इतने कांटे पाए हैं मैंने राहों में , कि फूलों की चाह ना रही । इतने रास्ते बदले हैं मैंने पल-पल , कि मंजिल की चाह ना रही।
इतने कांटे पाए हैं मैंने राहों में , कि फूलों की चाह ना रही । इतने रास्ते बदले हैं मैंने पल-पल , कि मंजिल की चाह ना रही।
वक्त का समुंदर भी कम पड़ गया, जब भूलने की बारी आई तो….
आंसू ठहरे थे उनकी पलकों पर , मगर गिरना नहीं चाहते थे , भीतर उठा था तूफान, पर बहना नहीं चाहते थे।
ऐ !आयतें मुझे नजरबंद, कर ले कहीं , काश ! कोई दुआ में, पढ़ ले कहीं।
वक्त की सुई कभी टूटती नहीं , मेरे साथ भी चलती है, तेरे बाद भी।
किसी को भी किसी से प्यार कैसे हो जाता है, किसी पर भी ये दिल जांनिसार कैसे हो जाता है, कैसे ये दिल किसी की एक झलक को तरसने लगता है, और कैसे एक अजनबी […]
चाय गरम है, मीठा कम है जीवन में गम है लेकिन अपने जीने का ढंग भी क्या कम है। हमें रुला दे, वक्त में ऐसा कहाँ दम है।
कोरोना में लगा हुआ लॉकडाउन तो हट गया मेरी जिंदगी तो लॉकडाउन में ही बसर करती है..
मुझे मिटाकर कहता है वो तुम पहले जैसी नहीं रही, फकत शक्ल ही बची है खुशबू नहीं रही…
कौन बचा है पूरा, किसका दिल टूटा नहीं। इन हसरतों की दौर में , कौन रोता नहीं !
पुरानी सी डायरी के फ़टे पन्ने पर लिखी अधूरी नज्म हूं मैं जिसकी खूशबू बरकरार है अभी भी कई मौसम गुजर जाने के बाद
दो पल का साथ, पर था तो सही। मुस्कुराए थे हम , कभी तो सही । क्यों दोष दें तेरे जाने का, चंद लम्हे थे न मीठे। तेरे साथ ,पर थे तो सही।
कलियुग ही सही, मुझे सीधे रस्ते चलने दे, सतयुग न सही ,मुझे टेढ़े रस्ते रास नहीं आते हैं। ……………✍️गीता..
आंखे मीच कर भी में तुम्हे पहचान लेती हूं जिंदगी तुम्हे मैं जीने से पहले जान लेती हूं
जिसके साथ कोई घात होता है, यकीनन ख़ुदा उसके साथ होता है।
चलो जरा इश्क़ करके देखे, किसमें कितना है दम । सुनता हूँ जिसको डस ले , उसको निकल जाता है दम ।।
वक्त की कद्र ,न करते कुछ लोग। बस ,परछाइयों के पीछे भागते रहते हैं।
खैरात में दे दी है हमने ,अपनी जीत किसी को, लोगों को लगा ,हम हार के आ गए।
हर फासलें की गहराई होती है और कोई उतर कर नहीं देखता ….
तेरे हर दर्द की तासीर जानते हैं, तेरे हर रंजो गम की वजह जानते हैं, वो बेपरवाह है ,तेरे इश्क से , लेकिन तेरी रज़ा क्या है? वो सब जानते हैं।
टूटे हुए अरमानों को बचा रखा है, सबकी नजरों से छुपा रखा है , जी तो हम भी रहे हैं लोगों के बीच, मगर अपने जज्बातों को दबा रखा है , किस पर यकीन करें […]
उनसे उम्मीद लगाना बेकार हैं क्योंकि शाम की खिड़की से , सुबह का उजाला नहीं दिखता।
सच की जमीन पर, हम भी चल ना पाए , और औरों से उम्मीद लगा रखी है।
इमारतें मजबूत हो तो, साथ सभी का होता है, वरना खंडहरों को, कौन अपना आशियाना बनाता है।
ख़त्म हो जाएंगी एक दिन ये तन्हाइयां, मिल जाएगी मंज़िल, दूर होंगी रुसवाईयां..
जनवरी से दिसंबर गुजर गए, उस बेख़बर को खबर ही नहीं। उसे क्या पता इश्क़ करने वाला कोई आशिक़ ज़िंदा है भी या नहीं।।
दिल के आगरे में मैं भी एक ताजमहल बनाउंगा। पत्थर ना सही संगदिल से ही महल को सजाउंगा।।
बेफिक्र रहना आदत थी उनकी , कब जिम्मेदारियों ने दस्तक दी पता ना चला ।
तलब लग गई उनकी , उस प्याले की तरह है , जो हर बार इंतजार करता है कि वो उसे फिर से भर दे।
बहुत निराली है ये दुनिया प्रज्ञा ! यादों की बात तो करती है पर याद नहीं करती…
हम उनमें थे — वो मुझमें थे, उफ़ !!!! , वो क्या दिन थे। जब हम रुठ जाते थे, तब वो चाँद सितारे तोड़ लाते थे।।
कई वर्षों से इस पुरानी हवेली में कोई आया ही नहीं। जो भी आया मैं गैर समझ कर उसे अपनाया ही नहीं।।
वफा के बदले उनके शहर में”अमित”बेवफ़ाई ही मिला। चलो गम को भुलाने के लिए मयख़ाने में मय तो मिला।।
वो आये दबे पांव से यूं कानों ने तो कुछ सुना नहीं मगर दिल ने सब सुन लिया
ये कैसा कारवां जो कभी खत्म ना हुआ, वह उम्मीद कभी न धुंधली हुई और न मिटी , वह साथ पाने का जज्बा अभी भी बरकरार है।
हैसियत क्या थी मेरी पूछिए मत, बस किताब के कोरे पन्ने थे , लिखते रहे अपनी रूबानी, जब बनी ना कोई गजल ना कोई नज़्म, फटकर सिमटकर पैरों तले बस कुचले गए।
आज कर दूं, आंखें नम या समंदर कर दूं , मेरे भीतर का वो दर्द ; कैसे संदल कर दूं।
‘वजह हुआ करती है नज़रों के झुक जाने में, बेबाक आँखों में शर्मिन्दगी का सलीका नही होता.. वो तोड़ सकते हैं मेरे यकीं को किसी भी वक्त मगर, बेरुखी जताने का ये आखिरी तरीका नही […]
अजीब सी है ये ज़िन्दगी, कभी, फूलों सी कोमल लगी। कभी शमशीर की धार हुई, दिल के जज्बातों को जब- जब किया बयां, एक कविता हर बार हुई ।
ऐ ज़िन्दगी सुन, शिक्षक दिवस मुबारक हो, तू भी मेरी गुरू है, बहुत कुछ सिखा दिया ।
तराशने वालों ने, पत्थर को भी तराशा है, नदानों के आगे हुआ, हीरे का भी तमाशा है।
अच्छे इंसान की भी एक आदत बुरी पाई, हर किसी को समझा अच्छा, बस यही मार खाई ।
हर क्यूं का जवाब नहीं होता, हर जवाब लाजवाब नहीं होता । यूं तो हम ख्वाब देखते हैं बहुत सारे, पर, हर ख्वाब तो पूरा नहीं होता ।
टूट कर बिखरी नहीं, सांस है अभी थमी नहीं। थक चुकी है जीवन आशा , फिर भी लौ बुझी नहीं।
कभी पल-पल इबादत करते थे मेरी, अब किसी गैर की आयत हो गए।
तेरी खिड़की से झांकते बादल, तेरे हाथों में चलती कलम । बड़ी ही अद्भुत लगती हमें, कुछ लिखते ही रहते हो हरदम ।
कलम कहती है,बोल दूं, क्या राज़ दिलों के खोल दूं। “गीता” चाहे वो मौन रहे, नज़र लग जाती है, कौन कहे।
ए दोस्त —- जो इश्क़ में बदनाम होते है। दरअसल वही आशिक़ कामयाब होते है।।
झील में उतरने से पहले काश मैं गहराई को नाप लेता। अब दलदल में फंसता जा रहा हूँ काश कोई बचा लेता।।
हम उनके लिए “मीर”, बद से बदनाम होते गए। वो नादान मुझे इम्तहान पे इम्तहान लेते गए।।
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