जब देश के किसी हिस्से में हिंसा की आग भड़की हो , अपने हीं देश के वासी अपना घर छोड़ने को मजबूर हो गए हो और जब अपने हीं देश मे पराये बन गए इन […]
जब देश के किसी हिस्से में हिंसा की आग भड़की हो , अपने हीं देश के वासी अपना घर छोड़ने को मजबूर हो गए हो और जब अपने हीं देश मे पराये बन गए इन […]
मर्यादा पालन करने की शिक्षा लेनी हो तो प्रभु श्रीराम से बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। कौन सी ऐसी मर्यादा थी जिसका पालन उन्होंने नहीं किया ? जनहित को उन्होंने हमेशा निज हित सर्वदा […]
अपना सनातन नूतन वर्ष है आया लेकर अनंत खुशियां अपार करिए अभिनन्दन नववर्ष का चहुंओर ले आएं प्रेम की बहार दो पल का जीवन है मिला यूं हीं मत करिए बेकार वसुधैव कुटुंबकम् की महत्ता […]
चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राज गुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, खुदी राम बोस, मंगल पांडे इत्यादि अनगिनत वीरों ने स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में हंसते हंसते अपनी जान को कुर्बान कर दिया। परंतु ये देश ऐसे […]
जीत कर के तुझे ऐ सनम ! खुद को ही हार कर बैठे हैं हम। जिन्दगीं बन गया जब से तू मौत से यार डरते हैं हम। प्रीत है, रीत है, जीत है, मौत है, […]
तुम्हारे बिन मेरा जीवन बड़ा बेरंग है, तुम्हारे संग ही जीवन के सारे रंग है, ना इक भी कॉल, मैसेज और ना बातें, बताओ इस तरह से कौन करता तंग है, हमारी पहली होली और […]
मैं ख़ुद को बेकार समझता हूँ, हूँ नहीं, मगर यार समझता हूँ, आपकी भी कहानी से वाक़िफ हूँ, आपका भी किरदार समझता हूँ, आप मुझे बेवकूफ़ समझते हैं, आपको मैं समझदार समझता हूँ, आपको मैं […]
मुश्किल है आसान नहीं है, जीना आसाँ काम नहीं है, जिसको अच्छा समझ रहे थे, वो अच्छा इंसान नहीं है, जो वाकई ज्ञानी होता है, सबको देता ज्ञान नहीं है, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे है, सबका […]
वासना छोड़े घर मिटे मन कि विकार पूर्व-संस्कार न सताए ऐसा हो होली का त्यौहार ।।1।। जले अगर अग्नि में तो क्रोध व काम पियो वैसी शराब जिसकी नशा न उतरे जिंदगी भर रंगों मन […]
आओ कुछ ऐसी होली मनाएं हर चेहरे पर मुस्कान ,हर घर खुशहाली आए छल कपट का इस होली में दहन हो जाए प्रेम रूपी गुलाल हर जन उड़ाएं हर रंग में ऐसा रंग मिले, हर […]
मृग तृष्णा मृग तृष्णा समदर्शी सपना , भव ऐसा बुद्धों का कहना। था उनका अनुभव खोल गए, अंतर अनुभूति बोल गए। ………. पर बोध मेरा कुछ और सही, निज प्रज्ञा कहती और रही। जब प्रेमलिप्त […]
सैंया तेरे साथ खेल को लाई चुनरिया कोरी मैं कौन रंग के साथ रंगोगे, मोहे अबकी होरी में जीवन मिला तोहे पाने को,कितने मौसम बीत गए इंतजार में तेरे प्रीतम नैना मेरे भीग गए अबकी […]
अबला बनकर रह लिया बहुत अब स्वयं सबला तुम्हें बनना होगा कभी पुत्री बहन मॉं पत्नी बन सखा निभाती फर्ज सभी हर फर्ज निभाया तुमने बखूबी से निज पहचान बनाने को बढ़ना होगा। कहीं अशिक्षा, […]
कोई हो जो बिन कहे हर भाव समझ ले, कोई हो जो चेहरे की हर शिकन को पढ़ ले। कोई हो जो मुस्कुराने का बहाना दे दे, कोई हो जो बिन मांगे प्यार का खज़ाना.. […]
जब दिल से दिल के तार जुड़े हों, किसी पहचान की जरूरत कहाँ। नाम भले ही गुम जाए, चाहे चेहरा भी बदल जाए.. आपकी आवाज़ से,आपके अंदाज़ से, आपकी रूह को पहचान लेंगे हम। ये […]
कलम गढ़ो अविराम सत्यता, ना डिगो निडर निर्भीक चलो। यह कलम धार निरंतर बनी रहे, उर प्रबल वेग नित जोश भरो।। ********************* लिखो पुण्य गाथा वीरों की, कुछ जीवन अपना धन्य करो। यशगान करो मां […]
वो मेरी आहट से ही मुझको पहचान लेता था, नींदों में भी बस मेरा ही नाम लेता था। याद करती थी मैं उससे रात-दिन और वह हिचकियां लेता था। ना मिलने की कभी जिद्द की […]
एक वक्त था… जब तुम मेरे लिए रातों को जगा करते थे मैं कुछ भी कहती, तुम हंसकर सब सुन लेते थे। मुझसे ज्यादा तड़प होती थी तुमको मिलने की, व्हाट्सएप’ पर भी तुम अवलेबल’ […]
मेरा शोक हर लो, मेरा दोष हर लो, जैसे पिया आपने जहर को वैसे मेरे!हर दुख के आंसू पी लो —— ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’ पता-खजुरी खुर्द,तह.कोरांव, प्रया.
मेरा शोक हर लो, मेरा दोष हर लो, जैसे पिया आपने जहर को वैसे मेरे!हर दुख के आंसू पी लो —— ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’ पता-खजुरी खुर्द,तह.कोरांव, प्रया.
बारिश की एक फुहार से, सुखे पेड़ में भी जान आ जाती है और जब होता है जिक्र प्यार का, मुझे मेरी मां याद आ जाती है। —मानुष
प्रजातांत्रिक व्यवस्था में पूंजीपति आम जनता के कीमती वोट का शिकार चंद रुपयों का चारा फेंक बड़ी आसानी से कर लेते हैं। काहे का प्रजातंत्र है ये ? हर पांच साल पर प्यार जताने, आ […]
जब तक तारों मे नहीं मै हू यही बस तेरी आस ही है जिनकी चिंगारी जिंदा रखे हुए है रेत मे पैरों के निशान जो खो जाती है वैसा मेरा प्यार नहीं पत्थर पर कुरेदे […]
जीवन रण है संघर्ष भरा, अनगिनत शूल पथ में बिखरे, मेहनत परिश्रम अथक प्रयास, कंटक प्रसून बनकर निखरे। ********************* महामारी काल संघर्ष पूर्ण, कितने कुलदीपक काल ग्रास बने, सांसों की डोर पड़ी कमजोर, आजीविका संसाधन […]
आज एक अर्से के बाद कलम उठाई है। तेरी प्रीत मेरी आँख में भर आई है दिल की पीर से है मुझको कुछ आराम मिला, आज इसी वाइस मैंने कलम उठाई है। दीद हुई जबसे […]
भुला दिया शायद तुमने मुझे, जिस चाहत की मैं हकदार थी वो प्यार ना दिया तुमने मुझे। कैसे आ जाती है नींद तुम्हें, जब एक उम्र ना सोने दिया तुमने मुझे। मैं माँगी थीं कान […]
इन्तज़ार की भी एक हद होती है हमने उस हद को पार करके तेरा इन्तज़ार किया, जानते थे तू नहीं आएगा फिर भी तेरा इन्तज़ार किया। मेरी किस्मत में तू नहीं ना सही सब कुछ […]
कविता- गुलाब जल ————————- चाहत न थी, अब जीने की बस तुम्हें देखा दुआ करने लगा जीने की, साकी दे- प्याला तो, नशा चढ़े| भर नजर- देख ले यह हसीना, जाम से बढ़कर नशा चढ़े, […]
बचपन में पूछा करते जब भी दादी से दादी साड़ी श्र्वेत क्यों सर पर काले केश नहीं क्यों दादी कहतीं ‘ रंग गए सब दादा के संग वेणी, जूड़ा, काजल, बिंदी, केश गए दादा के […]
बारिश की बूंदें सहला गईं प्रकृति का अंग अंग हरियाईं उपेक्षित शिलाएं अहिल्या जन्मी राम जी के पदन्यास से ०८.०२.२०२२
तकलीफ अंदर के शोर से है, तनहाई तो यूँ ही बदनाम होती है। गिरता है खारा जल जब भी ऑंख से, वह सुबह वह शाम, तेरे ही नाम होती है॥ _______✍गीता
हृदय प्रभु ने सरल दिया था, प्रीति युक्त चित्त तरल दिया था, स्नेह सुधा से भरल दिया था , पर जब जग ने गरल दिया था, द्वेष ओत-प्रोत करल दिया था , तब मैंने भी […]
जो तुम चिर प्रतीक्षित सहचर मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष तुम्हे होगा निश्चय ही प्रियकर बात बताता हूँ। तुमसे पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता हूँ अधम शत्रु का निज कर से। सुन मित्र की बातें […]
खुद को जब खंगाला मैंने, क्या बोलूँ क्या पाया मैंने? अति कठिन है मित्र तथ्य वो, बामुश्किल ही मैं कहता हूँ, हौले कविता मैं गढ़ता हूँ, हौले कविता मैं गढ़ता हूँ। अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार […]
हिम की बरसात हुई, कहीं तो बीती रात हुई। गिरी नर्म-नर्म रुई सी, चाॅंदी सी बिछ गयी राहों में रूचिर रुपहली रात हुई बही सर्द-सर्द हवाएँ, तन-मन ठिठुरता ही जाए। बादल घुमड़ रहे गगन पर, […]
आधुनिकता के दौर में, कितने आगे हम निकल चुके, भवनों के; निर्माण के लिए खेतों में अब प्लॉट कटे। आधुनिकता के दौर में कुएँ, पोखर सब सुख गए, चहकते थे; मुंडेर पर पँक्षी अब वो […]
इस क्षणभंगुर संसार में जो नर निज पराक्रम की गाथा रच जन मानस के पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है उसी का जीवन सफल होता है। अश्वत्थामा का अद्भुत पराक्रम देखकर कृतवर्मा और […]
अश्वत्थामा दुर्योधन को आगे बताता है कि शिव जी के जल्दी प्रसन्न होने की प्रवृति का भान होने पर वो उनको प्रसन्न करने को अग्रसर हुआ । परंतु प्रयास करने के लिए मात्र रात्रि भर […]
महाकाल क्रुद्ध होने पर कामदेव को भस्म करने में एक क्षण भी नहीं लगाते तो वहीं पर तुष्ट होने पर भस्मासुर को ऐसा वर प्रदान कर देते हैं जिस कारण उनको अपनी जान बचाने के […]
जब अश्वत्थामा ने अपने अंतर्मन की सलाह मान बाहुबल के स्थान पर स्वविवेक के उपयोग करने का निश्चय किया, उसको महादेव के सुलभ तुष्ट होने की प्रवृत्ति का भान तत्क्षण हीं हो गया। तो क्या […]
शिवजी के समक्ष हताश अश्वत्थामा को उसके चित्त ने जब बल के स्थान पर स्वविवेक के प्रति जागरूक होने के लिए प्रोत्साहित किया, तब अश्वत्थामा में नई ऊर्जा का संचार हुआ और उसने शिव जी […]
विपरीत परिस्थितियों में एक पुरुष का किंकर्तव्यविमूढ़ होना एक समान्य बात है । मानव यदि चित्तोन्मुख होकर समाधान की ओर अग्रसर हो तो राह दिखाई पड़ हीं जाती है। जब अश्वत्थामा को इस बात की […]
हिमालय पर्वत के बारे में सुनकर या पढ़कर उसके बारे में जानकरी प्राप्त करना एक बात है और हिमालय पर्वत के हिम आच्छादित तुंग शिखर पर चढ़कर साक्षात अनुभूति करना और बात । शिवजी की […]
मानव को ये तो ज्ञात है हीं कि शारीरिक रूप से सिंह से लड़ना , पहाड़ को अपने छोटे छोटे कदमों से पार करने की कोशिश करना आदि उसके लिए लगभग असंभव हीं है। फिर […]
मृग मरीचिका की तरह होता है झूठ। माया के आवरण में छिपा हुआ होता है सत्य। जल तो होता नहीं, मात्र जल की प्रतीति हीं होती है। आप जल के जितने करीब जाने की कोशिश […]
========================= मन की प्रकृति बड़ी विचित्र है। किसी भी छोटी सी समस्या का समाधान न मिलने पर उसको बहुत बढ़ा चढ़ा कर देखने लगता है। यदि निदान नहीं मिलता है तो एक बिगड़ैल घोड़े की […]
============================= किसी व्यक्ति के चित्त में जब हीनता की भावना आती है तब उसका मन उसके द्वारा किये गए उत्तम कार्यों को याद दिलाकर उसमें वीरता की पुनर्स्थापना करने की कोशिश करता है। कुछ इसी […]
कृपाचार्य और कृतवर्मा के जीवित रहते हुए भी ,जब उन दोनों की उपेक्षा करके दुर्योधन ने अश्वत्थामा को सेनापतित्व का भार सौंपा , तब कृतवर्मा को लगा था कि कुरु कुंवर दुर्योधन उन दोनों का […]
कृपाचार्य दुर्योधन को बताते है कि हमारे पास दो विकल्प थे, या तो महाकाल से डरकर भाग जाते या उनसे लड़कर मृत्युवर के अधिकारी होते। कृपाचार्य अश्वत्थामा के मामा थे और उसके दु:साहसी प्रवृत्ति को […]
Please confirm you want to block this member.
You will no longer be able to:
Please note: This action will also remove this member from your connections and send a report to the site admin. Please allow a few minutes for this process to complete.