Poetry on Picture Contest

“खिड़कियों से झांकती आँखें”

कितनी बेबस हैं लोह-पथ-गामिनी (रेलगाड़ी) की खिड़कियों से झांकती 👁आंखें। इन आंखों में अनगिनत प्रश्न उपस्थित हैं। कितनी आशाएं कीर्तिमान हो रही हैं । अपने परिजनों से मिलन की उत्सुकता ह्रदय को अधीर कर रही है। परंतु कोरोना महामारी का भय यह सोचने पर मजबूर कर रहा है, कि कहीं अपने परिजनों को हम भेंट स्वरूप कोरोना महामारी तो प्रदान नहीं कर रहे? यह बात लोह-पथ-गामिनी के इन सहयात्रियों को व्यथित कर रही है। मुख ... »

यादों को फिर से समेटना है।

जब छोड़ के आए थे गाॅऺव को हम, तब हमें न पता चला था अपना ग़म, लेकिन इस महामारी में याद आए गाॅ॑व के हसीन पल, जहां मिल जाता था हर समस्या का हल, आज लंबे अरसे के बाद वहां जाना है, क्योंकी यहां हर मजदूर बेबस और बेचारा है, रेलवे में बैठकर एक दफा इस शहर को देखना है, छुटी हुइ यादों को एकबार फिर से समेटना जो है। »

बेहाल मजदूर

आया ‘कोरोना वायरस’ सबसे ज्यादा हम बेहाल हुये। सच कहता हूँ हम मजदूरों के बहुत ही बुरे हाल हुये। छूटा रोजगार तो, दाल रोटी के लाले हो गये। मकान मालिक भी किराये के, तलाशी हो गये। हम मजदूर,मजबूर, बेबस व लाचार बन गये। उठा झोला परिवार संग, घर की ओर चल दिये। न ट्रेन,न ही मोटरकार, और न ही कोई बस मिली। पैदल ही चले क्योंकि न, कोई और आशा दिखी। हम गिरे,गिरकर फिर उठे, चल दिये,चलते गये। खुद रोये,खुद ... »

टूटे अपने सपने

थी ख्वाईश हमारे दिल को मगर, इतफाकन गम करोना के मिल गए। जब होने लगे थे साकार अपने सपने, तब महामारी के आगोश में हम समा गए।। क्या करे घर में जवान बहन बेटी थी हमारी, बेरोजगारी के देश में रोजगार कहाँ मिलता। पापी पेट का सवाल लिए खड़े थे हमारे बच्चे, गर न जाता परदेश होंठों पे हंसी कैसे आता।। सोचा था अपने गुलशन में गुल खिलायेंगे, गुल न खिल कर किस्मत में काँटे ही मिले। गरीब की गठरी सिर पर ले कर ए दोस्त, दे... »

दिल हार गया

गये थे परदेश दो वक्त के रोटी कमाने। क्या पता था करोना आएगा दिल जलाने।। दिल में सपने ले के, चले थे हम परदेश । सपने सपने ही रह गए बदल गये हमारे भेष।। कभी एक गज की दूरी तो कभी दो गज की दूरी। कैसे कमाते हम यही थी हमारी मजबूरी।। किस्मत व करोना ने क्या क्या रंग दिखाए। मुंह (👄) में पट्टी बगल में करोना हाए हाए।। कहे कवि चलो वापस चले बहुत कमा लिए यार । जिंदगी है अनमोल यही कहता है घर परिवार।। »

प्रवासी मजदूर

प्रवासी मजदूर मजदूर हूं, मजबूर हूं, कैसी है तड़प हमारी, या हम जाने, या रब जाने, आया कैसा चीनी कोरोना, ले गया सुख-चैन हमारा, जेब में फूटी कौड़ी नहीं, छूट गया काम- धाम हमारा, खाने को पड़ गए लाले, घर जाना अब है जरूरी हमारा, जाऊँ या न जाऊँ दोनों तरफ है मौत खड़ी, मंजिल है मिलोंं दूर फिर भी, घर जाना है जरूरी हमारा, कुछ पैदल ही चले गए, कुछ साइकिल से चले गए, कुछ रास्ते में ही दुनिया छोड़ गए, सामने है कोरोना... »

KISAN

DESH KI AAN,BAN,SHAN KISAN KITNA PRESHAN KHET KI JAN,PHCHAN,ARMAN KISAN KITNA PRESHAN MEHNT KI JUBAN,MUKAN,PRWAN KISAN KITNA PRESHAN FASAL KE NA MILE DAM MHGAI KI MAR PED PR LTKA JMI PR BIKHRE ARMAN KISAN KITNA PRSHAN »

अन्नदाता कहलाता हूं

अन्नदाता कहलाता हूं पर भूखा मैं ही मरता हूं कभी सेठ की सूद का तो कभी गोदाम के किराये का इंतजाम करता फिरता हूं बच्चे भूखों मरते है खेत प्यासे मरते है अब किसकी व्यथा मैं दूर करूं मैं ही हरपल मरता हूं अन्नदाता कहलाता हूं »

खामोश किसान

खामोश किसान

जवाब देने में हाज़िरजवाब बताये गए हम, के अपने ही घर में खामोश कराये गए हम, ज़िन्दगी बनाने को कितनी ही जगाये गए हम, के अपनी ही चन्द सांसों से दूर कराये गये हम, हर मौसम से क्यों सामने से भिड़ाये गये हम, के सूखी धरती पे ही सूली पर चढ़ाये गए हम।। राही (अंजाना) »

किसान की व्यथा

किसान की व्यथा

पसीना सूखता नहीं धूप में। किसान होता नहीं सुख में।। अतिवृष्टि हो या फिर अनावृष्टि। प्रकृति की हो कैसी भी दृष्टि। किसानों के परिश्रम के बिना, कैसे पोषित हो पाएगी सृष्टि। संसार का पोषण करने वाला, क्यों रह जाता है भूख में। पसीना सूखता नहीं धूप में। किसान होता नहीं सुख में।। इनके परिश्रम का मूल्यांकन, हमारी औकात नहीं। ना मिल पाए उचित मूल्य, ऐसी भी कोई बात नहीं। मौसम की मार और सर पर कर्ज का भार, क्यों ... »

बेटी से सौभाग्य

बेटी है लक्ष्मी का रुप, मिलतीं है सौभाग्य से, घर का आंगन खिल जाता है, उसकी पायल की झन्कार से। बेटी ही तो मां बनकर, हमको देती नया जनम, सम्मान करें हर बेटी का, यह है हर मानव का धरम, जनम न दोगे बेटी को तो, संसार ये रुक जाएगा, बिन बेटी के, बेटे वालो, बेटा न हो पाएगा। »

सिर्फ़ बोझ न समझ मुझे

सिर्फ़ बोझ न समझ मुझे

जीना चाहती हूं मैं भी इस दुनिया को देखना चाहती हूं मां तेरे आंचल में सर रखकर सोना चाहती हूं बापू तेरी डाट फ़टकार प्यार पाना चाहती हूं मां मैं तेरा ही हिस्सा हूं तेरा अनकहा किस्सा हूं तू मुझे अलग कर क्या जी पायेगी इस दुनिया की भीड़ में तू भी अकेली पड़ जायेगी इक मौका तो दे मुझे बापू को अपने हाथ से रोटी बनाकर खिलाऊंगी कक्षा में प्रथम आकर मैं सबको दिखलाऊंगी बड़ी होकर जब अधिकारी बन घर आऊंगी बापू के सर को म... »

बेटी घर की रौनक होती है

बेटी घर की रौनक होती है बाप के दिल की खनक होती है माँ के अरमानों की महक होती है फिर भी उसको नकारा जाता है भेदभाव का पुतला उसे बनाया जाता है आओ इस रीत को बदलते है एक बार फिर उसका स्वागत करते है »

बेटियाँ

पैदा होने से पहले मिटा दी जाएँगी बेटियाँ, बिन कुछ पूछे ही सुला दी जाएँगी बेटियाँ, गर समय रहते नहीं बचाई जाएँगी बेटियाँ, तो भूख लगने पर रोटी कैसे बनाएंगी बेटियाँ, जहाँ कहते हैं कन्धे से कन्धा मिलायेंगी बेटियाँ, सोंच रखते हैं एक दिन बोझ बन जाएँगी बेटियाँ, चुपचाप गर यूँही कोख में छिपा दी जाएँगी बेटियाँ, तो भला इस दुनियां को कैसे खूबसूरत बनायेंगी बेटियाँ॥ राही अंजाना »

चुनावों के इस मौसम में

चुनावों के इस मौसम में फिजा में कई रंग बिखरेंगे अगर कर सके हम अपने मत का सही प्रयोग हम नये युग में नयी रोशनी सा निखरेंगे »

वोट डालने चलो सखी री

वोट डालने चलो सखी री

वोट डालने चलो सखी री लोकतंत्र के अब आयी बारी एक वोट से करते हैं बदलाव नेताजी के बदले हम हाव-भाव ! सही उम्मीदवार का करते है हम चुनाव, बेईमानों को नहीं देंगे अब भाव ! आपका वोट है आपकी ताकत लोकतंत्र की है ये लागत सुबह सवेरे वोट दे आओ वोटर ID संग ले जाओ ! »

जागरूक मतदाता

सोंच समझकर वोट दें तो बन जायेगी तकदीर, चलो निकाले सोच समझ कर ऐसी कोई तदबीर, विश्व पटल पर छप जाये अपने देश की तस्वीर, जागरूक करे जो हर जन को हो ऐसी कोई तरकीब, लोकतन्त्र समझे नहीं और बहाते जो झूठे नीर, जनता के मतदान से ही जो बन जाते बलवीर, हर मतदाता का मान करे जो सरकार चलाये वीर, चलो लगादे हिम्मत कर अब कोई ऐसी तरतीब।। राही अंजाना »

माँ

माँ

देखा किसी ने नहीं है मगर बहुत बड़ा बताते हैं लोग, कुछ लोग उसे ईश्वर तो कुछ उसे खुदा बताते हैं लोग, पता किसी के पास नहीं है मगर रस्ता सभी बताते हैं लोग, कुछ लोग उसे मन्दिर तो कुछ उसे मस्ज़िद बताते हैं लोग, ढूढ़ते फिरते हैं जिसे हम यहां वहां भटकते दर बदर, तो कुछ ऐसे भी हैं जो उसे तेरी मेरी माँ बताते हैं लोग।। राही (अंजाना) (Winner of ‘Poetry on Picture’ contest) »

धुँआ

पूरे शहर को इस काले धुंए की आग़ोश में जाना पड़ा, क्यों इस ज़मी की छाती पर फैक्ट्रियों को लगाना पड़ा, चन्द सपनों को अपने सजाने की इस चाहत में भला, क्यों उस आसमाँ की आँखों को भी यूँ रुलाना पड़ा, अमीरों की अमीरी के इन बड़े कारखानों में घुसकर, क्यों हम छोटे गरीबों के जिस्मों को ही यूँ हर्जाना पड़ा॥ राही (अंजाना) »

हवा में घुल रहा आज जहर है

हवा में घुल रहा आज जहर है सांसो को आज तरस रहा आज शहर है बंद कमरे में कब तक कैद रहोगे खुले आम घूम रहा आज कहर है »

सर्दी नहीं जाने वाली

सर्दी नहीं जाने वाली

बन्द मुट्ठी में हैं मगर कैद में नहीं आने वाली, हाथों की लकीरों की नर्मी नहीं जाने वाली, आलम सर्द है मेरे ज़हन का इस कदर क्या कहूँ, के ये बुढ़ापे की गर्मी है यूँही नहीं जाने वाली, जमाकर बैठा हूँ आज मैं भी चौकड़ी यारों के साथ, अब अकेले रहने से तो ये सर्दी नहीं जाने वाली।। राही (अंजाना) »

फुलझड़ियाँ

फुलझड़ियाँ

  आसमाँ छोड़ जब ज़मी पर उतरने लगती हैं फुलझड़ियाँ, हाथों में सबके सितारों सी चमकने लगती हैं फुलझड़ियाँ दामन अँधेरे का छोड़ कर एक दिन ऐसा भी आता है देखो, जब रौशनी में आकर खुद पर अकड़ने लगती हैं फुलझड़ियाँ, अमीरी गरीबी के इस भरम को मिटाने हर दीवाली पर, दुनियाँ के हर कोने में बिजली सी कड़कने लगती हैं फुलझड़ियाँ।। – राही (अंजाना) »

दहेज

दहेज

मेरे माथे को सिंदूर देके मेरे विचारों को समेट दिया मेरे गले को हार से सजाया पर मेरी आवाज़ को बांध दिया मेरे हाथों मे चूड़ियों का बोझ डालके उन्हें भी अपना दास बना दिया मैं फिर भी खुश थी मुझे अपाहिज किया पर थाम लिया मेरे पैैरों में पायल पहनाई और मेरे कदमों को थमा दिया मैं फिर भी खुश थी कि मेरा संसार एक कमरे में ला दिया पर आज मुझे मेरा और मैं शब्द नहीं मिल रहे शायद वो भी दहेज में चले गये… »

चील कौवो सा नोचता ये संसार

चील और कौवो सा नोचता रहता संसार है, ये कैसा चोरों का फैला व्यापार है, दहेज के नाम पर बिक रही हैं नारियाँ कैसे, ये कैसा नारियों को गिरा कर झुका देने वाला हथियार है, न चाह कर भी बिक जाती है जहाँ अपनी ही हस्ती, ये मोल भाव का जबरन फैला कैसा बाज़ार है॥ राही (अंजाना) »

संसार के बाजार में दहेज

संसार के बाजार में दहेज

इस जहांँ के हाट में , हर  चीज की बोली लगती है, जीव, निर्जीव क्या काल्पनिक, चीजें भी बिकती हैं, जो मिल न सके वही , चीज लुभावनी लगती है, पहुँच से हो बाहर तो, चोर बाजारी चलती है, हो जिस्म का व्यापार या, दहेज लोभ में नारी पर अत्याचार, धन पाने की चाहे में, करता इन्सान संसार के बाजार में, सभी हदों को पार, दहेज प्रथा ने बनाया, नारी जहांँ में मोल-भाव की चीज, ढूँढ रही नारी सदियों से, अपनी अस्तित्व की थाह, ... »

रंग गुलाल

रंग गुलाल के बादल छाये रंगो में सब लोग नहाये देवर भाभी जीजा साली करें ठिठोली खेलें होली बोले होली है भई होली खायें गुजिया और मिठाई घुटे भांग और पिये ठंडाई गले मिलें जैसे सब भाई भांति भांति के रंग लुभावन प्रेम का रंग सबसे मन भावन प्रेम के रंग में सब रंग जाएँ जीवन को खुशहाल बनाएँ उ खेलें सभी प्रेम से होली बोलें सभी स्नेह की बोली मिलें गले बन के हमजोली ऐसी है अनुपम ये होली »

होली है रंगों का खेल

होली है रंगों का खेल होली है रंगों का खेल आवो खेले मिल के खेल देखो खेल रही है होली ये आसमा ये धरथी हमारी   आवो मिल के रंग चुराये सबको मिल के रंग लगाए रंग सच्चाई का आसमा से लाए रंग खुसी का हरयाली से चुराये रंग चेतना का सूर्य मे पाये रंग प्यार का फूलों से भर आए रंग सादगी का चाँद से ले आए आवो मिल रंग चुयारे सबको मिल के रंग लगाए मैं रंग जाऊँ तेरे रंग मैं तू मेरा रंग हो जाओ ओड़ तुझे मैं तन मन मे रंग दूँ... »

होली की टोली

होली पे मस्तों की देखो टोली चली, रँगने को एक दूजे की चोली चली, भुलाकर गमों के भँवर को भी देखो, आज गले से लगाने को दुनीयाँ चली, हरे लाल पिले गुलाबी और नीले, अबीर रंग खुशयों के उड़ाने चली, भरकर पिचकारी गुब्बारे पानी के, तन मन को सबके भिगाने ज़माने के, हर गली घर से देखो ये दुनियां चली॥ राही (अंजाना) »

आओ रंग लो लाल

आओ रंग ले एक दूसरे को, बस तन को नहीं मन को भी रंग ले…. हर भेदभाव जात-पात को रंग ले धर्म के नाम को रंग ले। मिला ले सबको एक रंग में वो रंग जो है मेरे तेरे प्यार का हर सरहद से पार का धरती से ले कर उस आकाश का रंग दो सबको उस रंग में।। सिर्फ अपना नही उस नन्ही परी का मुँह मीठा कराओ उस गरीब के घर तक भी रंग को पहुचाओ उस माँ के खाली दामन में भी ख़ुशी थोड़ी तुम डाल आओ।। सिर्फ अपनों को नहीं सबको रंग दो हर... »

आओ तन मन रंग लें

आओ तन मन रंग लें

चली बसंती हवाएँ , अल्हड़ फागुन संग, गुनगुनी धूप होने लगी अब गर्म, टेसू ,पलाश फूले, आम्र मंज्जरीयों से बाग हुए सजीले, तितली भौंरे कर रहे , फूलो के अब फेरे , चहुंँ दिशाओं में फैल रही, फागुन की तरूणाई, आओ तन मन रंग लें, हम मानवता के रंग , भेद-भाव सब भूल कर, आओ खेलें रंगों का ये खेल , प्रेम , सौहार्द के भावों से, हो जाए एक-दूजे का मेल, होली पर्व नहीं बस रंगो का खेल, प्रेम , सौहार्द के भावों का है ये म... »

सूखे नहीं थे धार आंशु के, पड़ गए खेतों मे फिर सूखे

सूखे नहीं थे धार आंशु के पड़ गए खेतों मे फिर सूखे  »

माटी मेरी पूछ रही  है मुझसे

माटी मेरी पूछ रही  है मुझसे दो घूँट पानी कब मिलेगा? बहाने मत बना दम निकला जा रहा है जल्दी बता पानी कब मिलेगा कैसे मैं अंकुरित कर दूं अन्न के दानो को कैसे मैं विश्वास कर लूँ कि पानी कल मिलेगा   वैसे  लगता तो नहीं कि अबकी बार मेरी माटी को जल मिलेगा लेकिन मैं भरोसा दिला रहा हूँ माटी को कि पानी जल्द ही मिलेगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि इस माटी की प्यास बुझाकर ही इस आस्मां को सकून का कोई पल मिलेगा       ... »

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बारिश का इंतज़ार

लगाकर टकटकी मैं किसी के इंतज़ार बैठा हूँ, भिगा देगी जो मुझ किसान की धरती मैं उसी के एहतराम में बैठा हूँ, बेसर्ब बंज़र सी पड़ी है मेरे खेतों की मिट्टी, मैं आँखों में हरियाले ख़्वाबों के मन्ज़र तमाम लिए बैठा हूँ॥ राही (अंजाना) »

सूखी धरती सूना आसमान

सूखी धरती सूना आसमान

सूखी धरती सूना आसमान, सूने-सूने किसानों के  अरमान, सूख गयी है डाली-डाली , खेतों में नहीं  हरियाली, खग-विहग या  हो माली, कर रहे घरों  को खाली, अन्नदाता किसान हमारा, खेत-खलियान है उसका सहारा, मूक खड़ा  ये  सोच रहा है, काश  आँखों में हो  इतना पानी, धरा को दे  देदूँ मैं हरियाली, अपलक आसमान निहार, बरखा की करे गुहार, आ जा काले बादल आ, बरखा रानी की पड़े फुहार, धरती मांँ का हो ऋंगार, हम मानव हैं बहुत नादा... »

ख़्वाबों की बंज़र ज़मी

देख लूँ एक बार इन आँखों से बारिश को, तो फिर इन आँखों से कोई काम नहीं लेना है, बंजर पडे मेरे ख़्वाबों की बस्ती भीग जाए एक बार, तो फिर इस बस्ती के सूखे हुए ख़्वाबों को कोई नाम नहीं देना है, चटकता सा खटकता है ये दामन माँ मेरी धरती, सम्भल कर के बहल जाए फसल जो रूप खिल जाए, तो फिर धरती के आँगन से कोई ईनाम नही लेना है॥ राही (अंजाना) »

सूखी है जमीन

सूखी है जमीन, सूखा आसमान है मगर उम्मीद है कायम, जब तक जान है »

खोज…

खोजते है बचपन अपना , ढूंढते है नादानी अपनी , कूड़े के ढ़ेर को समझते है कहानी अपनी ! देखकर मुझको वैसे तो दया सब दिखाते है, पर जब कोई गलती हो जाए, तो पढ़े-लिखे बाबू भी गालियां दे जाते है ! कोड़े का ढ़ेर किसी को पैदा नहीं करता , साहब हम भी किसी की ओलाद है सिर्फ गरीबी के नहीं मारे हम, हम आप सबकी ख़ामोशी के भी शिकार है ! इसलिए कोड़े के ढ़ेर मे बचपन खोज रहे है, गलतफहमी है की कूड़ा बीन रहे है ! »

बच्चे हम फूटपाथ के

बच्चे हम फूटपाथ के

बच्चे हम फूटपाथ के, दो रोटी के वास्ते, ईटे -पत्थर  तलाशते, तन उघरा मन  बिखरा है, बचपन  अपना   उजड़ा है, खेल-खिलौने हैं हमसे दूर, भोला-भाला  बचपन अपना, मेहनत-मजदूरी करने को है मजबूर मिठई, आईसक्रीम और गुबबारे, लगते बहुत लुभावने , पर बच्चे हम फूटपाथ के, ये चीजें नहीं हमारे  वास्ते, मन हमारा मानव का है, पर पशुओं सा हम उसे पालते, कूड़ा-करकट के बीच, कोई मीठी गोली तलाशते, सर्दी-गर्मी और बरसात, करते हम पर... »

बचपन गरीब

यूँ तो हर रोज गुजर जाते हैं कितने ही लोग करीब से, पर नज़र ही नहीँ मिलाते कोई इस बचपन गरीब से, रखते हैं ढककर वो जो पुतले भी अपनी दुकानों में, वो देखकर भी नहीं उढ़ाते एक कतरन भी किसी गरीब पे, बचाते तो अक्सर दिख जाते हैं दो पैसे फकीर से, पर लगाते नहीं मुँह को दो रोटी भी किसी बच्चे गरीब के॥ राही (अंजाना) »

गरीबी का बिस्तर

गरीबी है कोई तो बिस्तर तलाश करो, रास्तों पर बचपन है कोई घर तलाश करो, कचरे में गुजर रही है ज़िन्दगी हमारी, कोई तो दो रोटी का ज़रिया तलाश करो, यूँ तो बहुत हैं इस ज़मी पर बाशिन्दे, मगर इस भीड़ में कोई अपनों का चेहरा तलाश करो, खड़े हैं पुतले भी ढ़के पूरे बदन को दुकानों में, जो ढ़क दे हमारे नंगे तन को वो कतरन तलाश करो॥ राही (अंजाना) »

गरीबी में जलते बदन

दे कर मिट्टी के खिलौने मेरे हाथ में मुझे बहकाओ न तुम, मैं शतरंज का खिलाड़ी हूँ सुनो, मुझे सांप सीढ़ी में उलझाओ न तुम, जानता हूँ बड़ा मुश्किल है यहाँ तेरे शहर में अपने पैर जमाना, मगर मैं भी ज़िद्दी “राही” हूँ मुझे न भटकाओ तुम, बेशक होंगे मजबूरियों पर टिके संबंधों के घर तुम्हारे, मगर मजबूत है रिश्तों पर पकड़ मेरी इसे छुड़ाओ न तुम, माना पत्थर दिल हैं लोग बड़े इस ज़माने में तोड़ना मुश्किल है, मगर म... »

चाय का बहाना

आओ बैठो संग मेरे एक एक कप चाय हो जाए, फिर से बीते लम्हों की चर्चा खुले आम हो जाए, कह दूँ मैं भी अपने दिल की, कहदो तुम भी अपने दिल की, और फिर तेरे मेरे दिल का रिश्ता सरेआम हो जाए, वैसे तो हर रात होती रहती है ख़्वाबों में मुलाक़ात तुझसे, चल आज चाय की चुस्की के बहाने नज़ारा कुछ ख़ास हो जाए॥ राही (अंजाना) »

आज कुछ चाय पे चर्चा हो जाये|

आज कुछ चाय पे चर्चा हो जाये|

आज कुछ चाय पे चर्चा हो जाये दिल के राज जो छुपे बैठे है अरसे से उनसे कुछ गुफ़्तगू हो जाये इससे पहले उम्र ए दराज धोखा दे ले ले कुछ लफ्जों का सहारा कहीं लाठी का सहारा ना हो जाये आज कुछ चाय पे चर्चा हो जाये| »

कितने ही दिन गुज़रे हैं पर, ना गुजरी वो शाम अभी तक; तुम तो चले गए पर मैं हूँ, खुद में ही गुमनाम अभी तक! . तुम्ही आदि हो,…तुम्ही अन्त हो,…तुमसे ही मैं हूँ, जो हूँ; ये छोटी सी बात तुम्हें हूँ, समझाने में नाकाम अभी तक! . कैसे कह दूँ, …तुम ना भटको, …मैं भी तो इक आवारा हूँ; शाम ढले मैं घर न पहुँचा, है मुझपे ये इल्ज़ाम अभी तक! . प्यार से, ‘पागल’ नाम दिया था, तूने जो इक रोज़ मुझे; तु... »

चुस्की चाय की

वही चाय के दो कप और एक प्लेट लौटा दे, कोई तो तेरे साथ बीते पलों को वापस लौटा दे, एक चाय के कप का बना कर झूठा बहाना, वो तेरा रोज रोज मेरे घर चले आना लौटा दे, तेरे साथ बैठ कर वो नज़रें मिलाना, वो चाय की चुस्की वो वक्त पुराना लौटा दे॥ राही (अंजाना) »

महफ़िल-ए-चाय

मैं मान लेती हूँ, की तुम्हे मेरी याद नहीं आती , पर वो महफ़िल-ए-चाय तो याद आती होगी ! वो शाम की रवानगी , वो हवा की दिवानगी, वो फूलो की मस्तांगी , याद न आती हो , पर वो चाय की चुस्की की आवाज तो याद आती होगी ! याद ना आती हो तुमको गूफ्तगू-ए-महफिल , पर निगाहों की शरारते तो याद आती होगी ! मैं मान लेती हूँ , की तुम्हे मेरी याद नहीं आती , पर वो महफिल-ए-चाय तो याद आती होगी ! हर शाम चाय के साथ अखबार पढ़ना , आद... »

चाय की प्याली

तेरे साथ बिताई मस्ती और चाय की वो चुस्की याद आई है, लो आज फिर से बीते लम्हों की एक बात याद आई है, तेरे साथ बैठ कर जो बनाई थी बातें, उन बातों से फिर से दो कपों के टकराने की आवाज आई है, छोड़ दी थी चाय की प्याली कभी की हमने, मगर आज फिर से तेरे साथ चाय पीने की इच्छा बाहर आई है॥ राही (अंजाना) »

चंद पलों का चुनिंदापन

जैसे उम्मीद की प्याली से चुस्की लेकर मानों मंज़िल की तरफ कोई सरिता बह जाती है वैसे ही मेरे चंद पलों का चुनिंदापन मुझे मिलते ही मेरे मन की विचार–शक्ति कविता बनकर कुछ कह जाती है।                                      – कुमार बन्टी   »

Heroes of nation

Ek rang ki chah  thi Ek daman ki chhav thi Khusub mitti ki Mere mathe ki shan thi Ek armano ki sham thi Ek riste ki sougat thi Door man mera  dol gya Jab khabar aayi ki vo gujar gya HVA ka rukh bhi badal  gya Na Jane vakat kyu ther  gya Tirnge ke liye fir ek jvan shhid ho gya Kyu kisi ke mathe ki bindiya ujad gyi  kyu kisi bahan se uska bhai chhot gya  kyu ma ke  keleje ka tudka aaj tirnge ke kafa... »

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