Category: ग़ज़ल

  • अदावत

    ऐसे भी रफ़ीक़ जो कयामत ढाते हैं।
    दावत देकर वो अदावत निभाते हैं।

    जान बनाकर जान लेने की कोशिश की,
    ज़ख्मों का सेज देकर अयादत आते हैं।

    ज़ुल्म करने से सहने वाला गुनहगार,
    यही सोच कर अब बगावत लाते हैं।

    ऐ दगा करने वाले, कुछ तो वफ़ा कर,
    दोस्ती पर से लोग अकीदत उठाते हैं।

    देवेश साखरे ‘देव’

    1.रफ़ीक़ – दोस्त, 2. अदावत – दुश्मनी, 3.अयादत – रोगी का हाल पुछना 4. अकीदत – आस्था

  • बुजुर्गों का साया

    बेशक दौलत बेशुमार नहीं कमाया है।
    मगर मेरे सर पर, बुजुर्गों का साया है।

    ज़हां की दौलत कम है, मेरे खजाने से,
    दुआओं का खजाना, मेरा सरमाया है।

    हादसा सर से गुजर गया, मैं बच गया,
    लगता है, दुआओं ने असर दिखाया है।

    पाँव में काँटा, कभी चुभ नहीं सकता,
    पाँव जिसने भी, बुजुर्गों का दबाया है।

    जन्नत सुना था, ज़मीं पर ही देख लिया,
    कदमों में इनके, जब भी सर झुकाया है।

    देवेश साखरे ‘देव’

    सरमाया- संपत्ति

  • गुरूर है

    देर मिलता है, पर मिलता जरूर है।
    किस्मत पे अपने, इतना तो गुरूर है।

    खामोशी मेरी, लगने लगी कमजोरी,
    रहम दिल हूं, बस इतना कुसूर है।

    छत है सर, फिर भी हूं बेघर,
    घर जिनके हैं, वो कितने मगरूर हैं।

    हैं सब, पर कोई भी नहीं अब,
    सोच है मेरी, या मेरा फितूर है।

    हर हाल में, करुं ना मलाल मैं,
    नफरत से तो ‘देव’ होते सभी दूर हैं।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • तसव्वुर तेरी

    कम्बख़त तसव्वुर तेरी की जाती नहीं है।
    भरी महफिल भी मुझे अब भाती नहीं है।

    जिंदगी तो अब बेसुर-ताल सी होने लगी,
    नया तराना भी कोई अब गाती नहीं है।

    पुकारूं कैसे, अल्फ़ाज़ हलक में घुटने लगे,
    सदा भी सुन मेरी तू अब आती नहीं है।

    कहकहे नस्तर से दिल में चुभने लगे,
    सूखी निगाहें अश्क अब बहाती नहीं है।

    संग दिल से दिल मेरा संगदिल हो गया,
    कोई गम भी मुझे अब रुलाती नहीं है।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • मायूस

    बड़े मायूस होकर, तेरे कूचे से हम निकले।
    देखा न एक नज़र, तुम क्यों बेरहम निकले।

    तेरी गलियों में फिरता हूँ, एक दीद को तेरी,
    दर से बाहर फिर क्यों न, तेरे कदम निकले।

    घूरती निगाहें अक्सर मुझसे पूछा करती हैं,
    क्यों यह आवारा, गलियों से हरदम निकले।

    मेरी शराफत की लोग मिसाल देते न थकते,
    फिर क्यों उनकी नज़रों में, बेशरम निकले।

    ख्वाहिश पाने की नहीं, अपना बनाने की है,
    हमदम के बाँहों में ही, बस मेरा दम निकले।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • किसे कदर देखेगा

    कुछ ऐसा कर जाएंगे, सारा शहर देखेगा।
    मेरे शहर का, अब हर एक बशर देखेगा।

    मेरे सितारे भी चमकेंगे एक दिन यकीनन,
    गुज़रूं जहां से, हर शख्स एक नज़र देखेगा।

    कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश है गर तुझमें,
    तो फिर क्या शब और क्या सहर देखेगा।

    चलना है ज़िंदगी, मुश्किलें हजार फिर भी,
    तेरा ज़ुनून अब यह लंबा सफर देखेगा।

    जिन्हें शक था ‘देव’ काबिलियत पर कभी,
    आज वह भी हैरत से किस कदर देखेगा।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • हमारी रूह पर क़ब्ज़ा जमाने आ गई फिर से।

    हमारी रूह पर क़ब्ज़ा जमाने आ गई फिर से।
    ये लड़की प्यार में पागल बनाने आ गई फिर से।।
    ,
    हमारे कब्र का रसता किसी से पूँछकर शायद।
    वो पागल नींद से हमको जगाने आ गई फिर से।।
    ,
    सुलाने को तो आई थी वो दुनियाँ साथ में लेकर।
    मगर अब बात क्या है जो उठाने आ गई फिर से।।
    ,
    सहारा हिज्र ने देकर हमें चलना सिखाया था।
    मुहब्बत वस्ल के किस्से सुनाने आ गई फिर से।।
    ,
    दफ़ा कोई करो उसको कहो ख़ुद सामने आये।
    ग़ज़ल का हुश्न ले कर के मनाने आ गई फिर से।।
    ,
    तुम्हारी रूह से साहिल उसे पीछा छुड़ाना है ।
    तभी वो रूह को ज़िन्दा जलाने आ गई फिर से।।
    #रमेश

  • सोचा न था

    सुन सदा मेरी, वो चल निकले।
    मेरे अपने ही संगदिल निकले।

    जिन पे भरोसा किया था हमने,
    वो भी साजिशों में शामिल निकले।

    ना रही कोई उम्मीद उनसे अब,
    मेरे जज़्बातों के, वो कातिल निकले।

    हम तो नादान, नासमझ ठहरे,
    समझदार हो, क्यों नाकाबिल निकले।

    हमें तैरने का हुनर आता नहीं,
    बीच मझधार छोड़, वो साहिल निकले।

    उन्हें अंदाजा है, ‘देव’ की ताकत का,
    पीठ पर वार कर, वो बुजदिल निकले।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • कहां जाओगे

    दस्तकश कहां जाओगे।
    क्या मुझे भूल पाओगे।

    मैं तो तुम्हारी आदत हूं,
    क्या आदत बदल पाओगे।

    ख्वाब में मैं, जेहन में मैं,
    हर-शू मुझे हर पल पाओगे।

    इतना आसां नहीं भूल पाना,
    बगैर मेरे संभल पाओगे।

    दिल से ‘देव’ पुकार तो लो,
    आज पाओगे, मुझे कल पाओगे।

    देवेश साखरे ‘देव’

    दस्तकश- हाथ छुड़ा कर

  • क्या है शबाब

    तुम्हें देख फीका लगने लगा माहताब।
    चुरा लिया तुमने, मेरी नींदें मेरे ख्वाब।

    शाने पे रख के सर, जुल्फों से खेलना,
    तुम्हें गले लगाकर जाना, क्या है शबाब।

    तुम्हारा समझाना, हद से न गुजर जाना,
    वरना संभल ना सकोगे, फिर तुम जनाब।

    यहां सीता भी ना बच सकी रुसवाई से,
    ना किया करो हंसकर, किसी को आदाब।

    इसे शिकायत कहो, या दिल-ए-मजबूरी,
    गलत ना समझना, मोहब्बत है बेहिसाब।

    ढल जाओ बस यूं ‘देव’ की चाहत में,
    दुनिया से लड़कर, मैं दे सकूं जवाब।

    देवेश साखरे ‘देव’

    शाने- कंधे

  • पहचान

    स्याह रात की चादर ओढ़ कर।
    खुद्दारी की सभी हदें तोड़ कर।

    निकला हूं गुमनामी में पहचान ढूंढने,
    शोहरत की सभी ख्वाहिशें छोड़कर।

    घरौंदा ख्वाब का कहीं बिखर न जाए,
    बुना था जो तिनका तिनका जोड़कर।

    ये भी एक वक्त है, वक्त गुज़र जाएगा,
    वक्त से आगे ना निकला कोई दौड़कर।

    हौसला तो है, कुछ कर गुजरने की ‘देव’,
    राह निकाल लूं दरिया का रुख मोड़ कर।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • मोहब्बत पे नाज़

    मोहब्बत का ऐलान, हम आज करते हैं।
    तुझपे जां कुर्बान, मोहब्बत पे नाज़ करते हैं।

    उन्हें इल्म है, हमारी मोहब्बत की हद का,
    जज़्बात से खेलकर, हमें नाराज करते हैं।

    ऐसे आज तक हमने चारागर नहीं देखे,
    खुद ही जख्म देकर, खुद इलाज करते हैं।

    अपनी मोहब्बत पर ‘देव’ हमें है पूरा यकीं,
    तुम्हें ही दिलसाज, तुम्हें ही हमराज करते हैं।

    देवेश साखरे ‘देव’

    चारागर-चिकित्सक

  • पयाम आया है

    महफ़िल में तेरे आने का पयाम आया है।
    हर ज़ुबान पर बस तेरा ही नाम आया है।

    सब कि नज़रें टिकी रही, तेरी ही राह पर,
    तेरी निगाहों से बस मुझे सलाम आया है।

    पढ़ती रही सारी बज़्म, तेरे हुस्न पे ग़ज़लें,
    तेरी ज़ुबां पर बस मेरा, कलाम आया है।

    तेरे हुस्न के चरचे होती रही दबी आवाज़,
    मेरे पहलू में देख तुझे, कोहराम आया है।

    सादगी की कद्र तो है, कद्रदानों के सदक़े,
    मेरी सादगी पर तुझे, एहतराम आया है।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • पयाम आया है

    महफ़िल में तेरे आने का पयाम आया है।
    हर ज़ुबान पर बस तेरा ही नाम आया है।

    सब कि नज़रें टिकी रही, तेरी ही राह पर,
    तेरी निगाहों से बस मुझे सलाम आया है।

    पढ़ती रही सारी बज़्म, तेरे हुस्न पे ग़ज़लें,
    तेरी ज़ुबां पर बस मेरा, कलाम आया है।

    तेरे हुस्न के चरचे होती रही दबी आवाज़,
    मेरे पहलू में देख तुझे, कोहराम आया है।

    सादगी की कद्र तो है, कद्रदानों के सदक़े,
    मेरी सादगी पर तुझे, एहतराम आया है।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • बाकी है

    साथ मेरे एक तू और तेरा प्यार बाकी है।
    बाकी सब बेजान चीजें बेकार बाकी है।

    हालात संग, लोगों के मिजाज बदल गये,
    टूटा हूँ, बिखरा नहीं, अभी धार बाकी है।

    कितने ही इम्तहानों से तो गुजर चूका हूँ,
    लगता अभी और वक्त की मार बाकी है।

    नजरें चुराकर चले हैं ऐसे, कि जानते न हो,
    लगता है जैसै, मेरा उन पर उधार बाकी है।

    हर एक शख्स से पूछा, पहचानते हो मुझे,
    कुछ तो मुकर गये, कुछ के करार बाकी हैं।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • और एक जाम

    खत्म न हो जश्ने-रौनक हँसीन शाम की।
    आ टकरा लें प्याला और एक जाम की।

    देखो साकी खाली ना होने पाए पैमाना,
    ले आओ सारी मय, मयकदे तमाम की।
    आ टकरा लें प्याला और एक जाम की।

    वक्त की क्या हो बात, जब दोस्त हों साथ,
    फिर किसे परवाह, हालाते-अंजाम की।
    आ टकरा लें प्याला और एक जाम की।

    कोई गम नहीं, फिर होश रहे या ना रहे ,
    पर्ची लिख छोड़ी जेब में, अपने नाम की।
    आ टकरा लें प्याला और एक जाम की।

    चार दिन की है ये जवानी, ये जिंदगानी,
    फिर ना तेरे काम की, ना मेरे काम की।
    आ टकरा लें प्याला और एक जाम की।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • मुहब्बत का खुमार

    तेरे आने से दिल को करार आया है।
    तुझे पाकर खुशियां बेशुमार पाया है।

    मैंने पी नहीं लेकिन, मैं नशे में चूर हूं,
    मुहब्बत का ये कैसा, खुमार छाया है।

    मौसमें भी अब रंगीन सी लगने लगी,
    पतझड़ ने भी कैसा, बहार लाया है।

    एक दूजे में हम, डूबे कुछ इस कदर,
    तू जिस्म है, तो मेरा आकार साया है।

    मेरी जिंदगी तो है, एक खुली किताब,
    फिर क्यों लगता, असरार छिपाया है।

    तेरे सिवा कोई और नज़र आता नहीं,
    निगाहों में बस तेरा, निगार बसाया है।

    देवेश साखरे ‘देव’

    1. असरार-भेद, 2. निगार-छवि

  • छोड़ दिया

    मैंने ज़ाम से ज़ाम टकराना छोड़ दिया।
    यारों मैंने पीना – पिलाना छोड़ दिया।

    खबर जो फैली, कि मैं हो चला बै-रागी,
    दोस्तों ने महफ़िल में बुलाना छोड़ दिया।

    दोस्ती का मतलब जानता हूं मैं, लेकिन,
    मतलब कि दोस्ती निभाना छोड़ दिया।

    हुए क्या ज़रा जो दूर, हम महफ़िल से,
    मुश्किलों में मिलना मिलाना छोड़ दिया।

    दोस्तों पे दोस्ती निसार है आज भी ‘देव’,
    दोस्तों ने दोस्ती आजमाना छोड़ दिया।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • Mere khyabo me tum roj chale ate ho

    मेरे ख्वाबों में तुम रोज चले आते हो ,
    ख्वाब टूटते ही तुम दूर चले जाते हो,

    जिंदगी बेजान न हुई होती इतनी ,
    छोड़कर अगर तुम न जाते मुझको,

    तेरी तस्वीर इन आंखों में उतार बैठे हैं,
    ऐसा लगता है तुम्हें मीत बना बैठे हैं ,

    तेरे बिना जीना मुझे गवारा ही नहीं,
    मैं तेरी हूं तेरी ही रहूंगी तूने यह जाना ही नहीं,

    यह तन्हाई मुझे जीने भी देंगी नहीं,
    चले आओ क्यों रूठे हो मेरे भोले सनम….

  • Mere khyabo me tum roj chale ate ho

    मेरे ख्वाबों में तुम रोज चले आते हो ,
    ख्वाब टूटते ही तुम दूर चले जाते हो,

    जिंदगी बेजान न हुई होती इतनी ,
    छोड़कर अगर तुम न जाते मुझको,

    तेरी तस्वीर इन आंखों में उतार बैठे हैं,
    ऐसा लगता है तुम्हें मीत बना बैठे हैं ,

    तेरे बिना जीना मुझे गवारा ही नहीं,
    मैं तेरी हूं तेरी ही रहूंगी तूने यह जाना ही नहीं,

    यह तन्हाई मुझे जीने भी देंगी नहीं,
    चले आओ क्यों रूठे हो मेरे भोले सनम….

  • अंजान सफर

    मंज़िल पता नहीं, निकला हूं अंजान सफर में।
    अमृत ढुंढने निकला हूं , दुनिया भरी ज़हर में।

    इंसानियत बांध कर सभी ने, रख दी ताक पर,
    डरता हूं कहीं गिर ना जाऊं, खुद की नज़र में।

    नज़रें चुराकर चले हैं जो, ज़ुल्म होता देखकर,
    आईना बेचने निकला हूं मैं, अंधों के शहर में।

    आबरू महफूज़ है, ना कोई जाने- हाफ़िज़ है,
    लूटने के बाद निकले हैं लेकर, शम्मा डगर में।

    ख़ुदा भी खुद रोया होगा, हालाते-जहां देखकर,
    ऐसी तो न सौंपी थी दुनिया, ‘देव’ मेरी खबर में।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • दौर आ चला है

    देखो फिर किचड़ उछालने का दौर आ चला है।
    खुद का दामन संभालने का दौर आ चला है।

    लाख दाग सही, खुद का गिरेबां बेदाग नहीं,
    दुसरों की गलतियां गिनाने का दौर आ चला है।

    वादों की फेहरिस्त तो, फिर से लंबी हो चली,
    इरादों को समझने समझाने का दौर आ चला है।

    बरसों से निशां पे फ़ना हैं, कुछ एक नादां मुरीद,
    शख्सियत पे बदलाव लाने का दौर आ चला है।

    वहां रसूख़दारों की मिलीभगत, पूरे ज़ोरों पर है,
    यहां दोस्तों के लड़ने लड़ाने का दौर आ चला है।

    देवेश साखरे ‘देव’

    1. फेहरिस्त-सूची, 2. मुरीद-अनुयायी

  • मैं जाम नहीं

    छलक जाए पैमाना, मैं जाम नहीं।
    भले खास ना सही, पर आम नहीं।

    एक बार गले लगा कर तो देखो,
    भूला सको मुझे, वो मैं नाम नहीं।

    गुरूर नहीं मेरा, खुद पर यकीन है,
    आज़मा लो, पीछे हटाता गाम नहीं।

    तुमको माना देवकी, मुझ ‘देव’ की,
    पर अफसोस है, की मैं राम नहीं।

    देवेश साखरे ‘देव’

    1.गाम- कदम

  • तारीफ़ तेरी

    तारीफ़ तेरी, नहीं मेरी जुबां करती है ।
    नजरें पढ़ ले, हाले-दिल बयां करती है ।

    इश्क में हूँ तेरे आज भी, जहां जानता है,
    तेरा हुश्ने-मुकाबला, कोई कहाँ करती है ।

    माना बरसों पुराना, इश्के-फसाना हमारा,
    पर आज भी, इश्के-मिसाल जहां करती है ।

    एक तेरे सिवाय, नहीं कोई और जिंदगी में,
    शक मुझ पर, बेवजह, ख़ामख़ाह करती है ।

    कल के लिए, हम अपना आज ना खो दें,
    कल का फैसला, जिंदगी की इम्तहां करती है।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • नक़ाब

    नक़ाब से जो चेहरा, छिपा कर चलती हो।
    मनचलों से या गर्द से, बचा कर चलती हो।

    सरका दो फिर, गर जो तुम रुख से नक़ाब,
    महफिल में खलबली, मचा कर चलती हो।

    तेरे आने से पहले, आने का पैगाम आता है,
    पाज़ेब की छन – छन, बजा कर चलती हो।

    तेरी एक दीद को, तेरी राह पे खड़ा कब से,
    तिरछी नज़रों से दीदार, अदा कर चलती हो।

    डसती है नागिन सी, तेरी बलखाती गेसू,
    पतली कमर जब, बलखा कर चलती हो।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • तुम पर एक ग़ज़ल लिखूं

    तुम्हें गुलाब लिखूं या फिर कंवल लिखूं।
    जी चाहता है तुझ पर एक ग़ज़ल लिखूं।

    गुल लिखूं, गुलफ़ाम या लिखूं गुलिस्तां,
    या फिर तुम्हें महकता हुआ संदल लिखूं।

    तन्हाई छोड़ बना लूं तुम्हें शरीक-ए-हयात,
    ज़िंदगी के पन्ने पर ये हॅसीन पल लिखूं ।

    ज़िंदगी तुम्हारे नाम लिख तो दी है ‘देव’,
    तुम्हें अपना आज लिखूं, अपना कल लिखूं।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • पहचानी सी है

    फिज़ा में खुशबू, पहचानी सी है।
    छिपी कहां, मुझमें तू सानी सी है।

    ढूंढे उसे जो खुद से अलग हो ,
    मैं जिस्म और तू रूहानी सी है।

    सूखी, बंजर जिंदगानी थी पहले,
    मैं तपता सहरा, तू नीसानी सी है।

    तेरे बगैर कुछ भी नहीं वजूद मेरा,
    मेरी जिंदगी में, तू शादमानी सी है।

    तूने छुआ तो, मैं फिर से जी उठा,
    लगता परियों की, तू कहानी सी है।

    कोई शक नहीं, तू ‘देव’ के लिए बनी,
    खुदा की नेमत, तू निशानी सी है।

    देवेश साखरे ‘देव’

    1.सानी-मिलाया हुआ, 2.सहरा-रेगिस्तान,
    3.नीसानी-बारिश की बूंदों जैसी, 4.शादमानी-ख़ुशी

  • इस कागज़ी बदन को यकीन है बहुत


    इस कागज़ी बदन को यकीन है बहुत
    दफ्न होने को दो ग़ज़ ज़मीन है बहुत

    तुम इंसान हो,तुम चल दोगे यहाँ से
    पर लाशों पर रहने वाले मकीं* हैं बहुत

    भरोसा तोड़ना कोई कानूनन जुर्म नहीं
    इंसानियत कहती है ये संगीन है बहुत

    झुग्गी-झोपड़ियों के पैबन्द हैं बहुत लेकिन
    रईसों की दिल्ली अब भी रंगीन है बहुत

    वो बरगद बूढ़ा था,किसी के काम का नहीं
    पर उसके गिरने से गाँव ग़मगीन है बहुत

    बस एक हमें ही खबर नहीं होती है
    वरना ये देश विकास में लीन है बहुत

    *मकीं-मकाँ में रहने वाला

    सलिल सरोज

  • दौलत

    कोई ज़मीं बेचता, कोई आसमां बेचता ।
    दौलत के नशे में चूर, ये ज़हां बेचता ।

    कब परवान चढ़ा, मोहब्बत मुफ्लिशी का,
    दौलत मोहब्बत का है, आशीयां बेचता ।

    दर-दर की ठोकरें, मुफ्लिशी के हालात,
    दौलत की खातिर इंसां, अरमां बेचता ।

    तारीख़ गवाह, कब दौलत किसका हुआ,
    दौलत को ख़ुदा मान, अपना ख़ुदा बेचता ।

    लूटे हैं कई घर, ये दौलतमंद मानूस,
    दौलत की बदौलत, वो खुशियाँ बेचता ।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • दिल का पथिक

    हालात जमाने की कुछ वक्त की नजाकत,
    कैसे कैसे बहाने भूलों के वास्ते।
    अपनों के वास्ते कभी सपनो के वास्ते,
    बदलते रहे अपने उसूलों के रास्ते।
    कि देख के जुनून हम वतनों की आज,
    जो चमन को उजाड़े फूलों के वास्ते।
    करते थे कल तक जो बातें अमन की,
    निकल पड़े है सारे शूलों के रास्ते।
    खाक छानता हूँ मैं अजनबी सा शहर में,
    क्या मिला खुदा तेरी धूलों के वास्ते।
    दिल का पथिक है अकेला”अमिताभ” आज,
    नाहक हीं चल पड़ा है रसूलों के रास्ते।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • तारीफ तेरी

    तारीफ तेरी, नहीं मेरी जुबां करती है ।
    नजरें पढ़ ले, हाले-दिल बयां करती है ।।
    इश्क में हूँ तेरे आज भी, जहां जानता है,
    तेरा हुश्ने-मुकाबला, कोई कहाँ करती है ।।
    माना बरसों पुराना, इश्के-फसाना हमारा,
    पर आज भी, इश्के-मिसाल जहां करती है ।।
    एक तेरे सिवाय, नहीं कोई और जिंदगी में,
    शक मुझ पर, बेवजह, ख़ामख़ाह करती है ।।
    कल के लिए, हम अपना आज ना खो दें ‘देव’,
    कल का फैसला, जिंदगी की इम्तहां करती है।।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • ज़नाब आहिस्ता आहिस्ता !

    सच होते जा रहे हैं मेरे ख्वाब आहिस्ता आहिस्ता,
    वो दे रही मेरी बातों के जवाब आहिस्ता आहिस्ता,

    सालों से बेकरार किया है  मेरे दिल को जो उन्होंने,
    लूँगा मैं उनसे अपना यह हिसाब आहिस्ता आहिस्ता,

    धीमी आँच पर पका है मेरे जज्बातों का सिलसिला,
    चढ़ने लगा मुझ पर उनका शबाब आहिस्ता आहिस्ता,

    ढल गई है अब मेरे इंतजार की स्याह रात,
    उभर रहा है अक्स पर आफ़ताब आहिस्ता आहिस्ता,

    वो सुर्ख़ चेहरा जिस पर क़ुर्बान दिलोजान,
    हो रहा है सामने बेनक़ाब आहिस्ता आहिस्ता,

    जिस नूर की एक झलक ने दीवाना कर दिया,
    क्या होगा जब उतरेगा हिज़ाब आहिस्ता आहिस्ता,

    ऐसा ना हो मैं भूल जाऊँ सारे होशोहवास,
    आना मेरी बाहों में मगर ज़नाब आहिस्ता आहिस्ता,

  • zindgi

    ghujari hai,zindgi aise bhi..
    khud ko khud se dhundhne me.
    lapta sahi kaun apna waise bhi.
    dhundhta kha hai,koe dhundhne me..
    jane do bhikre pdhe hai,saman ghar ke waise bhi.
    koe aur nhi rehta yha mere sath rehne me..
    ha, ek umar ki dehlij hai aise bhi..
    aaine me nhi dhundhta,khud ko jhurriyo me..
    fark kha hai tanhae budhape me waise bhi.
    darta hai kausar o khud se darne me

  • fitur

    fitur

    ye ishq hi to hai, kha kisi ki.
    bala wajah fir kuan intejar krna..
    khush guman hoti hai, hasinawon ki.
    ye wo mushe dekhta hai, khayal krna.
    hamari fitrat nhi,fitur hai kisi ki.
    ha wo dil hai,tu bta ab dil ka kya krna.
    kabhi sano pe gira kr,adawon se un ki.
    inki adat hai,masumo ko giraftar krna.
    ha hai fitur dil ki par,khawab lati hai kisi ki.
    be rang zindgi me kisi ka intejar krna……
    mahtab kausar

  • tawakku

    Umar hai choti,khawhishe jada hai.
    zindgi ye bta,ab tera kya irada hai..
    siyah hai kam,panne jada hai.
    khawhishe kuch aur, likhne ka irada hai..
    zindgi ye bta ,ab tera kya irada hai…..
    rasten hai lambi muskile bhi jada hai.
    andhiyon ka bhi aane, ka irada hai..
    zindgi ye bta ,ab tera kya irada hai….
    tawakku kya kre,,ye bas yada hai.
    dekhta nhi fareb khane ka,kya irada hai..
    zindgi ye bta ,ab tera kya irada hai….
    milna mohabbat nhi, ab matlab, jada hai.
    sayad akele rehna,insaan ka ab irada hai.
    zindgi ye bta,ab tera kya irada hai……
    hichkiyan aaj hme aae kuch jada hai.
    hme yaad karne ka, unka aaj irada hai…
    zindgi ye bta ab.tera kya irada hai…..

  • ग़ज़ल

    इक समंदर यूं शीशे में ढलता गया ।
    ज़िस्म ज़िंदा दफ़न रोज़ करता गया ॥

    ख़्वाब पलकों पे ठहरा है सहमा हुआ ।
    ‘हुस्न’ दिन-ब-दिन ख़ुद ही सँवरता गया ॥

    ‘इश्क़’ है आरज़ू या कि; सौदा कोई ।
    दिल तड़पता रहा -— दिल मचलता गया ॥

    क्या हो शिक़वा कि; ‘अनुपम’ यही ज़िन्दगी ।
    ‘ज़िंदा’ रहने की ख़ातिर ‘मैं’ मरता गया ॥
    #anupamtripathi #anupamtripathiG
    ———- गोयाकि; ग़ज़ल है ! ———-

  • गीत होठो पे समाने आ गये है

    गीत होठो पे समाने आ गये है
    प्रीत भावो के सजाने आ गये है
    ?
    चाह ले के आस छाके गा रही है
    साज ओढे ताल लुभाने आ गये है
    ?
    रीत गाने के सदाये दे रहे है
    भाव ले के तान भाने आ गये है
    ?
    चाव गाने का हमारा है नही पर
    भाव ले के चाव छाने आ गये है
    ?
    आज मेरा दौर फीका भी नही है
    बात मीठी सी सुझाने आ गये है
    ?श्याम दास महंत ?

  • तुम रोक तो सकते थे….

    हम तो चल दिये थे अपना कारवा लिए,
    मगर तुम रोक तो सकते थे

    हम तो चल दिये थे अपने आंसू लिए,
    मगर तुम रोक तो सकते थे

    हम तो चल दिये थे अपने गम को लेकर,
    मगर तुम रोक तो सकते थे

    हम तो चल दिये थे अपनी तन्हाई लेकर,
    मगर तुम रोक तो सकते थे

    हम तो चल दिये थे मौत की तरफ,
    मगर तुम रोक तो सकते थे……!!

    -देव कुमार

  • शैलेन्द्र जीवन से एक दिन शिला खण्ड जब टकराया

    शैलेन्द्र जीवन से एक दिन शिला खण्ड जब टकराया,

    पिता की छाया हटी तो जैसे संकट मुझपर गहराया,

    संस्कारों का दम्ब था मुझमें सब धीरे-धीरे ठहराया,

    मेरे कन्धों पर परिवार का जिम्मा जैसे बढ़ आया,

    बचपन से ही कवि ह्रदय ने मेरे दिल को धड़काया,

    बस इसी विधा में लगकर मैंने अपने मन को बहलाया,

    बहुत रहा पल-पल उलझा इन सम्बंधों की उलझन में,

    फिर किसी तरह से शैलेन्द्र जीवन को अपने मैंने सुलझाया।।

    राही (अंजाना)

  • Ghazal

    उत्कर्ष मेल में पहली बार मेरी ग़ज़ल बहुत बहुत शुक्रिया संपादक महोदय जी का । आपका सहयोग यूँ ही बना रहे ।

  • कब तक मै यूँ ख़ामोश रहूँगा

    कब तक मै यूँ ख़ामोश रहूँगा,
    अब मुझे तू शब्दों में बयां हो जाने दे,

    कब तक मै राहों में यूँ भटकता रहूँगा,
    अब मुझे तू अपनी मन्ज़िल हो जाने दे,

    कब तक मैं यूँ तेरे ख़्वाबों में रहूंगा,
    अब तू मुझे अपनी हकीकत हो जाने दे,

    कब तक में यूँ तनहा रहूंगा,
    अब तू मुझे अपनी महफ़िल हो जाने दे,

    कब तक मैं यूँ टूटता पत्थर रहूंगा,
    अब तू मुझे अपनी रूह हो जाने दे॥
    Raaही

  • कभी ठीक से अपने ही बिछाने पर सो भी तो नही सकते

    कभी ठीक से अपने ही बिछाने पर सो भी तो नही सकते,
    ए ज़िन्दगी महसूस तो कर सकते है पर छू भी तो नही सकते

    काश अब ये भी समज ले कि कोशिश नही की थी हमने,
    कुछ भी हो जाये लेकिन मुश्किलो से डर भी तो नही सकते

    आदते डाल दी है हमने यू  सबको गले लगाकर मुस्कुराने की,
    पता है कि हम उनके है लेकिन वो हमारे हो भी तो नही सकते

    चलो एक बार फिर वादा करो मिलने का,फिर से बिछड़ने का,
    साथ चलने का वादा करेंगे पर साथ चल भी तो नही सकते

    – हार्दिक भट्ट

  • परिन्दा कैद से छूटा नही है

    परिन्दा कैद से छूटा नही है
    छुडाने कोई भी आता नही है

    बहुत खामोश है दरिया के जैसे
    बहुत बेचैन है कहता नही है

    दिवाना बन गया है प्यार में वो
    वो लड़ता है मगर वैसा नही है

    बनाया है उसे पागल जिन्होनें
    वही अब कह रहे अच्छा नही है

    सभी लड़ रहा है ठीक है पर
    कोई कहदे कि वो ऐसा नही है

    नसीहत वक्त ने क्या खूब दी है
    करो वो काम जो दिखता नही है

  • गुस्ताखियाँ

    यूं तो अरमानों के इरादे भी परेशान हैं,
    पानी की बूँदें भी आँखों की बारिश से हैरान हैं|
    पर जनाब हमारी गुस्ताखियों की भी हद नहीं होती,
    ऐसी केफ़ियत में अपनी ही परछाई में सुकून ढूँढ लिया करते हैं|

  • नींद

    आजकल नींद सोती है मेरे बिस्तर पर,
    और मैं तो ख्यालों की दुनिया मैं टहलने निकल जाती हूँ|

  • जीतना

    मुझको मुझसे जीत कर,
    खुशियाँ मना रहे थे वो|
    शायद हारकर जीतने और जीत कर हारने के ,
    उस एहसास से वाकिफ़ न थे वो|

  • ज़मीन तुम हो

    मेरी हर इक ग़ज़ल की अब तक ज़मीन तुम हो …..
    मेरा अलिफ़ बे पे से चे और शीन तुम हो ….

    जज़्बात से बना मैं इक प्यार का नगर हूँ
    रहते हो इस में तुम ही इस के मकीन तुम हो …..

    इन क्रीम पाउडर का एहसान क्यूँ हो लेते
    मैं जानता हूँ तुमको कितने हसीन तुम हो ….

    तुमको कोई तो समझे संसार कोई साँसे
    लेकिन किसी की ख़ातिर कोई मशीन तुम हो ….

    टूटोगे तुम कभी तो बिखरूंगा मैं ज़मीं पर
    कुछ और हो न हो पर मेरा यक़ीन तुम हो …

    पंकजोम ” प्रेम “

  • कवि

    कवि होना भी खुदा की रहमत का ही नमूना है
    वरना युं अपने दर्द को शब्दों में बयां कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं।

  • उदास

    पानी से भरी आखें लेकर मुझे घूरती ही रही
    शीशे के उस पार खड़ी लड़की उदास बहुत थी।

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