Category: ग़ज़ल

  • हमें भी पिलाइए

    मेरे लबों की आप सदा बनके आइए।
    खुद जाम पीजिए, हमें भी पिलाइए।

    नज़रों में आपकी मयखाना नज़र आये।
    मखमूर क्यों न हो इनमें जो उतर जाए।
    मयकश की लाज रखिए तशरीफ़ लाइए।
    खुद जाम पीजिए हमें भी पिलाइए।

    जादू की कशिश हैं ये जलबों भरी अदायें।
    जुल्फों में भी हजारों महफूज हैं घटायें।
    छिटकाइए ये जुल्फ प्यास को बुझाइए।
    खुद जाम पीजिए हमें भी पिलाइए।

    खुशरंग गुलबहार है ये हुस्न आपका।
    बेदाग चाँद जैसा है चेहरा जनाब का।
    हो जाए जहां रोशन घूँघट उठाइए।
    खुद जाम पीजिए हमें भी पिलाइए।

    संजय नारायण

  • पत्थरों की तरह आदतें हो गयीं

    हम भी रोये नहीं मुद्दतें हो गयीं।
    पत्थरों की तरह आदतें हो गयीं।

    जबसे बेताज वह बादशाह बन गया,
    पगड़ियों पर बुरी नीयतें हो गयीं।

    जख्म भी दर्द देते नहीं आजकल,
    कम सितमगर तेरी रहमतें हो गयीं।

    खुशनुमां एक चेहरा दिखा ख्वाब में,
    तबसे जागे न हम मुद्दतें हो गयीं।

    थी खबर आदमी हैं उधर राह में,
    जो भी गुजरा उसे आफ़तें हो गयीं।

    एक मुफ़लिस था वो रोटियाँ माँगकर,
    झोलियाँ भर गया नेमतें हो गयीं।

    शौक जबसे अमीरी का चढ़ने लगा,
    जो जरूरी न थीं, जरूरतें हो गयीं।

    उसको जो भी मिला चाहने लग गया,
    दिल की पूरी सभी मन्नतें हो गयीं।

    ले गयीं दाद सब वो सजी सूरतें,
    और खामोश सी सीरतें हो गयीं।

    दिल भी टूटा जहां ने भी रुसवा किया,
    इस कदर मेहरबां किस्मतें हो गयीं।

    डूबकर खुद हवस में बिके आदमीं,
    मुफ्त बदनाम ये दौलतें हो गयीं।

    वो मुहब्बत में बदनाम तो हैं मगर,
    खुश हैं यूँ मानिए शोहरतें हो गयीं।

    उसको तनहाइयों ने बिगाड़ा बहुत,
    उसकी खुद से बड़ी सोहबतें हो गयीं।

    गालियों गालियों जब लड़े आदमी,
    तब निशाना फ़क़त औरतें हो गयीं।

    मुस्कराकर जो तुम सामने आ गए,
    एक पल में जबां हसरतें हो गयीं।

    हाँथ में हाँथ ले साथ हम चल पड़े,
    दुनियाभर को बहुत दिक्कतें हो गयीं।

    संजय नारायण

  • तुम झूठ किसी और दिन बोलना

    सच कभी हमारा दामन नहीं छोड़ता 
    कोई भटकाव हमारा प्रण नहीं तोड़ता 
    जब भी विरोधाभास का आभास हुआ 

    हम कोई प्रतिक्रिया देते वक़्त नहीं भूले 
    अपने शब्दों को बोलने से पहले तोलना 

    फिर भी जाने क्यूँ कहने वाले कह ही गए 
    तुम झूठ किसी और दिन बोलना
    तुम झूठ किसी और दिन बोलना

    हमने फिर भी बेरुखी नहीं अपनायी 
    लाख चाहे लफ़्ज़ों के हेर फेर की 
    अक्सर बेतरतीबी से चोट खायी 

    लेकिन सम्मान देने की खातिर 
    हमने कभी फटे में टांग न अढ़ाई 

    क़श्मक़श में दिल से जो बात की
    बस अपने दिल से ये आवाज़ आयी 

    कभी अपने इस बड़ी कमज़ोरी का 
    तुम राज़ किसी के आगे नहीं खोलना

    फिर भी जाने क्यूँ कहने वाले कह ही गए 
    झूठ किसी और दिन बोलनातुम
    तुम झूठ किसी और दिन बोलना

  • धैर्य

    चारो तरफ कयामत ही कयामत है।
    जिधर देखो करोना के ही क़हर है।।
    महामारी में जी रहे है हम और आप।
    फिर भी उम्मीद के किरण जलाए बैठे है।।
    आज नहीं तो कल होंगे कामयाब हम।
    बस कुछ और धैर्य रखने की जरूरत है ।।

  • धधक रहा है मुल्क

    धधक रहा है मुल्क, और कुछ आग मेरे सीने में।
    वफ़ादारी खून में नहीं तो फिर क्या रखा जीने में।

    वतन परस्ति से बढ़कर, और कोई इबादत नहीं,
    वतन परस्ति का सुकून, न काशी में न मदीने में।

    सियासत के ठेकेदार, देश जला सेंक रहे हैं रोटी,
    हमारे घरों में रोटी, मिलती मेहनत के पसीने में।

    अच्छे ताल्लुकात हैं उनसे जिन्हें मैं जानता हूँ, वो
    पत्थर नहीं फेंकते, चढ़ ऊँची इमारत के ज़ीने में।

    बिखरना लाज़मी है, जब मजहबी दरार पड़ जाए,
    डूबने से बच नहीं सकते, गर छेद हो सफ़ीने में।

    देवेश साखरे ‘देव’

    ज़ीना- सीढ़ी, सफ़ीना- नाव

  • तन्हाई हमें रास आने लगी

    महफ़िलों से डर लगने लगा,
    तन्हाई हमें रास आने लगी
    दोस्तों में हमें ऐ ख़ुदा,
    दुश्मनी की बांस आने लगी
    समझा था जिसे अपना हमसफ़र,
    उसी ने बदल दी है अपनी डग़र
    दो राहे पे हमें छोड़कर,
    चल दिये वो मुंह मोड़कर
    आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी
    दोस्तों में हमें ऐ ख़ुदा दुश्मनी की बांस आने लगी

    सपने मिट गए, अरमां लुट गए,
    भरे बाज़ार में हम तो लुट-पिट गए
    जब लुट गए तब लगी थी ख़बर,
    हमीं को हमारी लगी थी नज़र
    जुबां चुप थी, आंखें मग़र सब राज़ कहने लगी
    दोस्तों में हमें ऐ ख़ुदा ……

  • जुबां जो कह नहीं सकती..

    जुबां जो कह नहीं सकती
    आंखें वो राज़ कहती हैं।
    दिल में जो कुछ भी चलता है
    धड़कनें आवाज करती हैं ।
    लगाए लाख भी पहरे
    दिलों पर चाहे जमाना,
    मोहब्बत तोड़कर पहरे
    दिल को आजाद करती है।
    मिले ना दुनिया की शोहरत
    सच्चा दिलदार मिल जाए।
    जहां में प्यार की दौलत ही
    सच में आबाद करती है।
    किसी को टूट कर चाहो
    अगर वो छोड़ दे दामन,
    एक तरफा मोहब्बत ही ‘प्रज्ञा’
    जलाकर खाक करती है।

  • दीवाने

    तलाशी जिस्म की खुलेआम दे दी।
    सब दिखाया पर दिल दिखाया नहीं।

    ढूढ़ते रहे हार के लौटना पड़ा सबको,
    जब हाथ लगाया दिल धड़काया नहीं।

    ढूंढते ढूंढते रात दिन हाथ से निकले,
    रूह में रहे वो हम ही को बताया नहीं।

    सबके सामने खुले आम जीते रहे हम,
    हमने तो सच किसी से छिपाया नहीं।

    उनकी यादों में दीवाने हुए इस कदर,
    आँखों को भिगाया राही सुखाया नहीं।

    राही अंजाना

  • क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर

    अब तो घर में भी रहना कारावास है
    क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर।
    देख विरयानी में भी है खिचड़ी का स्वाद
    क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर।।
    क्यों अनजाना -सा लगता है अपना शहर
    क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर।
    बड़ी मुश्किल -सी लगती ज़िन्दगी वसर
    क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर।।

  • कोई एक दीवाना

    मुद्दत बाद ए दोस्त भेजा उसने मेरे नाम इश्क़ ए पैगाम।
    गुजर गया वो जमाना कभी याद करते थे उनको सुबह शाम।।
    न मै बेवफा थी न वो बेवफा था बेवफा था ए ज़ुल्मी जमाना।।
    सोचा था मुकद्दर साथ देगा ए दोस्त निकला वह भी बेगाना।।
    कुदरत के तमाशा तो देखिए मै कहाँ आज वो कहाँ
    सूखे पत्तों पे मेंहदी के रंग चढाने चले है फिर कोई एक दीवाना।।

  • जुस्तजू

    आज की रात कयामत की रात है।
    गर तुम हो मेरे साथ तो जन्नत की बात है।।
    थी जुस्तजू तुम्हें पाने को मगर।
    क्या करू सब की अपनी मुकद्दर है।।
    डर है मुझे कहीं ए चिराग बुझ न जाए।
    इसलिए हवा के रुख बदलने का इरादा है।।

  • बे-वफा

    उनके मस्त अदाओं के जाल में,हम गिरफ्तार हो गए।
    जुस्तजू के मेले में हमारी मुकद्दर, हम से ही खफ़ा हो गए।।
    वफा से बे -वफा बनेंगे वो , हमने ऐसा सोचा ही कब था ।
    हम तो बस उनके लिए छोटा सा महल बनाने में लग गए।।
    बने थे कभी वो मेरे दोस्त, मेरे हमदम, मेरे इब्तिदा ।
    उनके मुस्कान को हम इश्क़ के सिलसिला समझने लग गए।।

  • गलतफहमियों के बीज

    गलतफहमियों के बीज अविश्वास से पनपते हैं
    अधसुनी बातों को लोग पूरा सच समझते हैं

    बड़े तो हो चले हैं हम अपनी नजरों में प्रज्ञा !
    ना जाने लोग क्यों मुझे अभी छोटा ही समझते हैं

    जीने की उम्मीद खत्म हो चुकी है मगर जिंदा अभी हैं हम
    ये बात समझ ना आई! वो मुझे मुर्दा क्यों समझते हैं?

    दाग दर्पण में है चेहरे पर मेरे एक भी नहीं
    फ़क़त इतनी-सी बात वो क्यों नहीं समझते हैं

    उलझे हैं हम या हमारी जुल्फों में कई राज
    इस रहस्य के धागे कभी क्यों नहीं सुलझते हैं

    सामना कभी तो होगा उनका मेरी वफा(पवित्रता)से
    अभी तो दामन को मेरे वो मैला ही समझते हैं

    गम छुपाने के लिए हम जो जरा हंस बोल देते हैं
    हंसी तो छोड़ो उन्हें मेरे आंसू भी खटकते हैं

    जो दो-चार गजलें हम अपनी तन्हाई में लिखते हैं
    कुछ नासमझ हैं जो इसको प्रेमपत्र समझते हैं

    प्रेमपत्र तो लिखकर प्रेषित किया जाता है
    हम तो अपने जज़्बात कविताओं में निचोड़ देते हैं।

  • मौजूदा हालात पे ग़ज़ल

    आदाब

    मुफ़लिसों को क्यों मिली है जिंदगी
    बारहा ये सोचती है जिंदगी

    ज़िंदगी जैसे मिली ख़ैरात में
    ऐसे उनको देखती है जिंदगी

    इस जहाँ में बुज़दिलों के वास्ते
    बस क़ज़ा है, तीरगी है ज़िन्दगी

    ख़ुदकुशी से क्या मिला है आज तक
    सामना कर कीमती है जिंदगी

    बंद आँखों से कभी सुन सरगमें
    इक सुरीली बाँसुरी है जिंदगी

    दिल में हो उम्मीद की कोई किरन
    रौशनी ही रौशनी है जिंदगी

    हर घड़ी तैयार रहना ‘आरज़ू’
    इम्तिहानों से भरी है जिंदगी

    आरज़ू

  • बेटियों पर एक ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    दौलत नहीं, ये अपना संसार माँगती हैं
    ये बेटियाँ तो हमसे, बस प्यार माँगती हैं

    दरबार में ख़ुदा के जब भी की हैं दुआएँ,
    माँ बाप की ही खुशियाँ हर बार माँगती हैं

    माँ से दुलार, भाई से प्यार और रब से
    अपने पिता की उजली दस्तार माँगती हैं

    है दिल में कितने सागर,सीने पे कितने पर्बत
    धरती के जैसा अपना, किरदार माँगती हैं

    आज़ाद हम सभी हैं, हिन्दोस्ताँ में फिर भी,
    क्यों ‘आरज़ू’ ये अपना अधिकार माँगती हैं?

    आरज़ू

  • जिसे सर झुकाने की आदत नहीं है

    जिसे सर झुकाने की आदत नहीं है
    उसे हर बशर से मोहब्बत नहीं है

    दुःखा दिल किसी का ख़ुशी मैं मनाऊँ
    मेरे दिल की ऐसी तो फ़ितरत नहीं है

    वो अपने किए पर पशेमां बहुत है
    नज़र भी मिलाने की हिम्मत नहीं है

    बहा आई दरिया में लख़्त ए जिगर को
    ज़माने से लड़ने की ताक़त नहीं है

    समझ आ चुका है ये रिश्तों का मतलब
    किसी आसरे की ज़रूरत नहीं है

  • मेरे दिल का नज़राना

    कभी मायूस होती हूँ कभी बेचैन होती हूँ
    मगर तेरी मोहब्बत में डूबी दिन-रैन होती हूँ,
    कभी बातें कभी यादें कभी तन्हाई में तुझको
    भुलाकर सब ओ मेरी जान सिर्फ तुझमें ही खोती हूँ ।
    ——————————————————-
    मेरे दिल का नजराना मुबारक हो तुम्हें साहिब
    मेरे किस्से मेरे सपने मुबारक हो तुम्हें साहिब
    जो ना दे सके तुमको चाहकर भी मेरे हमदम,
    वो खुशियां और वो मंजिल मुबारक हो तुम्हें साहिब।
    ——————————————————
    इश्क फरमाते हो तुम भी इश्क फरमाते हैं हम भी
    जरा पास आते हो तुम भी जरा पास आते हैं हम भी
    बहुत मजबूर हैं हम यार दुनिया के उसूलों से,
    अतः खामोश हो तुम भी अतः खामोश हैं हम भी ।

    मोहब्बत ही मोहब्बत है तेरे जानिब मेरे जानिब
    शरारत ही शरारत है तेरे जानिब मेरे जानिब
    नजर आती हैं जब तेरी नजरें मेरी नजरों को,
    आग ही आग लगती है तेरे जानिब मेरे जानिब।

  • कड़ाई से लड़ाई

    आओ साथी करे हम कोरोना पे कड़ाई।
    यही से होगी हमारी भारत की लड़ाई ।।
    वार पे वार हम सहते गए,अब न सहेंगे ।
    चलो चलें हम करे पीड़ितों की भलाई।।
    यही बनता है हमारा अपना परम धरम ।
    इसी में छिपी है मानवता की सच्चाई ।।

  • वफा से बे – वफा

    माथे पे आज पसीना के बूंद आया है क्यों।
    जो कल तक थे हमारे आज अजनबी है क्यों।।
    दामन – ए – यार का जब साथ पकड़ा था मैने।
    हल्की मुस्कान से हम पर वार किए थे क्यों।।
    जन्म जन्म का वादा था साथ निभाने का ।
    आज वादे को कबर में दफना के मुस्करा रहे है क्यों।।
    गैर के हाथों में है आज उनके नाजुक से हाथ।
    वफा के दिलासा दिलाने वाली तू बे-वफा बनी क्यों।।
    सोचा था सारी खुशियां तुम्हारे दामन में डाल दूँगा।
    ए मेरे खुदा मेरी मुहब्बत में तूने नजर लगायी ही क्यों।।

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल
    ——-
    दूरियां ,नज़दीकियां, खुशफहमियां तेरे साथ में,
    हम मिले ना थे कभी पर बह गए जज्बात में।

    1. मौसमै अंदाज था कुछ खास था उस रात में,
    थे गिरफ्त में इश्क के उस बेवजह सी बात में।
    थी नहीं मंजूर हद …इश्क की बरसात में,
    दूरियां नजदीकियां खुशफहमियां तेरे साथ में……

    2. जब्बे सैलाबे मोहब्बत ले रहा उफान था,
    धड़कने बेकाबू थी दिल में अजब तूफ़ान था।
    तेरी आहट देती थी बस.. दिल को थोड़ा सा सुकून,
    बेजुबा सी थी मुहब्बत और मुझे तेरा सुरूर।
    दूरियां नजदीकियां खुशफहमियां तेरे साथ में……

    3. हो हकीकत तो निगाहों से बयां हो जाती वो,
    सपना था बंद आंखों का बस याद बन आ जाता वो,
    रात भर तारे चमकते चांद बन छा जाता वो,
    जुगनू बन गुनगुन वो करता
    अक्स सा छप जाता वो।

    दूरियां नजदीकियां खुशफहमियां तेरे साथ में….

    4. दरमियां था फासला इस छोर से उस छोर तक,
    दिलकशी थी बस धुआं था , छा गया पुरजोर जो।
    बेकरारी तुझ को पा लू
    दूरियां अपनी जगह
    धड़कने गाती थी सरगम, बेख्याली हर जगह।
    दूरियां नज़दीकियां खुशफहमियां तेरे साथ में……

    निमिषा सिंघल

  • इंसानियत के दुश्मन

    जो इंसानियत की दुश्मन बन जाये, वो जमाअत कैसी।
    खुदा ने भी लानत भेजी होगी, इबादत की ये बात कैसी।

    खुद की नहीं ना सही, अपनों की तो परवाह कर लेते,
    जिन्हें अपनों की परवाह नहीं, दिलों में जज़्बात कैसी।

    जहाँ जंग छिड़ी मौत के खिलाफ, जिंदगी बचाने को,
    वहाँ मौत के तांडव की, फिर से नई शुरुआत कैसी।

    मौत किसी का नाम पूछ कर तो, दस्तक नहीं देती,
    ये कोई मजहबी खेल नहीं, फिर यह बिसात कैसी।

    जूझ रहे कई कर्मवीर, हमारी हिफाज़त के लिए,
    मदद ना सही, फिर मुसीबत की ये हालात कैसी।

    घरों में महफ़ूज रहें, मिलने के मौके और भी मिलेंगे,
    जहाँ मिलने से मौत मिलती हो, फिर मुलाक़ात कैसी।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • आज कल सोंचता बहुत है दिल ये मेरा

    पेश है आपकी खिदमत में:-
    गज़ल
    आज कल सोंचता बहुत है दिल ये मेरा
    तुझे भूलूँ या कैद दिल में करूँ
    ————————
    दिल लगा लूँ या जान छुड़ा लूँ तुमसे
    आज कल सोंचता बहुत है दिल ये मेरा
    ————————–
    गज़ल सुना के सुलाये हैं मैनें जो एहसास
    उन्हें जगा लूँ या सुला दूँ है बड़ी उलझन
    —————————-
    भूल जाना भी तूझे है ना आसान इतना
    दिल में बसता है तू अर्से से तुझे नहीं है खबर
    ——————————
    तुझे भी इल्म है इस बात का नहीं मालूम
    कितनी बेबस हूँ तेरे बिन तुझे नहीं है फ़िकर
    ———————————
    तुझे छुपा लूँ आँखों में,लिपट जाऊँ मैं
    आज कल सोंचता बहुत है दिल ये मेरा।

  • ग़ज़ल। सभी को मौत के डर ने ही..

    आदाब

    सभी को मौत के डर ने ही ज़िंदा रक्खा है
    ख़ुदाया फिर भी ये इंसाँ इसी से डरता है

    हमारी साँस भी चलती उसी की मर्ज़ी से ही
    जहाँ में पत्ता भी उसकी रज़ा से हिलता है

    हमेशा आस का दीपक जला के रखना तुम
    अँधेरे रास्ते है, तू सफ़र पे निकला है

    वो सारे चल पड़े थे, तिश्नगी लिये अपनी
    किसी ने कह दिया सहरा में कोई दरिया है

    ज़मी पे अजनबी भी अजनबी नहीं होता
    बुलंदी पे जो है अक्सर अकेला होता है

    ये ज़िंदगी है, इसे नासमझ सा बन के जी
    जहाँ में कौन है जो ज़िंदगी को समझा है

    रहे न एक भी शिकवा न ‘आरज़ू’ कोई
    बता दे ज़िंदगी को ये कि ज़िंदगी क्या है

    आरज़ू

  • राह भूल सी गई है हमको

    राह भूल सी गई है हमको
    जो छोड़ आओ, तो बात बने

    मंज़िल की सरहद पर दीया
    जो छोड़ आओ, तो बात बने

    मेरी तेरी या उसकी बातें
    जो छोड़ आओ, तो बात बने

    ढाई आखर हर देहरी पर
    जो छोड़ आओ,तो बात बने

  • हिन्दी गजल

    गम के आँसू सदा हीं बरसता रहा।
    मेरा जीवन खुशी को तरसता रहा।।
    मैंने मांगा था कोई ना सोने का घर
    प्यार की झोपड़ी को तरसता रहा।
    ना तुम्हारा रहा ना हमारा रहा
    गेन्द-सा दिल हमेशा उछलता रहा।।
    गैर की है दुनिया में तेरी खुशी ,फिर
    तेरा मन मेरे मन को काहे लपकता रहा।
    जरा बचके निकलना ‘विनयचंद ‘यहाँ
    प्यार की राह अश्कों से धधकता रहा।।

  • क्या हुआ है शहर को आख़िर

    आप सब की नज़र को आख़िर ,
    क्या हुआ है शहर को आख़िर .

    नफरतों की लिए चिंगारी ,
    लोग दौड़े कहर को आख़िर .

    चाँदनी चौक की वह दिल्ली ,
    आज भूखी गदर को आख़िर .

    मजहबी क्यों सियासत करके ,
    घोलते हो ज़हर को आख़िर .

    जिस्म से दूर रहकर भरसक ,
    रूह तड़पी सजर को आख़िर .

    ज़िन्दगी का हिसाब क्या दें ,
    जिंदगी भर बसर को आख़िर .

    ऐ ज़मानों वफ़ा मत परखो ,
    फैशनों में असर को आख़िर .

    खामखाँ प्यार करके ‘रकमिश’ ,
    रौंद बैठे जिगर को आख़िर .

    -रकमिश सुल्तानपुरी

  • Maatam Manaiye

    दिल के टूटने का भी, क्या मातम मनाइए
    किस को है सारोकार, ज़रा कम मनाइए

    वो फिर किसी के दिल को, शीशे सा तोड़ेंगे
    उस बदनसीब का अभी से गम मनाइए

  • रुबाई

    कभी सोचा ना हो वह काम हो जाता है,
    जो करीब है वह दूर चला जाता है।

    मासूम सा चेहरा इन नाज़ुक-ए- हथेलियों से,
    हिना का रंग-चंद अश्कों से उतर जाता है।

    फरेब करने वाले खुश रहते हैं नसीहत से,
    ईमान ताउम्र का गम खरीद लाता है।

    ना कुछ पास था बस सच्ची मोहब्बत थी,
    अब तो प्यार करने वाला भी बेईमान नजर आता है।

    ना सोंच पास है जो कल भी नजर आएगा,
    साया है करीब आके बड़ी दूर चला जाता है।

    जो लब-ए- रुखसार बोलने में थर-थराते हैं,
    उन्हीं के हाथों से तेरा जनाजा सजाया जाता है।

  • हादसा

    तेरी दुआओं का असर है,
    वरना मैं तो मरने वाला था।

    एक हादसा जो टल गया,
    सर से जो गुजरने वाला था।

    जिंदा तो हूं पर हाथ नहीं है,
    वरना मांग तेरी भरने वाला था।

    आवाज तुमने भी दिया नहीं,
    वरना मैं तो ठहरने वाला था।

    ख़ैर, जहां भी रहो खुश रहो,
    जिंदगी नाम तेरे करने वाला था।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • नज़रे-करम

    मोहब्बत की कर नज़रे-करम मुझ पर।
    यूँ ना बरपा बेरुख़ी की सितम मुझ पर।

    तेरी मोहब्बत के तलबगार हैं सदियों से,
    अपनी मोहब्बत की कर रहम मुझ पर।

    न मिलेगा मुझसा आशिक कहीं तुझे,
    तेरी तलाश कर बस ख़तम मुझ पर।

    तोड़ दे गुरूर मेरा, गर तुझे लगता है,
    पर ना तोड़ अपनी क़लम मुझ पर।

    एक तू ही है, नहीं कोई और जिंदगी में,
    आज़मा ले, पर ना कर वहम मुझ पर।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • तुम पास नहीं

    वाह रे कुदरत तेरा भी खेल अजीब।
    मिलाकर जुदा किया कैसा है नसीब।

    जब सख्त जरूरत होती है तुम्हारी,
    तब तुम होती नहीं हो, मेरे करीब।

    सब कुछ है पास मेरे, पर तुम नहीं,
    महसूस होता है, मैं कितना हूं गरीब।

    या खुदा, ये इल्तज़ा करता है ‘देव’,
    वस्ले-सनम की सुझाओं कोई तरकीब।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • अफ़सोस

    किसी को देख, ना कर अफ़सोस ।
    यूँ ना अपनी किस्मत को तू कोस ।

    भले ही तन से नहीं हैं हम पास,
    भले ही ना ले सकूँ तुझे आगोश ।

    पर मन तो एक दूजे के पास ही है,
    दिल की सदा सुन, ज़ुबां है ख़ामोश।

    ख़ुदा ने एक दूजे के लिए ही बनाया,
    आंखें मूंद, नज़र आएगी फ़िरदौस।

    देवेश साखरे ‘देव’

    सदा- आवाज़, फ़िरदौस- स्वर्ग

  • अमन चैन न हो

    हिन्दी गजल- अमन चैन न हो
    सियासत कैसी जिसमे अमन चैन ना हो |
    साजिस ऐसी जहा भाई से भाई प्रेम ना हो |
    समझते है हम सब जिसे मसीहा अपना |
    लगे धारा एक सौ चौवालिस जुलूस बैन ना हो |
    चमकाने सियासत किस हद तक जाएँगे |
    आलाप बेसुरा राग जिसमे कोई धुन ना हो |
    सही को बताकर गलत हासिल होगा ना कुछ |
    बनेगा कैसे रहनुमा जिसमे कोई गुण ना हो |
    लड़वाकर भाई से भाई को तुम भी ना बचोगे |
    खुलेगा नहीं खाता कुर्सी अच्छा सगुण ना हो |
    अबतक बनाया उल्लू अब ना बना सकोगे |
    नचाओगे कैसे सबको हाथो जब बिन ना हो |
    डर है तुमको जमीन अपनी खिसकने का |
    दिखेगा दूर तलक कैसे पास दूरबीन ना हो |
    फैलाकर दंगा फसाद कुल्हाड़ी पैरो ना मारो |
    रहोगे खड़ा कैसे तले पैरो जब जमीन ना हो |
    समझो देश की नब्ज आबो हवा को तुम |
    रहनुमा वही सर जिसके जुर्म संगीन ना हो |

    श्याम कुँवर भारती [राजभर] कवि ,लेखक ,गीतकार ,समाजसेवी
    बोकारो झारखंड

  • क्या लीजिएगा

    कहिए हुज़ूर और क्या लीजिएगा।
    दिल तो ले चुके अब जाँ लीजिएगा।

    तुम्हें हमसे मोहब्बत है या फिर नहीं,
    फैसला जो भी लो बजा लीजिएगा।

    मेरी ज़ुबाँ पर बस एक तेरा ही नाम,
    नाम मेरा भी तेरी ज़ुबाँ लीजिएगा।

    डूब ना जाऊँ कहीं गम के पैमाने में,
    जाम आँखों से छलका लीजिएगा।

    खो ना जाऊँ ज़हाँ की भीड़ में कहीं,
    अपनी आगोश में समा लीजिएगा।

    ‘देव’ जीना मरना रख छोड़ा हाथ तेरे,
    गर साथ जीना हो तो बचा लीजिएगा।

    देवेश साखरे ‘देव’

    बजा- ठीक,

  • गलतफहमी

    तीरे-नज़र से दिल जार-जार हुआ।
    ऐसा एक बार नहीं, बार-बार हुआ।

    देख उनकी तीरे-निगाहें, ऐसा लगा,
    कि उन्हें भी हमसे, प्यार-प्यार हुआ।

    करीब आते, हकीक़त से वास्ता पड़ा,
    मोहब्बत नहीं, दिल पे वार-वार हुआ।

    जिंदगी की रहगुज़र में ‘देव’ अकेला,
    ना कोई हमसफर, ना यार-यार हुआ।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • तिजारत बन गई है

    तालीम और इलाज, तिजारत बन गई है।
    कठपुतली अमीरों की, सियासत बन गई है।

    मज़हबी और तहज़ीबी था, कभी मुल्क मेरा,
    वह गुज़रा ज़माना, अब इबारत बन गई है।

    लोग इंसानियत की मिसाल हुआ करते कभी,
    आज दौलत ही लोगों की इबादत बन गई है।

    धधक रहा मुल्क, कुछ आग मेरे सीने में भी,
    दहशतगर्दों का गुनाह हिक़ारत बन गई है।

    यहाँ कौन सुने दुहाई, कहाँ मिलेगी रिहाई,
    ज़ेहन ख़ुद-परस्ती की हिरासत बन गई है।

    देवेश साखरे ‘देव’

    तिजारत- व्यापार, इबारत- अनुलेख,
    इबादत- पूजा, हिक़ारत- तिरस्कार,

  • पूस की रात

    फकीर बन तेरे दर पर आया हूं
    एक मुट्ठी इश्क बक्शीश में दे देना

    आशिक समझ दर से खाली ना भेजना
    अमीर हो तुम चंद सांसे उधार दे देना

    किस्मत की लकीरें हैं जुड़ी तुझ संग
    ख्वाहिशों से भरी है झोली चंद आरजू दे देना

    दुआओं में तुमको ही है मांगा सनम
    कुछ चंद लम्हों का एहसास भर दे देना

    दिल- ए- मरीज हूं तेरी जुस्तजू का जानां
    रहमों करम ना सही इश्क- ए- दर्द दे देना

    पूस की रात में सर्द हवाओं के अलाव में
    बस एक शाम तुम अपनी उधार दे देना।।

  • ज़िन्दगी रंगीन हो जाता

    कर गुज़रता कुछ तो, ज़िन्दगी रंगीन हो जाता।
    जो किया ही नहीं, वो भी ज़ुर्म संगीन हो जाता।

    मैं क्या हूँ, ये मैं जानता हूँ, मेरा ख़ुदा जानता है,
    आग पर चल जाता तो, क्या यकीन हो जाता।

    कुसूर बस इतना था, मैंने भला चाहा उसका,
    काश ज़माने की तरह, मैं भी ज़हीन हो जाता।

    तोहमतें मुझ पर सभी ने, लाख लगाई लेकिन,
    ज़माने की सुनता गर मैं, तो गमगीन हो जाता।

    नशे में जहाँ है, मैं भी गुज़रा हूँ, उन गलियों से,
    सम्भल गया वरना, ‘देव’ भी शौकीन हो जाता।

    देवेश साखरे ‘देव’

    ज़हीन- intelligent,

  • नही मिलते

    ये रास्तें है कैसे हमसफ़र नही मिलते,
    छूट गए जो पीछे उम्र भर नही मिलते!

    सूख चूके है उनके दीदार के इंतजार में,
    हरे-भरे अब ऐसे शजर नही मिलते!

    तार-तार होते रिश्तों पर खड़ी दीवार हो गई,
    मोहब्बत हो जहां अब ऐसे घर नही मिलते!

    एक दूजे की मुसीबत में काम आए कोई,
    दरिया दिल लोग अब मगर नही मिलते!

    मिल जाये ठिकाना इस उखड़ती सांस को,
    न गांव मिलते है अब और शहर नही मिलते!

    वक्त की भीड़ में न जाने रातें कहाँ खो गई,
    चैन की नींद मीले ऐसे पहर नही मिलते !

    दिखावे की चाह ने आखिर वृद्घालय ढूंढ ली,
    तभी तो “नील”बुजुर्ग महलों पर नही मिलते!
    **************************************
    स्वरचित-राजेन्द्र मेश्राम “नील”

  • कहीं खामोश लम्हा है

    कहीं खामोश लम्हा है,कहीं ये शोर कैसा है,
    कहीं पर शाम मातम की,ये सुख का भोर कैसा है!

    कहीं मासूम जलते है ,पिघलते मोम के जैसे,
    सियासत का कहीं झगड़ा,बढ़ा हर ओर कैसा है!

    कहीं दुत्कार, नफरत है,कहीं विषदार ईर्ष्या है,
    दिखावे का कहीं देखों,धुँआ घनघोर कैसा है!

    कहीं जज्बात जलता है,हमारा शुष्क पत्तों सा,
    कहीं रोना कहीं हंसना,दिखाना चोर कैसा है!

    बड़ा अफसोस है मुझको,ये ताकत खो रहे है हम,
    बना है खून अब पानी, ये खुद पर जोर कैसा है !
    **************************************
    रचना-राजेन्द्र मेश्राम “नील”

  • मार गई मुझे

    तेरी अदाएँ, तेरी नज़ाकत मार गई मुझे।
    तेरी शोख़ियाँ, तेरी शरारत मार गई मुझे।

    बेशक मोहब्बत है, पर डरता हूँ इज़हार से,
    मेरी खामोशी, मेरी शराफ़त मार गई मुझे।

    मैं करना चाहता था, अकेले दिल की बातें,
    पर तेरे दोस्तों की, जमाअत मार गई मुझे।

    तेरी नज़रें बहुत कुछ कहना चाही मगर,
    मेरी नादानी, मेरी हिमाक़त मार गई मुझे।

    दिल चाहता है तेरी धड़कने महसूस करना,
    गले में तेरी बाहों की हिरासत मार गई मुझे।

    देवेश साखरे ‘देव’

    जमाअत- मंडली, हिमाक़त- बेवकूफी

  • हम मिलें

    तोड़ कर हद , ज़माने की ,
    हम कहीं दूर , सितारों में मिलें ,

    बहा लाए , वहीं , वक़्त फिर से ,
    बिछड़ी कश्ती से हम, किनारों पे मिलें ,

    हों , रस्म-ए-दुनिया , से रिहा हम-तुम ,
    साथ गुलशन में जब , बहारों में खिलें ,

    छोड़ जाए , ये ज़िक्र , हीना की खुशबू ,
    फूल जब-जब , तेरी किताबों में मिलें ,

    तोड़ कर हद , ज़माने की ,
    हम कहीं दूर , सितारों में मिलें ।

  • Aye Sanam

    Aye sanam mujko rulane ki, zarurat kya thi
    Tumko jaana hi tha to aane ki, zarurat kya thi
    mujko kehthe the ki, tum hi meri zindagi ho
    phir tumko ye zamane ki zarurat kya thi

    By- Abdul sattar Najmi

  • Sharaab

    Ghol kar Shishe me pyaar peene de
    Thand bahuth hai cigaar peene de
    Na my masjid me na mandir me baitha hun
    Tere dar pe paada hun yaar peene de

    BY- Abdul Sattar Najmi

  • मेरे बस की बात नहीं

    तुम्हें भुला पाना, मेरे बस की बात नहीं,
    तुम्हें जिंदगी में ला पाना, मेरे बस की बात नहीं।

    तुम्हें बस देख कर ही जी लेंगे,
    तुम्हें बगैर देखे रह पाना, मेरे बस की बात नहीं।

    तुम ही पहली और आखरी मोहब्बत,
    पहली मोहब्बत भुला पाना, मेरे बस की बात नहीं।

    अगर तुम ना हुई कभी मेरी तो,
    किसी और को अपना पाना, मेरे बस की बात नहीं।

    दुनिया से दिल भर चुका मेरा,
    अब और जिंदा रह पाना, मेरे बस की बात नहीं।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • इस प्यार में

    बगैर प्यार के कुछ भी नहीं संसार में।
    वो कहते हैं क्या रखा है, इस प्यार में।

    हंसीन लगती यह दुनिया, प्यार होते ही,
    जहां की खुशियां सिमटी, इस प्यार में।

    कैसे दिलाएं तुम्हें एतबार, इस प्यार का,
    जां तक कुर्बान कर सकते, इस प्यार में।

    ना करेंगे, ना होने देंगे, रुसवा ‘देव’ तुम्हें,
    मोहब्बत को परस्तिश माना, इस प्यार में।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • मेरी रूह

    तू मेरी रूह में, कुछ इस तरह समाई है।
    के रहमत मुझपर, रब की तू ख़ुदाई है।

    तू नहीं तो मैं नहीं, कुछ भी नहीं, शायद
    तुझे पता नहीं, मेरा वजूद तुने बनाई है।

    तू यहीं है, यहीं कहीं है, मेरे आसपास,
    हवा जो तुझे छू कर, मुझ तक आई है।

    तेरी खुशबू से महकता है, चमन मेरा,
    तेरा पता, मुझे तेरी खुशबू ने बताई है।

    मैं भी इत्र सा महक उठा तेरे आगोश में,
    टूटकर जब तू, गले मुझको लगाई है।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • ख़ुदा पर यकीं

    ख़ुदा पर जो भी बंदा यकीं दिखाता है।
    तलातुम में फँसी वो सफीना बचाता है।

    कठपुतलीयों की डोर है उसके हाथों में,
    जाने कब, कहाँ, कैसे, किसे नचाता है।

    जो किरदार उम्दा निभा गया रंगमंच में,
    खुशियों का इनाम वो यक़ीनन पाता है।

    नसीब का लिखा, ना टाल सका कोई,
    किये का हिसाब वो ज़रूर चुकाता है।

    दौलत ना सही, पर दुआएं कमाई मैंने,
    बुरे वक़्त में ‘देव’ दुआएं काम आता है।

    देवेश साखरे ‘देव’

    तलातुम- समुद्री तुफान, सफीना- कश्ती

  • सजा ना सकूंगा

    अपनी ज़िंदगी फिर सजा ना सकूंगा।
    प्यार का साज फिर बजा ना सकूंगा।

    क्या मैं इतना मजबूर हो गया हूं,
    कि तुम्हें फिर बुला ना सकूंगा।

    क्या तुम इतनी दूर हो गई हो मुझसे,
    कि तुम्हें गले फिर लगा ना सकूंगा।

    अब आ भी जाओ और ना तड़पाओ,
    गमे-ज़ुदाई सीने में फिर दबा न सकूंगा।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • सर्द रातें

    ठिठुरती रातों में वो हवाएँ जो सर्द सहता है।
    किसे बताएँ मुफ़्लिसी का जो दर्द सहता है।

    ज़मीं बिछा आसमां ओढ़ता, पर सर्द रातों में,
    तलाशता फटी चादर, जिसपे कर्द रहता है।

    पाँव सिकोड़, बचने की कोशिशें लाख की,
    पर बच ना सका, हवाएँ जो बेदर्द बहता है।

    किसको इनकी परवाह, कौन इनकी सुनता,
    देख गुज़र जाते, कौन इन्हें हमदर्द कहता है।

    रोने वाला भी कोई नहीं, इनकी मय्यत पर,
    खौफनाक शबे-मंज़र, बदन ज़र्द कहता है।

    देवेश साखरे ‘देव’

    मुफ़्लिसी- गरीबी, कर्द- पैबंद,
    शबे-मंज़र- रात का दृश्य, ज़र्द- पीला

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