Suman Kumari's Posts

कर प्रतिकार तू

नारी तू जो चाह ले रच दे नव संसार तू होने वाले अपमान का करती क्यूँ न प्रतिकार तू ।। कभी दाव पे लगा दिया खुद तेरे ही परमेश्वर ने मौन हुए सब देख रहे, बिलखते छोङ दिया हर अपने ने तेरे चीरहरण के साक्षी बनने थे सब तैयार खङे कान बंद थे जैसे उनके, कैसे सुन पाते चित्कार तेरे सोंच हृदय कंपित है मेरा, कैसे वे भारतवंशी थे निर्वस्त्र होती कुलवधू, कैसे देख रहे, अत्याचार तेरे सत्य शपथ तेरा था, क्यूँ करती क्षमा अप... »

नियामत

खत्म होगा इन्तजार, स्वागत को कब होंगे तैयार वह सुहाना पल जब कोरोना मुक्त होगा यह संसार इस टूटन-घुटन पङी जिन्दगी से है सभी बेजार बस फिर से हो रब की नियामत सुखमय हो संसार »

इबादत

तस्लीम नहीं उनकी हिमाकत हरहाल में करेंगे अपनी हिफाज़त मुमानियत लगाए अपनी आकांक्षाओं पर नहीं तो भूल बैठेगे हम भी अपनी सराफत मकबूल नहीं तेरी अनैतिक मनाहट मान दोगे तो करेंगे हम तेरी इबादत »

क्यूँ करें

क्यूँ करें उनकी हिमायत उद्धत रवैया जो अपनाए हुए हैं खुद पे लगा पाते नहीं मुमानियत बदस्तूर आतंक बन छाए हुए हैं »

मक़बूल नहीं

रफ्ता-रफ्ता चलते-चलते पहुँच गए हम किस मंजिल पे बोध नहीं है, सुध-बुध खोके मक़बूल नहीं,सब अर्पित करके (मकबूल-सर्वप्रिय) »

हँसना भूल गए

आज अवसादो से जुङा है रिश्ता अपना मुस्कुराना भूल गए, कहाँ होता है हंसना अपना वो बात- बात पर रूठकर चुप होके बैठे रहना थोड़ी- सी गुदगुदी पे खिलखिला के हंसना गम की परछाई नहीं,इतरा के तितली-सा उङना अब तो बस जिम्मेदारियों के बोझ तले दबना मुस्कुराना भूल गए, कहाँ होता हंसना अपना । »

रवायत

हर मुश्किल को चुनौती देने की हमारी रवायत है हम नारी हैं, हर रिश्ता हमारे लिए एक इबादत है । हर नामुमकिन को मुमकिन बनाना अपनी आदत है हर खुशी, स्वप्न की अनदेखी कमजोरी , शहादत है। »

बधाई हो प्रधानमंत्रीजी

आप हमेशा सलामत रहें अपना जन्मदिन मनाते रहे । आज वैश्विक मंच पे हमारे भारत को गौरवपूर्ण स्थान दिलाया है आपने एक उभरती शक्ति का अहसास, अपनी एक अलग पहचान बनाने का विश्वास हम सबो में जगाया है आपने “एक भारत – श्रेष्ठ भारत” के स्वप्न को सही मायने में चरितार्थ करते रहें, आप हमेशा जन्मदिन मनाते रहें ।। आज कयी समस्याओं से है घिरे कोरोना का कहर से है सहमे हुए रोजगार का कोई ठिकाना नहीं खाने... »

संग चलना है

नहीं कुछ और कहना है आपके साथ चलना है ।। स्थितियां अनुकूल हो न हो सुख से मुलाकात हो ना हो पर हर घङी, हर कदम मेरे हमदम, न रुकना है आपके साथ चलना है ।। कोई भी लम्हा अब ऐसा न हो ना दूर रहूँ, हालात कैसा भी हो आप मेरे लिए जियो ना जियो मुझे मेरे हमदम संग- संग रहना है आपके साथ चलना है ।। रहूँ जबतक, तीज का व्रत करती रहूँ लाल रंग के दमक से सजती-संवरती रहूँ चौथ के चाँद की पूजा , करती, निरखती रहूँ मेहन्दी का ... »

तन्हा-तन्हा

दिल खाली-खाली क्यू है शाम भी क्यू तन्हा-तन्हा लागे है । बिन कारन, क्यू बेचैनी का साया है यह कैसा उलझन वाला पल आया है उम्मीदों की किरण कहाँ अब, घोर निराशाओं की काली छाया है अपने भी अब बेगाना-सा भागे है, शाम भी क्यू तन्हा-तन्हा लागे है । निन्द नहीं इन नयनों में, ख्वाब गये हैं दूर कहीं मुस्कान कहाँ इन अधरों पे, आशाओं की गीत नहीं जज़्बा कहाँ हासिल करने की अब, शील बना यह तन मेरा, इस मन में है जज़्बात न... »

रुकना है नहीं

हम भी हैं मुश्किलों से, हारने वालों में से है नहीं कोई भी चुनौती क्यू न आए, घबरायेगे हम तो नहीं कैसा भी हो अनल, स्वर्ण जैसे जलता है नहीं पर जबतक ना तपे वो, कुन्दन सा निखरता भी नहीं किसी अवलम्बन की आश इस मन में है नहीं हौसलों के पंख की उङान ये, हम हारने वालो में नहीं जहाँ मैं न होऊ, हरगिज़ वो लम्हा आने वाला है नहीं बोलियों में हो समाहित भाषा का रूप यूँ पाया है नहीं मातृभाषा से राजभाषा का सफ़र, बस म... »

समझ न पाए

बहुत ही कोशिश की,जरा हम भी बदले से जाएँ पर कैसे अब तक यह मन, बात समझ न पाए । अपनों से दर्द मिले थे अकसर शिकवा-शिकायत चलता ज्यादा- कमतर अनजान भी कैसे चोट पहुँचाए, मन समझ न पाए । ना कोई रिश्ता, शत्रुता की ठौर कहाँ बिन समझे ही, कैसा शोर यहाँ सब एक हैं, काहे को पछताए, मन समझ न पाए । चन्द दिवस का साथ है अपना यहाँ कहाँ हमको, इतिहास है रचना बिन समझे ही क्यू बैर बढाय, मन समझ न पाए । दोष कयी मुझमें भी है, ... »

हिन्दी हमारी मातृभाषा

एकता के सूत्र में विविधता को पिङोती, जनमानस की भाषा है जो देवनागरी लिपि में गुथी हुई,अपनी राजभाषा रूप धर आई है जो। हर जन के दिलों में उमंग सी बहती हुई अभिलाषा सी हमारे मन में है बसती हुई हर हिन्दुस्तानी के स्वाभिमान की है आधार वो हिन्दी हमारी मातृभाषा, राजभाषा रूप धर आई है जो। अगर सम्मान इस जग में पाना है हमें हिन्दी भाषी होने का अभिमान लाना होगा हमें तरक्की के सफ़र में साथ निभाती है वो हिन्दी हमा... »

हौसला

इंसाफ की लङाई लङनी हो तो फिर कोरोना का क्या डर मुस्कुरा के करेंगे हर मुश्किल का सामना, चाहे जिसका हो कहर »

पतन

फांसी, एनकाउन्टर जैसी किसी भी सजा का नौनिहालो को न रहा है अब डर जब हो गया हो पतन नैतिक मूल्यों का फिर कैसे हो आदर्शों का असर। »

मृगमरीचिका

चीखते चेहरों पर चीखने से क्या फायदा सजा मिल जाने पर, बेगुनाह साबित होने से भी क्या फायदा । इज्जत की नाम अपने ही मासूमो की हत्या साथ देने के बदले आरोप लगाते हैं मिथ्या मानवता के मूल्यों को खोने से क्या फायदा । जो दिखता है वैसा, अकसर होता नहीं दूजो के लिए अपनों को ऐसे खोता नहीं मृगतृष्णा के पीछे भागने से क्या फायदा । »

निश्छल

नदी नाम है अविरल बहती जलधारा की त्याग, गतिमय, अवगुण-गुण का भेद मिटाने की कश! हममें भी यह सब आ जाए अपना चित भी तरनी से निश्छल हो जाएँ »

घबराता कहाँ

तरू को आलस सताता कहाँ सरिता को रुकना भाता कहाँ पाने की जद हो जिन्हें मुश्किलों से वो घबराता कहाँ । »

खुद पर एतवार करते हैं

चलिए एकबार फिर से, खुद पर एतवार करते हैं । बहुत कर लिया गैरो से, इसबार खुद से ही प्यार करते हैं ।। बहुत किया भरोसा, जो भरोसे के हरगिज़ काबिल नहीं थे, खुद पर भरोसा चलो अबकी बार करते हैं । वक्त के साथ चलने की हर बार कोशिश की वक्त को अपने साथ करने की कोशिश इस बार करते हैं । वक़्त कैसा भी हो बीत ही जाता है बीत गया जो कब लौट के आता है बीते हुए कल की क्यू अफसोस मनाते हैं खुद पे भरोसा करके, खुद को आजमाते... »

अवनी हूँ मैं

अवनी हूँ मैं अंबर है तू , डूबू जो मैं संबल है तू । ये मन मेरा मन्दिर है जो प्यारे प्रभु की मूरत है वो। भटकू मैं क्यों इधर से उधर मन में ही तो रहता है वो। अकेली कहाँ क्यूँ डर मुझे हरपल संग में रहता है वो। अधूरी रहे क्यू ख्वाहिश मेरी कहने से पहले पूर्ण करता है वो । »

मातृभाषा

विविधता में एकता के सूत्र को सहजता से पिङोती जो संस्कृत की बेटी, विविध भाषाओं की सहचरी है वो। माँ सी ममता जिसके हर वर्ण में समाहित है फिरन्गी भी जिसे सीखने को ललायित हैं । जो भारती के माथे पे बिन्दी बन सुशोभित है जन- जन की भाषा देवनागरी लिपि से विभूषित है । रस, अलंकार, जैसे आभूषण हैं जिसके, विभिन्न रूपों में दिखते अंदाज जिसके । जिसकी पहली शिक्षा माँ के आँचल से मिलती लोङियो में जिसकी अभिव्यक्ति, गो... »

लाशों की सेज पर

सोची समझी चाल से, शायद जानबूझकर पार्टियां वे कर रहे, विश्व को मौत में ढकेल कर। जिस वुहान से इसकी शुरुआत हुई इससे निजात की, तैयारी थी क्या कर रखी। मास्क को दे तिलांजली, दुनिया का नुकसान कर हजारों मासूम लोग जा रहे, काल का ग्रास बन । लाशों की सेज बिछा चैन वे अलाप रहे लद्दाख पे आके, असलियत दिखा रहे । जब सब कोई सहमा सा, दुआ है कर रहा तब वे अंधान्ध हो सीमा पर, चील सा मंडरा रहा। जमीर जिनमें थी नहीं, जिनक... »

कालचक्र मौत का

पाबंदियों की धज्जियां उङाते, सीधे-सीधे संक्रमण को आमंत्रण देने निकल पङे । गजब की परिस्थितिया, चारों तरफ मंडराते मौत के बीच खुद को चुनौती देने निकल पङे । संकटकालीन दौर में जीते, मन बेचैन जिगर बेताब जीने की लालसा, कैसे रखें फासला, हालात हैंखराब अजीब सा भय लिए देखो सङक पर निकल पड़े । खुद पे लगी पाबंदी खुद ही हटाते चल दिए पेट की आग ऐसी बढी, सवाल हैं कयी खङे मौत के खौफ की धज्जियां उङाते निकल पङे । हमार... »

सुता को ज्ञान

अपनी सुताओ को वह ज्ञान दे दे माँ की तरह उन्हें भी थोङा प्यार वो दे दे। दोष उनका क्या जो हदन में अकेले हैं दूर सुत उनका क्यूँ स्वप्नों से खेले हैं । बङी हसरत थी उनकी जो आंखो का तारा है सफलता की बुलन्दी को चुमे, जो प्राणों से प्यारा है जिसकी पढाई में जर-जमीन तक बेचें भूखे रहके, दुख सहके, आशाओं के पौध को सीचे जुदा मत कर, जिगर के उस टुकड़े को अपनों के बीच में उन्हें भी, उनका स्थान वो दे दे। यह कहानी ह... »

समवेत स्वर

एल एसी में शान्ति, विश्वास बहाली को हम प्रतिबद्ध हैं मातृभूमि की अखंडता, संप्रभुता की रक्षा को तत्पर हैं । हमारा भारत शान्ति का हिमायती, हिंसा से दूर रहता है बातचीत से ही मसले सुलझाने की ख्वाहिश रखता है । हमारे पङोसी की मंशा उकसावे की रहते आई है हमरे मुल्क के संवाद, अहिंसा की नीति पे बन आई है । सुलझाना नहीं, उलझाना जिन्हें बस आता है अशांति के पोषक को, शान्त रहना, कहाँ भाता है । उद्धत रवैया की भरपा... »

तुझसा बनना चाहती हूँ

मैं पीङ तेरी अपनाना चाहती हूँ तेरे आँसूओ की वज़ह जानना चाहती हूँ ।। तेरी साधना, तपस्या, त्याग के भाव को बस अपने में समाना चाहती हूँ ।। तेरी करूणा वात्सल्य ममत्व के गुणों को खुद में खुद से पिङोना चाहती हूँ ।। तू ज्ञान की मूर्ति, कामनाओं की करे पूर्ति तुझ जैसी ही अन्नपूर्णा, बनना चाहती हूँ ।। कभी ज़िद पे न अङती, दूजे के लिए को बदलती मैं भी अपनी हठधर्मिता, तुझ-सा मिटाना चाहती हूँ ।। दूर से ही समझ जात... »

हम ही चले जाते हैं

किसी की रूसवायी की वज़ह क्यूँ बनें ऐ मेरी जिंदगी, चलो हम ही चले जाते हैं । औरों की परेशानी का सबब क्यूँ बने किसी की आँखों की चुभन क्यूँ बने तेरा चैन यूँ ही बना रहे, चलो हम ही चले जाते हैं । क्यूँ किसी से गिला हम करें क्यूँ किसी की हसरतो से हम जले सारे स्वप्न पलकों पे लिए, चलो हम ही चले जाते हैं । कयी उम्मीदों के सुमन थे तुमसे खिले बिखर गए सब, कयी ज़ख्म ऐसे तूने दिये कोई आश फिर से पले, चलो हम ही चल... »

ऐ जिन्दगी

ऐ जिन्दगी ! कभी तो तू मेरी होती जिधर को मैं कहती, उधर रूख़ करती ।। तू जिधर इशारा करती, मुङ जाते हैं उधर तेरे आगे अपनी मर्जी चलती है किधर काश! बस एक बार मेरा अनुसरण करती। थक गये हैं, तेरी इच्छाओं की कद्र करके भीगी है पलकें मेरी, उभरे हैं जो दर्द बनके इस पीङा की अनुभूति तू भी जिया करती । पथ पर पथिक बहुत हैं पर,अपनी-अपनी मंजिल है कहाँ मिलता है सबको , जो जिसके काबिल है मनचाही मंजिल का फिक्र,तू भी करती... »

भूलेगी कैसे

आज का यह भारत प्रतिफल है उनके अथक प्रयासों का सावित्री बाई फूले जो थी शिक्षिका, उनकी शिक्षा नीतियों का भूलेगी कैसे भारत की बेटियां, ऋणी है जिनकी संकल्प शक्ति का जिनके जज़्बातो से, बल मिला, बालिका शिक्षा दिलाने का हर स्त्री का सच्चा है आभूषण उनकी ज्ञान की ज्योति का ललक जगाया उनमें शिक्षित,स्वाबलम्बी,आत्मविश्वासी बनने का । »

पथप्रदर्शिका

लडकियों की पथप्रदर्शिका थी जो घर से निकल पाठशाला का रूख करवायी थी जो पति ज्योतिबा संग शिक्षा की अलख जगाने चली थीं जो तमाम बाधाओं पे पार पाते हुए, पहली पाठशाला बालिकाओं की खोली थी जो “खूब पढो” सिखाने वाली, सावित्री बाई फूले थी वो »

मेरे पथ प्रदर्शक

बबीता मैम , बहुत सारे शिक्षकों का मुझे मार्गदर्शन प्राप्त हुआ परन्तु आपनें मुझे जीवन जीना सिखाया आपने । मैं तो कुछ भी नहीं थी परन्तु आपने मेरी सुप्तावस्था की क्षमताओ को उजागर किया आपने । मुझपे जितना विश्वास खुद नहीं था, उससे कहीं ज्यादा मुझपे विश्वास जताया आपने । मैं बहुत दूर हूँ, नम्बर नहीं की बात कर सकूँ, परन्तु फिरभी मेरे मन के करीब रहना सिखाया आपने । आज भी निराशाओं की घङी में आपकी कही बातों से... »

बधाई शिक्षक दिवस की

हे गुरूवर करूँ आपका अभिनन्दनम् सानिध्य आप सबो का पाके बन जाऊँ मैं चन्दन शिक्षक दिवस पर सभी गुरुजनों का हार्दिक बधाई! »

मंजुषा से नैतिकता की शिक्षा

मंजुषा से नैतिकता की शिक्षा ** ** ** ** ** ** ** सिर्फ जननी-जनक कहलाने के नहीं अधिकारी हम विवेकशील, कर्तव्यपरायण कहाते मनुजधारी हम है मनुज पशु नहीं, क्यूँ दिखाये अब लाचारी हम बच्चों को नैतिकता सिखाने की ले जिम्मेदारी हम।। बेघर आवारा कुत्तों की तरह ताकते फिरते इधर-उधर हैवानियत की निशानी छोङ आते किसी की देह पर कभी आखों से बेधते, छेङते आते-जाते छेककर हर सीमा को लाघते, बहसीपन दिखाते आवरू बेधकर।। अफसोस... »

गमगीन है सारा हिन्दुस्तान

गमगीन है हिन्दुस्तान ———————- प्रणवदा थे राजनीति का एक जीता-जागता, सजीव संस्थान निधन,राजनीति ही नहीं, जनता के लिए भी बङा नुकसान । गुणी, पढ़े लिखे, सादगी की थे जो जीती-जागती प्रतिमान इस दौर में ढूँढे नहीं मिलेगा, उनकी बराबरी का कहीं इंसान विरोधियों से भी थी जिनकी अपने सगे-संबंधियों जैसी पहचान करनी कथनी में गज़ब का तालमेल, द्वेष का नहीं नामो-निशान सैद्धांतिक... »

बढ़ता ही जा रहा

क्यूँ बारम्बार किया जाता महिलाओं के साथ घृणित अपराध, कयी तरह की वेदना-संताप से गुजरती,जिनसे होता बलात्कार । हर कानून बौना सावित, हर जायज कोशिश जा रही बेकार, थमता दिखता नहीं, दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा दुराचार ।। बेटियाँ परिवार पे बोझ नहीं समझी जाती हैं जब हर सुख-सुविधा, समानता, शिक्षा मुहैया है अब पर विडम्बना है यह, क्या आई है ईश्वर से वह माँगकर कभी बस में, कभी ट्रेन में, कभी स्कुटी से खींचकर लु... »

गंगा बहती है जहाँ

गंगा बहती है जहाँ *************** रीषिमुनियो की तपोभूमि बसती हैं वहाँ सबसे पावन भूमि है मेरी गंगा बहती है जहाँ ।। हरदिन से जुड़ी एक कथा, बयां होती है जहाँ हर कथा नैतिकता की पाठ पढाती हैं जहाँ बर, पीपल, शमी, तुलसी की पूजा होती जहाँ हे राम! के नाम से गुन्जित हर सुबहा है जहाँ सबसे पावन भूमि है मेरी गंगा बहती है जहाँ ।। प्रकृतिदृश्य की छटा इतनी निराली है जहाँ पठार, पहाङ, मैदान, मरूभूमि से सजी धरा है ज... »

जन्म भूमि की ओर चलें

जन्म भूमि की ओर चलें ******************* इस बेगाने शहर में मरने से अच्छा अपनी जन्म भूमि की ओर चलें । भूख की जंग में मरने से अच्छा मिट्टी की सोनी खुश्बू के बीच रहें। एक ऐसा सफ़र,जहाँ पैरों का सहारा है जहाँ गाङी नहीं,हौसलों का पंख हमारा है हम प्रवासी,भाग्य से दो-चार होने को चलें—- कितने कष्टों से होते हुए यह सफ़र पूर्ण हुआ दहशत में ना रहो,गाँववासी हूँ वक्त का मारा हुआ कष्ट न होगा ,अपनी जमी को ... »

छिपाना मत

जो भी हो मन में, देखो कुछ भी छिपाना मत । मैं हर भावो को खुद ही समझ जाऊँगा देखो लोचन पे लाना मत । कभी तुमने ही कहा तो था सच बताने गर सच बताया तो दामन छुङाना मत। कयी गम हैं इन पलकों पर बताया तो पलकों को रूलाना मत। देखो तुम रूठे तो जग रूठा मैं रूठू , मुझे मनाना मत। »

स्वच्छ भारत अभियान

खुले में शौच से मुक्ति का दावा, बिलकुल निराधार घोषित करने से, कार्ययोजना लेती कहाँ आकार ।। स्वच्छ भारत अभियान का सच बताता ग्रामीण सङको के किनारे चलना मुश्किल होता ताजुब हमें तब होता, जब पढने को मिलता कोई जिला, कस्बा शौच मुक्त घोषित कैसे होता शौचालयों के निर्माण में खानापूर्ति कर रही सरकार सिर्फ घोषित करने से कार्ययोजना लेती कहाँ आकार । बता दें कहाँ बारह हजार में होता शौचालय निर्माण उसमें भी जब दो ... »

मेरा गाँव

मेरा गाँव ————– गाँव मेरा, हां वही गाँव है जहाँ सर्दी में धूप,गर्मी में शीतलता की छाँव है । अपनेपन का हर जङ चेतन से व्यवहार है हर गली हर टोले में छिपा अब भी प्यार है एक आवाज़ पे दौङ पङता है जो बना भारत की पहचान है हा वही गाँव है । मगही बोली में घुली मिस्री की मिठास है गोबर से लिपी गलयो में खुशबू का वास है खेतों में लहराती फसल,पगडंडियो पे मखमली घास है मन में कोई भेद नह... »

मातृत्वसुख

हर माँ शिशु के जीवन को संवारती खुद को खोकर, हर पहलू को निखारती । की कभी वह, स्वपहचान की भी अनदेखी कभी गहरी निद्रा पलकों पे इसकी नहीं देखी एक हल्की सी आहट, थोड़ी-सी छटपटाहट कयी आशंकाओ से घिरी,आत्मा तक कराहती, खुद को खोकर, हर पहलू को निखारती । गर्वित कर जाता, आँचल से ढक स्तनपान करवाना आलोकित करता उसे मातृत्व के अहसास को जीना स्नेह की मूरत वह , पलकों पे करूणा का छलक आना माँ कहलाने के खातिर, हर पीङा क... »

आश बूढ़े माँ-बाप की

अलगाव, अवसाद से निकलने को , तैयार हो अपनी सोंच बदलने को । खुद को आकने, अंतर्मन में झांकने को , नये हुनर सीख तैयार, बेहतर करने को । भविष्य की अनिश्चितता हमेशा से कायम थी अकेलेपन की खुमारी पहले ही से व्याप्त थी टूटते संयुक्त परिवार, एकल में हो रहे तब्दील थे खुद तक सीमित, पडोसियों से भी अनभिज्ञ थे हम अकेले ही नहीं, सब तैयार हैं फल भुगतने को, बस तैयार हो अपनी सोंच बदलने को । थोड़ा-सा सुधार करें, खुद म... »

कर्मफल

स्वप्नों के बीज पर ही कर्म फल लगते हैं स्वप्न सीढ़ियों पर चढ लक्ष्य के फल चखते हैं । बगैर स्वप्न देखे कहाँ हम आगे बढ़ते हैं बगैर इसके कहाँ उपलब्धियाँ हासिल करते हैं । कल्पना ही है वह आधार भूमि लक्ष्य इमारतों की बुनियाद जिसपर रखी होती हैं जीजिविषा के दम पर ही मन साकारता को पाती हैं हर नवनिर्माण के पीछे चेतना संघर्ष करते हैं स्वप्न के बीज पर ही कर्म फल लगते हैं । हमारा व्यक्तित्व सशक्त स्वप्न की पहच... »

प्रतीक बन जा

कठिन पथ पे चलकर, फतह हासिल करने की तू प्रतीक बन जा ! स्वमेहनत से कुछ ऐसा कर, सभी के मन की तू मुरीद बन जा ! अनेक रंगों से सजे, संग- संग गुजारे खट्टे- मीठे कयी भावों में पल बीते हमारे बिखरती-संवरती, कभी चल-चल के ठहरती चलते रहे निरन्तर एक-दूजे के सहारे बस ख्वाहिश है इतनी,नित नव कीर्तिमान गढते निडर, निर्भिक, अनवरत् आगे बढते निराशाओं के भंवर में भी पुरउम्मीद बन जा ! कठिन पथ पर चलकर, फ़तह हासिल करने की ... »

रिश्ता है बस निभाने का

बस अब और नहीं, गये अब दिन तुम्हारे हैं हमने हंस हंस के, जो अपनाये अंगारे हैं ये अंधेरे में सने पूनम की जो रातें हैं दिये तुमने, पर यही अब संग हमारे हैं । गमों की कहाँ परवाह हमको है खुशी की कहाँ चाह मन को है मिले जो दर्द तुमसे है बस उसीकी परवाह हमको है । थामा प्यार का दामन जो हमने था बदला यह , बना कब दर्द का रिश्ता समझ पाते, क्या है रिश्ते- नाते पर समझने की धैर्य किसमें था। खुद को सौंप के तुमको निभ... »

न जाने कहाँ बसता है वो

ना जाने बसता कहाँ * ———-*——–*——–* सङको पे चलता कहाँ वह संक्रमण से अनजान है भय व भूख को साथ लिए वो भी एक इन्सान है जानता है यह सफ़र शायद हो अंतिम सफ़र चल रहा, माथे पे गठरी ,बच्चों की अंगुली पकड़ धूप से तपते बच्चे को माँ लेती सीने से जकड़ मुसीबत से बेपरवा,खिलखिला,मासूम नादान है । कभी बिस्कुट की ज़िद करता चिल्ला पङता वो तात की अंगुली छूङा,बेखौफ़ द... »

देवी नहीं बस इन्सान

एक ऐसा जहाँ, देवी नहीं बस इंसान समझा जाता हो देवी का दर्जा देके न छल, नारी से किया जाता हो। आसमां पे बिठा के अस्तित्व पर भी बन आया है बाहर तो क्या घर में भी सम्मान कहाँ पाया है जिसकी वह अधिकारिणी वह भी छिनता आया है खुद पर खुद की इच्छाओं पर मलाल जिसे आया है वह नारी है जिसकी सोच पर पाबंदी लगा आया है नभ नहीं बस वह जमी मिले,जहाँ मान रखा जाता हो जहाँ देवी नहीं बस इंसान समझा जाता हो । कन्या पूजन के लिए,... »

हे प्राणदायनी नारी

हे प्राणदायनी नारी ************* हे प्राणदायनी नारी,तेरी करूण कहानी आँचल में है करूणा,पर आखों में पानी । हर युग में क्यू नारी ही सतायी जाती है विरह वेदना सहती,अग्नि में उतारी जाती है कदम -कदम पर सहती,सबकी मनमानी । तेरी करूण कहानी— स्नेह की डोर से बँधकर,आई है तेरे द्वारे एक प्रीत निभाने ख़ातिर,त्यागे सपने प्यारे अलग कहाँ है तुमसे,है तेरी अर्धांगनी तेरी करूण कहानी— पाँच पतियों की द्रोपदी... »

गणपति

प्रथम मौलिक जन-जन के गुरु प्रबंधन के पुरोधा,नवाचार की शुरू आस्था के आकाश पर सूर्य से बिराजमान हैं धर्म के धरातल पर रचे कृतिमान हैं मातृभक्ति की वज़ह से पिता की भी की अवहेलना पिता की विश्राम की खातिर परशु का किया सामना हाथ में फरसा लिए मूषक पर सवार हैं एकदन्त दयावन्त बप्पा हमार हैं »

जहाँ बसाते चलें

कुछ पाना हमारा मकसद न हो देने की लत खुद को लगाते चलें जीवन हमारा यह रहे न रहे दूसरों का जहाँ चलो बसाते चले । हमने देखा दुनिया की भीड़ में भी हम अकेले है क्यूँ न अकेले ही आशियाना बसाने चले । बहुत सह लिया अपनो से सितम फिर क्यू उनके नाम का दीप जलाते रहे । मेरी भावनाओं की जिन्हें कद्र ही नहीं क्यूँ उनकी बेरूखी पे आँसू बहाते रहे । जिन्हे आँसूओ की कद्र ही नहीं क्यूँ उनके खातिर खुद को जलाते रहे। कयी ऐसे ... »

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