Suman Kumari's Posts

दुर्गा भाभी-01

उम्मीद की लौ जल-जल के बुझ रही थी नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी परालम्बन भरे जीवन से मुक्ति हमें दिलाने वीर- वीरान्गनाओ की टोली कफ़न बाँध चल रही थी ।। दिन के उजाले में भी, तमस से हम घिरे थे खुद के ही घरों में, हम बंधक बन रह गये थे तब दुर्गा रूपी पुष्प, कौशांबी में, खिल रही थी नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी —- “हिंद की अग्नि” से थी जो विभूषित वीरता से अपनी, ब... »

अभ्यर्थना है प्रभु

किसी का आसरा नहीं करूँ मन में दंभ न भरूँ अभ्यर्थना है प्रभु बस तेरे पनाह में मैं रहूँ »

असर

फ़िजाए भी कुछ बदलने लगी शायद असर उसपर भी तेरा छाने लगा »

नसीब

हम तो तेरे मुरीद हैं तुमसे मिले तमस ही मेरे नसीब है »

तफ्तीश

आँखे रोके कहाँ रूकती तफ्तीश में लग जाती हैं छिपे हुए अश्क को पहचान लेती हैं »

“सावन” मंच हमरा

विविध काव्यों से सजा है न्यारा कविवर ने है जिसे संवारा समालोचना की मुखरता से मिलकर सबने जिसे निखारा छन्द- अलंकार की बहती धारा हाँ, वह है “सावन” मंच हमारा। बनी एक पहचान हमारी खुद से हुई मुलाकात हमारी जहाँ अपने ही अनछुए पहलू को जाना, समझा और संवारा हाँ, वह है “सावन” मंच हमारा । भावों की बहती है अविरल सरिता विविध उदगारों से बनती है कविता हर मुद्दे पे उठते बोल यहाँ पर हर क्षेत्... »

तस्लीम होगी

कब अपनी इबादत “उन्हे ” तस्लीम होगी सभी सुताओ की ख्वाहिशे महफ़ूज होंगी । »

तुम्हारा ख़याल आया हो

कोई ख्वाहिश कहाँ कोई पछतावा भी नहीं पतझङ-सी है वीरानी बसंत आया ही नहीं दूर तक फैला है सूनापन जैसे शून्य निकल आया हो हाँ, कुछ इस तरह तेरा ख़याल आया हो । काली निशा की छाया में अर्णव में खामोशी छायी है पर उसके तलचर में सुनामी की तरंगों ने जैसे पनाह पायी हो हाँ, कुछ इस तरह तेरा खयाल आया हो । »

कुछ इस तरह

बादलों से चाँद जैसे निकल आया हो आके अपनी छटा से सारी गम की परछाई को मुझसे छिपा आया हो हाँ, कुछ इस तरह तेरा ख़याल आया हो। »

विकृति

बेटियों के साथ क्यूँ होता यह बार बार मानसिक विचलन है ये कहते जिसे बलात्कार यह सामान्य नहीं क्रूरतापूर्ण व्यवहार है मानसिक विकृति की ओर बढतो की पहचान है »

मिली आजादी तेरे सहारे

बापू हमारे, जन- जन के प्यारे मिली आजादी बापू तेरे सहारे ।। वर्षों से भारत माता सिसक रही थी पाँवो में गुलामी की बेङी पङी थी दिल में हमारे न कोई ललक बची थी स्वाधीन होने की ज्वाला ठन्ढी पङी थी छाया था हमपे, पराधीनता के अंधियारे मिली आजादी बापू तेरे सहारे ।। व्यापारी बनके जो आए दुष्ट बङे थे लोलुप दृष्टि से भारत माँ को देख रहे थे कुनीतियों के कुटक्र में फंसते गये हम गुलामी की जंजीरों से बंधते गए हम खो ... »

ऐसा कौन है जिसने, अहिंसा से लङाई जीती हो

जिनके तेज के आगे, चाँद की चमक फीकी हो ऐसा कौन है जिसने, अहिंसा से लङाई जीती हो । बिन गोली- बारूद के चला था फ़िरंगी से उलझनें सोचा भी नहीं था कभी, चला है वो महात्मा बनने हिंसा में वो बल है कहाँ, जीते जो मन को जिसकी एक पुकार पर लगे जन सैलाब उमङने कहाँ ऐसा योगी, ऐसी उपमा दिखती हो ऐसा कौन है जिसने, अहिंसा से लङाई जीती हो । राम राज्य की कल्पना की थी जिसने वर्धा शिक्षा योजना की शुरुआत की उसने करके सीखो ... »

अहिंसा के पुजारी हम

अहिंसा के पुजारी, सत्य, प्रेम , करूणा जैसे मानवीय गुणों की हमें दरकार है । किसानों के हिमायती की दृढ़ता को अपनाने हेतु क्या हम पुनः तैयार हैं । अपनी मानवीय संवेदना को रखना हमें बरकरार है । उत्पीङको के प्रति दया रखने वालों से टकरार है । »

अर्द्धनग्न फकीर

अपनी दुर्वलताओ से भी अवगत करवाकर दुनिया को बताया, अहिंसा अपनाकर अर्द्ध नग्न फकीर कहा था कभी किसीने। बिना अस्त्र-शस्त्र के ही, चले लाठी ठेकाकर महिला, किसान सबको मोहा उन्मुक्त मुस्कराकर अविश्वसनीय है, आजादी दिलाया, कृषकाय वृद्ध ने । »

स्मृतियों से

स्मृतियों के झरोखो से ऐसे शूल निकल आए हम फिर से, मिले घावों को अनजाने ही कुरेद आये। »

इंसाफ

हमारे संविधान की विशेषता असंतुष्टो को भी संतुष्ट होने के अवसर उपलब्ध कराती है यही वजह है कि इंसाफ की प्रक्रिया तारीख़ दर तारीख़ चलती जाती है »

कैसे कहें सुरक्षित हैं तू

कैसे कहें ” सुरक्षित हैं तू” —————–******* हम भारत की आधी आबादी, कबतक सहे दुराचार बढता ही जा रहा, थमता नहीं, हिंसक व्यवहार आख़िर क्यूँ नहीं, कोई कर पा रहा इसका निराकार सारी कोशिशें, सारे कानून, सावित हो रहे निराधार । दिन-प्रतिदिन बढती घटनाएं, छोङ रही सवाल मानव क्या तू सच में है मानव कहलाने का हकदार तेरी प्रवृतियाँ, पाश्विक नहीं, राक्षसों से बढ़कर है ... »

नन्ही लगी निशाने पर

हम अभिभावकों के लिए यह कहाँ तक संभव है हर जगह बेटियों के साथ, परछाई बन चल पाना क्या यह उचित होगा, फिर से घर की चाहरदीवारी में, रोक पाना हथरस जैसी घटनाएँ, नितप्रतिदिन डरा रही है हमारी नन्ही सी जान, लगी है निशाने पर ।। »

क्या दे जबाब

बताइए क्या जबाब दें, उस मासूम को कैसे कहें, बाहर का कोई ठिकाना नहीं है कहाँ, क्या, कौन भेङिया का रूप लिए है तेरी जिन्दगी महफ़ूज नहीं, लग सकती है दाव पर। »

क्यूँ है इंकार

पूछ रही नन्ही परी क्या होता यह दुराचार क्यूँ होता महिलाओं के साथ गलत व्यवहार क्यूँ माँ किसी से बात करने पर टोकती तू क्यूँ लगाती पाबंदी, बाहर निकलने क्यूँ है इंकार »

कहने को शर्मिंदा हैं

माँ भारती, अब भी चुप क्यों, फिर बिटिया हुई शिकार दुष्कर्म, असह्य पीङ, कत्ल, कर दिया अंतिम संस्कार । अपमान हर महिला का, हर पिता हुआ शर्मसार अनवरत् चलता है, थमता नहीं, होता बारम्बार ।। भूल बैठे इंसानियत, जीभ काट, रीढ़ दी तोङ करते रहें हैवानियत, दे गये अनगिनत चोट अब और नहीं, जिन्दगी जीने लायक रही नहीं, मौत के रथ पर सवार, वो गयी मानवता से हार।। बिटिया कहने को शर्मिन्दा है, छिपा इन्हीं में दरिन्दा है ह... »

अंतहीन समस्याएँ

इस महामारी में आमजन के कष्टों की दासताँ जानना हो तो बस एक दिन गुजारिए उनके बीच, उनसे मिल, जिनके दिन बितते आजीविका तलाशते रातें बीतती आने वाली परेशानियोंको गिन। हमें तो बस उन्ही नीतियों की आश और दरकार है जिनसे पेट उनका भर सके जो हो गये बेरोजगार हैं । सरकारी राहतों से, ज़रूरतें पूरी होती नहीं मिले अनाजों से, भूख मिटती नहीं हर जगह फैला भ्रष्टाचार है। सिर्फ चावल, गेहूं के सहारे कैसे घर- परिवार चल पाएग... »

जान गयी

देखो ना, जिन्दगी आज फिर मैं हार गयी किसी और के लिए फिर से गलत ठहरा दी गयी ।। आज फिर मैं यह जान गयी सच का साथ कोई नहीं देता, मुक दर्शक बन, बस हर कोयी अपनी फिराक में लगा होता फितरत अच्छे से पहचान गयी ।। जब तक उनकी चाहतो को पूरी करोगे बस तभी तक, उनकी हँसी को तकोगे एक इन्कार, सारी असलियत को बतला देती उनकी छिपे स्वार्थों की झलक हमें दिखला देती भ्रमर से निकले कैसे, अबूझ सबब डाल गयी ।। अकेले भी खुद को कह... »

वीर क्रांतिकारी की जयन्ती

ॠणी आपके हैं हम सभी, त्याग, तप, पौरूष की गाथा भूलेगे ना कभी । 28 सितम्बर, 1907 का था वो पावन दिवस बसंती चोला धारी, वीर क्रांतिकारी, सेनानी भगतसिंह का पंजाब की , पावन धरा पर हुआ अवतरण, इनके जन्म को हम भूलेगे ना कभी। इनकी जयन्ती पर है इन्हें कोटि-कोटि नमन जिनकी वीरता की गाथा से परचित है नीला गगन अभूतपूर्व साहस थी उनकी भूलेंगे ना कभी । देशभक्ति के भावों के धनी, अंग्रेजी हुकूमत से ना जिनकी बनी “... »

निश्चय

आज सवेरे ही मैने निश्चय किया मन में शत्रुता संभाल अब न रखूगी मेरे नज़र से जो भी मेरे दोषी हैं उनके दोष मन से निकाल देखुगी । खुद को कलुषित करने वाले अंध विचारों से मुँह मोङूगी अपने ध्यान से हटा, नासूर जख्मो को छोङूगी । पर अपने निश्चय पथ पर क्या, कितनी दूर, कैसे बढ़ पाऊँगी उन भरे जख्मो के निशां से कैसे, कबतक, मुँह मोङूगी । »

समय रहते

हाँ कुछ लोगों को समय रहते ही ज्ञान आ जाए अपनी क्षुधा की तृप्ति में, किसी और का चैन न उङाए »

जुदा-जुदा

खुशी हो या गमी संग नहीं रहती सदा एक-दूसरे से मिलकर भी रहती जुदा-ज़ुदा »

अपनेमन में

खुद को संभाल पाते, इस लायक ही कहाँ छोङा है कई अपनों ने ही, अपनेपन में, अपना बन, दिल तोङा है »

पूछतीं सवाल

लगता पूछती हो, बता माँ कबतक बंदिशो में रहना होगा कब खुलकर हंसना, बोलना बेखौफ़ घर से निकलना होगा । कब मैं भी बेखौफ़, सुबह की सैर पर जाया करूँगी दिन ढले भी निश्चिंतता से, मैं अकेले आया करूँगी। मेरे स्वप्न कब उङान लेगें, मेरे लिए भी द्वार, ऊँची शिक्षा के खुलेगे कोटा, पटना, दिल्ली, जैसे शहर भी कोई भी ना हमसे अछूता रहेंगे । बिटिया दिवस की ढेर सारी शुभकामनायें »

बिटिया

माँ की सबसे अच्छी सहेली पिता की हर ज़रूरतों का ख़्याल बिटिया के बिना सब अधूरा इसके जैसा कहाँ कोई मिशाल । भाई की हर घङी हिमायत करने वाली बात -बात में, ठुनक कर लङाई करने वाली रूठकर फिर खुद-से खुद ही मान जाने वाली कौन रखे हर छोटे-बड़े का ख्याल । ज़िद करती पर समझ कर मान भी जाती कभी पापा की तो कभी माँ का पक्ष लेती इसके रहने से ही आधा हो जाता भार इसका स्थान कहाँ, है बङा सवाल । जन्म लेते ही किलकारियों से... »

जज़्बातो के तूफान

मेरे इन आँखों में प्यार की एक बूंद नहीं कभी इन में प्रेम का समन्दर उमङा था खुद पर पछतावा करें या खामोशी से भूल स्वीकार करें इसी जद्दोजहद में, मन में उमङते जज़्बातो के तूफा में चीखती खामोशी पसरा था »

पहले सा जहाँ लौटा दो

मास्क-सेनेटाइजर से मुक्ति दिला दो प्रभु फिर से वही हमारा जहाँ लौटा दो। जहाँ खुलकर रह सकें, खुली हवा में गमन कर सकें गमगीन है इस धरा के वासी, फिर से वही हंसी लौटा दो। जहाँ छूने से पहले सोचें नहीं एक-दूजे को मिलने से रोके नहीं रास आए कैसे नजदीकिया, जरा इसका पता बता दो। »

संयम रखें

बेहतर भविष्य की चाह में, खुद की असीम भावनाओं पर, थोङा-सा संयम रखें । ख्वाहिश गगन को छूने की, पाँव जमी पे टिकी रहे ।। »

जीना भूल गये

तुम क्या गये हम तो जीना भूल गए । तेरा छाया था कैसा सरूर तेरा होके था खुद पे गुरूर सच झूठ की कालीमा से बाहर आया हम प्यार पे विश्वास करना भूल गए हाँ, हम तो जीना भूल गए । »

तुम नहीं थे

सोचो कैसे गुज़रे वे पल जब घिरे थे कयी सवालों के घेरे हर तरफ़ बस सुनाने वाले जब साथ देने वाले तुम नहीं थे »

प्रभु तुझ बिन

आज किन रंगों से सजा होगा यह दिन क़ोई पल न गुजरे प्रभु तुझ बिन आज किन रंगों से सजा होगा यह दिन क़ोई पल न गुजरे प्रभु तुझ बिन त्राहि त्राहि कर रही तेरी धरा खतरे में पङा ये सारा जहाँ मनुज काल का ग्रास बन जा रहा तू क्यू छिपा, बता बैठा कहाँ कितने घर बिखर गए कितने नन्हें बिलट गये मानव घर तक सिमट गये फिरभी संक्रमण से हैं जकड़े हुए अब और हम जैसों से सहा जाता नहीं भूखे पेट घर पे, चुपचाप रहा जाता नहीं बाहर ... »

उम्मीदों के बीज

चलो आज अपनी तन्हा जिन्दगी को नया रूप देते हैं सशंकित ह्रदय में फिर से नव उम्मीदों के बीज बोते हैं । रोज की भागदौड़, दोहरे कामों से मन है बेहाल घर-बाहर की जिम्मेदारियां, फिर भी उठते सवाल अब भी ठहरो, खुद को समझो, खुद को वक्त देते हैं सशंकित ह्रदय में, फिर से उम्मीदों के बीज बोते हैं । वो बचपन के दिन, माटी के कच्चे सात घङकुल्ले सात मिठाइयाँ, सतन्जा, सात रंगीले मिट्टी के खिलौने उल्लास के पलों की तरह,जी... »

दूरियाँ

अधरों पर कभी आया तेरा नाम नहीं नयनों में तेरा प्यार छलक आया हमें चाह नहीं तुझे पाने की दूरियाँ ही मुझे रास आया »

अन्नदाता

समझ में बिलकुल नहीं आता ये कैसी फितरत है इनकी जहाँ देखा नफ़ा अपना हाथ थाम ली उनकी । हल्ला मचा करके बस बात रखनी है फिक्र कहाँ इनको, अपनी भेट भरनी है हमारे धरतीपुत्र भटकते फिर रहे दर-दर इन्हे तो बस अपने मन की करनी है । हमारे देश की धूरी “कृषि” जो कहलाती है किसानों के बल पर ही, धरा खिलखिलाती है उन किसानों की ये मजबूरियाँ कैसी खुदकुशी करने को जो उकसाती है । कोई खुशी से कैसे खुदको लील जाएगा... »

आँखे बंद करके भी

बहुत कोशिश की मैने तुम से दूर जाने की हर कोशिश जाया ही जाती रही हरदम तुम ही दिखाई देते हो, आँखे बंद कर के भी । गजब का अहसास है तेरा रह पाता नहीं दूर मन मेरा दूर होओगे कैसे समझ में बात यह अब आई भूल पाएंगे कैसे बसर है मन में तूने बसायी खबर है तुम दूर हो मुझसे फिर भी, तुम ही दिखाई देते हो आँखे बंद कर के भी । »

बेजान कर गया वो

जाना ही था उसको,चला ही गया वो, जाते-जाते बेजान कर गया वो।। जाने वाले को रोक पाया है कहाँ कोई होता है वही जो, नसीब में सबके होई जिन्दा हैं पर जान ले गया वो जाते- जाते बेजान कर गया वो ।। सबके जीवन में जोखिम भरा पङा है कहाँ कब कोई, यहाँ सब दिन रहा है फिर भी देखो हैरान कर गया वो जाते-जाते बेजान कर गया वो ।। वो कौन है धरा पे इतना नसीब वाला, गमों से जिसका, कभी पङा नहीं हो पाला बोध है पर, नादान कर गया वो... »

मिलती-जुलती गाथा है

हर घर की यह बस मिलती-जुलती गाथा है बेटी का कुछ वर्षों का मैके से नाता है । हीना रचने से पहले थी अलहङ अब चौका-चुल्हा बना भाग्य विधाता है थोड़ी सी भूल, भूलवश हुई हमसे माँ-बाप को कोशा जाता है हर घर की यह बस मिलती-जुलती गाथा है । दहेज़ की बोझ से दबे माँ-बाप कहते चुप रहकर सह यह संताप पगङी की लाज तुझे है रखना गम खाकर तुम बस चुप रहना समाज के डर से वे, कुछ कहा नहीं जाता है हर घर की यह बस मिलती-जुलती गाथा ... »

मजबूर खङी

कयी प्रश्न है मानस पर उभरे यहाँ दस्तूर भी हैं कैसे-कैसे अपने भी हैं क्यूँ पराए जैसे माँ-पापा ने भरपूर स्नेह दिया फिर क्यों कर खुद से दूर किया जन्म दिया, पालन पोषण करके क्यू किसी और के हाथों सौंप दिया यहाँ सभी हैं अनजाने,इनके मन में कैसे झांके सबकी है उम्मीद बङी,नन्ही गुङिया मजबूर खङी »

तुझसे

मेरी रैना की शुरुआत है तुझसे इन नैनन की बरसात है तुझसे तुम जो दो मीठे बोल भी दो हर दर्द कबूल मुझे, जो मिले हैं तुझसे »

हम शिक्षक हैं -01

हम शिक्षक हैं शिक्षा की लौ दिखलाते हैं देश के नौनिहालो में उम्मीद की किरण जगाते हैं । समाज की प्रतिष्ठा हमसे है हम भारत भाग्य विधाता हैं मुल्क का मान बढ़ाने को, हम ज्ञान का सुमन खिलाते हैं देश के नौनिहालो में उम्मीद की किरण जगाते हैं ।। सभ्य नागरिक गढ़ने को नैतिकता का पाठ पढ़ाते आये हैं किसी क्षेत्र विशेष में बंधे नहीं विश्व बंधुत्व का मार्ग दिखाते हैं देश के नौनिहालो में उम्मीद की किरण जगाते हैं ... »

कुलदीपक

मेरे कुल का दीपक तुझसे छाया प्रकाश है आया है तू जबसे आलोकित आकाश है । बहनों की तू आशा माता का लाल है सबो की तू आशीष से चमका तेरा भाल है सलामत रहें तू हम सबकी जान है तुझसे दूर हम सबका जीना मुहाल है करेगा कुल का नाम रौशन, हमें विश्वास है ।। छल-प्रपंच से तू हमेशा बच के रहना सत्य की जीत होगी, यह गाँठ बाँध लेना खुद के बलबूते, तू हर कीर्तिमान रचना मन्जिल दूर है, पर मुमकिन तलाश है ।। »

सब पहले जैसा है

माँ तेरी निश्छल ममता की, छाया नशा कुछ ऐसा है कुछ भी तो नहीं बदला हममें, हाँ सब पहले जैसा है आज भी माँ की आँचल में उम्मीदों की मोती पाती हूँ सुख की घङियो में उसकी दुआओं को देखा करती हूँ लाचारी- बीमारी की बेला में उसको ही ढूँढा करती हूँ आज भी मेरे चंचल मन में चाहत लङकपन जैसा है कुछ भी तो नहीं बदला हममें हाँ सब पहले जैसा है । आज भी तेरी हाथों की खुशबू अपने बालों में पाती हूँ करके दो चोटी बेटी की, मै ... »

प्रेम एक इबादत है

किसी पर आख बंद कर एतवार मत करना किसी से टूट- टूट कर प्यार मत करना।। प्यार तो वो है जहाँ खोने का डर नहीं यह वो इवादत है जहाँ पाने की चाहत नहीं प्यार के नाम पर, इसका तिज़ारत मत करना किसी पर आख बंद कर एतवार मत करना ।। प्यार अहसास है जिसे सिर्फ महसूस करो किसी नाम में बंधने को न मजबूर करो इस प्यार को नाम भी मिल जाए तो फिर चाहतो में टकरार हो जाए तो यह नेमत्त है, इसे शर्मसार मत करना किसी पे आख बंद कर एतव... »

हिमाकत है

प्रेम हमारे लिए इबादत है ईश्वर की दी हुई सबसे खूबसूरत इनायत है प्रेम विश्वास का दूजा नाम है विश्वास नहीं तो बस यह हिमाकत है »

नैतिकता का संचार

सुबह सवेरे , आखोंदेखी घटना का है यह मंजर अरूणोदय से पहले पहुँची,बच्चों की टोली चलकर दौङ लगाते लगते थे, जैसे हो मंजिल पाने को तत्पर स्वाबलम्बी बनने को आतुर, पर मर्यादा का नाम नहीं अगल-बगल में कौन चल रहे, थोड़ा-सा भी ध्यान नहीं अपशब्दो की झङी लगाते, कहाँ तनिक भी वे शर्माते खो गये संस्कार कहाँ ,बची माचनवता आज कहाँ क्या अपनी कथनी’ कुकरनी का उन्हें अंदाज कहाँ एक यही आवाहन है, थोड़ा नौनिहालो पर ध्... »

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