हम उस राह से गुजरना नहीं चाहते, जिस राह में खड़े हो जाए दिल्लगी। कह दो पागल आशिक़ दीवानो से, मुझे पसंद नहीं है किसी की आवारगी।।
हम उस राह से गुजरना नहीं चाहते, जिस राह में खड़े हो जाए दिल्लगी। कह दो पागल आशिक़ दीवानो से, मुझे पसंद नहीं है किसी की आवारगी।।
तुम से दूर रह कर भी, हमने अब जीना सिख लिया है। कौन है अपना कौन है पराया, हमने यह देख लिया है।।
वो जवानी ही क्या जिस जवानी में कोई कहानी ही न हो। वो मुहब्बत मुहब्बत ही नहीं जिसमें कोई अश्क ही न हो।।
आज फिर फलक से सितारे जमीं पर आने लगे है। शायद उनका ईशारा होगा जो मेरा एक अंदाज़ है।।
कितनी कशिश थी, उनकी मासूमियत में। भूल जाते थे सारा जहां। जो बदल गए अब, एक तूफान के बाद। अब न झलक मिलती है, ना निशान दिखते हैं।..
कितने कोरे कागज रंग डाले, तुम्हारे लिए। फिर भी ना कह पाए, जो कहना था….
बिन बुलाए आते हैं गमों के सागर, मुसीबतों के तूफान, और कभी चाहकर भी नहीं होती, खुशियों की बारिश , मुस्कुराहटों की बौछार।
फिर वही, कहीं से आयी घूंघरू की आवाज़। दिल को लुभा रही है, फिर वही पुरानी साज।।
सोचा रहा था मैं, इश्क़ है बेदाम की। बाद में पता चला, इश्क़ है बड़े काम की।।
कहीं हीर की टोली तो कहीं रांझे की टोली। अंजुमन में गूंज उठा शेर व ग़ज़ल की बोली।।
जब वो अपनी स्याह भरी गेसूओं को अपनी अंदाज से संवारने लगी। खुदा की कसम तब वादियों के नियत भी धीरे धीरे बदलने लगी।।
कभी वो नचाती थी उसे, अब सत्ता उसे नचाती हैं, गांव को गोद लेना, तो बात पुरानी ठहरी , अब मीडिया को भी, गोद लिया जाता है।
क्या करूंगा “अमित “जा के उनके शहर में। वफा के बदले मिला बेवफ़ाई उनके शहर में।।
मुझको अगर जीतना है , तो ज़िद कभी ना करना, बस हृदय को; थोड़ा-सा छू जाना।
ये जो उदासी है तेरे अंदर, वो खुशी में बदल जाएगी। तू उठ तो सही,संघर्ष के लिए , वक्त तो इंतजार में है तेरे, किस्मत भी बदल जाएगी।
जब तक़दीर से दोस्ती की, तब तदबीर ने मुझ से कहा। मुझे मत छोड़ ए नादान गर मैं नहीं तो तकदीर कहाँ।।
माना कि मुकद्दर पे जोर चलता नहीं किसी का। फिर क्यों न मेहनत से ही दोस्ती कर लिया जाए।।
वक्त को हमने वक्त की तरह बड़ी मेहनत से कदर किया। तभी तो आज मैं अपनी तक़दीर को अपने वश में किया।।
चलो फिर सजाएं मुहब्बत की दुनियां नहीं रोक पाये हमें अब ये दुनियाँ। बहुत हो चुकी अब कमबख्त दूरी, दर्द गम का सहना नहीं है जरूरी।
मैं चाहती हूं ख्वाबो की पौड़ियों पर चढ़ना, मगर पीछे से जिम्मेवारियों की रस्सी खींच रही है
असर है आपका शायद कि हम भी बन गए शायर किया इजहार शायरी से ज़माना कह न दे कायर।
जिंदगी ने सौगात में , खूबसूरत-सा लम्हा जरूर दिया , मासूम से हाथों ने जब , उंगलियों को मेरी थाम लिया।
ये ज़माना जो है दिखावे का ही है अंतर्गुणो को हमेशा नजरअंदाज किया जाता है
मैंने जिंदगी को हमेशा सहेली बनाकर रखा, मगर वो है कि हमेशा दुश्मनी निभाती रहती है।
रास्ते कठिन है प्यार के, फिर भी मैने हिम्मत नहीं हारा। तुम तो थोड़े ही दूर चल के कहने लगे अब मैं जीवन से हारा।।
इश्क़ क्या करे हम, वो कहते है इसके पास दिल ही नहीं है। उन्हें क्या पता कभी कभी बिन बरसात के ही हम भीग जाते है।।
हम इतने भी नादान नहीं थे, जितना की वो मुझे समझते थे। कस्मे वादे मुझ से करते थे, इश्क़ जनाब कहीं और फरमाते थे।।
बड़ा ना समझ है यार मेरा हमसे पूँछता है कौन है वो ? थोड़ा दिमाग नहीं लगा सकता!!
तेरी तारीफ में क्या कहूँ लफ्ज कम पड़ रहे हैं तू खूबसूरत है इतना अरमां मचल रहे हैं
।। आवारा से क्या पूछना इश्क़ किसे कहते हैं।। ।। हवस के नजरों से देखना भी क्या इश्क़ है।।
कब तलक निगाहें यूँ चुराओगे है यकीन एक दिन तो पास आओगे..
आज भी हम तुम्हारी एक ही मुस्कान पर, सैकड़ों शायरी बना सकते हैं तुम मुस्कान तो दो। आज भी शब्दों के फूलों को बिछाकर राह में स्वागत करेंगे, तुम, हमें आने का कुछ पैगाम तो […]
चल हट जा !! नहीं करना है मुझे इश्क़ विश्क़ मैं बर्बाद होता गया ले ले के इश्क़ में रिश्क़।।
सोच रहा था की काश मोहब्बत मे भी चुनाव होते एकदम खुल्लमखुल्ला प्रचार होते ऐसा गजब भाषण देते के एक ही रॅली मे आपको अपना बना लेते
पाक इश्क अक्सर होता नहीं, मगर जब होता है तो बेमौसम बरसता है! और जिस पर बरसता है, वो बहुत भीगता है, आंसुओं से भी और उस खुमार से भी!
अपने चहरे को इस तरह अपनी शक्सीयत के अनुरूप बनाइए… कि अपके पूरे विवरण के लिए… केवल चहरा ही काफी हों।। HEMANKUR❤️
दर्द का आलम सहसा बाढ़ बन गया, जब किताब के पन्नो में; उनकी तस्वीर रूबरू हुई।
कौन सा क़ासिद तुम्हारे पास भेजूं जो मुहब्बत की बता दे असलियत कौन सी कविता दूँ लिखकर साथ में प्यार की समझा दे थोड़ा अहमियत।
साँवरे, इसमें हमारा नही कोई दोष तुम्हारा ख्याल आते नही रहता होश हमारी तो क्या बिसात जब खयाल तेरा राधे को करता मदहोश।
बड़ी बेबाक बातें करते हैं वो, जमाना कब तक उन्हें चुप कराता। जो खौफजदा है नहीं, उन्हें खौफ कौन दिलाता….!
झुक कर उठ जाती थी, उनकी नज़रें, हमारी मौजूदगी में। और अब आलम ऐसा है, कि उनकी नज़र, अब उठती ही नहीं।
मय से मैने पूछा ग़म की दवा है क्या आपके मयख़ाने में। मय कहा किस ग़म की दवा चाहिए आपको मयख़ाने मे।
तुम्हें ढूंढती रही निगाहें, बरसों बीतने के बाद। कभी तुमने ना खबर दी, न ही तुम तक आने का पता।
खोखलापन है तुम्हारी बातों में अब ना रही तेरे लिए मेरे दिल में वो जगह ! जो हुआ करती थी पिछली बरसातों में..
‘कुछ तो है कि तुझसे किये वादे की खातिर, खुद से ही उलझ पड़ता हूँ कभी-कभी..’ – प्रयाग
लिखने का शौक जरा कम ही है मुझे पर तेरा लिखा हर पन्ना पढ़ा करता हूँ… हर बार गलतियों पर जुबां बोल पड़ती है बस यही गुनाह बार-बार करता हूँ…
सब कुछ देखा करता हूँ नादान नहीं हूँ मैं पुलिसवाला हूँ गुनाह पकड़ ही लेता हूँ मैं…
हिन्दू से पूछो , मस्लमां से पूछो , पूछना है तो सारे जहां से पूछो , सबका यही होगा कहना स्वर्ग से भी अच्छ है इस हिन्दुस्तान में रहना (संदीप काला)
कौन किस पे कुर्बान होता है इस ज़माने में। कोई वास्ता ही नहीं है यहाँ किसी को किसी से ।।
वो कहते हैं तुम्हारी कविता में भाव नहीं हैं मैं क्या जवाब दूं जब दिल ही नहीं हैं !!
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