Category: Poetry on Picture Contest

Submission for ‘Poetry on Picture’ Contest

  • ये तो वही किसान है

    चिड़ियों के चहचहाने से पहले,
    बैलो के रंभाने से पहले जो जाग जाता है,
    ये तो वही मेहनत का पुजारी किसान है|
    अन्न को उपजाने में जिसकी दिन-रात बहती लहू और जिसकी लगती जान है,
    ये तो वही किसान है |

    अन्नदाता ही अन्न को आज मोहताज है,
    जिसके भरोसे कितनों के चुल्हों में आग सुलगते है,
    और जिसके कारण आज दंभ भरते बड़े साहूकार है ,
    ये तो वही मेहनतकस किसान हैं|

    कर्ज,तकलीफ और बेरोजगारी ही आज किसान की किस्मत बनी है,
    घुट-घुट कर जी रहे किसानों की अब हिम्मत भी टूटने लगी है |
    अब आत्महत्या करना ही उनकें बस की बात रहीं है,
    ना जाने कब किसानों की तरक्की होगी,
    उनके बच्चों की बुनियादी जरूरतें पूरी होगी |
    ना जाने कब किसानों के चेहरे पर मुस्कान होगी,
    ना जाने कब किसानो की किस्मत धनवान होगी |
    मेहनत ही जिसका ईमान है,
    ये तो वही किसान है |

    सरकारें बनती और गिरती है,
    पर किसानों की तकदीर कहाँ संवरती है |
    कर्ज में डूबा किसान अपनी किस्मत बदलने के लिए आंदोलन कर रहा है,
    अपने हक के लिए सड़को पर ठंड मे मर रहा है |
    परेशानी जिसके हाथों की लकीरें बनी है,
    ये तो वही मेहनत करने वाला किसान है |

    हाथ जोड़े जिसका सर झुका है,
    उम्मीद भरी आँखो से जो रोटी को देख रहा है,
    जिसके लिए सरकार की भी बदल गई ईमान है,
    ये तो वही कर्म को ही पूजा समझने वाला किसान है |
    किसान गर आंदोलन कर रहा है,तो क्या बुरा कर रहा है ,
    वो बस अपनी पसीने की कमाई के लिए दिन-रात लड़ रहा है ,
    पर उसकी किस्मत कहाँ बदल रहा है |
    सोचो गर किसान ना होते तो हमारा क्या होता,
    तो हलक के नीचे इतनी स्वादिष्ट एक निवाला भी नही होता है |
    फिर भी समझ नही आता कि हम किसानों की सता को क्यूँ नकारते है ,
    हमारे खेतों में हरियाली भूमिपुत्र किसान भाई से है, ये बात हम क्यूँ नहीं स्वीकारते है |

    आज फिर से ‘जय जवान,जय किसान का नारा
    लगाना होगा,
    किसानों का सस्ममान वजूद लौटाना होगा |
    किसान भाई! टैक्टर रैली कोई सामाधान नही है ,
    मिटा दे कोई आपका वजूद बना आजतक कोई
    संविधान नहीं है |
    किसान भाईयों को ये समझाना होगा कि वे आंदोलन ना करे,
    अपने आपको बदनाम ना करे |
    अब वो समय आ गया है जब आपकी भी किस्मत चमकेगी |
    गांवो में दूध की नदियाँ तथा खेतों में हरियाली
    बिखरेगीं |
    ये तो वही किसान है जिसकी कभी बिकती नही ईमान है |

  • Kisan ka samman khalistani beiman

    तुम खालिस्तानी हो या पाकिस्तानी
    उतारा सेना को तो पड़ जाएगी भारी
    सब्र ठहरा है इम्तिहान मत लेना
    खून बहे तो फिर किसान आंदोलन मत कहना

    पुलिस की जान को क्या तुमने समान समझा है
    तलवार से खेल रहे हो क्या इकलौता औजार समझा है
    उठानी अगर बंदूक पड़ गयी
    तो हमने भी जमीं नहीं शमशान समझा है

    किसानों को नमन करो
    खालिस्तानी का दमन करो

  • किसान

    खेतों के सब बीज शज़र हो जाते हैं
    सरहद पर वीर अमर हो जाते हैं
    तुम वर्दी पहने मिट्टी साने क्या बतलाते हो
    हम भी इनके जैसे हैं ये दिखलाते हो,

    सीखो जरा लाल अटल और बल्लभ से
    क्या होते हैं वीर-किसान देश नगर के
    अब उनको तुम गोली मारो या फासी लगवा दो
    कर्ज़ से इक़ है मरने वाला एक तुम्हारी यारी से,

    ये भारी है सर्द रात मगर इस दिल्ली की
    तान खड़े है सम्मुख किसान-जवान
    कर रहै है सत्ताधारी न रहे कोई जवान किसान
    फिर कर रहे भारी नुकसान इस दिल्ली की,

    माना के इक़ नशा है सत्ता पर रहने का
    पर ऐसा न करो शोषण जनता के लोगों का
    तुम रखो ये देश संभाले रखो
    पर मत बेचो ये देश जनता के लोगों का,

    तुम किस चेतन के अचेतन पर अटके हो
    तुम कहो नही तुम उसे अन्तर्मन में रहने दो
    देश की सारी संपत्ति को लेकर आए
    तुम उस सम्पति का व्योरा खैर छोड़ो रहने दो,

    क्या कहते हो “बापू” के सपने को पूरा करने
    तुम अपने बात पर कब तक रहते हो रहने दो
    अबकी बार….सरकार का उदघोष अटल है
    कुछ करो अटल बल्लभ से काम,खैर रहने दो।

    तुमको क्या सियासत की रोजगारी है
    हम जैसे वनवासी को नौकरी की आस जारी है
    ऐसे भी अत्याचार कौन करता है बदर’
    अपना भी कहता है और तीर ज़िगर के पार भी करता है।

    -कुमार किशन_बदर

  • आंदोलन

    भूमिपुत्र किसान भाई, तुम जिद्द अपनी छोड़ दो
    धरना प्रदर्शन की दिशा भी घर की तरफ मोड़ दो
    देश पर मण्डरा रहे ख़तरे को गम्भीरता से भांप लो
    तुम्हारी आड़ में मचा आतंक अब तुम पहचान लो

    किसान भाई कोई शक नहीं, व्यथा तुम्हारी सच्ची है
    आंदोलन तुम्हरा हाईजेक हुआ खबर ये भी पक्की है
    तुम किसान भोले भाले, दुश्मन चंट और चालाक है
    देश के अंदर और बाहर, हर तरफ गम्भीर हालात हैं

    रंगे सियार जैसे दुश्मन अंधेरा हर ओर तलाश रहे
    भटके हुए नौजवानों को, बहुरुपिया बन तराश रहे
    तुम्हारे आंदोलन में अपनाबन, विश्वासघात कर रहे
    आंदोलन की आड़ में द्रोही, घातक घात लगा रहे

    ठहरो, सोचो, समझो ट्रेक्टर रैली का प्लान तुम्हरा था
    गणतंत्र दिवस पर शक्ति प्रदर्शन का सिर्फ इरादा था
    फिर लालकिले पर द्रोह, झण्डा किसने फहराया था
    सुरक्षाकर्मियों को मार, तुम्हें बदनाम क्यों करवाया था

    एक बात और समझो, किसान गांव, खेत में होता है
    ज़मीन खोदना, बीज बोना, पानी भी चलाना होता है
    कड़ी धूप, सर्द रातें उधारी, मफलूसी में घर चलाता है
    फिर आंदोलन के नाम पर कौन इतना पैसा बहाता है

    बंद करो अब आंदोलन खुद को मत बदनाम करो
    कौन माचिस दिखा रहा, उसकी तुम पहचान करो
    आज समझौता कर देश संविधान का सम्मान करो
    आंदोलन से क्या खोया, क्या पाया गहनजांच करो

    जय किसान, जय जवान, जय जय जय हिन्दुस्तान

    राकेश सक्सेना
    3 बी 14, विकास नगर, बून्दी (राजस्थान)
    मोबाइल 9928305806

  • अन्नदाता

    खेतों से निकल कर सड़को पर क्यों उतर आना पड़ा,
    लाल किले पर उत्तेजित हो क्यों झण्डा लहराना पड़ा।।

    लेकर ट्रेक्टर रैली में बढ़ चढ़के क्यों डण्डा खाना पड़ा,
    रस्ते पर लगा टेण्ट रातों में आखिर क्यों सो जाना पड़ा॥

    अन्न उगाने वालों को आखिर भरभर के क्यों ताना पड़ा,
    अपनी ज़मीन को लेकर सरकारों से क्यों टकराना पड़ा।

    कमी कहाँ थी संसद में जो बिल किसान बनवाना पड़ा,
    मुश्किल हुआ जवाब नहीं तो क्यों पल्ला छुड़ाना पड़ा।

    राही अंजाना

  • . ं. किसान

    देखो देखो किसान है देश की रीड की हड्डी इनको ना तोड़ो तुम इन को मजबूत बनाओ तो देश मजबूत होगा
    इनको ना राजनीति की आग में मत झोंको किसान तो देश की अर्थव्यवस्था का मूल मंत्र है इनको जला दोगे देश का क्या होगा देखो देखो किसान है देश की रीढ़ की हड्डी….
    आजादी आंदोलन में जैसे एकजुट हुए थे वैसे किसान आंदोलन में एकजुट हो जाओ आपस का स्वार्थ जला दो.
    यहां सिर्फ किसान की बात नहीं है यहां पूरे देश की बात हैं देश की अर्थव्यवस्था की बात है अब तो जागो देशवासियों

  • मेरे हवाले कर दो…

    ‘रेत पर लिख दो और लहरों के हवाले कर दो,
    आज इस साल की सब बन्द रिसालें कर दो..

    इस नए साल में बाहर न कोई ढूंढे तुम्हे,
    मेरे रब तुम अगर दिलों को शिवाले कर दो..

    किसी भूखे के लिए ये बड़ी वसीयत है,
    कि उसके नाम कभी चंद निवाले कर दो..

    किसी की ऊँची हैसियत से जला क्यूँ कीजे,
    जलो ऐसे कि हर तरफ ही उजाले कर दो..

    किसी को हश्र दिखाना हो किसी आशिक का,
    मुझी को ताक पर रखकर के मिसालें कर दो..

    तुम अपनी यादों से कह दो कि रिहा कर दें मुझे,
    मैं थक गया हूँ मुझको मेरे हवाले कर दो..

    रेत पर लिख दो और लहरों के हवाले कर दो,
    आज इस साल की सब बन्द रिसालें कर दो..’

    – ‘प्रयाग धर्मानी’

    मायने :
    रिसालें – पतली किताबें
    शिवाले – मंदिर
    मिसालें – उदाहरण
    रिहा – आज़ाद

  • वही सागर का तट

    वही सागर का तट
    बालुकामय सतह।
    जहाँ आनन्द मनाया
    कुछ इस तरह।।
    खाया -खेला
    नाचा-गया।
    गीले बालुका पर
    अंगूठा घुमाया।
    कुछ इस तरह।।
    अंकित हुआ
    बीस सौ बीस।
    कितने दुखो के
    भरे हैं टीश।।
    सागर के लहरों ने
    मिटा दिया वो अंकन।
    पर दिल में एक
    अधूरी यादों का है कंपन।।
    शायद लिखा हुआ होगा
    अब तक ज्यों का त्यों।
    चल पड़े आज फिर
    उसी ओर आखिर क्यों।।
    शायद कुछ खोजने
    और करने मन को हल्का।
    वही अधूरी यादे
    अंकित बीस बीस हल्का।।
    समझ न पाया क्या था
    हकीकत या फिर मन का टीश।
    होकर आदत के वशीभूत
    लिख डला बीस सौ एकीश।
    ठीक उसी तरह
    जैसे पृष्ठ पलट रहा हो कैलेंडर का।
    ‘विनयचंद ‘ ने भी लिख डाला
    अपने मन के अन्दर का।।

  • मैं, मैं न रहूँ !

    खुशहाल रहे हर कोई कर सकें तुम्हारा बन्दन।
    महक उठे घर आँगन, हे नववर्ष! तुम्हारा अभिनन्दन।।
    दमक उठे जीवन जिससे
    वो मैं मलयज, गंधसार बनूँ !
    उपवास करे जो रब का
    उस व्रती की मैं रफ़्तार बनूँ !
    सिंचित हो जिससे मरूभूमि
    उस सारंग की धार बनूँ !
    दिव्यांगता से त्रस्ति नर के
    कम्पित जिस्म की ढाल बनूँ !
    मैं, मैं ना रहूँ,
    हारे- निराश हुए मन की,
    आश बनूँ !
    बिगत वर्ष में में
    जिनका अबादान मिला
    कृतज्ञता ज्ञापित,
    उनकी मैं शुक्रगुजार बनूँ!
    मुकाम कैसा भी आये
    पर मन में थकान न आये
    हे ईश! हर मुश्किल में
    संभलने का समाधान बनूँ!

  • नव वर्ष आ रहा है

    समय की धीर लहरें
    बढ़े ही जा रही हैं,
    खुद में बीते दिनों को
    समाते जा रही हैं।
    जा रहा यह बरस अब
    वक्त के इस जलधि में,
    आ रहा नव-बरस है
    आज बिंदास गति में।
    रेत सी जिन्दगी है,
    बीतता वक्त है यह,
    काल के इस उदधि में
    समाता वक्त है यह।
    नए पल आ रहे हैं
    पुराने जा रहे हैं,
    रेत में चिन्ह अपने
    घोलते जा रहे हैं।
    पुराना जा रहा है
    उसे है नम विदाई,
    नया जो आ रहा है
    आज उसकी बधाई।
    पा सके थे नहीं जो
    आप बीते बरस में,
    वो मिले आपको अब
    आ रहे नव-बरस में।
    नैन आशा जगायें
    होंठ मुस्कान लायें,
    जहां भी आप जायें
    वहां सम्मान पायें।
    दूर हो रोग -बाधा
    सभी का स्वस्थ तन हो
    बनें राहें सरल सब
    नहीं कुछ भी कठिन हो।
    सभी निज लक्ष्य पायें
    उदर का भक्ष्य पायें
    झूठ के मार्ग को तज
    सत्य के गीत गायें।
    रेत सा वक्त है यह
    लहर गतिमान है यह
    नहीं रुकता कभी भी
    सभी को भान हो यह।
    निरंतर चल रहा है
    वक्त, हम भी चलें अब
    इस नए वर्ष में अब
    सभी संकल्प लें यह।
    जा रहे नव बरस को
    आज है नम विदाई,
    आ रहे नव बरस की
    आज सबको बधाई।
    ——- डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय

  • सन् 2020

    सन् 2020 को विदा करते हैं,
    दुःखो को खुद से जुदा करते हैं।
    खुशियाँ का खुल के आगमन,
    हर इक से चलो वफ़ा करते हैं।

    सन् 2020……

    वक्त कट गया मुश्किल था जो,
    इसे भूल जाने की ख़ता करते हैं।
    चलो बोते हैं ज़मी में नए पौधे,
    फिर कोशिश कर बड़ा करते हैं।

    सन् 2020……

    साथ इक दो नहीं हजारों ले गया,
    प्रार्थना सब मिल दोबारा करते हैं।
    जाने अनजाने में हुई जो गलती,
    भुला सब हम गले लगा करते हैं।।

    *राही अंजाना*
    नव वर्ष मङ्गलमय हो।💐🙏💐

  • उज्जवल बनाओ नया साल

    अपनी त्रुटियों में करके सुधार
    उज्जवल बनाओ नया साल।
    आलस्य व नकारात्मकता को
    हे मानव जीवन से निकाल।।

    समय का न दुरपयोग कर
    यह पर्याप्त है रख ख्याल।
    स्वयं को नियंत्रित करके
    सहजता से जीवन संभाल।।

    साहस और आत्मविश्वास की
    अंतर्मन को तू पहना खाल।
    सकारातमकता को बना लेना
    सदैव विकट क्षणों में ढाल।।

    सपने सच हो तेरे अनमोल
    किताबों से प्रेम करना अपार।
    संकल्प तेरा ना विफल हो
    पूर्व त्रुटियों में करना सुधार।।

    गुरुजन शिक्षित होकर तुम
    स्वच्छ बनाना संपूर्ण समाज।
    मात- तात से आशीष लेकर
    सफल बनाना अपूर्ण काज।।

    जीवन की भाग दौड़ में तुम
    प्रिय मित्रों को न कभी भूल जाना।
    विपत्ति में वह संग होंगे तुम्हारे
    सदैव उनके काम तुम भी आना।।

    भले आसमान को छू लो तुम
    प्यार को कभी न करना कम।
    मैं के अहम में आकर आज
    भुला न देना तुम कल थे हम।।

    अपने आचरण से जीवन को
    रंग बिरंगा करना जैसे गुलाल।
    खुद को बेहतर बनाना हर दिन
    क्योंकि बीतेगा यह भी साल।।

  • नए साल ने दस्तक दी है

    नए साल ने दस्तक दी है
    आओ इसको हग कर लें ।
    मन तन वचन ध्यान से
    अपना सारा जग कर ले।
    बीत गया सो बीत गया
    कुछ सीख गए कुछ सिखा गया ।
    कल का नहीं पता क्या हो
    अपनों की कुछ दूरी मिटा गया।
    माना कि बहुत सताया सबको
    कल गया साल जो बीत गया।
    पर हमने भी कुछ छीना उसका
    वह तभी तो बाजी जीत गया।
    धरती पर नहीं है हक केवल इंसानों का
    सीख दे गया ये जाने वाला साल ।
    अपने पराए की पहचान हो गई
    खोखला साबित हो गया संबंधों का जाल।
    अदृश्य करोना ने बदल दिया है
    सबके जीवन जीने का तरीका।
    स्वच्छ सतर्कता का पाठ बहुत पढ़ा
    पर 2020 में ही आकर हमने सीखा।
    वीरेंद्र सेन प्रयागराज

  • “स्वर्णिम नवल वर्ष”

    कालचक्र ने लिखा था एक रोज़
    रेत पर उंगलियों के पोरों से,
    वह हस्तलेख मिट गया
    सागर की लहरों के थपेड़ों से…
    स्वागत है कर जोड़कर २०२१,
    खूँटी पर अब टाँग दी
    वैमनस्यता भरी कमीज…
    सागर की जलधार ने
    मिटा दिया एक नाम,
    २०२० ऐसे ही गया
    आया नव स्वर्ण विहान…
    हे नवल वर्ष ! तुम सबके
    जीवन में सुख का संचार करो…
    दीनों दुःखियों का त्रास हरो,
    मानवता का कल्याण करो…
    तुम आओ जीवन पथ पर और
    प्रेरणा का नव उत्थान करो…
    भूखे की रोजी-रोटी बन,
    हर नस में रक्त संचार करो…
    स्वप्नों के नूतन पुहुप खिलें,
    बैरी भी हँसकर गले मिलें…
    बोये जाएं सर्वत्र पुष्प,
    नहीं हृदय में शूल मिले…
    कुछ ऐसा हो यह नवल वर्ष,
    सबके गृह में हो समृद्धि- हर्ष…
    अधरों पर केवल मुस्कानें हों,
    पलकों के तट पर ना नयन जलधारे हों…
    हर मानव नीरोग मिले,
    कोरोना ना अब कहीं दिखे…
    तरुणाई मुसकाये और
    अवनि भी स्वच्छन्द मिले…
    जो घाव दिये विगत वर्ष ने
    हे आगत ! तू उसका मरहम बन,
    सागर में मिल जाए सर्वस्व व्यथा
    पुष्पित हो विश्व का तन-मन…

    “नववर्ष मंगलमय हो” आप सभी को प्रज्ञा की ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं…🙏🙏🙏

    काव्यगत सौंदर्य एवं साहित्यिक योगदान:-

    यह कविता मैंने सावन द्वारा आयोजित “फोटो प्रतियोगिता” पर लिखी है,
    मैंने सावन के लगभग सभी मापदण्डों को ध्यान में रखकर लिखी है तथा हर बारीकी का ध्यान रखते हुए लिखी है…

    मैंने फोटो में जो भी दिखाया गया है उसको ध्यान में रखते हुए समग्रता का भी समावेश किया है..
    मैं कहाँ तक सफल हुई यह तो आप सब ही बताएगें परंतु यह कविता लिखने में मुझे बहुत मनन तथा अध्ययन करना पड़ा जिसके कारण कई दिन लग गये…
    अलंकारों के साथ-साथ, रस, नवीनता तथा समाज में सकारात्मक प्रभाव डालने का भी प्रयास किया है…

    आगे आप सभी की इच्छा चाहे तो कमेंट बाक्स में कुछ लिखकर मेरी मेहनत पर टिप्पणी करें अन्यथा आपकी इच्छा…

  • अलविदा 2020 नववर्ष की चाहत में

    नववर्ष आया है, झूमो, नामों सब खुशियाँ मनाओ,
    दहशत भरी 2020 की यादें को अब अलविदा कह जाओ |
    नई उमंगे, नई उम्मीदों के साथ अपना पग खुशहाली की ओर बढ़ाओ |
    बुरे वक्त में भी साथ निभाने का आओं अब ये कसम खाए,
    बुरा वक्त अब तुमको जाना होगा, खुशियाँ अब तुमको आना होगा |
    बुरे वक्त में हम इतना संयम दिखाई,
    कोरोनाकाल के सभी सहयोगी के सहादतों को तो हम भूलकर भी हम भूला ना पाएँगे |
    पर इस नववर्ष में उम्मीदों के किरण जगाएँगे |
    आनेवाले हर मुसीबतो का सामना हम हँसते- हँसते कर जाएँगे ,
    डॉक्टर, जाबांज सिपाही और कोरोनाकाल के सभी सहयोगी का हम तहेदिल से करे सम्मान,|
    जिसने अपनी जान जोखिम में डालकर कितनों
    की बचाई हैं जान,
    नववर्ष की तहेदिल से हैं सबको शुभकामना,
    साथ निभाए सबका, पूरा करे हर कर्तव्य अपना |
    अलविदा 2020 नववर्ष की चाहत में,
    सबको सुकून भरी ज़िन्दगी मिलें और हर दर्द से मिले सबको राहत ||

  • 2021

    उठती रहेगी
    इक लहर
    सागर से निरंतर
    जो समाहित कर लेगी
    हर पीड़ा
    जो दी बीते वर्ष ने
    हर बार होगी
    इक नईं हिलोर
    जो देगी हौंसला
    सतत् नवीन
    जीवन जीने की
    नववर्ष में।

  • 2020—–21

    आती जाती हैं ये लहरें, सिर्फ निशां छोड़ जाती है
    रेत के ऊपर हर पल नयी, कहानी ये लिख जाती है
    टकराकर किनारों से, हर पल नया उठना होगा
    बीस बीस के बाद इक्कीस की, इबारत गढ़ना होगा

    याद रखों इसी सागर में, अमृत विष के प्याले हैं
    याद रखों इसी सागर में, छुपे सुनामी छाले हैं
    दिखता शांत किन्तु हृदय में, भाटे ज्वार से पाले है
    अपने सीने में राज इसने, दफन अनेक कर डाले है

    ठीक बीस भी सागर की इन शांत लहरों सा दिखता था
    सुनामी को हृदय में अपने, दे रखा इक कोना था
    ज्वार भाटे सी उठी सुनामी, नाम इसका कोरॉना है
    पिया विष का प्याला सब ने, बीस का यही रोना है

    अब आया है इक्कीस देखो, संग यह वैक्सीन लाया है
    लॉक डाउन से जूझता सूरज, सागर से उग आया है
    जो आया है इक्कीस तो अब, सब कुछ ही इक्कीस होगा
    ख़तम हुए दिन जीरो के बस, अब आगे बढ़ना होगा

    बढ़ते बढ़ते आगे हमको, याद यह रखना होगा
    भूले ना हम बीस की भूले, यादों को सहेजना होगा
    इस सागर में जानवर विषैले, थाल मोती के भी सजे
    मंथन यह हमको ही करना, कैसे साल इक्कीस का सजे

  • “नववर्ष हो इतना सबल”

    नववर्ष हो इतना सबल
    ना पीर चारों ओर हो,
    जिधर भी उठे नजर
    सर्वत्र पुष्प ही पुष्प हो..
    यह लेखनी अविराम हो,
    हर पंक्ति में ऐसे भाव हों…
    जाग जाए यह जमीं और
    आसमां झुक जाए,
    लेखनी हो तरुण-सी
    ऐसा नववर्ष आए…
    कोरोना की ना मार हो,
    फूला-फला संसार हो…
    दुर्गम हो, चाहे दुर्लभ हो,
    हर पथ मानव को सलभ हो…
    युवा हो कर्मठ और हाथ में
    उनके पतवार हो,
    ना डूबे कभी बहती रहे ऐसी
    सुंदर नाव हो…
    २०२० तो जलमग्न हो गया,
    २०२१ सजकर आ गया…
    सबके मनोरथ पूर्ण हो
    सबका सुखी संसार हो…

  • गीली रेत पर…..

    थमी हुई जिंदगी
    थमे हुए पल
    रुकती, चुकती सांसें
    उंगलियों की पोरों से छूटते
    रिश्तों के रेशमी धागे
    ठंडी, बेजान दीवारों से टकराते
    जीने, मरने, हंसने और रोने के पल
    कितना कुछ
    लिख गया गुज़रता साल
    गीली रेत पर

    कोई तो मौज हो
    मिटा जाए इस अनचाही तहरीर के निशान
    छू जाए
    आते साल का पहला क़दम
    कि ज़िंदगी बेख़ौफ फिसल आए
    बेजान दीवारों से
    फिर लिख जाए अपना नाम
    गीली रेत पर

    डॉ. अनू
    ३१.१२.२०२०

  • शुभ हो, मुबारक हो नया साल आपको

    ऐलान नया हो कोई, उद्घोष नया हो
    जज्बे भी नये हों और जोश नया हो
    हों राग नये से सभी , तान हो नई
    हौसले बुलंद हों, उड़ान हो नई

    मिल जाए नयेपन की एक मिसाल आपको
    शुभ हो, मुबारक हो नया साल आपको

    धरती से मिले धैर्य और अंबर से ऊंचाई
    पश्चिम से पूर्व तक दे खुशियां ही दिखाई
    उपहार हर जगह से सदा खास ही मिले
    उत्तर से भी दक्षिण से भी उल्लास ही मिले

    चारों दिशा से कर जाए निहाल आपको
    शुभ हो, मुबारक हो नया साल आपको

    व्यवहारकुशल हों सदा, गुण के धनी रहें
    चेहरे की मुस्कान ये सदा बनी रहे
    हर रोज और बड़ा हो ये नाम आपका
    दुनिया के दिल पे राज करे काम आपका

    किसी चीज का भी न रहे मलाल आपको
    शुभ हो, मुबारक हो नया साल आपको

    विक्रम कुमार
    मनोरा, वैशाली

  • *परिवर्तन*

    सब एकही राहपे चलते हैं
    आँँखें बंद किए सर झुकाए
    बस्स एकही बंदा होता हैं
    आँखे खोलके मूडता हैं
    वही परिवर्तन लाता हैं

  • कुछ ऐसा नया साल हो

    हे ईश्वर ! 2021 में ऐसा कुछ कमाल हो , गम सारे मिटे ,हर चेहरे पर मुस्कान हो , चारों तरफ से समृद्धि फैले , खुशहाल मेरा किसान हो कुछ ऐसा नया साल हो (1) कोरोना का कहीं न नाम और न निशान हो ,
    विश्व में सबसे आगे मेरा हिंदुस्तान हो, शौर्य और वीरता का प्रतीक देश का जवान हो, कुछ ऐसा नया साल हो (2) देश में न कहीं बेरोजगारी हो, भ्रष्टाचार मुक्त हर अधिकारी हो, दाग रहित नेता और राजनीति संस्कारी हो, जनकल्याण का ही हर तरफ सवाल हो, कुछ ऐसा नया साल हो(3) मानव मन से स्वार्थ मिटे, आपसी प्रेम और सद्भाव बढ़े, ” संदीप काला “की कलम में रचनात्मकता का रंग चढ़े , 2021 में बस धमाल ही धमाल हो, कुछ ऐसा नया साल हो (4)

  • मेरी बेटी

    अब मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी 8 महीनेहो गई है कुछ जिद्दी, कुछ नकचढ़ी हो गई है
    अब मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी 8 महीने हो गई है
    अब अपनी हर बात मनवाने लगी है
    हर दिन नई – नई फरमाइशें होती है
    लगता है कि फरमाइशों की झड़ी हो गई है
    मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी 8 महीनेहो गई है

    अगर डांटती हूँ तो हंसती है जब वो हंसती है तो मन को मोह लेती है
    घर के कोने कोने मे उसकी महक होती है
    मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी 8 महीनेहो गई है

    “राज” सपने सारे अब उसी के संवारता है
    दुनियाँ में उसको अलग पहचान दिलानी है
    मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी 8 महीनेहो गई है

  • Happy Birthday 🎂 To You Maa

    मेरी सबसे 👌अच्छी दोस्त मेरी माँ है,
    मेरी माँ को 🎂 जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ 🎉🎈 !
    माँ मुझे नहीं पता कि मैं आपके बच्चे के रूप में
    कितनी भाग्यशाली हूं,
    लेकिन मुझे ये पता है की आप मेरे लिए,
    माँ और अच्छी दोस्त के रूप में बहुत भाग्यशाली हो,
    लेकिन मैं God ji को हर दिन 👏 धन्यवाद करती हूं,
    जब भी मुझे आपकी जरुरत हुई है,
    आप हमेशा आसपास रहे हैं, और मेरे साथ दिया है,

    आज इस ख़ूबसूरत दिन पर मैं यही दुआ करती हूं कि आपका कल ख़ुशियों से भरा हो। कोई भी मुश्किल आपको छू भी न पाए। सारे ग़म मिट जाएं। माँ मुझे आपकी बेटी होने पर गर्व है।
    माँ मैं सारी दुनिया को भूल सकती हूँ
    मगर आपकी ममता और प्यार को कभी नहीं सकती हूँ,
    जो आपने मुझ पर बरसाई है।
    मैं आपको हद से ज्यादा प्यार💕 करती हूँ
    माँ कभी – कभी मेरे पास शब्द इतने कम पड़ जाते है
    व्यान नहीं कर पाती की आप कितने महत्व हो मेरे जीवन में,
    क्या हो मेरी ज़िंदगी……………………
    बस यही बोलूगी की आप सब कुछ हो मेरे लिए I Love You So Much 🙂

  • कलयुग का रावण

    – ** कलयुग का रावण -**
    *********************

    हे राम रमापति अजर अमर
    रावण से ठाना महासमर
    ले आए जग की जननी को
    अपनी प्रिय अर्धांगिनी को ..।

    वह रावण की मर्यादा थी
    नहीं नजर लगा मान में
    सीता भी महाकाली थी
    लंका ढल जाती श्मशान में ..।

    अब इस भारत में भी
    हरण रोज ही होते हैं
    कोई रामकृष्ण नहीं आता
    अबला नयना रोते हैं ..।

    रावण दुशासन सिर नहीं कटते
    वह स्वयं काट ले जाते हैं
    कहीं पर लाश पड़ी होती है
    रावण जिंदा रह जाते हैं ..।

  • सच्चे मन से

    रावण जलाना ही है तो
    मन में छिपे रावण को जलाओ।
    गर तुम से न जले तो
    सच्चे मन से श्री राम को बुलाओ।।

  • अधर्म पे धर्म की विजय

    जब जब धर्म
    अधर्म के चंगुल में फंसा,
    तब तब इस धरती पे
    पुरुषोत्तम का जन्म हुआ।
    अत्याचार से धरती फटी
    अधर्म से नील गगन,
    तभी तो दिव्य पुरुष के हाथों
    अधर्मी का अंत हुआ।
    बुराई पे अच्छाई की जीत तो
    एक दिन होना हो था,
    “ढोल शूद्र पशु नारी”
    यही अधर्म के कारण
    पापी का आज अंत हुआ।

  • श्री राम जी के नाम एक पाती

    विजयादशमी का यह पावन पर्व
    वर्षों से समाज को सच्चाई का सबक सिखाऐ
    पर आज यह एक प्रश्न उठाये
    आज प्रतयंजा कौन चढ़ाऐ
    कौन बाण आज छुड़ाए
    इस युग में कोई काबिल नहीं
    जो रावण का संहार करे
    आज कोई राम नहीं
    हर और रावण ही रावण छाऐ
    दशानन कहलाता ज्ञानी अभिमानी
    डंके की चोट पर युद्ध को ललकारे
    आज मानव छद्म वेश धार
    अपनों के पीठ पीछे वार करे
    आज मंथरा घर-घर छाई है
    विभीषण ने ही दुनिया में धूम मचाई है
    अब राम कैसे आए
    कोई शबरी ना बेर खिलाए
    केवट बिन दक्षिणा ना नदिया पार कराऐ
    कौन भ्राता प्रेम में राज सिंहासन का त्याग करे
    हनुमान जैसा सेवक कहाँ से आऐ
    अब राम कैसे आए
    हाय, अब रावण का कौन संहार करे
    तो क्या रावण ही रावण को मार गिराऐ
    मानव कब तक कागद पुतला बना मन बहलाऐगा
    कब तक समाज नारी की अग्नि-परीक्षा लेता जाएगा
    प्रश्न के उत्तर देने प्रभु आपको आना होगा
    इस युग के मानव को मर्यादा का पाठ पढ़ाना होगा
    नारी को अग्नि-परीक्षा से मुक्त कराना ही होगा
    नर को नारी शक्ति और समर्पण का एहसास कराना होगा
    अचल अटल विश्वास हमें, तुम आओगे
    मानव के सुप्त आदर्शों को नई राह दिखाओगे
    फिर विजयादशमी के सन्देश को मन-द्वार पहुचाओगे
    सुदृढ़ विश्वास हमें, तुम आओगे, तुम आओगे।

  • नहीं मरेगा रावण

    61-नहीं मरेगा-रावण

    अहम भाव में बसता हूं मैं
    कभी न मरता रावण हूं मैं
    स्वर्ण मृग मारीच बनाकर
    सीता को भी छलता हूं मैं..।

    किसे नहीं है खतरा सोचो
    केवल अपनी सोच रहे हो
    रावण वृत्ति कभी न मरती
    यह सुनकर क्यों भाग रहे हो..।

    दुख का सागर असुर भाव है
    क्या राम धरा पर आएंगे
    सुप्त हुए सब धर्म-कर्म जब
    रावण कैसे मर पाएंगे..।

    धर्म बहुत होता त्रेता युग
    तक केवल लंका में रहता
    कलयुग पाप काल है ऐसा
    रावण अब घर-घर में बसता.।

  • “रावण दहन”

    दशहरे का रावण सबसे पूछ रहा है

    हर वर्ष देखा है मैंने स्वयं को दशहरे पर
    श्रीराम के हाथों से जलते हुये,

    सभी को बुराई पर अच्छाई की जीत बताते हुये।

    उस लंकेश को तो मर्यादा पुरुषोत्तम ने मारा था,

    प्रभु श्रीराम ने उसकी अच्छाईयों को भी जाना था।

    सभी इकट्ठे होते हैं रावण को जलाने के लिए,

    दुनिया से पूरी तरह बुराईयों को मिटाने के लिए।

    आज रावण स्वयं पूरी भीड़ से यह कह रहा है,

    तुम में से कौन श्रीराम जैसा है यह पूछ रहा है?

    क्या तुम अपने अन्दर की बुराइयों को मिटा पाये हो ?

    क्या तुम सब अंशमात्र भी स्वयं को श्रीराम-सा बना पाये हो?

    यदि उत्तर नहीं है तो क्यों मुझे बुरा मानकर रावण दहन करने आते हो?

    तुम स्वयं ही हो बुरे तो क्यों मुझे हर वर्ष जलाने
    आ जाते हो ?

    यदि वास्तव में विजयादशमी मनानी है तो
    मुझ जैसे कागज के बने रावण को मत जलाओ,

    बल्कि अपने अन्दर के पापी रावण को मिटाओ
    निर्भया और सीता जैसी नारी की लाज बचाओ

    मत बनो विभीषण सम कपटी
    लक्ष्मण सम भाई बन जाओ

    ना करो लालसा बालि की तरह कुर्सी की
    तुम भरत, अंगद सम बन जाओ

    राजा दशरथ की तरह तुम अपने वचन
    पर अडिग हो जाओ

    शिक्षा प्राप्त कर प्रभु श्रीराम के व्यक्तित्व से फिर आना विजयादशमी मनाने तुम

    अपने अन्तर्मन के रावण का दहन करके फिर आना मुझे जलाने तुम…

    काव्यगत सौन्दर्य एवं विशेषताएं:-

    यह कविता मैंने प्रतियोगिता की फोटो को ध्यान में रखते हुए लिखी है जिसका विषय ‘रावण दहन’ है.
    मैंने इस कविता के माध्यम से सामज में व्याप्त बुराईयों के ऊपर कटाक्ष किया है.
    रावण के माध्यम से समाज में फैली समस्याओं, कुरीतियों और हर मनुष्य के अन्दर छुपी बुराईयों को दर्शाया है.
    मेरा आशय रावण को श्रेष्ठ दिखाने का नहीं वरन् समाज को एक अच्छा संदेश देने की है जिससे वह अपने अन्तर्मन को स्वच्छ करके राम के चरित्र से सीख ले और कुपथ को छोंड़कर अच्छे पथ पर अग्रसर हो.
    समाज में नई चेतना आए और रामराज्य की स्थापना हो सके.

  • धनुष उठा श्री राम का

    धनुष उठा श्री राम का,
    रावण की अब खैर नहीं
    चलो आज विजय की बात करें,
    हो कहीं किसी से,बैर नहीं
    त्रेता युग में रावण ने,
    श्री राम को ललकारा था
    सीता माता का हरण किया,
    अतएव राम ने मारा था
    आज के युग में देखो,
    रावण ही रावण आए हैं
    तू राम बन, संघार कर
    संकट के बादल छाए हैं
    अपने भीतर का राम जगा,
    भारत में फैला तिमिर भगा
    नारी पर हुए जुल्मों का,
    हे युवा, तू ही इंसाफ़ दिला
    अशोक-वाटिका में भी सीता,
    रही सुरक्षित उस युग में..
    कभी,अपने ही घर
    कभी आते-जाते
    कोई सीता नहीं सुरक्षित
    बड़ी असुरक्षित, कलियुग में
    बलात्कार,कहीं भ्रूण हत्या
    कहीं एसिड अटैक की खबर सुनी,
    भारत की नारी, कब तक झेलेगी
    कोई तो आए, राम सा गुणी
    ये सब सम्भव कैसे होगा
    कुछ विचार मन में आए,
    साझा करती हूं, समाज से
    एक प्रण लिया जाए..
    जो उंच-नीच और संस्कार के,
    अब तक पाठ पढ़ाए पुत्री को
    वहीं पाठ और संस्कार ,
    अब पुत्रों को भी दिए जाएं..

    *****✍️गीता

  • हे रावण

    हर दौर में अधर्म का प्रारम्भ एक नव-चरण होता रहा l
    हर एक युग में “हे रावण” तेरा नव-अवतरण होता रहा l
    हर बार अग्नि परीक्षाओं से गुजरी सीता सती सी नरियाँ ,
    किसी न किसी रूप में औरत का यूँ अपहरण होता रहा l आखों पर पट्टी बांधकर इन्साफ तो तख़्त पर बैठा रहा ,
    भरी सभा में किसी पंचाली का यूँ चीर-हरण होता रहा l
    हर दौर में भरोसा तोड़कर पीठ में हैं खँजर उतारे गए ,
    हर घर में कोई तो घर का भेदी वभीषण होता रहा l
    पाप कितना बलवान हो पर यह बात बिल्कुल सत्य है ,
    हर एक युग में राम से ही पराजित यह रावण होता रहा l

  • सरहद का रखवाला

    हम सरहदों पर रहते हैं
    आज ज़माने से ये कहते हैं
    भारत माता के वीर सभी हम
    हमको सभी सरहद का रखवाला कहते हैं।

    है अगर हिम्मत किसी दुश्मन में
    तो आकर टक्कर ले हमसे
    हम भारत को अपने दिल में रखते हैं
    जज्बा-ए-हिन्दोस्तान लोग इसको कहते हैं।

    कोई नापाक कदम न आने देंगे इस धरा पर
    हम आज सर पे कफ़न बाँध कर ये कहते हैं
    दुश्मन कितना ही शातिर क्यों न हो
    उसको धुल चाटने की हिम्मत हम रखते है।

    हम सरहदों पर रहते हैं
    आज ज़माने से ये कहते हैं
    भारत माता के वीर सभी हम
    हमको सभी सरहद का रखवाला कहते हैं।

    कोई लाख भेजे दुश्मन मेरे वतन के लिए
    अपनी जान पर खेल कर उनसे लड़ने की ताक़त हम रखते हैं
    मेरा वतन मेरा हिन्दोस्तान सदा खुश रहेगा
    माँ भारती की कसम हम लेते है।

    हम सरहदों पर रहते हैं
    आज ज़माने से ये कहते हैं
    भारत माता के वीर सभी हम
    हमको सभी सरहद का रखवाला कहते हैं।

  • विजयादशमी हम मनाते है

    विजयादशमी हम मनाते है पर अपने अंदर के रावण को कहाँ जलाते है ?
    कटाक्ष कर रही है भगवान श्री राम की सच्चाई और निष्ठा ,रावण जैसे दुराचारी के क्रोध,कपट,कटुता,कलह,चुगली ,अत्याचार |
    दगा,द्वेष,अन्याय,छल रावण का बना परिवार ,
    आज कहाँ मिलते है माता सीता जैसे निश्छल विचार |
    वर्तमान का दशानन,यानी दुराचार भ्रष्टाचार ,
    आओ आज दशहरा पर करे,हम इसका संहार |
    कागज के रावण मत फूँको, जिंदा रावण बहुत पड़े है,
    अहंकार,आज इंसान की इंसानियत से भी बड़े है |
    आज झूठ भी बड़े गर्व से अपने हुकूमत पे अड़े है|
    आज भी सीता रावण की नजरो मे उसकी जागीर बनी है,
    सीता की पवित्रता की ना जाने कितनी तस्वीर जली है|
    विजयादशमी हम मनाते है पर अपने अंदर के रावण को कहाँ जलाते है ||

    धरतीमाता आज भी रो पड़ी है ,अपनी सीता की ये हालत देखकर,
    पर विधाता की कलम भी ना डगमगाई, सीता की ऐसी तकदीर लिखकर |
    आज कहाँ राम सीता को बचाते है ,
    आज तो राम ही सीता की पवित्रता पर प्रश्नचिन्ह लगाते है |
    मृगतृष्णा में ना जाने कितने बहके पड़े है,
    राम के जैसे सद् विचारो से मीलो दूर खड़े है |
    आज ना राम जैसा पुत्र जन्मा है,ना राजा दशरथ जैसा पिता |
    ना आज रावण की नजरें रहने देती गीता जैसी पवित्र सीता |
    विजयादशमी आज भी हम मनाते है,पर अपने अंदर के रावण को कहाँ जलाते है ||

    नवनीता कुमारी (डेंटिस्ट)
    ग्राम+पोस्ट -चुहड़ी
    शहर-बेतिया
    जिला-पश्चिम चंपारण
    राज्य-बिहार
    थाना-चनपटिया
    पिन -कोड-845450
    मोबाईल नंबर -9304421634

    प्रमाणपत्र

    प्रमाणित किया जाता है कि संलग्न कविता जिसका शीर्षक “विजयादशमी हम मनाते है”है मौलिक वअप्रकाशित है तथा इसे “saavan Redefining poetry “2020 मे सम्मिलित करने हेतु प्रेषित किया जा रहा है और मुझे सावन कविता प्रतियोगिता 2020 पिक्चर पर कविता ) की तमाम शर्ते मान्य है |

  • मैं हिन्दी

    हिन्द भाषाओं का सागर है l

    मैं हिन्दी उसमें से एक हूँ , उद्भव मेरी संस्कृत से है l

    हिन्द की सारी भाषाओं में भाईचारा था l

    अंग्रेजी ने हमें स्वार्थ के लिए बांटा था l

    मेरे संस्कार ने आजादी की चिंगारी डाला था l

    फिर क्या था मैं इतिहास रचने निकल पड़ा था l

    हिंद की कड़ी बनी, शंखनाद किया आजादी का l

    मैंने जुल्मों सितम सहा, पर अडिग रहा l

    आजादी का मंत्र हिंद के जनमानस में फूंका l

    ऐसे मैंने आजादी का इतिहास रचा l

    राष्ट्रभाषा का मुझे सम्मान मिला l

    मैंने ही संविधान रचा,फिर भी कुछ ने मुझे ठुकराया l

    अंग्रेजी ने अहंकार रूपी बीज जो बोया था l

    मैंने हर भाषा को अपनाया, समानता का अधिकार दिया l

    मैंने ही भेदभाव की जंजीरे तोड़ा, पर मुझे ही धर्म से तोला गया l

    वर्षों से आस लगाए बैठा कभी तो मुझे अपनाओगे l

    सारे बैर भुला राष्ट्रहित के लिए गले लगाओगे l

    Rajiv Mahali

  • 🌹🌹आज पकड़े गए कान्हा🌹🌹

    आज पकड़े गए तुम कन्ह।
    माखन चुराते हुए,’ माखन खाते हुए।।
    रोज़ खीजते हो तुम रोज़ सताते हो ।
    नटखट बड़े हो तुम कान्हा.🌹……….।।
    हाथ नहीं आते हो माखन चुराते हो🌷।
    माखन खाते तो तुम हो कान्हा
    दूसरों का नाम धराते हो।🌱
    नटखट बड़े हो तुम कान्हा .🌴
    कितना सताते हो 🙏🌹🌹…तुम
    हाथ नहीं आते हो माखन चुराते हो
    आज बताती हूं तुम को मै कान्हा ✨
    कैसे माखन चुराते हो देखती हूं कान्हा🙏
    यूं मंद मंद मुस्काते मुझे क्यूं रिझाते हो।🙏
    नटखट बड़े हो तुम कान्हा ..🌹🏵️🌹
    क्यूं मुझको सताते हो माखन चुराते हो।

  • चेतावनी धरती की

    हे अज्ञानी मानव,  सुन ले मेरी पुकार,
    तेरी हूँ मैं पालनहार,  फिर भी तू कड़े है वार l

    तुमको  शुद्ध आहार दिया,  मुझको प्लास्टिक की पहाड़ दिया,
    तुझको जीवनदायी पानी दिया, तुमने उसमें जहर मिलाया  l

    ओजन जैसी प्रहरी दिया, उसको भी कर्म से छेद किया,
    तुमको खुला आसमान दिया, उसको भी प्रदूषित किया l

    तुमको मिट्टी की खुशबू दिया,  तुमने कचरे वाली बदबू  फैलाया ,
    जीवन उपयोगी सारी चीजें दिया,तुमने विनाशकारी चीजें बनाया l

    हे अज्ञानी मानव, अब समय है सुधर जाओ,
    वरना तुमको औकात दिखाऊंगी l

    मैंने ही कई सभ्यता  मिटाई है,
    जरूरत पड़ी तो तुमको भी मिटाऊँगी l

    याद रख मैं तुम्हारी जननी हूँ , सबकी सीमा बांटी  हूँ,
    जहां न जाना था तुमको,  वहां भी बस्ती बसाए हो l

    बाढ़ और भू – चाल जैसी कई चेतावनी दी है तुमको,
    फिर भी समझ ना आई तुमको l

    तूने ही धरती के सारे भेद खोले,
    फिर भी न्यूटन के तीसरे नियम को भूले l

    जो तुम दोगे मुझको, वापस करूंगी मैं तुझको,
    जो मैंने दिया है तुझको , वापस करो तुम मुझको l

    हे अज्ञानी मानव, मेरे जंगल वापस कर तू मुझको,
    प्लास्टिक रहित धरती दे मुझको l

    फूलों से सुगंधित खुशबू वापस कर तू मुझको,
    शुद्ध वायु दे मुझको , वापस कर तू जीवन मुझको l

    दम  तोड़ी जिसने तेरी लालसा के कारण,
    अनंत काल से झेला तुझको, शायद तू संभल जाएगा l

    अब संभलने में देर न कर,
    वरना तू काल के खंडहर में लुप्त हो जाएगा l

    अब समझने और समझाने के दिन गए तेरे,
    अब कुछ करने की है बारी l

    अब न स्नेह दूंगा तुझको न समझाउँगा,
    अब प्रलय  दिखाऊंगी तुझको l

    अब प्रलय  दिखाऊंगी तुझको ll

                                 Rajiv Mahali

  • दम तोड़ती जिंदगी

    अचानक से कर्ण में एक ध्वनि गूंजी ,

    देखा तो भीड़ में कोई दम तोड़ रही थी,

    पालन हार अपनी जिंदगी की जंग लड़ रही थी,

    कटती अंग – प्रत्यंग के साथ काली घटा छा रही थी,

    मानों अपनी कातर नजरों से बहुत कुछ कह रही थी,

    प्राण खोने का भय न था उसमें जरा भी,

    मानों किसी की तिवान उसे कचोट रही थी,

    कौन देगा जीवन इस संसार को ?

    पखेरू कहाँ  ढूंढेगा अपना बसेरा ?

    बटोही ढूंढेगा छाँव कहाँ ?

    सुत करेंगे किलोल कहाँ ?

    ओह !….. उसकी पीड़ा असहनीय थी ,

    सवालों के साथ जिंदगी ने भी दम तोड़ दी,

    नेक इरादा मानव स्वार्थ के बली चढ़ गयी ,

    अकस्मात घनघोर बादल छा गयी ,

    मानों प्रकृति भी मातम माना रही ,

    पर मानव इसबार भी मूक दर्शक बनी रही l

         इसबार भी मूक दर्शक बनी रही l l

                                  Rajiv Mahali

  • कब आएगा नया सवेरा (स्वतंत्रता दिवस प्रतियोगिता)

    रवि के उजाले में हम तिरंगा लहरायेंगे।
    वीर जवानो के गाथा फिर से हम दोहरायेंगे।।
    दो मिनट के मौन रख कर हम एक साथ।
    इंकलाब जिंदाबाद के नारा लगायेंगे।।
    वतन के लिए हमने क्या किया भूल जायेंगे हम।
    गर्व से सुभाष बापू के डगर पे हम सबको चलना सिखलायेंगे।।
    आज़ाद देश के गुलाम बन कर जी रहे हैं हम।
    फिर भी आज़ादी की कीमत सभी को बतायेंगे।।

  • हे भारती आशीष दे मुझको

    आज आजादी की शुभ अवसर है ,

    हे भारती नमन मेरा आपको है ,

    आशीष दें आज आप मुझको ,

    घर  के दुश्मनों को मिटा सकूँ ,

    बाहरी दुश्मनों का संहार कर सकूँ ,

    भले मेरा सीना छलनी हो जाए ,

    फिर भी दुश्मनों के सर धड़ से अलग कर सकूँ ,

    रक्त का हर कण तेरे चरणों में  बहा दूँ ,

    दुश्मनों के नापाक इरादे को नाकाम कर दूँ ,

    भले मेरा मस्तक तेरे चरणों का भेंट चढ़ जाए ,

    फ़िर भी मेरा देह दुश्मनों के छक्के छुड़ाते रहे ,

    भले ही आत्मा भी देह त्याग दे ,

    फिर भी दुश्मनों को धूल  चटाता रहूँ ,

    जब  दुश्मनों का खात्मा  कर दूँ  ,

    अपनी गोद में सर रखने का जगह दे देना ,

    आंसू मत बहाना लोरी सुना मेरे आत्मा को शांत कर देना ,

    आपके रक्षा में जाने से पहले आशीष दे देना l

                                            Rajiv Mahali

  • हिन्दुस्तान हमारा (स्वतंत्रता दिवस प्रतियोगिता)

    अपना देश कितना सुंदर कितना प्यारा।
    हर देश से प्यारा देश हिन्दुस्तान हमारा।।
    हिन्दी है हम हिन्दी ही मेरा परम धरम।
    इसलिए तो गर्व करे आज भी हिन्दुस्तान हमारा।।
    पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण वालों से कोई भेद नहीं।
    सभी को एक नजर से देखे हिन्दुस्तान हमारा ।।
    जिसको हिंद से प्रेम नहीं वह अभागा कपूत नादान है।
    उसे रास्ते पर लाओ यही संदेश देता है हिन्दुस्तान हमारा।।
    वैसे भी नादान को सही रास्ते पर लाना हम जानते है।
    तभी तो आज भी सपूतों पे गर्व करता है हिन्दुस्तान हमारा
    हिमालय से गंगा जिस देश में शान से बह रही हो।
    क्यों न गर्व करेगा हम सब का देश हिन्दुस्तान हमारा।।
    कहे “अमित” अधर्म के रास्ते पर तुम न जाना ए अर्जुन।
    अपनी शान को खोने न देना यही कहे हिन्दुस्तान हमारा।।

  • अभिलाषा

    मैं कब कहता हूँ फूलों की सेज मिले,
    मुझे तो कमल जैसी सुदृढ मन मिले l
    जो खिलता तो कीचड़ में है,
    पर दाग नहीं लगने देता दामन में l

    कब कहता हूँ पीड़ा रहित जीवन मिले,
    मुझे तो गुलाब जैसी जज़्बा मिले l
    जो कांटों में भी मुस्कुराते रहें,
    फिर भी प्यार का प्रतीक कहलाए ll

    मैं कब कहता हूँ कि दूसरों की सेवा मिले,
    मुझे तो रजनीगंधा जैसी सेवा भाव मिले l
    जो डाली से टूटकर कहीं और सज जाए,
    फिर भी खुशबू फैलाती जाए l

    Rajiv Mahali

  • बुलंदों की हुड़दंग

    जब देश में रंगा बसंती चोला था।
    तब अंग्रेजी शासन भी डोला था।।
    महासंग्राम की जब आई घड़ी।
    सभी के दिलो में तब, शोला ही शोला था।।
    हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई, सभी एक साथ।
    चीख चीख कर, आज़ादी आज़ादी बोला था।।
    कहीं भाइयों की कुर्बानी, तो कहीं बेटों की कुर्बानी।
    उस समय भी माँ की हाथो में, आज़ादी का झोला था।।
    सुन ले ए दुश्मन, ईंट के जवाब हम पत्थर से देंगे ।
    सभी हिन्दुस्तानी, छाती ठोक ठोक कर बोला था।।
    नहले पे दहले फेंकना, हमने तुझ से ही सीख लिया।
    हमारी एकता ही तेरे लिए ,बना बम का गोला था।।

  • तिरंगा

    हमारा आन तिरंगा है, हमारा बान तिरंगा है।
    हमारा शान तिरंगा है, हमारा जान तिरंगा है।।
    हमारा धर्म तिरंगा है, हमारा कर्म तिरंगा है।
    हमारा सोच तिरंगा है, हमारा समझ तिरंगा है।।
    हमारा औकात तिरंगा है, हमारा बल तिरंगा है।
    इसलिए तो आज भारत में तिरंगा ही तिरंगा है।।

  • संगत

    आये टोली ले मक्खन खिलाने को आये कान्हा ले अपने संग संगत को देखि मोहे कान्हा को छोड़ चलन छिप गये परदे के पीछे आज पकड़ में आया कान्हा मक्खन गिराये कान्हा भूमि पर

  • प्यारी पीहू का जन्मदिन

    प्यारी सी एक परी, जिसका जादू हर ओर चला है।

    मेरे भईया-भाभी का घर, जिसने खुशियों से भरा है।

    मुस्कान जिसकी, दुनियां से न्यारी है।

    सुरत भी देखो, कितनी प्यारी है।

    दादी-बाबा, मम्मी-पापा और हम सबकी लाडली।

    गुड़िया सी वो प्यारी पीहू, इतराती है बर्थडे गर्ल बनी।

    जन्मदिन पर उसके, ढेर सारा प्यार मिलें।

    आने वाले जीवन में, खुशियां अपरंपार मिलें।

  • यशोदा प्यारे कृष्ण

    यशोदा प्यारे कृष्ण

    कहें यशोदा मैया कान पकड़ कान्हा से
    तंग हुई मैं लल्ला अब तेरे शरारत से
    सुनो लल्ला माखन चोरी की आदत छोड़ो
    मेरे प्यारे कृष्ण मुरारी मटकी ना फोड़ों

    छूप-छूप कर तुने सारे माखन हैं खाये
    दही माखन को तुने घर में है गिराये
    मेरे लल्ला अब सारी मस्ती तो छोड़ो
    मेरे प्यारे कृष्ण मुरारी मटकी ना फोड़ों

    बहुत किया है तंग मुझे माखन गिराकर
    भोली भाली सूरत बना इठलाकर
    सुनो लल्ला मथनी रस्सी अब ना तोड़ो
    मेरे प्यारे कृष्ण मुरारी मटकी ना फोड़ों

    गली मोहल्ले में तुने तंग किया है सबको
    अपनी मर्जी करके परेशान किया है मुझको
    मान जा कहना मेरा अब जिद छोड़ो
    मेरे प्यारे कृष्ण मुरारी मटकी ना फोड़ों

    महेश गुप्ता जौनपुरी
    गनापुर अजोसी मड़ियाहू जौनपुर उत्तर प्रदेश
    मोबाइल – 9918845864

  • बचपन

    बचपन की एक प्यारी छवि, जो आज तुम्हें मैं बतलाता हूं।
    मन कल्पना के दर्पण में, उसे देख मैं सुख पाता हूं।
    गांव की वह प्यारी गलियां, जिसमें बचपन का नटखटपन है।
    खट्टे मीठे ताने बाने है, मित्रों के वह अफसाने हैं।
    क्या बचपन है क्या मंजर है, जिसमें हमको ना कोई गम है।
    नादानी नटखटपन और पवित्रता ना ईश से कम है।
    वह गलियों की दादी नानी, वह अनुशासन की प्रतिछाया, उनसे कौन करे मनमानी।
    पर साथ ही प्रेम की मूरत, और वात्सल्य की दानी।
    जिनके परप्यारे भी अपने, यह कैसी है छवि न्यारी।
    हंसते खेलते खाते पीते कैसे बचपन बीत गया, सब अपने थे नहीं पराए सबसे सबका मीत गया।
    आज बैठ जब दूर विदेश में उस छवि को मैं ध्याता हूं,
    आंखों में बचपन बस जाता मानो मैं ईश्वर पाता हूं।

  • ओ मैया! मोरी

    ओ मैया! मोरी पीर बड़ी दुखदायी
    सब कहें मोहे नटवर-नागर
    माखनचोर कन्हाई।
    तेरो लाला बरबस नटखट
    कब लघि बात छपाई।
    ओ मैया! तेरो कान्हा
    माखन बिखराई।
    सो खावत सो माखन-मिसरी
    ग्वालन खूब खिलायी।
    फोड़ दई मोरी मटकी- हांड़ी
    गऊवन देत ढिलाई।
    पनघट पे नित बंशी बजावत
    मोरी सुधि-बुधि सब बिसराई।
    राह चलत नित छेड़त नटखट
    छोड़े ना मोरि कलाई।
    सुनि गोपिन के वचन कन्हैया
    मन्द-मन्द मुसकायी।
    ना मोसे फूटी मटकी-हांड़ी
    नाहि गउवन दियो ढिलाई।
    कान पकड़ि खींचे यशोमति माई
    रोवत कृष्ण कन्हाई।
    ब्रजगोपी सब बैरन लागें
    झूठी चुगली करें तोसे माई।
    चूमि-चूमि मुख गीलो नित करि
    ग्वालिन मोहे रोजु नचाई ।
    नाचि-नाचि पग पड़ि गये छाले
    कमर लचकि गई माई।
    ग्वालिन माखन खारा- खट्टा
    बड़ो मीठो लगे तेरो माई।
    ग्वाल- बाल सब चोरी कीन्ही
    दोष लगावे मोहे माई।
    मैं तेरो भोलो-भालो कान्हा
    चोरी ना आवे मोहे माई।
    कान्हा के सुनि वचन यशोदा
    हँसि-हँसि लेति बलाई।
    ब्रह्मा, विष्णु, शंकर रीझत
    नंदलाला की देखि चतुराई।
    मोर-मुकुट प्रभु औरु चन्द्रमुख
    ‘प्रज्ञा’ बलि-बलि जाई।
    ‘प्रज्ञा’ के प्रभु कृष्ण-कन्हैया
    धन्य यशोदा माई।

    काव्यगत सौन्दर्य-
    कृष्ण के बाल-चरित्र की शरारतों का सजीव तथा भावात्मक चित्रण।

    भाषा:-ब्रज,अवधी
    छन्द:-गेय पद
    रस:- वात्सल्य
    गुण:-माधुर्य
    अलंकार:-पुनरुक्ति, अनुप्रास, रूपक, उपमा।

  • माखनचोर ।

    तू है माखनचोर।

    कान्हा तुम आ जाते छुपके
    खा जाते हो माखन चुपके,
    तड़के आँगन सखियाँ करतीं शोर
    तू है माखनचोर।

    दही मगन खा मटकी तोड़ी
    करते नहीं शरारत थोड़ी,
    गाँव में अब चर्चा है हर ओर
    तू है माखनचोर।

    माखन नहीं अकेले खाते
    बाल सखा सब लेकर आते,
    शाम कभी तो आ जाते हो भोर
    तू है माखनचोर।

    माँ, माखन से मैं अनजाना
    व्यर्थ गोपियाँ मारें ताना,
    उनका तो बस मुझपर चलता जोर
    मैं नहीं माखनचोर।

    अनिल मिश्र प्रहरी।

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