जगमग ज्योति जगा री सजनी,
घर – बाहर सब होय उजाला।
घनी अमावस की रतिया भी
आज,लगे धवल चांदनी वाला।।
मिट्टी का दीपक
रूई की बाती ।
सरसों का तेल
भर दीया बाती।।
मिटे अंधेरा काला वाला।। घर बाहर सब होय उजाला।।
प्रथम दीवाली धन तेरस का
द्वितीय जले यम चौदस का
तृतीय कुबेर लक्ष्मी गणेश का
चौथी गोवर्धन अन्नकूट
पंचम टीका भैया दूज
जगमग होवे घर रंगशाला।। घर बाहर सब होय उजाला।।
Category: Poetry on Picture Contest
Submission for ‘Poetry on Picture’ Contest
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दीप जलाओ री सजनी
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दीप जले हर घर आंगन में
कार्तिक मास अमावस घनेरी
प्रकाश पुंज बिखरा तिमिर मिटाने आई है
दीप जलें हर घर आंगन में
शुभ दीपावली आई है।श्री गणेश लक्ष्मी कुबेर अनुकंपा बरसाते
धन्य धन्य पूर्ण कार्य सब करते
अंधकार से प्रकाश की ओर करें अग्रसर
आशीर्वाद स्नेह से अभिसिंचित करते।पूर्ण कर वनवास ,लंकापति रावण वध
अयोध्या नगरी लौटे रघुराई
दीपोत्सव पावन पर्व की पड़ी रीति
असत्य पर सत्य की विजय पताका लहराई।उमंग प्रेम मन उल्लासित करता
दीपक दैदीप्तिमान हो जग को प्रकाशित करता
फुलझड़ियां रंगोली मिष्ठान की महक
पर्व स्वच्छता खुशहाली का संदेशा देता।मिटे कलुष तम मन में जो छिपा
स्वच्छ शीतल निर्मल बनाने आई है
दीप जलें हर घर आंगन में
शुभ दीपावली आई है।।स्वरचित मौलिक रचना
✍️… अमिता गुप्ता “नव्या” -
जलता जाए दीप हमारा।
जलता जाए दीप हमारा।
मिट्टी के दीपों में भरकर
तेल – तरल और बाती,
तिमिर-तोम को दूर भगाने
को लौ हो लहराती।
मिट जाए भू का अँधियारा
जलता जाए दीप हमारा।हो आँधी, तूफान मगर यह
दीप न बुझने पाये,
दीपक की लघु जल-जल बाती
युग – युग साथ निभाये।
धरती पर बिखरे उजियारा
जलता जाए दीप हमारा।खुशियों के ये दीप जलें
हों पूर्ण सकल अरमान,
घटे विषमता, उर में ममता
निर्धन हो धनवान।
मिटे व्यथा, जर, क्रंदन सारा
जलता जाए दीप हमारा।शान्ति, सफलता की फुलझड़ियाँ
घर – घर करें प्रकाश,
न्याय, धर्म की ज्योति बिखेरे
निर्बल में विश्वास।
चमके सबका भाग्य – सितारा
जलता जाए दीप हमारा।अनिल मिश्र प्रहरी।
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हाँथों में लेकर थाल
हाँथों में लेकर थाल
मेरी इस थाल में भरे गुलाल
लगाने आई हूँ,नजरों से नजर मिलाकर
तुझे छू कर तुझमे समा कर
कुछ इस तरह से होली आज
मनाने आई हूँ।मेरे प्रियतम मेरे मनमीत
तेरे दिल में मेरी प्रीत
जागने आई हूँ।यूँ हवा में उड़ता रंग
मैं अपने पिया के संग
ये होली का त्योहार मनाने आई हूँ।। -
ऐसा हो होली का त्यौहार ।।
वासना छोड़े घर
मिटे मन कि विकार
पूर्व-संस्कार न सताए
ऐसा हो होली का त्यौहार ।।1।।
जले अगर अग्नि में तो क्रोध व काम
पियो वैसी शराब
जिसकी नशा न उतरे जिंदगी भर
रंगों मन को बैरागी रंग में
वैराग्य की तिल्ली से जलाओ काम रूपी विकार.
_विकास कुमार -
*रंगीली होली*
रंगीली होली का आया त्योहार,
आओ सब मिलकर मनाएं।
सतरंगी रंगों से सराबोर,
अबीर-गुलाल लगाएं।।
फाल्गुन पूर्णिमा बसंती रंग बरसे,
प्रीत के रंग में हिय मन हरसे,
भर पिचकारी रंगों की बौछार,
होली सब मिलजुल कर मनाएं।
नीला गुलाबी लाल नारंगी,
अनंत खुशियां रंग बिरंगी,
छल क्लेश बुराई का हो नाश,
मन में छिपा मैल मिटाएं।
प्रेम सद्भावना आपसी भाईचारा,
होली है पावन त्यौहार हमारा,
असत्य पर सत्य की जीत,
विजय पताका फहराएं,
रंगीली होली का आया त्यौहार,
आओ सब मिलकर मनाएं।।स्वरचित मौलिक रचना
✍️… अमिता गुप्ता -
बुरा ना मानो होली है!
बुरा ना मानो होली है!
जोगीरा सा रा रा,
होली आई, होली आई.
बीत गयी बसंत, लौटी है फिर से फागुन के होली की उमंग.
भांग पीकर सब ऐसे मस्त पडे़ है,
जैसे दुनिया के सारे रंजोगम से बेखबर लग रहे है.
बच्चों की टोली आई,
रंगों के साथ खुशियाँ लाई.
कि
कई मीठे पकवान बने हैं,
बड़े तो बड़े दादाजी भी झूम रहे हैं .
याद आ गई बचपन की वो बातें,
पिचकारी में भरके रंगों को दूसरों पर उड़ेलना .
और दूसरों का -
आओ कुछ ऐसी होली मनाएं
आओ कुछ ऐसी होली मनाएं हर चेहरे पर मुस्कान ,हर घर खुशहाली आए छल कपट का इस होली में दहन हो जाए
प्रेम रूपी गुलाल हर जन उड़ाएं हर रंग में ऐसा रंग मिले, हर मन से मन मिल जाए प्रेम का ऐसा रंग लगाएं, दुश्मन भी गले मिल जाएं ऐसा कुछ चमत्कार हो जाए , कि कोई घरवाला बच्चों से लामणी न कराए बच्चों में भी पढ़ाई का चाव नजर आए पर , परीक्षा के समय कोरोना जरूर आए
आओ कुछ ऐसी होली मनाएं
📝( संदीप काला ) -
होली है
इस बार की होली पर अवगुण जलाये जाएंगे,
हर जन मन के हृदय में सद्गुण सजाये जाएंगे।जो रूठ के बैठ गए थे कभी संग साथी अपने,
लगाकर गले सब दुःख सन्ताप भुलाए जाएंगे।आएंगे आँगन में आज खेलेंगे और खिलाएंगे,
माथे से उन सबके स्नेह तिलक लगाये जाएंगे।सूखी जीवन की बेरंग चादर पर सोये हुए जो,
आज तन मन रंगों से उनके भी भिगाये जाएंगे।गाँव शहर गली गलियारे चौक चौबारे गूंजेंगे,
होली आई के गीत सभी कानों में सुनाये जाएंगे।थोड़ी सी भांग पीकर जो धरती माँ से लिपट गए,
तो राही हमभी किसी तरह से घर पहुंचाये जाएंगे।राही अंजाना
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अबकी होरी में
सैंया तेरे साथ खेल को लाई चुनरिया कोरी मैं
कौन रंग के साथ रंगोगे, मोहे अबकी होरी मेंजीवन मिला तोहे पाने को,कितने मौसम बीत गए
इंतजार में तेरे प्रीतम नैना मेरे भीग गए
अबकी होरी ऐसो रंग दे कोई कह न पाए मोरी मैं
तोरे रंग के साथ रंगोगे, कह दो अबकी होरी मेंदेख न तो एक बार मुझे ये चूड़ी कितनी प्यारी रे
चूड़ी क्या ये हंसी ये आंसू सब कुछ तुझ पर वारी रे
फिकर न करना सबरी टूटे अपनी इस बरजोरी में
कहो पिया तुम कैसे रंगोगे, मोहे अबकी होरी मेंतेरे विजोग में छोड़े सब रंग, बाकी एक सिंदूर सिवा
याद यही था लौटूंगा मैं, जाते समय जो तूने कहा
कैसे मैं समझाऊं पिया तोहे बस तोरी हूँ तोरी मैं
सच कहती हूँ मर जाऊंगी अलग किया जो होरी मेंऔर नही कुछ मुझको देना इतना वादा काफी है
दीपक बाती जैसे हम तुम बस दोनों ही साथी है
प्रेम लुटाती हूँ मैं तुझ पर ये प्रेम ही मेरी झोरी में
कस के मुझको गले लगा ले तू साजन और गोरी मैं -
आओ दो बोल सुना जाओ ना
आओ दो बोल
सुना जाओ ना,
गीत के बोल
सुना जाओ ना।
हो गए दिन बहुत
सुना ही नहीं,
अपने उदगार
सुना जाओ ना।
सूनी सूनी सी फिजायें हैं अब
सारी मुरझाई दिशाएं हैं अब,
वो घनी रात थी वो बीत गई
वो कड़ी धूप थी जो बीत गई,
अब तो बारिश जरा सा होने लगी,
आपके बिन हँसी भी रोने लगी,
थाम लो आप अब कलेजे को
आओ दो बोल सुना जाओ ना
अपने उदगार सुना जाओ ना। -
पुलकित हुआ तन
मनोहर शाम है
छितरे हुए हैं व्योम में घन
टपकती बूँद के अहसास से
पुलकित हुआ तन।
लग रहे हैं बहुत खुश पेड़-पौधे
उग रहे हैं अनेकों बीज
दे रहा भानु उनको ताप
गगन भी दे रहा है सींच। -
धरती माता कह रही
धरती माता कह रही, संकट मे संसार
रक्षा हो अस्तित्व की, सब मिल करे विचार
धरती माता कह रही, पर्यावरण सुधार
अभी समय है कीजिए, मत कीजै संहार
धरती माता कह रही, छिद्र हुआ ओजोन
ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ रही, दुखी विश्व सब कोन
भारत माता कह रही, मत समझें फुटबाल
पालन अब तक ज्यों किया, वैसे करिए लाल
धरती माता कह रही, बढ़ता नहीं आकार
जनसंख्या की वृद्धि का, करे नियंत्रण सार
धरती माता कह रही, एटम बम की होड़
से प्रथ्वी का अंत है, जल्दी लाओ तोड़
धरती माता कह रही, संसाधन का मोल
समझ खर्च सीमित करो, ग्यान कि गठरी खोल धरती माता कह रही, -
धरती माता
धरती माता ! धरती माता !
करूँ माँ कैसे मैं तेरा गुणगान,
आज तो निकली जा रही है सबके प्राण |
आज हर शै की रौनक जा चुकी है ,
चारो तरफ उदासी छा चुकी है |
कल तक चारो तरफ हरियाली ही हरियाली छाई थी |
देखकर ऐसी खुशहाली धरती माता की खुशी से आँखे भर आई थी |
पर आज का मंजर ही कुछ और है |
कल तक बात कुछ और था ,और आज का दौर ही कुछ और है |
आज सांसो में अजीब- सी घुटन है ,
ना जाने कोरोना वायरस जैसी तबाही का कौन सा ये चलन है |
पहले स्वच्छ हवा जीवन में रंग भरा करती थी ,
पर आज वहीं हवा प्रदूषित होकर जान लिया करती है |
आज लाशों की ढ़ेर लगी है,
कहीं बेटे, तो कहीं माएँ रो पड़ी है |
मैं पूछती हूँ कहाँ गयी तेरी रंग-बिरंगी खुश्बू से भरी हरियाली,
किसने छीन ली तुझसे तेरी खुशहाली |
धरती माता ! आज मैं करूँ तेरा क्या बखान,
पेड़ कट रहे है, बन रहें है फैक्टरी और मकान|
चिमनिंयों से निकलते धुएँ अब पूरी धरती को प्रदूषित करने की वजह बने है ,
कितनों के हाथ अब खून से सने है |
आओ! हर कोई पेड़ लगाने का प्रण ले,
जीव-जन्तु और वन्य प्राणियों को एक नया जीवन दे |
प्रकृति की विकृति जैसे सुनामी ,बाढ़ और प्रदूषित वातावरण बिगाड़ रही है अच्छी-खासी स्थिति,
जीवन अब शून्य हो रहे है,
पाप भी अब पूण्य हो रहे है |
आओ ! धरती माता को आज बचाएँ,
इसके लिए अपने हाथों से सभी एक पेड़ लगाएँ|
फिर से धरती माता को स्वच्छ व निर्मल बनाएँ |
एे! कोरोना वायरस का कहर तुझे अब जाना होगा ,
सबको मिलकर इस डर को हर किसी के अंदर से भगाना होगा |
ये पावनभूमि संत-महात्माओं का जन्मस्थल है
गंगा जैसी पवित्र नदी की बहती यहाँ शीलत जल है |
आज हॉस्पिटलो में ऑक्सीजन की कमी हो रही है ,
पर वहीं ऑक्सीजन देने वाले पेड़ों को काटने में कुछ लोगो की आँखो में नही है |
आज शुद्ध हवा के लिए मानव तड़प रहा है ,
जैसे उससे उसका संसार बिछड़ रहा है |
धरती माता !आज मैं करूँ मैं आपका क्या बखान,
जबकि सारी धरा ही बन रही हैआज शमशान |
तेरे बखान के लिए शब्द हलक से उतर नही रहें ,
तबाही का है आज एेसा मंजर कि जनजीवन सुधर नहीं रहे है |
कोई तो इस धरा की रौनक लौटा दो,
हर शै को फिर से महका दो |
इस धरा को मरूभूमि बनने से बचा लो |
अब कहाँ रहा नीला अंबर खुला आसमान,
तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही है तेरी संतान |
धरती माता! धरती माता !
तेरा अब करूँ मैं क्या बखान ,
मुझको अब कुछ समझ नहीं आता | -
धरती
वस्त्रों के बिना नारी शोभा नहीं पाती है
धरती को किया नंगी और शरम नहीं आती है
कैसे सपूत हो तुम जब मां तड़प रही
पीने को शुद्ध पानी ऑक्सिजन नहीं पाती है
प्रथ्वी दिवस मनाकर आजाद हो गए
परमाणु बम की होड़ से प्रथ्वी कि फटती छातहै
ओजोन छिद्र की उसे चिंता सता रही
सरकार फैक्ट्री की स्थापना कराती है
जीवन है इसी गृह में यह जानने के बाद
जनता जनार्दन इसे अब क्यूँ नहीं बचाती है बीमारियों की जड़ है इंसान तेरी भूख
जनसंख्या मत बढ़ाओ प्रथ्वी नहीं बढ़ पाती है -
वसुधा को हरा-भरा बनाए हम
जब सांसे हो रही है कम ,आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम,
आओ नमन करे हम वसुधा, को जो मिटाती है हम सबकी क्षुधा को,
जो बिना भेदभाव हम सबको पाले,वह भी चाहे पेड़ों की बहुधा को,
नये पेड़ों को फिर से रोपकर, इसे फिर बनाए रत्नगर्भा हम,
आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।
एक अकेले से कुछ ना होगा,हमें चाहिए सबका साथ,
पृथ्वी मां की रक्षा को फिर से बढ़ाओ अपने हाथ,
फिर कमी न कुछ जीवन में होगी,होगी तरक्की दिन और रात,
खुद जागें औरों को भी जगाए हम,
आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।
मानो तो माटी है मानो तो यह है चंदन,
हम सब मां को मनाएंगे और करेंगे फिर से वंदन,
पृथ्वी को हरा-भरा करने को निछावर कर दें अपना तन मन,
पृथ्वी मां जब मुस्काएगी तब दूर होंगे सारे गम,
आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।
ऑक्सीजन की कमी यूं बनी हुई,सांसे यूं सबकी थमी हुई,
लोगों का बिछड़ना शुरू हुआ,आंखों में फिर से नमी हुई,
ऑक्सीजन की कमी को दूर करें यूं हम,
आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।
जब धरती मां मुस्काएगी,परेशानियां स्वयं दूर हो जाएंगी,
एक दिन की तो यह बात नहीं,होगी यदि इनकी देखभाल जीवन में खुशियां आएंगी,
एक दिन के पृथ्वी दिवस से क्या होगा,आओ रोज पृथ्वी दिवस मनाएं हम।
आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।।
(पृथ्वी दिवस पर रचित मेरी कविता का संपूर्ण अंश प्रेषित ना होने के कारण मैं यह कविता आज पुनः प्रेषित कर रही हूं।) -
हमारी धरती मां
गेंद जैसी गोल
धरोहर है अनमोल
थकती नहीं दिन रात सूरज के चक्कर लगाती है जीवो को अपने अंचल में बसाती है इसीलिए तो यह धरती माता कहलाती है
लेकिन कई दिनो से है यह बीमार
ऊपर से परमाणु परीक्षण उसके अस्तित्व को रहा है ललकार
ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, वनो का संहार जैसे भयानक खतरे हैं तैयार
फिर भी वह देती है पुत्रों को उपहार
ममता दया दुलार
आओ सब मिल करे अपनी धरती मां का श्रंगार -
हमारी धरती मां
गेंद जैसी गोल
धरोहर है अनमोल
थकती नहीं दिन रात सूरज के चक्कर लगाती है
सभी जीवो अपने अंचल में बसाती है इसीलिए तो यह धरती माता कहलाती है
लेकिन कई दिनो से है बीमार
थकी नहीं ढोकर जग का भार
डिप्रेशन में चली गई है देख कर अपने पुत्र का बदला हुआ व्यवहार -
हमारी धरती मां
गेंद जैसी गोल
धरोहर है अनमोल
थकती नहीं दिन रात सूरज के चक्कर लगाती है
सभी जीवो अपने अंचल में बसाती है इसीलिए ये हमारी धरती माता कहलाती है
लेकिन कई दिनो से है यह बीमार
थकी नहीं है ढोकर संसार का भार
डिप्रेशन में चली गई है देख कर अपने पुत्र का b
बदला व्यवहार
ग्लोबल वॉर्मिंग, ओजोन छिद्र, वनो का संहार
मानो दुर्योधन की सेना हरण करना चाहती है
दोपतीका श्रंगार
कई सदियों से एटम बम परमाणु बम के परीक्षण
धरती के अस्तित्व को रहे हैं ललकार
उसे दुख है कि उसका इलाज कराने के बजाय
उसके पुत्र बेचने को है तैयार -
पृथ्वी लिये दो हाँथ”
सौंप रही है देखो पृथ्वी
अपना संरक्षण किन के हाथों में
जिनको आता नहीं सहेजना
प्राकृतिक संसाधनों को
जो ना कर सकते हैं अपनी सुरक्षा
वह पृथ्वी की सुरक्षा कैसे कर पाएंगे !
यही सोचकर डगमगा रहे हैं
पृथ्वी लिए दो हाथ,
कि ये सुकोमल हाथ
क्या पृथ्वी की सुरक्षा कर पाएंगे!!
क्या आने वाले कल में
मैं सुरक्षित महसूस कर पाऊंगी !
यही सोचते हुए पृथ्वी सहम रही है
और कह रही है-
कोई तो हो जो मेरी सुरक्षा कर पाये
प्राकृतिक संसाधनों का हनन होने से बचाए
मेरे वक्ष पर वृक्ष लगाए,
प्रदूषण रोंके, महामारी से मरते लोगों को बचाए।
भूमि पुत्रों को आत्महत्या करने से रोंके,
कोई तो हो जो असल में पृथ्वी दिवस मनाए।। -
जीवनदायनी वसुंधरा
तू ममतामयी तू जगजननी रहे आँचल तेरा हरा-भरा l
तू पालक है प्राणी मात्र की, हे जीवनदायनी वसुंधरा l
यह रज जो तेरे दामन की, लगती है शीतल चंदन सी,
तू उपासना की पाक ज्योति, तू पावन आरती-वंदन सी ,
तू माँ की ममता सी कोमल तू चाँद-सूरज सी मर्यादित,
तू चेतना की अभिप्राय, कोटि जीवन तुझ पर आश्रित,
तेरा ही ममता का ऋणी है इस सृष्टि का कतरा-कतरा l
तू पालक है प्राणी मात्र की, हे जीवनदायनी वसुंधरा l -
पृथ्वी दिवस का मनाने का संदेश
पृथ्वी कितनी सुन्दर है
हमें यह सब कुछ देती है
पुरानी पीढ़ी के अनुभवी हाथ
पृथ्वी की रक्षा सुरक्षा के लिए
नई पीढ़ी के नन्हें हाथों में
पृथ्वी को इस आशा के साथ
सौंप रहे हैं कि
नई पीढ़ी के नन्हें हाथ
इस जीवनदायिनी पृथ्वी का
संरक्षण करेंगे।
पृथ्वी को भी बचाएंगे
खुद को भी बचायेंगे।
पर्यावरण को भी बचाएंगे।
यही पृथ्वी दिवस को
मनाने का सन्देश है। -
“पृथ्वी दिवस”
पृथ्वी दिवस (22 अप्रैल) स्पेशल
——————————–इन दो हाथों के बीच में पृथ्वी
निश्चित ही मुसकाती है
पर यथार्थ में वसुंधरा यह
सिसक-सिसक रह जाती है
जा रही है पृथ्वी अब
प्रदूषण के हाथों में
कितना सुंदर रचा था इसको
लेकर ईश्वर ने अपने हाथों में
कैसा था इसका रूप सलोना
कैसा विकृत रूप हुआ
रे मानव ! तेरे कृत्यों से
धरती का यह स्वरूप हुआ
उगल रही है पवन खफा हो
गर्म-गर्म से गोलों
बुझा ना पाती नदियां अब तो
प्यासे कंठ के शोलों को
ध्वनियों के यह शोर-शराबे
अब ना मन को भाते हैं
दिन प्रतिदिन कर खनन पृथ्वी का
मानव कैसे इतराते हैं
कोप ना देखे पृथ्वी का यह
रहते अपने मद में चूर
जितना सुख पाते हैं भौतिकता से
उतना होते जाते प्रकृति से दूर
कोरोना सम रोग है आया
प्रकृति ने है रोष दिखाया
हे मानव ! अब संभल जा जरा तू
अब तो थोड़ी अकल लगा तू
वृक्ष लगा धरा सुंदर कर दे
पशु-पक्षियों को फिर से घर दे
कल-कल करके नदी बहेगी
जिससे प्राणियों की प्यास बुझेगी
काले-काले मेघ घिरेंगे
धरती सोना फिर उगलेगी
पृथ्वी दिवस* पर प्रण यह कर लो
धरती को फिर से पुलकित कर दो
एक-एक पौधा सभी लगाओ
प्रदूषण को जड़-मूल मिटाओ।।काव्यगत सौंदर्य एवं प्रतियोगिता के मापदंड:-
यह कविता मैंने सावन द्वारा प्रायोजित ‘पोएट्री ऑन पिक्चर कॉन्टेस्ट में दी गई फोटो को देखकर लिखी है।
जिसमें दर्शाया गया है-
“दो हाथों के बीच में पृथ्वी है तथा तो छोटे-छोटे हाथों को सामने दिखाया गया है”जिसे देखकर मेरे कविमन ऐसा लगा जैसे:-
ईश्वर के सुंदर हाथों से पृथ्वी, प्रदूषण के
नन्हे-नन्हे हाथों में जा रही है।
मैंने उस चित्र को देखकर अपने दिमाग में स्थापित किया और उसके बाद इस कविता का निर्माण किया।
आपको कैसी लगी जरूर बताइएगा।।जहां तक बात भाव की है तो यह चित्र भावना प्रधान है।जिसे देखकर अपने आप भावनाएं जागृत हो जाती हैं।क्योंकि पृथ्वी दिवस सिर्फ एक दिवस नहीं है यह एक त्योहार के रूप में मनाया जाना चाहिए।
क्योंकि धरती को हम अपनी मां कहते हैं उसे
स्वच्छ रखना हमारी जिम्मेदारी है।मैंने चित्र की समग्रता का ध्यान रखा है और साथ ही समाज में एक अच्छा संदेश जाए, इसलिए अपनी कविता को एक संदेशात्मक भाषा में विराम दिया है
पाठक को पृथ्वी के प्रति संवेदनशील बनाकर तथा अपनी गलतियों का एहसास कराकर पेड़ पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया है।
ताकि उसमें आंतरिक प्रेरणा जागृत हो और वह पृथ्वी की देखरेख करे, ऐसे काम करे जिससे हमारी पृथ्वी प्रदूषण के हाथों में नहीं बल्कि सुरक्षित हाथों में रहे।समग्रता, भाव- प्रगढ़ता तथा शब्द-चयन में, मैं कितनी कारगर रही यह तो मैं नहीं जानती !
परंतु मैंने यह कविता बहुत ही भावुक होकर लिखी है ताकि समाज को एक नई दिशा मिले।।पृथ्वी दिवस’ पर सावन द्वारा प्रतियोगिता
रखने के लिए मैं सावन का धन्यवाद करती हूं।। -
पृथ्वी दिवस(पृथ्वी की पुकार)
आज यह धरती माता,कर रही हम सब से यह पुकार है।
मुझसे जन्मा अस्तित्व तेरा,और मुझसे ही यह संसार है।।
मत करो क्षरण प्राकृतिक संसाधनों का,
रोपो सब मिलकर वृक्ष कई रोशन होगा सबका कुनबा,
चहुंओर बिछेगी हरियाली,
नदियां देंगी स्वर् कल कल का,
चरणों में अमिता करती वंदन हर क्षण मां तेरा आभार है।
तुझसे जन्मा अस्तित्व मेरा और तुझसे ही यह संसार है।। -
धरा माँ है हमारी
धरा माँ है हमारी
पालती है पोसती है,
इसी में जिंदगी
सारे सुखों को भोगती है।
अन्न रस पहली जरूरत
है हमारी जिंदगी की,
वायु-जल के बिन कहाँ है
कल्पना इस जिन्दगी की।
और सबसे मूल है
टिकना हमारा पृथ्वी पर
आश्रय लेना चलाना
जिन्दगी को पृथ्वी पर।
एक आकर्षक गुरुत्वी
खींचता है केंद्र को जो
इस तरह से है कि जैसे
माँ लगाती वक्ष से हो।
चारों तरफ है वायुमंडल
जिंदगी को सांस देता,
नीर है अन्तःपटल में
जिन्दगी की प्यास धोता।
भानु की किरणों से लेकर
ऊष्मा जल मेघ कर के
हर तरफ बरसात देती है
धरा माँ है हमारी।
हजारों जीव बसते हैं
वनस्पतियां हजारों हैं,
सभी को पालने के
पोसने के पथ हजारों हैं।
कहीं लघु कीट कीचड़ में
कहीं महलों में मानव है,
कहीं जलचर कहीं थलचर
कहीं उड़गन का है कलरव।
निभाती पृथ्वी दायित्व पूरे
एक माता का,
करें महसूस हम भी
पूत बनकर दर्द माता का।
है इसका आवरण पर्यावरण
उसको बचाना है,
हमें संतान के दायित्व को
अच्छा निभाना है।
न हो दोहन निरंकुश
पृथ्वी माता के अंगों का,
सरंक्षण करें सब लोग
मिलकर पेड़ पौधों का।
पर्वतों का खदानों का
नियंत्रित ही करें उपयोग,
समुंदर और नदियों का
नियंत्रित ही करें उपभोग।
पेड़ पौधे लगायें
जंगलों को बचाएं हम
अपनी पृथ्वी माँ को
सजायें हम।
पृथ्वी दिवस है
आज यह संकल्प लेना है
धरा है मां हमारी
इस धरा को पूज लेना है।
*******************
कविता पर प्रकाश – कविता भाव, विचार, नाद व प्रस्तुति योजना का समन्वय है। इस समन्वय को कविता में स्थापित करने का प्रयास किया गया है। नाद स्वरूप गति, प्रवाह व तुक का समावेश किया गया है। पाठक हृदय तक सहजता से प्रविष्ट करने हेतु आम जीवन मे प्रचलित भाषा का प्रयोग किया गया है।
पृथ्वी के साथ माता व संतान का पवित्र संबंध स्थापित कर काव्य सृष्टि का लघु प्रयास है। प्रस्तुत और अप्रस्तुत के साथ अनुभूति को उकेरने का एक प्रयास सादर प्रस्तुत है। -
आओ पृथ्वी दिवस मनाऍं
अन्न एवम् जल प्रदान करने वाली,
वसुन्धरा को नमन्।
पृथ्वी के संरक्षण हेतु,
आओ उठाऍं कुछ कदम।
पृथ्वी पर पवन हो रही अशुद्ध,
आओ वृक्ष लगाऍं हम।
इस धरा को और भी,
हरा बनाऍं हम।
आओ पृथ्वी दिवस मनाऍं,
पृथ्वी को हरा-भरा बनाऍं।
धरती माॅं कितना देती है,
क्या कभी अनुमान लगाया है।
मात्र एक बीज बोने पर,
एक वृक्ष उग आया है।
फल, फूल देता है हमको
मिलती उसकी छाया है।
प्लास्टिक आदि कूड़े कचरे से,
मानव ने धरा को मलिन किया।
श्वास अवरुद्ध हुई धरा की,
रक्षा हेतु अब कोई कदम उठाना है।
वृक्षारोपण करना है सबको,
पृथ्वी दिवस मनाना है।
प्रकृति ने यह पृथ्वी,
ऐसी नहीं बनाई थी।
चारों और हरियाली थी,
बहुत ख़ुशहाली छाई थी।
मानव ने अपने हित हेतु,
सब वन-उपवन नष्ट किए
वहाँ बसने वाले जीवों को,
निज स्वार्थ हेतु कष्ट दिए।
संतुलन बिगड़ गया धरा का,
प्रकृति ने प्रकोप बरसाया है।
कोरोना के रूप में,
महारोग यह आया है।
अपनी जीवन शैली में,
अब सुधार हमको लाना है
इस धरा को स्वच्छ बनाना है।
प्रयत्न करेंगे हम सभी तो,
अवश्य सुधार आएगा।
यह धरा ही ना रहेगी तो,
सब धरा का धरा रह जाएगा॥
____✍गीता -
अपनी पृथ्वी बचालो
अपनी पृथ्वी बचालो – पृथ्वी दिवस पर मेरी नवीन रचना
हे भूमिपुत्र आज अपनी, पृथ्वी को बचालो तुम,
स्वार्थों से दूर रहकर हाथ अपने मिला लो तुम।
पृथ्वी खतरे में है यारों, पर्यावरण बचा लो तुम,
प्रदूषणमुक्त कर पृथ्वी को काल से बचालो तुम।।मानव अपनी बुद्धि से चांद पर कब्जा कर रहा,
नित नये नये आविष्कार से प्रकृति को छेड़ रहा।
अणु परमाणु खोज कर शक्तिशाली भी हो रहा,
पर मानव अतितरक्की से मानवता भी खो रहा।।अति महत्वाकांक्षा के कारण जंगल नष्ट हो गये,
कारखानों की गंदगी से नदी नहर दूषित हो गये।
ध्वनि और वायु प्रदूषण से शहर प्रदूषित हो गये,
महिलाओं के अपमान से ईश्वर भी कूपित हो गये।।तभी कोरोना काल बन मानव जाति पर छाया है,
हमारी ही गलतियों से, मौत का तांडव मचाया है।
वृक्षों के कटने से पृथ्वी पर, घोर संकट आया है,
इम्युनिटीपाॅवर घटने से वायरस सक्रिय हो पाया है।।अब भी समय है भूमिपुत्रों, अपनी पृथ्वी बचालो,
वृक्ष लगाकर जगह जगह, मानव जीवन बचालो।
प्रदूषण मुक्त कर पृथ्वी को, प्रकृति से सजालो,
हे भूमि पुत्र कोरोना से भी, अपनी पृथ्वी बचालो।। -
मैं तुम्हारी धरोहर
मैं तुम्हारी धरोहर
मैं पृथ्वी बोलूँ आज अपने दिल की,
सुनू,देखूँ मैं भी तुमसा तुम ये जानो,
बोला तुम्हरा हर शब्द हर पल मैं सुनती,
सुनू वो जिसे सुन खिल उठती मैं भी,
दिल न चाहें कभी वो भी सुनना पड़ता,
देखूं उसे भी जो सँवारे सजाएं मुझको,
होता वो भी जो हर पल रौंदे मुझको,
फ़र्क रौंदने का हर का मैं भी समझूँ,
भरू पेट किसी का तो पेट मेरा भरता,
नियत नहीँ भरी होती वो रहता भूखा,
हूँ मैं तुम्हारी जननी अब तो मुझे पहचानों,
दे गए तुम्हें अपने तुम्हारे धरोहर मान मुझको,
करो संचय धरोहर की मान तुम अपना,
कल देते समय हो मुस्कान चेहरों पर तुम्हारी,
करे सलाम तुम्हें पीढियां देख धरोहर तुम्हारी।
प्रतिभा जोशी
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Happy Holi 2021
होली के रंग में रंग जा मेरे कन्हैया जी, होली आई है मेरे सांवरिया जी,
हंसते – गाते, नाचते आना मेरे घर मेरे सांवरिया जी,
राधा जी को भी साथ में लाना मेरे सांवरिया, मेरे घर में डेरा लगाना, मेरे परिवार और मेरी बेटी को अपना आशीर्वाद प्रदान करना, अपनी छत्रछाया में हम सब को रखना मेरे सांवरिया……
होली आई है, होली आई है मेरे सांवरिया रंग उड़ाती, मिठास ( मधुर) बरसाती,
ये रंगों का त्योहार है, मेरे कान्हा जी, हमेशा मेरे संग-2 रहना, इस पावन त्यौहार में खुशियाँ ही खुशियाँ लाना…
क्योंकि ये खुशियों की बौछार है ये होली, मेरे कान्हा जी, मेरे सांवरिया, सुख और समृद्धि की पिचकारी भर-भर
के लेते आना……
सबको मिलकर भांग पिलाएं ,पी कर कोई हसंता जाए, अपने हर दुःख को भुलता जाए,
खेलों सब खुशियों के संग आओ मेरे कान्हा जी, मेरे सांवरिया मिलकर होली खेलें सब एक दूजे के संग!!!
मथुरा की खुशबु, गोकुल का हार, वृन्दावन की सुगंध, बरसाने की फुहार, राधा की उम्मीद, कान्हा का प्यार, मुबारक हो आपको Holi का त्यौहार ! Happy Holi 2021 -
My Dear Itika My Angel
My Dear Itika My Angel, तुम से ही मेरी जिंदगी है
मैं तुम्हें खुद से भी ज्यादा प्यार करती हूँ और
मैं किसी भी कीमत पर तुम्हें खोना नहीं चाहती।
Dear Itika जब तुम कभी लड़खड़ाओ तो जो हाथ तुम्हें सहारा दें वो मेरे यानी तुम्हारी माँ के होगे,
जिस कंधे पर सिर रखकर तुम्हें सुकून मिले वो मेरे यानी तुम्हारी माँ के होगे,
जब तुम कहोगी तो तुम्हें सुनने वाले कान भी मेरे यानी तुम्हारी माँ के होगे,
मैं हर पल हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगी। तुमसे ही प्यार करुँगी। -
मेरी प्यारी Mam Neha
दिलों में बस जाए तो महोब्बत है वो,
कभी पत्नी-धर्म तो कभी बहू का कर्तव्य निभाती है वो,
कभी बहिन तो कभी ममता की मूरत है वो,
उनके आँचल में हैं से चाँद सितारे,
कभी सहेली बन कर हर दर्द -ग़म को छुपा लेते सीने में,
सब्र की मिसाल, हर रिश्ते की ताकत है वो,
कौन कहता हैं कि वो कमज़ोर है।
आज भी उनके हाथ में अपने घर को चलाने की डोर होती है।
वो तो दफ्तर भी जाते हैं, और अपने घर परिवार को भी संभालते हैं।
हौंसले और हिम्मत की पहचान है वो,
अपने हौसले से तक़दीर को बदलने की ताकत रखते है वो,
वो और कोई नहीं मेरी प्यारी Mam Neha है, -
My Dear Itika
My Dear Itika तुम मेरी जिंदगी में सबसे खूबसूरत लड़की हो। इससे से भी बढ़कर तुम एक तुम मेरे प्यारी से बेटी हो। मुझे नाज है कि तुम मेरी बेटी हो। मैं उस दिन की बहुत शुक्रगुजार हूँ, जिस दिन God ji ने तुम्हे मेरे लिए एक माँ के रूप में चुना है। मेरे लिए वो दिन ढेर सारी खुशियां लाया था, तुम जितनी खूबसूरत हो, उससे भी कहीं ज्यादा तुम्हारी हसीं है, तेरी शरारते, तेरी हँसी,तेरी तोतली बातें। मैं तुमसे आज का दिन उसी तरह स्पेशल बनाने का वादा करती हूँ। जितनी स्पेशल तुम मेरे लिए हो… मेरी जिंदगी में आने के लिए, इस जमीं पर कदम रखने का और मुझे ढेरों खुशियां और हिम्मत देने के लिए शुक्रिया।
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My Dear Itika My Angel
My Dear Itika My Angel, तुम से ही मेरी जिंदगी है
मैं तुम्हें खुद से भी ज्यादा प्यार करती हूँ और
मैं किसी भी कीमत पर तुम्हें खोना नहीं चाहती।
Dear Itika जब तुम कभी लड़खड़ाओ तो जो हाथ तुम्हें सहारा दें वो मेरे यानी तुम्हारी माँ के होगे,
जिस कंधे पर सिर रखकर तुम्हें सुकून मिले वो मेरे यानी तुम्हारी माँ के होगे,
जब तुम कहोगी तो तुम्हें सुनने वाले कान भी मेरे यानी तुम्हारी माँ के होगे,
मैं हर पल हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगी। तुमसे ही प्यार करुँगी। -
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं
हे शिव जफ सफ कुछ ही तेया है, फपय मे साया सॊसाय तेया भेया क्यमं कयता है ? हय इॊसान,हय धड़कन,जीव-जॊतु,मे साया ब्रह्माॊड आफि सफ कुछ ही तेया है,हय कोने – कोने भं,कण – कण तू ही तू फसा है,सुख बी तेया,िुख बी तेया,यात औय सुफह बी सफ तेयी है,जीवन शभरे मा कारा अॉधेया सफ आऩके ही इिायं ऩे है…..
Anu Mehta -
भाई जैसा मेरा दोस्त(My Best Friend)
प्रेम और त्याग के धागे से जुड़ा है, भाई जैसा मेरा दोस्त और उसकी दोस्ती,दुनिया के सभी रिश्तों में से सब से खास है भाई जैसा मेरा दोस्त और उसकी दोस्ती,दिलों को दिलों से जोड़ने वाला, एक प्यारा – सा अहसास है,
भाई जैसा मेरा दोस्त
और उसकी दोस्ती,
सब के जीवन में घोल दे जो खुशियों का रस, वह मिठास है,
भाई जैसा मेरा दोस्त और उसकी दोस्ती,
पूरी हो जाये जो ख्वाहिश ,वह आस है
भाई जैसा मेरा दोस्त और उसकी दोस्ती,
होठों पर ला दे
जो मुस्कुराहट, वह हंसी है
भाई जैसा मेरा दोस्त और उसकी दोस्ती,
जीवन में भर दे संगीत, वो राग है
भाई जैसा मेरा दोस्त और उसकी दोस्ती,
जीना सिखलाता है जो, वो अंदाज है
भाई जैसा मेरा दोस्त और उसकी दोस्ती,
Anu Mehta -
चाहे तुम कभी मुझे से बात मत करना
चाहे तुम कभी मुझे से बात मत करना,
पर हो सके तो बस
Whatsapp Pe Message लिखना,
चाहे कुछ भी लिखना जैसे उम्मीदें, आशाएं और मुस्कुराहटें,
या फिर कुछ दर्द, कुछ शिकवे,
बेशक अपने आंसू भी तुम लिखना पर अपनी यादें मत लिखना,
कुछ अपने सपनों को लिखना,अपनों का दर्द,
या फिर अपनों का प्यार लिखना, मौसम की करवटें
और जिंदगी में फैले रंगों को भी लिखना
पर अपनी यादें मत लिखना
चाहे अपने इर्द-गिर्द की घटनाएं,
या फिर अपने पापा की डांट, या माँ का प्यार लिखना,
पर हो सके तो अपनी यादें मत लिखना……….
चाहे भाई- बहनों का दुलार, या फिर अपनी भाभी के चेहरे की मुस्कान लिखना
पर हो सके तो अपनी यादें मत लिखना
मैं जानती हूँ तुम पढ़कर मेरे पे हंसोगे और बोलेंगे
“पागल”
चाहे तुम कुछ भी बोलना/ सोचना पर हमारे बीते पलों को अपनी यादें में
मत लिखना….. -
साइको इंसान (Psycho Person)
हमारे जीवन में एक दोस्त बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। एक दोस्त आपकी जिंदगी को खूबसूरत बना सकता है। हमारी जिंदगी हमारी बचपन कि संगत पर काफी हद तक depend होती है। बचपन में हम जिस तरह के दोस्त बनांते है या जिस तरह के दोस्तों के साथ रहते है हमे वैसी ही आदत हो जाती है।
अगर आपको लाइफ में एक अच्छा और सच्चा दोस्त मिल जाये तो आपकी लाइफ ही अलग होगी। एक अच्छा दोस्त हमारा हर मुसीबत में साथ देता है और बुरा दोस्त सिर्फ अच्छे वक़्त में हमारे साथ रहता है………….
मेरा दोस्त, जो मुझे अच्छे से जानता था,
पर लोगो का कहना है एक लड़का लड़की एक अच्छे दोस्त नहीं हो सकते है या फिर लोगो को हमारी दोस्ती खलती होगी………
एक साइको इंसान (Psycho Person) जिससे बात करना और उसका behaviour मुझे बिल्कुल पसंद नहीं था, उसको लड़कियों से या फिर ये बोलू की उसको बात करने का तरीका, कब क्या, किसके सामने क्या कितनी बात करनी होती है वो कुछ नहीं जानता था……
हम साथ में एक ही ऑफिस में काम करते थे, पर हमारे विभाग अलग अलग थे, हम एक साथ में काम नहीं करते थे, ना ही दिन में साथ में खाना नहीं खाते थे, पर जब भी हमारी बात होती थी तो हम दोनों लड़ते रहते थे…..
दिन भर वो मेरी डांट खाता और मेरी बात सुन -2 कर कई – कई दिन निकाल देता था…,
वो मेरे गुस्से को भी झेल जाता था, मेरी ख़ामोशी से मेरे नाराज़ होने का अंदाज़ा लगा लेता था,
कभी-कभी वो मुझ से सामने से आकर मेरे से अच्छे से बात ना करने का कारण मांगा था और मैं उसे रूखेपन से बात करके भगा देती थी….. एक दो साल तक ऐसे ही चलता रहा वो मेरे से कारण मांगता रहा और उसे रूखेपन से बात करती रही…..`
वो उन लोगो मे से है, जो दुनियाँ की भीड़ मैं भी मुझे ढूंढ लेता था,
वो उन लोगो मे से नही है, जो मुंह में राम बगल में छुरा धरते..
उसके दोस्त उसे मेरे नाम से चिढाते भी थे, पर वो मुस्कुरा कर उन सब से पीछा छुड़ा लेता था, ज्यादा हदें पार होने पर वो मेरे लिए लड़ भी जाता था…….
जब मैं रो भी देती थी और मेरा मूंड ठीक करने के लिए, वो कभी-कभी अपने रिश्तेदारों की कहानिया भी सुनाता था…….,
तो कभी कभी बोलता था तू मेरे लिए एक लड़की भी नहीं ढूंढ सकती, किसी को मेरी सेहली बना दे आदि बकवास बातें करता था और कभी-2 बोलता था तेरे सिवा मेरा है ही कौन यहाँ, उसकी बेवकूफियां मुझे मुश्किल मैं डाल देती है, Light ले यार , कहकर सब टालता है, ये लाइन बोलकर मक्खन भी बहुत लगाता……
पता क्यों ????
क्योंकि उसको 11.00 बजे की चाय पीनी होती थी……..
उसमे बहुत कमिया थी, वो नादान था, मैंने उसको उसकी गलतियां और कमियां बताया करती थी, वो अपनी कमियों और गलतियों को सुधरता था
मैंने उसको बोला अगर तुम मेरे से बात करना चाहते हो तो अच्छे से मेरे से रेस्पेक्टफ़ुल्ली (Respectfully) बात किया कर… पर उसके कान तक आज तक जूं नहीं रेंगी.. आज भी हमारी बात होती है तो वो तू – तड़ाक में ही बात करता है, पर वो पहले जैसा नहीं है सब से अच्छे से और सम्मान से (Respectfully),किसी से फालतू बात नहीं करता है…….
रुको- रुको अभी उसकी Story खत्म नहीं हुए है
अभी उसकी अच्छाई और बुराई की बात हुई है, वो कौन है उसका नाम क्या है ये तो बताना बाकि है वो साइको इंसान /पागल लड़का उसका नाम Ketan Sharma है, अब हम दोनों एक ऑफिस(Office) में काम नहीं करते पर फ़ोन पे कभी कभी बात होती है वे one Month में एक/ दो बार….. पर वो आज भी मुझे आप बोल कर बात नहीं करते सिर्फ तू बोल कर बात करता है कोई बात नहीं बाकि वो सब से अच्छे से बात करता है बस वो अपना और अपने परिवार का ध्यान रखें………… bye Cu tata
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https://anumehta2019.blogspot.com/2021/02/psycho-person.html -
Happy International Women’s Day
Happy International Women’s Day नारी हर घर की शान होती हैं, आज के युग में तो नारी घर के साथ साथ सभी क्षेत्रों में अपना स्थान बना चुकी हैं। महिला समाज एवं परिवार का मुख्य आधार होती हैं। महिलाएं समाज को सभ्य बनाने से लेकर देश के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आज महिलाओं ने खुद को हर क्षेत्र में साबित किया है।
इंसान के वजूद के लिए आसमान का होना बेहद ज़रूरी है, इसी से हमें बारिश मिलती है और इसी से हमें धूप भी मिलती है। किसी ने आसमान की ऊंचाई से अपने ज़ज़्बे को मापा है तो किसी ने आसमान में ख़ुदा को ढ़ूंढ़ने की कोशिश की है लेकिन यह हमेशा ही मानवीय-जिज्ञासा का विषय रहा है।
हैलो, (Heloo /Hi ) मैं हूँ अनु मेहता । मैं आज आपके सामने एक बहुत मेहनती और बहादुर और हिम्मती लड़की के बारे में बताना चाहती हूँ “Women’s Day Mam” कविता को पूरा पढ़े….
आईये पढ़ते है. कुछ ऐसे ही मेहनती और निडर शेरो के बारे में परिचय करवाती हूँ.. जिन्होंने ये साबित कर दिया है लड़किया लड़को से 100 क्या 1000 कदम आगे है जो आसमां की इन्हीं खूबियों को अपने में समेटे हुए हैं…….
वहीं आइए जानते हैं महिलाओं के महत्व को समझाने वाली महिला दिवस पर कुछ प्रेरणात्मक कविताओं – Woman के बारे में महिला दिवस पर कुछ कविताएँ – Women’s Day Poem in Hindi है।
दिलों में बस जाए तो महोब्बत है वो,
कभी पत्नी-धर्म तो कभी बहू का कर्तव्य निभाती है वो,
कभी बहिन तो कभी ममता की मूरत है वो,
उनके आँचल में हैं से चाँद सितारे,
कभी सहेली बन कर हर दर्द -ग़म को छुपा लेते सीने में,
सब्र की मिसाल, हर रिश्ते की ताकत है वो,
कौन कहता हैं कि वो कमज़ोर है।
आज भी उनके हाथ में अपने घर को चलाने की डोर होती है।
वो तो दफ्तर भी जाते हैं, और अपने घर परिवार को भी संभालते हैं।
हौंसले और हिम्मत की पहचान है वो,
अपने हौसले से तक़दीर को बदलने की ताकत रखते है वो,
वो और कोई नहीं मेरी प्यारी Mam है वो, -
बहकावों में छले गए..
कुछ दावों में, वादों में, कुछ बहकावों में छले गए,
भोले-भाले कुछ किसान झूठे भावों में चले गए..खेतों में पगडण्डी की जो राह बनाया करते थे,
आज भटक कर वो खुद ही ऐसे राहों में चले गए..वो ऐसे छोड़ के आ बैठे अपने खेतों की मिट्टी को,
सागर को छोड़ सफीने भी बंदरगाहों में चले गए..थककर किसान ने जीवनभर जिस रोटी को था उपजाया,
वो रोटी छोड़के कैसे अब झूठे शाहों में चले गए..अब तो किसान भी नज़रो में दोतरफा होकर रहते हैं
कितने दुआओं में शामिल थे कितने आहों में चले गए..भोले-भाले कुछ किसान झूठे भावों में चले गए…
– प्रयाग धर्मानी
मायने :
सफीने – नाव
झूठे शाहों – झूठे बादशाह -
नहीं है ,अब हम मजबूर
किसान है,भारत की शान है
खेत – खलियान की है,जान
मेहनत में है ,उनकी
अलग पहचान
देश को विकसित बनाने में है
उनका सबसे बड़ा योगदान
देश की अभिमान
भारत की है,अलग पहचान
किसान है ,भारत की वीर पहचान।
धन्यवाद – काजल साह – स्वरचित -
किसान आंदोलन
जिस बंदे ने तुम्हारी परोसी थाली है,
पर मजबूरन आज उसी की थाली खाली है।
और समझो धूप बरसात गर्मी -ठण्डी उन दताओ की
वरना राजनीति के चेहरे पर कालिख है।कल जो बादल वर्षा करते रहते थे
कल तक जो तुमको थाली परसा करते थे
वो आज गरज-बरस कर राजनीति पर आये है
समझो तुम राजनेताओं तुम पर काले साये है। -
Kisan aandolan
उसके खून से धरती माँ की चुनर लाल है,
उस अन्नदाता से ही माँ के लाल लाल है।
देखो आज माँ के कुछ लालो ने क्या हाल किया,
कुछ लोगो से ही मेरा अन्नदाता आज बेहाल है। -
“किसान आन्दोलन”
जो बादल सदैव ही निर्मल
वर्षा करते थे
निज तपकर अग्नि में
तुमको ठण्डक देते थे
वह आज गरजकर
तुम्हें जगाने आये हैं
ओ राजनीति के काले चेहरों !
ध्यान धरो,
हम ‘हल की ताकत’
तुम्हें दिखाने आये हैं…
———————————
धरती का सीना चीरकर
जो उत्पन्न किया
वह सफेदपोशों ने
अपनी तिजोरियों में बंद किया
हम वह ‘मेहनत का दाना’
उनसे छीनने आये हैं…
———————————यह कैसा बिल लेकर आए
तुम संसद में ?
फूटा गुस्सा आ बैठ गये
हम धरने में
हम बीवी, बच्चे, खेत-खलिहान
छोंड़कर आये हैं…..
————————————
कितनी रातें सड़कों पर
टेंण्ट में बीत गईं
दो सौ से ज्यादा
किसान भाईयों की
मृत्यु हुई
हम ‘भारत माँ के लाल’
बचाने आये हैं……
——————————–
हम खालिस्तानी और विपक्षी
कहे गये
कोहरा, बादल, बिजली, वर्षा
से भी नहीं डरे
आँसू गैसे के गोले,
पीठ पे डण्डे खाए हैं…..
———————————–
कुछ अराजक तत्वों ने
इस आन्दोलन को अपवित्र किया
दूध बहाया तो कभी
लाल किले पर कुकृत्य किया
हम हलधर ! वह बदनामी का दाग
मिटाने आये हैं…….
————————————-
तुम ढीठ बड़े !
कुछ सुनने को तैयार नहीं
हम भी पीछे हट जाने को
तैयार नहीं
हम तुमको अपनी व्यथा
सुनाने आये हैं…
——————————————-
आज देखकर
अपनी थाली में सूखी रोटी
हिल पड़ा कलेजा
पगड़ी की भी हिम्मत टूटी
कोई क्या जाने ! हमने कर जोड़ के
कितने नीर बहाये हैं…कुछ ढुलक पड़े गालों पर
कुछ थाली में टूट गिरे
कुछ गटक लिए जो
गले उतरकर आये हैं…
हम सूखी रोटी का मान
बढ़ाने आये हैं
अन्नदाता की पीर’ को
परिभाषित करने आये हैं…
**********************काव्यगत् सौंदर्य एवं प्रतियोगिता के मापदण्ड:-
इस कविता को मैंने फोटो प्रतियोगिता में दिखाये गये चित्र को ध्यान में रखकर लिखा है|
जिसमें एक बुजुर्ग पगड़ीधारी किसान
अपनी थाली में सूखी रोटी देखकर सिर झुकाए हुए कुछ सोंचने की मुद्रा में खड़ा है |
उसकी खामोंशी को मैंने शब्दों के माध्यम से
रेखांकित तथा जीवंत बनाने की छोटी-सी कोशिश की है |
***********************************
प्रतियोगिता के मापदण्डों को ध्यान में रखते हुए मैंने सर्वप्रथम चित्र तथा किसान आन्दोलन की समग्रता तथा समाहार शक्ती का प्रयोग किया है जैसा कि चित्र का भाव है वैसा ही भाव व्यक्त करने का प्रयास किया है…
काव्य के सभी तत्वों को समाहित करने के कारण तथा रचना का भावुक विषय काव्य परंपरा में कितना योगदान दे पाया यह तो निर्णायक मण्डल पर निर्भर है…समाज में अच्छा संदेश पहुंचाने तथा किसान आन्दोलन को सार्थक दृष्टिकोण प्रदान करते हुए मैंने विषय को गम्भीरता से लिया है तथा
सरकार और किसान के बीच सार्थक वार्ता हो और मतभेद खत्म हो ऐसी कामना की है…
कविता के अन्त में मैंने चित्र को उसी रूप में प्रस्तुत किया है जैसा वह मेरे कविमन को नजर आया…
आपको मेरा प्रयास कैसा लगा जरूर बताइयेगा..
कविता को अन्त तक पढ़ने के लिए धन्यवाद… -
मैं किसान हूं|
मैं किसान हूं , हां मैं किसान हूं |
धरती मां की मैं ही आन बान शान हूं|
मैं किसान हूं||
धरती मां को चीर के तुम्हें खिलाया है,
अपना पसीना पौछकर तुम्हें जिलाया है,
अपनी नींदें भूलकर तुम्हें सुलाया है,
तुमने मुझको आज क्यों इतना रुलाया है,
यह मत भूलो मैं करता ,अन्न दान हूं
मैं किसान हूं , हां मैं किसान हूं|
मैं किसान हूं||
मैं सड़कों पर आज हुआ क्यों,
इतना मैं मजबूर हुआ क्यों,
मुझको तुमने छोड़ दिया क्यों,
लाके ऐसा मोड़ दिया क्यों,
देश का दुश्मन बना दिया क्यों,
खुद से हमको अलग किया क्यों,
तुम राष्ट्रगीत हो तो मैं राष्ट्रगान हूं
मैं किसान हूं हां मैं किसान हूं|
मैं किसान हूं|| -
अन्नदाता
मैं किसान हूं
समझता हूं मैं अन्न की कीमत
क्योंकि वो मैं ही हूं
जो सींचता हूं फसल को
अपने खून और पसीने से
मरता हूं हर रोज
अपने खेत की फ़सल को जिंदा रखने के लिये
ताकि रहे न कोई भूखा
कोई इस दुनिया में
फिर भी तरसता हूं खुद ही
रोटी के इक निवाले को
ले जाता है कोई सेठ
मेरी पूरी फ़सल को
ब्याज के बहाने, कोढ़ियों के दाम
लड़ता हूं अकेला
आकर शहर की सड़्कों पर
फिर भी नहीं हो
तुम साथ मेरे
अपने अन्नदाता के! -
हलधर धरने पर
हलधर धरने पर रहा, आस लगाये बैठ।
मानेगी सरकार कब, सोच रहा है बैठ।
सोच रहा है बैठ, मांग पूरी होगी कब।
अकड़ ठंड से गया, ताप सब छीन गया अब।
कहे लेखनी आज, व्यथित है कृषक भाई,
कुछ तो मानो मांग, दिखाओ मत निठुराई।
**************************
ठीक नहीं थी बात वह, लालकिले में पैठ।
आंदोलन धीमा पड़ा, सोच रहा है बैठ।
सोच रहा है बैठ, सभी नाराज हो गये।
जो अपने थे वही, पराये आज हो गये।
कहे लेखनी सोच, समझकर कदम उठाओ।
सत्य अहिंसा पर चल अपनी मांग उठाओ।
**************************
जनता तो समझी नहीं, आंदोलन का मर्म,
लेकिन अपनी बात को, रखना सबका धर्म।
रखना सबका धर्म, बात जो भी जायज हो।
लोकराज का धर्म , कभी नहीं गायब हो।
कहे लेखनी रखो, लचीलापन दोनों ही।
थोड़ा थोड़ा झुको, आज झुक लो दोनों ही।
**************************
रोटी देता है किसान, सेकूँ रोटी आज,
आंदोलन को चोंच दूँ, सोच रहा है बाज।
सोच रहा है बाज, मुझे फायदा हो जाए।
इधर उधर की बात, देख कृषक मुरझाये।
कहे लेखनी आज, जरूरत आन पड़ी है,
सुलह बने अब यही, जरूरत आन पड़ी है।
**************************
मांग उठाना देश में, नहीं कोई अपराध,
लोकतंत्र की रीत है, रखना अपनी बात।
रखना अपनी बात, और सुनना राजा को,
यही बात जो मधुर बनाती है सत्ता को।
कहे लेखनी इधर, मधुरिमा उधर मधुरिमा,
मांग रही है यही, समन्वय अब भारत माँ।
—— डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय -
मैं अन्नदाता
मैं अन्नदाता
देख अपनी थाली में खाना रूखा सूखा,
हो उदास सोचे किसान फ़िर एक बार,
हूँ किसान कहलाता मैं जग में अन्नदाता,
रहता साथ अन्न के, मिले मुझे ये मुश्किलों से,
मेहनत मेरी रोटी बन भूख मिटाती जग की,
न देख सके वो सुबह सुहावनी सब सी,
पसीना मेरा शर्माए गर्मी जेठ बैसाख की,
बैलों संग मेरे हल के धरा मेरी निखरती,
बीज लिए आशाएं धरा के मैं बोता,
आशाएं अब मेरी देखें बादल वो चंचल,
आता सावन घुमड़ घुमड़ लाये मुस्कान,
मेहनत फ़िर मेरी नवांकुर धरा खिलाए,
दिन रात मेरे फसलों संग लहलहाएँ,
देख फसलें मुझ संग मेरी धरा खिलखिलाए,
सोना जग का सोना हमेशा गुमाये,
सोना खोकर सोना फसलों का मैं पाता,
धान मेरी धरा का अब घर घर जाए,
मेहनत मेरी ढल रोटी में माँ की भूख मिटाये,
भूख जग की मैं मिटाता सोता ख़ुद भूखा,
करो गुणगाण जब रोटी का माँ की ,
याद करना मेरी भी मेहनत मेरे वीरा।स्वरचित
प्रतिभा जोशी -
भारत वर्ष मेरा देश
तुमने कहा की मुसलमान गलत है
हमने मान लिया
तुमने कहा लॉकडाउन मे घर वापसी कर रहे मज़दूर गलत है कोरोना संक्रमण का कारण है
हमने मान लिया
तुमने कहा किसान आतंकवादी है ख़ालिस्तानी
हमने मान लियातुमने कहा देश नहीं बिकने देंगे
रेल और हवाई अड्डे बेच दिए
पीसउ बेच दिए
हमने कहा चौकीदार ने कहा है
अच्छा ही होगातुमने सब अच्छा किया सबसे दूर किया
पर भाई एक बार तोह चस्मा उतारो
देश मे अब कौन है जिसके खिलाफ हमें करोगे
दूध 30रुपया लीटर है गो मूत्र 70रुपया लीटर है
पेट्रोल सबसे ज़्यादा दाम पर है -
Mera bharat
जो हल जोते, फसल उगाए
उसे उसकी कीमत नहीं मिलती।
जो मजदुर उत्पाद बनाए
उसे उसकी कीमत नहीं मिलती।
भूख और लाचारी का ऐसा आलम है
अब जान सस्ती है रोटी नहीं।
जात और धर्म का ऐसा टॉनिक खिलाया जाता है
कि किसी बच्ची या व्यक्ति की
मौत में धर्म नज़र आता है।
महात्मा को मारने वाले की पूजा करने वाले
उन्हीं के नाम पर डींगे हाँकते है।
देश में बेरोज़गार बढ़ रहे हैं
पर नेताओं के आम खाने के तरीके सुर्खियां बटोरते हैं।
व्यक्ति की क्रय छमता कम होने की वजह से
कारखाने बंद हो रहे हैं ।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दाव पर है
देश प्रेम के दिखावे में जेट प्लेन को निम्बू मिर्ची का चोखा लगाना पड़ रहा है।
कवि हूं प्यार और वेदना को सिर्फ नहीं लिख सकता हूं
मेरा देश जल रहा है और यह अंदर से टूट रहा है।
-
थकान
●थकान
 ̄ ̄ ̄ ̄
किसान के पास
फ़सल की बोरियां भरते वक्त
बोरियां भर थकान भी होती है….लेकिन
वह नहीं भरता
थकान की बोरियां….क्योंकि-
वह जानता है थकान खरीद सके
उतना दम नहीं फ़सल खरीदने वालों में…!(रमेश धोरावत)
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