जब जब ज़ुल्म की जलजले इस ज़मीन पे फन फैलाया। तब तब इन्सान की इंसानियत खून की आँसू ही रोया।।
जब जब ज़ुल्म की जलजले इस ज़मीन पे फन फैलाया। तब तब इन्सान की इंसानियत खून की आँसू ही रोया।।
बहुत खुश थे हम, दुनिया में अपनी, मगर ये इश्क ! सारी खुशियां खा गया, कब से भुला दिया था तुमको, तेरी यादों को, मगर फिर अचानक क्यों, मुझे रोना आ गया।
जज्बा जो जगा है ज़हन में, कुछ पाने का, उसे कैंसर से कम ना समझना, उबल रहा है हौसला, फौलाद-सा, कभी गलती से पस्त ना समझना।
बहुत मनाता है दिल मुझे , उसके लिए, मगर मैं कैसे विचलित होती, ठोकरों से उभरना सीख जो लिया ।
छोड़ दिया है हमने; आजकल, उनके दिल में रहना भला कैसे सांस लेते! पसंद नहीं हमें भीड़ में रहना!
वे जानते हैं हमारे बारे में , मगर , थोड़ा आड़ में रखते हैं , पसंद नहीं है हमें उनका रूस जाना, मगर , वह कभी-कभार रूठ जाते हैं।
इस बार अगर ठुकरा दिया तूने तो फिर कभी लौटकर ना आएगे चली गई साँस भी मेरी तो भी तुझसे कंधा ना लगवाएगे….
मैं कविताएं नहीं लिखती ना लिखना ही जानती हूँ बस अपनों के दिये दर्द ही बयां करती हूँ..
मरने की कगार पर पहुँच गये हैं हम पर लोगों ने आज भी मुझ पर चिल्लाना नहीं छोंड़ा…
आँखें पथराई हैं तेरी राह देखकर मुलाकात को बेचैन हैं इतना पर तू तो ईद का चाँद हो गया है..
जलते चिराग़ों से कह दो, कहीं और जा के जलें , ख़ुशी बहुत है यहां जलने वालों का काम नहीं… ……….✍️ गीता………
महफ़िल में हमसे हर शख्स खफा था, क्यूंकि, जो दिल में है, लब पर वही हर दफा था । *****✍️गीता*****
बचपन में खेल का तकाजा, जवानी में मौसम के तकाजा तो बुढ़ापे में उम्र की तकाजा ।। जब आ जाए अंतिम घड़ी , उठ जाता है हम सब के जनाजा ।।
तुम हर मर्तबा यही कहते हो, इश्क़ बुरी लत है। चुपके चुपके दिल चुरा लेना,ए कौन सा लत है।।
अश्क़ बहा के भी उस बेवफा को मैं अपना न सका। उनको खबर थी मेरी हालत फिर भी वो बेखबर रहा।।
ओस की बुंदों को, चमकते देखा है। उनकी आंखों में, कहीं बिखर न जाए। मेरे छूने से।
जब उन्हें यूं घमंड हुआ, अपनी सूरत पर। वक्त ने भी दिखला दिया, जब झुरिया पड़ी चेहरे पर।
नींद की चादर ओढ़ कर, सोए जमाना हो गया। रात यूं ही कट जाती है, और पल में सवेरा हो जाता है।
कोई मुस्कुरा रहा है आज यूं , हमें फुरसत में याद कर के हिचकियां आना तो चाह रही हैं, पर हिचकिचा रही हैं..।
मिट जाए जिंदगी की कड़वाहट , ए खुदा! तू इसे मीठा सा सच कर दे।
मैं अक्सर आंखें मूंद लेता हूं, चैन से सोने के लिए, मगर मक्कारी; बीमारी जमाने की; मुझे सोने नहीं देती!
कुछ पन्नों को रखें राज़, ये भी आजमाइए दर्द में मज़ा लेते हैं कुछ लोग, ज़िन्दगी को खुली किताब ना बनाइए…
दर्द ना पढ़ पाओगे, मेरे चेहरे से कभी मेरी तो आदत है, तेरी बात पे मुस्काने की…
रोता हुआ ही मिले, हर टूटा इंसान हमें भी गम छिपाने आते हैं, मुस्कानों के पीछे…
अरे पागल आशिक़ बस इतने में ही तुम घबड़ा गए। ज़ुल्म के दौड़ आया ही नहीं तुम अभी से घबड़ा गए।।
प्यार भी करती हो ज़माने से भी डरती हो। गर दम नहीं है तो दो नाव पे क्यों चढ़ती हो।।
चलो हम तुम इश्क़ फरमाते है। ज़माना यों ही जल जल मरते हैं।।
ख्वाहिशों की मैं बातें आजकल नहीं करती जिंदगी को बस किश्तों में जिया करती हूँ।
रोती हैं ख्वाहिशे और तन्हाई मुस्कुराती है **************************** जब कभी भी हम तुझको याद किया करते हैं।
रात-दिन रहते थे हम एक-दूजे के साये में **************************** एक-दूजे के तन से हम बदन को ढका करते थे।
आप चाहते तो हालात बदल सकते थे, आप के आंसू मेरी आंखो से निकल सकते थे । मगर आप तो ठहर गए झील के पानी की तरह, दरिया बनते तो बहुत दूर निकल सकते थे।
चाँद में दाग है ये वो बार-बार कहता था हम चाँद को बेदाग कहा करते थे वो मेरी हर एक बात मान जाता था हम हर एक बात पे उससे सवाल करते थे।
जब से देखा तुमको ऐ सनम, हमसे ही दिल हमारा नहीं जाए संभाला । रात आंखों में ही कट जाती है, लगता है नींद ने आंखों से रिश्ता ही तोड़ डाला।
छुप-छुप के देखती थी मुझको जब नजर उसकी —————————————- तब कितना खुद पे हम गुरुर किया करते थे।
रोज-रोज रूठती थी मैं और वह मनाता था —————————————- अपनी जवानी के ये अंदाज हुआ करते थे।
तेरे इश्क का जुनून मेरे रग रग में बस गया है। ये एहसास मुझे अब हद से ज्यादा होने लगा है।
उसकी दीद में ही मेरी ईद हुआ करती थी —————————————— हम कुरान उसकी इबादत में पढ़ा करते थे।
कल तलक फिरता था वह मेरा बनके दीवाना हम आंखों ही आंखों में बात किया करते थे आज बहुत दूर है वो हमसे मगर फिर भी हम सपनों में उनसे रोज़ मिला करते हैं।
नींदें हैं आजकल ना जाने क्यों रूठी हमसे वो मिलेगा तो यह गुत्थी भी सुलझा लेंगे
दीद हो जाएगी तो बातें चार कर लेंगे रोना आएगा तो उसके कंधे पर सिर रख लेंगे वह जाने लगेगा रूठ कर अगर हमसे हम मनाने के लिए उसके पैर पड़ लेंगे।
उनके आने से मेरा जहान जगमगाया था उनके जाने के खयाल से भी पैर डगमगाते हैं, छोड़ जायेंगे एक दिन वो मुझको तन्हा ही यह सोचकर भी हम तो सिहर जाते हैं।
टूट कर चाहने से कुछ भी नहीं होता है, सब खेल मुकद्दर का होता है ये अब समझ पा रही हूँ मैं।
जिसके बिन जीना एक पल भी ना मुनासिब था ++++++++++++++++++++ उसके बिना पूरी उम्र जिए जा रही हूँ मैं…
उसके होंठों पे बनके मैं गुलाब टूटी हूँ, *********************** अब तो काँटों से भी मैं प्यार किया करती हूँ।
खाक में मिला के उसने मेरे तन को राख किया कब्र में भी उसी को याद किया करती हूँ ।
मैं तो मरती हूँ उसकी एक-एक शोखी पर रूबरू उसको मैं महसूस किया करती हूँ।। अभिव्यक्ति दिल से ❤❤
अक्सर दिल में बैठकर वो बात करता है मैं आजकल ये एहसास किया करती हूँ । अभिव्यक्ति दिल से ❤❤
दीद हो जाए उसकी एक बार मुझको बस *************************** हर आने-जाने वाले पर इसी वाइस मैं नजर रखती हूँ।
कोई आ ना जाए दिल में मेरे रहने को यही सोंचकर दिल के दरवाजे बंद रखती हूँ। एक बार खा चुकी हूँ पहले प्यार में धोखा इसलिए छाछ भी मैं फूंक-फूंक पीती हूँ।
वह चला जाएगा ये सोचकर मैं रोती थी, रात को रात बनाने से अब मैं डरती हूँ। छोड़कर जा चुका है वह तो मुझे बरसों से लौटकर आएगा ये इंतजार करती हूँ।
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