन की हर ख्वाहिश मिनटों में पूरी कर देता था, उसे फिर क्या हुक्म मेरे आका कहते देखना […]
जिस नारी को समझ पातकी पति ने पत्थर बना दिया था। दे निज चरणन की धूल रामजी पंचकन्याओं में सजा दिया था।। प्रातकाल उठि सुमिरन करते इनका जो भी नर -नारी। उनके सारे पाप कटे […]
पति ने पत्थर बना दिया था एक जीती जागती नारी को। परमेश्वर ने फिर नारी कर डाला निज चरणन अधिकारी को।।
तेरी मोक्ष की माया को समझें हम इतने सक्षम नहीं भगवान जब मानव थे तो हमने हरि जब मोक्ष मिला तो हरी में हम
कलम और पेन से अभी नाता कब का छूट चुका है अभी ज़माना ईमेल और मोबाइल का है छोटे उन पन्नो में अपनी भावनाएं सारी लिखने की नौबत अभी नहीं आती अभी तेरे ख़तों में […]
दादाओं के भी दादा थे वो ना जाने कितने युगों से खड़े थे एक पाँव पर अपने घर के पास। खेल कबड्डी गिल्ली डंडे भाग भाग के आँख मिचौनी खेला करते सदा हीं उनके आस-पास।। […]
शिक्षा और शिक्षक का नाता है भरा बस्ता, ज्ञान की बातों में छुपा है कोई रास्ता। भारी बस्ते से आमदनी है होता, बचपन के बोझ से उनका नहीं कोई वास्ता।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
तू दूर जा रही है या यादों में पास मै टूट रहा हू या तपित लोहा बन रहा हू तेरे जाने का गम है या तुझे पाने की आस अजीब सा द्वंद है
मिट जाओगे , पाक मुहब्बत को खाक में मिलाने वाले। आसमान के, कदमों पे झुका देंगे हम है वो दिलवाले।।
मुहब्बत (💘) के गुनहगार जरा होश में आ जाओ। कब्र खोदे हो किस के लिए जरा यह तो बताओ।।
शीशे से बेरहम पत्थर को तोड़ता रहा । मेरे रकीब मुझ पर तोहमत लगाता रहा।।
घर में ही बैठो और रहो मौन ना करो किसी से झगड़ा ना कोई कुतर्क नहीं पड़ो किसी प्रपंच में यदि रहना है सुखी तो बढ़ाओ अपनी सहनशक्ति को और बटाओ हाँथ घर के काम […]
किसी का दम निकलता है घर में तो कोई सड़कों पर मारा-मारा फिरता है भूंख लगती है तो सिर्फ प्यास बुझा लेता है इतनी धूप में सब घर में बैठे हैं तो कोई सड़कों पर […]
माँ की ममता कभी भी झूठी नहीं होती। रूठी होकर भी कभी माँ रूठी नहीं होती।।
आज के इस दौर में उल्फत के हर रस्म झूठे लगते हैं। अपने घर में भी सभी एक दूजे से रूठे-रूठे लगते हैं। ।
चोट जो तुमने दिया उसका कोष बना देते है हम शायर है जनाब हम बातों से नहीं सिर्फ दिल में समझ जाते है मकबरे हमारे नहीं हम लोगों के बना जाते है हम शायर है […]
मधुसूदन के चरणों में है सारा संसार होंठो पर मुस्कान है और दिल में प्रेम अपार
रोटी के निवाले के लिए बचपन अपना खो दिया, भूख की तड़प से मासूम बेचारा रो दिया। दिन रात एक करके लगा है देखो पैसा कमाने, अपने बचपन की सारी खुशियां हंसकर लुटा दिया।। ✍ […]
नशे की लत ने बर्बाद है किया, हंसते खेलते घर को बर्बाद है किया। खुशियों का गला घोंटकर देखो, अपनी मंजिल को ही नजर अंदाज है किया।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
नशे की लत में डूब गया देखो इंसान, धुम्रपान के चक्कर में हुआ बर्बाद, एक एक पैसे के लिए हुआ परेशान, जीवन अपना नशे में किया आजाद।। ✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
पेट की भूख छुड़ा दिया, कापी पेंसिल और चाक। कारखाने में जिंदगी बीता रहा, किया उम्र अपना अब राख।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
उम्मीदों पर बसा है यह संसार, नशे को देगा हालात सुधार । उम्मीद कभी तुम ना हारना, लौट आयेगा एक दिन भटका यार ।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
जन्नत के आश में लगाते है कस, धुम्रपान करके पाते है नर्क । इतना ही समझ होता तो, क्या रह जाता इनमें और मुझमें फर्क।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
बालश्रम के कलंक को, चलो मिटाये मिलकर हम। देकर छोटू को विद्या उपहार, सारे कसक को मिटाये हम।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
नशे का व्यापार जो करते है, लिप्त होता उनका परिवार। चंद खुशियों के चक्कर में, बर्बाद हो जाता पुरा परिवार।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
बच्चें को बचपन तपाना मंजूर था, मेहनत मजदूरी की रोटी कुबूल था। शान से जीना शान से मरना मां ने सिखाया था, इसलिए आत्मसम्मान में रोटी कमाना आसान था।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
किस किस से उम्मीद लगा बैठेंगे, चारों तरफ नशे का जंजाल है। गली मोहल्ले चौराहों पर, दुध से ज्यादा नशे का व्यपार है।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
उम्मीद और प्रेरणा का हम करते हैं सम्मान, बाल बचपन का हम करते हैं सम्मान। भूखे को रोटी खिलाना है मेरा अधिकार, बचपन को संवारना है मेरा अधिकार।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
चिलचिलाती धूप और भयंकर गर्मियां व्यापित है इस जेठ में । दशा बताये क्या प्राणियों की छाया भी जाए छाया की हेठ में।।
हिन्दी गीत- सुना घर परिवार बिना | प्रिया प्रिय बिना देह हिय बिना | नीर क्षीर बिना भोजन खीर बिना | उत्सव उदास उपहार बिना | सुना घर परिवार बिना ठौर कहा घरवार बिना | […]
एक नकाब है चेहरे का ,दूसरा नकाब है हिजाब का। हमने कयी गुलाब देखे है पर ,देखा न चेहरा जनाब का।।
कदम-दर-कदम है ठोकर लगी। ज्ञान की जोत दिल में है निश दिन जगी। फिर भी ना बुद्धि तुम्हारी बढ़ी।।
लाॅकडाउन भी देखो बेअसर हो रहा। सारे भारत में कोरोना का बढ़ता कहर हो रहा। रात में नींद आती न दिन में है चैन अब चिन्ताओं का घर में लहर हो रहा।।
देश धर्म के ख़ातिर है अपनी जान हथेली पे। वीर सिपाही हैं हिन्दी हम कुर्बां जन्महवेली पे।।
तीर किसी को घायल करके बोलो कब पछताता है? कड़वा बोल कहो दुनिया में कब भला काम कर पाता है??
देख अनीति को चुप रहना सचमुच एक अनाचार हुआ। पाठ अहिंसा का पढ़ाकर खुद हिंसा का शिकार हुआ ।।
इसी समाज में सीता को भी अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी। इसी समाज के कारण निर्दोष जानकी वन के बीच पड़ी थी।।
ये समाज है जिसका क्या ठिकाना। किसी को मान दे किसी को दे अपमाना।।
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