दुनिया क्या कहेगी ये सोचेगा तो रुक जाएगा सफलता के लिए तपना पडे़गा , जितना तपेगा उतना निखर जाएगा मेहनत के बल पर ये जमाना क्या आसमां भी तेरे आगे झुक जाएगा
दुनिया क्या कहेगी ये सोचेगा तो रुक जाएगा सफलता के लिए तपना पडे़गा , जितना तपेगा उतना निखर जाएगा मेहनत के बल पर ये जमाना क्या आसमां भी तेरे आगे झुक जाएगा
बंद आंखों की कोरों पर ठहरी बूंदें गोया पलकों के पीछे गहराते अंधेरे में क़ैद किरणें अपनी ही आंच में पिघलती जा रही हैं धीरे- धीरे ०४.०९.२०२२
अब के झमाझम सावन ने ताना अंतरपट झीना, झिलमिल – झिलमिल अंबर से धरती तक ढोल – नगाड़े बजते अविरत बिजली का मंडोला सजता नभ में बूंदों का सेहरा बांधे उतरा बादल धानी धरती का […]
एक व्यक्ति का व्यक्तित्व उस व्यक्ति की सोच पर हीं निर्भर करता है। लेकिन केवल अच्छा विचार का होना हीं काफी नहीं है। अगर मानव कर्म न करे और केवल अच्छा सोचता हीं रह जाए […]
दिल के वीराने में एक अंजुमन हम भी सजाते हैं। जब भी होते हैं तन्हा आपको उसमें बिठाते हैं। आप तो भूल गए हो यादें पुरानी, आइये हम आपको याद दिलाते हैं.. सावन, नदियाँ पर्वत […]
तुझसे बिछड़ के जिंदगी कुछ इस तरह से गुजरी है, न कोई राह-ए-सफ़र, न हम सया साथ चलता है, इतना तन्हा हुआ मैं तेरे जाने के बाद, ना अपना, ना कोई पर्य साथ चलता है। […]
विवाद अक्सर वहीं होता है, जहां ज्ञान नहीं अपितु अज्ञान का वास होता है। जहाँ ज्ञान की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है, वहाँ वाद, विवाद या प्रतिवाद क्या स्थान ? आदमी के हाथों में वर्तमान समय […]
अब के झमाझम सावन ने ताना अंतरपट झीना, झिलमिल – झिलमिल अंबर से धरती तक ढोल – नगाड़े बजते अविरत बिजली का मंडोला सजता नभ में बूंदों का सेहरा बांधे उतरा है बादल धानी धरती […]
मेरी दुआ है आतिश-ए-इश्क़ में तेरा घर भी यूँ ही जला करे न ज़ख़्म हो न सकूँ मिले तेरा दिल भी यूँ ही दग़ा करे न दर्द हो न दवा मिले यूँ मेरी तरह तू […]
Mana ki Zindagi ek kowaishon ka samandar hai,har khowaishe puri hon ye zaruri to nahi. ———————- Na jane kab khatam hogi jaddo-zahad zindagi ki,abhi talak uljha hun zindagi k sawalo me.
इस सृष्टि में बदलाहटपन स्वाभाविक है। लेकिन इस बदलाहटपन में भी एक नियमितता है। एक नियत समय पर हीं दिन आता है, रात होती है। एक नियत समय पर हीं मौसम बदलते हैं। क्या हो […]
कितनी बार सोंचा तुम्हारे बारे में ना सोंचूं, यही सोंचते सोंचते रात हो गई।
नाम है अनेक तेरे कण कण मे आप हो देखना बस एक झलक, सांसो में आलाप हो मैं कलंकित शंकित हूँ जरा, गंगाधर आप हो मन से मेरे भवभय हरो, हर हर विश्वनाथ ओ। सभी […]
आज एहसास ये हुआ की मैं कितनी अकेली हूँ, सजल जल नैन भर बरसे दुख की मैं सहेली हूँ। कहाँ है प्रीत का सावन?? कहाँ है गीत मनभावन?? कहाँ है प्रेम की गगरी आज बिल्कुल […]
सच है एक कड़वी दवा, इसको धीरे-धीरे पिला। आदत तो हो जाने दे, इतना सच कैसे झेलूॅं, चाक सीना तो सी लूॅ़ं। भरम में ही जीती आई हूँ, भरम में ही जी लेने दे, सच […]
प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए संसार को कोसना सर्वथा व्यर्थ है। संसार ना तो किसी का दुश्मन है और ना हीं किसी का मित्र। संसार का आपके प्रति अनुकूल या प्रतिकूल बने रहना बिल्कुल आप पर […]
मैं ,,जीयूं इस तरह , कि विभव में भोर हो जाए, मैं,, जीयूं इस तरह ,की कविता हर ओर हो जाए, देश ,लिखने वाले द्वेश नहीं लिखा करते, मिट्टी में भी सुगन्ध लिया करते हैं, […]
विषय –जगन्नाथ रथयात्रा (*जय जय हो तेरी प्रभु जगन्नाथ सरकार*) हरि बोल के जयकारों से गूंज रहा सम्पूर्ण संसार बजते ढोल नगाड़े मंजीरा, जय जगन्नाथ स्वामी मंत्रोच्चार रथ के लिए काष्ठ का चयन होता बसंत […]
अरसे बाद,खुद को पहचान पाई हूं, ये मेरे अहसास की सुगन्ध है,। समय का इक पहलू ,मेरा बड़ा भयभीत रहा , फिर भी मुसाफिर इक जिन्दाबाद रहा,। ज़िन्दगी का वह मोड़ क्या रहा होगा, जहां […]
आजकल थोड़ा खफा सा रहता है जग रहा मगर सोया सा रहता है पर जाने क्या है मजबूरी उसकी वो बैठा हुआ थका सा रहता है । अशोक बाबू माहौर
===== धर्म ग्रंथों के प्रति श्रद्धा का भाव रखना सराहनीय हैं। लेकिन इन धार्मिक ग्रंथों के प्रति वैसी श्रद्धा का क्या महत्व जब आपके व्यवहार इनके द्वारा सुझाए गए रास्तों के अनुरूप नहीं हो? आपके […]
Sabka bhla soch k itna achha krte krte; Apna itna bura kr gyi, pta hi na chla… Ek naariyal ka kirdaar tha mera, Kyu mera vajood unhe pathar-sa dikha… Dil roya andron bhot, maano kasoor […]
विषय– पिता की छांव मां-पापा हैं मेरे जीवन की पतवार कैसे चुका पाएंगे हम अपने पापा के उपकार चलना सिखाया पापा ने मुझे गोद उठा दिखलाया संसार एक साया बनकर चलते संग मुझे खुशियां देते […]
अपनी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत पर नाज करना किसको अच्छा नहीं लगता? परंतु इसका क्या औचित्य जब आपका व्यक्तित्व आपके पुरखों के विरासत से मेल नहीं खाता हो। आपके सांस्कृतिक विरासत आपकी कमियों को छुपाने के […]
=================== कौरव सेना को एक विशाल बरगद सदृश्य रक्षण प्रदान करने वाले गुरु द्रोणाचार्य का जब छल से वध कर दिया गया तब कौरवों की सेना में निराशा का भाव छा गया। कौरव पक्ष के […]
सलीक़े से हवाओं में जो ख़ुशबू घोल सकते हैं अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जो उर्दू बोल सकते हैं ~ मुहम्मद आसिफ अली
======= हाल फिलहाल में मेरे द्वारा की गई मेरे गाँव की यात्रा के दौरान मेने जो बदलाहट अपने गाँव की फिजा में देखी , उसका काव्यात्मक वर्णन मेने अपनी कविता “मेरे गाँव में होने लगा […]
========= महाभारत युद्ध के समय द्रोणाचार्य की उम्र लगभग चार सौ साल की थी। उनका वर्ण श्यामल था, किंतु सर से कानों तक छूते दुग्ध की भाँति श्वेत केश उनके मुख मंडल की शोभा बढ़ाते […]
सोचता था तूने मुझे छोड़ दिया पर पीछे मुड़ा तो साया तेरा ही था हम टूटे थे उस वक्त जरूर पर खुद्दारी से लड़कर सफल होंगे ज़रूर जज़्बा है शोर नहीं काली रात है पर […]
सुना हैं कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता। हमें जैसा भी मिला है किसी को ऐसा भी आसमां नहीं मिलता।
ख़्वाब को साथ मिलकर सजाने लगे घर कहीं इस तरह हम बसाने लगे कर दिया है ख़फ़ा इस तरह से हमें मान हम थे गए फिर मनाने लगे
इस सृष्टि में कोई भी वस्तु बिना कीमत के नहीं आती, विकास भी नहीं। अभी कुछ दिन पहले एक पारिवारिक उत्सव में शरीक होने के लिए गाँव गया था। सोचा था शहर की दौड़ धूप […]
अपनी क़िस्मत को फिर बदल कर देखते हैं आओ मुहब्बत को एक बार संभल कर देखते हैं चाँद तारे फूल शबनम सब रखते हैं एक तरफ महबूब-ए-नज़र पे इस बार मर कर देखते हैं जिस्म […]
मुझे नहीं पता तू है कहाँ, खुश रहे तू है जहाँ। हृदय से देती हूँ तुझको दुआ, फ़िर न हो जैसा अब हुआ। हृदय में वास करेगी सदा, तेरा नाम रहेगा सर्वदा मेरी जु़बाॅं, वादा […]
द्रोण को सहसा अपने पुत्र अश्वत्थामा की मृत्यु के समाचार पर विश्वास नहीं हुआ। परंतु ये समाचार जब उन्होंने धर्मराज के मुख से सुना तब संदेह का कोई कारण नहीं बचा। इस समाचार को सुनकर […]
नहीं कर सकते हम अब और इन्तज़ार, करना ही नहीं अब हमें तुमसे प्यार। मेरी बेबसी का मजाक उड़ाते हो, मेरे दिल को रोज़ चोट पहुँचाते हो। कर नही सकते अब तुम पे ऐतबार जाओ […]
न जाने कहां ले जा रही है जिंदगी.. जाने क्या चाहती है मुझसे यह जिंदगी?? खुद को जितना गमों से दूर रखती हूं, उतना ही गमगीन होती जा रही है जिंदगी… खुशियों की बात तो […]
हो रहा विमुख-सा मन, न इच्छा बची ना चाह। यह उम्र का पड़ाव, सच में इरादों को छीन-हीन, कर ही देता है। वह पहले सा उत्साह, मर ही जाता है। वो रंग-बिरंगे सपने, धुंधले पर […]
समाज की बेहतरी की दिशा में आप कोई कार्य करें ना करे परन्तु कार्य करने के प्रयासों का प्रचार जरुर करें। आपके झूठे वादों , भ्रमात्मक वायदों , आपके प्रयासों की रिपोर्टिंग अखबार में होनी […]
प्रीत रोग के मारे दिल को हम को ये तो बताना था हम को .गम तो और भी हैं लेकिन इसी का .जमाना धा हम को ही पछताना धा इस के संग तो .फसाना धा […]
पैर थक गए हैं तेरी ठोकरों से, ए जिंदगी! मगर कहता! हौसला इन पैरों का, ज़फ़र तो हम भी नहीं छोड़ेंगे। और तेरे सितमों का कहर, पहाड़ ही क्यों ना बन जाए, मुस्कुराना तो हम […]
किसी व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य जब मृत्यु के निकट पहुँच कर भी पूर्ण हो जाता है तब उसकी मृत्यु उसे ज्यादा परेशान नहीं कर पाती। अश्वत्थामा भी दुर्योधनको एक शांति पूर्ण मृत्यु प्रदान करने […]
खूबसूरत सांझ शांत होता हुआ शहर का कोलाहल कम होता हुआ वायु में घुल रहा हलाहल, चलो थोड़ी देर, छत पर घूम लें। आप वहां हम यहाँ, रूहों की टेलीफोनिक तरंगों से थोड़ा मिल लें, […]
किलै खिलना हौला साल भरि में एक्कै बैर गुलाब वन भरि कुइयाँ फुलि रौ घर-घर गुलाब। दिखै बेर चार दिनैकि रंग-बिरंगी चमक, फिर पैंली को झौ कांडा वालो है जाँ गुलाब। नै खिलनो त कि […]
ईश्वर किसी एक धर्म , किसी एक पंथ या किसी एक मार्ग का गुलाम नहीं। अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानने से ज्यादा अप्रासंगिक मान्यता कोई और हो हीं नहीं सकती । परम तत्व को किसी […]
सर्वदा होश की अवस्था हैं ब्रह्मचर्य विषयों से अनासक्त का नाम हैं ब्रह्मचर्य पूर्व संस्कार का पूर्ण रुपेण त्याग हैं ब्रह्मचर्य ब्रह्मचर्य कुछ भी नहीं :_ निज मूल स्थिति का नाम हैं ब्रह्मचर्य ।।१।। +++++++++++++++++++++++++++++ […]
सर्वदा होश की अवस्था हैं ब्रह्मचर्य विषयों से अनासक्त का नाम हैं ब्रह्मचर्य पूर्व संस्कार का पूर्ण रुपेण त्याग हैं ब्रह्मचर्य ब्रह्मचर्य कुछ भी नहीं :_ निज मूल स्थिति का नाम हैं ब्रह्मचर्य ।।१।। +++++++++++++++++++++++++++++ […]
ख़ामोश है कलम, कर रही इन्तज़ार है। कब कोई लेख लिखूँ मैं, वो देख रही बारम्बार है। पी कर अश्क अपने एक दिन, सचमुच कलम उठाऊॅंगी। प्रतीक्षारत कलम को, न और अधिक प्रतीक्षा करवाऊँगी॥ _____✍️गीता
सत्य भाष पर जब भी मानव, देता रहता अतुलित जोर। समझो मिथ्या हुई है हावी, और हुआ है सत कमजोर। अजय अमिताभ सुमन
सृष्टि के कण कण में व्याप्त होने के बावजूद परम तत्व, ईश्वर या सत , आप उसे जिस भी नाम से पुकार लें, एक मानव की अंतर दृष्टि में क्यों नहीं आता? सुख की अनुभूति […]
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