आज के इस दौर में उल्फत के हर रस्म झूठे लगते हैं। अपने घर में भी सभी एक दूजे से रूठे-रूठे लगते हैं। ।
आज के इस दौर में उल्फत के हर रस्म झूठे लगते हैं। अपने घर में भी सभी एक दूजे से रूठे-रूठे लगते हैं। ।
चोट जो तुमने दिया उसका कोष बना देते है हम शायर है जनाब हम बातों से नहीं सिर्फ दिल में समझ जाते है मकबरे हमारे नहीं हम लोगों के बना जाते है हम शायर है […]
मधुसूदन के चरणों में है सारा संसार होंठो पर मुस्कान है और दिल में प्रेम अपार
रोटी के निवाले के लिए बचपन अपना खो दिया, भूख की तड़प से मासूम बेचारा रो दिया। दिन रात एक करके लगा है देखो पैसा कमाने, अपने बचपन की सारी खुशियां हंसकर लुटा दिया।। ✍ […]
नशे की लत ने बर्बाद है किया, हंसते खेलते घर को बर्बाद है किया। खुशियों का गला घोंटकर देखो, अपनी मंजिल को ही नजर अंदाज है किया।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
नशे की लत में डूब गया देखो इंसान, धुम्रपान के चक्कर में हुआ बर्बाद, एक एक पैसे के लिए हुआ परेशान, जीवन अपना नशे में किया आजाद।। ✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
पेट की भूख छुड़ा दिया, कापी पेंसिल और चाक। कारखाने में जिंदगी बीता रहा, किया उम्र अपना अब राख।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
उम्मीदों पर बसा है यह संसार, नशे को देगा हालात सुधार । उम्मीद कभी तुम ना हारना, लौट आयेगा एक दिन भटका यार ।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
जन्नत के आश में लगाते है कस, धुम्रपान करके पाते है नर्क । इतना ही समझ होता तो, क्या रह जाता इनमें और मुझमें फर्क।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
बालश्रम के कलंक को, चलो मिटाये मिलकर हम। देकर छोटू को विद्या उपहार, सारे कसक को मिटाये हम।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
नशे का व्यापार जो करते है, लिप्त होता उनका परिवार। चंद खुशियों के चक्कर में, बर्बाद हो जाता पुरा परिवार।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
बच्चें को बचपन तपाना मंजूर था, मेहनत मजदूरी की रोटी कुबूल था। शान से जीना शान से मरना मां ने सिखाया था, इसलिए आत्मसम्मान में रोटी कमाना आसान था।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
किस किस से उम्मीद लगा बैठेंगे, चारों तरफ नशे का जंजाल है। गली मोहल्ले चौराहों पर, दुध से ज्यादा नशे का व्यपार है।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
उम्मीद और प्रेरणा का हम करते हैं सम्मान, बाल बचपन का हम करते हैं सम्मान। भूखे को रोटी खिलाना है मेरा अधिकार, बचपन को संवारना है मेरा अधिकार।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
चिलचिलाती धूप और भयंकर गर्मियां व्यापित है इस जेठ में । दशा बताये क्या प्राणियों की छाया भी जाए छाया की हेठ में।।
हिन्दी गीत- सुना घर परिवार बिना | प्रिया प्रिय बिना देह हिय बिना | नीर क्षीर बिना भोजन खीर बिना | उत्सव उदास उपहार बिना | सुना घर परिवार बिना ठौर कहा घरवार बिना | […]
एक नकाब है चेहरे का ,दूसरा नकाब है हिजाब का। हमने कयी गुलाब देखे है पर ,देखा न चेहरा जनाब का।।
कदम-दर-कदम है ठोकर लगी। ज्ञान की जोत दिल में है निश दिन जगी। फिर भी ना बुद्धि तुम्हारी बढ़ी।।
लाॅकडाउन भी देखो बेअसर हो रहा। सारे भारत में कोरोना का बढ़ता कहर हो रहा। रात में नींद आती न दिन में है चैन अब चिन्ताओं का घर में लहर हो रहा।।
देश धर्म के ख़ातिर है अपनी जान हथेली पे। वीर सिपाही हैं हिन्दी हम कुर्बां जन्महवेली पे।।
तीर किसी को घायल करके बोलो कब पछताता है? कड़वा बोल कहो दुनिया में कब भला काम कर पाता है??
देख अनीति को चुप रहना सचमुच एक अनाचार हुआ। पाठ अहिंसा का पढ़ाकर खुद हिंसा का शिकार हुआ ।।
इसी समाज में सीता को भी अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी। इसी समाज के कारण निर्दोष जानकी वन के बीच पड़ी थी।।
ये समाज है जिसका क्या ठिकाना। किसी को मान दे किसी को दे अपमाना।।
पेड़ रहे नित धूप में बाँटे सबको छांव। ऐसे हीं परोपकार में लगे हाथ और पांव।।
कौन कहता है कि दिल में सुराग नहीं होते। गर ना होते तो बेवफा कभी फरार नहीं होते।।
वो टहनियाँ जो हरे भरे पेड़ों से लगे हो कर भी सूखी रह जाती है जिनपे न बौर आती है न पात आती है आज उन मृत टहनियों को उस पेड़ से अलग कर दिया […]
मां भारती वीणावादनी ये घाव कैसा है, शब्दों की झुंझलाहट में फटकार कैसा है। कण्ड से निकलते झूठ का ये भाव कैसा है, ज्ञान की देवी मनुष्य का दुर्भाव ये कैसा है।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
नारी तुम हो बड़ी बलशाली, हारना नहीं तुम कभी हालातों से। लड़ते रहना खुद को साबित करना, मात ना खाना तुम कभी अपने बातों से।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
कौन किया हालात तुम्हारा हे मां वीणावादनी, शिक्षा के धरोहर ही लगा दिए है दाग मां वीणावादनी। दृष्ट के कण्ठ,ज्ञान के भण्डार को छीन लो मां भारती, कमल आसान छोड़कर पापी को सजा दो मां […]
शिक्षा के आंगन में सौदेबाजी हो रहा, शिक्षक ही शिक्षा का बोली बखुबी लगा रहा। मां सरस्वती को तांक पर रखकर, शिक्षक दिन रात ज्ञान को नीचा दिखा रहा।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
धरा पर जब जब बढ़ता अत्याचार, नारी धारण करती रूप विकराल। खुद से करके नारी सोच विचार, पाप के अन्त के लिए उठाती भाल।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
ज्ञान की दो चार बातें सीखकर इंसान, मां वीणावादनी का करता दुत्कार । सीख पढ़कर शब्दों का वर्ण संसार, अपने ज्ञान को समझता इंसा महान ।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
कितना भी बना लो शिक्षा को व्यापार, मां वीणावादनी करेंगी अपने बच्चों पर उपकार। शीश आशीष ज्ञान का भण्डार मन मस्तिष्क में भरकर, करती रहेंगी सदैव दृष्ट पापीयों का संहार।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
शिक्षा को शिक्षा ही रहने दो, मां सरस्वती मुझे वर दो । सौदेबाज शिक्षकों को दण्डित कर, हे हंसवाहनी मेरे उर का तम हर दो।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
झूठ फरेब की कलंक से कलंकित होती मां, कण्ड ज्ञान का भण्डार देकर खाती अब मात। हिंद के सिपाही थाम लिए अंग्रेजी का हाथ, दाग लगाकर सरस्वती पर मिट्ठू बनके गाते गान।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
दिल की बात दिल में ही रह जाती है रात खामोश हो कर भी बहुत कुछ कह जाती है
ज्ञान कि देवी सुर कण्ठ वरदायनी, शत् शत् नमन तुम्हें करें हम सब । जीह्वा पर हम सबके करती हो वास, हे वीणावादनी नमन करें हम सब।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
शत् शत् नमन करेंगे गुरूवर, शिक्षा का वरदान दे दो । मां सरस्वती को प्रणाम करके, विद्या दान का संकल्प हमें दे दो।। ✍महेश गुप्ता जौनपुरी
प्रस्तुत है हाइकु विधा में रचना :- जिसका जो हो कर्म करे मानव ना करे चोरी जीत ले बाजी हर दांव की वह ना थके कभी संघर्ष करे नित जीवन में वो ना रुके कभी […]
प्रस्तुत है हाइकु विधा में कविता:- मजदूर हूँ पैदल चल पड़ा घर की ओर विपदा आयी सबने छोड़ दिया मौत की ओर आशावादी हूँ खुद ही जीत लूँगा यह युद्ध भी तुम कौन हो? समाज […]
गजल- भूख के मारे हुये है | भूख ले आई शहर हम भूख के मारे हुये है | छोड़ चले शहर को हम भूख के सताये हुये है | कोरोना के कहर ने बदल दी […]
इम्तिहान -ए-इश्क़ में सारे शरीक होते हैं। जो पास हो गए वही तो खुशनसीब होते हैं।।
तुम्हारे नजर- ए-रहम से तेरे,सब मीत बन जाते हैं। मेरे अल्फाज तेरे लबों से छूकर गीत बन जाते हैं।।
यूँ कहना तो बड़ा आसान है भूल जाना सारे बन्धनों को जाति -पाति को छोड़ देना परंतु सच्चाई यह है की जाति- पाति के ताने-बाने हमने ही बनाये हैं और उनको हम ही पोषित करते […]
एक बाद कहूँ गर सुनते हो तुम मुझे अच्छे अच्छे लगते हो जब होते हो नाराज़ कभी तो प्यारे प्यारे लगते हो एक बात कहूँ गर सुनते हो तुम मुझे भोले -भाले लगते हो
किसी को अपनी खता दिखाई नहीं देती जिस तरह तिमिर में दिखाई परछाई नहीं देती
ए सनम कहाँ खो गये हो । बोलो न ए सनम कहाँ खो गये हो।। किस खता की सजा हमने पायी। एक मर्तबा बता तो दे ए हरजाई।।
जमाने में सबसे निराला है । इसलिए नहीं कि मेरा यार है वो , मन का बड़ा हीं सच्चा और भोला भाला है।।
मुहब्बत के कई रंग देखे हैं। जो भी मिला उसे तंग देखे हैं। यूँ तो बड़ी सुहानी है ये दुनिया पर कहीं खुशी तो कहीं गम देखे हैं।।
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